Friday, 21 February 2014

भारत को प्रकृति ने स्पष्ट तौर से भूगौलिक सीमाओं से बाँधा है

आधुनिक भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश और म्यनमार को संयुक्त कर के देखें तो विश्व में केवल प्राचीन भारत ही ऐक मात्र क्षेत्र है जिस के ऐक तरफ दुर्गम पर्वत श्रंखला और तीन तरफ महासागर उसे ऐक विशाल दुर्ग की तरह सुरक्षा प्रदान कर रहै हैँ। भारत को प्रकृति ने स्पष्ट तौर से भूगौलिक सीमाओं से बाँधा है तथा इस तथ्य का कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। विष्णु पुराण में भारत की सीमाओं के साथ साथ वहाँ के निवासियों की पहचान के बारे में इस प्रकार उल्लेख किया गया हैः-

उतरं यत् समुद्रस्य हिमेद्रश्चैव दक्षिण्म , वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति

(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में समुद्र से घिरा हुआ जो देश है वहाँ के निवासी भारतीय हैं।)

‘बृहस्पति आगम’ के अनुसार भारत की पहचान इस प्रकार हैः-

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
अर्थात – हिमालय से ले कर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक का देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
मुस्लमानों ने ‘हिन्दुस्थान’ शब्द का अपभ्रंश ‘हिन्दुस्तान’ कर दिया था।

रामायण का कथानक समस्त पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत, दक्षिणी पठार से होता हुआ रामेश्वरम और लंका तक फैला हुआ है। महाभारत का कथानक भी उसी प्रकार भारत के चारों कोनो तक फैला हुआ है। इस भू खण्ड में रहने वाले सभी हिन्दू थे यहाँ तक कि लंकाधिपति रावण भी ब्राह्मण था और त्रिमूर्ति शक्ति शिव का पुजारी था। वह वेदों का ज्ञाता था और यज्ञ भी करता था।

दिूतीय आधार – भाषा और साहित्य में समानता

भारत की सभी भाषायों की जननी संस्कृत हैं जो आदि काल से ग्यारहवीं शताब्दी तक लगातार भारत की साहित्यिक तथा सभी प्रान्तों को ऐक सूत्र में बाँधे रखने के माध्यम से भारत की राष्ट्रभाषा भी रही है। आज भी संस्कृत भाषा ऐक सजीव भाषा है। कई दर्जन पत्र पत्रिकायें आज भी संस्कृत में प्रकाशित होती हैं। अखिल भारतीय रेडियो माध्यम से समाचारों का प्रसारण भी संस्कृत में होता है। चलचित्रों तथा दूरदर्शन पर संस्कृत में फिल्में भी दिखायी जाती हैं। तीन हजार से अधिक जन संख्या वाला ऐक भारतीय गाँव आज भी केवल संस्कृत भाषा में ही दैनिक आदान प्रदान करता है। भारत के कई बुद्धिजीवी परिवारों की भाषा आज भी संस्कृत है। केवल उदाहरण स्वरूप संस्कृत भाषा का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र आज भी प्रत्येक हिन्दू से सुना जाता है जोकि संस्कृत की चिरंजीवता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वेदों, उपनिष्दों, पुराणों, धर्म शास्त्रों, रामायण तथा महाभारत का प्रभाव भारत के कोने कोने में है।

तृतीय आधार – समान रीति रिवाज

निम्नलिखित तथ्य भारत की राष्ट्रीय ऐकता को दर्शाने के लिये प्रत्यक्ष प्रमाण हैं -

समस्त भारत के हिन्दू परिवारों में जब भी कोई रीति रिवाज किये जाते हैं तो उन में पढे जाने वाले संस्कृत के मन्त्रों में गंगा यमुना, सरस्वती, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, तथा सिन्धु नदियों का नाम लिया जाता है जो भारत की विशालता और ऐकता का प्रमाण हैं।
यातायात के सीमित साधनों के बावजूद भी हिन्दू भारत के चारों कोनों में स्थित तीर्थ-स्थलों की यात्रा करते रहै हैं जिन में मथुरा, अयोध्या, पुरी, सोमनाथ, कामाक्षी, इन्दौर, उज्जैन, मीनाक्षीपुरम, और रामेश्वरम के मन्दिर मुख्य हैं।
विपरीत परिस्थितियों और मौसम के बावजूद भी हिन्दू अमरनाथ, बद्रीनाथ, सोमनाथ, जगन्नाथ, कैलास-मानसरोवर, वैश्णो देवी तथा राम सेतु जैसे दुर्गम तीर्थ स्थलों की यात्रा निष्ठा पूर्वक स्वेच्छा से कर के निजि जीवन की अभिलाषा की पूर्ति करते हैं।
यातायात की असुविधाओं के बावजूद, स्वेच्छा से निश्चित समय पर भारत के चारों कोनों से हिन्दूओं का यात्रा कर के प्रयाग, हरिदूार, नाशिक तथा काशी में कुम्भ स्नान के लिये ऐकत्रित हो जाना कोई जनसंख्या का त्रास्ती पलायन नहीं होता अपितु आस्था और हिन्दूओं के समान वैचारिक, सामाजिक और रीतिरीवाजों का प्रदर्शन है।
देश भर में 12 ज्योतिर्लिंग हिन्दू ऐकता का अनूठा प्रमाण हैं। यह भी भारत की ऐकता का प्रतीक है जब प्रत्येक वर्ष पैदल चल कर लाखों की संख्या में आज भी काँवडिये हरिदूार से गंगा जल ला कर काशी स्थित ज्योतिर्लिंग का शिवरात्री के पर्व पर अभिषेक कराते हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति के अतिरिक्त राम, कृष्ण, गणेश, हनुमान, दुर्गा तथा लक्ष्मी समस्त भारत के सर्वमान्य देवी-देवता हैं।

विश्व के किसी भी अन्य देश में भारत के जैसी समान रीति रिवाजों की परम्परा नहीं है। मकर संक्रान्ति, शिवरात्रि, रामनवमी, बुद्ध जयन्ती, वैशाखी, महीवीर जयन्ती जन्माष्टमी तथा दीपावली के अतिरिक्त कई पर्व हैं जो भारत के पर्यावरण, इतिहास, तथा जन नायकों के जीवन की घटनाओं से जुडे हैं और विचारधारा की ऐकता के सूचक हैं। इन पर्वों की तुलना में ईद, मुहर्रम, क्रिसमिस, ईस्टर आदि पर्वों से भारत के जन साधारण का कोई सम्बन्ध नहीं।

चतुर्थ आधार – समान नैतिकता

नैतिकता की समानतायें हिन्दूओं के सभी साम्प्रदाओं में ऐक जैसी ही हैं। पाप और पुण्य की धारणायें भी समान हैं। समस्त हिन्दू राम की रावण पर विजय को धर्म की अधर्म पर विजय के अनुरूप देखते हैं। विदेशी लोग इस घटना को आर्यों की अनार्यों (द्राविडों) पर विजय का दुष्प्रचार तो करते हैं परन्तु वह यह तथ्य नहीं जानते कि दक्षिण भारत में भी कोई रावण, कुम्भकरण, या मेधनाद की मूर्ति घर में स्थापित नहीं करता।

विविधता में ऐकता स्वरूप हिन्दुत्व

व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं के बावजूद भी भारत में पनपे सभी धार्मिक साम्प्रदायों में समानतायें पाई जाती हैं -

सभी हिन्दू ऐकमत हैं कि ईश्वर ऐक है, निराकार है किन्तु ईश्वर को साकारत्मक चिन्हों से दर्शाया भी जा सकता है, ईश्वर कई रूपों में प्रगट होता है तथा हर कृति में ईश्वर की ही छवि है।
सभी हिन्दू शिव, राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरू नानक, साईं बाबा, स्वामीमारायण तथा अन्य किसी महापुरुष में से किसी को अपना जीवन नायक मानते हैं।
भारत में भगवा रंग पवित्रता, वैराग्य, अध्यात्मिकता तथा ज्ञान का प्रतीक है।
हिन्दू पुर्नजीवन में विशवास रखते हैं।
सभी वर्गों के तीर्थस्थल अखणडित भारत, नेपाल और तिब्बत में ही स्थित हैं क्यों कि धर्म और सभ्यता का जन्म सर्व प्रथम यहीं हुआ था।

सामाजिक विचारधारा के आधार पर हिन्दूओं ने कभी किसी अहिन्दू के धर्म स्थल को ध्वस्त नहीं किया है। हिन्दू कभी किसी अहिन्दू के धर्म के विरुध धर्म-युद्ध या हिंसा नहीं करते। हिन्दू समस्त विश्व को ही एक विशाल परिवार मानते हैं। हिन्दूओं में विदूानो तथा सज्जन प्राणियों को ऋषि, संत या महात्मा कहा जाता है तथा वह सर्वत्र आदरनीय माने जाते हैं। हिन्दू गौ मांस खाने को वर्जित मानते है। हिन्दूओं का विवाहित जीवन एक पति-पत्नी प्रथा पर आधारित है तथा इस सम्बन्ध को जीवन पर्यन्त निभाया जाता है। हिन्दूओं के सभी वर्गों पर एक ही सामाजिक आचार संहिता लागू है। हिन्दूओं के सभी समुदाय एक दूसरे के प्रति सौहार्द भाव रखते हैं और एक दूसरे की रसमों का आदर करते हैं। धार्मिक समुदायों में स्वेच्छा से आवाजावी पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। कोई किसी को समुदाय परिवर्तन करने के लिये नहीं उकसाता। संस्कृत सभी भारतीय मूल की भाषाओं की जनक भाषा है।

पर्यावर्ण के प्रति भी वैचारिक समानतायें हैं। समस्त नदीयाँ और उन में से विशेष कर गंगा नदी अति पवित्र मानी जाती है। तुलसी के पौधे का उस की पवित्रता के कारण विशेष रुप से आदर किया जाता है। सभी वर्गों में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता है और अस्थियों का बहते हुये जल में विसर्जन किया जाता है। सभी वर्गों के पर्व और त्यौहार मौसमी बदलाव, भारतीय महापुरुषों के जीवन की या जन-जीवन सम्बन्धी घटनाओं से जुड़े हुये हैं तथा किसी भी पर्व-त्यौहार के अवसर पर सार्वजनिक या सामूहिक ढंग से रोने धोने और छाती पीटने की कोई प्रथा नहीं है। मुख्य तथ्य यह है कि सभी हिन्दूओं पर ऐक ही आचार विचार तथा संस्कार संहिता लागू है।

हिन्दू संस्कृति ही भारत वासियों की राष्ट्रीय पहचान है। मुसलिम और ईसाई धर्मों के तीर्थ स्थल, धर्म ग्रँथ, नैतिकता के नियम अकसर हिन्दूओं के विरोध में आते है क्यों कि इन धर्मों का जन्म भारत के वातावरण में ना हो कर अन्य देशों में हुआ था। इस के फलस्वरूप उन के प्रेरणा स्त्रोत्र भी भारत से बाहर ही हैं। उन के जीवन नायक भी विदेशी है तथा वह भारत के मौलिक आधार से स्दैव संघर्ष करते रहै हैं। यदि वह स्थानीय विचारधारा को ना अपनायें तो निराधार धर्म निर्पेक्षी बनावटी राष्ट्रीयता उन्हें ऐक राष्ट्र में नहीं बाँध सकती।

चाँद शर्मा
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नेताजी सुभाषच न्द्र बोस

नेताजी सुभाषच न्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वे सरकारी वकील थे, मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाषचंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थें। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थें। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।

स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश और कार्य

कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी, देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखकर, उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार, भारत वापस आने पर वे सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गाँधी से मिले। मुम्बई में गाँधीजी मणिभवन में निवास करते थे। वहाँ, 20 जुलाई, 1921 को महात्मा गाँधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच पहली बार मुलाकात हुई। गाँधीजी ने भी उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। इसके बाद सुभाषबाबू कोलकाता आ गए और दासबाबू से मिले। दासबाबू उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। उन दिनों गाँधीजी अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया था। दासबाबू इस आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाषबाबू इस आंदोलन में सहभागी हो गए 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, कोलकाता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्टी ने लड़कर जीता। स्वयं दासबाबू कोलकाता के महापौर बन गए। उन्होंने सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।

बहुत जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग शुरू की। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह मॉंग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया। जब सुभाषबाबू जेल में थे, तब गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझोता किया और सब कैदीयों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारकों को रिहा करने से इन्कार कर दिया। भगत सिंह की फॉंसी माफ कराने के लिए, गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझोता तोड दे। लेकिन गाँधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोडने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अडी रही और भगत सिंह और उनके साथियों को फॉंसी दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर, सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तरिकों से बहुत नाराज हो गए।

अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 में छह महीने का कारावास हुआ।

1925 में गोपिनाथ साहा नामक एक क्रांतिकारी कोलकाता के पुलिस अधिक्षक चार्लस टेगार्ट को मारना चाहता था। उसने गलती से अर्नेस्ट डे नामक एक व्यापारी को मार डाला। इसके लिए उसे फॉंसी की सजा दी गयी। गोपिनाथ को फॉंसी होने के बाद सुभाषबाबू जोर से रोये। उन्होने गोपिनाथ का शव मॉंगकर उसका अंत्यसंस्कार किया। इससे अंग्रेज़ सरकार ने यह निष्कर्ष किया कि सुभाषबाबू ज्वलंत क्रांतिकारकों से न ही संबंध रखते हैं, बल्कि वे ही उन क्रांतिकारकों का स्फूर्तीस्थान हैं। इसी बहाने अंग्रेज़ सरकार ने सुभाषबाबू को गिरफतार किया और बिना कोई मुकदमा चलाए, उन्हें अनिश्चित कालखंड के लिए म्यानमार के मंडाले कारागृह में बंदी बनाया।

5 नवंबर, 1925 के दिन, देशबंधू चित्तरंजन दास कोलकाता में चल बसें। सुभाषबाबू ने उनकी मृत्यू की खबर मंडाले कारागृह में रेडियो पर सुनी।

मंडाले कारागृह में रहते समय सुभाषबाबू की तबियत बहुत खराब हो गयी। उन्हें तपेदिक हो गया। परंतू अंग्रेज़ सरकार ने फिर भी उन्हें रिहा करने से इन्कार कर दिया। सरकार ने उन्हें रिहा करने के लिए यह शर्त रखी की वे इलाज के लिए यूरोप चले जाए। लेकिन सरकार ने यह तो स्पष्ट नहीं किया था कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाषबाबू ने यह शर्त स्वीकार नहीं की। आखिर में परिस्थिती इतनी कठिन हो गयी की शायद वे कारावास में ही मर जायेंगे। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी, कि सुभाषबाबू की कारागृह में मृत्यू हो जाए। इसलिए सरकार ने उन्हे रिहा कर दिया। फिर सुभाषबाबू इलाज के लिए डलहौजी चले गए।

1930 में सुभाषबाबू कारावास में थे। तब उन्हे कोलकाता के महापौर चुना गया। इसलिए सरकार उन्हे रिहा करने पर मजबूर हो गयी।

1932 में सुभाषबाबू को फिर से कारावास हुआ। इस बार उन्हे अलमोडा जेल में रखा गया। अलमोडा जेल में उनकी तबियत फिर से नादुरूस्त हो गयी। वैद्यकीय सलाह पर सुभाषबाबू इस बार इलाज के लिए यूरोप जाने को राजी हो गए।

यूरोप प्रवास

1933 से 1936 तक सुभाषबाबू यूरोप में रहे।

यूरोप में सुभाषबाबू ने अपनी सेहत का ख्याल रखते समय, अपना कार्य जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वॅलेरा सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।

जब सुभाषबाबू यूरोप में थे, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाषबाबू ने वहाँ जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को सांत्वना दिया।

बाद में सुभाषबाबू यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाषबाबू ने पटेल-बोस विश्लेषण प्रसिद्ध किया, जिस में उन दोनों ने गाँधीजी के नेतृत्व की बहुत गहरी निंदा की। बाद में विठ्ठल भाई पटेल बीमार पड गए, तब सुभाषबाबू ने उनकी बहुत सेवा की। मगर विठ्ठल भाई पटेल का निधन हो गया।

विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी करोडों की संपत्ती सुभाषबाबू के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात, उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत को स्वीकार नहीं किया और उसपर अदालत में मुकदमा चलाया। यह मुकदमा जितकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने वह संपत्ती, गाँधीजी के हरिजन सेवा कार्य को भेट दे दी।

1934 में सुभाषबाबू को उनके पिता मृत्त्यूशय्या पर होने की खबर मिली। इसलिए वे हवाई जहाज से कराची होकर कोलकाता लौटे। कराची में उन्हे पता चला की उनके पिता की मृत्त्यू हो चुकी थी। कोलकाता पहुँचतेही, अंग्रेज सरकार ने उन्हे गिरफ्तार कर दिया और कई दिन जेल में रखकर, वापस यूरोप भेज दिया।

नजरकैद से पलायन

नजरकैद से निकलने के लिए सुभाषबाबू ने एक योजना बनायी। 16 जनवरी, 1941 को वे पुलिस को चकमा देने के लिये एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन का भेष धरकर, अपने घर से भाग निकले। शरदबाबू के बडे बेटे शिशिर ने उन्हे अपनी गाडी से कोलकाता से दूर, गोमोह तक पहुँचाया। गोमोह रेल्वे स्टेशन से फ्रंटियर मेल पकडकर वे पेशावर पहुँचे। पेशावर में उन्हे फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी, मियां अकबर शाह मिले। मियां अकबर शाह ने उनकी मुलाकात, कीर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार से कर दी। भगतराम तलवार के साथ में, सुभाषबाबू पेशावर से अफ़्ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर निकल पडे। इस सफर में भगतराम तलवार, रहमतखान नाम के पठान बने थे और सुभाषबाबू उनके गूंगे-बहरे चाचा बने थे। पहाडियों में पैदल चलते हुए उन्होने यह सफर पूरा किया।

काबुल में सुभाषबाबू दो महिनों तक उत्तमचंद मल्होत्रा नामक एक भारतीय व्यापारी के घर में रहे। वहाँ उन्होने पहले रूसी दूतावास में प्रवेश पाना चाहा। इस में नाकामयाब रहने पर, उन्होने जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में ओर्लांदो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर, सुभाषबाबू काबुल से रेल्वे से निकलकर रूस की राजधानी मॉस्को होकर जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे।
नाजी जर्मनी में प्रवास एवं हिटलर से मुलाकात

बर्लिन में सुभाषबाबू सर्वप्रथम रिबेनट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओ से मिले। उन्होने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडिओ की स्थापना की। इसी दौरान सुभाषबाबू, नेताजी नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।

आखिर 29 मई, 1942 के दिन, सुभाषबाबू जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूची नहीं थी। उन्होने सुभाषबाबू को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया।

कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक अपना आत्मचरित्र लिखा था। इस किताब में उन्होने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाषबाबू ने हिटलर से अपनी नाराजी व्यक्त की। हिटलर ने अपने किये पर माँफी माँगी और माईन काम्फ की अगली आवृत्ती से वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।

अंत में, सुभाषबाबू को पता चला कि हिटलर और जर्मनी से उन्हे कुछ और नहीं मिलनेवाला हैं। इसलिए 8 मार्च, 1943 के दिन, जर्मनी के कील बंदर में, वे अपने साथी अबिद हसन सफरानी के साथ, एक जर्मन पनदुब्बी में बैठकर, पूर्व आशिया की तरफ निकल गए। यह जर्मन पनदुब्बी उन्हे हिंदी महासागर में मादागास्कर के किनारे तक लेकर आई। वहाँ वे दोनो खूँखार समुद्र में से तैरकर जापानी पनदुब्बी तक पहुँच गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में, किसी भी दो देशों की नौसेनाओ की पनदुब्बीयों के दौरान, नागरिको की यह एकमात्र बदली हुई थी। यह जापानी पनदुब्बी उन्हे इंडोनेशिया के पादांग बंदर तक लेकर आई।
पूर्व एशिया में अभियान

पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम, वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंप दिया।

जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने, नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, उन्हे सहकार्य करने का आश्वासन दिया। कई दिन पश्चात, नेताजी ने जापान की संसद डायट के सामने भाषण किया।

21 अक्तूबर, 1943 के दिन, नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए।

आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकडे हुए भारतीय युद्धबंदियोंको भर्ती किया गया। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतो के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।

पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थायिक भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और उसे आर्थिक मदद करने का आवाहन किया। उन्होने अपने आवाहन में संदेश दिया तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने चलो दिल्ली का नारा दिया। दोनो फौजो ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। यह द्वीप अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का शहीद और स्वराज द्वीप ऐसा नामकरण किया। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पगडा भारी पडा और दोनो फौजो को पिछे हटना पडा।

जब आज़ाद हिन्द फौज पिछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परंतु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लडकियों के साथ सैकडो मिल चलते जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श ही बनाकर रखा।

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडिओ पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्येश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा । इस प्रकार, नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया।
लापता होना और मृत्यु की खबर

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था।

18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गए। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये।

23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी, कि 18 अगस्त के दिन, नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी।

दुर्घटनाग्रस्त हवाई जहाज में नेताजी के साथ उनके सहकारी कर्नल हबिबूर रहमान थे। उन्होने नेताजी को बचाने का निश्च्हय किया, लेकिन वे कामयाब नहीं रहे। फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।

स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार एक आयोग को नियुक्त किया। दोनो बार यह नतिजा निकला की नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से तो, इन दोनो आयोगो ने बात ही नहीं की।

1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होने कहा, कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।

18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे हुये हैं लेकिन इनमें से सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। छत्तीसगढ़ में तो सुभाष चंद्र बोस के होने को लेकर मामला राज्य सरकार तक गया। हालांकि राज्य सरकार ने इसे हस्तक्षेप योग्य नहीं मानते हुये मामले की फाइल बंद कर दी।
 Rajeev Yadav

५००० साल पुराना असली विमान मिला अफगानिस्तान में



५००० साल पुराना असली विमान मिला अफगानिस्तान में

Russian Foreign Intelligence Service (SVR) report

5000 year old Viamana craft was found in Afghanistan :

अफगानिस्तान में बड़ा क्षेत्र है जहाँ US Military का केम्प है। इस क्षेत्र में कभी कभी electromagnetic shockwave यानि खतरनाक किरणें उत्पन्न होती थी जिससे मिलिट्री के कई जवान मारे गए या गायब हो गए।

इसकी तह तक पहुँचने के लिए अमेरिका 8 सील कमांडो अफगानिस्तान के उसी स्थान पार एक गुफा में गये तथा वहां उन्हें एक फंसा हुआ विमान दिखा जब वो उसेको निकालने प्रयास कर रहे थे। तभी वो अचानक गायब हो गए।

इस बारे में Russian Foreign Intelligence Service (SVR) report द्वारा 21 December 2010 को एक रिपोर्ट पेश की गयी की जिसमे बताया ये विमान द्वारा उत्पन्न एक रहस्यमयी Time Well क्षेत्र है जिसकी खतरनाक electromagnetic shockwave से ये जवान मारे गये या गायब हो गये।
इसी की वजह से कोई गुफा में नहीं जा पा रहा।

US Military scientists ने इसकी ने बताया की ये विमान ५००० हज़ार पुराना है और जब कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तो ये सक्रिय हो गया जिससे इसके चारों और Time Well क्षेत्र उत्पन्न हो गया यही क्षेत्र विमान को पकडे हुए थे। इसी क्षेत्र के सक्रिय होने के बाद 8 सील कमांडो गायब हो गए।

Time Well क्षेत्र विद्युत चुम्बकीये क्षेत्र होता है जो सर्पिलाकार होता है हमारी आकाशगंगा की तरह।

Russian Foreign Intelligence ने साफ़ साफ़ बताया की ये वही विमान है जो संस्कृत रचित महाभारत में वर्णित है। और जब इसका इंजन शुरू होता है तो बड़ी मात्र में प्रकाश का उत्सर्जन होता है।

SVR report का कहना है यह क्षेत्र 5 August को फिर सक्रिय हुआ था electromagnetic shockwave यानि खतरनाक किरणें उत्पन्न हुई ये इतनी खतरनाक थी की इससे 40 सिपाही तथा trained German Shepherd dogs इसकी चपेट में आ गए।

US Army CH-47F Chinook हेलीकाप्टर जो ओसामा बिन लादेन को मरने के बाद बापस लौट रहा था ये हेलीकाप्टर इसी विमान की shockwaves चपेट में आ गया था।

http://www.wired.com/dangerroom/2011/05/aviation-geeks-scramble-to-i-d-osama-raids-mystery-copter/

http://www.whatdoesitmean.com/index1510.htm

http://www.youtube.com/watch?v=qBlwhVyZxmQ

http://webcache.googleusercontent.com/search?q=cache%3Ahttp%3A%2F%2Freinep.wordpress.com%2F2011%2F10%2F09%2F5000-year-old-viamana-craft-was-found-in-afghanistan%2F

अफगानिस्तान के हिन्दू इतिहास

अफगानिस्तान के हिन्दू इतिहास


अफगानिस्तान राजा जया पाल शाही ने पंजाब के शासक इस्लामी हमले का खामियाजा बोर संप्रग गण-स्टेन "" से आता है. "

वर्ष 980C.E. Sabuktagin अफगानिस्तान में राजा जया पाल पर हमला किया जब उचित भारत में मुस्लिम आक्रमण की शुरुआत के निशान. अफगानिस्तान अन्य मुस्लिम देश पाकिस्तान द्वारा भारत से अलग एक मुस्लिम देश है आज. लेकिन 980 में CE अफगानिस्तान भी लोगों को हिंदुओं और बौद्धों थे जहां एक जगह थी.

नाम "अफगानिस्तान" संस्कृत में है जिसका अर्थ है "संप्रग गण-स्टेन" "संबद्ध जनजाति का निवास स्थान" से आता है.

यह महाभारत की गांधारी जिसका राजा शकुनी था गंधार से आया है जहां से जगह थी. Pakthoons वैदिक साहित्य में वर्णित Paktha जनजाति के वंशज हैं. जया पाल शाही - गजनी से Sabuktagin यह हमला किया और सत्तारूढ़ हिंदू राजा विस्थापित तक वर्ष 980 सीई तक, इस क्षेत्र, एक हिंदू बहुमत क्षेत्र था.

काबुल के मुख्य मस्जिद में आज एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल और उसके कब्जा की कहानी थी खड़ा है जहां जगह हिंदुओं को हराने और नष्ट करने के लिए हर हाथ में एक तलवार के साथ लड़ाई लड़ी है जो इस्लामी नायक Sabuktagin का वर्णन करता है जो इस्लामी अफगान कथा में जिंदा रखा है उनके उसके स्थान पर एक मस्जिद प्रस्तुत करने के लिए मंदिर.

में अपनी राह पर मृत्यु हो गई, जो हिंदुओं की संख्या का वर्णन करने के महमूद गजनी द्वारा दिए गए नाम - Sabuktagin की जीत हिंदू कुश सचमुच "हिंदुओं का हत्यारा 'है हिंदू कुश पहाड़ों के पीछे करने के लिए काबुल से Shahis के हिंदू राज्य की सीमाओं को धक्का दिया अफगानिस्तान कैद की एक जीवन के लिए. इस झटके के बाद, Shahis Udbhandapura (एनडब्ल्यूएफपी में आधुनिक und) को कुभा (काबुल) से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर दिया. Sabuktagin के पुत्र महमूद गजनी, Shahis पर हमले के लिए रखा और Und पर कब्जा कर लिया. बाद में, Shahis हिमाचल में कांगड़ा को बाद में लाहौर के लिए अपनी राजधानी ले जाया गया और.

***

हिन्दू शासक VEKA और भगवान के प्रति समर्पण `शिव 'की एक कहानी कह शिलालेख, की वसूली और महत्व, अग्रणी पुरालेखवेत्ता और पुरातत्वविद् चल रहे भारतीय पर इस्लामाबाद की कायदे आजम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अहमद हसन दानी ने कहा था यहां इतिहास कांग्रेस

इतिहासकारों, 821-828 ई. के लिए 843-850 ई. से पहले हिंदू शाही शासक Kallar की तारीख को संशोधित करने के लिए पसंद करते हैं, तो मौजूद शिलालेख से 138 की तिथि, यह उसी युग को संदर्भित करता है, गिरता है, जो 959 ई. के बराबर होना चाहिए Bhimapala'' के शासनकाल के दौरान, दानी कांग्रेस को सौंपी गई एक कागज साल 138 दिनांक शाही शासक VEKA के समय की `मजार-I शरीफ शिलालेख,'', में कहा.

शिलालेख, 10 वीं शताब्दी के संस्कृत के `पश्चिमी सरदा 'शैली में लिखा ग्यारह लाइनों के साथ, कई वर्तनी की गलतियों था. `` पत्थर से थोड़ा ऊपर छोड़ दिया कोने में टूट जाता है, पहले पत्र `ओम ''' याद आ रही है, उन्होंने कहा.

शिलालेख के अनुसार, "शासक VEKA आठ गुना बलों, पृथ्वी, बाजारों और किलों से कब्जा कर लिया. यह उमा के साथ गले में शिव का एक मंदिर Parimaha (महान) Maitya द्वारा Maityasya में बनाया गया था कि उनके शासनकाल के दौरान होता है अपने और अपने बेटे'' के लाभ के लिए.

दानी शिलालेख शाही VEKA राजा के रूप में राजा का नाम देता है और उस पर `Iryatumatu Ksanginanka 'की योग्यता bestows .... और (वह) Khingila या Khinkhila के नाम भालू जो एक ही राजा प्रतीत होता `` जो कहा एक शाही शासक'' के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.

दानी आगे वह VEKA देवा के एक पूर्वज हो सकता है `` कहा . उसकी सिक्के अफगानिस्तान में पाए जाते हैं और वह अरब शासक Yaqubi ने उल्लेख किया है, वह VEKA देवा का एक तत्काल पूर्ववर्ती हो सकता है ...... शिलालेख और सिक्कों के दोनों सबूतों VEKA या Vaka एक स्वतंत्र रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए सुझाव उत्तरी अफगानिस्तान के शासक .

"इस प्रकार हम Hindukush परे अफगानिस्तान के उत्तरी भाग में शाही शासक की एक और शाखा हैं. VEKA वह खुद के खिलाफ सफलता प्राप्त होना आवश्यक है , सुझाव है कि , उसके आठ गुना बलों द्वारा बाजार और किलों पृथ्वी पर विजय प्राप्त की है कहा जाता है दक्षिणी अफगानिस्तान के अरब शासकों '' .

एक शाखा , Jayapala के नेतृत्व में , Lamaghan और पंजाब में शासन किया , और VEKA की अध्यक्षता में एक और शाखा , , शासन - दानी यह हिन्दू शाही शासक Bhimapala के शासन के दौरान वंश में एक टूट गया था लग रहा था कि निष्कर्षों से जा रहा है कि मनाया अफगानिस्तान के उत्तरी भाग में .

" उत्तरी शाखा दसवीं शताब्दी ई. की दूसरी छमाही में Alptigin की विजय से एक को समाप्त करने के लिए आ गया होगा '' , उन्होंने कहा.

( स्रोत : शिलालेख अफगानिस्तान में हिंदू शासन को नई रोशनी फेंकता - indianexpress.com )

भारत, अफगान समाज के हर क्षेत्र को खुश अफगान लोगों के साथ भारत एक उच्च प्रोफ़ाइल देना, अफगान सरकार के साथ अधिकतम राजनीतिक लाभ हासिल, इसके उत्तरी गठबंधन के साथ अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि अफगानिस्तान के लिए एक बेहद रचनात्मक, कल्पनाशील पुनर्निर्माण रणनीति विकसित की है मित्रों और नई सदी में अफ़ग़ान लोगों का एक अनिवार्य सहयोगी और मित्र के लिए 1980 के दशक में सोवियत आक्रमण और साम्यवादी शासन समर्थित है कि एक देश के उस से अपनी छवि बदल जाते हैं.
(स्रोत: हिंदू धर्म forgotten facts)
copied from - dr subramaniyam swami waal 

Thursday, 20 February 2014

सौगंध मुझे इस मिट्टी की

सौगंध मुझे इस मिट्टी की
मैं यह देश नहीं झुकने दुंगा 


वह लुट रहे है सपनो को मैं चैन से कैसे सो जाउ ।
वह देश को बेच रहे है मैं चुप कैसे बैठ जाउ ।
वह जितने अंधेरे लायेंगे । मैं उतने सुरज लाऊंगा ।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की

 मैं इस देश को नहीं मिटने दुंगा ।

वह नशा बांटते जाए और यह देश बीमार हो जाए
पर हर भारतवासी अब जाग रहा ।
माँ और बहनो की असमत पर गिद्ध नजर गराए बैठे है ।
मैं अपने देश की धरती पर अब दर्द नहीं उगने दुंगा ।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की

 मैं देश नहीं झुकने दुंगा ।

अब घडी परीक्षा की है आई
हम खुद को नहीं भटकने दुंगा
सौगंध मुझे इस मिट्टी की
मैं देश नहीं झुकने दुंगा 

:- Narendra Modi

क्या आप फ़्रिज का इतिहास जानते है? ?

 क्या आप फ़्रिज का इतिहास जानते है? ?
कि कैसे ये युरोप के देशो से भारत में आया और क्यों आया ? ? ? ?

कुछ वर्ष पहले KELVINATOR नाम की फ़्रिज बनाने वाली कंपनी भारत में आई ।

क्यों आई ? ?

क्या उसके मन में दया आ गई कि भारत के लोगो को ठंडा पानी पिलाना है ।

नहीं कारण कुछ और था । वो कारण ये था कि KELVINATOR की marketing खत्म हो गयी पुरे युरोप और अमेरिका में |

क्यों खत्म हो गई ? ? ?

क्यों कि अमेरिका और युरोप के देशो में एक समस्या शुरु हो गई (कलोरो फ़लोरो कार्बन के एमिशन की ) (C.F.C) |

ये समस्या रेफ़ारिजरेटर के कारण हुई । क्योंके कि इससे C.F.C बहुत निकलता है ।
C.F.C से होता क्या है कि हमारे वातावरण एक़ अजोन परत होती है जो हमको सूर्य से निकलने वाली अॅल्ट्रा वालेट रेन से बचाती है ।ये अगर आपकी चमड़ी पर सीधी पर जाये तो आपकी चमड़ी जल जायेगी ।

तो हुआ ये कि कि रेफ़्रिजरेटर की जितनी तकनीकी दुनिया में विकसित हुई । उस से c.f.c की समस्या बढ़ गई और इतनी बढ़ गई कि युरोप के कुछ देश के आसमान में अजोन खत्म होने से एक बहुत भारी होल हो गया । जिससे वहां गर्मी बढ़ने लगी और गलेशियर पिघलने लगे । नदियओ में पानी ज्यादा होने लगा और वहां बाढ़ आ गई ।

1996 में अमेरिका के लासएंजलेस में बाढ़ आई । इतना बढ़ा अमेरिका का मैनेमेंट सिस्टम था लेकिन कुछ नहीं कर पाया । बाद पता लगा कि बाढ़ क्यों आई कि अमेरिका में गर्मी बढ़ गई और गलेशियर पिघले और नदियों पानी ज्यादा हुआ और बाढ़ आई ।

कारण पाता कि C.F.C एमिइशन बढ़ने से वातावरण में गर्मी बढ़ी ।
तो इन सारे देशो में एक भयंकर किस्म की घबराह्ट होने लगी ।
तो इन 12 ,13 देशो में नय एक समझोता किया कि धीरे धीरे इस c.f.c एमिइशन को technology ख्त्म कर देगें 2000 तक आते आते पुरा खत्म कर देगें ।

तो किसी ने सवाल किया कि c.f.c बनाने वाली टैकनोलोजी का क्या होगा । तो किसी ने कहा कि भारत में लाकर डंप कर देगें ।

फ़िर इसको लेकर वो भारत में घुस आये ।
अब डंप करने वाली वस्तु बिकेगी कैसे ? ? ?

तो इसके लिये उनहोने हैवी विज्ञापन किये कि आपका घर कुछ भी नहीं है अगर आपके घर में फ़्रिज नहीं है । आपका घर रद्दी है अगर आपके घर मे फ़्रिज नहीं है ।

अब रोज रोज टी वी आप यही बात सुनेगे तो एक दिन उठा कर घर ले ही आयेगें ।

हिंदुस्तान के मूर्ख लोगो ने एक मिनट नहीं सोचा कि इस फ़्रिज की हमको क्या जरुर है । अब ले आये है तो किया किया पहले रोज अच्छी भली ताजी सब्ज़ी खाते थे । अब सब्ज़िया ला ला कर उसको फ़्रिज में भर देते है ।

युरोप के देश सुखे है और वहां कुछ परंपरा भी ऐसी है कि रोज खाना नहीं बनाते । और सब्ज़िया भी रोज वहां मिलती नहीं है जो जाती है वो भारत से जाती है तो हफ़ते में एक दिन सब्ज़िया ख़रीद लाते उनको फ़्रिज में भर देते है वो पुरा हफ़ता खाते है ।

लेकिन हमारे भारत में तो हर दिन ताजी सब्ज़ी मिलती हैं और सुबह को अलग मिलती है दोपहर, शाम को अलग मिलती है । और भारत में हमारी मां हमे रोज गर्म गर्म रोटी बना कर देती है युरोप में किसी की मां नहीं देती ।

तो उनको जरुरत थी तो उनहोने अपने लिये फ़्रिज बनाया और और हम बिना वजह उठा इसे घर ले आये ।

अब एक और मूर्खता करते है पलास्टिक की बोतल मे फ़्रिज में ठंडा पानी रख देगें ।

आप जानते है पुरी दुनिया में पलास्टिक सबसे घटिया वस्तु है कुछ खाने और पीने के लिये!
जपान और कई अन्य देशो खाने पीने की चीज़े पलस्टिक पैकिंग़ मे बेचने पर बैन लगा दिया है । ।

युरोप के देशो के लोगो को एक आदत है कोई भी चीज़ पीयें तो आधे से ज्यादा उनमे बर्फ़ डालेगें और एक दम ठंडी करके पीयेंगे ।

नतीजा ये है अमेरिका मे हर दुसरा आदमी कबजियत का शिकर हैं । पिछले एक सर्वे के अनुसार 90% अमेरिका के लोगो को कबजियत की परेशानी है घंटो घंटो टायलेट मे बैठे रहते हैं लेकिन टायलेट नहीं आती । वहां डाकटरो का कहना है कि उनके देश में कबजियत का सबसे बढ़ा कारण लोगो का ठंडा पानी पीना हैं अगर इससे बचन है तो ताजा पानी पियो ।

हमारे भारत में हजारो साल से शास्त्र यही सिखाते है कि ताजा पानी पियो ।

तो होता ये है टैकनोलोजी आपकी जरुरत की नहीं होती उसे जानबुझ कर आपकी जरुरत बनाया जाता है और आपके देश में डंप कर दिया जाता है ।

golbalization और liberlization के नाम पर (मनमोहन सिंह )ने और क्या क्या आपके देश में डंप करवाया !!जानने के लिये यहाँ click करें |
must must click here !!

http://www.youtube.com/watch?v=jCICrnmI6Hs
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 गाय मे भी  .. स्वदेशी -विदेशी होता  है !

अरे तुमने गाय मे भी स्वदेशी -विदेशी कर दिया ! अरे गाय तो माँ होती है तुमने माँ को भी अच्छी बुरी कर दिया !! लेकिन मित्रो सच यही है की ये जर्सी गाय नहीं ये पूतना है ! पूतना की कहानी तो आपने सुनी होगी भगवान कृष्ण को दूध पिलाकर मारने आई थी वही है ये जर्सी गाय !!

सबसे पहले आप ये जान लीजिये की स्वदेशी गाय और विदेशी जर्सी गाय (सूअर ) की पहचान क्या है ? देशी और विदेशी गाय को पहचाने की जो बड़ी निशानी है वो ये की देशी गाय की पीठ पर मोटा सा हम्प होता है जबकि जर्सी गाय की पीठ समतल होती है ! आपको जानकर हैरानी होगी दुनिया मे भारत को छोड़ जर्सी गाय का दूध को नहीं पीता ! जर्सी गाय सबसे ज्यादा डैनमार्क ,न्यूजीलैंड , आदि देशो मे पायी जाती है ! डैनमार्क मे तो कुल लोगो की आबादी से ज्यादा गाय है ! और आपको ये जानकार हैरानी होगी की डैनमार्क वाले दूध ही नहीं पीते ! क्यों नहीं पीते ? क्योंकि कैंसर होने की संभवना है ,घुटनो कर दर्द होना तो आम बात है ! मधुमेह (शुगर होने का बहुत बड़ा कारण है ये जर्सी गाय का दूध ! डैनमार्क वाले चाय भी बिना दूध की पीते है ! डैनमार्क की सरकार तो दूध ज्यादा होने पर समुद्र मे फेंकवा देती है वहाँ एक line बहुत प्रचलित है 
! milk is a white poison !

और जैसा की आप जानते है भारत मे 36000 कत्लखानों मे हर साल 2 करोड़ 50 गाय काटी जाती है और जो 72 लाख मीट्रिक टन मांस का उत्पन होता है वो सबसे ज्यादा अमेरिका और उसके बाद यूरोप और फिर अरब देशों मे भेजा जाता है ! आपके मन मे स्वाल आएगा की ये अमेरिका वाले अपने देश की गाय का मांस क्यो नहीं खाते ?

दरअसल बात ये है की यूरोप और अमेरिका की जो गाय है उसको बहुत गंभीर बीमारियाँ है और उनमे एक बीमारी का नाम है Mad cow disease ! इस बीमारी से गाय के सींघ और पैरों मे पस पर जाती और घाव हो जाते हैं सामान्य रूप से जर्सी गायों को ये गंभीर बीमारी रहती है अब इस बीमारी वाली गाय का कोई मांस अगर खाये तो उसको इससे भी ज्यादा गंभीर बीमारियाँ हो सकती है ! इस लिए यूरोप और अमेरिका के लोग आजकल अपने देश की गाय मांस कम खाते हैं भारत की गाय के मांस की उन्होने ज्यादा डिमांड है ! क्योंकि भारत की गायों को ये बीमारी नहीं होती है ! आपको जानकार हैरानी होगी जर्सी गायों को ये बीमारी इस लिए होती है क्योंकि उसको भी मांसाहारी भोजन करवाया जाता है ताकि उनके शरीर मे मांस और ज्यादा बढ़े ! यूरोप और अमेरिका के लोग गाय को मांस के लिए पालते है मांस उनके लिए प्राथमिक है दूध पीने की वहाँ कोई परंपरा नहीं है वो दूध पीना अधिक पसंद भी नहीं करते !!

तो जर्सी गाय को उन्होने पिछले 50 साल मे इतना मोटा बना दिया है की वे भैंस से भी ज्यादा बत्तर हो गई है ! यूरोप की गाय की जो मूल प्रजातियाँ है holstein friesian ,jarsi ये बिलकुल विचित्र किसम की है उनमे गाय का कोई भी गुण नहीं बचा है ! जितने दुर्गुण भैंस मे होते हैं वे सब जर्सी गाय मे दिखाई देते हैं !
उदाहरण के लिए जर्सी गाय को अपने बचे से कोई लगाव नहीं होता और जर्सी गाय अपने बच्चे को कभी पहचानती भी नहीं ! कई बार ऐसा होता है की जर्सी गाय का बच्चा किसी दूसरी जर्सी गाय के साथ चला जाए उसको कोई तकलीफ नहीं ! 

लेकिन जो भारत की देशी गाय है वो अपने बच्चे से इतना प्रेम करती है इतना लगाव रखती है की अगर उसके बच्चे को किसी ने बुरी नजर से भी देखा तो वो मर डालने के लिए तैयार हो जाती है ! देशी गाय की जो सबसे बड़ी विशेषता है वो ये की वह लाखो की भीड़ मे अपने बच्चे को पहचान लेती है और लाखो की भीड़ मे वो बच्चा अपनी माँ को पहचान लेता हैं ! जर्सी गाय कभी भी पैदल नहीं चल पाती ! चलाने की कोशिश करो तो बैठ जाती है ! जबकि भारतीय गाय की ये विशेषता है 
उसे कितने भी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ा दो चढ़ती चली जाएगी ! 

कभी आप हिमालय पर्वत की परिक्रमा करे जितनी ऊंचाई तक मनुष्य जा सकता है उतनी ऊंचाई तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! आप ऋषिकेश ,बद्रीनाथ ,आदि जाए जितनी ऊंचाई पर जाए 8000 -9000 फिट तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! जर्सी गाय को 10 फिट ऊपर चढ़ाना पड़े तकलीफ आ जाती है 
जर्सी गाय का पूरा का पूरा स्वभाव भैंस जैसा है बहुत बार ऐसा होता है जर्सी गाय सड़क पर बैठ जाये और पीछे से लोग होरन बजा बजा कर पागल हो जाते है लेकिन वो नहीं हटती ! क्योंकि हटने के लिए जो i q चाहिए वो उसमे नहीं है !

सामान्य रूप से ये जो जर्सी गाय उसके बारे मे यूरोप के लोग ऐसा मानते है की इसको विकसित किया गया है डुकर (सूअर )के जीन से ! भगवान ने गाय सिर्फ भारत को दी है और आपको सुन कर हैरानी होगी ये जितनी भी जर्सी गाय है यूरोप और अमेरिका मे इनका जो वंश बढ़ाया गया है वो सब artificial insemination से बढ़ाया गया और आप सब जानते है artificial insemination मे ये गुंजाइश है की किसी भी जानवर का जीन चाहे घोड़े ,का चाहें सूअर का उसमे डाल सकते है ! तो इसे सूअर से विकसित किया गया है ! और artificial insemination से भी उसको गर्भवती बनाया जाता है ये उनके वहाँ पिछले 50 साल से चल रहा है !!

यूरोप और अमेरिका के भोजन विशेषज्ञ (nutrition expert ) हैं ! उनका कहना है की अगर जर्सी गाय का भोजन करे तो 15 से 20 साल मे कैंसर होने की संभवना ,घुटनो का दर्द तो तुरंत होता है ,sugar,arthritis,ashtma और ऐसे 48 रोग होते है इसलिए उनके देश मे आजकल एक अभियान चल रहा है की अपनी गाय का मांस कम खाओ और भारत की सुरक्षित गाय मांस अधिक खाओ ! इसी लिए यूरोपियन कमीशन ने भारत सरकार के साथ समझोता कर रखा है और हर साल भारत से 72 लाख मीट्रिक टन मांस का निर्यात होता है जिसके लिए 36000 कत्लखाने इस देश मे चल रहें हैं !! 

तो मित्रो उनके देश के लोग ना तो आजकल अपनी गाय का मांस खा रहे हैं और ना ही दूध पी रहें हैं ! और हमारे देश के नेता इतने हरामखोर है की एक तरह तो अपनी गाय का कत्ल करवा रहें हैं और दूसरी तरफ उनकी सूअर जर्सी गाय को भारत मे लाकर हमे बर्बाद करने मे लगे है ! पंजाब और गुजरात से सबसे ज्यादा जर्सी गाय है ! और एक गंभीर बात आपको सुन कर हैरानी होगी भारत की बहुत सी घी बेचने वाली कंपनियाँ बाहर से जर्सी गाय का दूध import करती है !

दूध को दो श्रेणियों मे बांटा गया है A1 और A2 !
A1 जर्सी का A2 भारतीय देशी गाय का !

तो होता ये है की इन कंपनियो को अधिक से अधिक रोज घी बनाना है अब इतनी गाय को संभलना उनका पालण पोषण करना वो सब तो इनसे होता नहीं ! और ना ही इतनी गाय ये फैक्ट्री मे रख सकते है तो ये लोग क्या करते है डैनमार्क आदि देशो से A1 दूध (जर्सी गाय ) का मँगवाते है powder (सूखा दूध )के रूप मे ! उनसे घी बनाकर हम सबको बेच रहें है ! और हम सबकी मजबूरी ये है की आप इनके खिलाफ कुछ कर नहीं सकते क्योंकि भारत मे कोई ऐसा कानून नहीं बना जो ये कहता है की जर्सी गाय का दूध A1 नहीं पीना चाहिए ! अगर कानून होगा तो ही आप कुछ करोगे ना ? यहाँ A1 - को जाँचने की लैब तक नहीं ! नेता देश बेचने मे मस्त हैं 
तो आप सबसे निवेदन है की आप देसी गाय का ही दूध पिये उसी के गोबर से राजीव भाई द्वारा बताए फार्मूले से खाद बनाए और खेती करे ! देशी गाय की पहचान हमने ऊपर बताई थी की उसकी पीठ पर मोटा सा हम्प होता है ! दरअसल ये हम्प ही सूर्य से कुछ अलग प्रकार की तिरंगे लेता है वही उसके दूध ,मूत्र और गोबर को पवित्र बनाती है जिससे उसमे इतने गुण है ! गौ माता सबसे पहले समुन्द्र मंथन से निकली थी जिसे कामधेनु कहते है गौ माता को वरदान है की इसके शरीर से निकली को भी वस्तु बेकार नहीं जाएगी ! दूध ,हम पी लेते है ,मूत्र से ओषधि बनती है ,गोबर से खेती होती है ! और गोबर गैस गाड़ी चलती है , बिजली बनती है ! सूर्य से जो किरणे इसके शरीर मे आती है उसी कारण इसे दूध मे स्वर्ण गुण आता है और इसके दूध का रंग स्वर्ण (सोने जैसा होता है ) ! और गाय के दूध से 1 ग्राम भी कोलोस्ट्रोल नहीं बढ़ता !

कल से ही देशी गाय का दूध पिये अपने दूध वाले भाई से पूछे वो किस गाय का दूध लाकर आपको दे रहा है (वैसे बहुत से दूध वालों को देशी -जर्सी गाय का अंतर नहीं पता होगा ) आप बता दीजिये दूध देशी गाय का ही पिये ! और घी भी देशी गाय का ही खाएं !! गाय के घी के बारे मे अधिक जानकारी के लिए ये जान लीजिये !

गाय का घी मुख्य रूप से 2 तरह का है एक खाने वाला घी है और दूसरा पंचग्व्या नाक मे डालकर इलाज करने वाला ! ( पंचग्व्या घी की लागत कम होती है क्योंकि 2 -2 बूंद नाक मे या नाभि मे पड़ता है 48 रोग ठीक करता है ( 8 से 10 हजार रूपये लीटर बिकता है ) लेकिन 10 ML ही महीना चल जाता है ! इसको असली विधि जो आयुर्वेद मे लिखी उसी ढंग से बनाने वाले भारत मे ना मात्र लोग है !
एक गुजरात मे भाई है dhruv dave जी वैसे वो सबको नहीं बेचते केवल रोगी को ही देते हैं लेकिन फिर भी कभी एक बार इस्तेमाल करने की इच्छा हो तो आप email से संपर्क कर सकते हैं davedhruvever@gmail.com अगर उत्पादन मे हुआ तो शायद आपको मिल जाएँ !

आयुर्वेद मे खाने वाला गाय के दूध का घी निकालने की जो विधि लिखी है उस विधि से आप घी निकले तो आपको 1200 से 2000 रुपए किलो पड़ेगा ! क्योकि 1 किलो घी के लिए 25 से 30 लीटर दूध लग जाता है ! महंगा होने का कारण ये भी है की देशी गाय की संख्या काम होती जा रही है कत्ल बहुत हो रहा है वैसे तो यही घी सबसे बढ़िया है ! लेकिन एक दूसरे ढंग से भी आजकल निकालने लग गए हैं ! जिससे दूध से सीधा क्रीम निकालकर घी बनाया जाता है ! अब समस्या ये है की लगभग सभी कंपनियाँ या तो भैंस का घी बेचती है या गाय का घी बोलकर जर्सी का बेच रही है ! 

आपको अगर घी खाना ही है तो भारत की सबसे बड़ी गौशाला - विश्व की भी सबसे बढ़ी गौशाला वो है राजस्थान मे उसका नाम है पथमेढ़ा गौ शाला ! उनका घी खा सकते हैं पथमेढ़ा गौशाला मे 3 लाख देशी गाय है ! इनके घी की सबसे बड़ी विशेषता है ये है की ये देशी गाय का घी ही बेचते हैं ! बस अंतर ये है की यह क्रीम वाले ढंग से निकाला बनाया जाता है लेकिन फिर भी भैंस और जर्सी सूअर के घी की तुलना मे बहुत बहुत बढ़िया है ! लेकिन इसका मूल्य साधारण घी से थोड़ा ज्यादा है ये 1 लीटर 600 रूपये मे उपलब्ध है ! भगवान की अगर आप पर आर्थिक रूप से ज्यादा कृपा तो आप देशी गाय ही घी खाएं !! कम खा लीजिये लेकिन जर्सी का कभी मत खाएं !! और दूध भी हमेशा देशी गाय का ही पिये !

और अंत मे एक और बात जान लीजिये अब इन विदेशी लोगो को भारत की गाय की महत्ता का अहसास होने लगा है आपको जानकर हैरानी होगी भारतीय नस्ल की सबसे बढ़िया गाय( गीर गाय ) को जर्मनी वाले अपने देश मे ले जाकर इनका वंश आगे बढ़ाकर 2 लाख डालर (लगभग 1 करोड़ की एक गाय बेच रहें है !
जबकि भारत मे ये गीर गाय सिर्फ 5000 ही रह गई है !! तो मित्रो सबसे पहला कार्य अगर आप देश के लिए करना चाहते हैं तो गौ रक्षा करें गौ रक्षा ही भारत रक्षा है !!
एक बार यहाँ जरूर click करें 

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ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है l
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भाग :2
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श्री पी.एन. ओक का दावा है कि ताजमहल शिव मंदिर है
जिसका असली नाम तेजो महालय है। इस सम्बंध में उनके द्वारा दिये
गये तर्कों का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार हैं -
सर्व प्रथम ताजमहन के नाम के सम्बन्ध में ओक साहब ने कहा कि नाम -
(क्रम संख्या 1 से 8 तक)
1. शाहज़हां और यहां तक कि औरंगज़ेब के शासनकाल तक में
भी कभी भी किसी शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ताजमहल
शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल
समझना हास्यास्पद है।
2. शब्द ताजमहल के अंत में आये 'महल' मुस्लिम शब्द है ही नहीं,
अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में
एक भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से
पुकारा जाता हो।
3. साधारणतः समझा जाता है कि ताजमहल नाम मुमताजमहल,
जो कि वहां पर दफनाई गई थी, के कारण पड़ा है। यह बात कम से कम
दो कारणों से तर्कसम्मत नहीं है - पहला यह कि शाहजहां के बेगम
का नाम मुमताजमहल था ही नहीं, उसका नाम मुमताज़-उल-
ज़मानी था और दूसरा यह कि किसी इमारत का नाम रखने के लिय
मुमताज़ नामक औरत के नाम से "मुम" को हटा देने का कुछ मतलब
नहीं निकलता।
4. चूँकि महिला का नाम मुमताज़ था जो कि ज़ अक्षर मे समाप्त
होता है न कि ज में (अंग्रेजी का Z न कि J), भवन का नाम में
भी ताज के स्थान पर ताज़ होना चाहिये था (अर्थात्
यदि अंग्रेजी में लिखें तो Taj के स्थान पर Taz होना था)।
5. शाहज़हां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन
का उल्लेख 'ताज-ए-महल' के नाम से किया है जो कि उसके शिव
मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम तेजोमहालय से मेल खाता है। इसके
विरुद्ध शाहज़हां और औरंगज़ेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल
खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुये उसके स्थान पर
पवित्र मकब़रा शब्द का ही प्रयोग किया है।
6. मकब़रे को कब्रगाह ही समझना चाहिये, न कि महल । इस प्रकार से
समझने से यह सत्य अपने आप समझ में आ जायेगा कि कि हुमायुँ, अकबर,
मुमताज़, एतमातुद्दौला और सफ़दरजंग जैसे सारे शाही और
दरबारी लोगों को हिंदू महलों या मंदिरों में दफ़नाया गया है।
7. और यदि ताज का अर्थ कब्रिस्तान है तो उसके साथ महल शब्द
जोड़ने का कोई तुक ही नहीं है।
8. चूँकि ताजमहल शब्द का प्रयोग मुग़ल दरबारों में
कभी किया ही नहीं जाता था, ताजमहल के विषय में
किसी प्रकार की मुग़ल व्याख्या ढूंढना ही असंगत है। 'ताज' और
'महल' दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।
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इस लेख मे मेरा योगदान उतना ही है जितना कि रामसेतु के
निर्माण में गिलहरी का था, श्रेय मूल लेखक श्री ओक साहब
तथा अन्य प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लगे सभी इतिहास प्रेमियो को।
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