Friday, 3 June 2016

चन्द्रशेखर आज़ाद – जीवन परिचय।

चंद्रशेखर आज़ाद (Chandrasekhar Azad) का जन्म 23 जुलाई, 1906 को एक आदिवासी ग्राम भाबरा में हुआ था। काकोरी ट्रेन डकैती और साण्डर्स की हत्या में सम्मिलित निर्भीक महान देशभक्त व क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अहम् स्थान रखता है।
आपके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गांव के रहने वाले थे। भीषण अकाल के चलते आप ग्राम भाबरा में जा बसे। चंद्रशेखर आज़ाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भाबरा में व्यतीत हुआ जहाँ आपने अपने भील सखाओं के साथ धनुष-बाण चलाना सीख लिया था।
आज़ाद बचपन में महात्मा गांधी से प्रभावित थे।  मां जगरानी से काशी में संस्कृत पढ़ने की आज्ञा लेकर घर से निकले। दिसंबर 1921 गांधी जी के असहयोग आंदोलन का आरम्भिक दौर था, उस समय मात्र चौदह वर्ष की आयु में बालक चंद्रशेखर ने इस आंदोलन में भाग लिया।  चंद्रशेखर गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित किया गया।  चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम आज़ाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर ‘जेलखाना’ बताया। उन्हें अल्पायु के कारण कारागार का दंड न देकर 15 कोड़ों की सजा हुई। हर कोड़े की मार पर, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गाँधी की जय’ का उच्च उद्घोष करने वाले बालक चन्द्रशेखर सीताराम तिवारी को इस घटना के पश्चात् सार्वजनिक रूप से चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ कहा जाने लगा।

चंद्रशेखर का क्रांतिकारी जीवन

1922 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। इससे चंद्रशेखर आजाद बहुत आहत हुए।  उन्होंने देश का स्वंतत्र करवाने की मन में ठान ली। एक युवा क्रांतिकारी  ने उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी दल के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से परिचित करवाया। आजाद  बिस्मिल से बहुत प्रभावित हुए । चंद्रशेखर आजाद के समर्पण और निष्ठा की पहचान करने के बाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद को अपनी संस्था का सक्रिय सदस्य बना लिया।  चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों के साथ संस्था के लिए धन एकत्रित करते थे। अधिकतर यह धन अंग्रेजी सरकार से लूट कर एकत्रित किया जाता था।

चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह

1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की गई थी। 1925 में काकोरी कांड के फलस्वरूप अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित कई अन्य मुख्य क्रांतिकारियों को मृत्यु-दण्ड दिया गया था।  इसके बाद चंद्रशेखर ने इस संस्था का पुनर्गठन किया। भगवतीचरण वोहरा के संपर्क में आने के पश्चात् चंद्रशेखर आज़ाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के भी निकट आ गए।   भगत सिंह के साथ मिलकर चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजी हुकूमत को भयभीत करने और भारत से खदेड़ने का हर संभव प्रयास किया।

झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां

चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।

चंद्रशेखर आज़ाद का आत्म-बलिदान

फरवरी 1931 में जब चंद्रशेखर आज़ाद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने सीतापुर जेल गए तो विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा। चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए तो उन्होंने चंद्रशेखर की बात सुनने से भी इनकार कर दिया।
गुस्से में वहाँ से निकलकर चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ एल्फ्रेड पार्क चले गए। वे सुखदेव के साथ आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि पुलिस ने उन्हें घेर लिया।  आज़ाद ने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर गोलियां दागनी शुरू कर दी।
आज़ाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर स्वयं अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे। दोनों ओर से गोलीबारी हुई लेकिन जब चंद्रशेखर के पास मात्र एक ही गोली शेष रह गई तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा।
चंद्रशेखर आज़ाद ने  यह प्रण लिया हुआ था कि वह कभी भी जीवित पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। इसी प्रण को निभाते हुए एल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को उन्होंने वह बची हुई गोली स्वयं पर दाग के आत्म बलिदान कर लिया।
पुलिस के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर गोलियाँ चलाकर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही चंद्रशेखर की मृत्यु की पुष्टि की गई।
बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस पार्क में उनका निधन हुआ था उसका नाम परिवर्तित कर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका धिमारपुरा नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया।
एक बार भगतसिंह ने बातचीत करते-करते मज़ाक में चन्द्रशेखर आज़ाद से कहा, “पंडित जी, हम क्रान्तिकारियों के जीवन-मरण का कोई ठिकाना नहीं, अत: आप अपने घर  का पता दे दें ताकि यदि आपको कुछ हो जाए तो आपके परिवार की कुछ सहायता की जा सके।”
चन्द्रशेखर सकते में आ गए और बोले, “पार्टी का कार्यकर्ता मैं हूँ, मेरा परिवार नहीं। उनसे तुम्हें क्या मतलब? दूसरी बात -उन्हें तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है और न ही मुझे जीवनी लिखवानी है। हम लोग नि:स्वार्थभाव से देश की सेवा में जुटे हैं, इसके एवज़ में न धन चाहिए और न ही ख्याती।

चंद्रशेखर आज़ाद का राखी प्रसंग

बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे और फिरंगी उनके पीछे लगे थे। फिरंगियों से बचने के लिए शरण लेने हेतु आजाद एक तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचे जहां एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आजाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब आजाद ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी। बातचीत से आजाद को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आजाद महिला को कहा, ‘मेरे सिर पर पांच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पांच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं।
यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- “भैया! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती।” यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आजाद के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।”

आज़ाद के अमर-वचन

“जिस राष्ट्र ने चरित्र खोया उसने सब कुछ खोया।”
चंद्रशेखर आज़ाद
“मैं जीवन की अंतिम सांस तक देश के लिए शत्रु से लड़ता रहूंगा।”
चंद्रशेखर आज़ाद
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“गिरफ़्तार होकर अदालत में हाथ बांध बंदरिया का नाच मुझे नहीं नाचना है। आठ गोली पिस्तौल में हैं और आठ का दूसरा मैगजीन है। पन्द्रह दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं यहाँ!” और आज़ाद अपनी पिस्तौल की नली अपनी कनपटी पर छुआ देते।
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“आज़ाद की कलाई में हथकड़ी लगाना बिल्कुल असंभव है। एक बार सरकार लगा चुकी, अब तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे, लेकिन जीवित रहते पुलिस बन्दी नहीं बना सकती।”
– चंद्रशेखर आज़ाद
[आज़ाद केवल एक बार बचपन में पुलिस के हाथों पकड़े गए थे तभी उन्होंने प्रण किया था कि वे कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे।]
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“जब तक यह बमतुल बुख़ारा (आज़ाद अपने माउजर पिस्तौल को इसी नाम से पुकारते थे) मेरे पास है किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ ले जाए।”
– चन्द्रशेखर आज़ाद

बिहार में सत्तू बेच रही है कोरियाई महिला




दक्षिण कोरिया के शहर चुन चीआन की निवासी ग्रेस ली क़रीब 20 साल पहले बिहार आ कर बस गईं. पहले वो ख़ुद सत्तू की दीवानी हुईं और बाद में अपने कोऱियाई दोस्तों को इसका दीवाना बनाया.
ग्रेस ली और उनके पति यांज गिल ली को 2005 में स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानियां हुईं. अपने एक बिहारी दोस्त की सलाह पर ग्रेस ने सत्तू को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया.
वो बताती हैं, "हमने ये रूटीन बांधा कि रोज हम सुबह के नाश्ते में सत्तू पिएं. इसका जो नतीजा आया, वह बहुत अच्छा था. मैं खुद को ऊर्जा से भरा महसूस करती और मेरे पति की पेट से जुड़ी परेशानियां दूर हो गईं."
दरअसल सत्तू भुने हुए अनाज खासकर, जौ और चने का आटा है. बिहार के लोगों के जीवन में रचा बसा सत्तू प्रोटीन से भरपूर होता है. यह पचने में आसान होता है. शरीर को ठंडा रखने की अपनी ख़ासियत की वजह से गर्मी में लोग इसे खूब खाते हैं.
ली परिवार का बिहार से रिश्ता उसी समय से जुड़ना शुरू हो गया था, जब ग्रेस के पति यांज ली पटना उच्च शिक्षा के लिए आए. 1997 में यांज ली से शादी करके ग्रेस ली भी पटना आ गईं.

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उसके बाद उन्होंने हिन्दी सीखी और बिहार की संस्कृति को नज़दीक से देखा. ग्रेस ली हंसते हुए कहती भी हैं, "मैं आधी बिहारी हूं."
ग्रेस ली पटना के एएन कॉलेज में कोरियन भाषा पढाती हैं. सत्तू के सेहत पर पड़ने वाले अच्छे असर को देखते हुए उन्होंने अपने दूसरे कोरियाई दोस्तों से भी इसका स्वाद चखाने की ठानी.
उन्होंने 20 लोगों की मदद से सत्तू तैयार करना शुरू किया. जिसे उन्होंने दक्षिण कोरिया में अपने दोस्तों को भेजा. उन्होंने भारत में रहने वाले अपने कोरियाई मित्रों को भी सत्तू भेजा.
ग्रेस ली हर साल 40 किलो सत्तू दक्षिण कोरिया और दो क्विंटल सत्तू भारत में रहने वाले अपने कोरियाई दोस्तों को 500 रुपए प्रति किलो की दर पर बेचती हैं.
दिल्ली में 20 साल से रह रहे किम सुंग सु उनके ग्राहकों में से एक हैं. वो 2006 से ही सत्तू पी रहे हैं. 65 साल के किम सुंग सु ने फ़ोन पर बताया कि वो छह महीने का सत्तू मंगाकर रख लेते हैं और उसे सुबह शहद के साथ पीते हैं.

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वो कहते है, "ये बहुत स्वादिष्ट है और किसी भी हेल्थ ड्रिंक से बहुत अच्छा है. मैं चाहूंगा कि इसमें थोड़ा सी चीनी मिलाकर बेचा जाए ताकि ये एकदम रेडीमेड ड्रिंक की तरह तैयार हो जाए. साथ ही कुछ और भी अनाज इसमें डाले जाएं."
ली ने अपने इस ग्राहक के सुझाव पर काम करना शुरू कर दिया है. उन्होंने दिसंबर 2015 में पटना के पास हाजीपुर में सत्तू ड्रिंक बनाना शुरू कर दिया है. ये काम वो अपने कोरियाई अमेरीकी मित्र जॉन डब्लू चे और विलियम आर कुमार के साथ मिलकर कर रही हैं.
इस पाउडर में वो बहुत सारे अनाज मिला कर रही हैं.
जॉन डब्लू चे कहते हैं, "हम इसको आपदा के वक्त के खाने की तरह विकसित करना चाहते हैं. जहां कहीं भी आपदा हो, भुखमरी हो वहां हमारी संस्था 'बिनचे' इसे मुफ़्त बांटेगी."

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हाल ही में जब पटना के पास गंगहारा गांव में आग लगी तो ग्रेस ली ने अपना ये उत्पाद गांव वालों में बांटा. हालांकि ग्रेस ली के इस नए काम ने उनके सत्तू के कारोबार में ब्रेक लगा दिया है. ऐसे में उनके कोरियाई दोस्त थोड़े परेशान भी हैं.
ग्राहक किम सुंग सु कहते हैं, "बाज़ार में सत्तू मिलता है. लेकिन ग्रेस ली वाले सत्तू जैसी शुद्धता नहीं होती."
अपने पुराने ग्राहकों को निराश करने का दुख ग्रेस ली के चेहरे पर भी झलकता है.
वो कहती है, "थोड़ा इंतजार कर लीजिए, वक्त मिलने पर फिर तैयार करेंगे सत्तू. आख़िर मैं भी तो आपकी तरह सत्तू की दीवानी हूं."
मेदनीपुर (प. बंगाल) में मुस्लिमो ने किया था हमला,
पर आदिवासी हिन्दुओ ने उनकी ईंट से ईंट बजा दी

पूरा वाक्य ये था कि बंगाल को अपनी संपत्ति समझ जिहादियों ने उत्तरी मेदनीपुर के चंद्रकोना में भी हिन्दुओ पर हमला किया, दुकाने लूटने की कोशिश की, आगजनी की कोशिश की ।।

पुरे बंगाल में तो जिहादी तत्वों का सिक्का चलता है
पर उत्तरी मेदनीपुर में जिहादियों का दाव उल्टा पड़ गया क्योंकि यहाँ उनका सामना आदिवासी हिन्दुओ से हो गया

फिर क्या था, आदिवासी हिन्दुओ को भी आम बंगाली हिन्दू समझ जिहादियों ने हमले किये पर आदिवासी हिन्दुओ ने अपने तीर, धनुष, कटार, तलवार, और अन्य हथियार निकाल लिए ।

दंगा कर रहे जिहादी तत्वों को दौड़ा दौड़ा कर मारा गया
आदिवासी हिन्दुओ की एकता और साहस देख जिहादी तत्व पुरे चंद्रकोना इलाके से ही भाग खड़े हुए

जिहादी तत्वों ने उत्तरी मेदनीपुर के इस इलाके में भी अपना सिक्का चलाने के लिए सुनियोजित तरीके से दंगे की शाजिश रची पर आदिवासी हिन्दुओ को आम बंगाली व् कमजोर समझना उनकी भूल साबित हुई
आदिवासी हिन्दुओ ने एकता का परिचय दिया और जिहादियों को सन्देश दिया की ये चंद्रकोना है तुम्हारा कोलकाता नहीं जहाँ आम बंगाली जिहादियों से डरकर रहते है

पुरे इलाके में आदिवासी हिन्दू अब और एकजुट हो गए है
तथा अब कई सालों तक जिहादी तत्व इस इलाके में जिहाद की कोशिश करने की भी नहीं सोच सकते।


Thursday, 2 June 2016

संघ के स्कूलों में पढ़ रहे 47 हजार मुस्लिम बच्चे, 270 मुस्लिम आचार्य

गुवाहाटी में दसवीं की परीक्षा में टापर बनने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित स्कूल के छात्र सरफराज हुसैन अकेले नहीं हैं। वर्तमान में संघ के स्कूलों में 47 हजार मुस्लिम बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
संघ द्वारा मुस्लिम बच्चों में भी हिन्दुस्तानी संस्कार भरने की कार्ययोजना कई इलाकों में शुरू की गई है। इसके तहत संघ के स्कूलों में 270 मुस्लिम आचार्यों की भी भर्ती हुई है। इतना ही नहीं हिन्दुत्व के संस्कार केंद्रों में 110 ईसाई आचार्य भी योगदान दे रहे हैं।
कश्मीर समेत देश के कई मुस्लिम बहुल इलाकों में संघ ने स्कूलों के अलावा अनौपचारिक संस्कार केंद्र भी खोलना शुरू किया है जहां विभिन्न स्कूलों के छात्रों को कोचिंग दी जाती है।
संघ के अनुशांगिक संगठन विद्या भारती के स्कूलों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 12 हजार मुस्लिम छात्र हैं। संघ के सर सह कार्यवाह सुरेश सोनी के मार्गदर्शन में विद्या भारती ने मुस्लिम इलाकों में स्कूलों के विस्तार की कार्ययोजना पर काम शुरू किया है।
विद्या भारती के दिल्ली स्थित मुख्यालय के कार्यलय सचिव लाखन सिंह चौहान ने अमर उजाला को बताया कि सरस्वती शिशु मंदिर और संस्कार केंद्रों को सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि अन्य सियासी दलों का भी सहयोग मिलता है।
विद्या भारती के देश भर में फैले 12 हजार 364 विद्यालयों में मुस्लिम छात्रों के प्रवेश पर रोक कहीं नहीं है। अनौपचारिक संस्कार केंद्र आदिवासी इलाकों के अलावा उपेक्षित बस्तियों में चलते हैं? चुंकि मुस्लिम आबादी में निर्धन बस्तियां भी हैं इसलिए वहां मुस्लिम बच्चों को निशुल्क शिक्षा और कोचिंग दी जाती है।
ऐसे 11 हजार संस्कार केंद्र हैं। संस्कार केंद्रों में तीन घंटे तक प्रतिदिन शिक्षण कार्य होता है जिसमें खेल और कहानियां भी सुनाई जाती हैं जो राष्ट्रीय भावना से प्रभावित होती हैं। मुस्लिम बच्चों को इन संस्कारों केंद्रों में जाने के लिए उनके अभिभावक भी प्रोत्साहित करते हैं।
संघ के स्कूलों में मुसिलम बच्चे गीता पाठ और गायत्री मंत्र जाप भी करते हैं। वंदे मातरम के गायन से उन्हें कोई परहेज नहीं है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ और बुलंदशहर में भी संघ के स्कूलों में मुस्लिम बच्चे हैं।
मध्य प्रदेश के विद्या भारती के स्कूलों में 10 हजार मुस्लिम बच्चे हैं। जम्मू कश्मीर में जम्मू के अलावा कश्मीर घाटी और लेह में संस्कार केंद्र चल रहे हैं। इनमें मुस्लिम आचार्य बच्चों को पढ़ाते हैं। देश भर में फैले स्कूलों में एक लाख 46 हजार आचार्य हैं जो करीब 34 लाख बच्चों को हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के संस्कार से संस्कारित कर रहे हैं।
राघवेंद्र नारायण मिश्र /अमर उजाला,नई दिल्ली

डॉ. अशोक तिवारी
Ph.D. in Energy Management
Ashokktiwari@gmail.com
कहा जाता है कि बिजली का अविष्कार अंग्रेज वैज्ञानिकों वोल्टा, कूलम्ब, अम्पीयर, एडिसन, फराडे आदि ने सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी में किया. हमारी पाठ्यपुस्तकों में भी यही बताया जाता है. वास्तविकता यह है कि इनसे हजारों वर्ष पूर्व से बिजली का उपयोग किया जाता था.
अगस्त्य संहिता (600 BC) में एक सूत्र हैः
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:। संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
अर्थात् एक मिट्टी का बर्तन लें, उसमें अच्छी प्रकार से साफ किया गया ताम्रपत्र और शिखिग्रीवा (मोर के गर्दन जैसा पदार्थ अर्थात् कॉपरसल्फेट) डालें. फिर उस बर्तन को लकड़ी के गीले बुरादे से भर दें.
उसके बाद लकड़ी के गीले बुरादे के ऊपर पारा से आच्छादित दस्त लोष्ट (mercury-amalgamated zinc sheet) रखें. इस प्रकार दोनों के संयोग से अर्थात् तारों के द्वारा जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति की उत्पत्ति होगी. यहाँ पर प्रोटोन व इलेक्ट्रान को क्रमशः मित्र व वरुण कहा गया है.
अगस्त्य संहिता में आगे लिखा हैः 
अनेन जलभंगोस्ति प्राणो दानेषु वायुषु। एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥

अर्थात सौ कुम्भों (अर्थात् उपरोक्त प्रकार से बने तथा श्रृंखला में सौ सेलों को जोड़े) की शक्ति का पानी में प्रयोग करने पर पानी अपना रूप बदल कर प्राण वायु (ऑक्सीजन) और उदान वायु (हाइड्रोजन) में परिवर्तित हो जाएगा।

फिर लिखा गया हैः 
वायुबन्धकवस्त्रेण निबद्धो यानमस्तके उदान स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌।

अर्थात् उदान वायु (हाइड्रोजन) को बन्धक वस्त्र (air tight cloth) द्वारा निबद्ध किया जाए तो वह विमान विद्या (aerodynamics) के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों के आधार पर विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे गए -
(1) तड़ित्‌-रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न विद्युत.
(2) सौदामिनी-रत्नों के घर्षण से उत्पन्न विद्युत.
(3) विद्युत-बादलों के द्वारा उत्पन्न विद्युत.
(4) शतकुंभी-सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न विद्युत.
(5) हृदनि- हृद या स्टोर की हुई बिजली विद्युत.
(6) अशनि-चुम्बकीय दण्ड से उत्पन विद्युत.
अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है. उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली. अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं.
प्राचीन भारत में ELECTROPLATING द्वारा सोना चांदी को शुद्ध करने की कला ज्ञात थी जिसमे बैटरी की आवश्यकता होती है. इसका वर्णन शुक्रनीति में भी आता है.
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते। यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रंस्वर्णेन रजतेन वा। सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥
अर्थात्‌ कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है. लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है. स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है.
अगस्त्य संहिता पर आधारित प्राचीन विद्युत् बैटरियां प्राचीन मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) में पायी जाती हैं. इन्हें बग़दाद बैटरी कहा जाता है. इनका काल 250 BC से पूर्व का है. संभवतः इन्हें भारत में निर्मित कर बेबीलोन में पार्थियन राजाओं के काल में निर्यात किया गया था.
महर्षि अगस्त्य द्वारा वर्णित यह मित्र – वरुण शक्ति क्या है? इसका विवरण वेदों में प्राप्त होता है. वेदों के अनेक श्लोकों में मित्र वरुण वशिष्ठ अर्थात प्रोटोन इलेक्ट्रान न्यूट्रान की संकल्पना का प्रमाण प्राप्त होता है.
ऋग्वेद 7.33.10 में कहा गया है –
विद्युतो ज्योतिः परी संहिजान, मित्रावरुणा यद्पश्यतान त्वा.
तत ते जन्मोतैकं वशिष्ठ–अगस्त्यो यात तव आज्भार.
अर्थात जब मित्र (proton) और वरुण (electron) के कण समान मात्रा में विद्युत् का परित्याग करते हैं, तब वशिष्ठ (neutron) बनता है. यह वशिष्ठ का प्रथम जन्म है. यह अस्थायी होता है इसमें अगस्त्य (neutrino) मिलने से स्थायी हो जाता है.  
ऋग्वेद की ऋचाओं में मित्र–वरुण चुम्बकीय विकिरण (Electro-Magnetic-Radiation) तथा आकाशीय विद्युत् का प्रयोग सम्बन्धी वर्णन प्राप्त होता है. (देखें- ऋग्वेद 7.33.13,   8.101.1-2,   8.101.3,  1.2-7, 1.23.5, 1.2.9 यजुर्वेद 2.16, 3.33, 4.30 आदि) जिसका वर्णन अन्य लेख में किया जाएगा.
वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के प्रथम बार लंका यात्रा का विवरण दिया गया है. लंका की शोभा का वर्णन करते हुए बताया गया गया है कि वहां हर मार्ग पर विद्युत् से जलने वाले दीप लगे हुए थे. रावण के महल में हनुमान जी ने विद्युत् से जलने वाले दीप देखे.
ताम् सविद्युत् घन आकीर्णाम् ज्योतिः मार्ग निषेविताम् || (वाल. रा. सुन्दरकाण्ड पंचम सर्ग 3-5)
यूरोपीयन वैज्ञानिकों ने मिस्र के पिरामिडों के अध्ययन में पाया कि पिरामिडों के कमरों व सुरंगों के सीलिंग पर सूथ (धुएं जमने का कालापन) नहीं है.
अर्थात पिरामिडों के निर्माण के समय अँधेरे कमरों व सुरंगों में दीपक, मशालें, मोमबत्ती आदि का प्रयोग नहीं किया गया था. फिर उनको प्रकाश कहाँ से प्राप्त हुआ?
पिरामिडो के अन्दर दीवालों पर की गयी चित्रकारी का अवलोकन करने पर पाया गया कि उस काल में हाई–वोल्टेज संयत्रों का प्रयोग होता था जिनमें इंसुलेटर लगे थे और फिलामेंट द्वारा ट्यूब लाईट समान प्रकाशीय स्त्रोत से प्रकाश उत्पन्न किया जाता था. इनसे पता चलता है कि पिरामिडों के निर्माण काल (2500 BC)  में भी बिजली का प्रयोग किया जाता था.
गौतम बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं जातक–कथाएं कहलाती हैं और इनको लगभग 300 BC में संकलित किया गया था. इनमें एक जातक है जिसे उमग-जातक कहा जाता है. इसमें एक शहर का वर्णन है जिसमें बिजली का उपयोग किया जाता था, तथा एक ऐसी यांत्रिक व्यवस्था थी जिससे पूरे शहर की बिजली बंद की जाती थी.

डॉ. अशोक तिवारी
Ph.D. in Energy Management
Ashokktiwari@gmail.com
डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.
धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.
उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था.  दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.
अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि 'राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो'.
कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि 'अगर डच सेना मेरे  राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ'.  ['I would overcome any Dutch forces that were sent to my  kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe'- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]
डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.
अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.
कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.
डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.
अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए.   
कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.
केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.
राजा  ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.
मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.

तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.
यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.
1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था - 'जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा'.

Wednesday, 1 June 2016


NDA (National Defence Academy) में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक गोल्ड मैडल दिया जाता हैं, लेकिन क्या आपको यह ज्ञात हैं कि उस मैडल का नाम "लचित बोरफुकन" है ? कौन हैं ये "लचित बोरफुकन" ? क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे उत्तर भारत पर अत्याचार करने वाले मुस्लिम शासक और मुग़ल कभी बंगाल के आगे पूर्वोत्तर भारत पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सके ?
कारण था वो हिन्दू योद्धा जिसे इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया - असम के परमवीर योद्धा "लचित बोरफूकन" | अहोम राज्य (आज का आसाम या असम) के राजा थे चक्रध्वज सिंघा और दिल्ली में मुग़ल शासक था औरंगज़ेब | औरंगज़ेब का पूरे भारत पर राज करने का सपना अधूरा था औरंगज़ेब चाहता था कि उसका साम्राज्य पूरे भारत के ऊपर हो लेकिन भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से तक वह नहीं पहुँच पा रहा था |
यह बात औरंगज़ेब को सपनों में सताने लगी थी और तभी औरंगज़ेब के अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए 4000 महाकौशल लड़ाके, 30000 पैदल सेना, 21 सेनापतियों का दल, 18000 घुड़सवार सैनिक, 2000 धनुषधारी और 40 पानी के जहाजों की विशाल सेना असम पर आक्रमण करने के लिए भेजी थी सबसे रोचक बात यह थी कि असम अगर कोई जीत लेता तो इस तरह से वह उत्तर-पूर्वीं भारत पर कब्जा कर सकता था !
उस समय असम का नाम अहोम था | औरंगजेब ने इस इस हमले के लिए एक हिन्दू राजा को भेजा था | राजा राम सिंह अहोम को जीतने के लिए विशाल सेना लेकर निकल चुका था | अहोम का एक वीर सेनापति, जिसको बहुत ही कम लोग जानते हैं जिसका नाम लचित बोरफुकन था | इस नाम से उस समय लगभग सभी लोग वाकिफ थे | पहले भी कई बार लोगों ने अहोम पर हमले किये थे जिसे इसी सेनापति ने नाकाम कर दिए थे | कुछ समय पहले ही लचित बोरफूकन ने गौहाटी को दिल्ली के मुग़ल शासन से आज़ाद करा लिया था | जब लचित को मुग़ल सेना आने की खबर हुई तो उसने अपनी पूरी सेना को ब्रह्मपुत्र नदी के पास एक खड़ा कर दिया था |

मुग़ल सेना का ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे रास्ता रोक दिया गया | इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10000 सैनिक मारे गए और लचित बोरफुकन बुरी तरह जख्मी होने के कारण बीमार पड़ गये | अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ | राजाराम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा | जिसको राजा चक्रध्वज ने "आखरी जीवित अहोमी भी मुग़ल सेना से लडेगा" कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया |
लचित बोरफुकन जैसे जांबाज सेनापति के घायल और बीमार होने से अहोम सेना मायूस हो गयी थी | अगले दिन ही लचित बोरफुकन ने राजा को कहा कि जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के खतरे से जूझ रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे कर सकता हूँ ? मैं युद्ध भूमि से बीमार और लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें....
इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर वो ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमे "लचित बोरफुकन" ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुग़ल सेना को रौंद डाला | अनेकों मुग़ल कमांडर मारे गए और मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई | जिसका पीछा करके "लचित बोफुकन" की सेना ने मुग़ल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया | लचित के एक सैनिक ने कई सौ औरंगजेब के सैनिकों को मारा था | जब मुग़ल सेना ने लचित बोफुकन के सैनिकों का मनोबल देखा तो सभी में भगदड़ मच गयी थी | इस युद्ध के बाद फिर कभी उत्तर-पूर्वी भारत पर किसी ने हमला करने का सपने में भी नहीं सोचा | खासकर औरंगजेब को लचित बोरफूकन की ताकत का अंदाजा हो गया था | ये क्षेत्र कभी गुलाम नहीं बना |

ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर मिली उस ऐतिहासिक विजय के करीब एक साल बाद (उस युद्ध में अत्यधिक घायल होने और लगातार अस्वस्थ रहने के कारण) माँ भारती का यह अद्भुद लाड़ला सदैव के लिए माँ भारती के आँचल में सो गया | दुर्भाग्य की बात यह है कि आज इस वीर योद्धा का नाम भारत के कुछ 10 प्रतिशत लोग ही जानते हैं