Sunday, 3 December 2017

वर्ल्ड बैंक ने पाकिस्तान को कहा - कर्ज चुकाओ वरना कर देंगे - कराची बंदरगाह को नीलाम
जिस व्यक्ति की कूटनीति से चीन जैसा मजबूत देश और पाकिस्तान जैसा आतंकी देश विश्व मे बिलबिला रहा हो, उस व्यक्ति का मजाक जब देश के नालायक नेता उड़ाते हैं तो सचमुच उनकी दो कौड़ी की बुद्धि पर तरस आता है।
पाकिस्तान के ऊपर 83 अरब डॉलर का कर्ज है उनके जेब मे 3 अरब डॉलर है । वर्ल्ड बैंक ने कहा पैसा चुकाये नही तो कराची बंदरगाह नीलाम करने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा,
पाकिस्तानी वित्तमंत्री इशाक डार का खाता ही सीज कर दिया है वहाँ की अदालत ने ,लंदन में भर्ती है पूरे मंत्रिमंडल की बैठक लंदन में हो रही है ,पूरा लौहार अँधेरे में चला गया है, पाकिस्तान ने कहा है -
"यह धुँआ भारत से आ रहा है"
अफगानिस्तान से 4 अरब डॉलर का व्यापार था मोदी ने चाबहार खोल दिया 1 अरब डॉलर पर आ गया ।
पाकिस्तान में टमाटर 450 रुपये किलो है पाकिस्तान का न्यूज़ चैनल देखो तो दिन रात सिर्फ मोदी को गलियां देकर अपनी स्तिथि पर रोते है, न ही कोई वहां निवेश को तैयार है और न ही वर्ल्ड बैंक कोई नया कर्जा दे रहा है, वहीँ भारत में वर्ल्ड बैंक अपने सारे अधिकारी भेज रहा है
पाकिस्तान का अन्त.निकट.है,
मोदी की चालों को समझ पाना आसान नहीं होता है, लोगों के अनुमान अक्सर गलत साबित होते हैं-भारत पाकिस्तान पर आक्रमण भी नहीं करेगा, मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा भी बरकरार रखेगा। पर पाकिस्तान को इस स्थिति में ला देगा कि सोमालिया से भी ज्यादा भुखमरी पाकिस्तान में होगी।
मोदी ने कहा था पकिस्तान को अलग थलग करेंगे, और अब असर दिखने भी लग गया है।

Saturday, 2 December 2017

जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं।इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन. – मुस्लिम 1.8%
इटली. – मुस्लिम 1.5%.
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%
जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क. – मुस्लिम 2%
जर्मनी. – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन. – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%मुस्लिम
जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस. – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड. – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%
इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना. – मुस्लिम 10%
भारत – मुस्लिम 15%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%
जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड. – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%
जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –
अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%
जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –
बांग्लादेश. – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी. – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को. – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया. – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%
बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%
यमन. – मुस्लिम 100%
आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा २० से ३०% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)

Friday, 1 December 2017

vyang

दारू की वजह से बर्बाद शराबी ने कसम ली......और घर से दारू की खाली बोतले फेंकने लगा
😜 पहली बोतल फेंकते हुए बोला.....तेरी वजह से मेरी नोकरी गई
😜 दूसरी बोतल फेंकते हुए बोला....तेरी वजह से मेरा घर बिका
😜 तीसरी बोतल फेंकते हुए बोला.....तेरी वजह से मेरी बीवी चली गई
😉 चोथी उठाई तो वो भरी हुई निकली.....तो बोला 

😘 तू साइड में हो जा पगली.......................
तू तो बेकसूर है
Pawan Bhagat
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कुंभकर्ण 6 महीने चैन से इसीलिये सो पाता था क्योंकि...???
उसके घर के पास कोई मस्जिद नही थी।
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लड़की देखने जायें ताे एक बालटी पानी साथ लेकर जायें
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शूद्र कब शिक्षा और संपत्ति से वंचित हुआ ? कम से कम कौटिल्य के समय काल से 1830 तक तो नहीं /
 डॉ अंबेडकर दिग्भ्रमित कैसे हो गए ?
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कौटिल्य का नाम ,एक महान राजनीतिज्ञ के नाम पर दर्ज हैं ,,भारतीय इतिहास के पन्नों में / और उनकी दण्डनीति ,, आज शासन नीति के नाम से जाना जाता है / वे राज्य के नियमों का कड़ाई से पालन करवाते थे / चन्द्र गुप्त के समय भारत एक संपन्न राष्ट्र था ,,लेकिन खुद कुटिया में रहते थे ,,एक दरिद्र ब्राम्हण की तरह // यानी अपरिग्रह ही उनकी जीवन शैली थी / शायद तभी से " दरिद्र ब्राम्हण " जैसे शब्दों की नीवं पड़ी होगी / इसी को ब्रम्हानिस्म कहते हैं /अगर ग्रन्थों में उद्धृत -"जन्मना जायते शूद्रः ,,संस्कारात द्विजः भवति " ,,के महाभारत काल से कौटिल्य के समय काल तक ,,कौटिल्य की दण्डनीति का एक भाग रहा -- कि जन्म से कार्य निर्धारित नहीं होता ,,बल्कि स्वभाव से होता है जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है -- कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /( जिससे हर व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन कर समाज मे योगदान दे / )
अगर इसको तर्क की कसौटी पर कसें और सावधानी पूर्वक विचार करे ...तो शायद ये परंपरा इस्लामिक आक्रमण ,,और उसके भारत में आधार जमाने और उनके साम्राज्य स्थापित होने तक , जन्मना जायते शूद्र संस्कारत द्विजः भवति ,,का सिद्धांत और परंपरा का पालन हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग होना चाहिए/
और इसी तर्क की कसौटी पर कौटिल्य के दूसरी दण्डनीति ---" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / यदि यही व्यवहार दाई (धात्री) परिचारिका , अर्धसीतिका ,,और उपचारिका से करवाया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय / यदि उच्चकुलुत्पन्न दास से उक्त कार्य करवाया जाय तो वह दासकर्म को छोड़कर जा सकता है / "
तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम् }----- को कसा जाय तो कदाचित आप पाएंगे -- की मल प्रच्छालन ,,भंगी ,मेहतर हेला लालबेगी ,,और अछूत जैसी परंपरा का भी आगमन ------इस्लामिक शासन का ,भारत के समाज को उपहार स्वरुप भेंट होनी चाहिए /
इसलिए अछूत और शूद्रों की दुर्दशा के कारण को यदि डॉ आंबेडकर ने, भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत में खोजने की कोशिश की होती तो ज्यादा समसामयिक होता / और शायद सही नतीजे पर पहुँच सकते थे / और देश के अंदर सुलगती घृणा का दानव न पैदा होता ,,जिसके आग मे लोग सत्ता की रोटी सेंक रहे हैं /
भाषा की अज्ञानता ने उनको कहाँ ले जाकर खड़ा किया /
आज जब हम नित नए तथ्यों से वाकिफ हो रहे हैं कि भारत की जीडीपी ,समस्त विश्व की जीडीपी का 25 प्रतिशत के आसपास पिछले २००० साल ( और शायद उससे ज्यादा भी ,क्योंकि अँगुस मैडिसन ने 0 AD से 2000 AD तक की ही खोज की है ) से 1750 तक लगातार बनी हुई थी /
ये अकेले इकोनॉमिस्ट नहीं है ,जिन्होंने ये खोज की है ,एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बरोिच भी 1980 के आस पास इसी नतीजे पर पहुंचे थे , जिसका वर्णन पॉल कैनेडी ने अपनी पुस्तक "राइज एंड फॉल ऑफ़ ग्रेट पावर्स ,, ,जैक गोल्ड्स्टोन "व्हाई यूरोप -राइज ऑफ़ थे वेस्ट इन वर्ल्ड हिस्ट्री 1500-1850 ,में यही बात कहते हैं /
वही एकोनोमिस्ट ये भी बताते हैं कि 1750 अमेरिका और ब्रिटेन दोनों मिलकर विश्व की जीडीपी का मात्र २ प्रतिशत जीडीपी उत्पादित करते थे /
ब्रिटिश की शोषणकारी नीतियों के चलते 1900 आते आते ,, भारत का ट्रेडिशनल घरेलू उद्योग धराशायी हो जाता है / 1900 में जब भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) ,मात्र २ प्रतिशत बचती है / 700 प्रतिशत लोग ,जो की कौटिल्य के शूद्र की परिभाषा के अनुसार --शुश्रूषा ,वार्ता ( खेती व्यापर ,खनिज उद्योग ) और करकुशीलव ( टेचनोक्रट्स ,स्वरोजगार करने वाले , इंजीनियर ) बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं तो उनकी दरिद्रता को अगर इकोनॉमिस्ट डॉ आंबेडकर ने भारत के आर्थिक इतिहास से जोड़ा होता और उन्हे संस्कृत का ज्ञान होता तो कौटिल्य का अर्थशाश्त्र (,,एक अर्थशास्त्री की पहली पसंद होती है) पढ़ा होता ,,तो शायद उस नतीजे पर न पहुंचते जहाँ वे पहुंचे /
उसी जगह गांधीं ने बीमारी की जड़ को पकड़ा ,,घर घर खादी के कपड़ों की चरखी चलवाने का आह्वान किया ,,और गाडी को पटरी पर वापस लाने की कोशिश की ,,लेकिन गांधी शायद बहुत देर से भारत में पैदा हुए ,,,इसलिए गाडी पटरी पर वापस लाने में इतना समय लग गया / 65 साल का भारत का इतिहास गवाह है कि आज ब्रिटेन और अमेरिका भारत के कदमों में झुकाने को बेताब है ,,,तो 1900 -1946 की विशाल जनसमूह की दरिद्रता का कारन खोजने के लिए , डॉ आंबेडकर की प्रागैतिहासिक शास्त्रों की यात्रा कोई सार्थक यात्रा प्रतीत नहीं होती /
डॉ आंबेडकर ने ,,अपनी पुस्तक शूद्र कौन है ?? मे सारे ब्रम्हानिक ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले थे ,,अपनी नयी थीसिस को सिद्ध करने के पूर्व ,उनमें से कुछेक महत्वपूर्ण विन्दुओं पर विमर्श
(१)शूद्रों को समाज में सबसे निचला दर्जा और अपवित्र - डॉ अंबेडकर
इसको तो अम्बेडकर जी ने खुद ही खंडन किया है, जब वो शूद्र रत्नी का जिक्र करते हैं , राजा के सार्वभौमिकता के सन्दर्भ में , युधिस्ठिर को भीष्म के द्वारा राजनीती की शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में /---दूसरे इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थ शाश्त्र में भी नहीं है / कौटिल्य ने तो शूद्रो की सेना को , तो ब्राम्हणों की सेना से ज्यादा तेजोमय बताया है /---डॉ बुचनन जब 1807 में तुलवा प्रदेश के निवासियों का वर्णन करते हैं ,,तो बंटर्स के बारे में ,वे कहते हैं ..बंटर्स पवित्र शूद्र के वंशज है /इसका मतलब शूद्र समाज के निचले पायदान पर ,,और अपवित्र कम से कम 1807 तक तो नहीं हुवा था , और शूद्र होना भी उतना ही सम्मानित था ,,जितना बाकी वर्णों का /
(मेरी पहुँच वेदों तक और सतपत ब्राम्हण या अन्य ग्रंथों तक नहीं है )
(२) शूद्रों को ज्ञान तो कत्तई नहीं प्राप्त करना चाहिए ,,और उनको शिक्षा देना पाप ही नहीं अपराध भी है - डॉ आंबेडकर /कौटिल्य ने शूद्रों के धर्म को परिभाषित करते हुए दण्डनीति (शासन नीति) में प्रतिपादित किया कि - "शूद्रस्य द्विजातशुश्रूषा वार्ता कारकुशीलवकर्म " -- यानि द्विज की शुश्रूषा ,वार्ता और कार्यकुशीलव /कृषि ,पशुपालन और व्यापार ये वार्ता विद्या के अंग है / यह विद्या ,धन धान्य पशु ,हिरण्य ,हिरण्य ताम्र आदि खनिज पदार्थ के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।कार्यकुशील यानि शिल्पशास्त्र गायन वादन आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।
एक गाँधीवादी धरमपाल अपनी पुस्तक -The Beautiful Tree में लिखते हैं कि 1830 में अंग्रेजों द्वारा कराये गए सर्वे में प्राप्त डाटा के अनुसार स्कूल जाने वाले शूद्र छात्रों की संख्या ,ब्राम्हणों छात्रों से चार गुना थी ।
अब मैकाले का प्रवेश भारतीय शिक्क्षा जगत में 1835 में होती है । इससे दो निष्कर्ष निकलते है -(१) कौटिल्य के बाद और मैकाले के आने के पूर्व शूद्रो को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान प्राप्त करने का पूरा अधिकार था ।(२) वापस पलट के देखिये भारत के आर्थिक इतिहास पर । 1750 में भारत विश्व जीडीपी का 25% शेयर होल्डर और 1900 में मात्र 2% का शेयर होल्डर ।700 % लोग जो घरेलू उत्पाद की रीढ़ थे बेरोजगार बेघर और दरिद्र ।गणेश सखाराम देउसकर और Will Durant ने अपनी पुस्तकों , " देश की कथा "(1904) और "The Case For India " (1930) मे 1875 से 1900 के बीच 2 करोड़ भारतीयों अर्थात तत्कालीन आबादी का दसवें हिस्से की अन्न के अभाव मे मौत के मुह मे समा जाने की बात का विस्तृत वर्णन करते हैं / और ऐसा नहीं था कि अन्न का अभाव था , सिर्फ उनके जेबों मे अन्न खरीदने का पैसा नहीं था /
अब ये अपर जनसमूह जो जैसे तैसे अपने प्राणों की रक्षा करने मे सक्षम रहा , वो अपने सर के लिए छाया और पेट के लिए रोटी की जद्दोजहद करेगा , कि बच्चो की शिक्षा के लिए ??
दलित शोषित शिक्षा से वंचित । लेकिन क्या ब्रम्हानिस्म की वजह से ?
डॉ आंबेडकर ने जिन धर्म ग्रंथों को यूरोपियन संस्कृतज्ञों द्वारा अनुवादित, अनुवादों के अनुवादों को कॉपी एंड पेस्ट ( कॉपी एंड पेस्ट इसलिए कह रहा हूँ क्योकि , उन्होंने अपनी पुस्तक में कई जगहों पर वर्णों को caste के नाम से ही सम्बोधित किया है , और ये कहना कि डॉ आंबेडकर इतने अल्पज्ञ थे कि वर्ण और caste का फर्क नहीं समझते थे उनका अपमान होगा ) किया है /उन ग्रंथो तक तो मेरी पहुँच नहीं है इसलिए उनके कॉपी और पेस्ट किये गए quotations को ,,, उचित या अनुचित करार देना ,,मेरे बस की बात नहीं है / लेकिन जिन संस्कृतज्ञों को उन्होंने अपने लेखन का आधार बनाया है ,उन तक तो हम पहुँच ही सकते हैं / इसलिए ये साबित करना सरल हो जाएगा ,कि ये संस्कृतज्ञ पूर्वाग्रह से से ग्रस्त तो नहीं थे या इनके उद्देश्य अकादमिक न होकर अपने ईसाई धर्म को हिन्दू धर्म की तुलना में ज्यादा महान साबित करना था या ईसाइयत को फैलाना था ? / और फिर ये समझना भी आसान हो जाता है कि इन संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों को तोड़ मरोड़ कर तो नहीं पेश किया , या उनको संस्कृत केर समझ ही नहीं थी /
फिलहाल आपके प्रश्न को संज्ञान में लेने के पूर्व डॉ आंबेडकर के हिन्दू धर्मो के ग्रंथों से निकाले गए दो और निष्कर्षों की चर्चा करता हूँ /
(३) ..शूद्रं को संपत्ति का अधिकार नहीं है --डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर मेरे पहले लिखे गए कमेंट्स में है -
( १) कम से कम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में तो ये वर्णित नहीं है दूसरा आंबेडकर जी की पुस्तक में भी लिखा है कि शूद्र सार्वभौमिक राजाओं के रतनी हुवा करते थे / और उन्होंने ये भी लिखा है कि भीष्म ने युधिस्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ते हुए ये कहा कि मंत्रिमंडल में , कम से कम ३ शूद्र मंत्री होने चाहिए /
(२) डॉ बुचनन ने 1807 में प्रकशित अपनी पुस्तक में लिखा है कि -" यद्यपि तलुवा के ब्राम्हण ये कहते है कि यहाँ कि धरती के सच्चे मालिक वही हैं क्योंकि परशुराम ने ये धरती उनके लिए खोजी थी ,,लेकिन यहाँ पर ज्यादातर जमीनों के मालिक शूद्र है / और ब्राम्हणों का ये क्लेम ,,न तो वर्तमान कि सच्चाई है ,,और न भविष्य में कोई संभावना दिखती है /
(४) शूद्रों को उपनयन यानि जनेऊ संस्कार का अधिकार नहीं है , डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ,,अओको किसी ग्रन्थ या बुचनन जैसे विद्वानों को उद्धृत करने कि जरूरत नहीं है / हालांकि अब तो तथकथित द्विजों ने भी जनेऊ पहनना बंद कर दिया है ,,लेकिन अपने गावं में मैंने खुद ,,तथाकथित menial शूद्र बुजुर्गों को जनेऊ धारण करते हुए देखा है / आप भी देखे होंगे / और नहीं देखे होंगे तो ,,मई जब अपने गावं जाऊँगा अगले सप्ताह तो कइयों के फोटो खींच कर यही पर पोस्ट कर दूंगा / ( काश डॉ आंबेडकर ने गांधी कि तरह ,,२- ३ साल गावों कि ओर रुख किया होता , राजनीति में पैर रखने के पूर्व ,,तो वे इस भ्रमजाल के शिकार न बनते।शूद्र कब शिक्षा और संपत्ति से वंचित हुआ ? कम से कम कौटिल्य के समय काल से 1830 तक तो नहीं / डॉ अंबेडकर दिग्भ्रमित कैसे हो गए ?
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कौटिल्य का नाम ,एक महान राजनीतिज्ञ के नाम पर दर्ज हैं ,,भारतीय इतिहास के पन्नों में / और उनकी दण्डनीति ,, आज शासन नीति के नाम से जाना जाता है / वे राज्य के नियमों का कड़ाई से पालन करवाते थे / चन्द्र गुप्त के समय भारत एक संपन्न राष्ट्र था ,,लेकिन खुद कुटिया में रहते थे ,,एक दरिद्र ब्राम्हण की तरह // यानी अपरिग्रह ही उनकी जीवन शैली थी / शायद तभी से " दरिद्र ब्राम्हण " जैसे शब्दों की नीवं पड़ी होगी / इसी को ब्रम्हानिस्म कहते हैं /अगर ग्रन्थों में उद्धृत -"जन्मना जायते शूद्रः ,,संस्कारात द्विजः भवति " ,,के महाभारत काल से कौटिल्य के समय काल तक ,,कौटिल्य की दण्डनीति का एक भाग रहा -- कि जन्म से कार्य निर्धारित नहीं होता ,,बल्कि स्वभाव से होता है जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है -- कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /( जिससे हर व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन कर समाज मे योगदान दे / )
अगर इसको तर्क की कसौटी पर कसें और सावधानी पूर्वक विचार करे ...तो शायद ये परंपरा इस्लामिक आक्रमण ,,और उसके भारत में आधार जमाने और उनके साम्राज्य स्थापित होने तक , जन्मना जायते शूद्र संस्कारत द्विजः भवति ,,का सिद्धांत और परंपरा का पालन हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग होना चाहिए/
और इसी तर्क की कसौटी पर कौटिल्य के दूसरी दण्डनीति ---" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / यदि यही व्यवहार दाई (धात्री) परिचारिका , अर्धसीतिका ,,और उपचारिका से करवाया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय / यदि उच्चकुलुत्पन्न दास से उक्त कार्य करवाया जाय तो वह दासकर्म को छोड़कर जा सकता है / "
तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम् }----- को कसा जाय तो कदाचित आप पाएंगे -- की मल प्रच्छालन ,,भंगी ,मेहतर हेला लालबेगी ,,और अछूत जैसी परंपरा का भी आगमन ------इस्लामिक शासन का ,भारत के समाज को उपहार स्वरुप भेंट होनी चाहिए /
इसलिए अछूत और शूद्रों की दुर्दशा के कारण को यदि डॉ आंबेडकर ने, भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत में खोजने की कोशिश की होती तो ज्यादा समसामयिक होता / और शायद सही नतीजे पर पहुँच सकते थे / और देश के अंदर सुलगती घृणा का दानव न पैदा होता ,,जिसके आग मे लोग सत्ता की रोटी सेंक रहे हैं /
भाषा की अज्ञानता ने उनको कहाँ ले जाकर खड़ा किया /
आज जब हम नित नए तथ्यों से वाकिफ हो रहे हैं कि भारत की जीडीपी ,समस्त विश्व की जीडीपी का 25 प्रतिशत के आसपास पिछले २००० साल ( और शायद उससे ज्यादा भी ,क्योंकि अँगुस मैडिसन ने 0 AD से 2000 AD तक की ही खोज की है ) से 1750 तक लगातार बनी हुई थी /
ये अकेले इकोनॉमिस्ट नहीं है ,जिन्होंने ये खोज की है ,एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बरोिच भी 1980 के आस पास इसी नतीजे पर पहुंचे थे , जिसका वर्णन पॉल कैनेडी ने अपनी पुस्तक "राइज एंड फॉल ऑफ़ ग्रेट पावर्स ,, ,जैक गोल्ड्स्टोन "व्हाई यूरोप -राइज ऑफ़ थे वेस्ट इन वर्ल्ड हिस्ट्री 1500-1850 ,में यही बात कहते हैं /
वही एकोनोमिस्ट ये भी बताते हैं कि 1750 अमेरिका और ब्रिटेन दोनों मिलकर विश्व की जीडीपी का मात्र २ प्रतिशत जीडीपी उत्पादित करते थे /
ब्रिटिश की शोषणकारी नीतियों के चलते 1900 आते आते ,, भारत का ट्रेडिशनल घरेलू उद्योग धराशायी हो जाता है / 1900 में जब भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) ,मात्र २ प्रतिशत बचती है / 700 प्रतिशत लोग ,जो की कौटिल्य के शूद्र की परिभाषा के अनुसार --शुश्रूषा ,वार्ता ( खेती व्यापर ,खनिज उद्योग ) और करकुशीलव ( टेचनोक्रट्स ,स्वरोजगार करने वाले , इंजीनियर ) बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं तो उनकी दरिद्रता को अगर इकोनॉमिस्ट डॉ आंबेडकर ने भारत के आर्थिक इतिहास से जोड़ा होता और उन्हे संस्कृत का ज्ञान होता तो कौटिल्य का अर्थशाश्त्र (,,एक अर्थशास्त्री की पहली पसंद होती है) पढ़ा होता ,,तो शायद उस नतीजे पर न पहुंचते जहाँ वे पहुंचे /
उसी जगह गांधीं ने बीमारी की जड़ को पकड़ा ,,घर घर खादी के कपड़ों की चरखी चलवाने का आह्वान किया ,,और गाडी को पटरी पर वापस लाने की कोशिश की ,,लेकिन गांधी शायद बहुत देर से भारत में पैदा हुए ,,,इसलिए गाडी पटरी पर वापस लाने में इतना समय लग गया / 65 साल का भारत का इतिहास गवाह है कि आज ब्रिटेन और अमेरिका भारत के कदमों में झुकाने को बेताब है ,,,तो 1900 -1946 की विशाल जनसमूह की दरिद्रता का कारन खोजने के लिए , डॉ आंबेडकर की प्रागैतिहासिक शास्त्रों की यात्रा कोई सार्थक यात्रा प्रतीत नहीं होती /
डॉ आंबेडकर ने ,,अपनी पुस्तक शूद्र कौन है ?? मे सारे ब्रम्हानिक ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले थे ,,अपनी नयी थीसिस को सिद्ध करने के पूर्व ,उनमें से कुछेक महत्वपूर्ण विन्दुओं पर विमर्श
(१)शूद्रों को समाज में सबसे निचला दर्जा और अपवित्र - डॉ अंबेडकर
इसको तो अम्बेडकर जी ने खुद ही खंडन किया है, जब वो शूद्र रत्नी का जिक्र करते हैं , राजा के सार्वभौमिकता के सन्दर्भ में , युधिस्ठिर को भीष्म के द्वारा राजनीती की शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में /---दूसरे इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थ शाश्त्र में भी नहीं है / कौटिल्य ने तो शूद्रो की सेना को , तो ब्राम्हणों की सेना से ज्यादा तेजोमय बताया है /---डॉ बुचनन जब 1807 में तुलवा प्रदेश के निवासियों का वर्णन करते हैं ,,तो बंटर्स के बारे में ,वे कहते हैं ..बंटर्स पवित्र शूद्र के वंशज है /इसका मतलब शूद्र समाज के निचले पायदान पर ,,और अपवित्र कम से कम 1807 तक तो नहीं हुवा था , और शूद्र होना भी उतना ही सम्मानित था ,,जितना बाकी वर्णों का /
(मेरी पहुँच वेदों तक और सतपत ब्राम्हण या अन्य ग्रंथों तक नहीं है )
(२) शूद्रों को ज्ञान तो कत्तई नहीं प्राप्त करना चाहिए ,,और उनको शिक्षा देना पाप ही नहीं अपराध भी है - डॉ आंबेडकर /कौटिल्य ने शूद्रों के धर्म को परिभाषित करते हुए दण्डनीति (शासन नीति) में प्रतिपादित किया कि - "शूद्रस्य द्विजातशुश्रूषा वार्ता कारकुशीलवकर्म " -- यानि द्विज की शुश्रूषा ,वार्ता और कार्यकुशीलव /कृषि ,पशुपालन और व्यापार ये वार्ता विद्या के अंग है / यह विद्या ,धन धान्य पशु ,हिरण्य ,हिरण्य ताम्र आदि खनिज पदार्थ के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।कार्यकुशील यानि शिल्पशास्त्र गायन वादन आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।
एक गाँधीवादी धरमपाल अपनी पुस्तक -The Beautiful Tree में लिखते हैं कि 1830 में अंग्रेजों द्वारा कराये गए सर्वे में प्राप्त डाटा के अनुसार स्कूल जाने वाले शूद्र छात्रों की संख्या ,ब्राम्हणों छात्रों से चार गुना थी ।
अब मैकाले का प्रवेश भारतीय शिक्क्षा जगत में 1835 में होती है । इससे दो निष्कर्ष निकलते है -(१) कौटिल्य के बाद और मैकाले के आने के पूर्व शूद्रो को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान प्राप्त करने का पूरा अधिकार था ।(२) वापस पलट के देखिये भारत के आर्थिक इतिहास पर । 1750 में भारत विश्व जीडीपी का 25% शेयर होल्डर और 1900 में मात्र 2% का शेयर होल्डर ।700 % लोग जो घरेलू उत्पाद की रीढ़ थे बेरोजगार बेघर और दरिद्र ।गणेश सखाराम देउसकर और Will Durant ने अपनी पुस्तकों , " देश की कथा "(1904) और "The Case For India " (1930) मे 1875 से 1900 के बीच 2 करोड़ भारतीयों अर्थात तत्कालीन आबादी का दसवें हिस्से की अन्न के अभाव मे मौत के मुह मे समा जाने की बात का विस्तृत वर्णन करते हैं / और ऐसा नहीं था कि अन्न का अभाव था , सिर्फ उनके जेबों मे अन्न खरीदने का पैसा नहीं था /
अब ये अपर जनसमूह जो जैसे तैसे अपने प्राणों की रक्षा करने मे सक्षम रहा , वो अपने सर के लिए छाया और पेट के लिए रोटी की जद्दोजहद करेगा , कि बच्चो की शिक्षा के लिए ??
दलित शोषित शिक्षा से वंचित । लेकिन क्या ब्रम्हानिस्म की वजह से ?
डॉ आंबेडकर ने जिन धर्म ग्रंथों को यूरोपियन संस्कृतज्ञों द्वारा अनुवादित, अनुवादों के अनुवादों को कॉपी एंड पेस्ट ( कॉपी एंड पेस्ट इसलिए कह रहा हूँ क्योकि , उन्होंने अपनी पुस्तक में कई जगहों पर वर्णों को caste के नाम से ही सम्बोधित किया है , और ये कहना कि डॉ आंबेडकर इतने अल्पज्ञ थे कि वर्ण और caste का फर्क नहीं समझते थे उनका अपमान होगा ) किया है /उन ग्रंथो तक तो मेरी पहुँच नहीं है इसलिए उनके कॉपी और पेस्ट किये गए quotations को ,,, उचित या अनुचित करार देना ,,मेरे बस की बात नहीं है / लेकिन जिन संस्कृतज्ञों को उन्होंने अपने लेखन का आधार बनाया है ,उन तक तो हम पहुँच ही सकते हैं / इसलिए ये साबित करना सरल हो जाएगा ,कि ये संस्कृतज्ञ पूर्वाग्रह से से ग्रस्त तो नहीं थे या इनके उद्देश्य अकादमिक न होकर अपने ईसाई धर्म को हिन्दू धर्म की तुलना में ज्यादा महान साबित करना था या ईसाइयत को फैलाना था ? / और फिर ये समझना भी आसान हो जाता है कि इन संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों को तोड़ मरोड़ कर तो नहीं पेश किया , या उनको संस्कृत केर समझ ही नहीं थी /
फिलहाल आपके प्रश्न को संज्ञान में लेने के पूर्व डॉ आंबेडकर के हिन्दू धर्मो के ग्रंथों से निकाले गए दो और निष्कर्षों की चर्चा करता हूँ /
(३) ..शूद्रं को संपत्ति का अधिकार नहीं है --डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर मेरे पहले लिखे गए कमेंट्स में है -
( १) कम से कम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में तो ये वर्णित नहीं है दूसरा आंबेडकर जी की पुस्तक में भी लिखा है कि शूद्र सार्वभौमिक राजाओं के रतनी हुवा करते थे / और उन्होंने ये भी लिखा है कि भीष्म ने युधिस्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ते हुए ये कहा कि मंत्रिमंडल में , कम से कम ३ शूद्र मंत्री होने चाहिए /
(२) डॉ बुचनन ने 1807 में प्रकशित अपनी पुस्तक में लिखा है कि -" यद्यपि तलुवा के ब्राम्हण ये कहते है कि यहाँ कि धरती के सच्चे मालिक वही हैं क्योंकि परशुराम ने ये धरती उनके लिए खोजी थी ,,लेकिन यहाँ पर ज्यादातर जमीनों के मालिक शूद्र है / और ब्राम्हणों का ये क्लेम ,,न तो वर्तमान कि सच्चाई है ,,और न भविष्य में कोई संभावना दिखती है /
(४) शूद्रों को उपनयन यानि जनेऊ संस्कार का अधिकार नहीं है , डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ,,अओको किसी ग्रन्थ या बुचनन जैसे विद्वानों को उद्धृत करने कि जरूरत नहीं है / हालांकि अब तो तथकथित द्विजों ने भी जनेऊ पहनना बंद कर दिया है ,,लेकिन अपने गावं में मैंने खुद ,,तथाकथित menial शूद्र बुजुर्गों को जनेऊ धारण करते हुए देखा है / आप भी देखे होंगे / और नहीं देखे होंगे तो ,,मई जब अपने गावं जाऊँगा अगले सप्ताह तो कइयों के फोटो खींच कर यही पर पोस्ट कर दूंगा / ( काश डॉ आंबेडकर ने गांधी कि तरह ,,२- ३ साल गावों कि ओर रुख किया होता , राजनीति में पैर रखने के पूर्व ,,तो वे इस भ्रमजाल के शिकार न बनते।
सद्‌गुरु से प्रश्न पूछा गया कि क्या नजर लगना एक सच्चाई है? और अगर ऐसा होता है तो इससे कैसे बचाव कर सकते हैं? जानते हैं सद्‌गुरु से
#प्रश्न : सद्‌गुरु, जब कोई व्यक्ति हमें ईर्ष्या की नजर से देखता है तो हम कहते हैं कि ‘बुरी नजर लग जाती है।’ क्या वाकई ‘बुरी नजर’ जैसी कोई चीज होती है? अगर ऐसा सचमुच है तो क्या हमें इसकी चिंता करनी चाहिए और हम इससे अपना बचाव कैसे कर सकते हैं?
#सद्‌गुरु : अगर आप अपने माथे पर लाल रंग से आंख बना लें तो बुरी नजर नहीं लगेगी। यही वजह थी कि भारतीय महिलाएं अपने माथे पर लाल रंग की बड़ी बिंदी लगाती थीं। धीरे-धीरे इसका आकार घटता गया। पिछली पीढ़ी तक यह काफी बड़ी हुआ करती थी। धीरे-धीरे यह नाममात्र के बिंदु तक आ गई। पहले यह बिंदी एक खास तरह के पदार्थ से बनाई जाती थी। इसे बनाने के लिए हल्दी व चूने का इस्तेमाल होता था, जिसको लगाने से त्वचा पर कोई नुकसान न हो। खासकर अगर कोई महिला बहुत सुंदर होती थी तो उसके चेहरे पर बड़ी सी बिंदी लगाते थे। क्योंकि स्वाभाविक तौर पर लोगों की नजर वैसे इंसान पर पड़ती है, जो शारीरिक रूप से सुंदर हो। तो इस तरह बुरी नजर का असर उस महिला के स्वास्थ्य, खुशहाली व दूसरी चीजों पर कम पड़ता था, इसलिए बड़ी बिंदी लगाई जाती थी।
#मन की शक्ति चीज़ों को प्रभावित कर सकती है
आप इन सब चीजों में मत पडि़ए, क्योंकि तब आप यह सोचना शुरु कर देंगे कि ‘ओह! मेरे पेट में दर्द इसलिए हो रहा है, क्योंकि उसने मुझे देखा।’ हां, लोग चीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
अगर मैं एक गिलास पानी लेकर उसे एक मिनट तक देखूं, तो पानी का मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर बदल जाएगा और इस बात को हम साबित कर सकते हैं। यह बदलाव सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। दोनों ही स्थितियां संभव हैं।
किसी बिंदु पर फोकस किया हुआ मन बेहद क्तिशाली होता है। खतरनाक है या नहीं, यह उसकी मंशा पर निर्भर करता है। अगर आपके मन में एक खास तरह की एकाग्रता है और इसे ऊर्जावान कर दिया जाए, अगर आप अपने विचारों को सशक्त करने में सक्षम हों, तो विचार बेहद शक्तिशाली हो उठते हैं। एक क्रोधित मन या, एक कामुक मन या एक बेहद प्रेममय मन – ये सभी बेहद शक्तिशाली मन हैं।
इनके शक्तिशाली होने का कारण प्रेम या गुस्सा नहीं, बल्कि बस इतना है कि वे एक बिंदु पर केंद्रित हो जाते हैं। अगर कोई चीज एक बिंदु पर केंद्रित हो जाती है तो अचानक उसकी ताकत बढ़ जाती है। जागरूकता की वजह से भी मन एक बिंदु पर केंद्रित हो सकता है, या साधना की वजह से, या फिर गुस्से के चलते भी हो सकता है। गौर कीजिए कि जब आप किसी व्यक्ति से नाराज होते हैं तो आपका मन एक बिंदु पर केंद्रित हो जाता है। हो सकता है कि प्रेम में मन भटके, लेकिन गुस्से और नफरत में यह एक बिंदु पर टिक जाता है, जिसकी वजह से यह प्रभावशाली हो सकता है। तो जब व्यक्ति गुस्से, नफरत व लालच की बहुत तीव्र अवस्था में होता है और वह वाकई किसी चीज पर अपना मन केंद्रित करता है, तो दूसरे व्यक्ति के साथ कुछ चीजें हो सकती हैं। मैंने कहा कुछ हो सकता है, ऐसा नहीं कि वो होकर रहेगा।
#नजर से बचने के लिए क्लेश नाशन क्रिया करवा सकते हैं
यह इस पर भी निर्भर करता है कि आप कितने नाजुक हैं। अगर आपने खुद को इस तरीके से बना रखा है कि कोई बाहरी प्रभाव आपके भीतर होने वाली चीजों को तय नहीं करता, तो फिर इससे कोई फर्क नही पड़ता कि कौन आपकी तरफ देखता है। आप खुद को उससे मुक्त रख सकते हैं। अगर आप अपने आसपास की हर चीज से हरदम प्रभावित होकर नाजुक हो गए हैं, तो कुछ खास लोग आप पर असर डाल सकते हैं। वे सिर्फ आपको देखकर ही आपको बीमार बना सकते हैं। ऐसा बिल्कुल संभव है। इससे बचने के लिए हमारे पास आसान सा तरीका है। इसके लिए हम लोग व्यक्ति को अग्नि स्नान कराते हैं, जिसे हम ‘क्लेशनाशन’ कहते हैं। दरअसल, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के प्रभाव में होता है, तो सबसे पहला प्रभाव उसकी सबसे बाहरी परत में होता है। फिर संभव है कि धीरे-धीरे यह उसके भीतर उतरता जाए और फिर उसे परेशान करे। यह एक बीमारी का रूप भी ले सकता है, इससे मृत्यु तक हो सकती है। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनके देखने भर से सामने वाले की मृत्यु हो सकती है।
मन ऐसा ही होता है। यह कई तरह से आश्चर्यजनक काम कर सकता है, इसमें जबरदस्त संभावनाएं छिपी हैं। लेकिन लोग इससे अलग तरीके का काम लेते हैं। ऐसी जो भी चीजें बनाई जाती हैं, जो जीवन के स्तर को आगे बढ़ा सकती हैं, जो जीवन बचा सकती हैं, उसे सुंदर बना सकती हैं, वही चीजें जीवन को बर्बाद भी कर सकती हैं। रोज ऐसा हो रहा है।
#आपकी नजर से दूसरे सुखी हो सकते हैं
तो बेहतर होगा कि आप खुद को ऐसा बनाएं कि कोई भी चीज, या व्यक्ति, आप जैसे भी हैं या जो भी हैं, उसे प्रभावित न कर पाए। यही चेतना का मतलब है। अगर आप चेतनापूर्ण हो गए तो आप स्वाभाविक तौर पर अपने भीतर असुखद चीजों के बदले सुखद चीजों को ही पसंद करेंगे। एक बार अगर आपने सुखद चीजों को चुन लिया तो फिर आपके भीतर से भी सुखद अहसास ही बाहर आएगा। तब जो भी आपके संपर्क में आएगा, वह सुखद अनुभूति से भर उठेगा। अगर आप अचेतन हैं, सिर्फ तभी आप अप्रिय चीजों को चुनेंगे। अगर आप सचमुच चेतनापूर्ण हैं, तो मधुरता आपकी स्वाभाविक पंसद होगी। अगर आप अपने भीतर यह चीज ले आएं और तब आप किसी चीज को देखें तो सुखद चीजें घटित होंगी। लेकिन अगर आप खुद अपने भीतर अप्रियता से भरे हैं, ईर्ष्या से भरे हैं, और तब आप किसी चीज को देखेंगे तो बुरी चीजें ही घटित होंगी। तो क्या ऐसी चीजों का वजूद है? बिल्कुल है। लेकिन क्या आपको खुद को इन चीजों से प्रभावित होने देना चाहिए? बिल्कुल नहीं।
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भारत में पहली बार मतदान जूनागढ़ में हुआ था ...जी हां 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ में मतदान हुआ था कि जूनागढ़ भारत में रहेगा या पाकिस्तान में विलय होगा जूनागढ़ का नवाब महावत खान बॉबी जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने को आतुर था लेकिन सरदार पटेल जूनागढ़ को भारत में मिलाने पर तुले हुए थे .जनमत संग्रह में सिर्फ 78 वोट मिले जो जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने को कह रहे थे लेकिन 110000 लोगों ने जूनागढ़ का भारत में मिलाने के लिए मतदान किया फिर भी महावत खान बॉबी जूनागढ़ स्टेट को भारत में मिलाने पर तैयार नहीं था
अंत में सरदार पटेल ने जूनागढ़ पर हमला कर दिया भीषण लड़ाई हुई कई लोग मारे गए और जूनागढ़ का नवाब महावत खान बाबी पाकिस्तान भाग गया और इस तरह से जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हुआ
मशहूर अभिनेत्री परवीन बॉबी इसी महावत खान बॉबी की पोती थी.....
Jitendra Pratap Singh

mediya

...हे पार्थ! ...हिंदुओं में मैं जनेऊ-धारी हिन्दू हूँ... मुसलमानों में टोपीधारी मुसलमान.. आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में मैं सबसे बड़ा आदिवासी हूँ.. दक्षिण भारत में मैं सबसे पुराना द्रविड़.. विदेशों में मैं जींस, टी-शर्ट में पाया जाता हूँ और चुनाव में फटी जेब वाले कुर्ते में...इस तरह से घट घट में व्याप्त मैं इस भूलोक राहुल गांधी हूं।
Sanjeev Tripathi,
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मिलिए #असम के डिब्रूगढ़ की #हेमप्रभा से
पेशे से ये एक बुनकर है हेमप्रभा (असम के डिब्रूगढ़ की एक बुनकर) कपड़े पर अंग्रेजी और संस्कृत में भगवत् गीता बुन रही हैं। वह पिछले साल के दिसंबर से यह काम कर रही हैं।

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कांग्रेस की पिछले 3साल की उपलब्धियाँ
1.पाकिस्तान के।खिलाफ भारत की सर्जिकल स्ट्राइक पर उंगली उठाना
2. रोहिंग्या मुसलमानों का समर्थन
3. ट्रिपल तलाक का समर्थन
4. नोटबन्दी का विरोध
5. जीएसटी का विरोध
6. आधार लिंकिंग का विरोध
7. एक देश एक चुनाव का विरोध
8. राष्ट्रगान का विरोध
9. वन्दे मातरम का विरोध
10. राम मंदिर का विरोध
11. कश्मीरी आतंकियों का समर्थन
12. डोकलाम में भी भारत के स्टैंड का विरोध
13. सेना को गालियाँ
14. आतंकियों को पिता से भी ज़्यादा सम्मान
15. भारत तेरे टुकड़े होंगे,इंशा अल्ला इंशा अल्ला बोलने वालों का समर्थन...आदि आदि
पवन अवस्थी
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पूरा का पूरा गाँव मिल
कर NIA-ATS की टीम
पर हमला कर दे तो उसे
क्या कहेंगे...!!!!!
क्या ये देश के ख़िलाफ़
जंग छेड़ना नहीं ?
विजय कृष्ण पांडेय
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