Friday, 2 February 2018

 कुछ जादा टेक्स देने पर भी मुझे दर्द काहे नहीं होता है .....?.
क्योकि मुझे पता है कि ..............
जब भारत ने शांतिकाल में पहली बार पाकिस्तान के अन्दर घुस के मिलिट्री कार्यवाही की तो उसमे खर्च हुए सैकड़ो करोड़ रुपयों में एक बहुत छोटा सा अंश मेरे परिवार का भी था
जब भूटान की सीमा पर भारत चीन की आँख में आँखे डाल के खडा था .उस दौर में सैकड़ो करोड़ रूपये खर्च करके भारत जो मिलिट्री ढांचा खडा कर रहा था . देश की छावनियो से जब भारतीय सेनाओं के संसाधन ट्रेन , सड़क या वायु मार्ग से डोक्लाम में पहुंचाए जा रहे थे तो उसमे लगे डीजल में भी एक नन्हा का अंश मेरे परिवार का भी था .
जब भारत सरकार ने पाकिस्तान सीमा पर यह निर्णय लिया था की पाकिस्तान की तरफ से आने वाले एक फायर के बदले भारत 10 फायर का अनुपात रक्खेगा तो उस बारूद में ............एक नन्हा सा अंशदान मेरे परिवार का भी है
जब भारत सरकार ने पिछले 45 वर्ष से पेंशन में कमी और विसंगति झेल रही भारतीय सेनाओं को वन रैंक वन पेंशन की सुविधा दी तो उसके एक नन्हा सा अंशदान मेरे समाज का भी था ..........
पिछले 70 वर्षो बुलेट प्रूफ हैलमेट और जैकेट की कमी झेल रही सेनाओं के लिए जब सरकार ने बुलेट प्रूफ हैलमेट और जैकेट के टेंडर जारी किये तो उस खरीद में एक नन्हा सा अंश मेरे समाज का भी होगा ...
जब भारत ने श्री लंका में चीन समर्थक नेता को चुनाव हराने में कूटनीतिक मिशन में खर्चा किया तो उस खर्चे में एक सूक्षम अंश मेरे समाज का भी था ...
जब भारत ने मिलिट्री जासूसी के लिए उपग्रह लांच किये या इजरायल से किराए पर लिए , जब अफगानिस्तान में पाकिस्तान को न्यूट्रल करने के लिए भारत ने करोडो का खर्चा किया , जब अफगानिस्तान में संपर्क के लिए पाकिस्तान पर निर्भरता ख़त्म करने के लिए सरकार ने ईरान में पोर्ट बनाया , जब भारत के चारो तरफ के देशो में भारत ने मिलिट्री स्टेशन बनाये , जब भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर मिलिट्री सौदे अंजाम दिए , जब भारत में गरीबो के लिए तमाम कागजी नहीं जमीनी योजनाये शुरू की तो उन योजनाओं में भी एक अति सूक्षम हिस्सा मेरे परिवार तथा समाज का है
बहुत लम्बी लिस्ट है ऐसे देश हित के कार्यो की ....................... मुझे इसलिए भी दर्द महसूस नही हुआ क्योकि मेरे परिवार द्वारा दिए टैक्स के पैसे किसी घोटाले में नहीं बर्वाद हुए .............अपने लिए जीना अपने परिवार के लिए ही जीना .खाना पीना , हग देना .....अपनी निजी जरूरतों तक सोचने का काम जो जानवर भी कर लेते है ....मुझे गर्व है की हम इंसान है .............................इंसान है हम !!!#पवनअवस्थी

Thursday, 1 February 2018

जब आप भारत के आईन की बुराई करते हैं तो इसे किसी से कम्पेयर भी तो कर के देखिए कि हम किनके मुकाबले बेहतर या बदतर हैं। हमारे साथ ही हमारा ही टुकड़ा पाकिस्तान भी आजाद हुआ था। उसकी हालत देखिए आज। मजहब के नाम पर बने मुल्क में 1954 तक गणतंत्र दिवस मनाया गया फिर वही पाकिस्तान दिवस हो गया क्योंकि वहां गण का, मने लोक का तंत्र रहा ही नहीं। हमारे यहां पहले दिन से यह तय था कि हम चुनाव करवाएंगे, सरकार जनता चुनेगी, एक सुदृढ न्यायपालिका होगी, मीडिया स्वतंत्र होगी। और यह सब कुछ ही दिनों में हो गया। भले ही आजादी के कई सालों तक एक ही पार्टी ने राज किया पर उसे राज करने का अधिकार यहां की जनता ने दिया। यहां के आम चुनाव अनडाक्युमेंटेड वंडर हैं क्योंकि इतने बड़े देश में चुनाव करवाना हँसी खेल नहीं।

पाकिस्तान तो चलो बकवास देश है। कम्पेयर करते हैं यूरोप के समृद्ध देशों से। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि क्राइम के मामले में हम उनसे कहीं बेहतर हैं। माना कि अपराध की संख्या ज्यादा है क्योंकि हम खुद बहुत ज्यादा हैं। अनुपात देखें तो हम कई यूरोपियन मुल्कों से कहीं अच्छे हैं। हमारे यहां गरीबी भी है पर हमारे यहां का गरीब से गरीब आदमी भी शॉपिंग कर सकता है, गिफ्ट दे सकता है, बेटी को पार्क में घुमा सकता है, बीवी को डिनर पर ले जा सकता है और परिवार को बस या ट्रेन से एक से दूसरे शहर ले जा सकता है। यूरोप का गरीब इस बारे में सोच भी नहीं सकता। वहां जो है वो ठीक-ठाक पैसे वालों के लिए है। वो ट्रेन या बस नहीं ले सकता, शॉपिंग नहीं कर सकता, बाहर खा नहीं सकता। या खायेगा भी तो कबाब या ब्रेड, इससे अधिक का मूल्य चुकाना उसके बस की बात नहीं। पर हमारे यहां बाजारों की इतनी वेराइटी है कि अमीर से अमीर और गरीब से गरीब के लिए सुपरमार्केट और बाजार हैं। 10 रुपये से लेकर दुनिया की सबसे महंगी डिश है यहां। यूरोप का गरीब जो ब्रेड और कबाब से ज्यादा सोच नहीं सकता, हमारे यहां मल्टीकुजिन, बोले तो चाइनीज और इटैलियन गलियों में बड़े आराम से ₹10 या ₹20 में मिल जाएगा। यहां हर तरह की लाइफ स्टाइल है।
चीन से तुलना कीजिये। चीन में लोकतंत्र वगैरह तो है नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर है, बड़े बड़े प्रोजेक्ट हैं। आइए, कुछ अपने प्रोजेक्ट देखिए। नवी मुंबई एयरपोर्ट, दुनिया के पांच बड़े एयरपोर्ट में से एक होगा। ऐसे ही हैदराबाद मेट्रो रेल प्रोजेक्ट है। गिफ्ट सिटी का नाम सुना होगा। गिफ्ट सिटी (Gujarat International Financial Tech-City) एक फाइनांशियल हब की तरह विकसित होता शहर है जहां दुनिया की तमाम वित्तीय संस्थाएं काम करेंगी। लंदन से पांच गुना बड़े इस हब में तकरीबन 220 से अधिक गगनचुंबी इमारतें होंगी, जिनमें से 2 तो बन भी चुकी और जिनमें विभिन्न आफिस काम करना शुरू कर चुके हैं।
नर्मदा नदी प्रोजेक्ट है जो चीन की तीन सबसे बड़ी परियोजनाओं की कुल क्षमता एवं लागत से भी बड़ी है। इसमें 3000 डैम हैं जिनसे बाढ़ नियंत्रण, बिजली, पेयजल, कृषि-सिंचाई जैसे तमाम आवश्यकताएं पूरी होंगी।
प्रोजेक्ट्स का ताऊ है अपना दिल्ली-मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, मतलब औद्योगिक गलियारा, जो सम्भवतः दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। 100 बिलियन डॉलर का यह प्रोजेक्ट देश के छह राज्यों के 1483 किलोमीटर से होता हुआ जाएगा जिसका कवरिंग एरिया छह लाख वर्ग किलोमीटर होगा। आज देश की राजधानी दिल्ली से देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई का माल-ढुलाई सफर 4 से 14 दिनों का है जो घटकर 14 घण्टे हो जाएगा। हार्बरों का नवीनीकरण, हाई-स्पीड रेल-रोड, छह लेन का एक्सप्रेस वे, 2 पावर प्लांट, 23 इंडस्ट्रियल हब, 6 एयरपोर्ट, 24 नए स्मार्ट शहर। यह सब बनेगा इस प्रोजेक्ट में, करीब 3 मिलियन नई नौकरियों के सृजन के साथ-साथ जीडीपी में 25% की बढोत्तरी।
यह हवाई बातें नहीं हैं। हो रहा है सब काम। हमें नहीं पता क्योंकि हमारा इंटरेस्ट नहीं है।
इस मुल्क में क्या नहीं है! नमक का रेगिस्तान, लद्दाख का ठंडा रेगिस्तान, राजस्थान का थार रेगिस्तान, वर्षावन, आइलैंड, ज्वालामुखी, विशाल नदियां, सैकड़ों झरने, चाय और कॉफी के बागान, लंबे समतल हरे मैदान, महान हिमालय, 7000 किलोमीटर का कोस्टल एरिया जिस पर कुछ बहुत ही खूबसूरत बीच हैं, महान और दुर्गम किले, आदिम जातियां जो आज भी अपने उसी रूप में हैं, पुरातन गांव, आधुनिक शहर, टैम्पो से भी कम लागत में मंगल ग्रह तक भेजने की काबिलियत। यहां कल्चरल टूरिज्म है, प्रोफेशनल टूरिज्म है, मेडिकल टूरिज्म है, आध्यात्म है। दुनिया के सभी मजहब यहां हैं। यहां 22 तो ऑफिसियल भाषाएं हैं, 200 के करीब विकसित भाषाएं हैं, 6000 से ज्यादा बोलियां हैं। बताइये कि यहां क्या नहीं है?
एक समय था जब गोरे आप पर राज करते थे और यह केवल 70 साल पहले तक था (किसी राष्ट्र के पैमाने पर देखा जाए तो 70 साल कुछ नहीं होते)। सड़कें और सिनेमाघरों की सीटों पर लिखा होता था कि भारतीय और कुत्ते आर नॉट अलाउड। नैनीताल में 2 समांतर सड़कें हैं, ऊंची वाली पर अंग्रेज और नीची वाली पर हम "कुली" चलते थे। और आज देखिए कि आपका PM जब उनके यहां जाता है तो उनका PM हजारों की भीड़ के सामने गलबहियां डाले फोटो खिंचवाता है।
दुनिया के 90 देश मिला दें तो बनता है एक हिन्दोस्तान। इसकी इज्जत करें क्योंकि यह आपसे नहीं है, आप इससे हैं।
जय हिंद।
बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।
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अजीत
31 जनवरी 18
मोदी सरकार ने ऐसा काम कर दिखाया है जिसकी जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। ये अबतक का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी कार्य है। अगर आप कर्नल पठानिया समेत 5 सैनिको का किस्सा नहीं जानते तो आपको बता दें की 2010 में कर्नल दिनेश पठानिया जम्मू कश्मीर के माछिल में तैनात थे। 2010 में आये दिन कश्मीरी मुस्लिम पत्थरबाजी कर सैनिको को घायल कर देते थे, उस ज़माने में न पैलेट गन की छूट थी, और न ही सैनिको को किसी भी प्रकार की कार्यवाही करने की इज़ाज़त थी।
रोज रोज सैनिक घायल होकर अपना इलाज करवाते थे, इसी के बाद 2010 में कर्नल पठानिया ने पत्थरबाज आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश दे दिया और उनकी टीम ने 3 पत्थरबाज आतंकियों को ढेर कर दिया।
2010 में सोनिया-मनमोहन की सरकार थी, फ़ौरन रक्षा मंत्रालय ने आर्मी कोर्ट से कर्नल पठानिया समेत 5 सैनिको का कोर्ट मार्शल करते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी। अब 2017 में मोदी सरकार के दौरान आर्मी कोर्ट ने रक्षामंत्रालय के सिफारिश पर कर्नल पठानिया समेत सभी 5 सैनिको को जमानत दे दी, और उनकी उम्रकैद की सजा भी ख़त्म कर दी।
7 सालों से कर्नल पठानिया और उनके साथी जेल में सड़
रहे थे, वो भी आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही के लिए
मोदी सरकार ने 2015 से ही क़ानूनी कार्यवाही शुरू कर दी थी और अब तमाम क़ानूनी कार्यवाई ख़त्म हुई और कर्नल पठानिया समेत सभी 5 सैनिको की उम्रकैद की सजा ख़त्म और सभी को जमानत दे दी गयी।
ये हाल होता है लव जिहाद की शिकार हिन्दू लड़कियों का
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लव जिहाद पर चर्चा केरल की मशहूर लेखिका कमला दास उर्फ़ कमला सुरैया एक बार फिर से चर्चा में है। गूगल ने आज का doddle कमला दास को समर्पित किया हैं। वैसे उन पर बनाई गई लव जिहाद को लेकर एक वृत्तचित्र भी आजकल अच्छा खासा चर्चा में है।
क्या कमला दास को गूगल को doddle समर्पित करना चाहिये था?
इस लेख को पढ़कर आप स्वयं उत्तर दीजिये।
कमला दास केरल की जानी मानी लेखिका थी ... जो माधवी कुट्टी के नाम से लिखती थी ...और केरल की रायल परिवार से थी और नायर थी ... पति के निधन के बाद ये अकेलेपन में थी ... पति के निधन के समय इनकी उम्र 65 साल थी ... लेकिन फिर भी इनके अंदर शारीरिक इच्छाए भरी थी ... तीन काफी बड़े बच्चे थे। जो बड़ी बड़ी पोस्ट पर थे ..एक बेटा माधव दास नलपत टाइम्स ऑफ़ इंडिया का चीफ एडिटर था जो बाद में यूनेस्को का बड़ा अधिकारी भी बना ... उसकी पत्नी त्रावनकोर स्टेट की राजकुमारी है ..
एक बेटा चिम्मन दास विदेश सेवा का अधिकारी है और एक बेटा केरल में कांग्रेस से विधायक है ...
इनके घर पर इनके बेटे का एक मित्र अब्दुसमद समदानी उर्फ़ सादिक अली जो मुस्लिम लीग पार्टी का सांसद था और उनसे उम्र में 32 साल छोटा था वो आता जाता था ... उस मुस्लिम लीग के सांसद ने अपनी माँ की उम्र की कमला पर डोरे डाले और उन्हें अपने प्रेम जाल में फंसा लिया .. क्योकि खुद कमला ने अपने और समदानी के बीच के मुलाकातों का वर्णन ऐसे किया है। जैसे अश्लील सड़कछाप किताबो में होता है .. और कमला ने लिखा है की उम्र बढने के साथ साथ उनकी शारीरिक चाहत भी पता नही क्यों बढने लगी है ... और मेरी इस चाहत को अब्दुसमद समदानी ने मिटाने को तैयार हुआ इसलिए मै उसकी मुरीद बन गयी ...
फिर बाद में कमला ने इस्लाम स्वीकार करके अपना नाम कमला सुरैया रख लिखा ... तीनों बेटे अपनी माँ के इस कुकर्मो से इतने आहत हुए की उन्होंने अपनी माँ से सभी सम्बन्ध तोड़ लिए ...
सबसे चौकाने वाली खबर ये थी की उनके इस्लाम कुबूल करने पर सऊदी अरब के प्रिंस ने अपना दूत उनके घर भेजकर उन्हें गुलदस्ता भेजा था और भारत सरकार ने इसका विरोध नही किया ..
फिर 2009 में उन्हें कैंसर हुआ .. और केरल सरकार ने उन्हें पहले मुंबई फिर बाद में पुणे की एक अस्पताल में भर्ती करवा दिया ... तीनो बेटो और सभी रिश्तेदारों ने पहले ही उनसे सम्बन्ध तोड़ लिए थे ... और उनका मुस्लिम पति जिसकी वो तीसरी बीबी थी वो एक बार भी उनका हालचाल लेने नही गया था ... मरने के पहले उन्होंने लिखा "काश मुझे किसी ने तभी गोली मार दी होती जब मै समदानी के में फंस गयी थी ... मुझे पता ही नही चला की मुझे सिर्फ राजनीतिक साजिश के तहत केरल की हिन्दू महिलाओ को इस्लाम के प्रति आकर्षित करने के लिए ही फंसाया गया था और इसमें सऊदी अरब के कई लोग काफी हद तक शामिल है ...
पुरे आठ महीने तक अस्पताल में तड़प तड़प कर अपने बेटो और पोतो को याद करते करते उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए .. फिर केरल सरकार ने उन्हें मालाबार के जामा मस्जिद के बगल में कब्रिस्तान में दफना दिया ..
सलंग्न चित्र- कमला दास को समर्पित किया गया doodle
क्या आप भीलू राणा को जानते हैं?
इतिहास में उल्लेख है कि राणा पूंजा भील का जन्म मेरपुर के मुखिया दूदा होलंकी के परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम केहरी बाई था, उनके पिता का देहांत होने के पश्चात 15 वर्ष की अल्पायु में उन्हें मेरपुर का मुखिया बना दिया गया।
यह उनकी योग्यता की पहली परीक्षा थी, इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर वे जल्दी ही ‘भोमट के राजा’ बन गए। अपनी संगठन शक्ति और जनता के प्रति प्यार-दुलार के चलते वे वीर भील नायक बन गए, उनकी ख्याति संपूर्ण मेवाड़ में फैल गई।
इस दौरान 1576 ई. में मेवाड़ में मुगलों का संकट उभरा। इस संकट के काल में महाराणा प्रताप ने भील राणा पूंजा का सहयोग मांगा। ऐसे समय में भील मां के वीर पुत्र राणा पूँजा ने मुगलों से मुकाबला करने के लिए मेवाड़ के साथ अपने दल के साथ खड़े रहने का निर्णय किया। महाराणा को वचन दिया कि राणा पूंजा और मेवाड़ के सभी भील भाई मेवाड़ की रक्षा करने को तत्पर है। इस घोषणा के लिए महाराणा ने पूंजा भील को गले लगाया और अपना भाई कहा। 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में पूँजा भील ने अपनी सारी ताकत देश की रक्षा के लिए झोंक दी।
हल्दीघाटी के युद्ध के अनिर्णित रहने में गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का ही करिश्मा था जिसे पूंजा भील के नेतृत्व में काम में लिया गया। इस युद्ध के बाद कई वर्षों तक मुगलों के आक्रमण को विफल करने में भीलों की शक्ति का अविस्मरणीय योगदान रहा है तथा उनके वंश में जन्मे वीर नायक पूंजा भील के इस युगों-युगों तक याद रखने योग्य शौर्य के संदर्भ में ही मेवाड़ के राजचिन्ह में एक ओर राजपूत तथा एक दूसरी तरफ भील प्रतीक अपनाया गया है। यही नहीं इस भील वंशज सरदार की उपलब्धियों और योगदान की प्रमाणिकता के रहने उन्हें ‘राणा’ की पदवी महाराणा द्वारा दी गई। अब हमारा राजा पूंजा भील ‘राणा पूंजा भील’ कहलाकर जाने लगे।
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साभार
DesiCNN
संथाल जनजाति बिहार, झारखंड के अलावा बंगाल में भी होती है | बीरभूम जिले के सुलंगा गाँव में इनके करीब सौ घर होंगे | छोटा सा गाँव है, संथालों की आबादी भी वही 500-700 जैसी होगी | इतने मामूली से गाँव का जिक्र क्यों ? क्योंकि बरसों पहले यहाँ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका गया था | जैसा कि बाकी भारत में हुआ था यहाँ भी विद्रोह की मुख्य वजह धार्मिक और आर्थिक ही थी |
ये वो दौर था जब बिहार और बंगाल अलग अलग सूबे नहीं थे | एक ही बंगाल हुआ करता था और लोग भाषाई आधार पर सीमायें मानते थे | 1907 के उस दौर में बिहार के एक करपा साहेब को बुला कर यहाँ का जमींदार बना दिया गया और वो लगे किसानों से लगान वसूलने | इस लगान की दो शर्ते थी, या तो सीधे तरीके से लगान दो, या इसाई हो जाओ तो लगान माफ़ किया जायेगा |
विरोध करने वालों को या तो मार दिया गया था या पकड़ कर असम में कुली बना कर भेजा गया था | इस नाजायज और जबरन वसूली ऊपर से धर्म परिवर्तन के खिलाफ मुर्मू लोग विद्रोह पर उतर आये | जैसा कि बाकी के भारत में होता है और तिलक ने भी किया था वैसे ही यहाँ भी लोगों ने एकजुट होने के लिए त्योहारों का ही सहारा लिया | दुर्गा पूजा की नवमी को बलि प्रदान के दिन जब सब इकठ्ठा होते वहीँ से विद्रोह की शुरुआत हुई थी | विद्रोह के नेता थे बोर्जो मुर्मू और उनके भाई |
दल हित चिन्तक आज महिषासुर को जब संथाल लोगों का वंशज और झारखण्ड इलाके का वासी बताने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्होंने संथाल इतिहास तो जरूर ही देखा होगा ? अब ये सवाल इसलिए है क्योंकि बोर्जो मुर्मू के भाई का नाम दुर्गा मुर्मू था | जब इतिहास में संथाल विद्रोह दर्ज किया जाता है तो दुर्गा मुर्मू और बोर्जो मुर्मू का नाम साथ ही लिया जाता है | बोर्जो मुर्मू के वंशज अभी भी इसी गाँव में होते हैं | दुर्गा पूजा अभी भी यहाँ होती है, हां संस्कृत वाले मन्त्र नहीं पढ़े जाते, स्थानीय भाषा में बदले हुए मन्त्र होते हैं | तारीख़ वही बाकी भारत की दुर्गा पूजा वाली होती है मूर्तियाँ स्थानीय रंग-ढंग की |
जांच करने के लिए जो जाना चाहेंगे वो गाँव के पुजारी रोबीन टुडू से अष्टमी को गोरा साहिब को दर्शाने के लिए सफ़ेद छागर की बलि की प्रथा जांच सकते हैं | इलाके के वाम मोर्चे के पुराने मुखिया अरुण चौधरी से भी बात कर सकते हैं, दुर्गा पूजा में कम्युनिस्ट भी शामिल होते है | क्या कहा ? रोबिन टुडू नाम क्यों है पुजारी का ? भाई वो क्रिस्चियन वाला Robin नहीं है, “रविन्द्र” का बांग्ला अपभ्रंश है रोबीन ! नहीं भाई, हर बार पुजारी ब्राह्मण हो ये भी जरूरी नहीं होता |
बाकी ऊँचे अपार्टमेंट की तेरहवीं मंजिल (जिसका नाम आपने अज्ञात कारणों से 14th Floor रखा है) पर बंद ए.सी. कमरों से भारत पूरा दिखता भी नहीं जनाब ! नीचे जमीन पे आइये तो बेहतर दिखेगा |
कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश से गाजीपुर से दिल्ली के लिए एक ट्रेन शुरू हुई थी | ट्रेन का नाम था राजा सुहेलदेव राजभर एक्सप्रेस | राजा सुहेलदेव राजभर का इतिहास बड़ा अनोखा है | उन्हें भारत पर हमला करने वाले गजनवी के भांजे सालार मसूद को खदेड़ कर मारने के लिए जाना जाता है | आज भारत में गाज़ी सालार मसूद का मकबरा है जहाँ सालाना उर्स भी लगता है |
राजा सुहेलदेव राजभर का नाम बहराइच, उतपत देस के इलाकों के बाहर शायद ही जाना जाता है | इसका कारण है उतपत देस का जातिवादी महामूर्ख समाज | कई लोग इन्हें पासी समुदाय से जुड़ा मानते हैं | उनके हिसाब से राजा सुहेलदेव राजभर के नाम पर केवल दलितों का हक़ है | दूसरी तरफ उतपत देस का छतरी समुदाय मानता है कि राजा सुहेलदेव राजभर राजपूत थे इसलिए वो सिर्फ उनके हैं | इसमें एक छोटी सी समस्या है | अंग्रेजों ने “राजभर” को क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर दिया था |
अब जब क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1952 में ख़त्म हुआ तो, राजभर डीनोटीफाइड कास्ट हो गए | वो अब भी सत्तर साल बाद ना तो जनरल हैं, ना एस.सी. / एस.टी. या ओ.बी.सी. | करीब डेढ़ सौ साल तो क्रिमिनल कास्ट बना देने के कारण उन्हें शोषण झेलना पड़ा | अब उनके सामने नाम की समस्या है | किसी ने राजभर समुदाय से पूछा ही नहीं कि डेढ़ सौ साल का शोषण झेलने के एवज में क्या तुम आरक्षण का लाभ लेना चाहोगे ? जाति-जन्म के नाम पर उनका शोषण करने वाले चर्च का शासन नहीं रहा इसलिए आरक्षण का लाभ छोड़ना चाहेंगे राजभर ?
बाकी इन दोनों सवालों से बड़ा सवाल ये भी है कि उतपत देस के घनघोर जातिवादी समाज और उसके समाजवादी शोषकों ने राजभर समुदाय की पहचान की समस्या को सुलझाने के लिए क्या किया ?
✍🏻
आनंद कुमार
मुगलों से हार न मानने वाले महान सन्त गुरु रविदास जी की जयंती पर शत् शत् नमन।
सिकंदरलोदी के समय में जब हिन्दू संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा था अत: मुगल शासन घबरा गया। सिकंदर लोदी ने सदना कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था कि यदि संत रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेंगे।*
लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गई, स्वयं सदना कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और संत रविदास की भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गए। उनका नाम सदना कसाई से रामदास हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए।
उन्होंने संत रविदास को कारावास में डाल दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जूती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया। उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन संत रविदास ने कहा :-
*”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान। वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार, तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार॥”*
यातनाएं सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे और अपने अनुयायियों को विधर्मी होने से बचा लिया। ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया। शीघ्र ही चंवरवंश के वीरों ने दिल्ली को घेर लिया और सिकन्दर लोदी को संत को छोड़ना ही पड़ा।
संत रविदास का निधन चैत्र शुक्ल चतुर्दशी विक्रम संवत १५८४ रविवार के दिन चित्तौड़ में हुआ। वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी स्मृति आज भी हमें उनके आदर्शों पर चलने हेतु प्रेरित करती है, आज भी उनका जीवन हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है।
एक कहावत है, जब किसी को यकीन न दिला सको - तो उसे भ्रमित कर दो.
 इफ यू कांट कन्विन्स देम, कन्फ्यूज़ देम. उनके सामने इतने सारे झूठ परोस दो कि वो मजबूरन उनमें से किसी झूठ को ही सच मानने को मजबूर हो जाएं.
जैसे जेएनयू में देश के टुकड़े होने के नारे लगे ही नहीं. वीडियो झूठा है. पाकिस्तान ज़िंदाबाद कहा ही नहीं गया. कैमरे झूठ बोल रहे हैं.’ कैराना में लोग घर छोड़ कर गए ही नहीं. घरों पे लगे ताले झूठे हैं. कोई पलायन हुआ ही नहीं. बरसों बरस से पुश्तैनी मकान छोड़ कर और जगहों पर बस गए लोग झूठ बोलते हैं. मीडिया झूठ दिखा रहा है,. मालदा में‘कोई हंगामा या प्रदर्शन हुआ ही नहीं. ये टीवी वाले तो झूठ दिखा रहे हैं. बंगाल के तो किसी अखबार में छपा ही नहीं है. थाने में आग लगा दी ? अच्छा? वो तो कोई गुंडे थे, दंगा थोड़े न हुआ !’
जैसे धूलागढ़ में हुआ जैसे दादरी में , कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की मौत पर हुआ था.या फिर जैसे कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ था.इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है. फिर एक नैरेटिव सेट हो रहा है.
इसी लिए करणी सेना  जब भंसाली के विरोध में सड़क पर उतरते हैं, तो उन्हें आतंकवादी कहने में देर नहीं लगाई जाती. लेकिन कासगंज के आरोपियों के यहां जब बंदूकें और होटलों में देसी बम मिलते हैं - तो उन्हें आतंकवादी कहना तो दूर उनकी पैरवी के लिए लोग टीवी-अखबार छोड़िए, घर में बनाए जाने वाले सुतली बमों जैसे देसी वीडियो तक बना बना कर मैदान में कूदते हैं.तिरंगे की यात्रा निकालने पर झगड़ा हुआ या नहीं, इस पर जान गंवाने वाले लड़के की बिलखती मां की गवाही झूठी हो जाती है. उनकी गवाही सही हो जाती है जिन पर उस सोलह साल के बच्चे को मार देने का आरोप लगता है !
गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की इजाज़त नहीं ली गई थी जैसे तर्क दिए जाते हैं. और जब वो कुतर्क फेल हो जाते हैं तो तिरंगा ले के निकलने वालों को ‘भगवा गुंडे’ क़रार दे दिया जाता है.
ये संज्ञाएं गढ़ने वाले वही लोग हैं जो हरियाणा के जाटों पर ‘बलात्कारी’ होने का झूठ चस्पां करने में पल भर नहीं सोचते. और फिर अपने उस झूठ को सच साबित करने के लिए झूठी गवाहियां भी गढ़ते हैं, सुबूत भी.
ये वही लोग हैं जिन्हें खाने की थाली का धर्म पता है, स्कूल की प्रार्थना का धर्म पता है, इमारतों की दीवारों के रंगों का धर्म पता है, योग का धर्म पता है, सूर्य नमस्कार का धर्म पता है, वंदे मातरम का धर्म पता है, भारत माता की जय का धर्म पता है - बस आतंक का धर्म नहीं पता !
तय कीजिए, झूठ ये फैलाते आए हैं - या वो फैला रहे हैं जिन्होंने इनके झूठ की पोलें खोलनी शुरू की तो इनकी चूलें हिलने लगी हैं?