Wednesday, 24 September 2014

परमात्मा और किसान एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा ,देखिये प्रभु,आप परमात्मा हैं , लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है ,एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये , जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो,फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा! 
किसान ने गेहूं की फ़सल बोई ,जब धूप चाही ,तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! तेज धूप, ओले,बाढ़ ,आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी,क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी ! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, की फ़सल कैसे करते हैं ,बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे. फ़सल काटने का समय भी आया ,किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा ,एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था ,सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा ,प्रभु ये क्या हुआ ? तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था ,तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया . ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया ,उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया , इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है ,उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है
.सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने , हथौड़ी से पिटने,गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है,उसे अनमोल बनाती है !” उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो ,चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता ! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं ,उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, 
अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है,प्रतिभाशाली बनना है ,तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा !
~ आइये जाने "श्री मद्-भगवत गीता" के बारे में ~
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किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।
कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।
भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।
कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी
कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।
कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में
क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।
कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय
कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक
गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।
गीता को अर्जुन के अलावा
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने
अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को
गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में
गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।
गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद
गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना
गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.
काफ़िर को धोखा देकर इस्लाम को आगे बढ़ाना इस्लाम में अच्छा माना जाता है और यही जेहाद कहलाता है......जेहाद का मतलब इस्लाम को फैलाने में आने वाली बाधा को खतम करने के लिए युद्ध करना, हिकमत करना, मेहनत करना, और मर गए तो जन्नत में 72 हूर मिलेगी...डबल फायदा..

Tuesday, 23 September 2014

लव जेहाद है क्या ??? इसे प्रेम-धोखा कहना ज्यादा ठीक है....
लव जेहाद में मुख्यतः ३ चरण है बाकी के चरण लड़की के स्वाभिमान पर निर्भर करते हैं----
१- एक मुस्लिम पुरुष अपने को हिन्दू होने का धोखा देता है किसी हिन्दू महिला को,
२-फिर प्रेम का नाटक करके उससे शादी करना और सम्भोग करना दूसरा चरण है,
३-फिर कब्जे में आने बाद अपना असली मुस्लिम नाम और औकात दिखाना ,
यही से परेशानी शुरू होती है....
लड़की नहीं मानी तो उसका सामूहिक रेप कराया जाता है,
बहुत स्वाभिमानी लड़की है तो उसे चकलाघर में बेच दिया जाता है,
कभी कभी अरब वालो को बढ़िया पैसे मिलने पर बेच दिया जाता है,
मारकर उनके अंग भी बेच दिए जाते हैं काफी पैसा मिलता है,
घर वाले धनी हैं तो लड़की को ब्लैकमेल करके खूब पैसा वसूला जाता है,
लड़की को धमकी दी जाती है की तेरे भाई या बाप (पुरुष) को मार देंगे,
इसी प्रकार यातना का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो जाता है......धार्मिक बनिए, अधर्म का नाश करिए, बेटियों को दुर्गा और चंडी बनाइये, और भगवान् राम का आदेश याद रखे.
क़ुरआन का अध्ययन करते समय कुछ आयते ध्यान में आयी । स्रोत सन्दर्भ : कुर्आन मजीद, प्रकाशक : महमूद एण्ड कम्पनी, मरोल पाइप लाइन, मुम्बई ५९ । तर्जुमा : फ़तेह मुहम्मद खां साहब जालन्धरी । किताब प्राप्तिस्थान : आसिफ़ बुक डिपो गड़हय्या स्ट्रीट , जामा मस्जिद देहली ११०००६।
कोई मुझे समझाएगा कि निम्नलिखित आयतों में इस्लाम का "अमन का सन्देश" कहाँ और कैसे है ?
१०-९-५ जब इज़्ज़त के महिने गुज़र जायें, तो मुश्रिकों को जहाँ पाओ, क़त्ल कर दो और पकड़ लो और घेर लो और हर घात की जगह पर उनकी ताक में बैठे रहो, फिर अगर वे तौबा कर लें और नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने लगे, तो उन की राह छोड़ दो। बेशक खुदा बख़्शने वाला मेहरबान है ।
१०-९-२८ मोमिनो ! मुश्रिक तो पलीद हैं (नापाक) -------
५-४-१०१ ------- बेशक, काफ़िर तुम्हारे खुले दुश्मन है ।
११-९-१२३ ऐ ईमानवालों ! अपने नज़दीक के (रहनेवाले) काफ़िरों से जंग करो और चाहिए कि वह तुम में सख़्ती (यानी मेहनत और लड़ाई की ताक़त) मालूम करें और जान रखो कि खुदा परहेजगारों के साथ है ।
५-४-५६ जिन लोगों ने हमारी आयतों से कुफ़्र किया, उन को हम जल्द आग में दाख़िल करेंगे, जब उनकी खालें गल (और जल) जाएँगी, तो हम और खालें बदल देंगे, ताकि (हमेशा) अजाब का (मज़ा ) चखते रहें । बेशक, खुदा ग़ालिब हिक्मत वाला है।
५-४-८९ वे तो यही चाहते हैं कि जिस तरह वे काफ़िर हैं, (उसी तरह) तुम भी काफ़िर हो कर (सब) बराबर हो जाओ, तो जब तक वे खुदा की राह में वतन न छोड़ जायें, उनमें से किसी को दोस्त न बनाना । अगर क़ुबूल न करें तो उन को पकड़ लो और जहाँ पाओ क़त्ल कर दो और उनमें से किसी को अपना साथी और मददगार न बनाओ ।।
ऐसी हिंसा का और नफ़रत का सन्देश देनेवाली आयतें और भी बहुत सारी है । आज इतनी काफ़ी हैं, कुछ और बाद में लिखूँगा ।
अब मैं चाहता हूँ कि "अमन का सन्देश" देनेवाली, गैरमुस्लिमों के साथ शान्ति के साथ रहने का उपदेश देनेवाली, कुछ आयतें भी पढ़ूँ । कोई ऐसी आयतें यहाँ पोस्ट करेगा तो मेहरबानी होगी । आयत क्र ज़रूर लिखना ।
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मजहब के नाम पर मानवता का अहित जितना इस्लाम ने किया है उतना किसी ने नहीं किया है--- स्वामी विवेकानंद
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कहते हैं कि नमक खाने का हक अदा करना चाहिए। लेकिन अगरिया समुदाय नमक खिलाने की दर्दनाक कीमत चुका रहा है।
अगरिया समुदाय की आजीविका सदियों से नमक बनाने की है। इनके जीवन का मतलब सिर्फ नमक बनाना है। इनके द्वारा बनाया गया नमक देश की 75 फीसदी आबादी खाती है। अगरिया समुदाय अपनी पूरी जिंदगी रन ऑफ कच्छ के खेतों में अथाह परिश्रम करके गुजार देती है। पूरे देश को नमक खिलाने वाला यह समुदाय इसके एवज में खास कीमत चुकाने को मजबूर है। नमक बनाने के दौरान इनके पैर असाधारण पतले और कठोर हो जाते हैं। अत्यधिक कष्टदायक जीवन जीने को ये मजदूर मजबूर हैं। आलम यह है कि मरने के बाद इनका पूरा शरीर जल तो जाता है लेकिन इनके पैर को दफनाना पड़ता है।
अहमदाबाद से 235 किमी तो कच्छ के जिला मुख्यालय से 150 किमी दूर स्थित सुरजबरी क्रीक को छोटा रन ऑफ कच्छ कहते हैं। यह अरब सागर से करीब 10 किमी दूर है। इस समुदाय की पहचान ही नमक बनाने से जुड़ी है। गुजरात के पर्यटन अधिकारी फारुख पठान के मुताबिक यहां का पानी अरब सागर से करीब दस गुना ज्यादा खारा है। जब यहां के पानी पर सूरज की किरणें पड़ती हैं तो वह धीरे-धीरे नमक के रूप में बदलता जाता है। हर 15 दिनों में प्रत्येक खेत से करीब 10 से 15 टन नमक पैदा होता है। पठान आगे बताते हैं कि हर घर करीब तीस से साठ खेतों का मालिक है। कष्टदायक वातावरण में प्रत्येक अगरिया कठोर परिश्रम करने के बाद 60 टन नमक का औसत उत्पादन करता है। भारत के सबसे गरीब समुदायों में एक अगरिया समुदाय के बच्चे शायद ही स्कूल जा पाते हैं। करीब चार महीने जलमग्न होने की वजह से ये उन दिनों बेरोजगार रहते हैं।
हिंदू संस्कृति किसी अंधविश्वास पर नहीं बल्कि विज्ञान की ठोस धरातल पर बनी है, जिस पर लाखों लोग विश्वास करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। इस संस्कृति में सांस लेने, खाने, बैठने और खड़े होने जैसी सामान्य बातों समेत जीवन का हर पहलू एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के तौर पर विकसित हुआ।
हम लोग यह हमेशा से ही सुनते आ रहें हैं कि बहती नदी में सिक्के डालने से हमे सौभाग्य प्राप्त होगा। लेकिन इसका एक वैज्ञानिक कारण है, पहले जब सिक्के बनाये जाते थे तो वे तांबे के होते थे जो कि हमारे शरीर के लिए एक बहुत उपयोगी धातु मनी जाती है। लेकिन आज के समय में यह सिक्के तांबे के नहीं स्टेनलेस स्टील के बनते हैं, जिसे पानी में डालने से पानी में कोई फरक नहीं पड़ता है। इसके उलट तांबे के सिक्के पानी में जाने से पानी पीने लायक बनता था।
अब समस्या यहाँ ये है कि पहले जिस भी बर्तन में पानी रखा जाता था उसमे वो सिक्के डाले जाते थे पर अब लोग नदी में डालते हैं जिसका कोई फायदा नहीं मिलता पर लोगों ने अब इसे श्रद्धास्वरूप धन चढाने की परंपरा अगर बना भी ली है तो भी बुराई नहीं है क्योंकि इससे कम से कम दूसरे धर्मों की तरह कोई खून तो नहीं बहा ?