Tuesday, 1 August 2017

मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी,
 जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं।
प्रभावती की मुलाकात थिएटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महजबीं बानों (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)।
अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। और मीना कुमारी का बाप अपनी नौकरानी से भी निकाह कर लिया |
मीना कुमारी को कई लोगो से प्यार हुआ .. लेकिन सबने उन्हें इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ दिया ... धर्मेंद्र, सम्पूरन सिंह उर्फ़ गुलजार, महेश भट्ट, और शौहर कमाल अमरोही ... सबने मीना कुमारी का खूब इस्तेमाल किया .. यहाँ तक की मीना कुमारी का बाप भी अपनी बेटी को सिर्फ पैसे कमाने की मशीन ही समझता था और पुरे परिवार का खर्चा मीना कुमारी से ही लेता था .. यहाँ तक की उनकी सभी बहने भी मीना कुमारी से हमेशा पैसे लेती रहती थी |
कमाल अमरोही मीना कुमारी से २७ साल बड़े थे | मीना कुमारी का पूना में एक्सीडेंट हुआ और वो अस्पताल में भर्ती थी ..कमाल अमरोही ने उनकी खूब सेवा की जिससे मीना कुमारी का दिल उस पर आ गया .. और दोनों ने निकाह कर लिया ... मजे की बात ये की कमाल अमरोही की पहले से ही दो बेगमे थी ..एक उनके साथ मुंबई में और दूसरी उनके शहर यूपी के अमरोहा में रहती थी .और कमाल के आठ बच्चे थे | मीना कुमारी मुंबई की जिन्दगी से तंग आ गयी थी और कमाल अमरोही से बार बार कहती थी की कमाल तुम मुझे अपने गाँव अमरोहा ले चलो .मै वही रहना चाहती हूँ .. एक बार कमाल उन्हें साथ लेकर गये तो कमाल के घर वालो ने मीना कुमारी से बहुत दुर्व्यवहार किया और कहा कमाल तुमने तो किसी वेश्या से निकाह किया है |
बाद में उनका कमाल अमरोही से तलाक हो गया ... फिर उन्होने कमाल से दुबारा निकाह किया .... इस्लामिक नियमो के अनुसार यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देता है तो वो दुबारा उस महिला से निकाह नही कर सकता ..पहले उस महिला को किसी अन्य पुरुष से निकाह करना होगा फिर वो पुरुष उसे तलाक देगा फिर वो महिला अपने पूर्व पति से दुबारा निकाह कर सकती है ..
मीना कुमारी ने जीनत अमान के पिता के साथ निकाह किया फिर उनसे तलाक लेकर कमाल अमरोही से दुबारा निकाह किया ...लेकिन कमाल निकाह के बाद अपनी जिन्दगी में चला गया |
लेकिन बाद में उन्होंने अपने आपको शराब में डुबो लिया था .. वो हर वक्त शराब पीती रहती थी .. शराब ने उनके लीवर को खत्म कर दिया था और वो मानसिक रूप से एकदम टूट गयी थी ..उन्हें कैंसर हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा |
अस्पताल में ही उनकी मौत हो गयी .. और किसी ने भी उनके ईलाज पर १ रूपये भी नही खर्च किया ..
इसी सभ्य समाज में मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी की लाश को लावारिश घोषित करने की नौबत आ गयी थी ...उन्हें कैंसर हो गया था कई अंतिम समय में कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा था ..और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गयी थी
मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही ने अस्पताल में कहा की मैंने तो उन्हें तलाक दे दिया था ... उसने सौतेले पुत्र ताजदार अमरोही ने कहा की मेरा उनसे कोई वास्ता नही है ... उनके छोटी बहन के पति मशहूर कामेडियन महमूद ने कहा की मै क्यों ८०००० दूँ ?
और तो और जिस धर्मेन्द्र को फगवाडा से मुंबई बुलाकर स्टार बनाया वो भी बिल का नाम सुनते ही खिसक गया |
फिर जिस सम्पूरन सिंह कालरा को मीना कुमारी ने झेलम की गलियों से मुंबई बुलाकर "गुलज़ार" बनाया उस गुलज़ार ने कहा की मै तो कवि हूँ और कवि के पास इतना पैसा कहा ...जबकि उसी गुलज़ार ने एक मुशायरे में जिसमे मीना कुमारी भी थी कहा था "ये तेरा अक्स है तो पड़ रहा है मेरे चेहरे पर ..वरना अंधेरो में कौन पहचानता मुझे "
हर टीवी चैनेल पर आकर मुस्लिम हितों पर बड़ी बड़ी बाते करने वाला महेश भट्ट बोला मै पैसे क्यों दूँ ?
. जिससे अस्पताल वालो को कहना पड़ा की अब हमे मीना कुमारी जी की लाश को लावारिश घोषित करके बीएमसी वालो को देना पडेगा ... जब ये खबर अखबारों में छपी तबएक अनजान पारसी व्यक्ति अस्पताल आया और बिल चुकाकर मीना कुमारी के शव को सम्मान के साथ इस्लामिक विधि से कब्रिस्तान में दफन करवाया

Monday, 31 July 2017

राजनीति का बदलता चेहरा

सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल जो राज्य की सरकार बनाते गिराते थे, मंत्री के विभाग तय करते थे वह राज्य सभा सांसद बनने के लिए विधायक नहीं जुटा पा रहे हैं।

दलित शोषित वर्ग की रहनुमाई करने वाली मायावती ने इसी संभावना के कारण इस्तीफा दे दिया क्योंकि उनके पास भी राज्य सभा सांसद बनने के लिए आवश्यक संख्या बल नहीं है।

जो लालू यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा बने फिर रहे थे और जमीनी राजनीति के माहिर खिलाड़ी थे उनके सामने से सरकार चली गई और वे हाथ मलते रह गये।

जिस आर एस एस को 1947 से समाप्त करने की कोशिश की जा रही थी आज उसी आर एस एस का स्वयंसेवक पी एम है , राष्ट्रपति है ,उप राष्ट्रपति होने वाला है ,उसी आर एस एस के 17 सी एम हैं और 20 राज्यपाल हैं।देश के 62% भाग पर भगवा फहर रहा है।

3 साल के मोदी राज में किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता हवाला टेरर फंडिंग में गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पत्थरबाजों की रफ्तार धीमी हो गई है। चीन डोकलम से आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रहा है।

देश बदल रहा है । बाजार उछाल पर है। नीतीश कुमार ने मोदी से हाथ मिला लिया है। केजरीवाल चुप हैं।

और अभी भी कुछ लोग 15 लाख , टमाटर ,अच्छे दिन , व्यापम ,नोटबंदी , जीएसटी पर चुटकुले कोट्स जोक्स बना रहे हैं।-vitthal vyas



kahani srijan

" एक गाँव में एक संपन्न परिवार रहता था, उनके पास खेती बाड़ी और पशुओं की कोई कमी नही थी, परिवार में दो बेटे थे जो शादीशुदा और संपन्न थे लेकिन एक बेटा बेईमान था वो हमेशा किसी न किसी बात पर अपने माता पिता और भाई से झगड़ा करता रहता था, उसकी रोज़ की कलह कलेश को देखकर मातापिता ने सारी संपत्ति दो भागों में बाँट दी, वो कलेशि लड़का अपनी सारी सम्पति लेकर दूसरे गाँव में वस गया।
लेकिन उस बेईमान लड़के के भी एक लड़का और लड़की थी जो विभाजन के समय ये कहकर की "वो दादा और दादी को छोड़कर कहीं नही जाएंगे वो दादा दादी को बहुत प्रेम करते हैं, वो हमेशा दादा दादी के साथ ही रहेंगें"
और वो दोनों दादा दादी के साथ रुक गये।
बूढे दादा दादी उन्हें बहुत प्यार करते थे, अब दादा दादी ने उन बच्चों का अच्छे स्कूल में दाखिला कराया, उन्हें अच्छी अच्छी व्यवस्था देने लगे। शुरुआती दिनों में उन बच्चों ने दादा दादी से कहा की वे कभी उन माता पिता के पास नही जाएँगे, दादा दादी में बच्चों को समझाया की तुम हर महीने अपने माता पिता से मिल सकते हो।
अब बच्चे हर महीने अपने माता पिता के पास जाते थे और दादा दादी के ख़र्चे से मौज उड़ाते थे। इस तरह उनका समय बीतता गया।
कुछ वर्षों बाद जब बच्चे बड़े हो गये, अब दादा दादी ने अपना हिस्सा बेचकर लड़के के लिए एक अच्छा व्यवसाय खुलवाया और लड़की के लिए एक अच्छा परिवार देखकर शादी कर दी, जिसमें दादा दादी ने अपनी सम्पति का चौथाई हिस्सा दहेज़ में दे दिया।
अब लड़के ने अपने व्यवसाय में घाटा दिखाकर उस व्यवसाय को बचाने के बहाने दादा दादी से और रुपये ऐंठा, फिर लड़की ने भी अपने पति के लिए व्यवसाय खुलवाने के लिए दादा दादी से एक अच्छी रक़म उधार ली, इस तरह ये मंझारा चलता रहा और दादा दादी हमेशा इस भृम में रहे की उनके नाती नातिनि उन्हें बहुत प्यार करते हैं।
लेकिन दादा दादी का दूसरा लड़का जो ये मंशा समझ रहा था ने उन बुड्ढों को समझाने की बहुत कोशिस की जिसके चलते परिवार में बहुत झगड़ा हुआ, फिर उन लड़के लड़की ने सारे गाँव में ये हल्ला मचा दिया की दादा दादी और उसके चाचा जी उन पर बहुत अत्याचार कर रहे हैं, फिर उन बच्चों ने गाँव में शोर कर दिया की इन दादा दादी के कहने पर वे अपने माता पिता के साथ नही गये और आज ये सभी हम पर अत्याचार कर रहें हैं, फिर उन बच्चों ने "पटवारी" को कुछ लालच देकर अपने पक्ष में खड़ा कर लिया और गाँव में घोषणा कर दी की वे दादा दादी की सम्पति के जायज़ हक़दार हैं और वे अपना हिस्सा लेकर दादा दादी से अलग होना चाहते हैं।
अब गाँव के कुछ लालची उनके पक्ष में खड़े हो गये और इस तरह उन बच्चों ने दादा दादी को कंगाल कर दिया और उन बूढे दादा दादी को सारे गाँव की नज़रों में अत्याचारी, बेईमान, धोखेबाज़ की पदवी दिला दी।
और फिर वो बच्चे अपने माँ बाप के साथ मिल गये।
अब दिनों बाद कहानी में ट्विस्ट आया जब दादा दादी को पता चला की "ये सारा खेल प्रीप्लान था, जिसे उनके ही उस कलेशि लड़के ने रचा था और जान बूझकर अपने बच्चों को वहाँ छोड़कर गया जिससे वो उनकी सारी सम्पति को हड़प सके"
अब मेरे पिताजी ने मुझसे कहा की "अशोक अब मुसलमानों की स्तिथि देखो, उन्होंने भारत जैसे सम्पन्न परिवार को जान बूझकर धर्म के आधार पर विभाजित करवाया और अपना हिस्सा लिया।
अब उन्होंने अपने प्लान के थ्रू कुछ मुसलमानों को भारत में ही रहने की हिदायत दी, अब उन मुसलमानों ने भी भारत के हिन्दुओँ को भरोषा दिया की वो भारत से बहुत प्यार करते हैं (ठीक वैसे ही जैसे वो बच्चे उन बूढ़े दादा दादी से करते थे)
और वो अपने मरते दम तक भारत में ही रहेंगें"
फिर कुछ सालों बाद उन मुसलमानों ने पाकिस्तान के अपने रिश्तेदारों ( माता पिता) से मिलना शुरू कर दिया, लेकिन मासूम भारत के हिन्दू यही समझते रहे की वो मुसलमान उन्हें बहुत प्यार करते हैं, इसलिये वो मुस्लिम भारत छोड़कर नही गये।
इस वात्सल्य में हिन्दुओँ ने अपनी जमीं पर उनके लिए मस्जिदें बनवायीं और उन्हें सिर आँखों पर रखा।
फिर उन मुसलमानों ने अपना रँग दिखाना शुरू किया और बेईमानी पर उतर आये और उन्होंने भारत के कई हिस्सों पर अपनी आबादी के आधार पर कब्ज़ा जमा लिया, जिसमें उस "पटवारी" जैसे वामपंथियों ने भारत में ये घोषणा कर दी की हिन्दू बहुत दमनकारी और अत्याचारी हैं, इन हिन्दुओँ ने मासूम मुसलमानों पर अत्याचार किया है और उनका हिस्सा नही दे रहे।
फिर पिताजी ने कहा की " तुम्हें क्या लगता है, की उन दादा दादी ( हिन्दुओँ ) को आज वेवकूफ़ बनाया जा रहा है, एक्चुअल में उन दादा दादी (हिन्दुओँ )का वेवकूफ़ बनने का इतिहास बहुत पुराना है, पहले मुसलमानों ने हिन्दुओँ को तलवार के बल पर इस्लाम क़बूल कराया और जब इससे बात ना बनी तो उन्होंने हिन्दुओँ को वेवकूफ़ बनाने का एक और तरीका ईजाद कर लिया, वो था "सूफ़ी संत" जिसमें हिन्दुओँ को ढोंगी प्रेम के नाम पर इस्लाम और अल्लाह की महत्ता दिखाने लगे, उनके हर सूफ़ी गाने में सिर्फ़ इस्लाम के प्रतीकों जैसे " अल्लाह, ख़ुदा, मौला, रसूल, सजदा जैसे शब्द ही आते थे जिसको उन मासूम दादा दादी जैसे हिन्दुओँ ने पुरजोर से अपनाया।
फिर पिताजी ने मुझसे कहा की " भारत एक मात्र हिन्दू राष्ट्र है, लेकिन दुःख की बात है यहाँ हिन्दुओँ को आज भी मुसलमानों की मानसिकता समझ नही आयी, तुम्हें क्या लगता है अगर कश्मीर इन्हें दे दिया जाए तो समस्या ख़त्म हो जायेगी! बिल्कुल नही ख़त्म होगी, आज ये कश्मीर की माँग कर रहे हैं आने वाले कल को ये हैदराबाद माँगेगे फिर केरल फिर असम फिर पश्चिम बंगाल और इस तरह ये धीरे धीरे पुरे भारत पर कब्ज़ा करना चाहेँगे।
क्या तुम जानते हो मुसलमान हमेशा अपने प्री प्लान के थ्रू काम करते हैं, जब उन्हें किसी देश पर कब्ज़ा करना होता है तो वो हमेशा अपने आप को दो ग्रुप में डिवाइड कर लेते हैं जिसमें एक कट्टर होता है जो आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता है और दूसरा तुमसे झूठें प्रेम का ढोंग दिखाता है जो तुम्हें हमेशा ये विश्वास दिलाता है की आतंकवादी इस्लामी नही होते, उन्हें धर्म के आधार पर नही देखना चाहिए और तुम मासूम हिन्दू उनकी बात मान लेते हो, ये रक़म खर्च करके हिन्दुओँ के कुछ ग़द्दारों जैसे वामपंथी और पत्रकारों को अपनी तरफ़ मिला लेते हैं फिर वो ग़द्दार देश में हर तरह ये माहौल बना देते हैं की मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है। और धीरे धीरे तुम सभी हिन्दू अपनी सम्पति जैसे कश्मीर, बंगाल, असम, केरल, यूपी, बिहार, जैसे कई राज्यों से उन दादा दादी की तरह बेदखल कर दिए जाते हो, लेकिन वो दूसरा शाँति और प्रेम का ढोँग दिखाने वाला समुदाय तुम्हें कभी महशुस ही नही होने देता की तुम्हारे घर से बेदख़ल किया जा रहा है और तुम आँख बन्द करके मान भी लेते हो"
और सुनों जब वो तुम्हारे राज्य या देश पर कब्ज़ा कर लेते हैं तो फिर वो दोनों ( आतंकवादी कट्टर और शाँति का ढोँग करने वाले) उस राज्य या देश को आपस में बराबर बाँट लेते हैं ठीक उस कलेशि बाप और उनके बच्चों की तरह"......
अब पिताजी ने अपनी बात पर विराम दिया और
मैं आज अपने पिताजी की बात सुनकर स्तब्ध रह गया, कितनी बढ़ी बात उन्होंने कितने आसान शब्दों में समझा दी।
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धन्यवाद
साभार Ashok Sharma 

Sunday, 30 July 2017


“वो सच - जो हर भारतीय को "जानना और समझना" चाहिए”
आखिर क्या है – “अनुच्छेद 35A “

नेहरू ने संविधान संशोधन कर के इसी काले अनुच्छेद को देश पर थोप दिया था।
संविधान का यही वह अदृश्य काला हिस्सा है, जो जम्मू-कश्मीर सरकार को भारत विरोधी गतविधियों का अधिकार देता है।
संविधान की किताबों में न मिलने वाला अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके।
अनुच्छेद 35A : संविधान का अदृश्य हिस्सा जिसने कश्मीर को लाखों लोगों के लिए नर्क बना दिया है।
जून 1975 में लगे आपातकाल को भारतीय गणतंत्र का सबसे बुरा दौर माना जाता है।
इस दौरान नागरिक अधिकारों को ही नहीं बल्कि भारतीय न्यायपालिका और संविधान तक को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा दिया गया था।
ऐसे कई संशोधन इस दौर में किये गए जिन्हें आज तक संविधान के साथ हुए सबसे बड़े खिलवाड़ के रूप में देखा जाता है।
लेकिन आपातकाल से लगभग बीस साल पहले 1954 में एक ऐसा 'संवैधानिक धोखा' किया गया था जिसकी कीमत आज तक लाखों लोगों को चुकानी पड़ रही है।
1947 में हुए बंटवारे के दौरान लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए थे. ये लोग देश के कई हिस्सों में बसे और आज उन्हीं का एक हिस्सा बन चुके हैं. दिल्ली, मुंबई, सूरत या जहां कहीं भी ये लोग बसे, आज वहीं के स्थायी निवासी कहलाने लगे हैं।
लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है. यहां आज भी कई दशक पहले बसे लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है।
कई दशक पहले बसे इन लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी आज भी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है।
एक आंकड़े के अनुसार, 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन हिंदू परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे।
यशपाल भारती भी ऐसे ही एक परिवार से हैं. वे बताते हैं, -- हमारे दादा बंटवारे के दौरान यहां आए थे. आज हमारी चौथी पीढी यहां रह रही है. आज भी हमें न तो यहां होने वाले चुनावों में वोट डालने का अधिकार है, न सरकारी नौकरी पाने का और न ही सरकारी कॉलेजों में दाखिले का...
यह स्थिति सिर्फ पश्चिमी पकिस्तान से आए इन हजारों परिवारों की ही नहीं बल्कि लाखों अन्य लोगों की भी है.. इनमें “गोरखा समुदाय” के वे लोग भी शामिल हैं जो बीते कई सालों से जम्मू-कश्मीर में रह तो रहे हैं।
इनसे भी बुरी स्थिति – “वाल्मीकि समुदाय” - के उन लोगों की है जो 1957 में यहां आकर बस गए थे. उस समय इस समुदाय के करीब 200 परिवारों को पंजाब से जम्मू कश्मीर बुलाया गया था।
कैबिनेट के एक फैसले के अनुसार इन्हें विशेष तौर से सफाई कर्मचारी के तौर पर नियुक्त करने के लिए यहां लाया गया था.
बीते 60 सालों से ये लोग यहां सफाई का काम कर रहे हैं. लेकिन इन्हें आज भी जम्मू-कश्मीर का “स्थायी निवासी” नहीं माना जाता।
ऐसे ही एक “वाल्मीकि परिवार” के सदस्य “मंगत राम” बताते हैं, 'हमारे बच्चों को सरकारी व्यावसायिक संस्थानों में दाखिला नहीं दिया जाता. किसी तरह अगर कोई बच्चा किसी निजी संस्थान या बाहर से पढ़ भी जाए तो यहां उन्हें सिर्फ सफाई कर्मचारी की ही नौकरी मिल सकती है।
यशपाल भारती और मंगत राम जैसे जम्मू कश्मीर में रहने वाले लाखों लोग भारत के नागरिक तो हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य इन्हें अपना नागरिक नहीं मानता।
इसलिए ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं. 'ये लोग भारत के प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन जिस राज्य में ये कई सालों से रह रहे हैं वहां के ग्राम प्रधान भी नहीं बन सकते।
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता “जगदीप धनकड़” बताते हैं, 'इनकी यह स्थिति एक “संवैधानिक धोखे” के कारण हुई है.'
ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं।
जगदीप धनकड़ उसी 'संवैधानिक धोखे' की बात कर रहे हैं जिसका जिक्र इस लेख की शुरुआत में किया गया था..
“जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर” बताते हैं :----
“14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश पारित किया गया था. इस आदेश के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया. यही आज लाखों लोगों के लिए अभिशाप बन चुका है”
'अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह “स्थायी नागरिक” की “परिभाषा” तय कर सके और उन्हें चिन्हित कर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे सके।
आशुतोष भटनागर के मुताबिक :--- 'यही अनुच्छेद परोक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर की विधान सभा को, लाखों लोगों को शरणार्थी मानकर हाशिये पर धकेल देने का अधिकार भी दे देता है।
आशुतोष भटनागर जिस अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र करते हैं, वह संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता. हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है।
जगदीप धनकड़ बताते हैं :--- 'भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है. लेकिन 35A कहीं भी नज़र नहीं आता।
दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है. यह चालाकी इसलिए की गई ताकि लोगों को इसकी कम से कम जानकारी हो...
वे आगे बताते हैं, 'मुझसे जब किसी ने पहली बार अनुच्छेद 35A के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि ऐसा कोई अनुच्छेद भारतीय संविधान में मौजूद ही नहीं है।
कई साल की वकालत के बावजूद भी मुझे इसकी जानकारी नहीं थी।
भारतीय संविधान की बहुचर्चित धारा 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष अधिकार देती है. 1954 के जिस आदेश से अनुच्छेद 35A को संविधान में जोड़ा गया था, वह आदेश भी अनुच्छेद 370 की उपधारा (1) के अंतर्गत ही राष्ट्रपति द्वारा पारित किया गया था।
लेकिन - आशुतोष भटनागर कहते हैं :--- “भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है. यह अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को है.. इसलिए 1954 का राष्ट्रपति का आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है”
अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) संविधान की किसी किताब में नहीं मिलता... हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं
अनुच्छेद 35A की संवैधानिक स्थिति क्या है -??- यह अनुच्छेद भारतीय संविधान का हिस्सा है या नहीं -??- क्या राष्ट्रपति के एक आदेश से इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ देना अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग करना है -??- इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र जल्द ही अनुच्छेद 35A को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहा है।
वैसे अनुच्छेद 35A से जुड़े कुछ सवाल और भी हैं. यदि अनुच्छेद 35A असंवैधानिक है तो सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 के बाद से आज तक कभी भी इसे असंवैधानिक घोषित क्यों नहीं किया -??-
यदि यह भी मान लिया जाए कि 1954 में नेहरु सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल किया था तो फिर किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने इसे समाप्त क्यों नहीं किया -??-
इसके जवाब में इस मामले को उठाने वाले लोग मानते हैं कि ज्यादातर सरकारों को इसके बारे में पता ही नहीं था शायद इसलिए ऐसा नहीं किया गया होगा।
अनुच्छेद 35A की सही-सही जानकारी आज कई दिग्गज अधिवक्ताओं को भी नहीं है...
जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र की याचिका के बाद इसकी स्थिति शायद कुछ ज्यादा साफ़ हो सके. लेकिन यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो आज भी सबके सामने है. पिछले कई सालों से इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा गया है।
यशपाल कहते हैं, 'कश्मीर में अलगाववादियों को भी हमसे ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं, वहां फौज द्वारा आतंकवादियों को मारने पर भी मानवाधिकार हनन की बातें उठने लगती हैं. वहीं हम जैसे लाखों लोगों के “मानवाधिकारों का हनन” पिछले कई दशकों से हो रहा है...
लेकिन देश को या तो इसकी जानकारी ही नहीं है या सब कुछ जानकर भी हमारे अधिकारों की बात कोई नहीं करता।
आशुतोष भटनागर कहते हैं :--- अनुच्छेद 35A दरअसल अनुच्छेद 370 से ही जुड़ा है. और अनुच्छेद 370 एक ऐसा विषय है जिससे न्यायालय तक बचने की कोशिश करता है. यही कारण है कि इस पर आज तक स्थिति साफ़ नहीं हो सकी है...
अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार देता है. लेकिन कुछ लोगों को -"विशेषाधिकार"- देने वाला यह अनुच्छेद क्या कुछ अन्य लोगों के “मानवाधिकार” तक छीन रहा है -??- यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो यही कहती है।
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इस के अलावा भी - आप कुछ जानना चाहे तो मैं कई लिंक दे रहा हूँ --
यहाँ पर देख लीजिये ..
कश्मीर के कहानी NDTV पर
{1} https://www.youtube.com/watch?v=YS6L3ToI67k
यहाँ भी देख सकते है --
{2} https://www.youtube.com/watch?v=-BCCLqtlx1o&feature=youtu.be
और यहाँ पर देख लीजिये --
बीकानेर के सांसद श्री अर्जुन राम मेघवाल जी द्वारा आर्टिकल 370 पर दिया गया यह व्याख्यान अत्यंत तर्कसंगत, समयोचित और शोधपूर्ण है!
- आर्टिकल 370 पर इससे अच्छा व्याख्यान - आपने शायद ही कभी सुना होगा !!
{3} http://www.youtube.com/watch?v=mq3Limy929U&feature=youtu.be
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साभार मित्रगण – संकलन और संसोधन – गिरधारी भार्गव 29.7.2017

संविधान की किताबों में न मिलने वाला अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके,,,
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जून 1975 में लगे आपातकाल को भारतीय गणतंत्र का सबसे बुरा दौर माना जाता है. इस दौरान नागरिक अधिकारों को ही नहीं बल्कि भारतीय न्यायपालिका और संविधान तक को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा दिया गया था. ऐसे कई संशोधन इस दौर में किये गए जिन्हें आज तक संविधान के साथ हुए सबसे बड़े खिलवाड़ के रूप में देखा जाता है. लेकिन क्या इस आपातकाल से लगभग बीस साल पहले भी संविधान के साथ ऐसा ही एक खिलवाड़ हुआ था? 'जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र' की मानें तो 1954 में एक ऐसा 'संवैधानिक धोखा' किया गया था जिसकी कीमत आज तक लाखों लोगों को चुकानी पड़ रही है.
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1947 में हुए बंटवारे के दौरान लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए थे. ये लोग देश के कई हिस्सों में बसे और आज उन्हीं का एक हिस्सा बन चुके हैं. दिल्ली, मुंबई, सूरत या जहां कहीं भी ये लोग बसे, आज वहीं के स्थायी निवासी कहलाने लगे हैं. लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है. यहां आज भी कई दशक पहले बसे लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है.
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एक आंकड़े के अनुसार, 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन हिंदू परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे. यशपाल भारती भी ऐसे ही एक परिवार से हैं. वे बताते हैं, 'हमारे दादा बंटवारे के दौरान यहां आए थे. आज हमारी चौथी पीढी यहां रह रही है. आज भी हमें न तो यहां होने वाले चुनावों में वोट डालने का अधिकार है, न सरकारी नौकरी पाने का और न ही सरकारी कॉलेजों में दाखिले का.'
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यह स्थिति सिर्फ पश्चिमी पकिस्तान से आए इन हजारों परिवारों की ही नहीं बल्कि लाखों अन्य लोगों की भी है. इनमें गोरखा समुदाय के वे लोग भी शामिल हैं जो बीते कई सालों से जम्मू-कश्मीर में रह तो रहे हैं. इनसे भी बुरी स्थिति वाल्मीकि समुदाय के उन लोगों की है जो 1957 में यहां आकर बस गए थे. उस समय इस समुदाय के करीब 200 परिवारों को पंजाब से जम्मू कश्मीर बुलाया गया था. कैबिनेट के एक फैसले के अनुसार इन्हें विशेष तौर से सफाई कर्मचारी के तौर पर नियुक्त करने के लिए यहां लाया गया था. बीते 60 सालों से ये लोग यहां सफाई का काम कर रहे हैं. लेकिन इन्हें आज भी जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं माना जाता.
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ऐसे ही एक वाल्मीकि परिवार के सदस्य मंगत राम बताते हैं, 'हमारे बच्चों को सरकारी व्यावसायिक संस्थानों में दाखिला नहीं दिया जाता. किसी तरह अगर कोई बच्चा किसी निजी संस्थान या बाहर से पढ़ भी जाए तो यहां उन्हें सिर्फ सफाई कर्मचारी की ही नौकरी मिल सकती है.'
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यशपाल भारती और मंगत राम जैसे जम्मू कश्मीर में रहने वाले लाखों लोग भारत के नागरिक तो हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य इन्हें अपना नागरिक नहीं मानता. इसलिए ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं. 'ये लोग भारत के प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन जिस राज्य में ये कई सालों से रह रहे हैं वहां के ग्राम प्रधान भी नहीं बन सकते.' सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनकड़ बताते हैं, 'इनकी यह स्थिति एक संवैधानिक धोखे के कारण हुई है.'
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ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं
जगदीप धनकड़ उसी 'संवैधानिक धोखे' की बात कर रहे हैं जिसका जिक्र इस लेख की शुरुआत में किया गया था. जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर बताते हैं, '14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश पारित किया गया था. इस आदेश के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया. यही आज लाखों लोगों के लिए अभिशाप बन चुका है.'
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'अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके और उन्हें चिन्हित कर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे सके.' आशुतोष भटनागर के मुताबिक 'यही अनुच्छेद परोक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर की विधान सभा को, लाखों लोगों को शरणार्थी मानकर हाशिये पर धकेल देने का अधिकार भी दे देता है.'
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आशुतोष भटनागर जिस अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र करते हैं, वह संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता. हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है. जगदीप धनकड़ बताते हैं, 'भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है. लेकिन 35A कहीं भी नज़र नहीं आता. दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है. यह चालाकी इसलिए की गई ताकि लोगों को इसकी कम से कम जानकारी हो.' वे आगे बताते हैं, 'मुझसे जब किसी ने पहली बार अनुच्छेद 35A के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि ऐसा कोई अनुच्छेद भारतीय संविधान में मौजूद ही नहीं है. कई साल की वकालत के बावजूद भी मुझे इसकी जानकारी नहीं थी.'
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भारतीय संविधान की बहुचर्चित धारा 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष अधिकार देती है. 1954 के जिस आदेश से अनुच्छेद 35A को संविधान में जोड़ा गया था, वह आदेश भी अनुच्छेद 370 की उपधारा (1) के अंतर्गत ही राष्ट्रपति द्वारा पारित किया गया था. लेकिन आशुतोष कहते हैं, 'भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है. यह अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को है. इसलिए 1954 का राष्ट्रपति का आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है.'
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अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) संविधान की किसी किताब में नहीं मिलता. हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं
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अनुच्छेद 35A की संवैधानिक स्थिति क्या है? यह अनुच्छेद भारतीय संविधान का हिस्सा है या नहीं? क्या राष्ट्रपति के एक आदेश से इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ देना अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग करना है? इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र जल्द ही अनुच्छेद 35A को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहा है.
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वैसे अनुच्छेद 35A से जुड़े कुछ सवाल और भी हैं. यदि अनुच्छेद 35A असंवैधानिक है तो सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 के बाद से आज तक कभी भी इसे असंवैधानिक घोषित क्यों नहीं किया? यदि यह भी मान लिया जाए कि 1954 में नेहरु सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल किया था तो फिर किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने इसे समाप्त क्यों नहीं किया? इसके जवाब में इस मामले को उठाने वाले लोग मानते हैं कि ज्यादातर सरकारों को इसके बारे में पता ही नहीं था शायद इसलिए ऐसा नहीं किया गया होगा.
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अनुच्छेद 35A की सही-सही जानकारी आज कई दिग्गज अधिवक्ताओं को भी नहीं है. जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र की याचिका के बाद इसकी स्थिति शायद कुछ ज्यादा साफ़ हो सके. लेकिन यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो आज भी सबके सामने है. पिछले कई सालों से इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा गया है. यशपाल कहते हैं, 'कश्मीर में अलगाववादियों को भी हमसे ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं, वहां फौज द्वारा आतंकवादियों को मारने पर भी मानवाधिकार हनन की बातें उठने लगती हैं. वहीं हम जैसे लाखों लोगों के मानवाधिकारों का हनन पिछले कई दशकों से हो रहा है. लेकिन देश को या तो इसकी जानकारी ही नहीं है या सबकुछ जानकर भी हमारे अधिकारों की बात कोई नहीं करता.'
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आशुतोष भटनागर कहते हैं, 'अनुच्छेद 35A दरअसल अनुच्छेद 370 से ही जुड़ा है. और अनुच्छेद 370 एक ऐसा विषय है जिससे न्यायालय तक बचने की कोशिश करता है. यही कारण है कि इस पर आज तक स्थिति साफ़ नहीं हो सकी है.' अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार देता है. लेकिन कुछ लोगों को विशेषाधिकार देने वाला यह अनुच्छेद क्या कुछ अन्य लोगों के मानवाधिकार तक छीन रहा है? यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो यही बताती है।

Tuesday, 25 July 2017

 जिन बिमारियों का इलाज डॉक्टर भी नहीं कर पा रहे उनका इलाज जोंक से किया जा रहा है...

दादी-नानी की कहानियों में खून चूसने के लिए कुख्यात माने जाने वाले जीव जोंक का इस्तेमाल असाध्य बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है। जोंक के खून चूसने की स्वाभाविक खूबी के साथ सामंजस्य बैठाते हुए चिकित्सीय जगत में इसका उपयोग स्वच्छ रक्त के बजाय दूषित रक्त को निकालने में किया जा रहा है।
नॉएडा स्थित डा. चौहान आयुर्वेद के चिकित्सा डॉ. अक्षय चौहान ने बताया कि जोंक से उपचार की विधि को आयुर्वेद में जलौकावचारण विधि की संज्ञा दी जाती है। चिकित्सा विज्ञान में इस विधि को लीच थैरेपी भी कहा जाता है। लीच थैरेपी से डायबिटिक फुट, गैंगरिन, सोरायसिस, नासूर समेत कई बीमारियों का सफलता से इलाज हो रहा है। डीप वेन थ्रंबायोसिस जिसमें पैर कटवाने की नौबत आ जाती है, में यह विधि कारगर है। डॉ. अक्षय चौहान जी ने बताया कि पिछले कुछ वर्ष के दौरान इस विधि से अनेको बहुत मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज हो चुका हैक्या है लीच थैरेपी
जोंकों को प्रभावित अंगों के ऊपर छोड़ दिया जाता है। जोंक अपने मुंह से ऐसे एंजाइम का स्राव करते हैं जो व्यक्ति को यह अहसास ही नहीं होने देते कि शरीर से खून चूसा जा रहा है। कृमि प्रजाति के इस जीव की सबसे बड़ी खासियत इसके स्लाइवा में मिलने वाला हिरुडिन नामक एंजाइम है, जो रक्त में थक्का नहीं बनने देता है। इसके स्राव से स्वच्छ रक्त का प्रवाह तेजी से होता है। जोंक दूषित रक्त को ही चूसती है। एक बार में जोंक शरीर से 5 मिलीलीटर खून चूस लेती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक प्रभावित अंग से दूषित रक्त को पूरी तरह चूस नहीं लिया जाता। दूषित रक्त की समाप्ति से स्वच्छ रक्त प्रवाह होता है जिससे जख्म जल्दी भरते हैं।
क्यों हो रही लोकप्रिय
डायबिटिक मरीजों के लिए शल्य क्रिया काफी खतरनाक मानी जाती है। इसकी वजह जख्मों को भरने में सामान्य के मुकाबले अत्यधिक समय लगता है। इस बीच कई बीमारियों के खतरे की आशंका बन जाती है। लीच थैरेपी इन सब मुसीबतों से निजात दिलाती है। और जख्म भी जल्दी भरता है.
रखा जाता है खास ख्याल
इंफेक्शन न हो, इसके लिए एक जोंक का एक ही मरीज के लिए प्रयोग किया जाता है। दूषित रक्त चूसने के बाद इनको उल्टी कराई जाती है, ताकि ये अपने मुंह से दूषित रक्त निकाल दें।
देखिए डॉक्टर ने कैसे इस मरीज का इलाज किया
यह मरीज पिछले 8 महीने से पैर के जख्म से पीड़ित था। लगातार एंटीबायोटिक (Antibiotic) के प्रयोग के बाद भी बिलकुल भी आराम नहीं हो रहा था। और जख्म की संख्या बढ़ती जा रही थी। पैर में बहुत ज्यादा दर्द हो रहा है अब तो चल भी नहीं सकता। पैर का जख्म वाला हिस्सा काला हो गया था, इस मरीज की Blood Report बिलकुल नार्मल है। एलोपैथिक डॉक्टर ने बताया कि यह SCHAMBERG DISEASE WITH PUNCHED OUT ULCER है।10 दिन पहले ये मरीज डॉक्टर चौहान जी के पास आया । उन्होंने इसे आचार्य सुश्रुत के अनुसार “दुष्ट व्रण” (लीच थेरेपी) की चिकित्सा प्रारम्भ कर दी। पैर का कालापन लगभग 50% कम हो गया। 7 दिन के बाद 50 ml रक्त निकाला। रक्त निकलते ही अगले दिन मरीज ने बताया कि पैर का दर्द बिल्कुल बंद हो गया। आज इस मरीज को 13 ज़ोक (leech) लगाई। लगभग 300 ml ब्लड निकाला। मरीज के अनुसार 10 दिन में उसकी 8 महीने पुरानी बीमारी में 50% आराम हो गया हैं।
साहस हिम्मत

मित्रों कई बार हमारे जीवन ऐसा समय आता है जब हम परेशानियों से गुजर रहे होते हैं। यही वो समय है जब एक इंसान की असली परीक्षा होती है, ज्यादातर लोग अक्सर इस समय टूट जाते हैं और अपने धैर्य को खो देते हैं। लेकिन इंसान को चाहिए कि वो ऐसे समय में विवेक से काम लें अपनी शक्तियों को ना भूलें और तनिक भी घबराएं नहीं क्यूंकि चाणक्य ने कहा है कि इंसान का साहस ऐसी चीज़ है जो हर समस्या को हरा सकता है।

एक छोटा सा प्रेरक प्रसंग(Hindi Kahaniyan) है
जिसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ –

किसी जंगल में एक गधा रहता था,एक बार गधा जंगल में घास चर रहा था। अचानक वहां एक भेड़िया आता है, वो भेड़िया सोचता है कि क्यों ना आज इस गधे का शिकार किया जाये, काफी तंदरुस्त गधा है और ज्यादा मांस भी होगा तो दो तीन दिन का काम हो जायेगा। यही सोचकर वो गधे के पास जाता है और बोलता है – अरे गधे तेरे दिन अब ख़त्म हुए मैं तुम्हें खाने जा रहा हूँ।

अचानक गधा हक्काबक्का रह जाता है और बुरी तरह घबरा जाता है फिर भी वह साहस नहीं छोड़ता। फिर कुछ सोचकर भेड़िये से बोलता है – आपका स्वागत है श्रीमान! मुझे कल साक्षात भगवान ने सपने में आकर कहा था कि कोई बड़ा दयालु और बुद्धिमान जानवर आकर मेरा शिकार करेगा और मुझे इस दुनिया के बंधन से मुक्त करायेगा। मुझे लगता है कि आप ही वो दयालु और बुद्धिमान जानवर हैं।

भेड़िया सोचता है कि वाह ये तो खुद ही मेरा शिकार बनने को तैयार है ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी इसको मारने में। गधा फिर बोलता है – लेकिन महाराज मेरी एक आखिरी इच्छा है, मैं चाहता हूँ कि आप मुझे खाने से पहले मेरी आखिरी इच्छा जरूर पूरी करें।

भेड़िया बोला- हाँ हाँ क्यों नहीं कहो क्या है तुम्हारी आखिरी इच्छा? गधा विनम्रता से बोला- महाराज मेरे पैर में एक छोटा पत्थर फंस गया है क्या आप उसे निकल देंगे? भेड़िया खुश होकर बोला- वाह इतना सा काम अभी करता हूँ, कहाँ है पत्थर ? फिर भेड़िया गधे के पीछे जाकर जैसे ही उसके पैर के पास गया, गधे ने भेड़िये के चेहरे पे इतनी जोर से लात मारी कि भेड़िया बहुत दूर जाकर गिरा। फिर उसके बाद गधा पूरी ताकत के साथ वहां से भाग निकला, भेड़िया देखता रह गया।

मित्रों ये एक कहानी मात्र नहीं है इस कहानी में आपकी बहुत सारी समस्याओं का हल छिपा है। आप चाहें तो भेड़िये रूपी परेशानियों के आगे हार मान सकते हैं या उन परेशानियों को अपने साहस के दम पर हरा सकते हैं।

हर इंसान के अंदर कुछ ना कुछ विलक्षणता जरूर होती है और परेशानियाँ तो जीवन का एक मुख्य हिस्सा हैं, कोई अमीर(Rich) हो या गरीब(Poor), छोटा हो या बड़ा, परेशानियाँ तो सबको आती है और आपके अंदर वो क्षमता भी है जो समस्याओं को हरा सकती है बस जरूरत है तो हिम्मत दिखाने कि, साहस से काम लेने की। परेशानियाँ बड़ी नहीं होती हैं बल्कि हमारे विचार ही समस्याओं को बड़ा या छोटा बनाते हैं।