Friday, 31 July 2015

एक संवाद......मुशीं फैज अली ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा :
"स्वामी जी हमें बताया गया है कि अल्लहा एक ही है।
यदि वह एक ही है, तो फिर संसार उसी ने बनाया होगा ?
"स्वामी जी बोले, "सत्य है।".
मुशी जी बोले ,"तो फिर इतने प्रकार के मनुष्य क्यों बनाये।  जैसे कि हिन्दु, मुसलमान, सिख्ख, ईसाइ और सभी को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथ भी दिये। एक ही जैसे इंसान बनाने में उसे यानि की अल्लाह को क्या एतराज था। सब एक होते तो न कोई लङाई और न कोई झगङा होता।
".स्वामी हँसते हुए बोले, "मुंशी जी वो सृष्टी कैसी होती जिसमें एक ही प्रकार के फूल होते। केवल गुलाब होता, कमल या रंजनिगंधा या गेंदा जैसे फूल न होते!".
फैज अली ने कहा सच कहा आपने  यदि  एक ही दाल होती तो  खाने का स्वाद भी  एक ही होता। दुनिया तो  बङी फीकी सी हो जाती!
स्वामी जी ने कहा, मुंशीजी! इसीलिये तो ऊपर वाले ने अनेक प्रकार के जीव-जंतु और इंसान बनाए ताकि हम पिंजरे का भेद भूलकर जीव की एकता को पहचाने।
मुशी जी ने पूछा, इतने मजहब क्यों ?
स्वामी जी ने कहा, " मजहब तो मनुष्य ने बनाए हैं, प्रभु ने तो केवल धर्म बनाया है।
"मुशी जी ने कहा कि, " ऐसा क्यों है कि एक मजहब में कहा गया है कि गाय और सुअर खाओ और दूसरे में कहा गया है कि गाय मत खाओ, सुअर खाओ एवं तीसरे में कहा गया कि गाय खाओ सुअर न खाओ;इतना ही नही कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि मना करने पर जो इसे खाये उसे अपना दुश्मन समझो।"
स्वामी जी जोर से हँसते हुए मुंशी जी से पूछे कि ,"क्या ये सब प्रभु ने कहा है ?"
मुंशी जी बोले नही,"मजहबी लोग यही कहते हैं।"
स्वामी जी बोले, "मित्र!  किसी भी देश या प्रदेश का भोजन वहाँ की जलवायु की देन है।
सागरतट पर बसने वाला व्यक्ति वहाँ खेती नही कर सकता, वह  सागर से पकङ कर मछलियां ही खायेगा। उपजाऊ भूमि के प्रदेश में खेती हो सकती है। वहाँ अन्न फल एवं शाक-भाजी उगाई जा सकती है। उन्हे अपनी खेती के लिए गाय और बैल बहुत उपयोगी लगे। उन्होने गाय को अपनी माता माना, धरती को अपनी माता माना और नदी को माता माना । क्योंकि ये सब  उनका पालन पोषण माता के समान ही करती हैं।"
"अब जहाँ मरुभूमि है वहाँ खेती कैसे होगी? खेती नही होगी तो वे गाय और बैल का क्या करेंगे? अन्न है नही  तो खाद्य के रूप में पशु को ही खायेंगे। तिब्बत में कोई शाकाहारी कैसे हो सकता है? वही स्थिति अरब देशों में है। जापान में भी इतनी भूमि नही है कि कृषि पर निर्भर रह सकें।
"स्वामी जी फैज अलि की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, " हिन्दु कहते हैं कि मंदिर में जाने से पहले या पूजा करने से पहले  स्नान करो। मुसलमान नमाज पढने से पहले वाजु करते हैं। क्या अल्लहा ने कहा है कि नहाओ मत, केवल लोटे भर पानी से हांथ-मुँह धो लो?
"फैज अलि बोला,  क्या पता कहा ही होगा!
स्वामी जी ने आगे कहा, नहीं, अल्लहा ने नही कहा! अरब देश में इतना पानी कहाँ है कि वहाँ पाँच समय नहाया जाए।  जहाँ पीने के लिए पानी बङी मुश्किल से मिलता हो वहाँ कोई पाँच समय कैसे नहा सकता है। यह तो भारत में ही संभव है, जहाँ नदियां बहती हैं, झरने बहते हैं, कुएँ जल देते हैं। तिब्बत में यदि पानी हो तो वहाँ पाँच बार व्यक्ति यदि नहाता है तो ठंड के कारण ही मर जायेगा। यह सब  प्रकृति ने सबको समझाने के लिये किया है।
"स्वामी विवेका नंद जी ने आगे समझाते हुए कहा कि," मनुष्य की मृत्यु होती है। उसके शव का अंतिम संस्कार करना होता है। अरब देशों में वृक्ष नही होते थे, केवल रेत थी। अतः वहाँ मृतिका समाधी का प्रचलन हुआ, जिसे आप दफनाना कहते हैं। भारत में वृक्ष बहुत बङी संख्या में थे, लकडी.पर्याप्त उपलब्ध थी अतः भारत में  अग्नि संस्कार का प्रचलन हुआ। जिस देश में जो सुविधा थी  वहाँ उसी का प्रचलन बढा। वहाँ जो मजहब पनपा उसने उसे अपने दर्शन से जोङ लिया।
"फैज अलि विस्मित होते हुए बोला!   "स्वामी जी इसका मतलब है कि हमें शव का अंतिम संस्कार प्रदेश और देश के अनुसार करना चाहिये। मजहब के अनुसार नही।
"स्वामी जी बोले , "हाँ! यही उचित है।" किन्तु अब लोगों ने उसके साथ धर्म को जोङ दिया। मुसलमान ये मानता है कि उसका ये शरीर कयामत के दिन उठेगा इसलिए वह शरीर को जलाकर समाप्त नही करना चाहता। हिन्दु मानता है कि उसकी आत्मा फिर से नया शरीर धारण करेगी  इसलिए उसे मृत शरीर से एक क्षंण भी मोह नही होता।
"फैज अलि ने पूछा कि, "एक मुसलमान के शव को जलाया जाए और एक हिन्दु के शव को दफनाया जाए  तो क्या प्रभु नाराज नही होंगे?
"स्वामी जी ने कहा," प्रकृति के नियम ही प्रभु का आदेश हैं। वैसे प्रभु कभी रुष्ट नही होते वे प्रेमसागर हैं, करुणा सागर है।
"फैज अलि ने पूछा तो हमें उनसे डरना नही चाहिए?
स्वामी जी बोले, "नही! हमें तो  ईश्वर से प्रेम करना चाहिए वो तो पिता समान है, दया का सागर है फिर उससे भय कैसा। डरते तो उससे हैं हम जिससे हम प्यार नही करते।
"फैज अलि ने हाँथ जोङकर स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, "तो फिर मजहबों के कठघरों से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?
"स्वामी जी ने फैज अलि की तरफ देखते हुए मुस्कराकर कहा, "क्या तुम सचमुच कठघरों से मुक्त होना चाहते हो?"
फैज अलि ने स्वीकार करने की स्थिति में  अपना सर हिला दिया।
स्वामी जी ने आगे समझाते हुए कहा,"फल की दुकान पर जाओ, तुम देखोगे  वहाँ आम, नारियल, केले, संतरे,अंगूर आदि अनेक फल बिकते हैं; किंतु वो दुकान तो फल की दुकान ही कहलाती है। वहाँ अलग-अलग नाम से फल ही रखे होते हैं।
" फैज अलि ने हाँ में सर हिला दिया।
स्वामी विवेकानंद जी ने आगे कहा कि ,"अंश से अंशी की ओर चलो।  तुम पाओगे कि सब  उसी प्रभु के रूप हैं।
"फैज अलि अविरल आश्चर्य से स्वामी विवेकानंद जी को देखते रहे और बोले "स्वामी जी मनुष्य ये सब क्यों नही समझता?
"स्वामी विवेकानंद जी ने शांत स्वर में कहा,  मित्र! प्रभु की माया को कोई नही समझता। मेरा मानना तो यही है कि, "सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है।जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मतमतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं।
मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।"...
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आज के दिन प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था।
उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे।
........उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ 13 साल की उम्र में ही उन्‍होंने तिलिस्मे होशरूबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिरजा रुसबा और मौलाना शरर के उपन्‍यासों से परिचय प्राप्‍त कर लिया
.......वे आर्य समाज से प्रभावित रहे' जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और १९०६ में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया।
........ उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
१९१० में उनकी रचना सोजे-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं।
कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद ,धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया।उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया।
प्रेमचंद ने 1901 मे उपन्यास लिखना शुरू किया। कहानी 1907 से लिखने लगे। उर्दू में नवाबराय नाम से लिखते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों लिखी गई उनकी कहानी सोज़ेवतन 1910 में ज़ब्त की गई , उसके बाद अंग्रेज़ों के उत्पीड़न के कारण वे प्रेमचंद नाम से लिखने लगे। 1923 में उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना की। 1930 में हंस का प्रकाशन शुरु किया।इन्होने 'मर्यादा', 'हंस', जागरण' तथा 'माधुरी' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया।
****बौलिबुड और मुंशी जी ******
प्रेमचंद हिन्दी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से हैं। उनके देहांत के दो वर्षों बाद के. सुब्रमण्यम ने 1938 में सेवासदन उपन्यास पर फ़िल्म बनाई जिसमें सुब्बुलक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। प्रेमचंद की कुछ कहानियों पर और फ़िल्में भी बनी हैं, जैसे सत्यजित राय की फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी[8] प्रेमचंद ने मज़दूर शीर्षक फ़िल्म के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म के स्वामियों ने कहानी की रूपरेखा तैयार की थी। फ़िल्म में एक देश-प्रेमी मिल-मालिक की कथा थी, किन्तु सेंसर को यह भी सहन न हो सका। फिर भी फ़िल्म का प्रदर्शन पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में हुआ। फ़िल्म का मज़दूरों पर इतना असर हुआ कि पुलिस बुलानी पड़ गई। अंत में फ़िल्म के प्रदर्शन पर भारत सरकार ने रोक लगा दी। इस फ़िल्म में प्रेमचंद स्वयं भी कुछ क्षण के लिए रजतपट पर अवतीर्ण हुए। मज़दूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष में वे पंच की भूमिका में आए थे। एक लेख में प्रेमचंद ने सिनेमा की हालत पर अपना भरपूर रोष और असन्तोष व्यक्त किया है। वह साहित्य के ध्येय की तुलना करते हैं:
1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर आधारित ओका ऊरी कथा से एक तेलुगु फ़िल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। 1963 में गोदानऔर 1966 में ग़बन उपन्यास पर लोकप्रिय फ़िल्में बनीं। 1980 में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था। [5
प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह माने जाते हैं। यों तो उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ १९०१ से हो चुका था
पर उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर अंक में १९१५ में सौत नाम से प्रकाशित हुई और १९३६ में अंतिम कहानी कफन नाम से। बीस वर्षों की इस अवधि में उनकी कहानियों के अनेक रंग देखने को मिलते हैं।
उनसे पहले हिंदी में काल्पनिक, एय्यारी और पौराणिक धार्मिक रचनाएं ही की जाती थी। प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की। " भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी जड़ें कहीं गहरे प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं।"
प्रेमचंद के लेख 'पहली रचना' के अनुसार उनकी पहली रचना अपने मामा पर लिखा व्‍यंग्‍य थी, जो अब अनुपलब्‍ध है। उनका पहला उपलब्‍ध लेखन उनका उर्दू उपन्यास 'असरारे मआबिद'।
प्रेमचंद का दूसरा उपन्‍यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन नाम से आया जो १९०८ में प्रकाशित हुआ।
सोजे-वतन यानी देश का दर्द। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी सरकार ने रोक लगा दी और इसके लेखक को भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी। इसके कारण उन्हें नाम बदलकर लिखना पड़ा।
'प्रेमचंद' नाम से उनकी पहली कहानीबड़े घर की बेटी ज़माना पत्रिका के दिसंबर १९१० के अंक में प्रकाशित हुई। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ मानसरोवर नाम से 8 खंडों में प्रकाशित हुई। कथा सम्राट प्रेमचन्द का कहना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। यह बात उनके साहित्य में उजागर हुई है। १९२१ में उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी नौकरी छोड़ दी।
कुछ महीने मर्यादा पत्रिका का संपादन भार संभाला, छह साल तक माधुरी नामक पत्रिका का संपादन किया, १९३० में बनारस से अपना मासिक पत्र हंस शुरू किया और १९३२ के आरंभ में जागरण नामक एक साप्ताहिक और निकाला। उन्होंने लखनऊ में १९३६में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की।
उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी-लेखक की नौकरी भी की।१९३४ में प्रदर्शित मजदूर नामक फिल्म की कथा लिखी और कंट्रेक्ट की साल भर की अवधि पूरी किये बिना ही दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस भाग आये क्योंकिबंबई (आधुनिक मुंबई) का और उससे भी ज़्यादा वहाँ की फिल्मी दुनिया का हवा-पानी उन्हें रास नहीं आया।
उन्‍होंने मूल रूप से हिंदी में 1915 से कहानियां लिखना और 1918 (सेवासदन) से उपन्‍यास लिखना शुरू किया। प्रेमचंद ने कुल करीब तीन सौ कहानियां, लगभग एक दर्जन उपन्यास और कई लेख लिखे। उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे और कुछ अनुवाद कार्य भी किया। प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। गोदान उनकी कालजयी रचना है. कफन उनकी अंतिम कहानी मानी जाती है। उन्‍होंने हिंदी और उर्दू में पूरे अधिकार से लिखा। उनकी अधिकांश रचनाएं मूल रूप से उर्दू में लिखी गई हैं लेकिन उनका प्रकाशन हिंदी में पहले हुआ। तैंतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमित।
जिस युग में प्रेमचंद ने कलम उठाई थी, उस समय उनके पीछे ऐसी कोई ठोस विरासत नहीं थी और न ही विचार और प्रगतिशीलता का कोई मॉडल ही उनके सामने था सिवाय बांग्ला साहित्य के। उस समय बंकिम बाबू थे, शरतचंद्र थे और इसके अलावा टॉलस्टॉय जैसे रुसी साहित्यकार थे। लेकिन होते-होते उन्होंने गोदान जैसे कालजयी उपन्यास की रचना की जो कि एक आधुनिक क्लासिक माना जाता है। उन्होंने चीजों को खुद गढ़ा और खुद आकार दिया। जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था तब उन्होंने कथा साहित्य द्वारा हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को जो अभिव्यक्ति दी उसने सियासी सरगर्मी को, जोश को और आंदोलन को सभी को उभारा और उसे ताक़तवर बनाया और इससे उनका लेखन भी ताक़तवर होता गया।[
प्रेमचंद एक सफल अनुवादक भी थे। उन्‍होंने दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को पढा और जिनसे प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया। 'टॉलस्‍टॉय की कहानियां' (1923), गाल्‍सवर्दी के तीन नाटकों का 'हडताल' (1930), 'चांदी की डिबिया' (1931) और 'न्‍याय' (1931) नाम से अनुवाद किया। उनके द्वारा रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्‍यास 'फसान-ए-आजाद' का हिंदी अनुवाद 'आजाद कथा' बहुत मशहूर हुआ।
प्रेमचंद के अध्‍येता कमलकिशोर गोयनका ने अपनी पुस्‍तक 'प्रेमचंद : अध्‍ययन की नई दिशाएं' में प्रेमचंद के जीवन पर कुछ आरोप लगाकर उनके साहित्‍य का महत्‍व कम करने की कोशिश की. प्रेमचंद पर लगे मुख्‍य आरोप हैं- प्रेमचंद ने अपनी पहली पत्‍नी को बिना वजह छोडा और दूसरे विवाह के बाद भी उनके अन्‍य किसी महिला से संबंध रहे (जैसा कि शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर में' में उद्धृत किया है), प्रेमचंद ने 'जागरण विवाद' में विनोदशंकर व्‍यास के साथ धोखा किया, प्रेमचंद ने अपनी प्रेस के वरिष्‍ठ कर्मचारी प्रवासीलाल वर्मा के साथ धोखाधडी की, प्रेमचंद की प्रेस में मजदूरों ने हडताल की, प्रेमचंद ने अपनी बेटी के बीमार होने पर झाड-फूंक का सहारा लिया आदि. कमलकिशोर गोयनका द्वारा लगाए गए ये आरोप प्रेमचंद के जीवन का एक पक्ष जरूर हमारे सामने लाते हैं जिसमें उनकी इंसानी कमजोरियों जाहिर होती हैं लेकिन उनके व्‍यापक साहित्‍य के मूल्‍यांकन पर इन आरोपों का कोई असर नहीं पड पाया है।
अंतिम दिनों के एक वर्ष को छोड़कर (सन 1934-35 जो मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में बीता), उनका पूरा समय वाराणसी और लखनऊ में गुज़रा, जहाँ उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और अपना साहित्य-सृजन करते रहे। 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर रोग से उनका देहावसान हुआ।[8]इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
प्रेमचंद का रचना संसार - उनका कृतित्व संक्षेप में निम्नवत है-
उपन्यास- वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन(१९१६),
प्रेमाश्रम(१९२२), निर्मला(१९२३), रंगभूमि(१९२४), कायाकल्प(१९२६), गबन(१९३१), कर्मभूमि(१९३२), गोदान(१९३२), मनोरमा, मंगल-सूत्र(१९३६-अपूर्ण)।
कहानी-संग्रह- प्रेमचंद ने कई कहानियाँ लिखी है। उनके २१ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे जिनमे ३०० के लगभग कहानियाँ है। ये शोजे वतन, सप्त सरोज, नमक का दारोगा, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रसून, प्रेम द्वादशी, प्रेम प्रतिमा, प्रेम तिथि, पञ्च फूल, प्रेम चतुर्थी, प्रेम प्रतिज्ञा, सप्त सुमन, प्रेम पंचमी, प्रेरणा, समर यात्रा, पञ्च प्रसून, नवजीवन इत्यादि नामों से प्रकाशित हुई थी।
प्रेमचंद की लगभग सभी कहानियोन का संग्रह वर्तमान में 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित किया गया है।
नाटक- संग्राम(१९२३), कर्बला(१९२४) एवं प्रेम की वेदी(१९३३)
जीवनियाँ- महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम तलवार और त्याग, जीवन-सार(आत्म कहानी)
बाल रचनाएँ- मनमोदक, कुंते कहानी, जंगल की कहानियाँ, राम चर्चा।
इनके अलावे प्रेमचंद ने अनेक विख्यात लेखकों यथा- जार्ज इलियट, टालस्टाय, गाल्सवर्दी आदि की कहानियो के अनुवाद भी किया। —

Thursday, 30 July 2015

ए पी जे कलाम ।

लैब में महीनों से काम बहुत जोर शोर से चल रहा था। लोग देर रात तक काम कर रहे थे और किसी ने भी लंबे अरसे से कोई छुट्टी नहीं ली थी।
एक वैज्ञानिक ऑफिस पहुँचते ही अपने बॉस को बोलता है के आज उसने अपने बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने का वादा किया है इसलिए वो आज घर जल्दी जाना चाहता है। बॉस ने सहमति दे दी। खुशी-2 वो वैज्ञानिक काम में लग गया। काम कठिन था और धुन में लगे होने से उसे याद ही नहीं रहा कब रात्रि के 11 बज गए। वो दु:खी होकर घर पहुँचा परंतु बच्चे देर रात भी अपने पापा का इंतज़ार ढेर सारे खिलौनों के साथ कर रहे थे। बच्चे बहुत खुश थे। पता चला के उस वैज्ञानिक के बॉस खुद बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने ले गए थे वो भी वक्त पर पहुँच कर।
वो बॉस कोई और नहीं खुद डॉ कलाम थे!!
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तारीख 18 मई 1998, स्थान पोकरण... सुबह के 7 बजे..
चित्र में रक्षा मंत्रालय की फ़ाइल के साथ
मेजर जनरल पृथ्वीराज उर्फ़ ए पी जे कलाम ।
पोखरण 2 शक्ति स्थल से कुछ किलो मीटर दूर।
कलाम साहब ने अपने संस्मरण में लिखा है कि माह मई में उस दिन भी सुबह सर्द थी । ठंडी हवाए जोर से बह रही थी । हम 14 लोग जल्द तैयार होकर रेत पर दौड़ने वाली टायरों युक्त मिलिट्री जीप में सवार होकर उस इलाके में पहुंचे जहा अलग-अलग स्थानों पर जमीन में 6 गहरे कुंए खोदे गए थे जिनमे से 5 में एटामिक/ हाइड्रोजन बम रख्खे जा चुके थे ।
कमांडेंट के आदेश मिलते ही कुछ ही मिनटों में ट्रको और बुलडोजरों का एक बड़ा काफिला आया और रेत की बोरियो से घेरे हुए सभी 6 गहरे कुंओ को मात्र 55 मिनट में रेत से भर ही नही दिया बल्कि उनके उपर रेत की एक-एक छोटी-छोटी पहाड़िया भी बना दी ।
इसके कुछ देर बाद 3 कुंओ में विस्फोट कराया गया जिसमे एक हाइड्रोजन बम था ।
तो ऐसे थे हमारे कलाम साहब । उस वक्त उनकी उम्र 65 वर्ष के आस-पास थी और वो लगातार 4 रातो में जागकर आप्रेसन "पोखरन 2" को सफल बनाने में लगे हुए थे और सफल बनवाया ।
स्व डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम का राष्ट्रपति पद हेतु दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित था ..पर सोनिया गांधी उनसे अपना हिसाब चुकता करने ..के लिए दूसरे कार्यकाल के लिए ..भारत के इतिहास की सबसे अयोग्य और 1977 में इन्द्रा गांधी का किचन सँभालने वाली प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना दिया .....
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पाकिस्तान आज भारत को तोड़ने की बात सिर्फ इसी लिए सोचने की हिम्मत कर पाता है क्योंकि उसको पता है की इस के लोग सिर्फ राजनीति करते है
जब तक हमारे देश में  जैसे गद्दार, देशद्रोही भड़वे मौजूद है तब तक देश को बर्बाद करने के लिए कसाब , अजमल और याकूब जैसे आतंकवादियों की कोई जरुरत नहीं है
पिछले 22 सालो में ये दलाल 1993 में मारे गए 257 लोगो में से किसी एक के घर नहीं गया पर एक आतंकवादी को बचाने के लिए साला भड़वा रात को 12:30 बजे चीफ जस्टिस के घर पहुच गया और उस आतंकवादी के लिए 14 दिन का समय और मांगने लगा क्यों मियाँ पिछले 22 सालो से इसका वकील और आप जैसे याकूब के भड़वे कोर्ट में गिल्ली डंडा खेल रहे थे क्या और जिस देश में रात को 12 बजे के बाद मकान मालिक दरवाजा नहीं खोलता उस देश में एक आतंकवादी की सुनवाई करने के लिए रात 2 बजे सुप्रीम कोर्ट खोला गया ?
अगर इस देश को वाकई आतंकवाद से मुक्त करना है तो याकूब से पहले उसकी पैरवी करने वाले और विदेशी पैसो पर पलने वाले इन जैसे दलालों को देश से मुक्त करना होगा .........
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सरबजीत सालो पाकिस्तान की जेल में बन्द रहा ,उसकी बहने दर बदर उसकी रिहाई की गुहार मांगती रही और उसे पाकिस्तान की जेल में मार दिया गया |
तब किसी की भी आवाज नही आई
आज जब सेकड़ो मोत के गुनहगार को फांसी की सजा मिली तो देश के चन्द दगलबाज ,नपुंसक ,वकील से लेकर नेता और अभिनेता तक भोंक रहे हैं !
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 रोमांचक रात
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रात 11 बजे जैसे ही सोने लगा तभी टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आई कि प्रशांत भूषण व अन्य वकील जज साहब के घर के बाहर खड़े है..मांग थी कि उनकी दलील फिर से एक बार सुनी जाए । डर तो मुझे इस बात का था की इतनी सुनवाई के बाद कोर्ट बहरा न हो जाए ।
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खैर...शुरुवाती 3 घंटे तक तो जज साब घर से बाहर ही नहीं आये । मुझे डर था कि कही याकूब मेमन को छोड़ कर वो इन वकीलों को ही फांसी पर ना लटका दे..नींद में खलल डालने का इलज़ाम लगाकर । फिर रात 2 बजे ब्रेकिंग न्यूज़ आई कि अदालत लगेगी और सुनवाई होगी । बताइये ये तो हद ही हो गयी..सुप्रीम कोर्ट ना हुआ पान की दूकान हो गयी जिसे आप रात को 2 बजे खुलवा कर 4 गोल्ड फ्ल्रेक और एक रजनीगन्धा ले लो और चलते बनो..या फिर कोर्ट ना हुआ गाँव का ठेका हो गया कि जब तलब लगी तब खुलवा लिया । वैसे याकूब भाई की दाद देनी पड़ेगी कि जहां अपने जैसे लौंडो के लिए रात के 2 बजे कोई घर का दरवाज़ा ना खोलता हैं उन्होंने सुप्रीम कोर्ट खुलवा डाला । अच्छा है जज कोई इंजीनियर नहीं था वरना रात 2 बजे कोर्ट खोलने की बजाये ठेका खुलवाता और सब को पिलाता और पीछे से ठुल्ले याकूब को लटका देते ।
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अब 3:20 बज चुके थे । प्रशांत भूषण दलील दे रहे थे...उनकी दलीले सुनकर साफ़ पता चल रहा था कि उनके सर से बाल ही नहीं अक्ल भी झड़ चुकी हैं । वो कह रहे थे हमें 14 दिन का समय और दीजिए....चचा अगर 14 दिन में ही सारे सबूत बांच लोगे तो पिछले 22 सालो से इस केस के दौरान क्या कोर्ट में भारतनाट्यम हो रहा था । एक डर ये भी था कि अगर फांसी पर 14 दिन की रोक लगी तो ये मीडिया वाले याकूब को नए युग का क्रांतिकारी घोषित कर देगा । फिर 4 बजे टीवी पर खबर आई कि याकूब सो के उठ चूका हैं...लो भैंचो...जिसके लिए इतना भसड़ हो रहा, आधा हिन्दुस्तान जाग रहा वो बोस.डी.के. खुद मस्त बियर पी के सोया पड़ा था । याकूब मेमन (me"mon")...अब जिसके नाम में ही Mon (मंडे) आता हो उससे भला कोई हमदर्दी कैसे रख सकता है ?
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अब तक आतंकवादी की सज़ा एक सास बहु वाले सीरियल में तब्दील हो गयी थी । मैं सोच ही रहा था कि फैसला जल्दी आए कहीं आलिया भट्ट ने पूछ लिया कि याकूब कौन हैं तो याकूब खुद ही आत्महत्या कर बैठेगा । 4:30 बज गए फैसला ना आया...सोच रहा था ये बागड़बिल्ले चर्चा ही ना करते रह जाए और उधर पीछे से नागपुर के ठुल्ले मियाँ मेमन का गेम बजा डाले । खैर पौने पांच बजे फैसला आया कि फांसी होगी...और साढ़े 6 बजे जैसे ही फांसी हुई बरखा दत्त व सगारिका घोष फेफड़े फाड़ कर रो पड़ी लेकिन पूरा देश व मुंबई वाले मुस्कुरा उठे । देर से ही सही न्याय हुआ । और इसके बाद अपन भी अपने काम में लग गए । बोले तो इंडिया-पाकिस्तान जैसा रोमांचक मैच हुआ कल रात जिसमे फिर से जीत अपनी ही हुई
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देखा दाऊद का जलवा ... देखी पाकिस्तान की ताकत ... देखा "सेकुलर-वामपंथी गिरोह"
का बाहुबल ... पान-सिगरेट की दुकान की तरह रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवाई जाती
है, लाखों की फीस लेने वाले दस वकील रात भर खड़े रहते हैं... और सुनवाई भी होती है...
इसे कहते हैं "दम"... ये होता है "जेहादी नेटवर्क" और पैसे की ताकत ....... तुम्हारी तो
इतनी भी औकात नहीं कि पिछले कई साल से बिना चार्जशीट के जेल में सड़ रही एक
कैंसरग्रस्त साध्वी को बचा सको... वास्तव में दया मिश्रित क्रोध और क्रोध मिश्रित दया
आती है हिंदुओं तुम पर ... तुम तो इतने मूर्ख हो कि तुम्हारे बीच बैठी वामपंथी,सेकुलर,
गांधीवादी जयचंदों, मीर जाफरों की फ़ौज को ही नहीं पहचान पाते... तो फिर अपनी
और अपने बच्चों की चिताओं की लकडियाँ खुद ही सजाने से तुम्हें कौन रोक सकता
है .....
By... Suresh Chiplunkar
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Mithilesh Pandey 
याकूब को फांसी हो गयी .... मगर उसे रोकने के लिए रात भर जो देश द्रोहियो की नौटंकी हुई है वो डूब मरने वाली बात है ..रात की दो बजे इस बाबत सुप्रीम कोट में सुनवाई हुई है ...फिर रात दो बजे आखिरी फैसला दिया गया .. रात भर इंडिया गेट के बाहर मोमबत्ती गैंग ने याकूब की फांसी के विरोध में मार्च किया ..शर्म शर्म और बोहोत शर्म की बात है ..एक आतंकवादी के समर्थन में हजारो लोग आ जाते है परन्तु जब एक बेगुनाह फांसी पर लटकता है या एक देश भक्त को सजा होती है या एक मासूम को झूठे केस में फसाया जाता है या एक गरीब सूली चढ़ रहा होता है तब ये सेकुलर जमात ये मोमबत्ती गैंग कहा चली जाती है .... ????
मैं सलाम करती हु सुप्रीम कोट के उन जजों को जिसने इतने विरोध के बावजूद अपने फैसले पर अडिग रहे ..मैं सलाम करती हु राजनाथ जी को जो खुद रात को राष्ट्रपति जी के समक्ष जा कर अपने फैसले पर अडिग रहने की कहा ..मैं सलाम करती हु मोदी जी को जिनकी वज़ह से ही ये फांसी सम्भव हो पाई है ...
साथ ही साथ एक सवाल ये भी उठता है की यदि केंद्र में बीजेपी की सरकार न हो कर कांग्रेस की सरकार होती तो क्या तब भी ये फांसी होती ??नहीं होती ..मैं पुरे यकीं से कहती हु की नहीं होती ...
फांसी तो छोडो ये केस ही ओपन नहीं होता और होता भी तो ऐसे आतंकवादियों को बचाने के लिए कानून में एक दो छेद और कर दिए जाते ...धिक्कार है इस देश के ऐसे लोगो पर जो एक आतंकवादी की सजा का भी विरोध करने से नहीं चुकते ..फिर किस तरह खुद को हिंदुस्तानी कहते हो ..क्यों इस देश की मिटटी से निकले अनाजों को खाते हो ..चले जाओ अपने आकाओं के पास पाकिस्तान ..तुम्हे यहाँ रहने का कोई हक़ नहीं ..इस देश को अपना कहने का कोई हक़ नहीं ..क्यों फिर किसी आतंकवादी हमले पर ये कहते हो की क्या कर रही है मोदी सरकार क्या कर रहा है कानून ..जब की तुम्ही लोग उन आतंकवादियों की पैरवी करते हो ....
निकल जाओ कमीनो हमारे देश से हमारे भारत से निकल जाओ ..

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IB को इनपुट मिला है की, दाउद इब्राहीम ने हवाला के ज़रिये प्रशांत भूषण को 1000 रू करोड़ भेजा है ..
जिस में से 500 करोड़ वकीलों की फिस के रूप मेंं दिया गया है, जो याकूब मैमन का केस लड़ रहे हैं ,
कुछ पैसा जजों को दिया जाना था ..वो पैसा वकीलों और जजों तक पहुँचाने का काम प्रशांत भूषण के जिम्मे था ,
दाउद के लिए मेमन का बचना बहुत जरुरी था क्योंकि दाउद की भारत में अरबों खरबों की संपत्तियों के अलावा भारत में गुप्त धन्धों में लगा करोड़ों रुपये का हिसाब किताब भी याकूब मेमन के पास ही था ,
दाउद का पैसा ना डूबे इस के लिए दाउद चाहता था के याकूब किसी भी तरह मरना नहीं चाहिये ,
शाम को तीन जजों की बेंच के सज़ा बहाल रखे जाने के फैसले के बाद, दाउद ने प्रशांत भूषण पर दबाव डाला की इतना पैसा दिया था तो तुम ने सज़ा माफ क्युँ नहीं करवाई, दाउद ने प्रशांत भूषण को साफ कह दिया था की अगर याकूब नहीं बचा तो हम तुझे देख लेंगे ,
तब रात को 12.00 बजे प्रशांत भूषण अपने बिके हुए 21 वकीलों को साथ लेकर चीफ जस्टिस के घर पर गये, जहाँ पर चीफ जस्टिस ने रात को अपने घर पर 1.00 बजे अदालत लगायी, और रात 3.30 तक सुनवाई की ..
ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है की देश के किसी देशद्रोही गुनहगार को बचाने के लिए रात के 1.00 से लेकर 3.30 बजे तक चीफ जस्टिस के घर पर अदालत बनाई गयी ..
क्या वो एक देशभक्त था या देशद्रोही था ?
एक तरफ, आम आदमी के लिए "तारीख़ पर तारीख़" और
आंतकवादीयों के लिए चीफ जस्टिस रात 1.00 बजे विशेष अदालत लगाता है ..
शर्म आती है हमें, देश की ऐसी न्याय व्यवस्था पर ॥


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अब्दुल कलाम की अंत यात्रा में जितने मुस्लमान थे उस से हज़ार गुना ज्यादा मुस्लमान याकूब की अंत यात्रा में शामिल है । ये दिखाता है की देश में कितने मुस्लमान देश से ईमानदारी रखते है और कितने आतंकवादियों से ।

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ये मोहम्मद अनस पत्रकार है । इनकी सोच देखिये । बेटा सूअर की तरह आतंकी पैदा होंगे तो सुअरो की तरह मारे भी जाएंगे । खैर तुम छाती कूटो ...विधवा विलाप करो
आतंकवादियों का कोई धर्म नही होता कहने वाले जरा यह भी देख ले.....यह देख लीजिए गौर से पढ़ लीजिए जिहाद की चूल उफान मार रही है....
हम कब तक शतुरमुर्ग की तरह इस खतरे को अनदेखा करते रहेंगे? मैं कह रही हूँ कि आज नहीं तो कल भुगतान तो हमें है ही.... अब आगे जैसे जैसे इनकी जनसंख्या बढेगी उतना ही ज़्यादा टकराव बढ़ेगा..... और देर सवेर ये लोग अपना रुप दिखायेंगे ही .... इसलिए पहले ही अपने नुकसान का आकलन करके खुद को मानसिक रूप से तैयार रखो....



सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत : ईश्वरचंद्र विद्यासागर
भारत में 19वीं शती में जिन लोगों ने सामाजिक परिवर्त्तन में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 16 सितम्बर, 1820 को ग्राम वीरसिंह (जिला मेदिनीपुर, बंगाल) में हुआ था। धार्मिक परिवार होने के कारण इन्हें अच्छे संस्कार मिले।
नौ वर्ष की अवस्था में ये संस्कृत विद्यालय में प्रविष्ट हुए और अगले 13 वर्ष तक वहीं रहे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी; अतः खर्च निकालने के लिए इन्होंने दूसरों के घरों में भोजन बनाया और बर्तन साफ किये। रात में सड़क पर जलने वाले लैम्प के नीचे बैठकर ये पढ़ा करते थे। इस कठिन साधना का यह परिणाम हुआ कि इन्हें संस्कृत की प्रतिष्ठित उपाधि ‘विद्यासागर’ प्राप्त हुई।
1841 में वे कोलकाता के फोर्ट विलियम कालेज में पढ़ाने लगे। 1847 में वे संस्कृत महाविद्यालय में सहायक सचिव और फिर प्राचार्य बने। वे शिक्षा में विद्यासागर और स्वभाव में दया के सागर थे। एक बार उन्होंने देखा कि मार्ग में एक वृद्ध और असहाय महिला पड़ी है। उसके शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी। लोग उसे देखकर मुँह फेर रहे थे; पर ईश्वरचन्द्र जी उसे उठाकर घर ले आये। उसकी सेवा की और उसके भावी जीवन का भी प्रबन्ध किया।
ईश्वरचन्द्र जी अपनी माता के बड़े भक्त थे। वे उनका आदेश कभी नहीं टालते थे। एक बार उन्हें माँ का पत्र मिला, जिसमें छोटे भाई के विवाह के लिए घर आने का आग्रह किया था। उन दिनों वे कोलकाता के सेण्ट्रल कालेज में प्राचार्य थे। उन्होंने प्रबन्धक से अवकाश माँगा; पर उसने मना कर दिया। इस पर ईश्वरचन्द्र जी ने अपना त्यागपत्र लिखकर उनके सामने रख दिया। विवश होकर प्रबन्धक महोदय को अवकाश स्वीकृत करना पड़ा।
जिन दिनों महर्षि दयानन्द सरस्वती बंगाल में प्रवास पर थे, तब ईश्वरचन्द्र जी ने उनके विचारों को सुना। वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। उन दिनों बंगाल में विधवा नारियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। बाल-विवाह और बीमारी के कारण बाल विधवाओं का शेष जीवन बहुत कष्ट और उपेक्षा में बीतता था। ऐसे में ईश्वरचन्द्र जी ने नारी उत्थान के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया।
उन्होंने धर्मग्रन्थों के द्वारा विधवा-विवाह को शास्त्र सम्मत सिद्ध किया। वे पूछते थे कि यदि विधुर पुनर्विवाह कर सकता है, तो विधवा क्यों नहीं कर सकती ? उनके प्रयास से 26 जुलाई, 1856 को विधवा विवाह अधिनियम को गर्वनर जनरल ने स्वीकृति दे दी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर, 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर पर पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ।
इससे बंगाल के परम्परावादी लोगों में हड़कम्प मच गया। ऐसे लोगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये गये; पर वे शान्त भाव से अपने काम में लगे रहे। बंगाल की एक अन्य महान विभूति श्री रामकृष्ण परमहंस भी उनके समर्थकों में थे। ईश्वरचन्द्र जी ने स्त्री शिक्षा का भी प्रबल समर्थन किया। उन दिनों बंगाल में राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में काम कर रहे थे। ईश्वरचन्द्र जी ने उनका भी साथ दिया और फिर इसके निषेध को भी शासकीय स्वीकृति प्राप्त हुई।
नारी शिक्षा और उत्थान के प्रबल पक्षकार श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का हृदय रोग से 29 जुलाई, 1891 को देहान्त हो गया। भारतीय स्त्री समाज उनका चिर ऋणी रहेगा।

mediya......

सच्चाई ये नही है की मुस्लिम होने के कारण याकूब को फांसी दी गयी ।
बल्कि सच्चाई ये है की मुस्लिम होने के कारण याकूब को ऐसे वकील मुफ़्त में मिले जिनकी फीस करोड़ो रूपये थी । मुस्लिम होने के कारण उसे न्याय के लिए 1 रूपये भी खर्च नही करने पड़े क्योकि जमात ने उसके लिए पैसे खर्च किये और मुस्लिम होने के कारण ही सुप्रीम कोर्ट 2 दिनों में तीन बार सुनवाई करता है और रात के 2 बजे से 4 बजे तक भी बेंच बैठती है ।
मुस्लिम होने के कारण ही राष्ट्रपति उसकी दया की अर्जी पर तीन बार विचार करते है ।
ओबैसी भारत में 153 हिन्दुओ को फांसी दी गयी है क्या तुम कोई उदाहरण बता सकते हो जिसमे किसी हिन्दू अपराधी को इतनी फेशलिटी दी गयी हो ? दोगलेपन की इंतिहा हमने देखी । नरेंद्र मोदी को बिना किसी सुनवाई के सजा देने की मांग करने वाले सेकूलर सूअर 23 साल चले सुनवाई के बाद दोषी करार दिए गए याकूब को निर्दोष कहते है
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Zee न्यूज पर मनिदंर सिंह बिट्टा ने बहुत बड़ी बात कही - इन आतंकवादीयों का केस लड़ने वाले नामी वकील होते है जिनका किसी केस में एक ही सुनवाई का खर्चा लाखों रूपया होता है और वो खर्चा कौन फंडिंग करता है इनके तार किन किन से जुड़े होते हैं इसकी जाँच होनी चाहिए...
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एक आतंकी जिसने 257 लोगो को मार डाला उस आदमी के लिए इतनी भीड़ !!!!
आतंक का धर्म नहीं होता ????
शर्म आणि चाहिए इन मुसलमानों को जो भारत में रहके आतंकवादियों से हमदर्दी रखते है ।



एक आतंकी के फांसी पर बहस जारी है इसकी टेक्निकल खामिया निकाली जा रही है, ये हमारे जवानो का अपमान है हमारे देश का अपमान है ।
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दिल्ली क्षेत्र का आर्क विशप जॉन दयाल कई महीनो से याकूब की माफ़ी के लिए लगा हुआ था । उसने पोप को पत्र लिखकर अपील किया था की वो याकूब की फांसी रोकने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे ।
कल ये टाइम्स नाऊ चैनल पर याकूब के समर्थन में बड़ी बड़ी दलीले दे रहा था और कह रहा था की यदि कोई सुधर गया हो तो उसे नये सिरे से जिंदगी जीने देना चाहिए ।
ये वही नीच दोगला जॉन दयाल है जिसने उड़ीसा में बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाई बनाने वाले ग्राहम स्टेन्स को मारने वाले दारा सिंह को फांसी देने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी ।
आखिर हम हिन्दू ऐसे दोगलो को अपने बीच कब तक बर्दाश्त करेंगे ?
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रावण जब रणभूमि में मृत्युशय्या पर अंतिम सांसे ले रहा था तब उसने श्री राम से कहा-
राम मैं तुमसे हर बात में श्रेष्ठ हूँ।
जाति मेरी ब्राह्मण हैं, जो तुमसे श्रेष्ठ है।
आयु में भी तुमसे बड़ा हूँ,
मेरा कुटुम्ब तुम्हारे कुटुम्ब से बड़ा है।
मेरा वैभव तुमसे अघिक हैं,
तुम्हारा महल स्वर्णजड़ित है परन्तु मेरी पूरी लंका ही स्वर्ण नगरी है,
मैं बल और पराक्रम में भी तुमसे श्रेष्ठ हूँ,
मेरा राज्य तुम्हारे राज्य से बड़ा है,
ज्ञान और तपस्या में तुमसे श्रेष्ठ हूँ।
इतनी श्रेष्ठताओं के होने पर भी रणभूमि में मैं तुमसे परास्त हो गया।
सिर्फ इसलिये कि
तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ है, और मेरा भाई ...????
एक हो जाओ हिन्दू भाइयों वरना सबकुछ होकर भी कुछ नहीं बचेगा।
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इस देश में कोई आधी रात को चाय की दूकान खोलना पसंद नही करता और ....आतंकी के लिए वकील और सुप्रीम कोर्ट अपनी दूकान खोल लेते है..........
एक आतंकी के न्याय के लिए कोर्ट ये दलील देते हुए की सबको न्याय का हक हे रात दो बजे दरवाजा खोल देती है है ...सुप्रीम कोर्ट में लंबित केस क्या .... न्याय के लिए नही..... उनके लिए कोर्ट क्यों 5 बजे बंद हो जाता है...
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.क्या कोर्ट की नजर में देश के आतंकी प्रमुख हे और देश का नागरिक दोयम दर्जे का.......
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Wednesday, 29 July 2015


पाकिस्तान में अब तक हजारों आतन्कवादियो को फांसी दी जा चुकी है , हालिया पेशावर हमले के सिलसिले में ही 84 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है....
लेकिन इस पर कोई नहीं कहता कि मुस्लिमो को फसाया जा रहा है, ये इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश हैं...
ट्यूनीशिया में इस्लामी आतंकवाद रोकने के लिए अस्सी मस्जिदों पर ताला लगाया जा चुका है...सिर्फ ट्यूनिशिया ही नहीं तुर्की, बांग्लादेश जैसे कई मुस्लिम देशों की सरकारें इस्लामी आतन्कवाद से निपटने के लिए अपने देश के मस्जिदों, मदरसों पर सख्ती बरतती हैं और आतन्कवादियो को थोक भाव में पकड़ती हैं.... लेकिन इस पर कोई नहीं कहता कि मुस्लिमो को फसाया जा रहा है, ये इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश हैं...
लेकिन यहाँ अगर किसी मुस्लिम को अपराध में पकड़ लिया और आरोप साबित होने पर सजा दे दी, तो सारे मुस्लिम, सेकुलर, मिडिया सब चिल्लाने लगते है कि "मुस्लिमो को फसाया जा रहा है",,,,,," ये इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश हैं"...."ये कानून की नाइंसाफी हैं"...
अरे आजादी से लेकर अबतक 169 फांसियां हो चुकी है जिसमें से सिर्फ 19 मुसलमान हैं।। बाकी 150 हिंदू ही हैं, फिर भी हिंदुओ ने तो कभी ऐसा विरोध नहीं किया जैसा कि मुस्लिम याकूब के मामले में कर रहे हैं...
और जो मुसलमान यहाँ कानून के इंसाफ पर सवाल उठा रहे है वो ये बताए जब शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया था.....
जब देश के सविंधान के खिलाफ मुस्लिमों के लिए अलग पर्सनल ला बोर्ड लाया गया.... जब 2008 बंगलौर बम ब्लास्ट के आरोपी मदनी की बेल के लिए केरल सरकार ने विशेष सत्र बुलाया था.....
असम दंगे में हिन्दुओं का मरवाने वाला बदरुद्दीन अजमल एमपी बना बैठा है......
तो खुद को आईएसआई का एजेंट कहकर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाला बीस वांरटी बुखारी भी आजाद है, इन मामलों पर तो किसी मुस्लिम ने कानून व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाया था...