Tuesday, 2 January 2018


रोचक जानकारी - पट्रोल किसका ?
अरब तेल पर अरबो का कोई कंट्रोल नहीं है. 99% अरब तेल पर - Exxon-Mobil & Shell-BP नाम की दो कंपनियों का कब्ज़ा है. drilling, oil rigs, exploration, refining, production, storing, transportation, business पर भी इन्ही दो कंपनियों का कब्ज़ा है. हाँ pricing पर OPEC जिसका HQ-वियेना (Austria) में है वो कुछ control करता है , लेकिन सिर्फ शेयर बाजार की तरह.ये ओवर production control भी करता है Price बनाये रखने के लिए. ओवर production अरब देश चाहते है अपना पॉकेट के लिए.  अरब के देशो को USA & UK सिर्फ टैक्स और % मुनाफा देते है, न की control. इसीलिए USA ने करीब 60 जहाज छोड़ रखे है अरब के आस पास सिर्फ इन्ही दो कंपनियों को बचाने के लिए. वैसे भी अरब तेल पी कर नहीं रह सकते है , निकला हुआ तेल बेचना ही है via Exxon-Mobil & Shell-BP . इसलिए निश्चित रहे. अमेरिका की दादागिरी हमारा भला भी कर देता है.
इतने बड़े जाहिल है आज तक अरब वाले अपनी एक रिफाइनरी कम्पनी भी नहीं बना सके है क्यूंकि रिफाइनरी कम्पनी के लिए विज्ञानं और ज्ञान दोनों चाहिए और इनके पास दोनों की भारी कमी है.....72 हूरो से फुर्सत मिले तो विज्ञान और ज्ञान प्राप्त करे।।

Monday, 1 January 2018

कालिदास त्रयी-३ मुख्य कालिदास थे
 तथा अन्य ३ का उपनाम कालिदास था।

तीन कालिदासों का उल्लेख राजशेखर की काव्य मीमांसा में किया है, जल्हण की सूक्ति मुक्तावली तथा हरि कवि की सुभाषितावली मे भी-
एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केनचित्। शृङ्गारे ललितोद्गारे कालिदास त्रयी किमु॥
= एक ही कालिदास की बराबरी का कोई नहीं है, शृङ्गार तथा ललित वाक्यों में ३ कालिदास का क्या कहना?
(१) कालिदास-१ ने ३ नाटक लिखे थे-मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम्। मालविकाग्निमित्रम् के भरतवाक्य के अनुसार वे अग्निमित्र शुङ्ग (११५८-११०८ ई.पू.) के समकालीन थे।
मालविकाग्निमित्रम्-भरतवाक्य-आशास्यमीतिविगमप्रभृति प्रजानां सम्पत्स्यते न खलु गोप्तरि नाग्निमित्रे॥
दो अन्य नाटकों में कुछ लिखा नहीं है। वे अन्य के भी हो सकते हैं।
(२) कालिदास-२-उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य (८२ ई.पू.-१९ ई.) के नवरत्नों मे एक थे। ज्योतिर्विदाभरण के अन्तिम २२वें अध्याय में विक्रमादित्य, उनकी सभा के विद्वानों का परिचय तथा अपनी कृति का समय दिया है।
श्लोकैश्चतुर्दशशतै सजिनैर्मयैव ज्योतिर्विदाभरण काव्य विधानमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥
विक्रमार्कवर्णनम्-वर्षे श्रुति स्मृति विचार विवेक रम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।
मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्क नृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥
= १४२४ श्लोकों का यह ज्योतिर्विदाभरण मालवेन्द्र विक्रमादिय के आश्रय में लिखा गया जो १८० देशों पर श्रुति-स्मृति-विचार द्वारा शासन करते हैं।
नृपसभायां पण्डितवर्गा-शङ्कु सुवाग्वररुचिर्मणिरङ्गुदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरो घटखर्पराख्य।
अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥
सत्यो वराहमिहिर श्रुतसेननामा श्रीबादरायणमणित्थकुमारसिंहा।
श्रीविक्रमार्कंनृपसंसदि सन्ति चैते श्रीकालतन्त्रकवयस्त्वपरे मदाद्या ॥ᅠ२२.९ᅠ॥
नवरत्नानि-धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंहशङ्कुर्वेतालभट्ट घटखर्पर कालिदासा।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥
= मेरे अतिरिक्त कई विद्वान् हैं-शङ्कु, वररुचि, मणि, अङ्गुदत्त, जिष्णुगुप्त (नेपाल राजा अवन्तिवर्म १०३-३३ ई.पू. के पुत्र तथा ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त के पिता), त्रिलोचन, हर, घटखर्पर, अमरसिंह, कालतन्त्र लेखक (कृष्ण मिश्र), सत्याचार्य (ज्योतिषी), वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ, कुमारसिंह। उनकी सभा के ९ रत्न हैं-धन्वन्तरि (तृतीय, वर्तमान् सुश्रुत संहिता के लेखक), क्षपणक (वर्तमान् उपलब्ध जैन शास्त्रों के लेखक), अमरसिंह (अमरकोष), शङ्कु (भूमिति = सर्वेक्षण), वेतालभट्ट (पुराण का नवीन संस्करण), घटखर्पर (तन्त्र), कालिदास, विख्यात वराहमिहिर, वररुचि (पाणिनि व्याकरण पर वार्तिक, वाक्यकरण-ज्योतिष गणना के सूत्र जो स्मरण के लिये वाक्यों द्वारा प्रकट किये जाते हैं)
यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।
आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥
तस्मिन् सदाविक्रममेदिनीशे विराजमाने समवन्तिकायाम्।
सर्व प्रजा मङ्गल सौख्य सम्पद् बभूव सर्वत्र च वेदकर्म ॥ २२.१८ ॥
= विक्रमादित्य जैसा प्रतापी और कौन हो सकता है जिसने महायुद्ध में रुक्मदेश अधिपति (रोम के राजा जुलियस सीजर) को बन्दी बना कर उज्जैन लाये तथा नगर में घुमा कर छोड़ दिया? उनके वेदानुसार शासन के कारण लोगों में सौख्य और सम्पद है।
शङ्क्वादि पण्डितवराः कवयस्त्वनेके ज्योतिर्विदः सभमवंश्च वराहपूर्वाः।
श्रीविक्रमार्कनृपसंसदि मान्यबुद्घिस्तत्राप्यहं नृपसखा किल कालिदासः ॥ २२.१९ ॥
= विक्रमार्क राजाकी संसद में शङ्कु आदि अनेक विद्वान् हैं। उनमें कालिदास तो मन्दबुद्धि है तथा राजा का मित्र है।
काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।
ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
= सुमति होने के बाद (विद्योत्तमा से अपमानित होने के बाद) रघुवंश सहित ३ महाकाव्य लिखा, उसके बाद कर्मवाद (फलित ज्योतिष की पुस्तक कालामृत २ खण्डों में), उसके बाद मुहूर्त ज्ञान (कालविधान) यह ज्योतिर्विदाभरण लिखा)
वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणै (३०६८) र्याते कलौ सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।
नानाकाल विधानशास्त्र गदित ज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थ समाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥
इस ग्रन्थ का आरम्भ कलि वर्ष (३०६८) के माघ मास में हुआ तथा कार्त्तिक मास में पूर्ण हुआ।
यहां कालिदास ने संकेत दिया है कि पहले वे मूर्ख थे। सुमति होने के बाद ३ महाकाव्य लिखे। ये अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः के ३ शब्दों से आरम्भ होते हैं-अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा (कुमारसम्भव), कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा (मेघदूत), वागर्थाविव संपृक्तौ (रघुवंश).
उत्तर कालामृत में भी अपने आश्रयदाता का नाम विक्रमादित्य लिखा है-
श्रीमद्वक्त्र चतुष्टयाच्युत हर स्वर्णायकाद्यैः सुरैः कार्यारम्भ विधौ समर्चित पद द्वन्द्वं द्विपेन्द्राननम्।
पाशाद्यायुश्च लड्डुक प्रविलसद्धस्तैश्चतुर्भिर्युतं श्रीमद्विक्रम सूर्य पालनपरं वन्दे भवानी सुतम्॥१॥
कामेशस्य सुवामभाग निलयां भक्ताखिलेष्टार्थदां शङ्खं चक्रमथाभयं च वरदं हस्तैर्दधानां शिवाम्।
सिंहस्थां शशिखण्ड मौलि लसितां देवीं त्रिनेत्रोज्ज्वलां श्रीमद्विक्रम सूर्य पालनपरां वन्दे महाकालिकाम्॥२॥
अंग्रेजों के नकली विक्रमादित्य चन्द्रगुप्त-२ का आजतक किसी भी पुस्तक या शिलालेख में उल्लेख नहीं मिला है। पर हर साहित्य या खोज उसके नाम पर कर उसे स्वर्ण युग बनाया जाता है। कहीं किसी कुएं में पुरानी ईंट मिल गयी तो उसे गुप्तकाल का मान कर महान् पुरातत्त्व शोध द्वरा नकली स्वर्ण युग का बना देते हैं।
(३) कालिदास-३-यह भी मालवा राजा की सभा में थे। मालवा के सभी राजाओं को भोज कहते थे जैसे रघुवंश के इन्दुमती स्वयम्वर में उसे भोजकन्या, या महाभारत काल में रुक्मी को भोजराज कहा गया है। भोज-कालिदास वार्त्ताओं की आशु कविता इसी कालिदास की हैं। यह राजा भोज के साथ ईरान के बल्ख तक गये थे जहा मुहम्मद ने धर्मयुद्ध में उनसे सहायता मांगी थी।
भूपतिर्दशमो यो वै भोजराज इति स्मृतः॥दृष्ट्वा प्रक्षीण मर्य्यादां बली दिग्विजयं ययौ॥२॥
सेनया दशसाहस्र्या कालिदासेन संयुतः। तथान्यैर्ब्राह्मणैः सार्द्धं सिन्धुपारमुपाययौ॥३॥
जित्वा गान्धारजान् म्लेच्छान् काश्मीरान् आरवान् शठान्। तेषां प्राप्य महाकोषं दण्डयोग्यानकारयत्॥४॥
एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्य्येण समन्वितः। महामद इति ख्यातः शिष्य शाखा समन्वितः॥५॥
नृपश्चैव महादेवं मरुस्थल निवासिनम्। चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम्॥६॥
इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपायतम्॥९॥ महामद इति ख्यातः पैशाच कृति तत्परः॥१२॥
इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान् पुनरागमत्। महामदश्च तैः सार्द्धं सिन्धुतीरमुपाययौ॥१४॥
उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामद विशारदः। तव देवो महाराज मम दासत्वमागतः॥१५॥
तच्छ्रुत्वा कालिदासस्तु रुपा प्राह महामदम्। माया ते निर्मिता धूर्त नृपमोहनहेतवे॥१८॥
= शालिवाहन (७८-१३८ ई.) की १०वीं पीढ़ी के भोजराज १०,००० सेना लेकर कालिदास के साथ बल्ख गये थे। वहां म्लेच्छ गुरु महा-मद (मुहम्मद) ने उनसे युद्ध में सहायता मांगी। वह धोखा देने में कुशल था पर कालिदास ने उसका भेद खोल दिया। मरुभूमि के महादेव (विक्रमादित्य द्वारा पुनरुद्धार किया हुआ मक्केश्वर महादेव-मक्का) का दर्शन कर लौट गये।
यह कालिदास तान्त्रिक तथा आशु कवि थे। जैन मुनि मानतुङ्ग (भक्तामर स्तोत्र के प्रणेता) उनके समकालीन हैं। स्फुट काव्यों के अतिरिक्त उनकी पुस्तक चिद्-गगनचन्द्रिका है जिसमें उन्होंने अपना स्थान महाराष्ट्र के पूर्णा के निकट कहा है-
इह कालिदासचन्द्रप्रसूतिरानन्दिनी स्तुतिर्व्याजात्।
चिद्गगनचन्द्रिकाब्धेः समयतु संसारदावदवथुं वः॥३॥
कालिदास पदवीं तवाश्रितः त्वत्प्रसादकृतवाग्विजृम्भणः॥३०६॥
त्वद्गुणान्यदहमस्तु वै जगत् तेन मोहमतिरद्य मुच्यताम्।
पूर्णपीठमवगम्य मङ्गले त्वत्प्रसादमकृते मया कृतः॥३०७॥
तीन अन्य नाटककार-
(१) मालवा के विद्वान् राजा शूद्रक (मालव गण के अध्यक्ष, ७५६ ई.पू. से शूद्रक शक) ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् तथ ३ अन्य छोटे नाटक लिखे। यह समुद्रगुप्त (गुप्त वंश ३२०-२६९ ई.पू.) रचित कृष्ण चरित में है-
पुरन्दरबलो विप्रः शूद्रकः शास्त्रशस्त्रवित्। धनुर्वेद चौरशास्त्रं रूपके द्वे तथाकरोत्॥६॥
स विपक्षविजेताभूच्छास्त्रैः शस्त्रश्च कीर्तये॥ बुद्धिवीर्येनास्य वरे सौगताश्च प्रसेहिरे॥७॥
स तस्तारारिसैन्यस्य देहखण्डै रणे महीम्। धर्माय राज्यं कृतवान् तपस्विव्रतमाचरन्॥८॥
शस्त्रार्जितमयं राज्यं प्रेम्णाऽकृत निजं गृहम्। एवं ततस्तस्य तदा साम्राज्यं धर्मशासितम्॥९॥
कालिदास-तस्याभवन्नरपतेः कविराप्तवर्णः, श्री कालिदास इति योऽप्रतिमप्रभावः।
दुष्यन्त भूपतिकथां प्रणयप्रतिष्ठां रम्याभिनेय भरितां सरसां चकार॥१५॥
शाकुन्तलेन स कविर्नाटकेनाप्तवान् यशः। वस्तुरम्यं दर्शयन्ति त्रीण्यन्यानि लघूनि च॥१६॥
स्वयं कालिदास ने भी नाटक के आरम्भ में सूत्रधार द्वारा इसका निर्देश किया है-
नान्दीपाठ-सूत्रधार-आर्ये! इयं हि रसभावविशेषदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्य (अन्य पाठ में विशेष-साहसाङ्कस्य) अभिरूप भूयिष्ठेयं परिषत्। अस्याञ्च कालिदास प्रयुक्तेनाभिज्ञानशकुन्तलेन नवेन नाटकेनोपस्थातव्यस्माभिः॥
शूद्रक को साहसाङ्क तथा विक्रमादित्य भी कहते थे। उनके अधीन १०० राजाओं के संघ का उल्लेख है (४ मुख्य अग्निवंशी राजा थे-परमार, प्रतिहार, चालुक्य, चाहमान)-
भरतवाक्य-भवतु तव विडौजाः प्राज्यवृष्टिः प्रजासु त्वमपि विततयज्ञो वज्रिणं भावयेथाः।
गणशत परिवर्तैरेवमन्योन्यकृत्यैर्नियतमुभयलोकानुग्रहश्लाघनीयैः॥
इस नाटक का एक श्लोक कुमारिल भट्ट (जिनविजय महाकाव्य के अनुसार ५५७-४९३ ई.पू.) ने अपने तन्त्र वार्त्तिक में उद्धृत किया है-
सतां हि सन्देहपदेषुवस्तुषु, प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः। (१/२१)
(३) मातृगुप्त कालिदास श्रीहर्ष (उनका शक ४५६ ई.पू. में) के आश्रित है। कृष्ण चरित के अनुसार इनका काव्य शूद्रक-जय है-
मातृगुप्तो जयति यः कविराजो न केवलम्। कश्मीरराजोऽप्यभवत् सरस्वत्याः प्रसादतः॥२१॥
विधाय शूद्रकजयं सर्गान्तानन्दमद्भुतम्। न्यदर्शयद् वीररसं कविरावन्तिकः कृतिः॥२२॥
राजतरङ्गिणी के प्रथम तरङ्ग के अनुसार कश्मीर के राजा प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उनको ५ वर्ष के लिये कश्मीर का राजा बनाया गया था।
(३) हरिषेण कालिदास-इनका रघु चरित रघुवंश का आधार है। यह राज परिवार के थे तथा बाणभट्ट (हर्षवर्धन ६०५-६४७ ई. के आश्रित) की कादम्बरी में इनको भट्टार हरिश्चन्द्र कहा गया है-
हरिषेणः-तुङ्गं ह्यमात्यपदमाप्त यशः प्रसिद्धं भुक्त्वा चिरं पितुरिहास्ति सुहृन्ममायम्।
सन्धौ च विग्रहकृतौ च महाधिकारी, विज्ञः कुमार सचिवो नृपनीति दक्षः॥२३॥
काव्येन सोऽघ रघुकार इति प्रसिद्धो, यः कालिदास इति महार्हनामा।
प्रामाण्यमाप्तवचनस्य च तस्य धर्म्ये, ब्रह्मत्वमध्वरविधौ मम सर्वदैव॥२४॥
Arun Upadhyay जी की पोस्ट से कॉपी-पेस्ट।

vyang



"दुनिया में जो देशों ने अपना प्राचीन धर्म छोड़कर अन्य धर्मो(पुरखो) को गले लगाया है वह सभी अशांति में गिरे नज़र आते है! पितृ दोष !"
घनश्याम साक्षीभावक
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एक नामी गिरामी हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने मरीज को तुरंत बायपास सर्जरी करवाने की सलाह दी।
मरीज नर्वस हो गया किंतु तुरंत तैयारी में लग गया।
*ऐसे वक्त थोडा संयम रखकर सेकंड ओपीनियन लेना ज्यादा ठीक होता।*
ऑपरेशन के पहले वाले सारे टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर की टीम ने बजट बताया, जो की मरीज को बहुत ज्यादा लगा।
लेकिन *जान है तो जहान है* यह सोचकर वह फॉर्म भरने लगा... व्यवसाय के कॉलम के आगे उसने C.B.I. लिख दिया।

अचानक हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल गया। डॉक्टरों की दूसरी टीम चेकअप करने आयी। री-चेकींग हुआ और टीम ने घोषित किया की ऑपरेशन की जरूरत नहीं है। मेडिसिन खाते रहिये ब्लाकेज निकल जायेगा।
.मरीज *Central Bank of India* का एम्प्लॉई था।
Jitendra Pratap Singh

 ब्रह्मर्षि अंगिरा "


वेद और पुराणों में बताया गया है कि महर्षि अंगिरा ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं तथा ये गुणों में ब्रह्मा जी के ही समान हैं। इन्हें प्रजापति भी कहा गया है और सप्तर्षियों में वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा मरीचि आदि के साथ इनका भी परिगणन हुआ है।

इनके दिव्य अध्यात्मज्ञान, योगबल, तप-साधना एवं मन्त्रशक्ति की विशेष प्रतिष्ठा है। इनकी पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति (मतान्तर से श्रद्धा) थीं, जिनसे इनके वंश का विस्तार हुआ।

इनकी तपस्या और उपासना इतनी तीव्र थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गया। उस समय अग्निदेव भी जल में रहकर तपस्या कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि अंगिरा के तपोबल के सामने मेरी तपस्या और प्रतिष्ठा तुच्छ हो रही है तो वे दु:खी हो अंगिरा के पास गये और कहने लगे-

''आप प्रथम अग्नि हैं, मैं आपके तेज़ की तुलना में अपेक्षाकृत न्यून होने से द्वितीय अग्नि हूँ। मेरा तेज़ आपके सामने फीका पड़ गया है, अब मुझे कोई अग्नि नहीं कहेगा।''

तब महर्षि अंगिरा ने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य सौंपा। साथ ही पुत्र रूप में अग्नि का वरण किया। तत्पश्चात् वे अग्नि देव ही बृहस्पति नाम से अंगिरा के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। उतथ्य तथा महर्षि संवर्त भी इन्हीं के पुत्र हैं।

महर्षि अंगिरा की विशेष महिमा है। ये मन्त्रद्रष्टा, योगी, संत तथा महान् भक्त हैं। इनकी 'अंगिरा-स्मृति' में सुन्दर उपदेश तथा धर्माचरण की शिक्षा व्याप्त है।

सम्पूर्ण ऋग्वेद में महर्षि अंगिरा तथा उनके वंशधरों तथा शिष्य-प्रशिष्यों का जितना उल्लेख है, उतना अन्य किसी ऋषि के सम्बन्ध में नहीं हैं।

विद्वानों का यह अभिमत है कि महर्षि अंगिरा से सम्बन्धित वेश और गोत्रकार ऋषि ऋग्वेद के नवम मण्डल के द्रष्टा हैं। नवम मण्डल के साथ ही ये अंगिरस ऋषि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि अनेक मण्डलों के तथा कतिपय सूक्तों के द्रष्टा ऋषि हैं। जिनमें से महर्षि कुत्स, हिरण्यस्तूप, सप्तगु, नृमेध, शंकपूत, प्रियमेध, सिन्धुसित, वीतहव्य, अभीवर्त, अंगिरस, संवर्त तथा हविर्धान आदि मुख्य हैं।

ऋग्वेद का नवम मण्डल जो ११४ सूक्तों में निबद्ध हैं, 'पवमान-मण्डल' के नाम से विख्यात है। इसकी ऋचाएँ पावमानी ऋचाएँ कहलाती हैं। इन ऋचाओं में सोम देवता की महिमापरक स्तुतियाँ हैं, जिनमें यह बताया गया है कि इन पावमानी ऋचाओं के पाठ से सोम देवताओं का आप्यायन होता है।

क्रमश:...


इस लेख को पढ़कर हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने वाली मदर टेरेसा को

कितने लोग संत मानना चाहेंगे?...जब सब जागें ,तभी सबेरा


मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे, मेसेडोनिया[i] में हुआ था और बारह वर्ष की आयु में उन्हें अहसास हुआ कि “उन्हें ईश्वर बुला रहा है”। 24 मई 1931 को वे कलकत्ता आई और यही की होकर रह गई।

कोलकाता आने पर धन की उगाही करने के लिए मदर टेरेसा ने अपनी मार्केटिंग आरम्भ करी। उन्होंने कोलकाता को गरीबों का शहर के रूप में चर्चित कर और खुद को उनकी सेवा करने वाली के रूप में चर्चित कर अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करी। वे कुछ ही वर्षों में "दया की मूर्ति", "मानवता की सेविका", "बेसहारा और गरीबों की मसीहा", “लार्जर दैन लाईफ़” वाली छवि से प्रसिद्द हो गई। हालाँकि उन पर हमेशा वेटिकन की मदद और मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की मदद से “धर्म परिवर्तन” का आरोप तो लगता रहा । गौरतलब तथ्य यह है कि इनमें से अधिकतर आरोप पश्चिम की प्रेस[ii] या ईसाई पत्रकारों आदि ने ही किये थे[iii][iv]। ना कि किसी हिन्दू संगठन ने, जिससे संदेह और भी गहरा हो जाता है[v]। अपने देश के गरीब ईसाईयों की सेवा करने के स्थान पर मदर टेरेसा को भारत के गरीब गैर ईसाईयों के उत्थान में अधिक रूचि होना क्या ईशारा करता है? पाठक स्वयं निर्णय कर सकते है।
मदर टेरेसा को समूचे विश्व से, कई ज्ञात और अज्ञात स्रोतों से बड़ी-बड़ी धनराशियाँ दान के तौर पर मिलती थी। सबसे बड़ी बात यह थी की मदर ने कभी इस विषय में सोचने का कष्ट नहीं किया की उनके धनदाता की आय का स्रोत्र एवं प्रतिष्ठा कैसी थी। उदहारण के लिए अमेरिका के एक बड़े प्रकाशक रॉबर्ट मैक्सवैल, जिन्होंने कर्मचारियों की भविष्यनिधि फ़ण्ड्स में 450 मिलियन पाउंड का घोटाला किया[vi]। उसने मदर टेरेसा को 1.25 मिलियन डालर का चन्दा दिया। मदर टेरेसा मैक्सवैल की पृष्ठभूमि को जानती थी। हैती के तानाशाह जीन क्लाऊड डुवालिये ने मदर टेरेसा को सम्मानित करने बुलाया। मदर टेरेसा कोलकाता से हैती सम्मान लेने गई। जिस व्यक्ति ने हैती का भविष्य बिगाड़ कर रख दिया। गरीबों पर जमकर अत्याचार किये और देश को लूटा। टेरेसा ने उसकी “गरीबों को प्यार करने वाला” कहकर तारीफ़ों के पुल बांधे थे। मदर टेरेसा को चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डालर का चन्दा मिला था। ये कीटिंग महाशय वही हैं जिन्होंने “कीटिंग सेविंग्स एन्ड लोन्स” नामक कम्पनी 1980 में बनाई थी और आम जनता और मध्यमवर्ग को लाखों डालर का चूना लगाने के बाद उसे जेल हुई थी[vii]। अदालत में सुनवाई के दौरान मदर टेरेसा ने जज से कीटिंग को माफ़ करने की अपील की थी। उस वक्त जज ने उनसे कहा कि जो पैसा कीटिंग ने गबन किया है क्या वे उसे जनता को लौटा सकती हैं? ताकि निम्न-मध्यमवर्ग के हजारों लोगों को कुछ राहत मिल सके, लेकिन तब वे चुप्पी साध गई।
यह दान किस स्तर तक था इसे जानने के लिए यह पढ़िए। मदर टेरेसा की मृत्यु के समय सुसान शील्ड्स को न्यूयॉर्क बैंक में पचास मिलियन डालर की रकम जमा मिली। सुसान शील्ड्स वही हैं जिन्होंने मदर टेरेसा के साथ सहायक के रूप में नौ साल तक काम किया। सुसान ही चैरिटी में आये हुए दान और चेकों का हिसाब-किताब रखती थी। जो लाखों रुपया गरीबों और दीन-हीनों की सेवा में लगाया जाना था। वह न्यूयॉर्क के बैंक में यूँ ही फ़ालतू पड़ा था[viii]?
दान से मिलने वाले पैसे का प्रयोग सेवा कार्य में शायद ही होता होगा इसे कोलकाता में रहने वाले अरूप चटर्जी ने अपनी पुस्तक "द फाइनल वर्डिक्ट" पढ़िए[ix]। लेखक लिखते हैं ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका Lancet के सम्पादक डॉ.रॉबिन फ़ॉक्स ने 1991 में एक बार मदर के कलकत्ता स्थित चैरिटी अस्पतालों का दौरा किया था। उन्होंने पाया कि बच्चों के लिये साधारण “अनल्जेसिक दवाईयाँ” तक वहाँ उपलब्ध नहीं थी और न ही “स्टर्लाइज्ड सिरिंज” का उपयोग हो रहा था। जब इस बारे में मदर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “ये बच्चे सिर्फ़ मेरी प्रार्थना से ही ठीक हो जायेंगे"। मिशनरी में भर्ती हुए आश्रितों की हालत भी इतने धन मिलने के उपरांत भी उनकी स्थिति कोई बेहतर नहीं थी। मिशनरी की नन दूसरो के लिए दवा से अधिक प्रार्थना में विश्वास रखती थी। जबकि खुद कोलकाता के महंगे से महंगे अस्पताल में कराती थी। मिशनरी की एम्बुलेंस मरीजों से अधिक नन आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का कार्य करती थी। यही कारण था की मदर टेरेसा की मृत्यु के समय कोलकाता निवासी उनकी शवयात्रा में न के बराबर शामिल हुए थे।
मदर टेरेसा अपने रूढ़िवादी विचारों के लिए सदा चर्चित रही। बांग्लादेश युद्ध के दौरान लगभग साढ़े चार लाख महिलायें बेघर हुई और भागकर कोलकाता आईं। उनमें से अधिकतर के साथ बलात्कार हुआ था जिसके कारण वह गर्भवती थी। मदर टेरेसा ने उन महिलाओं के गर्भपात का विरोध किया और कहा था कि “गर्भपात कैथोलिक परम्पराओं के विरुद्ध है और इन औरतों की प्रेग्नेन्सी एक “पवित्र आशीर्वाद” है। मदर टेरेसा की इस कारण जमकर आलोचना हुई थी[x]।
मदर टेरेसा ने इन्दिरा गाँधी की आपातकाल लगाने के लिये तारीफ़ की थी और कहा कि “आपातकाल लगाने से लोग खुश हो गये हैं और बेरोजगारी की समस्या हल हो गई है”[xi]। गाँधी परिवार ने उन्हें इस बड़ाई के लिए “भारत रत्न” का सम्मान देकर उनका “ऋण” उतारा। भोपाल गैस त्रासदी भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना है, जिसमें सरकारी तौर पर 4000 से अधिक लोग मारे गये और लाखों लोग अन्य बीमारियों से प्रभावित हुए। उस वक्त मदर टेरेसा ताबड़तोड़ कलकत्ता से भोपाल आईं, किसलिये? क्या प्रभावितों की मदद करने? जी नहीं, बल्कि यह अनुरोध करने कि यूनियन कार्बाईड के मैनेजमेंट को माफ़ कर दिया जाना चाहिये[xii]। और अन्ततः वही हुआ भी, वारेन एंडरसन ने अपनी बाकी की जिन्दगी अमेरिका में आराम से बिताई। भारत सरकार हमेशा की तरह किसी को सजा दिलवा पाना तो दूर, ठीक से मुकदमा तक नहीं कायम कर पाई।
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रकार क्रिस्टोफ़र हिचेन्स ने 1994 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें मदर टेरेसा के सभी क्रियाकलापों पर विस्तार से रोशनी डाली गई थी। बाद में यह फ़िल्म ब्रिटेन के चैनल-फ़ोर पर प्रदर्शित हुई और इसने काफ़ी लोकप्रियता अर्जित की। बाद में अपने कोलकाता प्रवास के अनुभव पर उन्होंने एक किताब भी लिखी “हैल्स एन्जेल” (नर्क की परी)। इसमें उन्होंने कहा है कि “कैथोलिक समुदाय विश्व का सबसे ताकतवर समुदाय है। जिन्हें पोप नियंत्रित करते हैं, चैरिटी चलाना, मिशनरियाँ चलाना, धर्म परिवर्तन आदि इनके मुख्य काम है। जाहिर है कि मदर टेरेसा को टेम्पलटन सम्मान, नोबल सम्मान, मानद अमेरिकी नागरिकता जैसे कई सम्मान इसी कारण से मिले[xiii]।
ईसाईयों के लिए यही मदर टेरेसा दिल्ली में 1994 में दलित ईसाईयों के आरक्षण की हिमायत करने के लिए धरने पर बैठी थी। तब तत्कालीन मंत्री सुषमा स्वराज ने उनसें पूछा था की क्या मदर दलित ईसाई जैसे उद्बोधनों के रूप में चर्च में जातिवाद का प्रवेश करवाना चाहती है[xiv]। महाराष्ट्र में 1947 में देश आज़ाद होते समय अनेक मिशन के चर्चों को आर्यसमाज ने खरीद लिया क्यूंकि उनका सञ्चालन करने वाले ईसाई इंग्लैंड लौट गए थे। कुछ दशकों के पश्चात ईसाईयों ने उस संपत्ति को दोबारा से आर्यसमाज से ख़रीदने का दबाव बनाया। आर्यसमाज के अधिकारीयों द्वारा मना करने पर मदर टेरेसा द्वारा आर्यसमाज के पदाधिकारियों को देख लेने की धमकी दी गई थी। कमाल की संत? थी[xv]।
मदर टेरेसा जब कभी बीमार हुईं तो उन्हें बेहतरीन से बेहतरीन कार्पोरेट अस्पताल में भर्ती किया गया। उन्हें हमेशा महंगा से महंगा इलाज उपलब्ध करवाया गया। यही उपचार यदि वे अनाथ और गरीब बच्चों (जिनके नाम पर उन्हें लाखों डालर का चन्दा मिलता रहा) को भी दिलवाती तो कोई बात होती, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। एक बार कैंसर से कराहते एक मरीज से उन्होंने कहा कि “तुम्हारा दर्द ठीक वैसा ही है जैसा ईसा मसीह को सूली पर हुआ था, शायद महान मसीह तुम्हें चूम रहे हैं। तब मरीज ने कहा कि “प्रार्थना कीजिये कि जल्दी से ईसा मुझे चूमना बन्द करे”।
मदर टेरेसा की मृत्यु के पश्चात भी चंदा उगाही का कार्य चलता रहे और धर्मान्तरण करने में सहायता मिले इसके लिए एक नया ड्रामा रचा गया। पोप जॉन पॉल को मदर को “सन्त” घोषित करने में जल्दबाजी की गई। सामान्य रूप से संत घोषित करने के लिये जो पाँच वर्ष का समय (चमत्कार और पवित्र असर के लिये) दरकार होता है, पोप ने उसमें भी ढील दे दी। पश्चिम बंगाल की एक क्रिश्चियन आदिवासी महिला जिसका नाम मोनिका बेसरा था।उसे टीबी और पेट में ट्यूमर हो गया था। बेलूरघाट के सरकारी अस्पताल के डॉ. रंजन मुस्ताफ़ उसका इलाज कर रहे थे। उनके इलाज से मोनिका को काफ़ी फ़ायदा हो रहा था और एक बीमारी लगभग ठीक हो गई थी। अचानक एक दिन मोनिका बेसरा ने अपने लॉकेट में मदर टेरेसा की तस्वीर देखी और उसका ट्यूमर पूरी तरह से ठीक हो गया। मिशनरी द्वारा मोनिका बेसरा के ठीक होने को चमत्कार एवं मदर टेरेसा को संत के रूप में प्रचारित करने का बहाना मिल गया। यह चमत्कार का दावा हमारी समझ से परे है। जिन मदर टेरेसा को जीवन में अनेक बार चिकित्सकों की आवश्यकता पड़ी थी। उन्हीं मदर टेरेसा की कृपा से ईसाई समाज उनके नाम से प्रार्थना करने वालो को बिना दवा केवल दुआ से, चमत्कार से ठीक होने का दावा करता होना मानता है। अगर कोई हिन्दू बाबा चमत्कार द्वारा किसी रोगी के ठीक होने का दावा करता है तो सेक्युलर लेखक उस पर खूब चुस्कियां लेते है। मगर जब पढ़ा लिखा ईसाई समाज ईसा मसीह से लेकर अन्य ईसाई मिशनरियों द्वारा चमत्कार होने एवं उससे सम्बंधित मिशनरी को संत घोषित करने का महिमा मंडन करता है तो उसे कोई भी सेक्युलर लेखक दबी जुबान में भी इस तमाशे को अन्धविश्वास नहीं कहता[xvi]।
जब मोरारजी देसाई की सरकार में सांसद ओमप्रकाश त्यागी द्वारा धर्म स्वातंत्रय विधेयक के रूप में धर्मान्तरण के विरुद्ध बिल पेश हुआ[xvii]। तो इन्ही मदर टेरेसा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इस विधेयक का विरोध किया और कहाँ था की ईसाई समाज सभी समाज सेवा की गतिविधिया जैसे की शिक्षा, रोजगार, अनाथालय आदि को बंद कर देगा। अगर उन्हें अपने ईसाई मत का प्रचार करने से रोका जायेगा। तब प्रधान मंत्री देसाई ने कहाँ था इसका अर्थ क्या यह समझा जाये की ईसाईयों द्वारा की जा रही समाज सेवा एक दिखावा मात्र है। उनका असली प्रयोजन तो धर्मान्तरण हैं। देश के तत्कालीन प्रधान मंत्री का उत्तर ईसाई समाज की सेवा के आड़ में किये जा रहे धर्मान्तरण को उजागर करता है[xviii]।
इस लेख को पढ़कर हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने वाली मदर टेरेसा को कितने लोग संत मानना चाहेंगे?
मुहम्मद साहब पर अल्लाह का कहर...
किसी भी बाप के ऊपर सबसे बड़ा कहर तब टूटता है जब उसके कंधे पर उसके अपने बच्चों का जनाज़े का बोझ आता है|
मुहम्मद साहब की पहली बीवी से कुल 2 पुत्र पैदा हुए | मुहम्मद साहब का बड़ा पुत्र कासिम अपना दूसरा बसंत भी न देख पाया था | लेकिन अल्लाह से मुहम्मद साहब की ख़ुशी देखी नहीं गई और उनसे उनका कुल का दीपक छीन लिया |
इसके बाद मुहम्मद साहब ने खुद को कहरकारी अल्लाह का पैगम्बर घोषित कर दिया | लेकिन पैगम्बर बनने के बाद भी मुहम्मद साहब पर जुल्मो-सितम कम न हुआ | और अल्लाह ने मुहम्मद साहब का छोटा बेटा अब्दल्लाह भी बचपन में छीन लिया |
इसके बाद मुहम्मद साहब ने धड़ाधड़ शादियाँ की | कुल बची 12 बीवियों के साथ सालों साल खेती करने के बावजूद अल्लाह ने एक अदद बच्चा मुहम्मद साहब के खेतों में पैदा होने न दिया |
इसके बाद मुहम्मद साहब ने अल्लाह को चकमा देने के लिए दूसरा तरीका निकाला ....मुहम्मद साहब ने बिना निकाह के एक पराई महिला मारिया के साथ खेती कर ली और एक पुत्र इब्राहीम पैदा किया | लेकिन अल्लाह ने जैसे मुहम्मद साहब का वंश न चलने देने की कसम खाई थी | उस बेचारे को भी अल्लाह ने मुहम्मद साहब से छीन लिया |
पैगम्बर पर अल्लाह ने इतने भारी जुल्मो-सितम और कहर क्यों किये ? इसका कोई कारण अल्लाह ने कभी नहीं बताया |
महान सम्राट विक्रमादित्य के विषय में अत्यंत प्रामाणिक सामग्री सुलभ होने पर भी उनके ऐतिहासिक अस्तित्व को क्यों छिपाया गया ? क्योंकि उन्होंने १०८ देशों पर शासन किया था ,यह तथ्य ९० वर्षों तक छल बल से भारतीयों से अधिकाधिक सहयोग प्राप्त कर लगभग आधे भारत में संधि पूर्वक शासन करने वाले अंग्रेज राजपुरुष छिपाना चाहते थे .यह तो स्वाभाविक था .
परन्तु १९४७ के बाद इसे सरकारों ने क्यों छिपाया ?क्योंकि वे विद्या की दृष्टि से नितांत अभारतीय लोग थे और हैं
भारत के आधुनिक तथाकथित इतिहासकार नामधारी विद्वानों का या तो अज्ञान या दुष्टता या मूढ़ता इस से भी प्रमाणित है कि यूरोप आदि के इतिहास के लिए वे यूरोप के तनिक से साहित्य ,जो कुछ पन्ने मात्र होते हैं ,प्रायः फटे पन्ने या उनका कोई शताब्दियों बाद किया गया उल्लेख . को ही प्रमाण मान लेते हैं पर महाभारत सहित अत्यंत विशालकाय भारतीय इतिहास ग्रंथों को काल्पनिक कहकर उड़ाते हैं . वस्तुतः तो वे दंडनीय हैं पर अभी उपहास योग्य मान लें और संतोष करें किन्तु विद्वान तो ये किसी भी कसौटी पर नहीं है ,इनकी तुलना में यूरोपीय विद्वान हाल में ही विकसित इतिहास विधा के लिए अत्यंत परिश्रम कर रहे है अतः प्रशंसा के पात्र हैं 
यूरोप में इतिहास विधा का विकास २० वीं शताब्दी ईस्वी में ही हुआ है .
अज्ञानी मूर्ख कृपा कर इस विषय में ,जो स्वयं यूरोप में निर्विवाद मान्य है , इस पन्ने पर प्रलाप ना करें . जो बक बक करनी है ,अपने पन्ने पर करें
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महान सम्राट विक्रमादित्य ने रोम के शक नरेश को जीता था और उन्हें बांधकर उज्जयिनी लाये थे .. फिर उन्हें नगर में घुमाकर उन शरणागत नरेश को छोड़ दिया था .महाकवि कालिदास रचित ज्योतिर्विदाभरण में इसका स्पष्ट उल्लेख है :
यो रूम देशाधिपतिम शकेश्वरम , जित्वा तु तं उज्जयिनीम आहवे. 
आनीय सम्भ्राम्य मुमोचयत्यहो , स विक्रमार्कः खलु सत्य विक्रमः .
rameshwar mishr pankaj