Sunday, 5 October 2014

वीरांगना महारानी दुर्गावती

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सारिणी


गोंडवानाको स्वतंत्र करने हेतु जिसने प्राणांतिक युद्ध किया और जिसके रुधिरकी प्रत्येक बूंदमें गोंडवानाके स्वतंत्रताकी लालसा थी, वह रणरागिनी थी महारानी दुर्गावती । उनका इतिहास हमें नित्य प्रेरणादायी है ।

१. बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावतीका जन्म १० जून, १५२५ को तथा हिंदु कालगणनानुसार आषाढ शुक्ल द्वितीयाको चंदेल राजा कीर्ति सिंह तथा रानी कमलावतीके गर्भसे हुआ । वे बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी थीं । उन्होंने युद्धकलाका प्रशिक्षण भी उसी समय लिया । प्रचाप (बंदूक) भाला, तलवार और धनुष-बाण चलानेमें वह प्रवीण थी । गोंड राज्यके शिल्पकार राजा संग्रामसिंह बहुत शूर तथा पराक्रमी थे । उनके सुपुत्र वीरदलपति सिंहका विवाह रानी दुर्गावतीके साथ वर्ष १५४२ में हुआ । वर्ष १५४१ में राजा संग्राम सिंहका निधन होनेसे राज्यका कार्यकाज वीरदलपति सिंह ही देखते थे । उन दोनोंका वैवाहिक जीवन ७-८ वर्ष अच्छेसे चल रहा था । इसी कालावधिमें उन्हें वीरनारायण सिंह नामक एक सुपुत्र भी हुआ ।

२. रानी दुर्गावतीने गोंड राजवंशवकी बागडोर (लगाम) थाम ली

दलपतशाहकी मृत्यु लगभग १५५० ईसवी सदीमें हुई । उस समय वीर नारायणकी आयु बहुत अल्प होनेके कारण, रानी दुर्गावतीने गोंड राज्यकी बागडोर (लगाम) अपने हाथोंमें थाम ली । अधर कायस्थ एवं मन ठाकुर, इन दो मंत्रियोंने सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूपसे राज्यका प्रशासन चलानेमें रानीकी मदद की । रानीने सिंगौरगढसे अपनी राजधानी चौरागढ स्थानांतरित की । सातपुडा पर्वतसे घिरे इस दुर्गका (किलेका) रणनीतिकी दृष्टिसे बडा महत्त्व था ।
कहा जाता है कि इस कालावधिमें व्यापार बडा फूला-फला । प्रजा संपन्न एवं समृद्ध थी । अपने पतिके पूर्वजोंकी तरह रानीने भी राज्यकी सीमा बढाई तथा बडी कुशलता, उदारता एवं साहसके साथ गोंडवनका राजनैतिक एकीकरण ( गर्‍हा-काटंगा) प्रस्थापित किया । राज्यके २३००० गांवोंमेंसे १२००० गांवोंका व्यवस्थापन उसकी सरकार करती थी । अच्छी तरहसे सुसज्जित सेनामें २०,००० घुडसवार तथा १००० हाथीदलके साध बडी संख्यामें पैदलसेना भी अंतर्भूत थी । रानी दुर्गावतीमें सौंदर्य एवं उदारताका धैर्य एवं
बुद्धिमत्ताका सुंदर संगम था । अपनी प्रजाके सुखके लिए उन्होंने राज्यमें कई काम करवाए तथा अपनी प्रजाका ह्रदय (दिल) जीत लिया । जबलपुरके निकट ‘रानीताल’ नामका भव्य जलाशय बनवाया । उनकी पहलसे प्रेरित होकर उनके अनुयायियोंने चेरीतल का निर्माण किया तथा अधर कायस्थने जबलपुरसे तीन मीलकी दूरीपर अधरतलका निर्माण किया । उन्होंने अपने राज्यमें अध्ययनको भी बढावा दिया ।

३. आक्रमणकारी बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्ध में हराना

राजा दलपतिसिंहके निधनके उपरांत कुछ शत्रुओंकी कुदृष्टि इस समृद्धशाली राज्यपर पडी । मालवाका मांडलिक राजा बाजबहादुरने विचार किया, हम एक दिनमें गोंडवाना अपने अधिकारमें लेंगे । उसने बडी आशासे गोंडवानापर आक्रमण किया; परंतु रानीने उसे पराजित किया । उसका कारण था रानीका संगठन चातुर्य । रानी दुर्गावतीद्वारा बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्धमें हरानेसे उसकी कीर्ति सर्वदूर फैल गई । सम्राट अकबरके कानोंतक जब पहुंची तो वह चकित हो गया । रानीका साहस और पराक्रम देखकर उसके प्रति आदर व्यक्त करनेके लिए अपनी राजसभाके (दरबार) विद्वान `गोमहापात्र’ तथा `नरहरिमहापात्र’को रानीकी राजसभामें भेज दिया । रानीने भी उन्हें आदर तथा पुरस्कार देकर सम्मानित किया । इससे अकबरने सन् १५४० में वीरनारायणसिंहको  राज्यका शासक मानकर स्वीकार किया । इस प्रकारसे शक्तिशाली राज्यसे मित्रता बढने लगी । रानी तलवारकी अपेक्षा बंदूकका प्रयोग अधिक करती थी । बंदूकसे लक्ष साधनेमें वह अधिक दक्ष थी । ‘एक गोली एक बली’, ऐसी उनकी आखेटकी पद्धति थी । रानी दुर्गावती राज्यकार्य संभालनेमें बहुत चतुर, पराक्रमी और दूरदर्शी थी ।

४. अकबरका सेनानी तीन बार रानिसे पराजित

अकबरने वर्ष १५६३ में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानीको (सरदार) गोंडवानापर आक्रमण करने भेज दिया । यह समाचार मिलते ही रानीने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी । सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतोंद्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकोंको सावधान हो जानेकी सूचनाएं भेज दीं । अपनी सेनाकी कुछ टुकडियोंको घने जंगलमें छिपा रखा और शेषको अपने साथ लेकर रानी निकल पडी । रानीने सैनिकोंको मार्गदर्शन किया । एक पर्वतकी तलहटीपर आसफ खान और रानी दुर्गावतीका सामना हुआ । बडे आवेशसे युद्ध हुआ । मुगल सेना विशाल थी । उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे । इस कारण रानीके सैनिक मरने लगे; परंतु इतनेमें जंगलमें छिपी सेनाने अचानक धनुष-बाणसे आक्रमण कर, बाणोंकी वर्षा की । इससे मुगल सेनाको भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावतीने आसफ खानको पराजित किया । आसफ खानने एक वर्षकी अवधिमें ३ बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ ।

५. गोंडवानाकी स्वतंत्रताके लिए आत्मबलिदान देनेवाली रानी

अंतमें वर्ष १५६४ में आसफखानने सिंगारगढपर घेरा डाला; परंतु रानी वहांसे भागनेमें सफल हुई । यह समाचार पाते ही आसफखानने रानीका पीछा किया । पुनः युद्ध आरंभ हो गया । दोनो ओरसे सैनिकोंको भारी क्षति पहुंची । रानी प्राणोंपर खेलकर युद्ध कर रही थीं । इतनेमें रानीके पुत्र वीरनारायण सिंहके अत्यंत घायल होनेका समाचार सुनकर सेनामें भगदड मच गई । सैनिक भागने लगे । रानीके पास केवल ३०० सैनिक थे । उन्हीं सैनिकोंके साथ रानी स्वयं घायल होनेपर भी आसफखानसे शौर्यसे लड रही थी । उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकोंने उसे सुरक्षित स्थानपर चलनेकी विनती की; परंतु रानीने कहा, ‘‘मैं युद्ध भूमि छोडकर नहीं जाऊंगी, इस युद्धमें मुझे विजय अथवा मृत्युमें से एक चाहिए ।” अंतमें घायल तथा थकी हुई अवस्थामें उसने एक सैनिकको पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है; परंतु हमारे शरीरका नख भी शत्रुके हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है । इसलिए आप भालेसे हमें मार दीजिए । हमें वीरमृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानीने स्वयं ही अपनी तलवार गलेपर चला ली ।
वह दिन था २४ जून १५६४ का, इस प्रकार युद्ध भूमिपर गोंडवानाके लिए अर्थात् अपने देशकी स्वतंत्रताके लिए अंतिम क्षणतक वह झूझती रही । गोंडवानापर वर्ष १९४९ से १५६४ अर्थात् १५ वर्ष तक रानी दुर्गावतीका अधिराज्य था, जो मुगलोंने नष्ट किया । इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावतीका अंत हुआ । इस महान वीरांगनाको हमारा शतशः प्रणाम !
  • जिस स्थानपर उन्होंने अपने प्राण त्याग किए, वह स्थान स्वतंत्रता सेनानियोंके लिए निरंतर प्रेरणाका स्रोत रहा है ।
  • उनकी स्मृतिमें १९८३ में मध्यप्रदेश सरकारने जबलपुर विश्वविद्यालयका नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा ।
  • इस बहादुर रानीके नामपर भारत सरकारने २४ जून १९८८ को डाकका टिकट प्रचलित कर (जारी कर) उनके बलिदानको श्रद्धांजली अर्पित की ।

रानी तपस्विनी अर्थात ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजका संयोग

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सारिणी



१. ‘१८५७ के स्वतंत्रता संग्राममें रानी तपस्विनीका विशेष कार्य

रानी तपस्विनी अर्थात झांसीकी रानी लक्ष्मीबाईकी भानजी एवं झांसीके सरदार नारायणरावकी कन्या बाल्यावस्थामें ही वह विधवा हो गई । उनका वास्तविक नाम सुनंदा था । इस विरक्त बालविधवाकी दिनचर्या पूजापाठ, धार्मिक ग्रंथोंका वाचन, देवीकी उपासना इस प्रकारकी थी । जैसे वह संन्यासिनी ही बनी थीं । ऐहिक जीवनमें उन्हें रुचि नहीं थी, तो भी उनकी धार्मिक वृत्ति और विरक्तिके कारण वह प्रजाके आधारका प्रमुख स्रोत बन गयी थीं । गौर वर्णकी, तेजस्वी मुखवाली वे शक्तिकी उपासक ही थीं । वे निरंतर चंडीमाताका नामजप करती रहती थीं । साहस तथा धैर्य वे इन गुणोंकी साक्षात प्रतिमूर्ति थीं । रानी लक्ष्मीबाईके अनुसार ही वे घुडसवारी, अस्त्रशस्त्र चलानेका अभ्यास कर रही थीं । निराशा शब्दके लिए उनके जीवनमें कोई स्थान ही नहीं था । पिताजीकी मृत्युके पश्चात वे उनकी जागीरका (संपत्तिका) कार्यभार उत्तम प्रकारसे संभालने लगीं । उन्होंने पिताजीके दुर्गको दुरुस्त कर दृढ बनाया । नए सैनिकोंकी नियुक्ति की एवं उन्हें सैनिक शिक्षण देना आरंभ किया ।

२. अंग्रेजोंके विरोधमें छुपकर लडीं

अंग्रेजोंके प्रति उनके मनमें अत्यंत तीव्र घृणा थी । इसे कई बार वे अपने वक्तव्यद्वारा प्रकट भी करती थीं । अंग्रेजोंको उनके कार्यकी सूचना मिली थी; अतः उन्होंने उनसे पूछताछ किए बिना नजरबंदीमें रखा । उसकी संन्यासी वृत्ति देखकर अंग्रेज अधिकारियोंको लगा कि यह स्त्री अपने लिए धोकादायक नहीं है; अतएव उन्होंने उसे नजरबंदीसे मुक्त किया । उसके पश्चात नैमिषारण्यमें रहकर वे चंडीमाताकी उपासना एवं साधना करने लगीं । अंग्रेजोंको यह लगा कि वह तो संन्यासिनी ही हो गई हैं; इसलिए वे उनके प्रति निश्चिंत  हो गए । नैमिषारण्यमें लोग निरंतर उनके दर्शन करने हेतु जाते थे । वह उन लोगोंको उपदेश देती थीं और चंडीमाताकी उपासना करनेका सुझाव देती थीं । उस समयसे लोग उन्हें ‘माता तपस्विनी’ कहने लगे ।

३. अंग्रेजोंके विरुद्ध विद्रोह करने हेतु सेनाका प्रबोधन करना

रानी तपस्विनीके नैमिषारण्यके आश्रममें आशीर्वाद हेतु निरंतर लोगोंका आना-जाना रहता था । वे उन्हें उपदेश देती थीं । विश्वसनीय भक्तोंको और अंग्रेजोंकी छावनीमें रहनेवाले अपने देशके सैनिकोंको उन्होंने अंग्रेज शासनके विरुद्ध विद्रोह करनेके लिए प्रवृत्त किया । १८५७ के आरंभसे ‘साधु और संन्यासी’ छावनियोंके चक्कर काटने लगे । वे सैनिकोंको बताने लगे, ‘अंग्रेज लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं । ‘काला निगर’ कहकर तुम्हारा अनादर करते हैं । लुटेरे अंग्रेजोंने अपने देशको कंगाल बनाया । वे आपको अल्प और केवल गोरे सैनिकोंको अधिक वेतन देते हैं । तुम्हें और गोरे सैनिकोंको देशकी आयमेंसे ही वेतन दिया जाता है । उनकी आज्ञाके कारण ही तुमने अपने ही राज्यको डुबोनेके लिए उनकी सहायता की है । यह बात तुम्हारे ध्यानमें क्यों नहीं आती ? छावनीके अपने अधिकांश सैनिक विद्रोह करनेके लिए सिद्ध हुए हैं । अंग्रेजोंने अपना देश हडप लिया है । वे अब अपना धर्म डुबोकर हमें ईसाई बनानेके कार्यमें लगे हैं । क्या तुम्हें ईसाई होना पंसद है ? इसलिए सजग रहें । विद्रोह करनेके लिए सिद्ध रहें ।’ अर्थात रानी तपस्विनीने ही इन साधु-संन्यासियोंको यह सब सिखाया था ।

४. विद्रोहका गुप्त कार्य

१८५७ का स्वतंत्रता युद्ध आंरभ होनेसे पूर्व नानासाहेब, बाळासाहेब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां, रानी तपस्विनीके दर्शनके लिए आए थे । उनके साथ विद्रोहकी चर्चा हुई । अजीमुल्ला खांने साधु सन्यासियोंके माध्यमसे हर छावनीमें विद्रोहके निशान अर्थात लाल कमल भेजनेके लिए सूचित किया । कोई महान आपत्ति आनेवाली है, सेना आनेवाली है, लडाई होनेवाली है, इसकी सूचना गांवगांवमें पहुंचाने हेतु गांवगांवमें रोटियां भेजनेकी प्रथा पहलेसे ही चल रही है । रोटियां भेजकर जनताको विद्रोहके लिए सिद्ध रहनेका संदेश भेजनेका निश्चित हुआ । उसके अनुसार साधु, संन्यासी गांवगांवमें चक्कर काटने लगे । यह कार्य इतनी गुप्त पद्धतिसे चल रहा था कि एक भी अंग्रेज अधिकारीके मनमें इस बातकी आशंका नहीं हुई ।
निश्चित दिनांकसे पूर्व ही विद्रोह हुआ । रानी तपस्विनीके प्रभावके कारण गांवगांवके लोग विद्रोहमें सहभागी हुए । अंग्रेजोंके आधुनिक अस्त्रशस्त्रोंके कारण और देशका कोष (खजाना) भी उनके ही अधिकारमें होनेके कारण उन्होंने यह विद्रोह जोर पकडने नहीं दिया और जनताको अपनी क्रूरताका प्रदर्शन दिखाकर उनमें आतंक फैलाया । रानी तेजस्विनीके ध्यानमें आया था कि अंग्रेजोंके साथ युद्ध करनेसे कोई भी लाभ नहीं होगा । अपने देशके राजा-महाराजा अंग्रेजोंके सामने विवश होकर एवं द्रव्यलोलुपताके कारण विश्वासघात कर रहे हैं; इसलिए युद्ध कर यश प्राप्त करना कठिन है । वह नानासाहबके साथ नेपाल गई । नेपालके राजा जंगबहादुर अंग्रेजोंका मित्र थे । नेपालमें भी प्रवचनद्वारा उन्होंने स्वतंत्रताका महत्त्व समझा दिया । उस विवश राजाके राज्यमें रहना उन्हें अच्छा नहीं लगा । वहांसे वह दरभंगा और कोलकाताकी ओर गर्इं ।

५. वृद्धावस्थाके कारण थकान आनेपर भी बंगालके

विभाजन हेतु किए जानेवाले आंदोलनमें रानी तपस्विनीका सहभाग

रानीने कोलकातामें ‘महाभक्ति पाठशाला’ आरंभ की । लोकमान्य तिलकने वहां रानी तपस्विनीसे भेंट की । ‘केसरी’के उपसंपादक खाडिलकर भी उनके साथ थे । नेपालमें अस्त्र शस्त्रोंका कारखाना गुप्त रीतिसे आरंभ करनेका आयोजन खाडिलकरका था । नेपालके सेनापति समशेरजंगके साथ रानीकी पहचान थी । रानीकी पहचानके कारण नेपालमें बाह्यतः टाईल्स निर्मितिका कारखाना था, परंतु वास्तवमें वहां अस्त्र शस्त्रोंकी निर्मिति होती थी । वे शस्त्र बंगालकी ओर भेजे जाते थे । विश्वासघातके कारण खाडिलकर पकडे गए । बुद्धिमानीसे उन्होंने अपना छुटकारा कर लिया और वे लौटकर महाराष्ट्र आ गए । अपने ही लोगोंकी ओरसे क्रांतिका प्रयास निष्फल किया जा रहा है, यह रानी तपस्विनीको अच्छा नहीं लगा । अपने देशको परमेश्वरका शाप ही है, यह सोचकर वह उदास हुई; तो भी रानी तपस्विनीने वृद्धावस्थाके कारण थकान आनेपर भी बंगालके विभाजन हेतु किए जानेवाले आंदोलनमें सहभाग लिया । अंतमें वर्ष १९०५ में भारतकी इस महान विदुषी एवं क्रांतिकारिनीकी मृत्यु कोलकत्तामें हुई । महाराष्ट्रकी इस महान कन्याको महाराष्ट्र ही विस्मरण कर जाए, इस बातका अत्यंत खेद होता है । उनके जीवनके विषयमें संशोधन करनेकी आवश्यकता है ।’
(संदर्भ : महान भारतीय क्रांतिकारी, प्रथम पर्व १७७० से १९००, लेखक : श्री. स.ध. झांबरे, (महाराष्ट्र राज्य साहित्य एवं संस्कृति मंडल, मुंबई)) (समाचारपत्रिका सनातन प्रभात, ज्येष्ठ अमावास्या, कलियुग वर्ष ५११२ (११.७.२०१०))

राजमाता जिजाबाई : छत्रपति शिवाजी महाराजकी प्रेरणास्रोत

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हिंदू जनजागृति समिति राजमाता जिजाबाईको प्रणाम करती है, जो इस शताब्दीके सबसे महान राजा छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रेरणास्रोत थीं ।

 राजमाता जिजाबाई छत्रपति शिवाजी महाराजके साथ
एक घडेका आकार, पुष्टि (मजबूती) तथा उसके लक्षण पूर्णतया बनानेवालेके हुनर एवं सृजनशीलतापर निर्भर करता है ।
उसी प्रकार शिवाजी राजेका भरण-पोषण ‘हिंदवी स्वराज’ स्थापनाकी आड आनेवाले शत्रुओंके विरुद्ध लडनेकी दृष्टिसे किया गया था ।
सिंदखेड गांवमें म्हाकसाबाई तथा लखुजी जाधवके यहां जिजाऊका जनम हुआ । जैसे जैसे वे बडी होती गर्इं, मुगलोंद्वारा हिंदुओंका किया जा रहा शोषण उनकी समझमें आता गया ।
छोटी आयुकी लडकियां जहा गुडियोंके साथ खेला करती हैं, जिजाऊ तलवारबाजी सीखनेमें व्यस्त थीं । बहादुरी एवं वीरताकी कथाएं सुनाकर जिजाऊकी माताजीने उनमें साहसकी वृद्धि की ।
उस समय देशकी स्थिति ऐसी थी कि मुगल शासनकर्ताओंकी सेवा करने तथा अपने शत्रुके (अर्थात मुगलोंके) आधिपत्ययमें स्थानीय सरदार बनने हेतु उनकी चापलूसी कर अपनेही लोगोंको लूटना आम बात थी । मुसलमान हिंदु स्त्रियोंपर आक्रमण कर उनकी नीलामी करते थे । सारा समाज एक मूक दर्शक बनकर रह गया था । किसान केवल मुगलों हेतु खेतोंमें खाली पेट मेहनत करते थे । जिजाऊ एक ऐसे व्यक्तिकी तलाशमें थीं, जो इस अन्यायके विरुद्ध लड सके ।
खिस्ताब्द १६०५ में जिजाऊका विवाह शहाजी राजे भोसलेके साथ हो गया । अंतमें उन्हें प्रार्थनाद्वारा राहत मिल गई; उन्होंने भवानी मातासे पराक्रमी, तेजस्वी, कुशल तथा ‘स्वराज्य’ स्थापनाकी प्रचुर क्षमता रखनेवाले पुत्र प्राप्तिकी प्रार्थना की ।
शहाजी राजेसे विवाहके पश्चात जिजाऊके ध्यानमें आया कि आदिलशाह तथा निजामशाह जैसे मुगल शासनकर्ता उनके पतिको नीचा दिखाते हैं । वे जान गर्इं कि उनके पति सामर्थ्यवान होनेके पश्चात भी उनकी कोई पहचान एवं सुरक्षा नहीं थी तथा अपने समाज हेतु उनका कोई लाभ नहीं हो रहा था ।
संपूर्ण मानवजातिके इतिहासमें एकमात्र जिजाऊका उदाहरण होगा, जिसने अपने बच्चेका भविष्य उसके जनमके पूर्व ही निश्चित कर लिया था ।
भवानी माताने जिजाउकी मनोकामना पूरी की; अपनी भूमिपर होनेवाले आक्रमण, धर्म तथा मंदिरोंका टूट जाना; मुगल, आदिलशाह एवं निजामशाह जैसे यवनोंद्वारा मूर्तियोंकी तोड-फोड करना आदि दुखोंमें वह जैसे जिजाऊके साथ थीं । जिजाऊ तथा भवानी देवीने हिंदू स्वराजका एक ही सपना देखा ।
जिजाऊने शिवाजीको अन्यायके विरुद्ध लडकर लोगोंको तानाशाहीसे मुक्त कराने हेतु राजा राम, कृष्ण तथा भीमकी कथाएं सुनार्इं । इन कथाओंने शिवाजी राजेको सिखाया कि स्वराज ही उनके जीवनका एकमात्र उद्देश्य था ।
जिजाऊने अपने पुत्र शिवाजी राजेको राजनीति सिखाई तथा समानताका न्याय, साहस, पराक्रम तथा अन्याय करनेवालोंको कठोर दंड देने जैसे विषयोंमें उनकी मानसिकता सिद्ध की । उन्हें अलगअलग शस्त्रास्त्रोंके लिए दिए जानेवाले प्रशिक्षणकी निगरानी वह स्वयं करती थीं । इस प्रकारका कठोर तथा उचित मार्गदर्शन प्रत्यक्ष अपनी माता जिजाऊसे प्राप्त करनेके कारण ही शिवाजी राजे अपने आपको चमत्कारपूर्ण घटनाओंसे, जैसे शहाजी राजेकी कैद, अफजलखानकी हार तथा आगरासे पलायन आदिसे सुरक्षित बाहर ला सके ।
जिजाऊने एक स्नेहपूर्ण तथा ममतामयी माताकी भूमिकाके साथ जीवनको दिशा देनेवाले एवं ध्येय निश्चित करनेवाले पिताकी भूमिका भी उनकी अनुपस्थितिमें पूरे उत्तरदायित्वके साथ निभाई ।
केवल जिजाऊके प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शनके कारण ही शिवाजी राजे सदियोंसे चल रहा मुगल साम्राज्यको पराभूत कर हिंदवी स्वराज्यकी स्थापना कर सके ।
अपने पुत्र छत्रपति शिवाजी राजेके राज्याभिषेकतक जिजाऊ अपने पतिकी अनुपस्थितिमें हिंदवी स्वराज्यके विकास तथा विस्तार हेतु प्यारसे उत्तेजना देती रहीं । १७ जून १६७४ को राज्याभिषेकके ठीक १२ दिन पश्चात वे स्वर्गलोगकी यात्रापर निकल गर्इं । रायगढ किलेकी तलहटीमें पाचड गांवमें उनकी समाधि है ।

पराक्रमी, धैर्यशील ‘स्वतंत्रता प्रेमी वीरांगना अवंतिबाई लोधी’

१. ‘स्वतंत्रता प्रेमी वीरांगना अवंतिबाई लोधीका जन्म एवं बचपन

अवंतिबाई लोधी एक पराक्रमी, धैर्यशील एवं प्रत्युत्पन्नमति स्त्री थीं । मध्यप्रदेशके सिवनी नामक जनपदमें राव जुंझारुसिंहके राजमहलमें १६ अगस्त १८३१ के दिन अवंतिबाईका जन्म हुआ । उनका नाम मोहिनी रखा गया था । बचपनसे ही अश्वसंचालन, खड्गसंचालन, तीरंदाजी (धनुर्विद्या), सैनिक शिक्षण इत्यादि वीरता हेतु आवश्यक सभी विद्याओंमें उन्हें अत्यंत रुचि थी ।

२. शौर्यकी प्रतिमा रानी अवंतिबाईद्वारा राज्यकी धुरी संभालते

हुए अपने साहस, धैर्य एवं समाहितत्व जैसी सुयोग्यताका परिचय कर देना

१७ वें वर्षमें मोहिनीका विवाह रायगढके महाराजा लक्ष्मणसिंहके सुपुत्र कुंवर विक्रमादित्यके साथ हुआ । विवाहके पश्चात उनका नाम अवंति रखा गया । महाराजा लक्ष्मणसिंहकी मृत्युके पश्चात विक्रमादित्य रायगढके राजा बने । विक्रमादित्य ईश्वरभक्त, धार्मिक प्रवृत्तिके एवं वेदपठन करनेवाले थे । आगे अवंतिबाईने अमानसिंह और शेरसिंह नामक दो सुंदर एवं मनमोहक पुत्रोंको जन्म दिया । कुछ वर्षके उपरांत राजा विक्रमादित्य अस्वस्थ रहने लगे और उसीमें उनका मानसिक संतुलन भी बिगड गया । ऐसी परिस्थितिमें शौर्यमूर्ति रानी अवंतिबाईने राज्यकी धुरी संभालते हुए अपने साहस, धैर्य एवं समाहितत्व जैसी सुयोग्यताका परिचय दिया ।

३. प्रतिकूल कालमें भी अपने गुणोंके कारण

रानी अवंतिबाईने सफलता पाकर परिस्थितिको मात किया

१८५१ को अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनीने राजा विक्रमादित्यसिंहको पागल घोषित कर, वहां अपना एक सेनादल रखकर, रायगढका राज्य अपने अधिकारमें लेनेकी इच्छा प्रदर्शित की । कंपनी सरकारका यह षडयंत्र ध्यानमें आते ही, वैसी स्थितिमें भी रानी अवंतिबाईने निर्भीकतासे, समाहितत्व रखकर अपने शारीरिक एवं मानसिक रुग्णाईत पति एवं अल्पवयीन उत्तराधिकारी पुत्रोंकी सहायता ली । रायगढ शासनकी धुरी सुयोग्य एवं व्यवस्थित रूपसे संभालनेका प्रयास किया और बडी कुशलताके साथ शासनका कार्यभार संभालकर राज्य अधिकारमें लेनेके अंग्रेज शासनके उद्देश्यको झटका दिया ।

४. पतिकी मृत्युके पश्चात भी प्रजाका मन जीतकर

अपना राज्य अधिकसे अधिक विस्तृत करनेवाली कर्तव्यनिष्ठ स्त्री

१८५७ के मईमें राजा विक्रमादित्यकी मृत्यु हुई; किंतु पतिकी मृत्युके पश्चात भी दुःखसे विचलित होनेकी अपेक्षा रानीने धैर्यसे पूरे राज्यमें भ्रमण किया । जनताके सुखदुःखमें सहभागी होकर प्रजाका मन जीतकर उन्होंने रायगढका अपना राज्य अधिकसे अधिक विस्तृत किया । उसके राज्यका क्षेत्रफल ४००० वर्गमीटर इतना था । उसमें मंडला, हिंडोर, सोहागपुर, अमरकंटक इत्यादि जनपद एवं अन्य भूभाग अंतर्भूत थे ।
भविष्यमें नानासाहेब पेशवाके नेतृत्वतले छेडे गए स्वतंत्रता संग्राममें जिस धैर्य एवं चतुराई जैसे गुणोंद्वारा अपना विस्तृत राज्य कंपनी सरकारके हाथोंसे बचाकर एवं संभालकर कैसे रख सकते हैं, इसके विषयमें उनके गुणोंकी स्तुति करते हुए अंग्रेज सेनापति (कप्तान) वाडिंग्टन कहता है, ‘१८५७ के स्वतंत्रता संग्राममें रायगढके राज्यकी सुरक्षा इतनी सुचारु रूपसे रखी थी कि लंबी अवधितक उसके आसपास सेनाका घेरा डालकर भी हमें उसे जीतना असंभव हुआ था ।’

५. अपने अनुसार आसपासके जागीरदार एवं

देशी नरेशोंको सजग कर प्रेरित करनेवाली धैर्यवान रानी

रानी अवंतिबाईको यह ज्ञात था कि आज नहीं तो कल यह अंग्रेज सरकार अपने ही समाजके देशद्रोही दगाबाजोंकी सहायता लेकर हमें जीविकाकी खोजमें दरदर भिक्षा मांगनेके लिए विवश करेगी अथवा हमारे प्राण लेकर हमारा राज्य अपने अधिकारमें लेगी । ऐसा नहीं हो, अतएव कार्यरत रहना चाहिए, यह जानकर उन्होंने अपने आसपासकी राजभूमि अधिकारियोंको (जागीरदारोंको), छोटे-मोटे राजाओंको अपने हाथोंसे पत्र एवं कंगन भेजकर स्वतंत्रताके लिए सजग रहनेका संदेश दिया । इसके पीछे यह उद्देश्य था कि स्वतंत्रता चिरंतन रहे, ऐसी जिनकी इच्छा नहीं है, वे हाथोंमें यह कंगन पहनकर अंग्रेज सरकारकी दासता स्वीकार करें !

६. रानी अवंतिबाईद्वारा समर्थनीय रूपसे क्रांतिका

नेतृत्त्व स्वीकार कर अपने गुणोंके कारण लोकप्रियता प्राप्त करना

नियोजनके अनुसार अंग्रेजोंके विरोधमें स्वतंत्रता संग्राम आरंभ किया गया और वह सफल भी हुआ था; परंतु ‘कुल्हाडीका दस्ता अपने गोतका नाश करता है’ नामक कहावतके अनुसार कुछ शिंदे, होलकर जैसे भारतीय संस्थानोंके अधिपति अंग्रेजोंमें जुड गए, वैसे सफलता प्राप्त करनेवाले इस स्वतंत्रता संग्राममें रुकावट आने लगी । यशके कारण अंग्रेजोंका पल्ला भारी हुआ; किंतु रानी अवंतिबाई हतोत्साहित नहीं हुर्इं । उन्होंने अपने राज्यमेंसे अंग्रेजोंद्वारा नियुक्त ‘कोर्ट ऑफ वार्डस्’के अधिकारियोंको बाहर निकाल दिया और अपने राज्यकी सुरक्षाका उत्तरदायित्व स्वयंके ऊपर लेकर क्रांतिका भी नेतृत्व स्वीकार किया । भारतमाताकी स्वतंत्रताके लिए आसपासके सभी क्षेत्रोंमें रहनेवाली जनताको प्रेरित किया । उन्होंने अपने प्राणोंकी भी चिंता नहीं की । उनकी लोकप्रियता इतनी बढने लगी कि उनकी सुरक्षाके लिए स्वयंके प्राणोंकी आहुति देनेके लिए भी लोग तैयार थे ।

७. अपनी तलवारद्वारा शौर्यकी पराकाष्ठा करनेवाली रानीपर

उनकी ही सेनाके एक धोखेबाजने पीछेसे तलवारका वार कर उन्हें यमपुरी पहुंचाया

उस समय उस क्षेत्रका नेतृत्व जबलपुरकी ५२ वीं पलटनके अधिकारी कैप्टेन वाडिंग्टनके हाथोंमें था । अंग्रेज सेना और स्वतंत्रता प्रिय क्रांतिकारियोंके मध्य मंडला नामक क्षेत्रके पास खैरी गांवके निकट बेधुंद युद्ध आरंभ हुआ । रानी अवंतिबाईकी क्रांतिकारी सेनाके आवेशके सामने अंग्रेज परास्त हुए । वाडिंग्टन २३ नवंबर १८५७ को रणक्षेत्र छोडकर लौट गया; परंतु वह दिवा नरेशकी सहायता एवं प्रचुर सेना लेकर लौट आया । रानीपर उसने आक्रमण किया । घनघोर युद्ध हुआ । शत्रुको परास्त करने हेतु तोपखाना बिखर गया, बंदूकें निस्तेज हो गर्इं और तलवारें दमकने लगी । रानी अवंतिबाई तलवारके साथ वाडिंग्टनपर टूट पडीं; परंतु उनकी ही सेनाके एक धोखेबाजने उनपर पीछेसे तलवारका वार किया । स्वतंत्रता प्राप्तिके लिए स्वकर्तव्य निभाते हुए उन्हें रणांगणमें ही यमपुरी भेजा गया । ऐसेही धोखेबाजोंके कारण इस देशकी स्वतंत्रता मिट्टीमें मिली है, यह बात कभी भी भूलना असंभव है । भारतीय शौर्यसे भरा इतिहास ऐसे ही देशद्रोही धोखेबाजोंके कारण अधूरा रहा, तो देशप्रेमी, स्वतंत्रतावीर, क्रांतिवीर एवं क्रांतिदेवी अवंतिबाई जैसी नारियोंने वह ‘यावश्चंद्र दिवाकरौ’ प्रकाशमान किया ।’
– श्री वसंत अण्णाजी वैद्य, नागपुर (संदर्भ : मासिक ललना, अगस्त २०१०)

अंग्रेजों की भूमि में रहकर भारत की स्वातंत्रता हेतु कार्यरत निर्भय क्रांतिकारी पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा

वर्तमान की दृष्टि से तुलना करें, तो स्वातंत्र्यपूर्व काल बडा भाग्यशाली था; क्योंकि उस समय युवकों के समक्ष स्वराज्य का तेजस्वी ध्येय था तथा उस ध्येयपथ पर अग्रसर होते हुए कठिनाइयों का सामना करनेमें प्राप्त होनेवाला आनंद अवर्णनीय था । जीवनमें ऐसा कुछ अलौकिक था तथा उस हेतु उस कालके युवकोंको कठोर परिश्रम करनेका अवसर प्राप्त होता था । जीवन सार्थक होनेका समाधान उन्हें मिलता था । स्वतंत्रताके यज्ञमें अनेक समिधाएं अर्पण होती हैं, हम भी उनमेंसे एक हैं, इसका आनंद उन्हें प्राप्त होता था । ऐसे प्रयत्न करनेवाले इस देशमें बहुत थे; किंतु शत्रुके घरमें रहकर भी स्वतंत्रता हेतु प्रयत्न करनेवाले कुछ गिनेचुने ही निर्भय क्रांतिकारी थे और पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा उनमेंसे ही एक थे ।

१. पाश्चात्त्योंका यह कहना कि भारतीयोंको लेखनकला
पता नहीं होनेकी बातको प्रमाणसमेत झूठ सिद्ध करनेवाले पंडितजी !

शिक्षा प्राप्त करने हेतु पंडितजीको छोटी आयुमें ही लोगोंके घर कपडे धोने तथा पानी भरनेका काम भी करना पडा । विद्यार्थीदशामें वे स्वामी दयानंद सरस्वतीजीके संपर्कमें आए तथा उससे उनके जीवनको उचित दिशा प्राप्त हुई । इसी कालमें उन्होंने संस्कृतपर प्रभुत्व प्राप्त किया । उसके पश्चात वे कुछ काल ब्रिटेनके ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालयमें संस्कृतके अध्यापकके पदपर कार्यरत रहे । लेखनकला तथा लिपि भारतीयोंने परायोंसे ग्रहण की, पाश्चात्योंका ऐसा ही अभिप्राय था । वेदोंपर आधारित प्रमाणानुसार वेदकालीन भारतीयोंको लेखनकला एवं लिपिका ज्ञान था, पंडितजीने इसे प्रत्यक्ष प्रमाण देकर सिद्ध किया । उनकेद्वारा प्रस्तुत निबंधके कारण विदेशमें उनकी बडी प्रशंसा हुई । जर्मनीद्वारा उन्हें ‘पंडित’उपाधि प्रदान की गई, एवं ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालयद्वारा उन्हें ‘एम. ए.’ उपाधि अर्पण की गई । इसके पश्चात वे भारत आए; किंतु पुन: उन्हें वैयक्तिक कार्य हेतु ब्रिटेन जाना पडा । अपना देश परतंत्र है, इस विचारसे वे व्यथित रहते थे । ब्रिटेनके स्वतंत्र वातावरणमें भारतकी स्वतंत्रताके विषयमें अपने अभिप्राय अधिक आत्मविश्वाससे प्रस्तुत कर सकेंगे, यह ध्यानमें आनेपर उन्होंने वहींपर निवास करनेका निश्चय किया ।

२. अंग्रेजोंकी भूिममें स्थापित ‘इंडिया हाउस’
बना सशस्त्र क्रांतिकारियों आश्रयस्थान (मायका) !

पंडितजीने ‘ होमरूल सोसाइटी ’ एवं  `इंडियन सोशिओलॉजिस्ट’ ये दो पत्रिकाएं आरंभ कीं । इन पत्रिकाओंमें ब्रिटिश साम्राज्यपर आलोचना की जाती थी । ब्रिटेनमें पढाईके उद्देश्यसे आनेवाले भारतीय युवकों हेतु उन्होंने `इंडिया हाउस’ नामके निवासस्थानकी स्थापना की । वहां भारतीय युवकोंके रहने तथा खानेकी सुविधा की गई थी । यहां क्रांतिकारियोंकी कार्रवाई चलती थी । आगे चलकर अंग्रेजोंको इंडिया हाउसका इतना भय बैठ गया कि किसी वाचनालयमें किसी भारतीयने इंडिया हाउसका पता पूछा तो, तुम क्रांतिकारी होगे ही, अंग्रेज ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे ।

३. ब्रिटेनमें पढनेवाले भारतीय विद्यार्थियोंको
छात्रवृत्तिके माध्यमसे, तो भारतमें स्वतंत्रता हेतु कार्य
करनेवाले राष्ट्रप्रेमियोंको आर्थिकसहायता करनेवाले राष्ट्रप्रेमी पंडितजी !

पंडितजीने ब्रिटेनमें पढने हेतु आए भारतीय विद्यार्थियोंको महान भारतीय पुरुषोंके नामसे छात्रवृत्ति देना चालू किया । इन्हीं छात्रवृत्तियोंमेंसे स्वातंत्र्यवीर सावरकरजीको शिवाजी छात्रवृत्ति प्राप्त हुई । उन्होंने इस छात्रवृत्तिका सम्मान बढाया । ब्रिटेनमें रहते समय स्वातंत्र्यवीर सावरकरजीका निवास इंडिया हाउसमें था ।
भारतको स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हो, इस सूत्रका जितना महत्त्व था, उतना ही स्वतंत्रता प्राप्तिके पश्चात स्वराज्यकी रचना कैसे करें, यह सूत्र भी पंडितजीको महत्त्वपूर्ण लगा । अत: इस विषयपर विद्वत्तापूर्ण निबंध लिखनेवालेको भी उन्होंने पारितोषक घोषित किया था । भारतके कोनेकोनेसे स्वतंत्रता हेतु कार्य करनेवालोंकी वे आर्थिक सहायता करते थे ।

४. अंग्रेजोंके चंगुलसे निकलकर ब्रिटेनसे पलायन करनेवाले तथा अंततक
विदेशमें निवास कर भारतकी स्वतंत्रता हेतु समर्पित होकर कार्य करनेवाले पंडितजी !

पंडितजीने स्वातंत्र्यवीर सावरकरजीद्वारा आरंभ किए गए अभिनव भारत संगठनके कार्यकी पहचान करवा ली तथा वे अभिनव भारतके कट्टर समर्थक बन गए । तदुपरांत उन्होंने प्रकट रूपसे इस संगठनकी मदद करना आरंभ किया । स्वराज्यके विषयमें पं. श्यामजीका कार्य अंग्रेजोंकी दिृष्टसे छुपा  नहीं रह सका । अंग्रेज शासन कार्यवाही करेगा, यह ध्यानमें आनेपर पंडितजीने स्वयंको सबकी दिृष्टसे बचाकर पेरिस प्रयाण किया । वे पेरिस पहुंचें इससे पूर्व ही ब्रिटेनके अधिकोषमें जमा उनका सारा धन फ्रान्सके अधिकोषमें जमा हो चुका था । अत: उनकी उपाधियां वापस लेनेके अतिरिक्त अंग्रेज उनके विरोधमें कोई भी कार्यवाही नहीं कर सके । महायुद्ध आरंभ होनेपर फ्रान्समें रहना भी उन्हें धोखादायी लगा, अत: उन्होंने स्विटजरलैंड प्रयाण किया ।
स्वतंत्रता हेतु अंततक कार्य करनेवाले पंडित श्यामजी कृष्ण वर्माजीने ३० मार्च १९३० को अंतिम सांस ली । (स्वतंत्रतायुद्धके अमर क्रांतिकारी, संकलक : वि.द. कयाळ)

पेट में कीड़े 

कई बार किन्ही कारणों से पेट में कीड़े हो जाते हैं जिनसे काफी पीड़ा होती है | पेट में पाए जाने वाले कीड़ों के सामान्य लक्षण है --- सोते हुए दाँत पीसना ,शरीर का रंग पीला या काला होना , भोजन से अरुचि , होंठ सफ़ेद होना , शरीर में सूजन होना आदि | तो आइए जानते हैं इनसे छुटकारा पाने के कुछ सरल उपाय :-----

1-अनार के छिलकों को सुखाकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण दिन में तीन बार एक -एक चम्मच लें , इससे पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं |

2 -टमाटर को काटकर ,उसमें सेंधा नमक और कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करें | इस प्रयोग से पेट के कीड़े मर कर गुदामार्ग से बाहर निकल जाते हैं |

3-लहसुन की चटनी बनाकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर सुबह -शाम खाने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं |

4 -नीम के पत्तों का रस शहद में मिलकर पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं |

5 -कच्चे केले की सब्ज़ी 7 -8 दिन तक लगातार सेवन करने से पेट के कीड़े मर जाते हैं |

6 -तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस दिन में दो बार पीने से पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं |

7 - अजवायन का 1-2 ग्राम चूर्ण छाछ के साथ पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं | यदि छोटे बच्चों के पेट में कीड़े हो गए हों तो आप उन्हें लगभग आधा ग्राम काला नमक व आधा ग्राम अजवायन का चूर्ण मिलकर सोते समय गुनगुने पानी से दें लाभ होगा |

राजस्थान : जयपुर की प्रयोगशाला में चौकाने वाला खुलासा, ७ में ६ कोल्डड्रिंक्स जानलेवा

जयपुर (राजस्थान) - सेठी कॉलोनी स्थित जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला में कोल्ड ड्रिंक्स की जांच रिपोर्ट में चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने कोल्ड ड्रिंक्स की जांच के लिए अजमेर रोड़ स्थित बी.एस.ट्रेडर्स डिपो पर लहर, स्लाइस, ७ अप आदि ब्रांड के पांच सेंपल लिए थे। जांच में यह सभी सेंपल अनसेफ पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट में स्टेफाइलोकॉकस बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े एवं पॉलीथीन के टुकड़े मिले हैं।
एसएमएस अस्पताल के मेडिसन विभाग के डॉ. रमन शर्मा के अनुसार कोल्ड ड्रिंक्स में स्टेफाइलोकॉकस बैक्टीरिया से फूड पॉइजनिंग तथा ज्यादा टॉक्सिन होने पर शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।
कोर्ट में दर्ज होगा मामला
सीएमएचओ जयपुर प्रथम डॉ.ओ.पी. ठाकन ने बताया कि अजमेर रोड बाईपास स्थित बी.एस. ट्रेडर्स डिपो से लिए गए पांचों सैंपल अनसेफ मिले हैं। संबंधित फर्म के खिलाफ कोर्ट में मामला दर्ज कराया जाएगा। इसके अलावा जनता कॉलोनी के मैसर्स गुड़िया एंटरप्राइजेज के यहां से लिए दो सैंपलों में एक अनसेफ व एक सब स्टेंडर्ड मिलने पर नोटिस दिया जाएगा।
आगे क्या ?
खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम २००६ एवं नियम २०११ के अंतर्गत किसी भी सैंपल के अनसेफ पाए जाने पर संबंधित फर्मों को नोटिस तथा अनुसंधान पूर्ण होने पर विभाग की ओर से प्रकरणों में इस्तगासा दायर किया जाता है।
स्त्रोत : दैनिक भास्कर