Monday, 23 March 2015

पढ़ते वक्त गुस्सा और आंसुओ को थामे रखियेगा 

चरखे से निकलीं कुछ रस्सियों ने तेरी मौत लिख दी "बेख़ौफ"..
तेरी चिता की आँच से वतन के गद्दारों का चूल्हा जलता रहा..... 
. दोस्तों ब्रिटिश अंपायर में ऐसा नियम था की अगर वो किसी को फाँसी देंगे तो कम से कम 5 लोग गवाह के रूप में चाहिए होते थे।
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तो उसमे जब गवाही दी गयी तो उसमे 3 भारतीय थे और 2 अंग्रेज। वो जो 3 भारतीय थे जब मैं उनका नाम आपको बताऊंगा तो आपके पैरो के नीचे से जमीन खिसक जायेगी।
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वो पहले थे- किन्ही कारणों से नाम हटाया गया है
दूसरे थे- Mr Sar shobha singh जिनके बेटे सुखवंत सिंह पदम् विभूषण पाये और कांग्रेस की और से राज्य सभा सदस्य रहे। ...
भगत सिंह से की गयी गद्दारी से मिले पैसों और जमीन से खुशवंत सिंह की परवरिश हुई थी... खुशवंत सिंह ने आत्मनिर्भर होने पर (लेखक पत्रकार बनके कमाई करने पर) अपने पिता की जायदाद से (जो गद्दारी के कारण ही बनी थी) खुद को अलग नहीं किया था.
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......खुशवंत सिंह अथवा उनके पिता ने देश से सार्वजनिक माफी भी नहीं माँगी थी.?
......... सोभा singh को गद्दारी के बदले दिल्ली की लूटीयन जोन , विक्टोरिया भवन सहित आधी दिल्ली के सरकारी इमारतो को बनाने का ठेका मिला था
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तीसरे थे- Mr Sarsadi Lal जिनकी मवाना शुगर आज भी पुरे हिंदुस्तान में चीनी सप्लाई कर रही है। मगर शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
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आज ये सोचना है कि इन 3 लोगो ने या इनके पूर्वजो ने जो गवाहियां दी उसके बाद इन लोगो को प्रधानमंत्री, पदम् विभूषण और इतनी-2 बड़ी फर्मो के मालिक बना दिया गया।
लेकिन जिन्होंने सच्चा बलिदान दिया उनके लिए कब सोचेंगे।
..ख़ास बात तीनो ही पंजा गोत्र द्वारा पाले गये ......

Narendra Modi सरकार को बदनाम करने के लिए भारत को "ईसाई विरोधी" तथा यहाँ के मर्दों को "बलात्कारी" सिद्ध करने, चित्रित करने की होड़ मची हुई है... समय रहते "सेकुलर बुद्धिजीवी दलाल और Presstitutes" सुधर जाएँ अन्यथा इसके बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे...
 जॉन दयाल... सुन रहा है ना तू...
(तुझे) सरेआम झूठा, धूर्त और पागल कह रहा हूँ मैं...
किसी चर्च की खिड़की भी टूटे तो "हिन्दू संगठनों" को दोषी ठहराने का जो "पागल सेकुलर प्रलाप" आजकल चल रहा है उसकी एक और बखिया उधड़ गई है. मंगलौर (कर्नाटक) के चर्च हमले को लेकर खबीस कुमार जैसों ने जो रुदालीगान मचाया था, उसकी पोल खुल गई है. मंगलौर चर्च हमले के मामले में पुलिस ने जिसे गिरफ्तार किया है, वह चर्च का ही पूर्व कर्मचारी निकला, जो पैसों के लेन-देन को लेकर नाराज था.
ये "प्रगतिशील बौद्धिक नंगई" पहली बार नहीं हुई है. 2014 में एक पादरी केजे थॉमस की हत्याहुई थी, तो "हिन्दू जिम्मेदार, संघ जिम्मेदार.." चीखने वालों के मुँह पर तमाचा पड़ा था, जब उसी पादरी के तीन साथियों ने हत्या करना कबूल किया था. अगस्त 2014 में ही मुम्बई के विले-पार्ले के चर्च का क्रास तोड़ा गया... दल्ले फिर चिल्लाए "संघ-मोदी-हिन्दू-ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला"... जब जाँच हुई तो पता चला कि दारू पीकर सात ईसाई लड़कों ने ही नशे में क्रास तोड़ा था. इसी प्रकार 1999 में झाबुआ की एक नन का रेप/मर्डर हुआ था, उसमें भी बारह रेपिस्ट ईसाई ही थे. मोदी सरकार आने के बाद से चर्चों में मामूली चोरियाँ, शॉर्ट सर्किट से आग जैसी दुर्घटनाएँ हुई हैं, लेकिन चर्च पोषित मीडियाई भाण्डों ने इसे "ईसाईयों पर हमले" जैसा चित्रित किया हुआ है. मूर्खता की हद कहिये या मीडिया की "नकारात्मक ताकत" कहिये, देश के प्रतिष्ठित पुलिस अफसर जूलियो रिबेरो भी बिना सोचे-समझे बयान जारी करने लग जाते हैं कि "ईसाई होने के कारण मुझे डर लगने लगा है...". लानत है.

यह एक बूढ़े आदमी (लगभग 80 वर्ष) की कहानी है। जो एक पूर्व HAL कर्मचारी (इंजीनियर) था , बंगलौर मैं रहते हैं , इनके चार बच्चे (दो बेटियों और दो बेटों) है। जो निरीक्षकों, इंजीनियर और आईटी पेशेवर के रूप में काम कर रहे हैं। यह आदमी श्री रामकुट्टी 60 + साल के बाद से बेंगलूर में है और अंग्रेजी, तमिल, मलयालम, हिंदी और कन्नड़ समझ सकते हैं।
मेरा दोस्त विनय सिंह इनसे चिन्मय अस्पताल, इंदिरा नगर के पास मिला । जब यह ओल्ड मद्रास रोड के लिए मोटर यात्री को रोकने के लिए कोशिश कर रहे थे । तब उसने इन्हे अपनी बाइक पर बैठाया । यह विनय के कंधे पकड़े बाइक पर बैठ गया। ... जब विनय ने इनसे पूछा की इस ठंड के मौसम में सड़क पर क्या कर रहे हैं ??तब इन्होने बताया की मेरी पत्नी जो 70 + साल की हैं काफी वर्षो से बीमार हैं और बिस्तर मैं पड़ी हैं तो उसकी दवा और "खुद का और अपनी पत्नी , का खाने के इंतजाम के लिए मजदूरी पर गया था ,जहां से अब मैं अपने Lingarajpuram में अपने किराए के घर के लिए जा रहा था। विनय इन बुजुर्ग की बात सुनकर एक दम चौक गया और कहा , "खुद को और अपनी पत्नी को खिलाने के लिए" उसने तुरंत अपनी बाइक बंद कर दि और कहा कि वह दोपहर का भोजन किया था ?? उन्होंने कहा कि नहीं ... विनय उन्हें निकटतम चाय की दुकान पर ले गया और बुजुर्ग को चाय और नाश्ता खरीदा। खाने के बाद बूढ़े आदमी के शरीर में कुछ ऊर्जा आई। तब विनय ने बुजुर्ग को पूछा की दिन में खाना क्यों नही खाया तब वह चुप हो गए विनय के काफी जोर देने पर उन्होंने बताया की वह एक दिन में एक बार ही खाते हैं ... पैसे बचाने के लिए अब शरीर साथ नही देता तो काम नही हो पाता इसलिए !!! फिर जब विनय ने उनसे उनके बच्चो का फ़ोन नंबर माँगा तो वो ... देने के लिए झिझके ... फिर उन्होंने कहा कि वे तुम पर क्रोधित होंगे.. क्यों ?? विनय ने पूछा पूछा ... "वे मुझे डाँटने आयेगे " उन्होंने कहा कि मैने जब तक उन्हें अपना मकान और रुपया नही दिया था तब वह सभी हम दोनों ( बुजुर्ग दम्पति ) की सेवा करते थे लेकिन अब वह हमारा मुह भी नही देखना चाहते कहते हैं की आपका काम अब हमसे नही होगा और आपके साथ रहने से हमे घुटन होती हैं , अब मैं उनके लिए कुछ नही कर सकता शायद इस वजह से बच्चो ने मुझे निकाल दिया हैं !!!
थू हैं ऐसे बच्चो पर जो सिर्फ घर, कार और पैसे की सोचते है..... उन चार महान बच्चों के लिए शायद अपना स्टेटस अपनी पोस्टिंग माता-पिता से भी बड़ी है! plz शेयर ........ मुझे यकीन है कि इस जानकारी / संदेश ... को जो युवा वर्ग पढ़ेगा उसको एक मैसेज जायेगा ... और शायद वह अपने माता-पिता के साथ ऐसा ना करे जो इन चार महान बच्चो ने किया ।

भारतीय व हिंदू मानसिकता का विकास कीजिए और अपने सच्चे इतिहास से जुड़िए....

क्या आप जानते हैं कि हमलोगों ने जिन भंगी और मेहतर जाति को अछूत करार दिया और जिनके हाथ का छुआ तक आज भी बहुत सारे हिंदू नहीं खाते, उनका पूरा इतिहास साहस, त्याग और बलिदान से भरा पड़ा है।
मुगल काल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को दो रास्ते दिए गए, या तो इस्लाम कबूल करो या फिर मुसलमानों का मैला ढोओ क्योंकि तब भारतीय समाज में इन दोनों समुदायों का अत्यंत सम्मान था और इनके लिए ऐसा घृणित कार्य करना मर जाने के समान था। इसीलिए मुगलों ने इनके धर्मान्तरण के लिए यह तरीका अपनाया। आप किसी भी मुगल किले में चले जाओ वहां आपको शौचालय नहीं मिलेगा।
जबकि हजारों साल पुरानी हिंदुओं की उन्नत सिंधु घाटी सभ्यता के खण्डहरों में रहने वाले कमरे से सटा शौचालय मिलता है।
सुल्तानों और मुगलों को शौचालय निर्माण का ज्ञान तक नहीं था। दिल्ली सल्तनत में बाबर, अकबर, शाहजहाँ से लेकर सभी मुगल बादशाह बर्तनों में शौच करते थे, जिन्हें उन ब्राहम्णों और क्षत्रियों के परिजनों से फिकवाया जाता था, जिन्होंने मरना तो स्वीकार कर लिया था, लेकिन इस्लाम को अपनाना नहीं।
जिन ब्राहमणों और क्षत्रियों ने मैला ढोने की प्रथा को स्वीकार करने के उपरांत अपने जनेऊ को तोड़ दिया, अर्थात उपनयन संस्कार को भंग कर दिया, वो भंगी कहलाए। और मेहतर- इनके उपकारों के कारण।
तत्कालिन हिंदू समाज ने इनके मैला ढोने की नीच प्रथा को भी 'महत्तर' अर्थात महान और बड़ा करार दिया था, जो अपभ्रंश रूप में 'मेहतर' हो गया।
भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आपने सोचा कि ये 13 प्रतिशत की बढोत्तरी मुगल शासन में कैसे हो गई।
जो हिंदू डर और अत्याचार के मारे इस्लाम धर्म स्वीकार करते चले गए, उन्हीं के वंशज आज भारत में मुस्लिम आबादी हैं। जिन ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने मरना स्वीकार कर लिया उन्हें काट डाला गया और उनके असहाय परिजनों को इस्लाम कबूल नहीं करने की सजा के तौर पर अपमानित करने के लिए नीच मैला ढोने के कार्य में धकेल दिया गया। वही लोग भंगी और मेहतर कहलाए।
डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, '' अनुसूचित जाति
उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने
जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के
जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।''
प्रख्यात साहित्यकार अमृत लाल नागर ने अनेक वर्षों के शोध के बाद पाया कि जिन्हें "भंगी", "मेहतर" आदि कहा गया, वे ब्राहम्ण और क्षत्रिय थे।
स्टेनले राइस ने अपने पुस्तक "हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स" में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।
गाजीपुर के श्री देवदत्त शर्मा चतुर्वेदी ने सन् 1925 में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम 'पतित प्रभाकर' अर्थात मेहतर जाति का इतिहास था। इस छोटी-सी पुस्तक में "भंगी","मेहतर", "हलालखोर", "चूहड़" आदि नामों से जाने गए लोगों की किस्में दी गई हैं, जो इस प्रकार हैं (पृ. 22-23)
नाम जाति भंगी- वैस, वैसवार, बीर गूजर (बग्गूजर),
भदौरिया, बिसेन, सोब, बुन्देलिया, चन्देल, चौहान, नादों,यदुबंशी, कछवाहा, किनवार-ठाकुर, बैस, भोजपुरी राउत,गाजीपुरी राउत, गेहलौता, मेहतर, भंगी, हलाल, खरिया, चूहड़- गाजीपुरी राउत, दिनापुरी राउत, टांक, गेहलोत, चन्देल, टिपणी।
इन जातियों के जो यह सब भेद हैं, वह सबके सब क्षत्रिय जाति के ही भेद या किस्म हैं। (देखिए ट्राइब एण्ड कास्ट आफ बनारस, छापा सन् 1872 ई.)
यह भी देखिए कि सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।
क्या आप सभी खुद को हिंदू कहने वाले लोग उस अनुसूचित जाति के लोगों को आगे बढ़कर गले लगाएंगे, उनसे रोटी-बेटी का संबंध रखेंगे। यदि आपने यह नहीं किया तो समझिए, हिंदू समाज कभी एक नहीं हो पाएगा और एक अध्ययन के मुकाबले 2061 से आप इसी देश में अल्पसंख्यक होना शुरू हो जाएंगे।
इसलिए भारतीय व हिंदू मानसिकता का विकास कीजिए
और अपने सच्चे इतिहास से जुड़िए
आज हिंदू समाज को अंग्रेजों और वामपंथियों के लिखे पर इतना भरोसा हो गया कि उन्होंने खुद ही अपना स्वाभिमान कुचल लिया और अपने ही भाईयों को अछूत बना डाला।
आज भी पढे लिखे और उच्च वर्ण के हिंदू जातिवादी बने हुए हैं, लेकिन वह नहीं जानते कि यदि आज यदि वह बचे हुए हैं तो अपने ऐसे ही भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।
आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 30 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।
कृपया अपना वास्तविक इतिहास जानिए और इससे सबक लीजिए क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता जरूर है।
धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और तरह-तरह से भारतवासियों की सेवा की।
हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को मेरी तरफ से शत्-शत् प्रणाम और दिल से सैल्यूट ।
भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन 'प्रसाद' बन जाता है।
भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख 'व्रत' बन जाती है।
भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी 'चरणामृत' बन जाता है।
भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर 'तीर्थयात्रा' बन जाता है।
भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत 'कीर्तन' बन जाता है।
भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर 'मन्दिर' बन जाता है।
भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य 'कर्म' बन जाता है।
भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया 'सेवा' बन जाती है।
और...
भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति 'मानव' बन जाता है।
 सीधी बात में राहुल कंवर ने बीजेपी के नेता मुख़्तार अब्बास नकवी से पूछा 
1) स्कूलों में योगा क्यों जरूरी हे 
2) देश में वन्देमातरम बोलने के लिए क्यों दबाब बना रहे हो 
3) स्कूलों में सरस्वती वंदना क्यों अनिवार्य किया जा रहा हे 
4) गाय के मांस पर क्यों प्रतिबन्ध लगा दिया 
5) घर वापसी बंद क्यों नही करवाते
6) गाय हत्या पर महाराष्ट्र में 5 साल की सजा ओर हरियाणा में 10 साल की सजा क्यों
7) बुड्डी गायो की हत्या पर प्रतिबन्ध क्यों
नकवी जी सभी प्रश्नों का बड़े अच्छे ढंग से जबाब दिया

मेरा राहुल कंवर से कहना हे एक बार किसी सेकुलर नेता को बुलाकर निम्नलिखित प्रश्न पूछे
तभी मानेगे आप धर्मनिरपेक्ष हे
1) केरल में नर्सो का ब्लाउज सफेद से हरा क्यों कर दिया
2) रोजो में सभी छात्रो के लिए मिड डे मिल क्यों बंद कर दिया जाता हे
3) केरल शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष ने जुम्मे के दिन परीक्षा का समय बदलने के लिए पत्र क्यों लिखा
4) केरल के परीक्षा पत्रों में चाँद तारे क्यों छापे
5) मेरठ में पाकिस्तान जी जित पर ख़ुशी मनाने वालो को क्यों सजा नही दी गई
6) केरल के मल्लापुरम में अपनी गाड़ी में भगवान की फोटो लगाना अपराध क्यों हे
7) हेदराबाद का जिस दिन भारत में विलय हुआ था उस दिन को काला दिवसके रूप में क्यों मनाया जाता हे
8) शाहबानो के मामले में सुप्रीमकोर्ट का निर्णय क्या बदला गया
9) कोयम्बटूर बम विस्फोटो के अपराधी अब्दुल मदनी की रिहाई के लिए छुटी के दिन (होली ) केरल विधान सभा का विशेष सत्र क्यों बुला या गया……

sanskar-------------

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्न :::::::::::::::::::
1.हलाहल (विष)
समुद्र का मंथन करने पर सबसे पहले पहले जल का हलाहल (कालकूट) विष निकला जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की। शंकर ने उस विष को हथेली पर रखकर पी लिया, किंतु उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया तथा उस विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया इसीलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। हथेली से पीते समय कुछ विष धरती पर गिर गया था जिसका अंश आज भी हम सांप, बिच्छू और जहरीले कीड़ों में देखते हैं।
2. कामधेनु :
विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं। गाय को हिन्दू धर्म में पवित्र पशु माना जाता है। गाय मनुष्य जाति के जीवन को चलाने के लिए महत्वपूर्ण पशु है। गाय को कामधेनु कहा गया है। कामधेनु सबका पालन करने वाली है। उस काल में गाय को धेनु कहा जाता था।
3. उच्चैःश्रवा घोड़ा :
घोड़े तो कई हुए लेकिन श्वेत रंग का उच्चैःश्रवा घोड़ा सबसे तेज और उड़ने वाला घोड़ा माना जाता था। अब इसकी कोई भी प्रजाति धरती पर नहीं बची। यह इंद्र के पास था। उच्चै:श्रवा का पोषण अमृत से होता है। यह अश्वों का राजा है। उच्चै:श्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे जिसका यश ऊंचा हो, जिसके कान ऊंचे हों अथवा जो ऊंचा सुनता हो।
4. ऐरावत हाथी :
हाथी तो सभी अच्छे और सुंदर नजर आते हैं लेकिन सफेद हाथी को देखना अद्भुत है। ऐरावत सफेद हाथियों का राजा था। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: 'इरावत' (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को 'ऐरावत' नाम दिया गया है। यह हाथी देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान निकली 14 मूल्यवान वस्तुओं में से एक था। मंथन से प्राप्त रत्नों के बंटवारे के समय ऐरावत को इन्द्र को दे दिया गया था। चार दांतों वाला सफेद हाथी मिलना अब मुश्किल है।
महाभारत, भीष्म पर्व के अष्टम अध्याय में भारतवर्ष से उत्तर के भू-भाग को उत्तर कुरु के बदले 'ऐरावत' कहा गया है। जैन साहित्य में भी यही नाम आया है। उत्तर का भू-भाग अर्थात तिब्बत, मंगोलिया और रूस के साइबेरिया तक का हिस्सा। हालांकि उत्तर कुरु भू-भाग उत्तरी ध्रुव के पास था संभवत: इसी क्षेत्र में यह हाथी पाया जाता रहा होगा।
5. कौस्तुभ मणि :
मंथन के दौरान पांचवां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। महाभारत में उल्लेख है कि कालिय नाग को श्रीकृष्ण ने गरूड़ के त्रास से मुक्त किया था। उस समय कालिय नाग ने अपने मस्तक से उतारकर श्रीकृष्ण को कौस्तुभ मणि दे दी थी। यह एक चमत्कारिक मणि है। माना जाता है कि इच्छाधारी नागों के पास ही अब यह मणि बची है या फिर समुद्र की किसी अतल गहराइयों में कहीं दबी पड़ी होगी। हो सकता है कि धरती की किसी गुफा में दफन हो यह मणि।
6. कल्पद्रुम :
यह दुनिया का पहला धर्मग्रंथ माना जा सकता है, जो समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुआ। कुछ लोग इसे संस्कृत भाषा की उत्पत्ति से जोड़ते हैं और कुछ लोग मानते हैं कि इसे ही कल्पवृक्ष कहते हैं। जबकि कुछ का कहना है कि पारिजात को कल्पवृक्ष कहा जाता है।यह स्पष्ट नहीं है कि कल्पद्रुम आखिर क्या है? ज्योतिषियों के अनुसार कल्पद्रुप एक प्रकार का योग होता है।
7. रंभा :
समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर अप्सरा प्रकट हुई जिसे रंभा कहा गया। पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में माना जाता है, जो कि कुबेर की सभा में थी। रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी। समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था। अप्सरा को गंधर्वलोक का वासी माना जाता है। कुछ लोग इन्हें परी कहते हैं।
8. लक्ष्मी :
समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। लक्ष्मी अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं। माना जाता है कि जिस भी घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि कायम रहती है।
9. वारुणी (मदिरा) :
वारुणी नाम से एक शराब होती थी। वारुणी नाम से एक पर्व भी होता है और वारुणी नाम से एक खगोलीय योग भी। समुद्र मंथन के दौरान जिस मदिरा की उत्पत्ति हुई उसका नाम वारुणी रखा गया। वरुण का अर्थ जल। जल से उत्पन्न होने के कारण उसे वारुणी कहा गया। वरुण नाम के एक देवता हैं, जो असुरों की तरफ थे। असुरों ने वारुणी को लिया।
10. चन्द्रमा :
पौराणिक संदर्भों के अनुसार चंद्रमा को तपस्वी अत्रि और अनुसूया की संतान बताया गया है जिसका नाम 'सोम' है। दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं जिनके नाम पर 27 नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं। आज आसमान में हम जो चंद्रमा देखते हैं वह समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ | पुराणों अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति धरती से हुई है।
11. पारिजात वृक्ष :
समुद्र मंथन के दौरान कल्पवृक्ष के अलावा पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति भी हुई थी। 'पारिजात' या 'हरसिंगार' उन प्रमुख वृक्षों में से एक है जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है। पारिजात वृक्ष में कई औषधीय गुण होते हैं। हिन्दू धर्म में कल्पवृक्ष के बाद पारिजात को महत्व दिया गया है। इसके बाद बरगद, पीपल और नीम का महत्व है।
12. शंख :
शंख तो कई पाए जाते हैं लेकिन पांचजञ्य शंख मिलना मुश्किल है। समुद्र मंथन के दौरान इस शंख की उत्पत्ति हुई थी। 14 रत्नों में से एक पांचजञ्य शंख को माना गया है। शंख को विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है।1928 में बर्लिन यूनिवर्सिटी ने शंख ध्वनि का अनुसंधान करके यह सिद्ध किया कि इसकी ध्वनि कीटाणुओं को नष्ट करने की उत्तम औषधि है।
13. धन्वंतरि वैद्य :
देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस दौरान दरअसल कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला। हालांकि धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरिजी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था।
14. अमृत :
'अमृत' का शाब्दिक अर्थ 'अमरता' है। निश्चित ही एक ऐसे पेय पदार्थ या रसायन रहा होगा जिसको पीने से व्यक्ति हजारों वर्ष तक जीने की क्षमता हासिल कर लेता होगा। यही कारण है कि बहुत से ऋषि रामायण काल में भी पाए जाते हैं और महाभारत काल में भी। समुद्र मंथन के अंत में अमृत का कलश निकला था। अमृत के नाम पर ही चरणामृत और पंचामृत का प्रचलन हुआ।