Sunday, 28 January 2018


घर के पास ही गुरुद्वारा है जहाँ 24 घण्टो बारह महीना लंगर की सेवा चलती है ! मेंरा एक गैर सिक्ख मित्र है , जो की अक्सर रात बे रात आ धमकता और कहता कि चल गुरूद्वारे में लंगर करने चलना है ! यदि मैं कहता कि यार मैं खाना खा चुका हूँ तब भी उसका आग्रह होता की मैं बेशक ना खाऊँ लेकिन उसके साथ चलू !
उसके आने की दो वजह होती ! एक तो उसे लंगर की राजमा,चने,मूंग की मिक्स डाल पसन्द है दुसरा वह अक्सर मज़ाक में कहता की घरवाली से वह डरे जिसको गुरूद्वारे का रास्ता ना मालूम हो !
यानि जब भी उसकी घरवाली से लड़ाई होती तो वह गुस्से से घर से निकलता और यहाँ लंगर में खाकर घर ऐसे रूठ कर सोता मानो भूखा सोया हो ! 🙂
गुरुद्वारे के बड़े से लंगर हाल में दीवारो पर बहुत से फ्रेम लगी है जिसमे सिक्ख गुरुओ पर मुगल शासक द्वारा किये अत्याचार बताये गए है !
मेरा मित्र हमेशा मुझे कहता कि यार यह खून खराबे की ,यातना देती हुई तस्वीरें यहाँ नहीं लगाना चाहिए , खाना खाते हुए इसे देखना बड़ा अजीब लगता है , रोटी गले में ही अटक जाती है !
कही किसी को जलती कढ़ाही में खौलते तेल में डाला जा रहा है तो कही किसी को आरी से कटवाया जा रहा है , कहीं किसी के बच्चे को माँ से छीन कर आग में फेका जा रहा तो कहीं मुग़ल सैनिको के बरछो में सिक्खो के कटे सर टंगे हुए है !
एक दिन इसी तरह लंगर खाते हुए उसने फिर वही शिकायत की !
पास ही बैठे लंगर करते एक बुजुर्ग ने सुनकर कहा , यह इसलिये लगाईं गई है ताकि हर निवाले के साथ यह महसूस हो की यह कितने कष्टो और यातना सहने के बाद अपने धर्म को बचाते हुए रोटी मिल रही है , इसे कभी भूलना नहीं चाहिए ! इन लोगो ने अपने प्राण त्याग दिए लेकिन इस्लाम नहीं कबूल किया और अपना घर परिवार अपनी आँखों के सामने उजड़ते हुए देखा , चाहते तो झुक कर अपनी जान बचा लेते , लेकिन तब वह भी आम हो जाते !
उन्होंने दुसरा रास्ता चुना और हमारे सामने नई मिसाल रखी !
लंगर के पश्चात , जब हम दोनों बर्तन साफ़ कर धो रहे तब वह बड़ा चुपचाप बर्तन साफ़ कर रहा था , मैंने उसे छेड़ते हुए मज़ाक में कहा भी कि ऐसे बर्तन घर पर भी साफ़ किया कर , घर वाली खुश रहेंगी लेकिन वह चुप रहा , हमेशा की तरह पलट कर मुंहजोरी नहीं की !
बाहर निकल कर मैंने फिर पूछा क्या हुआ तब वह बहुत संजीदगी से बोला , " यार हम भी कितने कमीने हैं , अभी जब आयते पूछ कर पूछ कर लोगो को मारने की खबरे आ रही तो हम कैसे कैसे मजाक करते थे ?? कि दो चार आयाते याद कर लेनी चाहिए या कोई क्रेश कोर्स करना होंगा ??? कितने कायर मानसिकता होती हैं हमारी ??? हम मरने के पहले ही मरे होते हैं !
मैंने उसका दिल रखने के लिए कहा कि चल कोई बात नही यार , वह तो हंसी मज़ाक कि बाते रहती बस !
नहीं, वह बोला " हम जैसा आगे पीछे सोचते हैं , मुसीबत आने पर व्यवहार भी वैसा ही करते हैं "
अब की बार मेरा चेहरा उतर गया था ! क्या वह कुछ गलत कह रहा था ?

Saturday, 27 January 2018

शकरकंद (अंग्रेज़ी: Sweet Potato; वैज्ञानिक नाम : ईपोमोएआ बातातास) एक खाद्य है, जो काफ़ी कुछ आलू से मिलता-जुलता है। इसका पौधा एकवर्षी होता है, जो 'कॉन्वॉलुलेसी' कुल के अंतर्गत रखा गया है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तब शकरकंद बहुवर्षी जैसा व्यवहार करता है। इसकी रूपान्तरित जड़ की उत्पत्ति तने की पर्वसन्धियों से होती है, जो जमीन के अन्दर प्रवेश कर फूल जाती है। जड़ का रंग लाल अथवा भूरा होता है एवं यह अपने अन्दर भोजन संग्रह करती है। यह एक सपुष्पक पौधा है। शकरकंद का रोपण आषाढ़--सावन महीने में कलम द्वारा होता है।
शकरकंद उष्ण अमरीका का देशज है। अमरीका से फिलिपीन होते हुए यह चीन, जापान, मलेशिया और भारत आया, जहाँ व्यापक रूप से तथा सभी अन्य उष्ण प्रदेशों में इसकी खेती होती है। यह ऊर्जा उत्पादक आहार है। इसमें अनेक विटामिन विद्यामान रहते हैं। विटामिन 'ए' और 'सी' की मात्रा इसमें सर्वाधिक पाई जाती है। इसमें आलू की अपेक्षा अधिक स्टार्च रहता है। शकरकंद उबालकर या आग में पकाकर खाया जाता है। इसे कच्चा भी खाया जा सकता है। सूखे में यह खाद्यान्न का स्थान ले सकता है। इससे स्टार्च और ऐल्कोहॉल भी तैयार होता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से इसकी खेती होती है। फलाहारियों का यह बहुमूल्य आहार है। इसका पौधा गरमी सहन कर सकता है, पर तुषार से शीघ्र मर जाता है।

आखिर कौन हैं वामपंथी ? क्या है इनका काला इतिहास ? जानें ..
इतने बड़े विचारकों, विश्व राजनीति-अर्थनीति की गहरी समझ, तमाम नेताओं की अप्रतिम ईमानदारी और विचारधारा के प्रति समर्पण के किस्सों के बावजूद भारत का वामपंथी आंदोलन क्यों जनता के बीच स्वीकृति नहीं पा सका? अब लगता है, भारत की महान जनता इन राष्ट्रद्रोहियों को पहले से ही पहचानती थी, इसलिए इन्हें इनकी मौत मरने दिया। जो हर बार गलती करें और उसे ऐतिहासिक भूल बताएं, वही वामपंथी हैं।
** वामपंथी वे हैं जो 24 मार्च, 1943 को भारत के अतिरिक्त गृह सचिव रिचर्ड टोटनहम ने टिप्पणी लिखी कि ''भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, किसी के सगे नहीं हो सकते, सिवाय अपने स्वार्थों के।''
** वे वही है "जो पाकिस्तान निर्माण के समय "पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे। जो आज तक JNU में भी जारी है।
** वे वही हैं जो चीन के साथ हुए युद्ध में भारत विरोध में खड़े रहे। क्योंकि चीन के चेयरमैन माओ उनके भी चेयरमेन थे।
** वे ही हैं जो आपातकाल के पक्ष में खड़े रहे।
** वे ही हैं जो अंग्रेजों के मुखबिर बने और आज भी उनके बिगड़े शहजादे (माओवादी) जंगलों में आदिवासियों का जीवन नरक बना रहे हैं।
** वे वही है, भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ वामपंथी अंग्रेजों के साथ खड़े थे।
** वे वही है, मुस्लिम लीग की देश विभाजन की मांग का भारी समर्थन वामपंथी कर रहे थे।
** वे वही है, आजादी के क्षणों में नेहरू को 'साम्राज्यवादियों' का दलाल वामपंथियों ने घोषित किया।
** वे वही है , वामपंथियों ने कांग्रेस के गांधी को 'खलनायक' और जिन्ना को 'नायक' की उपाधि दे दी थी।
** खंडित भारत को स्वतंत्रता मिलते ही वामपंथियों ने हैदराबाद के निजाम के लिए पाकिस्तान में मिलाने के लिए लड़ रहे मुस्लिम रजाकारों की मदद से अपने लिए स्वतंत्र तेलंगाना राज्य बनाने की कोशिश की।
** वामपंथियों ने भारत की क्षेत्रीय, भाषाई विविधता को उभारने की एवं इनके आधार पर देशवासियों को आपस में लड़ाने की रणनीति बनाई।
** भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले गांधी और उनकी कांग्रेस को ब्रिटिश दासता के विरूध्द भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे देशभक्तों पर वामपंथियों ने 'देशद्रोही' का ठप्पा लगाया। भले पश्चिम बंगाल में माओवादियों और साम्यवादी सरकार के बीच कभी दोस्ताना लडाई चल चुकी हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोनों के बीच समझौता था। चीन को अपना आदर्श मानने वाली कथित लोकतंत्रात्क पार्टी माक्र्सवादी काम्यूनिस्ट पार्टी और भारतीय काम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) एक ही आका के दो गुर्गे हैं।
** भले चीन भारत के खिलाफ कूटनीतिक युद्ध लड रहा हो लेकिन इन दोनों साम्यवादी धड़ों का मानना है कि चीन भारत का शुभचिंतक है लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का नम्बर एक दुश्मन।
**देश के सबसे बडे साम्यवादी संगठन के नेता कामरेड प्रकाश करात ने चीन के बनिस्पत देश के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ज्यादा खतरनाक बताया है।
** संत लक्ष्मणानंद की हत्या कम्युनिस्टों और ईसाई मिशनरी गठजोड़ का प्रमाण थी।केरल में, आंध्र प्रदेश में, उडीसा में, बिहार और झारखंड में, छातीसगढ में, त्रिपुरा में यानी जहाँ भी साम्यवादी हावी हैं। वहां इनके टारगेट में राष्ट्रवादी हैं और आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या इनके एजेंडे में शमिल है।
** देश की अस्मिता की बात करने वालों को अमेरिकी एजेंट ठहराना और देश के अंदर साम्यवादी चरंपथी, इस्लामी जेहादी तथा ईसाई चरमपंथियों का समर्थन करना इस देश के साम्यवादियों की कार्य संस्कृति का अंग है। चीनी फरमान से अपनी दिनचर्या प्रारंभ करने वाले ये वही ये वही साम्यवादी हैं जिन्होंने दिल्ली दूर और पेकिंग पास के नारे लगाते रहे हैं।
**ये वही साम्यवादी हैं जिन्होंने सन 62 की लडाई में हथियार कारखानों में हडताल का षडयंत्र किया था, ये वही साम्यवादी हैं जिन्होंने कारगिल की लडाई को भाजपा का षडयंत्र बताया था, ये वही साम्यवादी हैं।
** ये वही साम्यवादी हैं जिन्होंने पाकिस्तान के निर्माण को जायज ठहराया था।
** ये वही साम्यवादी हैं जो यह मानते हैं कि आज भी देश गुलाम है और इसे चीन की ही सेना मुक्त करा सकती है।
** ये वही साम्यवादी हैं जो बाबा पशुपतिनाथ मंदिर पर हुए माओवादी हमले का समर्थन कर रहे थे।
** ये वही साम्यवादी हैं जो महान संत लक्ष्मणानंद सरस्वती को आतंकवादी ठहरा रहे हैं।
** ये वही साम्यवादी हैं जो बिहार में पूंजीपतियों से मिलकर किसानों की हत्या करा रहे हैं, ये वही साम्यवादी हैं जिन्होंने महात्मा गांधी को बुर्जुवा कहा।
** ये वही है जिन्हें 'हिन्दुत्व को कमजोर करने का सुख तो मिलता है। इसीलिए भारतीय वामपंथ हर उस झूठ-सच पर कर्कश शोर मचाता है जिससे हिन्दू बदनाम हो सकें। न उन्हें तथ्यों से मतलब है, न ही देश-हित से। विदेशी ताकतें उनकी इस प्रवृत्ति को पहचानकर अपने हित में जमकर इस्तेमाल करती है। मिशनरी एजेंसियाँ चीन या अरब देशों में इतने ढीठ या आक्रामक नहीं हो पाते, क्योंकि वहां इन्हें भारतीय वामपंथियों जैसे स्थानीय सहयोगी उपलब्ध नहीं हैं। चीन सरकार विदेशी ईसाई मिशनरियों को चीन की धरती पर काम करने देना अपने राष्ट्रीय हितों के विरूद्ध मानती है। किंतु हमारे देश में चीन-भक्त वामपंथियों का भी ईसाई मिशनरियों के पक्ष में खड़े दिखना उनकी हिन्दू विरोधी प्रतिज्ञा का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है।
**वामपंथी दलों में आंतरिक कलह, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पराकाष्ठा, पश्चिम बंगाल में राशन के लिए दंगा, देश की लगभग हर मुसीबत में विपरीत बातें करना, चरम पर भ्रष्टाचार, देशविरोधी हरकतें, विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सरेआम हत्या जैसे वाकयों को लेकर वामपंथ बेनकाब हो चुका है।
**पाकिस्तान बनवाने के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने वाले भारतीय कम्युनिस्टों का हिन्दू-विरोध यथावत है। किंतु जैसे ही किसी गैर-हिन्दू समुदाय की उग्रता बढ़ती है-चाहे वह नागालैंड हो या कश्मीर-उनके प्रति कम्युनिस्टों की सहानुभूति तुरंत बढऩे लगती है। अत: प्रत्येक किस्म के कम्युनिस्ट मूलत: हिन्दू विरोधी हैं। केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रंग में होती है। पीपुल्स वार ग्रुप के आंध्र नेता रामकृष्ण ने कहा ही है कि 'हिन्दू धर्म को खत्म कर देने से ही हरेक समस्या सुलझेगी'। अन्य कम्युनिस्टों को भी इस बयान से कोई आपत्ति नहीं है। सी.पी.आई.(माओवादी) ने अपने गुरिल्ला दस्ते का आह्वान किया है कि वह कश्मीर को 'स्वतंत्र देश' बनाने के संघर्ष में भाग ले। भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में चल रहे प्रत्येक अलगाववादी आंदोलन का हर गुट के माओवादी पहले से ही समर्थन करते रहे हैं। अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थिति भी बहुत भिन्न नहीं। माकपा के प्रमुख अर्थशास्त्री और मंत्री रह चुके अशोक मित्र कह ही चुके हैं, 'लेट गो आफ्फ कश्मीर'-यानी, कश्मीर को जाने दो।
कुमार अवधेश सिंह
कल दो खबरें पढ़ी..... पुणे की इंजीनियरिंग ग्रेजुएट 18 साल की सादिया अनवर शेख ने जब अपना धर्म ग्रंथ का अध्ययन किया तो उसके मन में वैराग्य गया गया और वह बेहद धार्मिक हो गई और एक बार उसे कोच्चि एयरपोर्ट पर पकड़ा गया जहां से वह सीरिया जा रही थी फिर कल उसे जम्मू कश्मीर में पकड़ा गया जहां वह सुसाइड बॉम्बर बनके भारतीय सेना पर हमला करने वाली थी
दूसरी खबर यह पढ़ा न्यूयॉर्क में रहने वाली हावर्ड से ग्रेजुएट युवती के मन में जब वैराग्य जागा तब वह जैन साध्वी बन गई कल गुजरात की दो पोस्ट ग्रेजुएट लड़कियों के मन में वैराग्य जाएगा तो वह भी जैन साध्वी बन गई
बस यही फर्क होता है उनके और हमारे धर्म ग्रंथों में ..हमारे धर्म ग्रंथ हिंसा में नहीं मानते बल्कि वसुधैव कुटुंबकम में मांनते हैं हमारे धर्म ग्रंथ मारकाट में विश्वास नहीं करते लेकिन उनका धर्म ग्रंथ ही यही कहता है जो तुम्हारा धर्म नहीं माने वह काफिर है और काफिरों का विनाश करना पाप नहीं है
 
नरेन्द्र मोदीजी ने सत्ता में आने के बाद एक चीज जो सबसे बेहतर की है वह "पद्म" सम्मान को लॉबी से मुक्त कर समाज के सही गुमनाम नायकों को सम्मान देने का सिलसिला। वरना पहले "दिल्ली लॉबी" इसे मैनेज कर लेती थी।
और आज मिले इन सभी पद्म सम्मान में सबसे बेहतरीन और प्रेरक कहानी पश्चिम बंगाल की सुभाषिनी की है। सुभाषिनी दूसरे के घरों में काम करती थी।मजदूरी करती थी। 12 साल में ही शादी हो गयी थी। पति भी मजदूर था। 10 साल बाद पति बीमार हुआ। सुभाषिनी ने अपने पति को बिना इलाज मरते देखा।
फिर तब 23 साल की सुभाषिनी ने तय किया कि वह कुछ ऐसा करेगी कि उसका कोई अपना इस तरह न मरे। उसने दिन में मजदूरी और रात में घर का काम कर पैसा जुटाने लगी।बेटे को पढ़ने के लिये अनाथालय भेज दिया।
25 साल में तिनका तिनका जोड़ 25 बेड का अस्पताल बना दिया। इस बीच उनका बेटा भी डॉक्टर बन गया।अब दोनों उसी अस्पताल में मुफ्त इलाज करते हैं गरीबों का। पति को मरता देख जो झेला, अब चाहती है कोई न देखे। उसकी जिद और संघर्ष की यह सफर बेमिसाल है। यह सही में पद्म सम्मान है। आज की लिस्ट में ऐसी ही बेहतरीन, जिंदगी खूबसूरत को दिखाने वाली कई कहानी है।
जहां चाह होती है वहीं राह होती है इस कहावत को सार्थक किया है  संगीता सिंह  ने
MBA करने के बाद इन्होंने दिल्ली में जॉब की लेकिन यह अपना खुद का बिजनेस करना चाहती थी फिर इन्होंने मात्र 10000 लगाकर ट्रेडिंग करना शुरू किया ट्रेडिंग करते वक्त उन्हें लगा कि पैकेजिंग इंडस्ट्रीज में बहुत अच्छा स्कोप है तो उन्होंने एक छोटी सी पैकेजिंग की यूनिट लगा ली 
देखते ही देखते उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अपनी कंपनी का टर्नओवर दो करोड़ कर दिया ...आज इनके कस्टमर बहुत से ऑटो सेक्टर में एनर्जी सेक्टर में हैं और अब यह गुजरात में भी अपना दूसरा यूनिट लगाने जा रही हैं ..अब इनके पति भी जॉब छोड़ कर इनके साथ बिजनेस में आ गए और दोनों पति-पत्नी मिलकर अपने बिजनेस को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए मेहनत कर रहे हैं
संगीता सिंह जी एक महिला उद्यमिता का उदाहरण है जिन्होंने अपनी मेहनत से एक इंडस्ट्री बना ली जबकि इनका कोई गुरु नहीं था इन्हें सबकुछ जीरो से शुरू करना पड़ा कई बार बहुत कठिन वक्त भी आए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यह पूरी मेहनत से अपने काम में लगी रही आज इन्हें कई बैंक लोन देने को भी तैयार हैं और यह अपने बिजनेस को और भी बढ़ाने जा रही हैं
संगीता सिंह जी एक बात हमेशा कहती हैं कि नौकरी करना मतलब गुलामी करना है और दूसरे के बिजनेस को बढ़ाना है तो फिर हम क्यों ना अपने लिए कुछ करें और यदि हम अपने बिजनेस को एक ऊंचाई तक ला देंगे तो फिर हमारे बच्चे उसे और आगे बढ़ाएंगे जब की नौकरी में ऐसा होता है कि हम पूरी जिंदगी नौकरी करके रिटायर हो जाते हैं फिर हमारे बच्चों को नए सिरे से संघर्ष करना पड़ता है

Friday, 26 January 2018

एक सिक्का उछालकर भारत ने पाकिस्तान से जीत ली थी राष्ट्रपति की बग्घी

आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान में भूमि से लेकर कई चीजों का बंटवारा हुआ. इसमें से एक 'गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स' रेजीमेंट भी थी.भारत और पाकिस्तान दोनों ही बग्घी अपने पास रखना चाहते थे.
आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान में भूमि से लेकर कई चीजों का बंटवारा हुआ. इसमें से एक 'गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स' रेजीमेंट भी थी. इस रेजीमेंट का बंटवारा 2:1 के अनुपात में शांतिपूर्वक हो गया. लेकिन रेजिमेंट की मशहूर बग्घी को लेकर दोनों पक्षों के बीच बात नहीं बन पाई. इस खास बग्घी को दोनों ही देश अपने पास रखना चाहते थे. तत्कालीन 'गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स' के कमांडेंट और उनके डिप्टी ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक सिक्के का सहारा लिया.
सिक्का उछाला और मिल गई बग्घी
बग्घी किसके हिस्से जाएगी इसके लिए टॉस करने का निर्णय लिया गया. गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स ने दोनों पक्षों को आमने-सामने लाकर उनके बीच सिक्का उछाला, जिसमें भारत टॉस जीत गया. इसी के साथ आज राष्ट्रपति की शान माने जाने वाली बग्घी भारत की हो गई.
गणतंत्र दिवस पर हुई इस्तेमाल साल 1950 में जब पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसी बग्घी में बैठकर समारोह तक गए थे. इसी बग्घी में बैठकर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद शहर का दौरा भी करते थे.
इस बग्घी में राष्ट्रपति के आने की परंपरा कई सालों तक चलती रही, लेकिन इंदिरा गांधी हत्याकांड के बाद सुरक्षा कारणों से इस परंपरा को रोक दिया गया. इसके बाद से राष्ट्रपति बुलेट प्रूफ गाड़ी में आने लगे.
प्रणब मुखर्जी ने बदली रीत
राष्ट्रपति के बुलेट प्रूफ गाड़ी में आने की रीत को साल 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बदल दिया. करीब 20 साल बाद वे बग्घी में बैठकर 29 जनवरी को होने वाली बीटिंग रिट्रीट में शामिल होने पहुंचे.
घोड़े भी होते हैं खास
राष्ट्रपति की बग्घी के लिए घोड़े भी खास किस्म के चुने जाते हैं.  इस  के घोड़ों की ऊंचाई आम घोड़ों की तुलना में ज्यादा होती है, जिससे वे बग्घी के सामने बिल्कुल फिट बैठते हैं.