Thursday, 11 April 2013

आखिर नरेद्र मोदी ने गीर फारेस्ट में महिला फारेस्ट गार्ड भर्ती करने का क्रांतिकारी और विश्व में अपने तरह का अनूठा फैसला क्यों लिया था ?

मित्रो, जब मोदी जी ने गुजरात की सत्ता सम्भाली तब भूकम्प पुनर्वास के बाद उन्होंने दुसरे कामो पर ध्यान दिया | वो चौक गये जब उन्हें बताया गया की गीर ने अब सिर्फ 56 एशियाटिक बब्बर शेर बचे है | उन्होंने इस मसले पर फारेस्ट विभाग के सभी अधिकारियो और कई वन्यजीवों के विशेषज्ञ की मीटिंग बुलाई |
उन्होंने सबकी बाते सुनी ... सब समझा .. उन्हें बताया गया कि शिकारी फारेस्ट गार्डो को पैसा देकर शेरो का शिकार करते है.. और शेरो की खाले, नाख़ून व् अन्य कई चीजे चीन भेजी जाती है जहां इनकी बहुत मांग है |

फिर बैठक के अंत में नरेंद्र मोदी जी ने गीर फारेस्ट के चीफ कंजरवेटर डा अमित कुमार से कहा कि आप 70 फारेस्ट गार्ड और बीट गार्ड और 20 रेंजर की वैकेंसी निकालिए ...

लेकिन दो शर्ते डालिए --

१- प्रार्थी सासन गीर या उससे आसपास का रहने वाला हो
२- महिला हो

मित्रो, "महिला" सुनते ही बैठक में मौजूद सभी बड़े बड़े खोपड़ी वाले विशेषज्ञ चौक उठे ... किसी ने विरोध नही किया क्योकि मुख्यमंत्री के फैसले का विरोध करने की हिम्मत बड़े बड़े अधिकारियो में नही होती .. फिर थोड़ी देर के बाद डा अमित कुमार ने कहा सर क्या महिलाओ के शेरो के जंगल में काम ओर रखना ठीक होगा ? उनकी हिम्मत होगी ..

मोदी जी ने कहा अभी आप उनको नियुक्त करिये फिर मै आपको एक साल के बाद बताऊंगा की आखिर मै महिलाओ को ही इस काम पर क्यों रखना चाहता हूँ | लेकिन जब उनकी नियुक्ति हो जाये तब आप उनको मेरे से मिलाने जरुर लाइयेगा |

फिर 70 महिला फारेस्ट गार्ड, और 20 महिला फारेस्ट रेंजर की नियुक्ति के बाद जब वो मोदी जी से मिलने आई तब मोदी जी ने उनसे पूछा कि क्या आप जानती है की मैंने आपको ही क्यों इस नौकरी पर रखा .. तब किसी भी महिला से संतोषजनक जनक जबाब नही दिया |

फिर मोदी जी ने कहा की मशहूर लेखक शिवानी ने लिखा है की "सृजन का दर्द और सुख वही महसूस कर सकता है जिसने सृजन का दर्द सहा है"

आज शिकारी चंद पैसे देकर शेरो के बच्चों को और शेरो को मार रहे है ... मुझे विश्वास है की आप अब महिला है आपको पता होगा की अब किसी शेर को मारा जाय तब शेरनी का दर्द क्या होगा या जब किसी शेरनी का शिकार हो तब उसके बच्चों का दर्द क्या होता होगा | ये पुरुष फारेस्ट गार्ड चंद सिक्को की खनक से अंधे हो सकते है लेकिन मुझे विश्वास है की आपको खरीदने वाला नोट दुनिया के किसी भी टकसाल में नही छपा होगा क्योकि आपके ममता है जिसे पैसे से नही ख़रीदा जा सकता |

मित्रो, धीरे धीरे गीर ने शेरो की संख्या बढती चली गयी ... और आज 512 शेर है और अब केंद्र सरकार गीर के शेरो को कान्हा नेशनल पार्क और रणथमबौर नेशनल पार्क में भी स्थानान्तरण करना चाहती है |

मित्रो, आज महिला फारेस्ट गार्ड कभी घड़ी देखकर अपनी ड्यूटी नही निभाती बल्कि वो गीर के शेरो को अपने परिवार के सदस्यों जैसा मानती है ..

गीर में शेरो की बढती संख्या पर रिसर्च करने आज दुनिया भर के प्रकृतिप्रेमी आते है .. और नेशनल जियोग्राफिक ने भी इस पर एक डोक्युमेंट्री दिखा चूका है .. और मोदी जी के इस फोर्मुले को आज अफ्रीका और अमेरिका का वनविभाग भी अपना रहा है |

लेकिन भारत की मीडिया ???? अरे उनकी सुई तो आज भी 2002 पर अटकी पड़ी है |

इमोशनल अत्याचार
.
आजकल यू टी वी बिंदास पर दिखाये जा रहे रियलटी प्रोग्राम ''इमोशनल अत्याचार'' - 4 में ज्यातर कहानिया सेकुलर हिन्दू लडकियों और जेहादी तत्वों के संबंधों पर आधारित हैं, इन कहानियों में दिखाया गया है कि सेक्युलर हिन्दू लडकियों को पहली मुलाक़ात में ही जेहादी ने आपने सही नाम और इरादे बता दिए थे लेकिन ''सभी धर्म एक जैसे हैं'' समझने वाली महामूर्ख हिन्दू लड़कियां उनसे दोस्ती करती है, उसके साथ निकाह का सपना देखती हैं आगे समय बीतने पर जब बुद्धिहीन हिन्दू लड़कियों को शक होता है कि जेहादी के किसी और से भी रिश्ते हैं तो वह जासूसी करती है तब अधिकतर मामलों में पता चलता है कि जेहादी के लिए सेक्युलर हिन्दू लड़कियों की लाइन लगी है, एक स्टोरी में तो हिन्दू लड़की जब एक गन्दी बस्ती में जेहादी के घर जाती हो तो देखकर दंग रह जाती है कि जेहादी ने जिस लड़की को अपनी आपा बताया था वह उसकी बेगम है और दो बच्चों की माँ है, इतना ही नहीं वह बेगम भी एक हिन्दू ही है, हिन्दू बेगम को पहले से पता है की उसका जेहादी शौहर दूसरी हिन्दू लडकियों से रिश्ता रखता है और उनसे किसी न किसी बहाने रुपये वसूलता है, 
मित्रो देखिये आपके आसपास कोई ऐसी लव जेहादी स्टोरी तो नहीं लिखी जा रही है यदि ऐसा हो तो देश काल परिस्थिति के अनुसार विरोध करें ---- दीपक

Wednesday, 10 April 2013

मर जाएँगे मिट जाएँगे पर पाकिस्तान नहीं जाएँगे

मर जाएँगे मिट जाएँगे पर पाकिस्तान नहीं जाएँगे : शरणार्थी

नई दिल्ली। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों से तंग आकर बहुत सारे हिन्दू अपना घर और देश छोड़ भारत में शरणार्थियों का जीवन बिताने को मजबूर हैं। इनके टूरिस्ट वीजा एक्सपायर हो चुकें हैं, पर ये सब वापसी के नाम सुनते ही डर जातें हैं। भारत आये इन हिन्दू शरणार्थियों ने कहा कि मर जायेंगें लेकिन पाकिस्तान वापस नहीं जायेंगे।

पाकिस्तान में हिन्दओं के साथ किये जा रहे बर्बरता पूर्वक व्यवहार से तंग आकर वहां के हिन्दू अपना सब कुछ छोड़ने को मजबूर हैं। पाकिस्तान से आये शरणार्थियों का कहना है कि वहां हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं।

पाकिस्तान में हिन्दू महिलाओं और लड़कियों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है, और तो और हिन्दू लड़कियों का धर्मं बदल कर उनकी शादी मुस्लिम लड़के से जबरन कराई जाती है। ये हिन्दू अपने धर्म और जीवन की रक्षा के लिए भारत में रहने को मजबूर हैं।पाकिस्तान में 1951 की जनगणना में 22 फीसदी हिन्दू आबादी थी, जो आज घटकर दो फीसदी से भी नीचे चली गई है। वहां के अधिकतर हिंदू परिवार सिंध क्षेत्र में रहते आए हैं।

पाकिस्तान में लगातार घट रही हिन्दुओं की संख्या, और भारत में बढती पाकिस्तानी शरणार्थियों की आबादी वहां के अल्पसंख्यकों के हालत दर्शाने के लिए काफी है।

पाकिस्तान से आये इन हिन्दू शरणार्थियों की वीजा डेडलाईन ख़त्म होने के बाद विदेश मंत्रालय ने इनकी वीजा अवधि को एक महीने का विस्तार तो दिया है पर इससे इनकी समस्याओं का कोई हलनिकलता नजर नही आ रहा।

कल ऐसे ही पाकिस्तान से आई 20 साल की जमुना ने बताया कि उनके लिए पकिस्तान लौटना मौत की सजा की तरह है। उनका कहना है कि वह पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में मर जाना पसंद करेंगी।

जमुना अकेली नहीं हैं जो ऐसा सोचतीं हैं बल्कि वहां से आये तमाम लोगों का यही कहना है कि पाकिस्तान भेजने से अच्छा है कि हमारे शव वहां भेज दो। नवंबर, 2011 से यहां एक बिल्डिंग में साथ रह रहे 450 पाकिस्तानी नागरिकों के टूरिस्ट वीजा की अवधि बीते सोमवार को खत्म हो गई है। अपने वतन की याद के बारे में बात करते हुए यहां के केयरटेकर नाहर सिंह ने बताया कि वह इस बारे में भारत के राष्ट्रपति, विदेश मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र संघ को लिख चुके हैं, पर अब तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है।

ब्योरा रिपोर्ट दिल्ली...
महावीर प्रसाद खिलेरी

तुम कहां रहती हो?

एक आदमी जंगल से गुजर रहा था । उसे चार स्त्रियां मिली । उसने पहली से पूछा - बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ?
उसने कहा "बुद्धि "
तुम कहां रहती हो?
मनुष्य के दिमाग में। दूसरी स्त्री से पूछा - बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ?
" लज्जा "।
तुम कहां रहती हो ?
आंख में । तीसरी से पूछा - तुम्हारा क्या नाम हैं ?
"हिम्मत"
कहां रहती हो ?
दिल में । चौथी से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
"तंदुरूस्ती"
कहां रहती हो ?
पेट में। वह आदमी अब थोडा आगे बढा तों फिर उसे चार पुरूष मिले। उसने पहले पुरूष से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
" क्रोध "
कहां रहतें हो ?
दिमाग में,
दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं,
तुम कैसे रहते हो? जब मैं वहां रहता हुं तो बुद्धि वहां से विदा हो जाती हैं। दूसरे पुरूष से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
उसने कहां -" लोभ"।
कहां रहते हो?
आंख में।
आंख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो।
जब मैं आता हूं तो लज्जा वहां से प्रस्थान कर जाती हैं । तीसरें से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
जबाब मिला "भय"।
कहां रहते हो?
दिल में तो हिम्मत रहती हैं तुम कैसे रहते हो?
जब मैं आता हूं तो हिम्मत वहां से
नौ दो ग्यारह हो जाती हैं। चौथे से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
उसने कहा - "रोग"।
कहां रहतें हो?
पेट में।
पेट में तो तंदरूस्ती रहती हैं,
जब मैं आता हूं तो तंदरूस्ती वहां से रवाना हो जाती हैं। जीवन की हर विपरीत परिस्थिथि में यदि हम उपरोक्त वर्णित बातो को याद रखे तो कई चीजे
टाली जा सकती है !!

गढ़वाल की घाटियों में .......

बात 1998 की है। उत्तराखंड तब बना नहीं था। खबर मिली कि कार्बेट नेशनल पार्क के पार दूर-दुर्गम पहाड़ों में एक अनोखा काम हुआ है। राम नगर से डौटियाल और वहां से सराईखेत। इसके आगे तब सड़क नहीं हुआ करती थी। कंधे पर पिट्ठू बैग टांगे कच्चे पहाड़ी रास्ते तय करता मैं चला जा रहा था। तीखी धूप, पहाड़ी चढ़ाई, सूखी चट्टानें, पसीने से तर शरीर और सूखता गला, मगर एक मोड़ पर सारा दृश्य बदल गया। मिट्टी में नमी, हवा में घुली मीठे पानी की महक और पेड़ों की पत्तियों से टपकती पानी की बूंदों की आवाज, साथ में टरर्ाते मेंढक और पक्षियों का कलरव। उजड़ते पहाड़ की सूरत संवारने का यही वह कमाल था जिसकी खबर दिल्ली तक जा पहुंची थी। दूधातोली के उस इलाके में सच्चिदानंद भारती नामक शिक्षक ने पानी बचाने की अनोखी मुहिम छेड़ रखी थी। ढलानों पर रिसते, बहते, बरसते पानी की एक-एक बूंद को बचाने की परम्परागत तकनीक को उन्होंने फिर जीवन दे दिया। छोटी नांद से लेकर कमरे के आकार तक के हजारों तालाब, लाखों पेड़ पहली बार मुझे किसी एक व्यक्ति द्वारा लिए संकल्प की अतुलनीय शक्ति का अनुभव हुआ। एक गुमनाम से व्यक्ति के पर्वत से संकल्प ने पहाड़ के जनजीवन में नई जान फूंक डाली। अब तो सारा समाज भारती के साथ खड़ा था। दैड़ा गांव में तारों की छांव में भारती का नाम लोकगीतों में सुना। मैंने स्वयं से पूछा, 'ठान लें तो हम क्या नहीं कर सकते?' तब से यह उदाहरण मुझे शक्ति और दिशा देता रहा है।
वर्ष प्रतिपदा विशेषांक की योजना के समय यही सवाल और गढ़वाल की घाटियों में गूंजता वही जवाब याद आया।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
श्री कलायनसुन्दरम जी ने 30 साल तक लाब्रेरियन की नौकरी की और हर महीने अपना पूरा वेतन जरुरतमंदो को दान कर दिया रिटायर होने के बाद अपनी पूरी पेंसन और बेनिफिट जो करीब 10 लाख रुपया बनता था वह सब भी जरुरतमंदो को दान कर दिया, अपना खर्च चलाने के लिए वो होटल में वेटर की नौकरी करते हैं|

वह दुनिया के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने जीवन की सारी कमाई सामाजिक कार्यो में खर्च कर दिया| UNO ने उनके कार्यो को सम्मान देते हुए उन्हें Outstanding People of the 20th Century में शामिल करके सम्मानित किया हैं एक अमेरिकी संगठन ने उनको "मैन आफ द मिलेनियम" अवार्ड से सम्मानित करते हुए उन्हें 30 करोड़ रुपया पुरस्कार स्वरुप दिया पर उन्होंने यह सारा पैसा भी गरीब और जरूरतमंद लोगो को दान कर दिया|

उनके इस महान कार्य और समाजसेवा के जज्बे को देखते हुए सुपरस्टार रजनीकांत ने उनको अपना पिता स्वीकार किया हैं| उन्होंने शादी नहीं की और अपना सारा जीवन समाजसेवा में समर्पित कर दिया|

हम सभी भारतीयों को उन पर गर्व हैं और हम उनको सादर नमन करते हैं कृपया शेयर करके औरो को भी इनके बारे बताये|

संतान" -
मैं तकरीबन २० साल के बाद विदेश से अपने शहर लौटा था ! बाज़ार में घुमते हुए सहसा मेरी नज़रें
सब्जी का ठेला लगाये एक बूढे पर जा टिकीं,बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान
नहीं पा रहा था ! लेकिन न जाने बार बार ऐसा क्यों लग रहा था की मैं उसे बड़ी अच्छी तरह से जनता हूँ !
मेरी उत्सुकता उस बूढ़ेसे भी छुपी न रही , उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैंसमझ
गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था !
काफी देर की जेहनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँवके नीचे से मानो ज़मीन
खिसक गई ! जब मैं विदेश गया था तो इसकी एक बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी नौकर चाकर
आगे पीछे घूमा करते थे !धर्म कर्म, दान पुण्य में सब से अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं
ताऊजी कह कर बुलाया करता था !
वही आटा मिल का मालिक और आज सब्जी का ठेला लगाने पर मजबूर? मुझ से
रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुंधे गले से पूछा :
"ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया ?"

भरी ऑंखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख उसने उत्तर
दिया:
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटा !"