Sunday, 29 April 2018

kahani-pariwar

कुछ बेटियों को मेरी बात का बुरा जरूर लगेगा!पर सच हैं!जिन बेटियों से घर का काम नही होता!उनको कहीं पर भी जीवन में उचित सम्मान ओर उचित स्थान नही मिलता-------!!==================================
एक वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया....
कुछ दिनों बाद वकील साहब होने वाले समधी के घर गए!
तो देखा कि होने वाली समधन खाना बना रही थीं!सभी बच्चे और होने वाली बहू टी वी देख रहे थे!वकील साहब ने चाय पी कुशल जाना और चले आये!
एक माह बाद वकील साहब समधी जी के घर फिर गए!
देखा भावी समधन जी झाड़ू लगा रहीं थी!बच्चे पढ़ रहे थे!
और होने वाली बहू सो रही थी!वकील साहब ने खाना
खाया!और चले आये!कुछ दिन बाद वकील साहब किसी काम से फिर होने वाले समधी जी के घर गए!घर में जाकर देखा!होने वाली समधन बर्तन साफ़ कर रही थी!बच्चे टीवी देख रहे थे!और होने वाली बहू खुद के हाथों में नेलपेंट लगा रही थी!
वकील साहब ने घर आकर!गहन सोच-विचार कर लड़की
वालों के यहाँ खबर पहुचाई कि हमें ये रिश्ता मंजूर नहीं है!
...कारण पूछने पर वकील साहब ने कहा कि मैं होने वाले
समधी के घर तीन बार गया!तीनों बार सिर्फ समधन जी ही घर के काम काज में व्यस्त दिखीं!एक भी बार भी मुझे होने वाली बहू घर का काम काज करते हुए नहीं दिखी!जो बेटी अपने सगी माँ को हर समय काम में व्यस्त पा कर भी उन की मदद करने का न सोचे!
उम्र दराज माँ से कम उम्र की जवान हो कर भी स्वयं की
माँ का हाथ बटाने का जज्बा न रखे!वो किसी और की
माँ और किसी अपरिचित परिवार के बारे में क्या!
सोचेगी!मुझे अपने बेटे के लिए एक बहू की आवश्यकता है!किसी गुलदस्ते की नहीं!जो किसी फ्लावर पाटॅ में सजाया
जाये!
इसलिये सभी माता-पिता को चाहिये!कि वे इन छोटी
छोटी बातों पर अवश्य ध्यान दें!
बेटी कितनी भी प्यारी क्यों न हो उससे घर का काम
काज अवश्य कराना चाहिए!
समय-समय पर डांटना भी चाहिए! जिससे ससुराल में!
ज्यादा काम पड़ने या डांट पड़ने पर उसके द्वारा गलत करने!
की कोशिश ना की जाये!हमारे घर बेटी पैदा होती है!हमारी जिम्मेदारी बेटी से
बहू बनाने की है!
अगर हमने अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभाई!
बेटी में बहू के संस्कार नहीं डाले तो इसकी सज़ा बेटी को
तो मिलती है!और माँ बाप को मिलती हैं!जिन्दगी भर
गालियाँ!
हर किसी को सुन्दर सुशील बहू चाहिए! लेकिन भाइयो!
जब हम अपनी बेटियों में एक अच्छी बहु के संस्कार डालेंगे!
तभी तो हमें संस्कारित बहू मिलेगी!
ये कड़वा सच शायद कुछ लोग न बर्दाश्त कर पाएं!
----- लेकिन पढ़ें और समझें बस इतनी इलतिजा!
वृद्धाआश्रम में माँ बाप को देखकर सब लोग बेटो को ही
कोसते हैं!लेकिन ये कैसे भूल जाते हैं!कि उन्हें वहां भेजने में
किसी की बेटी का भी अहम रोल होता है!वरना बेटे अपने
माँ बाप को शादी के पहले वृद्धाश्रम क्यों नही भेजते-------!!सीमा राय गाजीपुर उःप्रः

Saturday, 28 April 2018

mediya

चाहे हिन्दू समाज की चिंता में ही सही , आये दिन हिन्दुओं को डराने वाले बुजुर्गों से निवेदन है कि या तो उत्साह बढ़ने वाली बातें करें या चुप घर बैठें .
खेल नहीं है कि समाज को मुस्लमान बना डाला जायेगा , यह भय आप कुछ लोग दिखाते हैं .
हिन्दू संसार की सबसे वीर जाति है और एक बार धोखा खा गए , बार बार संभव नहीं . जो ऐसी भयंकर बात सोचेगा कि भारत में इस्लाम का शासन लाना है .वह भारत की धरती से साफ़ हो जायेगा .अपनी मर्यादा में रहने पर सब के लिए जगह है लेकिन हिन्दू कोई साग भाजी नहीं हैं कि जो चाहे खा लेगा
---.रामेश्वर मिश्र पंकज
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रेल दुर्घटना. जिहाद ...दलित भडकाओ जिहाद.
लव .जिहाद ...सहिष्णुता. जिहाद ...अब बलात्कार .जिहाद
अब भी समझ में ना आ रहा हो तो आप का कुछ नहीं हो सकता
सेकुलरिज्म हिंदुओं के पतन का कारण बनेगा
कुमार अवधेश सिंह

 भगवान की कोई फोटो है ..?  अपने पर्स में रखने के लिए
यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में टी.टी.ई. को एक पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स में कुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस टी.टी.ई. ने हवा में
पर्स हिलाते हुए पूछा -"यह किसका पर्स है?"
एक बूढ़ा यात्री बोला -"यह मेरा पर्स है। इसेकृपया मुझे दे दें"।
टी.टी.ई. ने कहा -"तुम्हें यह साबित करना होगा कि यह पर्स
तुम्हारा ही है। केवल तभी मैं यह पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं।"
उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन मुस्कान के साथ उत्तर दिया -"इसमें भगवान श्रीकृष्ण की फोटो है।"
टी.टी.ई. ने कहा -"यह कोई ठोस सबूत नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है? पर्स में तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है?"
बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुएबोला -"मैं तुम्हें बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं स्कूल में पढ़
रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे। मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी।
जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने बालों को देखकर खुश हुआ करता था।
कुछ साल बाद मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे को निहारा करता।
जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर जाता ओर जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी।"
बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ बोलना जारी रखा - "कई वर्ष पहले मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले
वर्ष मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का क्त नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था, वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है।
अब मैंने भगवान कृष्ण की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता। जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं इतना अकेला नहीं होता।"
टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने बुकस्टाल
पर पहुंचा और विक्रेता से बोला -"क्या तुम्हारे पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के लिए चाहिए।"
हम 1400 सालों से हिन्दू कैसे बने हुए हैं...
हमारे पूर्वजों की भूमि की चौहद्दी प्रायः वैसी ही क्यूँ है...
और उसी चौहद्दी को पुनः हासिल करने को हम प्रतिबद्ध क्यूँ हैं
आजकल लोगों की एक सोच बन गई है कि राजपूतों ने लड़ाई तो की, लेकिन वे एक हारे हुए योद्धा थे, जो कभी अलाउद्दीन से हारे, कभी बाबर से हारे, कभी अकबर से, कभी औरंगज़ेब से...
क्या वास्तव में ऐसा ही है ?
यहां तक कि समाज में भी ऐसे कईं राजपूत हैं, जो महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान आदि योद्धाओं को महान तो कहते हैं, लेकिन उनके मन में ये हारे हुए योद्धा ही हैं
महाराणा प्रताप के बारे में ऐसी पंक्तियाँ गर्व के साथ सुनाई जाती हैं :-
"जीत हार की बात न करिए, संघर्षों पर ध्यान करो"
"कुछ लोग जीतकर भी हार जाते हैं, कुछ हारकर भी जीत जाते हैं"
असल बात ये है कि हमें वही इतिहास पढ़ाया जाता है, जिनमें हम हारे हैं
* मेवाड़ के राणा सांगा ने 100 से अधिक युद्ध लड़े, जिनमें मात्र एक युद्ध में पराजित हुए और आज उसी एक युद्ध के बारे में दुनिया जानती है, उसी युद्ध से राणा सांगा का इतिहास शुरु किया जाता है और उसी पर ख़त्म
राणा सांगा द्वारा लड़े गए खंडार, अहमदनगर, बाड़ी, गागरोन, बयाना, ईडर, खातौली जैसे युद्धों की बात आती है तो शायद हम बता नहीं पाएंगे और अगर बता भी पाए तो उतना नहीं जितना खानवा के बारे में बता सकते हैं
भले ही खातौली के युद्ध में राणा सांगा अपना एक हाथ व एक पैर गंवाकर दिल्ली के इब्राहिम लोदी को दिल्ली तक खदेड़ दे, तो वो मायने नहीं रखता, बयाना के युद्ध में बाबर को भागना पड़ा हो तब भी वह गौण है
मायने रखता है तो खानवा का युद्ध जिसमें मुगल बादशाह बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बात आती है तो, तराईन के दूसरे युद्ध में गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया
तराईन का युद्ध तो पृथ्वीराज चौहान द्वारा लडा गया आखिरी युद्ध था, उससे पहले उनके द्वारा लड़े गए युद्धों के बारे में कितना जानते हैं हम ?
* इसी तरह महाराणा प्रताप का ज़िक्र आता है तो हल्दीघाटी नाम सबसे पहले सुनाई देता है
हालांकि इस युद्ध के परिणाम शुरु से ही विवादास्पद रहे, कभी अनिर्णित माना गया, कभी अकबर को विजेता माना तो हाल ही में महाराणा को विजेता माना
बहरहाल, महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा, चावण्ड, मोही, मदारिया, कुम्भलगढ़, ईडर, मांडल, दिवेर जैसे कुल 21 बड़े युद्ध जीते व 300 से अधिक मुगल छावनियों को ध्वस्त किया
महाराणा प्रताप के समय मेवाड़ में लगभग 50 दुर्ग थे, जिनमें से तकरीबन सभी पर मुगलों का अधिकार हो चुका था व 26 दुर्गों के नाम बदलकर मुस्लिम नाम रखे गए, जैसे उदयपुर बना मुहम्मदाबाद, चित्तौड़गढ़ बना अकबराबाद
फिर कैसे आज उदयपुर को हम उदयपुर के नाम से ही जानते हैं ?... ये हमें कोई नहीं बताता
असल में इन 50 में से 2 दुर्ग छोड़कर शेष सभी पर महाराणा प्रताप ने विजय प्राप्त की थी व लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर दोबारा अधिकार किया था
दिवेर जैसे युद्ध में भले ही महाराणा के पुत्र अमरसिंह ने अकबर के काका सुल्तान खां को भाले के प्रहार से कवच समेत ही क्यों न भेद दिया हो, लेकिन हम तो सिर्फ हल्दीघाटी युद्ध का इतिहास पढ़ेंगे, बाकी युद्ध तो सब गौण हैं इसके आगे!!!!
* महाराणा अमरसिंह ने मुगल बादशाह जहांगीर से 17 बड़े युद्ध लड़े व 100 से अधिक मुगल चौकियां ध्वस्त कीं, लेकिन हमें सिर्फ ये पढ़ाया जाता है कि 1615 ई. में महाराणा अमरसिंह ने मुगलों से संधि की | ये कोई नहीं बताएगा कि 1597 ई. से 1615 ई. के बीच क्या क्या हुआ |
* महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्ग बनवाए, कई ग्रंथ लिखे, विजय स्तंभ बनवाया, ये हम जानते हैं, पर क्या आप उनके द्वारा लड़े गए गिनती के 4-5 युद्धों के नाम भी बता सकते हैं ?
महाराणा कुम्भा ने आबू, मांडलगढ़, खटकड़, जहांजपुर, गागरोन, मांडू, नराणा, मलारणा, अजमेर, मोडालगढ़, खाटू, जांगल प्रदेश, कांसली, नारदीयनगर, हमीरपुर, शोन्यानगरी, वायसपुर, धान्यनगर, सिंहपुर, बसन्तगढ़, वासा, पिण्डवाड़ा, शाकम्भरी, सांभर, चाटसू, खंडेला, आमेर, सीहारे, जोगिनीपुर, विशाल नगर, जानागढ़, हमीरनगर, कोटड़ा, मल्लारगढ़, रणथम्भौर, डूंगरपुर, बूंदी, नागौर, हाड़ौती समेत 100 से अधिक युद्ध लड़े व अपने पूरे जीवनकाल में किसी भी युद्ध में पराजय का मुंह नहीं देखा
* चित्तौड़गढ़ दुर्ग की बात आती है तो सिर्फ 3 युद्धों की चर्चा होती है :-
1) अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को पराजित किया
2) बहादुरशाह ने राणा विक्रमादित्य के समय चित्तौड़गढ़ दुर्ग जीता
3) अकबर ने महाराणा उदयसिंह को पराजित कर दुर्ग पर अधिकार किया
क्या इन तीन युद्धों के अलावा चित्तौड़गढ़ पर कभी कोई हमले नहीं हुए ?
* इस तरह राजपूतों ने जो युद्ध हारे हैं, इतिहास में हमें वही पढ़ाया जाता है
बहुत से लोग हमें नसीहत देते हैं कि तुम राजपूतों के पूर्वजों ने सही रणनीति से काम नहीं लिया, घटिया हथियारों का इस्तेमाल किया इसीलिए हमेशा हारे हो
अब उन्हें किन शब्दों में समझाएं कि उन्हीं हथियारों से हमने अनगिनत युद्ध जीते हैं, मातृभूमि का लहू से अभिषेक किया है, सैंकड़ों वर्षों तक विदेशी शत्रुओं की आग उगलती तोपों का अपनी तलवारों से सामना किया है
आइये, हम अपने महापुरुषों के बारे में वास्तविक इतिहास पढें, ताकि आने वाली पीढ़ियां हमें वही समझे, जो वास्तव में हम थे।

Friday, 27 April 2018

श्री महाराणा प्रताप सिंह जी

पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य सीमा - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
वंश - सुर्यवंश राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर

अन्य जानकारी - श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम 'चेतक' था।
"राजपूत शिरोमणि श्री महाराणा प्रतापसिंह जी" उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि परमेवाड़-मुकुट मणि राणा प्रताप जी का जन्म हुआ। श्री प्रताप जी का नाम इतिहास मेंवीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। श्री महाराणा प्रतापजी की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर केअनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के बारे में कुछरोचक जानकारी
:1... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी एकही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थेतब उन्होने अपनी माँ सेपूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकरआना जहाँ का राजा अपनी प्रजा केप्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के
बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के भाले का वजन 80
किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल,
और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी पर श्री महाराणा प्रताप जी ने किसी की भी आधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... श्री महाराणा प्रताप जी के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुवा हैं जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... श्री महाराणा प्रताप जी ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा जी कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है मै नमन करता हूँ एसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला |
10..... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो श्री महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील |
13..... राणा जी का घोडा चेतक महाराणा जी को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की म्रत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |
14..... राणा जी का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमीत करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे
|15..... मरने से पहले श्री महाराणाप्रताप जी ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
16.... श्री महाराणा प्रताप जी का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ मे।
महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी।:---
 आप सब ने महाराणा प्रताप के घोंड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी ने जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में कीया है। वो लिखता है की जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।
आगे अल बदायुनी लिखता है की वो हाथी इतना समजदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था और वो लिखता है की: उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यू बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया तब कही जाके उसे बंदी बना पाये।
अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति। उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का नही तो दाना खाया और ना ही पानी पीया और वो शहीद हो गया।
तब अकबर ने कहा था कि;- जिसके हाथी को मै मेरे सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा।
आरबीआई गवर्नर रहे वाईवी रेड्डी की पुस्तक ADVISE AND DECENT से साभार।
नब्बे के शुरुआती दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को वो दिन भी देखना पड़ा जब भारत जैसे देश को भी अपना सोना विश्व बैंक में गिरवी रखना पड़ा था। सिर्फ 40 करोड़ रुपए के लिए हमे अपना 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था,
ये स्थिति थी इकॉनमी की।
ये वो दौर था जब तबके प्रधान मंत्री #राजीव_गाँधी की #हत्या #लिट्टे के #आतंकियों ने कर दी थी और युवा तुर्क कहे जाने वाले #चन्द्रशेखर तब नये नये प्रधान मंत्री बने थे।
पूरे देश में एक तरह का निराशा भरा माहौल था कोई #रोज़गार नहीं कोई नया #उद्योग_धंधानहीं एक बिजनेस डालने जाओ तो पचास जगह से #एनओसी लेकर आना पड़ता था। लाइसेंस परमिट के उस दौर में चारो तरफ #बेरोज़गारी और हताशा का अलाम था दूसरी तरफ देश में #मंडल और #कमंडल की लड़ाई छिड़ी हुयी थी।
अस्सी से नब्बे के दशक तक देश में #कांग्रेस ने राज किया था उसी दौरान #बोफोर्स_तोपों में #दलाली का मामला सामने आया। गाँधी_परिवार की अथाह लूट ने देश की #अर्थ_व्यवस्था को #रसातल में पंहुचा दिया। उन दिनों भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने अपना सोना विश्व बैंको में गिरवी रखने का फैसला किया।
हालात ये हो गये थे देश कि देश के पास तब केवल 15 दिनों का आयात करने लायक ही पैसा था। स्थिती कितनी भयानक थी इसका अंदाजा आप इस बात से लगा लीजिये की भारत के पास तब केवल 1.1 अरब डालर का ही विदेशी मुद्रा भंडार बचा हुआ था।
तब तत्कालीन प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर के आदेश से भारत ने 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में गिरवी रखा था। ये भी अपने तरह की एक दिलचस्प और भारतीय जनमानस को शर्म सार करने वाली घटना थी।
हुआ यह कि RBI को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में 47 टन सोना पहुंचाना था। ये वो दौर था जब #मोबाइल तो होते नहीं थे और #लैंड_लाइन भी बहुत सीमित मात्रा में हुआ करते थे।
नयी दिल्ली स्थित आरबीआई की बिल्डिंग से 47 टन सोना नयी दिल्ली एयर पोर्ट पर वैनों द्वारा पहुंचाया जाना था वहां से ये सोना इंग्लैंड जाने वाले जहाज पर लादा जाना था। लेकिन नब्बे के दशक में भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था कितनी लचर स्थिति में थी इसका अंदाजा आप
इस बात से लगा लीजिये की 47 टन सोना लेकर जो वैनें महज़ 6 सुरक्षा गार्ड्स के साथ एयर पोर्ट पर भेजी गयी थी उन सभी के टायर आधे रास्ते में ही पंचर हो गये। टायर पंचर होते ही उन 6 सुरक्षा गार्ड्स ने उस 47 टन सोने से भरी वैनों को घेर लिया बड़ी मशक्कत के बाद ये 47 टन सोना इंग्लैंड पहुंचाया गया और तब जाकर ब्रिटेन ने भारत को 40.05 करोड़ रुपये का कर्ज़ दिया।
इस घटना का वर्णन तबके आरबीआई गवर्नर रहे वाईवी रेड्डी ने अपनी पुस्तक ADVISE AND DECENT में किया है।
भारतीय अर्थ व्यवस्था से जुड़ी इस पुरानी और मन को दुखी करने वाले घटना का उदाहरण आपको इसलिये दिया ताकि आपको पता चले सके कि आज ये जो कांग्रेस के बेशर्म नेता #मोदी के ऊपर देश की अर्थ व्यवस्था को चौपट करने का इल्जाम लगाते हैं। उन्हें पता चले की उनके महान गाँधी परिवार की ऐय्याशी की वजह से ही देश को अपना सोना महज़ 40 करोड़ का कर्ज पाने के लिये गिरवी रखना पड़ा था। किसी भी देश के लिये इससे ज्यादा अपमान और शर्म की बात क्या हो सकती है।
बेहद हैरानी और गुस्सा आता है जब देश का सोना महज़ 40 करोड़ रुपये के लिए गिरवी रखने वाले लोग कहते हैं कि मोदी ने भारत की अर्थ व्यवस्था को बर्बाद कर दिया....हकीकत_में_आप_बहुत_बड़े_बेशर्म_हो
भाई आर सी शर्मा उत्कर्ष जी की वॉल से।
संकलित
निष्कलंक सीता की अग्निपरीक्षा ....
 बाईजी को कौन भारतीय राजनीति में स्थापित कर रहा था/है ..?देश को इसका कितना मूल्य चुकाना पड़ रहा था/है ?..शास्त्रीजी की हत्या में क्या इंदिरा/कामराज/KGB की तिकड़ी काम करी थी...?
 एक दृष्टिकोण ये भी
 स्वीडिश पुलिस प्रमुख ने बताया है कि क्वात्रोची को बचाने का हर संभव प्रयास गाँधी परिवार ने किया है।
यह बयान तमाम प्रश्नों को जन्म देता है --..क्या सोनिया, गाँधी परिवार में प्लांट की गयी है?संजय गाँधी, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी की हत्याएं मात्र संयोग है या किसी साजिश का हिस्सा है!?
हम भावुक लोगों ने कभी इस पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया। न कभी सत्ता शिखर पर बैठे लोगों ने इस पर विचार करने दिया। परन्तु अब समय है इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया जाय। इतिहास में अनेको उदाहरण महिलाओं को राज परिवारों में विचार पूर्वक स्थापित कर दूसरे राज्यों ने अपने हित साधन किये हैं। 
गाँधी परिवार की रहस्यमय हत्याएं इस दृष्टि से भी विचार करने की अपेक्षा करती है। पी एम हाउस में चार लोग हैं इंदिरा जी, राजीव जी, सोनिया जी, संजय जी एवं मेनका जी। देश की राजनीति में इंदिरा जी के बाद संजय जी महत्वपूर्ण भूमिका निबाह रहे थे।अकस्मात दुर्घटना में उनकी मृत्यु या उनकी हत्या हो जाती है। अब पी एम हाउस में चार लोग हैं --- तीन स्वदेशी एक विदेशी।
मेनका जी स्वदेशी महिला हैं संजय जी की पत्नी होने से उनका पी एम हाउस पर पकड़ है। उनको निकाल देने के बाद इंदिरा जी, राजीव जी राजनितिक व्यस्तताओं के कारण अधिकतर बाहर रहते हैं और पी एम हाउस पर पूरी पकड़ सोनिया जी की है उनके किसी भी चहेते के लिए पी एम हाउस खुला मैदान है।
इंदिरा जी की हत्या के लिए वह दिन चुना जाता है जिस दिन राजीव जी बाहर हैं। घर में सिर्फ सोनिया जी हैं।
जब किसी हस्ती का साक्षात्कार लिया जाता है तो उसकी विडिओग्राफी काफी प्रारंभ से होती है। जब इंदिरा जी लान की ओर बढ़ रही होगी तो उनकी विडिओग्राफी हो रही होगी। यदि उनके बॉडीगार्ड्स ने उनको गोलियाँ मारी होगी तो उसका विडिओ टेप होगा।उस विडिओ टेप को अदालत में क्यों नहीं पेश किया गया? कहीं वह विडिओग्राफी करने वाले ही तो शार्प शूटर नहीं थे?बॉडीगार्ड्स की हत्या करके इस कहानी को घुमा नहीं दिया गया है।
राजीव जी के रहते हुए सोनिया जी अपने नीति निर्देशकों के स्वार्थो को अमली जमा नहीं पहना सकती।इस लिए पेराम्ब्दुर में राजीव जी की हत्या होती है। क्या प्रियंका का राजीव जी के हत्यारों के प्रति दया का प्रदर्शन इस संदेह की पुष्टि नहीं करता है।
राजीव जी की हत्या के बाद अब सर्वेसर्वा सोनिया जी हैं।
देश में उनकी स्वीकार्यता पर शक है इसलिए यह प्रचार किया जाता है कि राजनीति में उनकी कोई रूचि नहीं लेकिन बहुत चतुराई से उनका महिमा मंडन किया जाता है। हर विदेशी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सोनिया जी से उनके निवास पर भेंट कराई जाती है...जबकि वे किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं हैं....न तो वे नेता विपक्ष हैं, न प्रधानमंत्री हैं तो किस वजह से उनकी भेंटे करवाई जा रही थी? वे सिर्फ एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की विधवा हैं,इस अधिकार से तो गायत्री देवी और ललिता शास्त्री से भी भेंट करनी चाहिए थी।
यदि सोनिया जी की रूचि राजनीति में नहीं थी तो कौन यह कार्य, किसके लाभ के लिए कर रहा था?...क्यों सोनिया जी इंदिरा जी की तरह चलने दिखने का अभ्यास कर रही थी? ...राजनीति में उनकी रूचि नहीं थी तो पहले ही अवसर पर वे राष्ट्रपति के पास फर्जी सूची लेकर क्यों पहुँच गयी?
ये सारे प्रश्न सोनिया जी की भूमिका, उनके संदिग्ध इटालियन संबंधो पर ऊँगली उठा रहे हैं। हमने तो निष्कलंक सीता की अग्निपरीक्षा ली थी....तो फिर देशहित में सोनिया जी की भूमिका की जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए?
इंदिरा जी के भाग्य की अजीब दु:खद विडम्बना ---जिसे राजनीति के लिए तैयार किया वह हवाई जहाज चलाते हुए नहीं रहा, जिसे हवाई जहाज चलाने के लिए तैयार किया वह राजनीति करते हुए नहीं रहा।
Mahesh Sinha26/04/2012