Wednesday, 27 December 2017

चोल साम्राज्य: जिसने जीता समुद्र, विजय की लंका:-
दक्षिण भारत में शक्तिशाली तमिल चोल साम्राज्य का इतिहास 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक मिलता है। चोल साम्राज्य के 20 राजाओं ने दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से पर लगभग 400 साल तक शासन किया।
मेगस्थनीज की इंडिका और अशोक के अभिलेख में भी चोलों का उल्लेख किया गया है कहते हैं कि चोल शासकों ने अपनी विजय यात्रा में आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल और दक्षिण एशिया में पूरा हिंद महासागर व श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया में अंडमान-निकोबार, मलेशिया, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया तक को विजय किया था।
आइये, चोल सम्राज्य के गौरवशाली इतिहास के कुछ पहलुओं को जानने का प्रयत्न करते हैं–
कांची के पल्लवों के सामंत विजयालय चोल ने सन 850 ईस्वी में तंजौर पर कब्जा कर चोल साम्राज्य की नींव रखी। नौवीं शताब्दी के अंत तक चोलों ने पूरे पल्लव साम्राज्य को हराकर पूरी तरह से तमिल राज्य पर अपना कब्जा कर लिया।
इसी कड़ी में आगे 985 ईस्वी में शक्तिशाली चोल राजा अरुमोलीवर्मन ने अपने आपको राजराजा प्रथम घोषित किया, जो आगे चलकर चोल शक्ति को चरमोत्कर्ष पर ले गया। चोल वंश के पहले प्रतापी राजा राजराजा ने अपने 30 के शासन में चोल साम्राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था।
राजाराज ने पांड्या और केरल राज्यों के राजाओं को हराकर अपनी विजय की शुरुआत की उन्होंने पश्चिमी तट, दक्षिणी तट और अपनी शक्तिशाली नौसेना की सहायता से श्रीलंका के उत्तरी राज्य सिंहल द्वीप पर कब्जा किया शायद इसलिए ही कहा जाता है कि राजराजा के शासन काल में चोल दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना। वह पांड्य, केरल व श्रीलंका के राजाओं का मजबूत संघ नष्ट कर अपने अंत समय में मालदीव और मैसूर के कई हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहा।
राजराजा प्रथम ने लौह और रक्त की नीति का पालन करते हुए श्रीलंका के शासक महिंद पंचम को पराजित कर मामुण्‍डी चोल मण्डलम नामक नए प्रांत को स्थापित किया साथ ही उसकी राजधानी जनजाथमंगलम बनाई।
इसके अलावा 1012 ईस्वी में राजराजा ने कंबोडिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर अंकोरवाट को बनवाने वाले राजा सूर्य वर्मन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। राजराजा ने 1010 ईस्वी में थंजावुर में भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
यह दक्षिण भारतीय शैली में वास्तुकला का उल्लेखनीय नमूना माना जाता है। चोलों के विस्तार की बात आती है, तो राजेंद्र प्रथम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
1012 ईस्वी के आसपास चोल साम्राज्य के उत्तराधिकारी बनने के बाद उन्होंने अपने पिता राजराजा की विस्तारवादी विजय नीतियों को आगे बढ़ाया। पिता से भी आगे बढ़कर राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण भारत में अपने वंश की महानता का डंका बजाया। राजेंद्र प्रथम ने चोल साम्राज्य की सीमा का विस्तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया, दक्षिणी थाईलैंड और इंडोनेशिया तक कर लिया।
प्राचीन समय में व्यापार मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से होता था। मालों से लदे जहाज हिंद महासागर होकर चीन-जापान व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक माल ले जाया करते थे। अपने व्यापार को बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा के लिए राजेंद्र प्रथम समुद्र जीतने निकल पड़ा। इसने अपने नौसेना बेड़े को मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों व छोटे गश्ती जहाजों की टोली बनाकर राज्यों की समुद्री सीमाओं पर तैनात कर दिया। देखते ही देखते समूचे हिंद महासागर और मालदीव, बंगाल की खाड़ी और मलक्का तक पूरे समुद्र को चोल राजाओं ने जीत लिया और उस पर अपना एकछत्र राज कायम किया।
उसने अपने व्यापार को इस रास्ते चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक पहुंचाने के साथ-साथ वहां से गुजरने वाले अन्य जहाजों को भी सुरक्षित किया और उन्हें सुरक्षा प्रदान की हालांकि, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से चाेलाें के अच्छे संबंध थे, फिर भी वहां के सैनिक हर राेज चोलों की नावों को लूट लेते थे।
इन्हें सबक सिखाने के लिए राजेंद्र प्रथम ने सन् 1025 ईस्वी में गंगा सागर पार कर जावा और सुमात्रा द्वीप पर अधिकार किया। वहीं चोल नौसेना ने इसके बाद मलेशिया पर आक्रमण कर उसके प्रमुख बंदरगाह कंडारम पर अपना कब्जा कर लिया। इन सब के बाद दक्षिण का समुद्री व्यापार मार्ग पूरी तरह से चोलों के कब्जे में था।
उनके बाद उनका बेटा राजाधिराज प्रथम 1044 ईस्वी में गद्दी पर बैठा। उसने सीलोन में शत्रुतापूर्ण ताकतों को उखाड़ फेंका और इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। कोप्पम में चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय के साथ लड़ाई में इनकी मौत हो गई।
इस कारण आगे उनके भाई राजेंद्र द्वितीय ने राजगद्दी संभाली. चोल-वंश के कालखंड में चोल-नौसेना को सबसे शक्तिशाली नौ-सेनाओं में से एक माना जाता था कहते हैं कि नौसेना के दम पर ही अपने चोल अपने सम्राज्य का विस्तार कर पाए। सही मायने में उनकी नौसेना ही उनकी असल ताकत थी।
चोल-नेवी की मुहिम, खोज-यात्राओं के कई उदाहरण संगम-साहित्य में आज भी उपलब्ध हैं दरअसल विश्व में ज्यादातर नौ-सेनाओं ने बहुत देर के बाद युद्ध-पोतों पर महिलाओं को जाने के लिए मंजूरी दी थी खास बात तो यह है कि चोल-नौसेना में बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं काम करती थी।
वहां उनकी भूमिका अहम होती थी जरूरत पड़ने पर वह युद्ध में भी शामिल होती। इसके साथ-साथ चोल-शासकों के पास युद्ध पोतों के निर्माण के बारे में एक समृद्ध ज्ञान था, जिसका प्रयोग करते हुए वह दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर करते रहे। चोल-नौसेना के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि सदियों बाद भी उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है।
यहां तक कि नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम मन की बात की बात में इसका गुणगान किया था। 7 मध्ययुग के कई तमिल कवियों ने भी अपनी कविताओं में चोल राजाओं की विजयों का वर्णन किया है।
चोलों के समय महमूद गजनवी जैसे कई आक्रांताओं ने भारत पर लूट के मकसद से आक्रमण कर दिया था। ऐसे में लुटते उत्तर भारत को देखते हुए राजेंद्र चोल ने सैन्य विस्तार पर ज्यादा बल दिया और अपने सम्राज्य को मजबूत किया हालांकि, उस समय उसके सामने चुनौतियां कम न थीं वहां राज्यों पर कब्जा करने और वर्चस्व की लड़ाई जारी थी, फिर भी उसने अपनी सेना को मजबूत किया और समुद्र से सुरक्षा के लिए एक नौसेनिक बेड़े की स्थापना की।
अपने विशाल समुद्री बेड़े से चोल साम्राज्य ने कई दक्षिण एशियाई शासकों-प्रायद्वीपों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी और उनमें विजयश्री हासिल की। बारहवीं सदी तक चोल साम्राज्य में सबकुछ ठीक-ठाक रहा और वह निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे, किन्तु आगे वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगे। उन्हें चालुक्यों व होयसलों की शत्रुता का सामना करना पड़ा।

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दस पवित्र पक्षी और उनका रहस्य
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आइये जाने उन दस दिव्य और पवित्र पक्षीयों के बारे मैं जिनका हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है...
हंस:- जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते हैं कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया और जब कोई समाधिस्थ हो जाता है, तो कहते हैं कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है।
हंस पक्षी प्यार और पवित्रता का प्रतीक है। यह बहुत ही विवेकी पक्षी माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि मनुष्य के नि:श्वास में 'हं' और श्वास में 'स' ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही 'हंस' है क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अत: हंस 'ज्ञान' विवेक, कला की देवी सरस्वती का वाहन है। यह पक्षी अपना ज्यादातर समय मानसरोवर में रहकर ही बिताते हैं या फिर किसी एकांत झील और समुद्र के किनारे।
हंस दांप‍त्य जीवन के लिए आदर्श है। यह जीवन भर एक ही साथी के साथ रहते हैं। यदि दोनों में से किसी भी एक साथी की मौत हो जाए तो दूसरा अपना पूरा जीवन अकेले ही गुजार या गुजार देती है। जंगल के कानून की तरह इनमें मादा पक्षियों के लिए लड़ाई नहीं होती। आपसी समझबूझ के बल पर ये अपने साथी का चयन करते हैं। इनमें पारिवारिक और सामाजिक भावनाएं पाई जाती है।
हिंदू धर्म में हंस को मारना अर्थात पिता, देवता और गुरु को मारने के समान है। ऐसे व्यक्ति को तीन जन्म तक नर्क में रहना होता है।
मोर :- मोर को पक्षियों का राजा माना जाता है। यह शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।
अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है।
कौआ :- कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। इसकी उम्र लगभग 240 वर्ष होती है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजना कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है।
उल्लू : - उल्लू को लोग अच्छा नहीं मानते और उससे डरते हैं, लेकिन यह गलत धारणा है। उल्लू लक्ष्मी का वाहन है। उल्लू का अपमान करने से लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है।
भारत वर्ष में प्रचलित लोक विश्वासों के अनुसार भी उल्लू का घर के ऊपर छत पर स्थि‍त होना तथा शब्दोच्चारण निकट संबंधी की अथवा परिवार के सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है। सचमुच उल्लू को भूत-भविष्य और वर्तमान में घट रही घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है।
वाल्मीकि रामायण में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यन्त चतुर कहा गया। रामचंद्र जी जब रावण को मारने में असफल होते हैं और जब विभीषण उनके पास जाते हैं, तब सुग्रीव राम से कहते हैं कि उन्हें शत्रु की उलूक-चतुराई से बचकर रहना चाहिए। ऋषियों ने गहरे अवलोकन तथा समझ के बाद ही उलूक को श्रीलक्ष्मी का वाहन बनाया था।
गरूड़ : - इसे गिद्ध भी कहा जाता है। पक्षियों में गरूढ़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है। गरूड़ के नाम पर एक पुराण भी है गरूड़ पुराण। यह भारत का धार्मिक और अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है।
गरूड़ के बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु की सवारी और भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ के बारे में कहा जाता है कि यह सौ वर्ष तक जीने की क्षमता रखता है।
नीलकंठ :- नीलकंड को देखने मात्र से भाग्य का दरवाजा खुल जाता है। यह पवित्र पक्षी माना जाता है। दशहरा पर लोग इसका दर्शन करने के लिए बहुत ललायित रहते हैं।
तोता :- तोते का हरा रंग बुध ग्रह के साथ जोड़कर देखा जाता है। अतः घर में तोता पालने से बुध की कुदृष्टि का प्रभाव दूर होता है। घर में तोते का चित्र लगाने से बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है।
आपने बहुत से तोता पंडित देखें होंगे जो भविष्यवाणी करते हैं। तोते के बारे में बहुत सारी कथाएं पुराणों में मिलती है। इसके अलवा, जातक कथाओं, पंचतंत्र की कथाओं में भी तोते को किसी न किसी कथा में शामिल किया गया है।
कबूतर :- इसे कपोत कहते हैं। यह शांति का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव ने जब अमरनाथ में पार्वती को अजर अमर होने के वचन सुनाए थे तो कबतरों के एक जोड़े ने यह वचन सुन लिए थे तभी से वे अजर-अमर हो गए। आज भी अमरनाथ की गुफा के पास ये कबूतर के जोड़े आपको दिखाई दे जाएंगे। कहते हैं कि सावन की पूर्णिमा को ये कबूतर गुफा में दिखाई पड़ते हैं। इसलिए कबूतर को महत्व दिया जाता है।
बगुला :- आपने कहावत सुनी होगी बगुला भगत। अर्थात ढोंगी साधु। धार्मिक ग्रंथों में बगुले से जुड़ी अनेक कथाओं का उल्लेख मिलता है। पंत्रतंत्र में एक कहानी है बगुला भगत। बगुला भगत पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है जिसके रचयिता आचार्य विष्णु शर्मा हैं।
बगुला के नाम पर एक देवी का नाम भी है जिसे बगुलामुखी कहते हैं। बगुला ध्यान भी होता है अर्थात बगुले की तरह एकटक ध्यान लगाना। बगुले के संबंध में कहा जाता है कि ये जिस भी घर के पास ‍के किसी वृक्ष आदि पर रहते हैं वहां शांति रहती है और किसी प्रकार की अकाल मृत्यु नहीं होती।
गोरैया:- भारतीय पौराणिक मान्यताओं अनुसार यह चिड़ियां जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है वहां सुख और शांति बनी रहती है। खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोदिन तरक्की करता रहता है।✍☘💕
*मनुष्य को पांच ऋण चुकाने होते हैं:-*
*_ 1. माता का ऋण_*
*_ 2. पिता का ऋण_*
*_ 3. गुरु का ऋण_*
*_ 4. घरती का ऋण_*
*_ 5. धर्म का ऋण_*
*इन ऋणो को चुकाने के निम्न उपाय कहे गए हैं*
*_ 1. माता का ऋण चुकाने के लिये कन्या दान करना चाहिए।_*
*_ 2. पिता का ऋण चुकाने के लिए संतान उत्पति करनी चाहिए।_*
*_ 3. गुरु ऋण चुकाने के लिए लोगों को शिक्षित करना चाहिए।_*
*_ 4. घरती का ऋण चुकाने के लिए कृषि करें या पेड लगाएं।_*
*_ 5. धर्म का ऋण चुकाने के लिये धर्म की रक्षा करें ओर धर्म* *करें व धर्म का प्रचार के लिए समय दें।*
*"मन" का झुकना बहुत ज़रूरी है...*
*केवल सर झुकाने से भगवान नहीं मिलते..*

Monday, 25 December 2017

अकसर अरब जगत का नाम सुनने को आता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि अरबी भाषा बोलने वाले इस अरब जगत में कितने देश शामिल हैं. चलिए जानते हैं.
1. सऊदी अरब
क्षेत्रफल: 21.49 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 3.3 करोड़, राजधानी: रियाद, मुद्रा: सऊदी रियाल.
2. मिस्र
क्षेत्रफल: 10.10 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 9.62 करोड़, राजधानी: काहिरा, मुद्रा: इजिप्शियन पाउंड.
3. संयुक्त अरब अमीरात
क्षेत्रफल: 83,600 वर्ग किलोमीटर, आबादी: 94 लाख, राजधानी: अबु धाबी, मुद्रा: यूएई दिरहम.
4. कतर
क्षेत्रफल:11,581 वर्ग किलोमीटर, आबादी: 25.75 लाख, राजधानी: दोहा, मुद्रा: रियाल.
5. अल्जीरिया
क्षेत्रफल: 23.81 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 4 करोड़, राजधानी: अल्जीरियस, मुद्रा: दीनार.
6. इराक
क्षेत्रफल: 4.37 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 3.72 करोड़, राजधानी: बगदाद, मुद्रा: इराकी दीनार.
7. कुवैत
क्षेत्रफल: 17,818 वर्ग किलोमीटर, आबादी: 43.48 लाख, राजधानी: कुवैत सिटी, मुद्रा: कुवैती दीनार.
8. मोरक्को
क्षेत्रफल: 7.1 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 3.3 करोड़, राजधानी: रबात, मुद्रा: मोरक्कन दिरहम.
9. ओमान
क्षेत्रफल: 3.09 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 44.24 लाख, राजधानी: मस्कट, मुद्रा: रियाल.
10. लीबिया
क्षेत्रफल: 17.59 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 62.93 लाख, राजधानी: त्रिपोली, मुद्रा: लीबियन दीनार.
11. सूडान
क्षेत्रफल: 18.86 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 3.95 करोड़, राजधानी: खारतूम, मुद्रा: सूडानी पाउंड.
12. ट्यूनीशिया
क्षेत्रफल: 1.63 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 1.09 करोड़, राजधानी: ट्यूनिस, मुद्रा: ट्यूनीशियन दीनार.
13. लेबनान
क्षेत्रफल: 10.45 हजार वर्ग किलोमीटर, आबादी: 60 लाख, राजधानी: बेरुत, मुद्रा: लेबनानी पाउंड.
14. सीरिया
क्षेत्रफल: 1.85 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 1.70 करोड़, राजधानी: दमिश्क, मुद्रा: सीरियन पाउंड.
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15. यमन
क्षेत्रफल: 5.27 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 2.75 करोड़, राजधानी: सना, मुद्रा: यमनी रियाल.
16. जॉर्डन
क्षेत्रफल: 89.34 हजार वर्ग किलोमीटर, आबादी: एक करोड़, राजधानी: अम्मान, मुद्रा: दीनार.
17. बहरीन
क्षेत्रफल: 765 वर्ग किलोमीटर, आबादी: 14.25 लाख, राजधानी: मनामा, मुद्रा: बहरीनी दीनार.
18. फलस्तीन
(अभी अलग देश नहीं बना है.)
19. मॉरिटानिया
क्षेत्रफल: 10.3 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 43.01 लाख, राजधानी: नोआकचोट, मुद्रा: ओएगुइया.
20. सोमालिया
क्षेत्रफल: 6.37 लाख वर्ग किलोमीटर, आबादी: 1.43 करोड़, राजधानी: मोगादिशु, मुद्रा: सोमाली शिलिंग.
21. जिबूती
क्षेत्रफल: 23.20 हजार वर्ग किलोमीटर, आबादी: 9.42 लाख, राजधानी: जिबूती, मुद्रा: जिबूतियन फ्रांक.
... वे हमारी पुरातन संपदाओं को थोड़े हेरफेर के साथ बदलकर अपनी मोहर लगा देते थे। आज उनके वंशज बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने ऐसे-ऐसे निर्माण किये। हम जानते हैं कि देश की अधिकांश पुरातन मस्जिदों को इसी तरह बनाया गया है। जो घालमेल इनके पूर्वजों ने किये ये मंदिर उसका साक्षात् प्रमाण है। ये दैत्यसूदन मंदिर है। इसका निर्माण हज़ारों साल पूर्व हुआ था। महाराष्ट्र के बुलढाना के पास लोणार कस्बे में ये मंदिर बना हुआ है। निजाम के शासनकाल में इसे फर्जीवाड़े से मस्जिद बनाने की कोशिश की गई थी। बस मुख्य दरवाजा बदल दो और सारे प्रमाण मिटा दो। हालांकि गांववाले घोर सनातनी थे। उन्होंने ये अनर्थ होने नहीं दिया और आगे का प्रमाण आपके सामने है...
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यश, अपयश ,हार ,जीत, जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।
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वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।
उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।
उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।
मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ?
क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?
हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा,शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया।
*हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।अन्तत: यश, अपयश ,हार ,जीत, जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।*

Saturday, 23 December 2017



ईसाईयों से धार्मिक चर्चा
ईसाई मत में ईश्वर की परिभाषा, ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव को लेकर बहुत भ्रम है
सवाल:- भगवान (God) कौन है ?
ईसाई:- जीसस है।
सवाल:- क्या जीसस, मैरी का बेटा है ?
ईसाई:- हां।
सवाल:- तो फिर मैरी को किसने बनाया ?
ईसाई:- भगवान ने बनाया।
सवाल:- OK, तो फिर भगवान कौन है ?
ईसाई:- जीसस है।
सवाल:- क्या जीसस का जन्म हुआ था ?
ईसाई:- हां, हुआ था।
सवाल:- तो जीसस के पिता कोन हैं ?
ईसाई:- जीसस के पिता भगवान है।
सवाल:- तो फिर भगवान कोन है ?
ईसाई:- जीसस है।
सवाल:- क्या जीसस भगवान का सेवक है ?
ईसाई:- हाँ है।
सवाल:- क्या जीसस सूली पर मरे थे ?
ईसाई:- हाँ, मरे थे।
सवाल:- जीसस को पुनर्जीवित किसने किया ?
ईसाई:- भगवान ने किया।
सवाल:- क्या जीसस दूत (संदेशवाहक) थे?
ईसाई:- हाँ, थे।
सवाल:- तो उनको पृथ्वी पर किसने भेजा था ?
ईसाई:- भगवान ने भेजा।
सवाल:- तो भगवान कौन है ?
ईसाई:- जीसस है।
सवाल:- क्या जीसस ने धरती पर किसी की पूजा की थी?
ईसाई:- हाँ।
सवाल:- किसकी पूजा की थी ?
ईसाई:- भगवान की।
सवाल:- तो भगवान कौन है ?
ईसाई:- जीसस है।
सवाल:- क्या भगवान का कोई प्रारम्भ है ?
ईसाई:- नही है।
सवाल:- तो 25 दिसम्बर को कौन जन्मा था ?
ईसाई:- जीसस जन्मे थे ।
सवाल:- क्या जीसस ही भगवान है ?
ईसाई:- हाँ, जीसस ही भगवान है।
सवाल:- भगवान कहाँ है ?
ईसाई:- स्वर्ग में है।
सवाल:- स्वर्ग में कितने भगवान हैं ?
ईसाई:- वहां सिर्फ एक ही भगवान है।
सवाल:-जीसस कहाँ है ?
ईसाई:- वो अपने पिता (भगवान) के दायीं तरफ विराजमान है।
सवाल:- तो स्वर्ग में कितने भगवान हैं ?
ईसाई:- वहां सिर्फ एक ही भगवान है।
सवाल:- वहां पर कितनी कुर्सियां हैं ?
ईसाई:- वहां सिर्फ एक कुर्सी है।
सवाल:- जीसस कहाँ है ?
ईसाई:- वे भगवान के पास बैठे हैं।
सवाल:- तो वे दोनों एक कुर्सी पर कैसे बैठ सकते हैं ?
ईसाई:- भगवान पर इतने सवाल ? आपको शैतान ने गुमराह कर रखा है। भगवान के बारे में इतना गलत सिर्फ शैतान ही सोच सकता है । आप शैतान के जाल में फंसे हुए हैं।