Friday, 5 April 2013


मोक्ष्यपातं : सांप-सीढी का खेल

आपको बचपन में खेले गए सांप-सीढी के खेल की तो अवश्य याद होगी। इस खेल का एक कमाल है, इसमें जितनी सीढियां हैं उतने ही सांप, फिर भी खेल में शामिल हर कोई ये मानता है की वो अपने हाथ के कमाल से इस बाज़ी को जीत सकता है। अब हम और आप में से जिसने भी ये खेल खेला होगा, उसका उदेश्य तो कुछ समय के लिए मनोरंजन करना ही रहा होगा।किन्तु इस खेल के निर्माता/आविष्कारकर्ता नें इसके जरिए मनोरंजन के साथ साथ खेल-खेल में ही कर्म फल के महत्व को दर्शाने का भी प्रयास किया है।
सांप सीढ़ी का खेल तेरहवीं शताब्दीे में कवि संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किया गया था इसे मूल रूप से मोक्षपट कहते थे। इस खेल में सीढियां वरदानों का प्रतिनिधित्वर करती थीं जबकि सांप अवगुणों को दर्शाते थे। इस खेल को कौडियों तथा पांसे के साथ खेला जाता था। आगे चल कर इस खेल में कई बदलाव किए गए, परन्तु इसका अर्थ वहीं रहा अर्थात अच्छेस काम लोगों को स्वंर्ग की ओर ले जाते जबकि बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप जीव को पुन: पुन: जन्म -मृ्त्यु के चक्र में उलझना पडता है।

मूल खेल में इन वर्गों में सीढीयां थी वर्ग 12 विश्वास के लिये , 51 विश्वसनीयता के लिये, 57 उदारता के लिये, 76 ज्ञान के लिये, और 78वा वर्ग संन्यास के लिये था !! 41वा वर्ग अवज्ञा के लिए, 44वा अहंकार के लिये, अशिष्टता के लिए 49, चोरी के लिए 52 , झूठ बोलने के लिए 58, मादकता के लिए 62, 69 ऋण के लिए, क्रोध के लिए 84, 92 लालच के लिए, 95 अभिमान के लिए, हत्या के लिए 73 और वासना के लिए 99 वर्ग रखा गया था. इन वर्गों में साँप थे.

100 वा वर्ग निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व था, 1892 में ब्रिटिश इस खेल को इंग्लैंड ले गये और वहा विक्टोरियन मूल्यों के हिसाब से यह सांप और सीढ़ी के नाम बदला.
 

Monday, 1 April 2013

किसी भी भूखे के लिए

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन
पकाती थी और एक रोटी वह वहां से ...गुजरने वाले
किसी भी भूखे के लिए पकाती थी ,
वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे
कोई भी ले सकता था .
एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और वजाय
धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह
बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और
जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "
दिन गुजर...ते गए और ये
सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी लेके
जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता
"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम
अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "
वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन
खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द
धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने
क्या क्या बडबडाता रहता है ,
मतलब क्या है इसका ".
एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और
बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी ".
और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर
मिला दीया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे
ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश
कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह
बोली "
हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?" और उसने तुरंत उस
रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दीया .एक
ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी ,
हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम
बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे
वह तुम तक लौट के आएगा " बडबडाता हुआ चला गया इस
बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल
रहा है .
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह
भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर
वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर
भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ
था .महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी.
शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह
दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है ,
अपने BETE को अपने सामने खड़ा देखती है.वह पतला और
दुबला हो गया था. उसके कपडे फटे हुए थे और वह
भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था. जैसे ही उसने
अपनी माँ को देखा,
उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं
एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर. मैं मर
गया होता,
लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र
मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लीया,भूख के
मरे मेरे प्राण निकल रहे थे
मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच
अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज
यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है
सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो " .
जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पिला पड़
गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे
का सहारा लीया ,
उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह
रोटी में जहर मिलाया था
.अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट
नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और
अंजाम होता उसकी मौत
और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट
हो चूका था
"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम
अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।
" निष्कर्ष "
~हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप
को कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय
आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो 

Sunday, 31 March 2013

सितारों की नक़ल करके मुस्लिम लड़कों के प्रेम जाल में आसानी से फंसजाएं


हाल ही में पुलिस ने एक युवक
को पकड़ा है , इस युवक का नाम वसीम
अकरम है , वो फेसबुक पर दक्ष शर्मा के
नाम से प्रोफाइल बनाकर हिंदू
युवतियों को फंसाता था , फिर
उनका शारीरिक शोषण करता था |
पुलिस ने अकरम को नजीराबाद से
पकड़ा है | वसीम ने पूछताछ में
बताया की लव जेहाद के नाम से ये सबकुछ
चल रहा है , इससे जुड़े कट्टरपंथी हिंदू
लड़कियों को फंसाकर उनसे शादी कर लेते
हैं , इसका मुख्या संगठन ढाका में है
तथा हिंदुस्तान में इसका मुख्या संगठन
केरल में है |
अकरम ने
बताया की मुल्ला मौलवी हिंदुस्तान के
मुस्लिम बोलीवुड सितारों से कहते हैं
की वे कम से कम दो हिंदू लड़कियों से
शादी करे जिससे की देश में हिंदू
लड़कियों में मुस्लिम लड़कों के
प्रति सहानुभूति बने ,
वो भी सितारों की नक़ल करके मुस्लिम
लड़कों के प्रेम जाल में आसानी से फंसजाएं |
इस संगठन का मानना है की अगर एक
मुस्लिम युवक एक हिंदू लड़की से
शादी करके छः बच्चे पैदा करे
तो हिंदुस्तान को इस्लामिक राष्ट्र
बनाने में ४० साल लगेंगे और अगर एक
मुसलमान दो हिंदू लड़कियों से शादी करके
१२ बच्चे पैदा करे तो केवल २४ साल में
मुस्लिम भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे |
वो कहते हैं की हिंदू लड़कीसे शादी करने से
एक तरफ हम हिंदू आबादी को बढ़ने से
रोकते हैं तो दूसरी तरफ मुस्लिम
आबादी बढाते हैं |
दक्षिण भारत में लव जेहाद फैलाने के बाद
कट्टरपंथी मुसलमानों ने अपना नेटवर्क अब
पूरे देश में फैला लिया है और अब तो फेसबुक
पर भी दबे पांव लव जेहाद का जाल
बिछाया जा रहा है
कट्टरपंथी शैतान मुसलमान , हिंदू
लड़कियों को फंसाने के लिए अब फेसबुक
का सहारा ले रहे हैं | हिंदू लड़कों के नाम
से फेक प्रोफाइल बनाकर , हिंदू
लड़कियों को फंसाया जा रहा है | फेसबुक
पर तो फतवा तक जारी कर दिया गया है
की हिंदू लड़कियों को भगाओ और उससे
छः बच्चे पैदा करो |
मित्रों ये हमारे देश ,
हमारी संस्कृति हमारे धर्म के खिलाफ
भयंकर षडयंत्र चल रहा है और बहुत
व्यापक रूप ले चूका है ,इसमें सलमान ,
आमिर , शाहरुख , सैफ अली,जावेद अख्तर ,
साजिद खान,हुसैन , सभी शामिल हैं और
भोली भली हिंदू युवतियों को मूर्ख
बनाया जा रहा है |
धिक्कार हे एसी लड़कियो पर
जो मुसलमानो से प्यार
करती हे...........फि र सच से
सामना होता हे तो रोती फिरती हे
इधर उधर ......हम लोग इतना समझा रहे
हे फिर भी इनकी समझमे
नही आती............ ......आपके आस पास
यदि कोई हिन्दू लड़की किसी मुसलमान
लड़के के प्यार मे हो तो उसे समझाए !
जागो हिन्दू जागो 

अमेरिकी यूनिवर्सिटी में गीता पढ़ना हुआ जरूरी !


अमेरिकी यूनिवर्सिटी में गीता पढ़ना हुआ
जरूरी !
अमेरिका की सेटन हॉल यूनिवर्सिटी में
सभी छात्रों के लिए
गीता पढ़ना अनिवार्य
कर दिया गया है। इस
यूनिवर्सिटी का मानना है
कि छात्रों को सामाजिक सरोकारों से
रूबरू कराने के लिए गीता से बेहतर कोई और
माध्यम नहीं हो सकता है।
लिहाजा उसने सभी विषयों के छात्रों के
लिए अनिवार्य पाठ्यक्रम के तहत
इसकी स्टडी को जरूरीबना दिया है।
यूनिवर्सिटी के स्टिलमेन बिजनस स्कूल के
प्रफेसर ए.डी. अमर ने यह
जानकारी दी।
यह यूनिवर्सिटी 1856 में न्यू जर्सीमें
स्थापित हुई थी और एक स्वायत्त
कैथलिक यूनिवर्सिटी है।
यूनिवर्सिटी के 10, 800 छात्रों में से एक
तिहाई से ज्यादा गैर ईसाई हैं। इनमें
भारतीयछात्रों की संख्या अच्छी-खासी है।
गीता की स्टडी अनिवार्य बनाने इस फैसले
के पीछे प्रफेसर अमर की प्रमुख
भूमिका रही। उन्होंने
कहा कि यूनिवर्सिटी में कोर कोर्स के
तहत सभी छात्रों के लिए अनिवार्य
पाठ्यक्रम होता है,
जिसकी स्टडी सभी विषयों के
छात्रों को करनी होती है।
2001 में यूनिवर्सिटी ने अलग पहचान
कायम करने के लिए कोर कोर्स की शुरुआत
की थी।
इसमें छात्रों को सामाजिक सरोकारों और
जिम्मेदारियों से रूबरू कराया जाता है।
अमर ने बताया कि इस मामले में
गीता का ज्ञान सर्वोत्तम साधन है।
गीता की अहमियत को समझते हुए
यूनिवर्सिटी ने इसकी स्टडी अनिवार्य
की।

Friday, 29 March 2013

GDP

Devinder Sharma LIKE
ये GDP क्या बला है ?? रोजाना अखबार लिखा होता है की भारत की जीडीपी 8 .7 % है कभी कहा जाता है के 9 % है ; प्रधानमंत्री कहते है की हम 12 % जीडीपी हासिल कर सकते है पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलम कहते थे की हम 14 % भी कर सकते है , रोजाना आप जीडीपी के बारे में पड़ते है और आपको लगता है की जीडीपी जितनी बड़े उतनी देश की तरक्की होगी । कभी किसीने जानने की कौशिश की के ये जीडीपी है क्या ? आम आदमी की भाषा में जीडीपी का क्या मतलब है ये हमें आज तक किसी ने नही समझाया । GDP actually the amount of money that exchanges hand . माने जो पैसा आप आदान प्रदान करते है लिखित में वो अगर हम जोड़ ले तो जीडीपी बनती है ।

अगर एक पेड़ खड़ा है तो जीडीपी नही बढती , लेकिन अगर आप उस पेड़ को काट देते है तो जीडीपी बढती है किउंकि पेड़ को काटने के बाद पैसा आदान प्रदान होता है , पर पेड़ अगर खड़ा है तो तो कोई इकनोमिक activity नही होती जीडीपी भी नही बढती । अगर भारत की सारे पेड़ काट दिया जाये तो भारत की जीडीपी 27 % हो जाएगी जो आज करीब 7 % है । आप बताइए आपको 27 % जीडीपी चाहिए या नही !

अगर नदी साफ़ बह रही है तो जीडीपी नही बढती पर अगर आप नदी को गंध करते है तो जीडीपी तिन बार बढती है । पहले नदी पास उद्योग लगाने से जीडीपी बढ गयी, फिर नदी को साफ़ करने के लिए हज़ार करोड़ का प्रोजेक्ट लेके ए जीडीपी फिर बढ गयी , फिर लोगोने नदी के दूषित पानी का इस्तेमाल किया बीमार पड़े, डॉक्टर के पास गए डॉक्टर ने फीस ली , फिर जीडीपी बढ गयी ।

अगर आप कोई कार खरीदते है , आपने पैसा दिया किसीने पैसा लिया तो जीडीपी बढ गयी, आपने कार को चलाने के लिए पेट्रोल ख़रीदा जीडीपी फिर बढ गयी, कार के दूषित धुयाँ से आप बीमार हुए , आप डॉक्टर के पास गए , आपने फीस दी उसने फीस ली और फिर जीडीपी बढ गयी । जितनी कारे आयेगी देश में उतनी जीडीपी तिन बार बढ जाएगी और इस देश रोजाना 4000 जादा कारे खरीदी जाती है , 25000 से जादा मोटर साइकल खरीदी जाती है और सरकार भी इसकी तरफ जोर देती है किउंकि येही एक तरीका है के देश की जीडीपी बड़े ।

हर बड़े अख़बार में कोका कोला और पेप्सी कोला का advertisement आता है और ये भी सब जानते है के ये कितने खतरनाक और जेहरिला है सेहत के लिए पर फिर भी सब सरकारे चुप है और आँखे बंध करके रखा है किउंकि जब भी आप कोका कोला पीते है देश की जीडीपी दो बार बढती है । पहले आप कोका कोला ख़रीदा पैसे दिया जीडीपी बढ गया , फिर पिने के बाद बीमार पड़े डॉक्टर के पास गए , डॉक्टर को फीस दिया जीडीपी बढ गयी ।

आज अमेरिका में चार लाख लोग हर साल मरते है किउंकि वो खाना खाते है , किउंकि जो जंक फ़ूड है कार्बोनेटेड ड्रिंक्स है वो खाने से मोटापा और बीमारी होती है , आज 62 % अमेरिका के लोग क्लीनिकली मोटापा के सिकार है और हमारे देश में 62 %लोग तो
कुपोषन के सिकार है । ये भी जीडीपी बदने का एक तरीका है , जितना जादा प्रदुषण खाने में होगा उतना जादा जीडीपी बढता है ।

आज अमेरिका में चार लाख लोग हर साल मरते है किउंकि वो खाना खाते है , किउंकि जो जंक फ़ूड है कार्बोनेटेड ड्रिंक्स है वो खाने से मोटापा और बीमारी होती है , आज 62 % अमेरिका के लोग क्लीनिकली मोटापा के सिकार है और हमारे देश में 62 %लोग तो कुपोषन के सिकार है । ये भी जीडीपी बदने का एक तरीका है , जितना जादा प्रदुषण खाने में होगा उतना जादा जीडीपी बढता है । पहले फ़ूड इंडस्ट्री की बृद्धि हुई जीडीपी बड़ी ,उसके साथ फार्मासिउटीकाल्स की बृद्धि हुई फिर जीडीपी बढ गयी , फिर इसके साथ इन्सिउरेंस की भी बृद्धि हुई । ये तिन इंडस्ट्री आपस में जुडी हुई है इसीलिए आज इन्सिउरेंस इंडस्ट्री फ़ूड में पैसा लगा रहा है किउंकि आप जितना जादा ख़राब फ़ूड खायेंगे इन तिन इंडस्ट्री का बृद्धि होगी और जीडीपी बढेगी । अब क्या आपको जीडीपी बढानी है या घर में खाना बनाना है ! अब घर में खाना बनाने से जीडीपी नही बढती । इस मायाजाल को समझे ।

अमेरिका में आज करीब चार करोड़ लोग भूखे पेट सोते है यूरोप में भी चार करोड़ लोग भूखे सो रहे है , भारत में सरकारी आंकड़ा के अनुसार करीब 32 करोड़ लोग भूखे सोते है , अगर जीडीपी ही एक विकास का सूचक होती तो अमेरिका में भूख ख़तम हो जानी चाहिए थी पर अमेरिका और यूरोप में भूख बढ रही है भारत में भी जीडीपी के साथ भूख बढ रही है ।

निचे दिए गए लिंक में जाके विडियो देखे :
http://www.youtube.com/watch?v=j5y5FvejSgU

संकट की ओर ले जाते ट्रैक्टर: Devinder Sharma


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संकट की ओर ले जाते ट्रैक्टर: Devinder Sharma

हर सोमवार सुबह-सुबह ही पंजाब की कोटकापुरा अनाज मंडी में सेकंड हैंड ट्रैक्टरों की आमद शुरू हो जाती है। दोपहर तक तो यह मंडी ट्रैक्टरों की मंडी में तब्दील हो जाती है। ज्यादातर टै्रक्टरों की खरीद वो बिचौलिए करते हैं, जो उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में सेकंड हैंड ट्रैक्टर बेचते हैं। आप सोच रहे होंगे, पंजाब के किसान ट्रैक्टर से तंग आ चुके हैं, इसलिए अपने ट्रैक्टर बेचने को लालायित हैं। सच्चाई यह है कि जो लोग ट्रैक्टर बेचने आ रहे हैं, वे नए अच्छे और आकार में बड़े ट्रैक्टर खरीद चुके हैं। अनेक दशकों से ट्रैक्टर पंजाब के किसानों के लिए सम्मान का प्रतीक हैं। जिन्हें जरूरत न हो, वे भी ट्रैक्टर खरीद लेते हैं। पंजाब में 5 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर हैं। कभी इन्हें सम्मान का प्रतीक माना जाता था, लेकिन अब ये आत्महत्या के प्रतीक हैं। इसके बावजूद किसानों ने ट्रैक्टर-प्रेम नहीं छोड़ा है। ट्रैक्टर के नए ब्रांड के प्रति उनमें चाहत विकसित हो गई है और यह चाहत बढ़ती जा रही है।

हालांकि ऎसे किसान भी बड़ी संख्या में हैं, जिनके लिए ट्रैक्टर जरूरत हैं, लेकिन ऎसे छोटे किसान भी हैं, जो सामाजिक दबाव के कारण ट्रैक्टर खरीद लेते हैं, चूंकि कम ब्याज दर पर आसान किश्तों में ट्रैक्टर उपलब्ध हैं। वे 5 लाख रूपए या उससे ज्यादा की कीमत पर भी ट्रैक्टर खरीद लेते हैं।
एक ट्रैक्टर अकेले किसान के लिए ज्यादा इस्तेमाल का नहीं है, उससे जुड़े भारी औजारों-कल-पुर्जो का बहुत महत्व होता है। ये औजार किसानों की ऋणग्रस्तता को बढ़ाते हैं। हरियाणा में जमीन समतल करने वाले औजार पर सब्सिडी 50,000 रूपए से बढ़कर 75,000 रूपए की गई है, मल्टिपल क्रॉप प्लान्टर पर सब्सिडी 10,000 रूपए से बढ़ाकर 20,000 रूपए कर दी गई है। ट्रैक्टर से जुड़कर काम करने वाले दूसरे औजार भी हैं, जो किसानों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को बढ़ा देते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं कृषि के यांत्रिकीकरण के खिलाफ हूं, मुझे तो यह स्पष्टीकरण चाहिए कि जब किसान पहले ही आर्थिक संकट में घिरे हैं, तब उन्हें महंगे कृषि औजार खरीदने के लिए प्रेरित करना कहां तक उचित है?

पंजाब के लगभग हर दूसरे घर में ट्रैक्टर है और खेतों का औसत आकार 4 एकड़ से भी कम हो गया है, लेकिन बुरी बात यह है कि 20,000 ट्रैक्टर हर साल बिकते हैं। ये टै्रक्टर काफी विशाल मशीन होते हैं, जिनमें 60-90 हॉर्स पावर होता है, ऎसे ट्रैक्टरों को आर्थिक रूप से कारगर बनाने के लिए सामान्य तौर पर 10-10 एकड़ के खेत चाहिए, पर उद्योगों के दबाव में सरकार ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए जरूरी खेत के आकार को घटाकर मात्र 2 एकड़ कर दिया है। जब पी. चिदम्बरम पिछली बार वित्त मंत्री थे, तब उन्होंने ट्रैक्टर पर विक्रय व उत्पाद शुल्क 18 प्रतिशत घटाकर ट्रैक्टर के खरीदारों को लुभाया था।

1980 के दशक के आखिर में मैं कंबोडिया (तब उसे कंपुचिया कहा जाता था) गया था। छोटी जोतों वाले उस देश में मैंने सोवियत संघ से आयातित बड़े-बड़े ट्रैक्टर देखे, यह देश तब बर्बाद हो चुका था और उसे केवल सोवियत संघ के खेमे वाले देशों की ही मान्यता मिली हुई थी, इसलिए वहां सोवियत निर्मित ट्रैक्टर की भरमार समझ में आती थी। मुझे याद है, मैंने वहां भारतीय राजदूत से कहा था, भारत अगर कंपुचिया को छोटे आकार के 25-35 हॉर्स पावर के ट्रैक्टर निर्यात करे, तो यह एक अच्छा फैसला होगा।

जहां कंपुचिया छोटे ट्रैक्टरों की ओर बढ़ा, वहीं पंजाब छोटी होती जोतों के बावजूद बड़े ट्रैक्टरों की ओर बढ़ा। मुझे पता चला है कि कुछ किसान अब 105 हॉर्स पावर के और भी विशाल ट्रैक्टर खरीदने की योजना बना रहे हैं। अगली बार जब आप पंजाब में किसानों के कर्ज में डूबने की रिपोर्ट पढें, तो समझ जाइएगा कि इसका एक बड़ा प्राथमिक कारण बड़े ट्रैक्टर हैं। यह त्रासद है, जिस देश में सतत कृषि संकट की वजह से विगत 15 साल में 2,90,470 लोगों के मौत की भेंट चढ़ जाने की रिपोर्ट हो, वह देश कृषि सम्बंधी मशीनों के लिए विशाल बाजार मुहैया कराता है। पंजाब में ही यांत्रिकीकरण के बावजूद प्रति दिन 2 किसान खुद का अंत कर लेते हैं। कृषि क्षेत्र को ऎसे देखा जा रहा है, मानो यहां मशीनों की कमी हो और मशीनें जितनी ज्यादा बिकेंगी, किसानों की आत्महत्या उतनी ही घटेगी। ध्यान दीजिए, विगत पांच वर्ष में ट्रैक्टरों की कीमत में 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह आश्चर्यजनक है, जब कारों और दोपहिया वाहनों का बाजार मूल्य बढ़ती महंगाई के बावजूद 20 प्रतिशत भी नहीं बढ़ा है, तब ट्रैक्टरों के मूल्य में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। दूसरे शब्दों मे कहें, तो यह कौन सुनिश्चित करेगा कि ट्रैक्टर निर्माता भोले किसानों को नहीं ठग रहे हैं? मैं चकित हूं, ट्रैक्टर कंपनियों ने भारत के दक्षिणी हिस्सों में कृषि विश्वविद्यालयों के साथ टै्रक्टर बिक्री के लिए समझौते किएं हैं।

मैं मानता हूं, कृषि क्षेत्र खेतिहर मजदूरों की बड़ी कमी झेल रहा है, लेकिन क्या बड़े ट्रैक्टर और उससे जुड़े औजारों की बिक्री किसानों को कृषि संकट से उबार पाएगी? तब हमारी राज्य सरकारें ट्रैक्टरों की बिक्री को क्यों प्रेरित कर रही हैं?

राज्य सरकारें ऎसी सहकारी समितियां क्यों नहीं बना सकतीं, जो किसानों को कृषि औजार पट्टे पर दें? सरकारें ऎसी निजी कंपनियों की स्थापना को प्रोत्साहित क्यों नहीं कर सकतीं, जो ट्रैक्टर और कृषि औजार किराए पर दें? मैं एक और राज्य सहकारी संस्था बनाने की सलाह नहीं दे रहा, बल्कि मैं सामाजिक उद्यमशीलता के लिए प्रोत्साहन मांग रहा हूं। यहां मैं जमींदारा फार्म सोल्यूशंस का उदाहरण देना चाहूंगा, पंजाब के फजिल्का का यह उद्यम किसानों को बड़ी मशीनें व कृषि औजार पट्टे पर देता है। विगत वर्षो में इसकी सदस्य संख्या 4000 का आंकड़ा पार कर चुकी है। मैं ऎसी अनेक छोटी ग्राम सहकारी समितियों को जानता हूं, जो औजार किराए पर देती हैं। ऎसे प्रयासों को आक्रामकता के साथ बढ़ाने व प्रोत्साहित करने का यह उचित समय है। यह किसानों को कृषि ऋण चक्र में और गहरे फंसने से बचाने का समय है।

राजस्थान पत्रिका:

Hindu Rashtra


मित्रों वर्तमान समय में जो इतिहास की सरकारी पुस्तकें पढाई जाती हैं उनके अनुसार जब भारत पर मुसलामानों का आक्रमण हुआ तब यहाँ के राजा पतनशील अवस्था में थे जो उनकी पराजय का प्रमुख कारन था किन्तु यह बात कोरी बकवास है तत्कालीन हिन्दू राजाओं का चरित्र विदेशी आक्रमणकारी राजाओं से शतगुणित उत्तम था | पराजयों के कारन कुछ तत्कालीन परिस्थितियां , सैनिक एवं कूटनीतिक कमियां थी जिनकी चर्चा अन्य लेखों में करूँगा | यहाँ बस हिन्दू राजाओं के सम्बन्ध में कुछ विदेशी लेखकों के विचार प्रस्तुत करता हूँ -

"यदि यह सिद्ध हो जाये कि राजा ने मदिरापान किया है तो उसे राज्य छोड़ना पड़ता था और उसे शासन के योग्य नही समझा जाता था |"
-------------------------- मजरूल जहब , ग्रन्थ - अलमसूदी ९१४ ई
"हिन्दू राजा मदिरापान नहीं करते थे | देश में ऐसी मान्यता थी की जो राजा मदिरापान करता है वह वास्तव राजा नही है |"
-----------------------------सुलेमान , ग्रन्थ -सल्सिलातुत्तावारीक ८५१ ई

'भारत के हिन्दू राजा सीधे सरल तथा धार्मिक थे | वे वचन का पालन करने वाले थे जबकि मुसलमान हर तरह से दूसरों को धोखा देना मजाक समझते थे |"---------------------------------मनूची १६५३-१७०८ ई

जब मैं हिन्द के गुण बताऊंगा तो (आप विदेशी मुसलमान) विरोध करेंगे | जो खुरासानी, हिन्द के निवासी को मूर्ख समझता होगा वह पान को भी घास मानता होगा | आपको चाहिए की हिंदुस्तान को स्वर्ग समझें |
------------------------------------ अमीर खुसरो

यह तो कुछेक उदाहरन हैं जितने भी विदेशी विद्वान भारत आये हैं और मन से पूर्वाग्रह रहित तथा निष्पक्ष रहे हैं उन्होंने भारत और भारतीयों की भूरि भूरि प्रशंसा की है और मैं गर्व से कहता हूँ की वर्तमान समय में भी हिन्दुओं का चरित्र पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ है |