Friday, 3 February 2017

http://thehinduhistorian.com/kumar-vishwas-attacks-on-sanjay-leela-bhansali-over-padmawati-row/


यूपी में बिक रहे हैं लड़कियों के मोबाइल नम्बर

लखनऊ | शनिवार, 4 फरवरी 2017, 01:55 PM IST |
उत्तरप्रदेश पुलिस ने लड़कियों के मोबाइल नंबर बेचने का धंधा करने वाले रैकेट का खुलासा किया है। पुलिस के अनुसार मोबाइल नंबर रिचार्ज की दुकानों में बेचे जा रहे थे। 50 रूपये से लेकर 500 तक की कीमत में बेचे जा रहे इन नंबरों की कीमत लड़कियों के रंग रूप से तय होती थी।हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने इस पूरे मामले का खुलासा हेल्पलाइन नंबर 1090 पर आने वाली शिकायतों के आधार पर किया। रिपोर्ट के अनुसार 15 नवंबर 2012 से 31 दिसंबर 2016 के बीच कुल 6 लाख 61 हजार 129 शिकायतें दर्ज कराई गईं। इनमें से 5 लाख 82 हजार 854 शिकायतें टेलीफोन पर परेशान करने को लेकर थीं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन शिकायतों में 90 फीसदी मामले पुलिस से जुड़े हुए हैं। पुलिस का कहना है कि ये लोग इन नंबरों पर कॉल करके लड़कियों को परेशान करते थे। ये कॉल करके कहते थे कि ''हमें आपसे दोस्ती करनी है''। जिसके बाद लड़कियों को परेशान किया जाता था।शाहजहांपुर के दुकानदार मोहम्मद ने पुलिस को बताया कि वह मजे के लिए कई बार इस तरह का मजाक करता था। इसके अलावा वह अपने दोस्तों को भी नंबर देता है। वह किसी-किसी लड़की के मोबाइल पर अश्लील फोटो भी व्हाट्सएप कर देता है। आईजी नवनीत सकेरा ने कहा कि हमने तीन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है जिन्होंने फेक आई पर सिमकार्ड बेचे हैं। इस मामले की छानबीन अभी जारी है


गुणी पुत्र पुत्री प्राप्ति के लिए नियम – शादीशुदा जोड़ो के लिए परिवार नियोजन उपाय ...

मारे बच्चे स्‍वस्थ हों, तन्दरुस्त हों, मेधावी हों, उनके जीवन मे इंटेलिजेन्सी हमेशा हो, | Q अच्छा रहे, समाज का काम करें. किसी भी माँ या पिता को अपने जीवन मे सबसे अच्छा बच्चा चाहिए तो उनका नियोजन करना पड़ेगा. बिना नियोजन के बच्चे दाऊद इब्राहिम होते हैं. माता बहन को पीटते हैं. हम हर चीज़ के लिए नियोजन करते हैं, घर बनाने के लिए, आदि, ऐसे ही बच्चे के लिए भी नियोजन करिए.
नियोजन मे क्या करना होगा? सबसे पहला नियोजन संयम पालना पड़ेगा. ज़्यादा समय ब्रह्मचर्या का पालन करना. स्त्री के लिए संयम रखना बहुत सरल है, पुरुषों के लिए कठिन है. साल मे एक या 2 बार ही संसर्ग करें, या फिर महीने मे बस एक बार ही पत्नी के साथ समागम हो. इसके लिए संकल्प मजबूत रहना चाहिए, और वो मजबूत करने के लिए अदरक काम आएगा, अदरक मुँह मे रख कर चूसते रहें. ये अदरक हर तरह का संकल्प मजबूत करने मे सहायता करता है.
2. नियमित रूप से जीवन मे चूना का सेवन करना, दोनो स्त्री पुरुष चूना खाएँ.
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– चूना 1 व्यक्ति दिन मे बस 1 ग्राम तक ही खाए, दूध छोड़ कर किसी भी तरल पदार्थ मे घोल कर पीना है, पान वाला चूना. जैसे पानी, दही, जूस दाल आदि.
नोट: पथरी के रोगी के लिए चूना वर्जित है.
3. ख़ान पान का ध्यान रखना.
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– राणा प्रताप, शिवा जी जैसे बच्चे चाहिए तो सात्विक भोजन करें स्त्री पुरुष. माँस, मछ्ली, अंडा, शराब सिगरेट सब वर्जित. शाकाहारी जीवन.
– शाकाहारी भोजन मे कुछ चीज़ें अवश्य हों, जैसे देशी गाय का दूध, दही, मक्खन, घी, ये सब अधिक उपयोग करना. मक्खन के साथ मिश्री ज़रूर खाएँ नियमित रूप से. मात्रा: 25 ग्राम मक्खन के साथ 10 ग्राम मिश्री.
– तिल, मूँग की दाल, मसूर की दाल, सीज़न वाले फल, जैसे गर्मी मे आम. नियमित रूप से खाना है ये सब
– फल कभी भी भोजन के साथ नही खाना अलग से खाना फल. खाने के 2-3 घंटे बाद फल खाना, या फिर सुबहा फल का ही नाश्ता करें, रात मे फल नही खाना.
4. शारीरिक श्रम नियमित रूप से करें दोनो पति पत्नी.
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– शारीरिक श्रम करें दोनो पति पत्नी. महिलाएँ ऐसा श्रम करें जिसमे गर्भाशय का मूव्मेंट हो. चटनी बनाना, कपड़े धोना, रोटी बनाना, ये सब काम हाथ से ही करें. चाकी चलाना सबसे अच्छा है, दिन मे बस 15 मिनिट. सबसे अच्छी संतान होगी.
– पुरुषों के लिए शरीर श्रम: नागर चलाना, नागार नही चला सकते तो, सीढ़ियाँ चढ़ना और उतरना. या फिर ज़्यादा पैदल चलना.
5. संतान का रंग साफ पाने के लिए.
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– वैसे तो व्यक्ति को उसके कर्मो से जानना चाहिए रंग रूप से नहीं !फिर भी जो लोग अपनी संतान का रंग साफ चाहते हैं, वो दोनो पति पत्नी हल्दी का दूध पीएँ, रात्रि को दूध मे हल्दी मिला कर पीएँ, संतान का रंग दोनो माता पिता से साफ होगा.
6. संतान खूब तेज बुद्धि वाली हो इसके लिए:
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– दही चूना मिला कर खाते रहना; देशी गाय का दूध लो, उसका दही जमाना चाँदी के बर्तन मे सुबह खाली पेट उसमे चूना मिला कर खाना, दोनो पति पत्नी. चूना वैसे ही लेना है प्रति व्यक्ति 1 ग्राम या गेहू के 1 दाने के बराबर. नोट: पथरी के रोगियों के लिए चूना वर्जित है ध्यान रहे.
7. तेजस्वी संताप प्राप्ति हेतु समागम करने के लिए आदर्श दिन:
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– पत्नी का मासिक शुरू होने वाले दिन से 10 दिन बाद और 18 दिन पहले, इस बीच का जो 7 दिन है वो संतान प्राप्ति के लिए सबसे अच्छा समय है. तेजस्वी और गुणी संतान होगी.
– इसमे 2 तरह के दिन आएँगे सम और विशॅम; जैसे 10 सम, 11 विषम, 12 सम, 13 विषम…. आदि; यदि सम दिन मे समागम करेंगे तो 99% पुत्र होगा, और विषम वाले दिन संसर्ग करेंगे तो पुत्री होगी. महिलाओं मे X और X गुण सूत्र होते हैं, और पुरुषों मे X और Y होते हैं, सम वाले दिन, Y अधिक सक्रिय हो जाता है, तब Y और X मिल कर पुत्र होते हैं, विषम दिन X सक्रिय होता है तो X और X मिल कर पुत्री होती है.
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8. शुकलपक्ष के दिनो मे समागम करने से पुत्र या पुत्री 99% प्रतापी, तेजस्वी, लड़ने भिड़ने वाले होंगे, कृष्नपक्ष मे अच्छे साहित्यकार, वैग्यानिक, डॉक्टर्स, इंजिनीयर्स, सीए होंगे.
– छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप, भगत सिंग, उधम सिंग, आज़ाद. ये सब शुकलपक्ष वाले हैं. शुकलपक्ष माने चंद्रमा लगातार बढ़ता हुआ होता है.
– न्यूटेन, गगदीश चंद्रा खुराना, जगदीश चंद्र बोस आदि, सब कृष्नपक्ष वाले हैं.
– चंद्रमा के शरीर पर पड़ने वाली ऊर्जा का सब चक्कर है, आप जानते हैं कृष्णपाक्ष मे चंद्रमा नही होता और शुकलपक्ष मे चंद्रमा बहुत तीव्र होता है. चंद्रमा का प्रकाश अपना नही है. वो सूर्य से आता है, शुकलपक्ष मे सूर्य की तीव्रता है, तो सूर्य का तेज आता है संतानों मे.
– कृष्णपाक्ष मे सूर्य का प्रताप नही है तो वो दिमाग़ वाली संतान होंगी.
– अगर आप 2 बच्चे कर रहे हैं तो इस प्रकार नियोजन करें की एक संतान शुकलपक्ष की और एक संतान कृष्णपाक्ष की.
9. मंदबुद्धि बच्चे कहाँ से आते हैं?
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– ये बच्चे उन माता पिता के हैं जिनके शरीर मे कॅल्षियम बहुत कम है. इनके बच्चे मतिमन्द होने ही वाले हैं, विकलांग होने ही वाले हैं. कॅल्षियम का टेस्ट होता है, पेतॉलजी मे हो जाएगा. सस्ते मे हो जाता है कॅल्षियम टेस्ट शरीर का. चुना कैल्शियम का सबसे अच्छा स्त्रोत है !
– महाराष्ट्र मे कोंकण बेल्ट के बच्चे खूब तेज बुद्धि वाले होते हैं, उनकी आँखे भी दुनिया मे सबसे सुंदर होती हैं. आई क्यू सबसे अधिक होता है उनका, वहाँ की मिट्टी लाल है, हर अनाज और फल मे कॅल्षियम और आइरन अधिक होता है. लाल मिट्टी मे भरपूर कॅल्षियम और आइरन है.
गर्भवती माता को आध्यात्मिक,ज्ञान वाली किताबें पढ़नी चाहिए ! बच्चा का उस पर प्रभाव होता है ! कहा जाता है अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ मे चक्रव्यू भेदने की विधि सीखी थी !!
– नाड़ी और गोत्र का मिलान होता है ताकि ‘डी एन ए’ एक ना हो. प्रेम विवाह भी करें तो इन बातों का ध्यान रखें, नही तो प्रेम छूट जाएगा और विवाह घिसट घिसट कर चलेगा. डोपमाइन केमिकल के प्रभाव से प्रेम भाव उत्पन्न होता है, वो शीघ्र ही समाप्त हो जाता है.
10. पति पत्नी का ब्लड ग्रूप अलग रहे तो अच्छा.
11. पति पत्नी सर्वदा दक्षिण दिशा मे सिर करके सोएँ.
12. यदि गर्भाधान हो गया तो अब क्या करें? उपरोक्त जानकारी के बिना | ऐसे मे हमे उत्तम संतान प्राप्त हो इसके लिए क्या करें?
– माता का भोजन अच्छा होते ही जाना चाहिए. दूध, ताक, दही, मक्खन, लोनी, छ्छाच्छ भरपूर खाना है. याद रखिए, देशी गोमता का ही. घबराएँ नही वजन नही बढ़ेगा.
– भरपूर कॅल्षियम आपके शरीर मे रहे, मतलब चूना बराबर खाते रहना, केला, मूँगफली दाना, तिल. इन चीज़ों मे भरपूर कॅल्षियम है.
– समय से भोजन समय से आराम. लंच करिए 10 बजे भरपेट, डिन्नर शाम 5-6 बजे, बीच मे भूख लगे तो जूस, फल, मूँगफली दाना, गुड, तिल पट्टी, दही खाना. सुबह शाम भोजन भरपेट.
– पहले महीने से सातवे महीने तक थोड़ा थोड़ा श्रम करते रहें, जाता चलाना, चटनी बनाना, कपड़े धोना, झाड़ू पोंच्छा, सब हाथ से करें, मशीन से नही.
– पहले दिन से 9 महीने, 9 दिन, 9 घंटे तक गर्भवती माता को कोई मानसिक तनाव नही देना नही तो दुष्परिणाम 10 गुना तक बच्चे को मिलेगा.
– गर्भवती माता को जो जो पसंद नही है वो उतने दीनो तक घर मे नही होना चाहिए.
– यदि इन बातों का ध्यान नही दिया तो बच्चा बाहर आकर जिंदगी भर आपको त्रास देगा.
– सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का असर गर्भवती महिला पर होता है, सूर्य ग्रहण बच्चे के लिए बड़ा तकलीफ़ वाला होता है, चंद्र ग्रहण उतना नही होता. सूर्य ग्रहण मे ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ होता है, तो ऐसे मे माता को आराम करना चाहिए और बाहर नही निकलना चाहिए.
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केदारनाथ से रामेश्वरम तक बने भगवान शिव के ये पांच पौराणिक मंदिर हैं एक सीधी लाइन में ...

भगवान शिव की हिन्दू धर्म में काफ़ी महत्ता है. कहा जाता है कि इन्होंने ही इस ब्रह्मांड की रचना की. इनकी पूजा कई अलग-अलग रूपों में की जाती है. लिंग, शिव प्रतिमा, काल भैरव. अर्धनारी रूप भी भगवान शिव का ही प्रतीक है.
भगवान शिव के मंदिर देश हर हिस्से में मिल जाएंगे. लेकिन इन मंदिरों में से कुछ ऐसे हैं, जिनका विवरण आपको पुराणों और हिन्दू धर्म ग्रंथों में मिलेगा. इसका मतलब है कि ये मंदिर कई हज़ार साल पुराने हैं. केदारनाथ से रामेश्वरम तक करीब 5 ऐसे मंदिर हैं, जिनका महत्व हिन्दू धर्म में काफ़ी ज़्यादा है. लेकिन मान्यताओं से अलग इन मंदिरों में एक ख़ास बात और है. ये पांचों मंदिर एक ही सीधी रेखा में बने हैं. मतलब समझने के लिए एक बार तस्वीर पर गौर कीजिए.
धरती के भौगोKalahasti हवा को.
Kanchipuram धरती को.
Chidambaram आकाश को.
वहीं Thiruvannamalai आग का प्रतीक माना जाता है.
इन मंदिरों को योगिक विज्ञान के आधार पर कुछ इस तरह बनाया गया कि सारे मंदिर एक सीधी रेखा में बनें.
इन मंदिरों को निर्माण हज़ारों साल पहले हुआ था. बिना सैटलाइट्स की मदद के इन मंदिरों को एक सीधी रेखा कैसे बनाया गया होगा? कैसे इन दूरियों को सही मापा गया होगा? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन हम उस वक़्त इन मंदिरों को बनाने वालों को दाद ज़रूर दे सकते हैं.लिक आधार पर बने ये पांच मंदिर पंचतत्व पर आधारीत हैं. Thiruvanaikaval जल को दर्शाता है.
एक इमाम जो पंडित बन गया
हिन्दू धर्म श्रेष्ठ धर्म है. यह हर कोई कहता है. लेकिन हिन्दू धर्म का इतना प्रभाव कही भी देखने को नहीं मिलेगा, जितना प्रभाव इस  इमाम पर पड़ा है.
जो इन्सान बचपन से कुरान पढ़ा हो और मस्जिद में इमाम रह चुका होने के बाद हिन्दू धर्म का इतना बड़ा प्रचारक बन गया कि वो आज वेद ज्ञान के अलावा और कोई बात ही नहीं करता.
आइये जानते है कौन है यह इमाम जो पंडित बन गया !
  • इस इमाम का नाम महबूब अली है, जो पहले कट्टर मुसलमान था.
  • इनका जन्म कोलकता के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था.
  • इन्होने अपनी शिक्षा में बचपन से ही कुरान और इस्लाम धर्म की सीखा ली थी.
  • महबूब अली मेरठ के इमाम  रह चुके है और कई सालो तक इमाम रहकर मस्जिद में जिंदगी गुजारी है.
  • इन्होने हिन्दू धर्म की खासियत जानकार वेद  की किताब पढ़ी उसके बाद इस्लाम धर्म की कुरान को चुनौती देने लगे.
  • यह जब  इमाम थे, तब कुरान की तारीफ़ करते नहीं थकते थे. आज हिन्दू धर्म के रंग में ऐसे रंग  है कि हर किसी को इस रंग में रंगना चाहते हैं.
  • महबूब अली ने अपना नाम  बदल कर महेंद्र पाल रख लिया. इनका वर्तमान में परिवर्तित नाम पंडित महेंद्र पाल आर्य है.
  • इस्लामी कट्टर और जिहादी इनके सामने आने से डरते और कतराते हैं.
  • इनको कुरान  के साथ हिन्दू धर्म के सारे किताबो का ज्ञान है.
  • मौलवी जाकिर नैक को  महेंद्र पाल ने डिबेट में चुनौती दी थी लेकिन  उसकी डिबेट  में आने की हिम्मत नहीं की.
  • महेंद्र पाल अब तक सारे मौलवी से  डिबेट जीत चुके है, लेकिन एक भी मौलवी इस पंडित को हरा नहीं पाया.
  • वेदों की इनको इतनी ज्यादा जानकारी है कि जो भी मुसलमान उनसे बहस करने आता है वह उनकी दिशा और सोच बदल देते है.
  • इनके अनुसार –  वेद एक ऐसी किताब है, जो इंसान को मनुष्य बनना सिखाती है, जब कि बाइबल इंसान को क्रिश्चन और कुरान इंसान की मुसलमान बनाता है.
  • पंडित जी के बच्चे भी वेद ज्ञान में पारंगत है और पिछले 30 साल से हिन्दू धर्म का प्रचार कर रहे है.
  • इन्होने अनगिनत मुसलमान को हिन्दू बना दिया है और कई मौलवी और इमाम को भी हिन्दू बनने पर मजबूर कर दिया.
कहानी – इमाम जो पंडित बन गया  – इनकी चुनौतयों को कोई मुसलमान जीत नहीं पाया है. इसलिए मौलवी और इमाम इनके सामने आने से डरते है और मुसलमानों को इनसे दूर रहने की सलाह दी जाती है.

Thursday, 2 February 2017

मेवाड़ की रानी पद्मिनी : एक शौर्य गाथा

वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना...जहाँ के इतिहास में आन बान शान या कहें कि सत्य पर बलिदान होने वालों की अनेक गाथाएं अंकित है।
१३०२ इश्वी में मेवाड़ के राजसिंहासन पर रावल रतन सिंह आरूढ़ हुए. उनकी रानियों में एक थी पद्मिनी जो श्री लंका के राजवंश की राजकुँवरी थी. रानी पद्मिनी का अनिन्द्य सौन्दर्य यायावर गायकों (चारण/भाट/कवियों) के गीतों का विषय बन गया था। दिल्ली के तात्कालिक सुल्तान अल्ला-उ-द्दीन खिलज़ी ने पद्मिनी के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन सुना और वह पिपासु हो गया उस सुंदरी को अपने हरम में शामिल करने के लिए। अल्ला-उ-द्दीन ने चित्तौड़ (मेवाड़ की राजधानी) की ओर कूच किया अपनी अत्याधुनिक हथियारों से लेश सेना के साथ। मकसद था चित्तौड़ पर चढ़ाई कर उसे जीतना और रानी पद्मिनी को हासिल करना। ज़ालिम सुलतान बढा जा रहा था, चित्तौड़गढ़ के नज़दीक आये जा रहा था। उसने चित्तौड़गढ़ में अपने दूत को इस पैगाम के साथ भेजा कि अगर उसको रानी पद्मिनी को सुपुर्द कर दिया जाये तो वह मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेगा।

रणबाँकुरे राजपूतों के लिए यह सन्देश बहुत शर्मनाक था। उनकी बहादुरी कितनी ही उच्चस्तरीय क्यों ना हो, उनके हौसले कितने ही बुलंद क्यों ना हो, सुलतान की फौजी ताक़त उनसे कहीं ज्यादा थी। रणथम्भोर के किले को सुलतान हाल ही में फतह कर लिया था ऐसे में बहुत ही गहरे सोच का विषय हो गया था सुल्तान का यह घृणित प्रस्ताव, जो सुल्तान की कामुकता और दुष्टता का प्रतीक था। कैसे मानी जा सकती थी यह शर्मनाक शर्त।

नारी के प्रति एक कामुक नराधम का यह रवैय्या क्षत्रियों के खून खौला देने के लिए काफी था। रतन सिंह जी ने सभी सरदारों से मंत्रणा की, कैसे सामना किया जाय इस नीच लुटेरे का जो बादशाह के जामे में लिपटा हुआ था। कोई आसान रास्ता नहीं सूझ रहा था। मरने मारने का विकल्प तो अंतिम था। क्यों ना कोई चतुराईपूर्ण राजनीतिक कूटनीतिक समाधान समस्या का निकाला जाय ?

रानी पद्मिनी न केवल अनुपम सौन्दर्य की स्वामिनी थी, वह एक बुद्धिमता नारी भी थी। उसने अपने विवेक से स्थिति पर गौर किया और एक संभावित हल समस्या का सुझाया। अल्ला-उ-द्दीन को जवाब भेजा गया कि वह अकेला निरस्त्र गढ़ (किले) में प्रवेश कर सकता है, बिना किसी को साथ लिए, राजपूतों का वचन है कि उसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जायेगा....हाँ वह केवल रानी पद्मिनी को देख सकता है...बस. उसके पश्चात् उसे चले जाना होगा चित्तौड़ को छोड़ कर... जहाँ कहीं भी, उम्मीद कम थी कि इस प्रस्ताव को सुल्तान मानेगा। किन्तु आश्चर्य हुआ जब दिल्ली के आका ने इस बात को मान लिया। निश्चित दिन को अल्ला-उ-द्दीन पूर्व के चढ़ाईदार मार्ग से किले के मुख्य दरवाज़े तक चढ़ा, और उसके बाद पूर्व दिशा में स्थित सूरजपोल तक पहुंचा। अपने वादे के मुताबिक वह नितान्त अकेला और निरस्त्र था, पद्मिनी के पति रावल रतन सिंह ने महल तक उसकी अगवानी की। महल के उपरी मंजिल पर स्थित एक कक्ष कि पिछली दीवार पर एक दर्पण लगाया गया, जिसके ठीक सामने एक दूसरे कक्ष की खिड़की खुल रही थी...उस खिड़की के पीछे झील में स्थित एक मंडपनुमा महल था जिसे रानी अपने ग्रीष्म विश्राम के लिए उपयोग करती थी। रानी मंडपनुमा महल में थी जिसका बिम्ब खिडकियों से होकर उस दर्पण में पड़ रहा था अल्लाउद्दीन को कहा गया कि दर्पण में झांके। हक्केबक्के सुलतान ने आईने की जानिब अपनी नज़र की और उसमें रानी का अक्स उसे दिख गया ...तकनीकी तौर पर उसे रानी साहिबा को दिखा दिया गया था..सुल्तान को एहसास हो गया कि उसके साथ चालबाजी की गयी है, किन्तु बोल भी नहीं पा रहा था, मेवाड़ नरेश ने रानी के दर्शन कराने का अपना वादा जो पूरा किया था......और उस पर वह नितान्त अकेला और निरस्त्र भी था।

परिस्थितियां असमान्य थी, किन्तु एक राजपूत मेजबान की गरिमा को अपनाते हुए, दुश्मन अल्लाउद्दीन को ससम्मान वापस पहुँचाने मुख्य द्वार तक स्वयं रावल रतन सिंह जी गये थे .....अल्लाउद्दीन ने तो पहले से ही धोखे की योजना बना रखी थी। उसके सिपाही दरवाज़े के बाहर छिपे हुए थे...दरवाज़ा खुला....रावल साहब को जकड लिया गया और उन्हें पकड़ कर शत्रु सेना के खेमे में कैद कर दिया गया।
रावल रतन सिंह दुश्मन की कैद में थे। अल्लाउद्दीन ने फिर से पैगाम भेजा गढ़ में कि राणाजी को वापस गढ़ में सुपुर्द कर दिया जायेगा, अगर रानी पद्मिनी को उसे सौंप दिया जाय। चतुर रानी ने काकोसा गोरा और उनके १२ वर्षीय भतीजे बादल से मशविरा किया और एक चातुर्यपूर्ण योजना राणाजी को मुक्त करने के लिए तैयार की।

अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा गया कि अगले दिन सुबह रानी पद्मिनी उसकी खिदमत में हाज़िर हो जाएगी, दिल्ली में चूँकि उसकी देखभाल के लिए उसकी खास दसियों की ज़रुरत भी होगी, उन्हें भी वह अपने साथ लिवा लाएगी। प्रमुदित अल्लाउद्दीन सारी रात्रि सो न सका...कब रानी पद्मिनी आये उसके हुज़ूर में, कब वह विजेता की तरह उसे भी जीते.....कल्पना करता रहा रात भर पद्मिनी के सुन्दर तन की....प्रभात बेला में उसने देखा कि एक जुलुस सा सात सौ बंद पालकियों का चला आ रहा है। खिलज़ी अपनी जीत पर इतरा रहा था। खिलज़ी ने सोचा था कि ज्योंही पद्मिनी उसकी गिरफ्त में आ जाएगी, रावल रतन सिंह का वध कर दिया जायेगा...और चित्तौड़ पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया जायेगा। कुटिल हमलावर इस से ज्यादा सोच भी क्या सकता था। खिलज़ी के खेमे में इस अनूठे जुलूस ने प्रवेश किया...और तुरंत अस्तव्यस्तता का माहौल बन गया...पालकियों से नहीं उतरी थी अनिन्द्य सुंदरी रानी पद्मिनी और उसकी दासियों का झुण्ड....बल्कि पालकियों से कूद पड़े थे हथियारों से लेश रणबांकुरे राजपूत योद्धा ....जो अपनी जान पर खेल कर अपने राजा को छुड़ा लेने का ज़ज्बा लिए हुए थे। गोरा और बादल भी इन में सम्मिलित थे, मुसलमानों ने तुरत अपने सुल्तान को सुरक्षा घेरे में लिया। रतन सिंह जी को उनके आदमियों ने खोज निकाला और सुरक्षा के साथ किले में वापस ले गये। घमासान युद्ध हुआ, जहाँ दया करुणा को कोई स्थान नहीं था। मेवाड़ी और मुसलमान दोनों ही रण-खेत रहे, मैदान इंसानी लाल खून से सुर्ख हो गया था। शहीदों में गोरा और बादल भी थे, जिन्होंने मेवाड़ के भगवा ध्वज की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी थी।

अल्लाउद्दीन की खूब मिटटी पलीद हुई. खिसियाता, क्रोध में आग बबूला होता हुआ, लौमड़ी सा चालाक और कुटिल सुल्तान दिल्ली को लौट गया। उसे चैन कहाँ था, जुगुप्सा का दावानल उसे लगातार जलाए जा रहा था। एक औरत ने उस अधिपति को अपने चातुर्य और शौर्य से मुंह के बल पटक गिराया था। उसका पुरुष चित्त उसे कैसे स्वीकार का सकता था। उसके अहंकार को करारी चोट लगी थी, मेवाड़ का राज्य उसकी आँख की किरकिरी बन गया था।

कुछ महीनों के बाद वह फिर चढ़ बैठा था चित्तौडगढ़ पर, ज्यादा फौज और तैय्यारी के साथ। उसने चित्तौड़गढ़ के पास मैदान में अपना खेमा डाला, किले को घेर लिया गया....किसी का भी बाहर निकलना सम्भव नहीं था..दुश्मन कि फौज के सामने मेवाड़ के सिपाहियों की तादाद और ताक़त बहुत कम थी। थोड़े बहुत आक्रमण शत्रु सेना पर बहादुर राजपूत कर पाते थे लेकिन उनको कहा जा सकता था ऊंट के मुंह में जीरा। सुल्तान की फौजें वहां अपना पड़ाव डाले बैठी थी, इंतज़ार में. छः महीने बीत गये, किले में संगृहीत रसद ख़त्म होने को आई। अब एक ही चारा बचा था, "करो या मरो" या "घुटने टेको" आत्मसमर्पण या शत्रु के सामने घुटने टेक देना बहादुर राजपूतों के गौरव लिए अभिशाप तुल्य था, ऐसे में बस एक ही विकल्प बचा था झूझना...युद्ध करना...शत्रु का यथासंभव संहार करते हुए वीरगति को पाना।

बहुत बड़ी विडंबना थी कि शत्रु के कोई नैतिक मूल्य नहीं थे। वे न केवल पुरुषों को मारते काटते, नारियों से बलात्कार करते और उन्हें भी मार डालते। यही चिंता समायी थी धर्म परायण शिशोदिया वंश के राजपूतों में....और मेवाड़ियों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया।

किले के बीच स्थित मैदान में लकड़ियों, नारियलों एवम् अन्य इंधनों का ढेर लगाया गया.....सारी स्त्रियों ने, रानी से दासी तक, अपने बच्चों के साथ गोमुख कुन्ड में विधिवत पवित्र स्नान किया....सजी हुई चित्ता को घी, तेल और धूप से सींचा गया....और पलीता लगाया गया. चित्ता से उठती लपटें आकाश को छू रही थी। नारियां अपने श्रेष्ठतम वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित थी, अपने पुरुषों को अश्रुपूरित विदाई दे रही थी....अंत्येष्टि के शोकगीत गाये जा रही थी. अफीम अथवा ऐसे ही किसी अन्य शामक औषधियों के प्रभाव से प्रशांत हुई, महिलाओं ने रानी पद्मावती के नेतृत्व में चित्ता कि ओर प्रस्थान किया....और कूद पड़ी धधकती चित्ता में....अपने आत्मदाह के लिए....जौहर के लिए....देशभक्ति और गौरव के उस महान यज्ञ में अपनी पवित्र आहुति देने के लिए।

जय एकलिंग, हर हर महादेव के उदघोषों से गगन गुंजरित हो उठा था. आत्माओं का परमात्मा से विलय हो रहा था।

अगस्त २५, १३०३ कि भोर थी, आत्मसंयमी दुखसुख को समान रूप से स्वीकार करनेवाला भाव लिए, पुरुष खड़े थे उस हवन कुन्ड के निकट, कोमलता से भगवद गीता के श्लोकों का कोमल स्वर में पाठ करते हुए.....अपनी अंतिम श्रद्धा अर्पित करते हुए.... प्रतीक्षा में कि वह विशाल अग्नि उपशांत हो। पौ फट गयी.....सूरज कि लालिमा ताम्रवर्ण लिए आकाश में आच्छादित हुई.....पुरुषों ने केसरिया बागे पहन लिए....अपने अपने भाल पर जौहर की पवित्र भभूत से टीका किया....मुंह में प्रत्येक ने तुलसी का पता रखा....दुर्ग के द्वार खोल दिए गये। जय एकलिंग....हर हर महादेव कि हुंकार लगते रणबांकुरे मेवाड़ी टूट पड़े शत्रु सेना पर...मरने मारने का ज़ज्बा था....आखरी दम तक अपनी तलवारों को शत्रु का रक्त पिलाया...और स्वयं लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गये।

अल्लाउद्दीन खिलज़ी की जीत उसकी हार थी, क्योंकि उसे रानी पद्मिनी का शरीर हासिल नहीं हुआ, न मेवाड़ कि पगड़ी उसके कदमों में गिरी।

Wednesday, 1 February 2017

 आप पीसा की झुकी हुई मीनार के बारे में जानते हैं?? जरूर जानते होंगे. 
 लेकिन क्या आपको“बृहदीश्वर मंदिर”  के बारे में जानकारी है?
कई पैसे वाले भारतीय सैलानी तो इटली होकर भी आए होंगे. पीसा की मीनार के बारे में, वहाँ हमें बताया जाता है कि उस मीनार की ऊँचाई 180 फुट है और इसके निर्माण में 200 वर्ष लगे थे . हमें और आपको बताया गया है कि यह बड़ी ही शानदार और अदभुत किस्म की वास्तुकला का नमूना है. यही हाल मिस्त्र के पिरामिडों के बारे में भी है. 

               लेकिन क्या आपको तंजावूर स्थित “बृहदीश्वर मंदिर” (Brihadishwara Temple) के बारे में जानकारी है? ये नाम सुनकर चौंक गए ना?? यह मंदिर हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है. ना तो भारतवासियों ने कभी अपनी समृद्ध परंपरा, विराट सांस्कृतिक विरासत एवं प्राचीन वास्तुकला के बारे में गंभीरता से जानने की कोशिश की और ना ही पिछले साठ वर्ष से लगभग सभी पाठ्यक्रमों पर कब्जा किए हुए विधर्मी वामपंथियों एवं सेकुलरिज़्म की “भूतबाधा” से ग्रस्त बुद्धिजीवियों ने इसका गौरव पुनर्भाषित एवं पुनर्स्थापित करने की कोई कोशिश की. ? उनके अनुसार तो भारत में जो कुछ भी है, वह सिर्फ पिछले 400 वर्ष (250 वर्ष मुगलों के और 150 वर्ष अंग्रेजों के) की ही देन है. उससे पहले ना तो कभी भारत मौजूद था, और ना ही इस धरती पर कुछ बनाया जाता था. 
               क्योंकि वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हजारों वर्षों पुरानी हमारी पूर्ण विकसित सभ्यता थी, संस्कृति थी, मंदिर थे, बाज़ार थे, शासन थे, नगर थे, व्यवस्थाएँ थीं... और यह सब जानबूझकर बड़े ही षडयंत्रपूर्वक पिछली तीन पीढ़ियों से छिपाया गया. उन्हें सिर्फ उतना ही पढ़ाया गया अथवा बताया गया जिससे उनके मन में भारत के प्रति “हीन-भावना” जागृत हो. पाठ्यक्रम कुछ इस तरह रचाए गए कि हमें यह महसूस हो कि हम गुलामी के दिनों में ही सुखी थे
बहरहाल... दक्षिण भारत के तंजावूर शहर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर भारत का सबसे बड़ा मंदिर कहा जा सकता है. यह मंदिर “तंजावूर प्रिय कोविल” के नाम से भी प्रसिद्ध है. सन 1010 में अर्थात आज से एक हजार वर्ष पूर्व राजराजा चोल ने इस विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था. इस मंदिर की प्रमुख वास्तु (अर्थात गर्भगृह के ऊपर) की ऊँचाई 216 फुट है (यानी पीसा की मीनार से कई फुट ऊँचा). यह मंदिर न सिर्फ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि तत्कालीन तमिल संस्कृति की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करता है. कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाईट की बड़ी-बड़ी चट्टानों से निर्मित है. ये चट्टानें और भारी पत्थर पचास किमी दूर पहाड़ी से लाए गए थे. इसकी अदभुत वास्तुकला एवं मूर्तिकला को देखते हुए UNESCO ने इसे “विश्व धरोहर” के रूप में चिन्हित किया हुआ है.
दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश के अरुलमोझिवर्मन नाम से एक लोकप्रिय राजा थे जिन्हें राजराजा चोल भी कहा जाता था. पूरे दक्षिण भारत पर उनका साम्राज्य था. राजराजा चोल का शासन श्रीलंका, मलय, मालदीव द्वीपों तक भी फैला हुआ था. जब वे श्रीलंका के नरेश बने तब भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस आधार पर उन्होंने इस विराट मंदिर की आधारशिला रखी. चोल नरेश ने सबसे पहले इस मंदिर का नाम “राजराजेश्वर” रखा था और तत्कालीन शासन के सभी प्रमुख उत्सव इसी मंदिर में संचालित होते थे. उन दिनों तंजावूर चोलवंश की राजधानी था तथा समूचे दक्षिण भारत की व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी. इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक वास्तुज्ञान पर आधारित था, जिसे चोलवंश के नरेशों की तीन-चार्फ़ पीढ़ियों ने रहस्य ही रखा. बाद में जब पश्चिम से मराठाओं और नायकरों ने इस क्षेत्र को जीता तब इसे “बृहदीश्वर मंदिर” नाम दिया.
तंजावुर प्रिय कोविल अपने समय के तत्कालीन सभी मंदिरों के मुकाबले चालीस गुना विशाल था. इसके 216 फुट ऊँचे विराट और भव्य मुख्य इमारत को इसके आकार के कारण “दक्षिण मेरु” भी कहा जाता है. 216 फुट ऊँचे इस शिखर के निर्माण में किसी भी जुड़ाई मटेरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इतना ऊँचा मंदिर सिर्फ पत्थरों को आपस में “इंटर-लॉकिंग” पद्धति से जोड़कर किया गया है. इसे सहारा देने के लिए इसमें बीच में कोई भी स्तंभ नहीं है, अर्थात यह पूरा शिखर अंदर से खोखला है. भगवान शिव के समक्ष सदैव स्थापित होने वाली “नंदी” की मूर्ति 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊँची है तथा एक ही विशाल पत्थर से निर्मित है. अष्टकोण आकार का मुख्य शिखर एक ही विशाल ग्रेनाईट पत्थर से बनाया गया है. इस शिखर और मंदिर की दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न नक्काशी और कलाकृतियां उकेरी गई हैं. गर्भगृह दो मंजिला है तथा शिवलिंग की ऊँचाई तीन मीटर है.
              आगे आने वाले चोल राजाओं ने सुरक्षा की दृष्टि से 270 मीटर लंबी 130 चौड़ी बाहरी दीवार का भी निर्माण करवाया. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक यह मंदिर कपड़ा, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्यों आदि के क्रय-विक्रय का प्रमुख केन्द्र था. आसपास के गाँवों से लोग सामान लेकर आते, मंदिर में श्रद्धा से अर्पण करते तथा बचा हुआ सामान बेचकर घर जाते. सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यह मंदिर अभी तक छः भूकंप झेल चुका है, परन्तु अभी तक इसके शिखर अथवा मंडपम को कुछ भी नहीं हुआ. 
                         दुर्भाग्य की बात यह है कि शिरडी में सांई की “मजार” की मार्केटिंग इतनी जबरदस्त है, परन्तु  ऐसे अदभुत मंदिर की जानकारी भारत में कम ही लोगों को है. इस मंदिर के वास्तुशिल्पी कुंजारा मल्लन माने जाते हैं. इन्होंने प्राचीन वास्तुशास्त्र एवं आगमशास्त्र का उपयोग करते हुए इस मंदिर की रचना में (एक सही तीन बटे आठ या 1-3/8 अर्थात, एक अंगुल) फार्मूले का उपयोग किया. इसके अनुसार इस मात्रा के चौबीस यूनिट का माप 33 इंच होता है, जिसे उस समय "हस्त", "मुज़म" अथवा "किश्कु" कहा जाता था. वास्तुकला की इसी माप यूनिट का उल्लेख चार से छह हजार वर्ष पहले के मंदिरों एवं सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माण कार्यों में भी पाया गया है.

सितम्बर 2010 में इस मंदिर की सहस्त्राब्दि अर्थात एक हजारवाँ स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया. UNESCO ने इसे “द ग्रेट चोला टेम्पल” के नाम से संरक्षित स्मारकों में स्थान दिया. इसके अलावा केन्द्र सरकार ने इस अवसर को यादगार बनाने के लिए एक डाक टिकट एवं पाँच रूपए का सिक्का जारी किया. परन्तु इसे लोक-प्रसिद्ध बनाने के कोई प्रयास नहीं हुए.
                      इस मंदिर के निर्माण के समय विभिन्न प्रकार की गणितीय एवं वैज्ञानिक गणनाएँ की गई होंगी. खगोलशास्त्र तथा भूगर्भशास्त्र को भी ध्यान में रखा गया होगा. ऐसा तो हो नहीं सकता कि पत्थर लाए, फिर एक के ऊपर एक रखते चले गए और मंदिर बन गया... जरूर कोई न कोई विशाल नक्शा अथवा आर्किटेक्चर का पैमाना निश्चित हुआ होगा. तो फिर यह ज्ञान आज से एक हजार साल पहले कहाँ से आया? इस मंदिर का नक्शा क्या सिर्फ किसी एक व्यक्ति के दिमाग में ही था और क्या वही व्यक्ति सभी मजदूरों, कलाकारों, कारीगरों, वास्तुविदों को निर्देशित करता था? इतने बड़े-बड़े पत्थर पचास किमी दूर से मंदिर तक कैसे लाए गए?? 80 टन वजनी आधार पर दूसरे बड़े-बड़े पत्थर इतनी ऊपर तक कैसे पहुँचाया गया होगा?? या कोई स्थान ऐसा था, जहाँ इस मंदिर के बड़े-बड़े नक़्शे और इंजीनियरिंग के फार्मूले रखे जाते थे?? 
                          तात्पर्य यह है कि भारतीय कला, वास्तुकला, मूर्तिकला, खगोलशास्त्र आदि विषयों पर ज्ञान के अथाह भण्डार मौजूद थे (बल्कि हैं) सिर्फ उन्हें पुनर्जीवित करना जरूरी है. बच्चों को पीसा की मीनार अथवा ताजमहल (या तेजोमहालय??) के बारे में पढ़ाने के साथ-साथ शिवाजी द्वारा निर्मित विस्मयकारी और अभेद्य किलों, बृहदीश्वर जैसे विराट मंदिरों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए. इन ऐतिहासिक, पौराणिक स्थलों की “ब्राण्डिंग-मार्केटिंग” समुचित तरीके से की जानी चाहिए, वर्ना हमारी पीढियाँ तो यही समझती रहेंगी कि मिस्त्र के पिरामिडों में ही विशाल पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है, जबकि तंजावूर के इस मंदिर में मिस्त्र के पिरामिडों के मुकाबले चार गुना वजनी पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है.