Wednesday, 10 October 2018



आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी द्वारा कही गई कुछ बड़ी और महत्वपूर्ण बातें"


🙌 सबरीमाला मुद्दे पर


📌 यह परंपरा बहुत पुरानी है और लोग इसका अनुसरण कर रहे थे. जो लोग इसके खिलाफ याचिका दायर करते हैं वे मंदिर नहीं जाएंगे. महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इस आस्था का पालन करता है. उनकी भावनाओं पर विचार नहीं किया गया.
📌 स्त्री पुरुष समानता अच्छी बात है, लेकिन इतने सालों से चली आ रही परंपरा और उसका पालन करने वालों लोगों की भावना का सम्मान नहीं किया गया, उनकी नहीं सुनी गई.
📌 धर्म के मामलों में संबंधित धर्म के धर्माचार्यों से बातचीत करना आवश्यक होता है सबको साथ लेकर भी धीरे धीरे बदलाव किया जा सकता है.
📌 हमारी सांस्कृतिक जागरण की परंपरा हमारे देश में लगातार चल रही है राजनीति को लेकर हमारे देश में अभिनव प्रयोग हुए.
📌 अपने देश की भाषा, भ्रमण और भोजन में संस्कार देखने की जिम्मेदारी हमारी है.


🙌 राम मंदिर मुद्दे पर


📌 बाबर नाम की एक बर्बर आंधी ने हमारे समाज पर अत्याचार किया.

📌 राम जन्माभूमि की जगह अभी तक आवंटित नहीं की गई है, हालांकि सबूतों ने पुष्टि की है कि उस जगह एक मंदिर था.

📌 अगर राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता तो मंदिर बहुत पहले बनाया गया होता.

📌 हम चाहते हैं कि सरकार कानून के माध्यम से निर्माण के लिए रास्ता साफ करे.

📌 राम मंदिर हिन्दू-मुसलमान का मसला नहीं है. यह भारत का प्रतीक है और जिस भी रास्ते से मंदिर निर्माण संभव है, मंदिर का निर्माण होना चाहिए.

📌 कुछ लोग राजनीति की वजह से जानबूझकर राम मंदिर मामले को आगे खींचते जा रहे हैं.

📌 रामजन्मभूमि पर जल्द से जल्द राम मंदिर बनना चाहिए. सरकार को कानून बनाकर मंदिर निर्माण करना चाहिए.

📌 राम मंदिर का बनना गौरव की दृष्टि से आवश्यक है, मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा.


🙌 चुनाव में मतदान/NOTA के मुद्दे पर


📌 चुनाव में मतदान न करना अथवा NOTA के अधिकार का उपयोग करना, मतदाता की दृष्टि में जो सबसे अयोग्य उम्मीदवार है उसी के पक्ष में जाता है, इसलिए राष्ट्रहित सर्वोपरि रखकर 100 प्रतिशत मतदान आवश्यक है.

📌 मतदान लोगों का अधिकार है, वे इसके प्रयोग के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन #NOTA का प्रयोग बुद्धिमानी नहीं है.


🙌 देश की सुरक्षा के मुद्दे पर


📌 हम दुनिया में किसी से शत्रुता नहीं करते लेकिन हमसे शत्रुता करने वाले कई लोग हैं, हमें उनसे सतर्क रहने की जरूरत है.

📌 कोई हमसे लड़ाई करने की हिम्मत ना करे हम इतने बलवान बनेंगे तो दुनिया में भी शांति होगी और हमारे यहां भी.

📌 ऐसे लोगों से बचने का एक ही तरीका है कि हम इतना बलवान बने कि किसी की आक्रमण करने की हिम्मत ही न पड़े.

📌 हमारी सुरक्षा के लिए जो सीमा पर बंदूक ताने खड़े हैं उनके परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी और हमारे समाज की है.

📌 सुरक्षा के क्षेत्र में हमें स्वावलंबी होने की आवश्यकता है, सीमा की लड़ाई अंदर की सुरक्षा पर निर्भर करती है.

📌 पड़ोस में सरकार बदल गई लेकिन उनकी नीयत नहीं बदली है.

📌 सेना तथा रक्षक बलों का नीति धैर्य बढ़ाना, उनको साधन-सम्पन्न बनाना, नई तकनीक उपलब्ध कराना आदि बातों का प्रारम्भ होकर उनकी गति बढ़ रही है, दुनिया के देशों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने का यह भी एक कारण है.

📌 हमारे देश को तोड़ने वाली शक्तियों को पाकिस्तान और इटली से समर्थन मिलता है.


🙌 शहरी नक्सलवादियों/माओवादियों के मुद्दे पर


📌 कुछ लोग हैं जो भारत के टुकड़े होने की बात करते हैं, संविधान को नहीं मानना चाहते, जो आतंकवादियों से संबंध रखते हैं.

📌 माओवाद हमेशा अर्बन ही रहा है, ये लोग समाज के उपेक्षित तबके का लाभ उठाते हैं, अभावग्रस्त छात्रों को भड़काते हैं.

📌 नए लोग जो उनके इशारे पर काम करें उन्हें स्थापित करने की कोशिश करते हैं ये अर्बन माओवादी.

📌 अर्बन नक्सल राष्ट्रविरोधी आन्दोलनों में अग्रपंक्ति में दिखाई देते हैं.


🙌 अन्य मुद्दों पर


📌 प्रबोधन से मन परिवर्तन करना होगा फिर समाज परिवर्तन स्वीकार कर लेता है.

📌 अगर हमारा सांस्कृतिक जागरण होता रहा तो निश्चित तौर पर भारत विश्वगुरू बनेगा.

📌 हमें बहुत ज्यादा चिंतित रहना पड़े ऐसी स्थिति आज भी नहीं है, लेकिन हमें सतर्क और सजग रहने की जरूरत है.

📌 समय पर न मिलने वाली मदद फिर मदद नहीं रह जाती, अनुसूचित जातियों के लिए योजनाएं तो बनती हैं लेकिन हर जगह समय पर लागू नहीं हो पाती.

📌 सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा सरकार ने वह नहीं किया इससे ही विभेद हो जाता है इसे समाज ठीक कर सकता है, अन्याय की प्रतिक्रिया में हम दूसरा अन्याय ना करें.

📌 समाज में सब कमियों को दूर कर उसके शिकार हुए समाज के अपने बंधुओं को स्नेह व सम्मान से गले लगाकर समाज में सद्भावपूर्ण व आत्मीय व्यवहार का प्रचलन बढ़ाना पड़ेगा.

📌 भारत में होने वाली आंतरिक हिंसा हमारे देश के लिए ठीक नहीं है, हमें इस पर काम करने की जरूरत है.

📌 नैतिक बल के आधार पर बोस जैसे महानुभाव ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की और स्वतंत्र भारत की पहली सरकार विदेश में बनाई, उसे भी 150 साल हुए हैं.


#RssIdeology

गुजरात में 'कांग्रेस कार्यकर्ता भड़का रहे हिंसा - सीएम विजय रूपाणी


गुजरात में बच्ची से रेप की घटना के बाद से यूपी-बिहार के लोगों पर हमले हो रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर गुजरात में बंद पड़े कारखानों और बेरोजगारी को हिंसा की वजह बताया. राज्य के सीएम विजय रूपाणी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.

रूपाणी ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए. उन्होंने kha, 'कांग्रेस पहले हिंसा भड़काती है. कांग्रेस पार्टी हिंसा के खिलाफ टिप्पणी करते हैं. कांग्रेस पार्टी को क्या कोई शर्म नहीं है?'

गुजरात में #उतर_भारतीयों के साथ हो रहा है...वो मैडम की पार्टी के कमीनेपन का ठेका लेने वाली कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ बनाई गई रणनीति तहत हो रहा है.....!!

यह सब दिल्ली वाले 10 लथपथ के आर्डर पर हो रहा है...ऐसा करने की जिम्मेदारी गुजरात में 5 लोग़ को दी गई है....

1-अमित चावडा-गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष,2-परेश धनाणी-गुजरात विपक्ष का नेता,3-हार्दिक पटेल-कांग्रेसियो का करीबी,4 -अल्पेश ठाकोर-काग्रेसी MLA राधनपुर,5-जिग्नेश मेवाणी-कांग्रेस के समर्थन से विधायक हैं.. इस साजिश मे और भी कई बड़े अजगर शामिल हैं..

अभी और नंगी होगी यह पार्टी...

.यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष तौफीक_आलम को गुजरात पुलिस ने बड़ौदा से गिरफ्तार किया है। तौफ़ीक़_आलम_ गैर गुजरातियों को मारकर गुजरात से बाहर खदेड़ देने के ज़हरीले मैसेज लोगों को भेजकर अपना बिहारी_भगाओ अभियान सोशल मीडिया में वॉट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर लगातार चला रहा था। ठाकोर सेना के उत्तर भारतीय विरोधी सारे भड़काऊ संदेशों को भी _तौफ़ीक़_आलम बहुत बड़े पैमाने पर लोगों के पास भेज रहा था। गुजरात पुलिस उस पर दो दिनों से नज़र रखे हुए थी। आज उसके खिलाफ बहुत पुख्ता सबूतों को इकट्ठा करने के बाद पुलिस ने तौफ़ीक़_आलम_ को संगीन धाराओं में गिरफ्तार कर लिया है।

गुजरातियों के पक्ष और उत्तर भारतीयों के खिलाफ इस मुसलमान_कांग्रेसी_नेता का खून क्यों खौल रहा था.? इसका जवाब स्वयं से पूछिए, उत्तर तत्काल मिल जाएगा।


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....................... कुल मिला कर मोदी को किसी तरह बदनाम करो और 2019 का चुनाव शुरू होने से पहले पूरे देश में अफरा तफरी का माहौल बना कर अपने कुटिल सत्ता लक्ष्य को कपट से हासिल किया जाय..


........................ प्रदूषण मुक्त दिवाली, होली,दुर्गापूजा,गणेश चतुर्थी करते-करते

कहीं त्योहार मुक्त हिंदू और हिंदू मुक्त हिंदुस्तान ना बन जाए।


............vyang................शादी अपने से बड़ी उम्र की लड़की से कीजिये,ताकि जब जब वो डांटे,तो दिल को तसल्ली दे सको,चलता है बड़ी है तो डाँटेगी ही...


........मूर्ख सेकुलर हिंदुओं...कब्र मजार दरगाह में सिजदा करने से मन्नत पूरी होती तो मोदी कभी PM नही बन पाते..


.......................mediya......चर्च_के_पाप........एक ईसाई महिला अमेरिका से भारत आकर चर्च के कुकृत्यों से सारा ध्यान मोड़कर Me_Tooकी तरफ लगा दिया ...वेटिकन एजेंट तनु श्री दत्ता.....वो तुम्हे Me_Too के लिए उकसायेंगे तुम बच्चा चोर गिरोह और फादर द्वारा बलात्कार पर अड़े रहना ...Me_too ki आड़ में क्रिस्चन फादरों द्वारा किये गए बलात्कार के कु-कृत्य छिपाये जा रहे हैं ...तनुश्री दत्ता मतांतरित ईसाई है....ये कैसा संयोग है की Me_Tooके शिकार सभी कलाकार हिन्दू और राष्ट्रवादी सोच के रहे हैं ?ये एक सुनियोजित षड्यंत्र है..//..........वो तुम्हे Me_Too बताएँगे लेकिन तुम सबरीमाला और राम मंदिर पर अड़े रहनाहालीवुड और विदेशों का चलन #meetoo का भसड़ अब भारत भी आ गया ..लेकिन निशाने पर कौन है ये सोचिये....


एमजे अकबर 13 सालो तक नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के सबसे बड़े आलोचक थे ।। मोदी के खिलाफ खूब जहर उगलते थे । तब उन पर किसी भी महिला ने कोई आरोप नही लगाया .. लेकिन जैसे ही वो मोटा भाई के आबे जमजम से पवित्र हो गए और केंद्रीय मंत्री बन गए तो अब चुनावी वर्ष में 5 महिला पत्रकार उनके ऊपर आरोप लगा रही हैं कि उन्होंने कई बार उन्हें गलत तरीके से छुआ था


मतलब जब इन महिलाओं को छुआ था तब उन्हें नहीं पता चला कि उन्हें सही तरीके से छुआ जा रहा है कि गलत तरीके से लेकिन 20 साल 25 साल बाद अचानक इन महिलाओं को याद आने लगा फलाने ने उन्हें गलत तरीके से छुआ था


अब नाना पाटेकर और विवेक अग्निहोत्री जैसे लोगों को देख लीजिए यह लोग ट्विटर पर और दूसरे माध्यमों में वामपंथियों को जमकर लतियाते हैं उनके खिलाफ अचानक दो तीन महिलाएं सामने आती हैं और कहती है 25 साल पहले मेरे साथ ही उन्होंने गलत व्यवहार किया था


यह एक नया ट्रेंड जो बेहद खतरनाक है अब 20 साल पहले या 25 साल पहले ना तो कोई सुबूत बचा होगा ना ही कोई ऐसा गवाह बचा बचा होगा फिर अब आरोप लगाकर वह भी ट्विटर पर या फेसबुक पर वह महिला क्या हासिल करना चाहती है


एक और ट्रेंड मैंने देखा है कि ज्यादातर वही महिलाएं आरोप लगा रही है या तो जिनका घर टूट चुका है या जो वक्त की मार से बेहद मोटी और कुरूप हो चुकी है और ऐसे पुरुषों पर आरोप लगा रही हैं जो अब शांत सुखी दांपत्य जीवन बिता रहे हैं

पुरुषों के लिए #YouTo #WeTo जैसी केम्पेन चलानी चाहिए , माचिस की तीली बगैर माचिस के मसाला लगे सिरे पर रगड़ें नही जलती ?

इन्हें तीन चार शादी किये आमिर ,शाहरुख , जावेद भी नही दिखेंगे ,या 300 के साथ सोने की घोषणा करने वाले संजय दत्त या महेश भट्ट या कोई और

#मीटू #यूटू #वीटू #WeTo #YouTo


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.......... जिस कांग्रेस से चीन पाकिस्तान और लश्कर- ए-तैयबा खुश हो, वो मेरे देश के लिए कैसे अच्छी हो सकती है?


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जूलिया रोबर्ट्स के बाद एक और हॉलीवुड मेगास्टार विल स्मिथ, पूरी विधि से की भगवान् शिव की पूजा, गंगा आरती, बढ़ रहा सनातनहालीवुड मेगास्टार विल स्मिथ ने किया रुद्राभिषेक,

यूरोप में भी कई चर्च मंदिर बन गए हैं,

धीरे धीरे विदेशी भी अपने मूल धर्म सनातन धर्म

में घरवापसी क्र रहर हैं..







अमेरिका की प्रतिबंध लगाने की धमकी के बावजूद भारत और रूस के बीच 40 हजार करोड़ के एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम का समझौता हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत भारत को रूस से सतह से हवा में मार करने वाली आधुनिक ट्रायम्फ मिसाइल स्क्वॉड्रन 2020 में मिलेगी। दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष में सहयोग को लेकर भी करार हुआ। इसके तहत भारत का एक मॉनिटरिंग स्टेशन रूस के साइबेरिया स्थित नोवोसिबिर्स्क में स्थापित किया जाएगा। इससे पहले रूस ने सिर्फ चीन को ये डिफेंस सिस्टम दिया है। वहीं तुर्की के साथ भी उसका करार हो चुका है।




गगनयान अभियान में हमारा सहयोग करेगा रूस- मोदी

पीएम मोदी ने कहा- 'भारत और रूस के बीच सहयोग का विस्तार अतीत के दायरों के पार ले जाएगा। भारत की विकास यात्रा में रूस हमेशा साथ रहा है। हमारा अंतरिक्ष में अगला लक्ष्य गगनयान में भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजना है। रूस ने पूरे सहयोग का आश्वासन दिया है। भारत और रूस के प्रतिभा संपन्न बच्चे अपने इनोवेटिव आइडिया बताएंगे। हमने ऐसे प्रयासों पर विचार किया है, जिससे लोगों के बीच संबंध मजबूत हों। मैं विश्वास से कह सकता हूं की भारत और रूस की दोस्ती अनूठी है। इस रिश्ते के लिए पुतिन की प्रतिबंद्धता से ये दोस्ती और मजबूत होगी। हम नई बुलंदियों पर पहुंचेंगे।'




पुतिन ने मोदी को दिया रूस आने का न्योता

पुतिन ने कहा- दोनों देश दोस्ती के अटूट धागे से जुड़े हैं। भारत ने हमेशा रूस के साथ अपने रिश्तों को प्राथमिकता दी है। मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मैं मोदी को अगले व्लादिवोस्तोक फोरम में एक बार फिर मुख्य अतिथि के तौर पर न्योता दे रहा हूं।




डील अमेरिकी कानून का उल्लंघन

ये डील काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए) का उल्लंघन मानी जाएगी। इसके तहत अमेरिकी संसद (कांग्रेस) ने रूस से हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। हालांकि, कुछ अमेरिकी सांसदों का कहना है कि इस मामले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से विशेष छूट मिल सकती है।







सीरिया में तैनात है एस-400

एस-400 मिसाइल सिस्टम, एस-300 का अपडेटेड वर्जन है। जमीन से हवा में मार करने वाला यह सिस्टम दुश्मन देशों के लड़ाकू जहाजों, मिसाइलों और ड्रोन को पलक झपकते ही खत्म कर देगा। रूस ने इस सिस्टम को सीरिया में तैनात कर रखा है। एयर डिफेंस सिस्टम मिसाइलों और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को भी 400 किलोमीटर के दायरे में आते ही खत्म कर देगा।







डिफेंस सिस्टम एक तरह से मिसाइल शील्ड का काम करेगा। यह पाकिस्तान और चीन की एटमी क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से भारत को सुरक्षा देगा। यह सिस्टम अमेरिका के सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट एफ-35 को भी गिरा सकता है। यह सिस्टम 36 परमाणु क्षमता वाली मिसाइलों को एकसाथ नष्ट कर सकता है। अगर सौदा होता है तो चीन के बाद इस सिस्टम को खरीदने वाला भारत दूसरा देश होगा।

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राफेल पे कोंग्रेसियों के "तथ्य" को नीचे दिए गए प्रश्नो के आधार पे जांचिए.


1. क्या प्रधानमंत्री मोदी ने दास्सो से अनुबंध किया?


उत्तर: नहीं. कॉन्ट्रैक्ट फ्रेंच राष्ट्रपति के साथ साइन हुआ था और भारत का पैसा फ्रांस के सरकारी खजाने में गया था.


2. क्या ऑफसेट क्लॉज़ में केवल रिलायंस को कॉन्ट्रैक्ट मिला?

उत्तर: नहीं.


3. अगर कांग्रेस का आरोप सही है, तो क्या प्रधानमंत्री मोदी ने बाकी की 71 ऑफसेट कंपनियों - जिनमे एल एंड टी, महिंद्रा समूह, रिलायंस, कल्याणी समूह, गोदरेज एंड बॉयस, टाटा समूह सम्मिलित है - के लिए भी पैरवी की?

उत्तर: नहीं.


4. फिर इन निजी कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट कैसे मिल गया?


उत्तर: शहज़ादे से पूछिए.


5. क्या एल एंड टी, महिंद्रा समूह, कल्याणी समूह, गोदरेज एंड बॉयस, टाटा समूह को डिफेन्स क्षेत्र में कार्य का अनुभव है?


उत्तर: नहीं.


6. क्या DRDO - जो एक सरकारी उपक्रम है - को कॉन्ट्रैक्ट मिला?


उत्तर: हाँ. ऑफसेट की एक तिहाई रकम.


7. रिलायंस को अमेरिका से उनकी नौ सेना के जहाजों की मेंटेनेंस के लिए 15000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मिला. क्या यह कॉन्ट्रैक्ट भी प्रधानमंत्री मोदी की पैरवी से मिला?


उत्तर: नहीं.


8. क्या प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के पहले रिलायंस के मालिक सड़क पे चाट बेचते थे?


उत्तर: नहीं.


9. राडिया टेप में मुकेश अम्बानी किस सरकार के लिए कह रहे थे कि वह सरकार उनकी जेब में है?


उत्तर: सोनिया सरकार.


अमित सिंघल जी की पोस्ट


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"एनएसजी को मिला कमीकाजी ड्रोन"




आतंकियों के खिलाफ आपरेशंस को धार देने के लिए नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के ब्लैक कैट कमांडो को अब ‘कमीकाजी’ ड्रोन्स का भी साथ मिलेगा. ये ड्रोन स्वदेशी तकनीक से विकसित किए गए हैं, एनएसजी के 34वें स्थापना दिवस पर कमीकाजी ड्रोन का लाइव डेमो के साथ अनावरण किया गया.

भारत में निर्मित कमीकाजी ड्रोन रिमोट से संचालित मानव रहित एरियल व्हीकल (यूएवी) है, इसका उद्देश्य ब्लैक कैट्स को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करना है, जुड़वा कमीकाजी ड्रोन गेमचेंजर बन सकता है,

भारतीय कंपनी वोर्टेक्स यूएएस की ओर से बनाए गए कमीकाजी में दो ड्रोन्स के सेट का इस्तेमाल किया जाता है. पहला ड्रोन विस्फोटक से लक्षित इमारत की खिड़की को तोड़ता है. दूसरा सुसाइड ड्रोन डेटोनेटर ले जाता है, जो सीधा आतंकी के सिर पर जाकर फट सकता है.

दोनों ड्रोन में एक मुलभुत अंतर है, ब्लैक हार्नेट आपके फोन के वजन के बराबर का है जिसके जरिये मुठभेड़ स्थल का लाईव टेलीकास्ट तथा जासूसी आतंकियों के ठिकाने की सटीक लोकेशन के जरिये जीपीएस आधारित हथियारों का उपयोग संभव है, तथा दुसरे कामिकाजी ड्रोन हमला करने वाले ड्रोन है.

सुसाइड ड्रोन खुद फट सकता है या बचे भी रह सकता है, जिससे कि जरूरत के हिसाब से उसका दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सके. एनएसजी के महानिदेशक सुदीप लखटकिया ने बताया कि हमने सशस्त्र ड्रोन को अपनी तकनीक को उन्नत बनाने के हिस्से के तौर पर साथ जोड़ा है.




Tuesday, 9 October 2018

सुलेमान के घर से हथियारों का जखीरा जप्त, 5 गिरफ्तार – रातों रात शहरों पर कब्जे की तैयारी-- 09/10/2018
आप शायद इन घटनाओं को छोटा मानकर ले रहे है, आपको बता दें की फिलीपींस में लोग सोये अगली सुबह उठे तो कईयों को मार दिया गया और शहर पर ISIS कब्ज़ा हो गया, क्यूंकि उनके पास हथियार थे
सेना को लगाना पड़ा कई दिन लगे पर ISIS ने फिलिपींस के शहर को कब्जाकर लोगों को बंधक बनाया कईयों को मारा, आतंकवाद का पूरा नंगा नाच किया, ऐसा ही सीरिया और इराक में किया गया
आप रात को सोयेंगे, कल उठेंगे तो शायद आप बंधक होंगे या आप सुनेंगे की आपके शहर को कब्जे में ले लिया गया है, पुलिस वालो को मार कर शहर पर कब्ज़ा हो चूका है, और हजारों को बंधक बनाया जा चूका है, और सेना और आतंकियों में संघर्षं चल रहा है
भारत में इसी काम की तैयारी चल रही है, कहीं से AK-47 का जखीरा, तो कहीं से सेना भी न टिके ऐसा केमिकल हथियार, तो कहीं पर बम की फैक्ट्री तो कहीं पर यूरेनियम भी मिल रहा है
अब मेरठ में पुलिस को कुछ ऐसा मिला है जिसने पुलिस को भी सक्ते में डाल दिया, दिल्ली की स्पेशल सेल ने सोमवार रात सटीक जानकारी पर मेरठ के लिसाड़ी गेट में छापा मारा, यहाँ सुलेमान नामक व्यक्ति के घर से हथियारों का जखीरा पकड़ा गया है, बताया जा रहा है की 84 पिस्टल तो बने हुए रेडी हालात में जप्त किये गए है, इसके साथ साथ सैंकड़ो पिस्टल बनाने का समान जप्त किया गया है
ये तो हथियार फैक्ट्री थी जो सुलेमान के घर के बेस मेंट में चल रही थी यहाँ से हथियार बनकर अलग अलग जगह सप्लाई होना था, इस मामले में 5 को गिरफ्तार किया गया है, सब एक ही समुदाय के है
ANI
@ANI
Delhi Police Special Cell has busted a manufacturing unit of illegal arms in Meerut and recovered raw materials. 5 persons arrested, 84 pistols recovered.
7:56 AM - Oct 9, 2018
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Suleman Meerut Arms Factory : इसके अलावा मेरठ के ही बुधना में भी छापेमारी की खबर है जहाँ से 2 को गिरफ्तार किया गया है जिनके नाम – उम्मीद अहमद और मंसूर अहमद है, इनके यहाँ भी हथियार की फैक्ट्री चल रही थी, दोनों सगे भाई है, इसके अलावा एक शख्स जिसका नाम इंतज़ार खान है वो फरार बताया जा रहा है
तैयारी पूरी चल रही है, किसी दिन किसी शहर, या कुछ शहरों पर हमला कर पुलिस वालो को कण्ट्रोल कर शहर के लोगों को बंधक बनाकर ISIS का खेल करने की, गजवा हिन्द की ये ही मानसिकता है
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दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हथियारों का ऐसा जखीरा बरामद किया है, जिसे देख लगता है कि भारत में भी जिहाद की बड़े पैमाने पर तैयारियां की जा रही हैं.
बिहार से तो ऑटोमैटिक राइफलें पकड़ी जा ही रही हैं, बंगाल में देसी बम बनाने के कारखाने घर-घर में चल रहे हैं, यूपी के मैनपुरी में भी मोर्टार बरामद हुआ है. अब खबर है कि जिहादियों का अड्डा बन चुके मेरठ में अवैध हथियारों की एक बड़ी फैक्ट्री का पर्दाफ़ाश हुआ है. फैक्ट्री में काम करने वाले मोहम्मद शब्बीर, मोहम्मद इंतियाज़, मोहम्द ओबैतद, मोहम्मद शैदुल्ला ओर नसीम को गिरफ्तार किया है. पांचों आरोपियों में से तीन मुंगेर के हथियार बनाने वाले कारीगर हैं.. आरोपियों के कब्ज़े से करीब 84 घातक हथियार और बड़ी मात्रा में हथियार बनाने वाला रॉ मैटेरियल और असलाह और औजार बरामद किया है. पुलिस अब इनके नेटवर्क से जुड़े अन्य बदमाशो की तलाश में छापेमारी कर रही है.इस फैक्टरी को चलाने वाला सरगना सैदुल्लाह को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है. इसकी कई दिनों से दिल्ली पुलिस को तलाश थी.
कैसे हुआ इस फैक्ट्री का पर्दाफाश
कुछ समय पहले दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने हथियार सप्लाई करने वाले कुछ तस्करों को दबोचा था. आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि ये अवैध हथियार और कारतूस मेरठ और मुंगेर से लाकर सप्लाई किये जा रहे है.दिल्ली पुलिस दानिश नाम के आरोपी को साथ लेकर मेरठ के थाना लिसाड़ी गेट क्षेत्र के लक्खीपुरा गली नम्बर दो में पहुंची थी और पुलिस ने फुरकान नाम के मिस्त्री के घर दबिश दी तो यहां मकान के तहखाने में हथियार बनाने की एक फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ. इस फैक्ट्री में पुलिस ने मुंगेर के रहने वाले ओवैसी हसन, मिंटू और सिद्धू को गिरफ्तार किया है.
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 माओवादी आंदोलन के गर्भ से उदित हुआ मिटू कैम्पेन 
हिन्दू समाज को दुष्चरित्र सिद्ध करने का कुत्सित प्रयत्न
माओवादियों ने आरम्भ किया था मिटू अभियान "मिटू अरबन नक्सल" कहते हुए ट्विटर ट्रेंड आरम्भ किया गया था शहरी माओवादियों द्वारा जब गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, और पी वारवरा राव नाम के पांच दुर्दांत शहरी माओवादियों की गिरफ्तारी हुई थी पुणे पुलिस द्वारा।
माओवादियों ने इनकी गिरफ्तारी पर लंबी चर्चा न हो इसीलिये उस समय एससीएसटी एक्ट और नोटा का मुद्दा उठाया विषय भटकाने के लिए। और अब उन पांचों को जेल भेजने वाली सुनवाई होने वाला है इसीलिये नया छिछोरापन का सिंथेटिक डिस्कोर्स मिटू नाम से चलाया जा रहा है।
मूर्खता का स्तर अच्छा खासा है भारत के हिन्दू समाज में। उसका ही लाभ उठाकर ऐसे सिंथेटिक डिस्कोर्स चलाये जा रहे हैं। उनको पता है कि कुछ भी न जानने वाला, अज्ञान में धंसा हुआ मूर्ख हिन्दू इस सिंथेटिक चर्चा को आगे बढ़ाएगा।
माना कि अनेक लोगों ने अपने जीवन में पाप-दुष्कर्म इत्यादि किया होगा। यदि कोई भी महिला ऐसे किसी भी घृणित कर्म से पीड़ित हुई है कभी भी तो उसके लिए पुलिस और न्यायपालिका की व्यवस्था है। भारत में कानून व्यवस्था है। यहाँ पाकिस्तान की तरह जंगल राज नहीं है। लोगों को पुलिस में या न्यायालय में जाकर न्याय पाने का मौलिक अधिकार भारतीय संबिधान ने उन्हें दिया हुआ है। फिर ये लोग पुलिस थाने में या जिला न्यायालय में क्यों नहीं जा रहे हैं? और सोसल मीडिया एवम मीडिया में ऐसे हंगामें की आवश्यक्ता क्या है?
किसी अपराध या बलात्कार के उपरांत पीड़ित या आरोपित का मुंह ढंककर न्यायालय में प्रस्तुत किये जाने का विधान है। बलात्कार पीड़िता का नाम गुप्त रखनेका विधान है। उसका नाम बदलकर मीडिया में समाचार छापा जाता है। फिर इस सरेआम बेशर्मी का कारण क्या है? माओवादियों मार्क्सवादियों द्वारा वेश्यावृति भारत में फैलाने का कुत्सित प्रयत्न है यह मिटू कैम्पेन।
भारत में यदि पुलिस न होती, न्यायालय न होता तो यह समझा भी जा सकता था कि लोग अपनी पीड़ा के लिए न्याय पाने का प्रयत्न कर रहे हैं नई मीडिया और नए प्लेटफॉर्म पर। किन्तु जब सबके लिए न्याय का अधिकार संबिधान ने सुनिश्चित करते हुए सम्पूर्ण न्यायतंत्र विकसित किया गया है भारत में फिर ऐसा कैम्पेन भारत को अरेबियन देश या यूरोपियन देश की भाँति चरित्रहीन सिद्ध करने का प्रयास मात्र है।
~मुरारी शरण शुक्ल।







Sunday, 7 October 2018

 बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिशनरियां...
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कई वर्ष पहले दूर दक्षिण भारत से बाबा माधवदास नामक एक संन्यासी दिल्ली में ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ प्रकाशन के कार्यालय पहुँचे। उन्होंने सीताराम गोयल की कोई पुस्तक पढ़ी थी, जिसके बाद उन्हें खोजते-खोजते वह आए थे। मिलते ही उन्होंने सीताराम जी के सामने एक छोटी सी पुस्तिका रख दी। यह सरकार द्वारा 1956 में बनी सात सदस्यीय जस्टिस नियोगी समिति की रिपोर्ट का एक सार-संक्षेप था। यह संक्षेप माधवदास ने स्वयं तैयार किया, किसी तरह माँग-मूँग कर उसे छपाया और तब से देश भर में विभिन्न महत्वपूर्ण, निर्णयकर्ता लोगों तक उसे पहुँचाने, और उन्हें जगाने का अथक प्रयास कर रहे थे। किंतु अब वह मानो हार चुके थे और सीताराम जी तक इस आस में पहुँचे थे कि वह इस कार्य को बढ़ाने का कोई उपाय करेंगे।
माधवदास ने देश के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ स्वयं ध्यान से देखी थीं। उन्हें यह देख बड़ी वेदना होती थी कि मिशनरी लोग हिन्दू धर्म को लांछित कर, भोले-भोले लोगों को छल से जाल में फँसा कर, दबाव देकर, भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर आदि विधियों से ईसाइयत में धर्मांतरित करते थे। सबसे बड़ा दुःख यह था कि हिन्दू समाज के अग्रगण्य लोग, नेता, प्रशासक, लेखक इसे देख कर भी अनदेखा करते थे। यह भी माधवदास ने स्वयं अनुभव किया। वर्षों यह सब देख-सुन कर अब वे सीताराम जी के पास पहुँचे थे। सीताराम जी ने उन्हें निराश नहीं किया। उन्होंने न केवल जस्टिस नियोगी समिति रिपोर्ट को पुनः प्रकाशित किया, वरन ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की ऐतिहासिक क्रम में समीक्षा करते हुए ‘छद्म-पंथनिरपेक्षता, ईसाई मिशन और हिन्दू प्रतिरोध’ नामक एक मूल्यवान पुस्तिका भी लिखी। पर ऐसा लगता है कि हिन्दू उच्च वर्ग की की काहिली और अज्ञान पर शायद ही कुछ असर पड़ा हो।
उदाहरण के लिए, सात वर्ष पहले जब ‘तहलका’ ने साप्ताहिक पत्रिका आरंभ की तो अपना प्रवेशांक (7 फरवरी 2004) भारत में ईसाई विस्तार के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र पर केंद्रित किया। इस के लिए अमेरिकी सरकार तथा अनेक विदेशी चर्च संगठनों द्वारा भारी अनुदान, अनेक मिशनरी संगठनों के प्रतिनिधियों से बात-चीत, उनके दस्तावेज, मिशनरियों द्वारा भारत के चप्पे-चप्पे का सर्वेक्षण और स्थानीय विशेषताओं का उपयोग कर लोगों का धर्मांतरण कराने के कार्यक्रम आदि संबंधी भरपूर खोज-बीन और प्रमाण ‘तहलका’ ने जुटा कर प्रस्तुत किया था। किंतु उस पर भारतीय नेताओं, बुद्धिजीवियों, प्रशासकों की क्या प्रतिक्रिया रही? कुछ नहीं, एक अभेद्य मौन! मानो उन्होंने कुछ न सुना हो। जबकि मिशनरी संगठनों में उस प्रकाशन से भारी चिंता और बेचैनी फैली (क्योंकि वे उस पत्रिका को संघ-परिवार का दुष्प्रचार बताकर नहीं बच सकते थे!)। उन्होंने तरह-तरह के बयान देकर अपना बचाव करने की कोशिश की। मगर हिन्दू समाज के प्रतिनिधि निर्विकार बने रहे! हमारे जिन बुद्धिजीवियों, अखबारों, समाचार-चैनलों ने उसी तहलका द्वारा कुछ ही पहले रक्षा मंत्रालय सौदों में रिश्वतखोरी की संभावना का पर्दाफाश करने पर खूब उत्साह दिखाया था, और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस समेत सबके इस्तीफे की माँग की थी। वही लोग उसी अखबार के इस पर्दाफाश पर एकदम गुम-सुम रहे। मानो इस में कोई विशेष बात ही न हो।
ठीक यही पचपन वर्ष पहले नियोगी समिति की रिपोर्ट आने पर भी हुआ था। जहाँ मिशनरी संगठनों में खलबली मच गई थी, वहीं हमारे नेता, बुद्धिजीवी, अफसर, न्यायविद सब ठस बने रहे। अंततः संसद में सरकार ने यह कह कर कि समिति की अनुशंसाएं संविधान में दिए मौलिक अधिकारों से मेल नहीं खाती, मामले को रफा-दफा कर दिया। कृपया ध्यान दें – किसी ने यह नहीं कहा कि समिति का आकलन, अन्वेषण, तथ्य और साक्ष्य त्रुटिपूर्ण है। बल्कि सबने एक मौन धारण कर उसे चुप-चाप धूल खाने छोड़ दिया। (उसके तैंतालीस वर्ष बाद, 1999 में, यही जस्टिस वधवा कमीशन रिपोर्ट के साथ भी हुआ, जिसने उड़ीसा में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या के संबंध में विस्तृत जाँच की थी)। हिन्दू सत्ताधारियों व बौद्धिक वर्ग की इस भीरू भंगिमा को देख कर सहमे हुए मिशनरी संगठनों का साहस तुरत स्वभाविक रूप से बढ़ गया। सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में उनकी गतिविधियाँ इतनी अशांतिकारक हो गईं कि उड़ीसा व मध्य प्रदेश की सरकारों को क्रमशः 1967 और 1968 में धूर्तता और प्रपंच द्वारा धर्मांतरण कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने पड़े। उस से माधवदास जैसे दुखियारों को कुछ प्रसन्नता मिली। मगर वह क्षणिक साबित हुई क्योंकि उन कानूनों को लागू कराने में किसी ने रुचि नहीं ली। जिन स्थानों में मिशनरी सक्रिय थे, वहाँ इन कानूनों को जानने और उपयोग करने वाले नगण्य थे। जबकि शहरी क्षेत्रों में जो हिन्दू यह सब समझने वाले और समर्थ थे, उन्होंने रुचि नहीं दिखाई कि इन कानूनों के प्रति लोगों को जगाकर चर्च के विस्तारवादी आक्रमण को रोकें।
एक अर्थ में आश्चर्य है कि ब्रिटिश भारत में मिशनरी विस्तारवाद के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध सशक्त था, जबकि स्वतंत्र भारत में यह मृतप्राय हो गया। 1947 से पहले के हमारे राष्ट्रीय विचार-विमर्श, साहित्य, भाषणों आदि में इस का नियमित उल्लेख मिलता है कि विदेशी मिशनरी भारतीय धर्म-संस्कृति को लांछित, नष्ट करने और भारत को विखंडित कर जहाँ-जहाँ संभव हो स्वतंत्र ईसाई राज्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। तब हमारे नेता, लेखक, पत्रकार अच्छी तरह जानते थे कि यूरोपीय साम्राज्यवाद और ईसाई विस्तारवाद दोनों मूलतः एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। इसलिए 1947 से पहले के राष्ट्रीय लेखन, वाचन में इस के प्रतिकार की चिंता, भाषा भी सर्वत्र मिलती है। किंतु स्वतंत्रता के बाद स्थिति विचित्र हो गई। स्वयं देश के संविधान में धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान देकर मिशनरी विस्तारवाद को सिद्धांततः वैधता दे दी गई!
जबकि स्वतंत्रता से पहले गाँधीजी जैसे उदार व्यक्ति ने भी स्पष्ट कहा था कि यदि उन्हें कानून बनाने का अधिकार मिल जाए तो वह “सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे जो अनावश्यक अशांति की जड़ है”। पर उन्हीं गाँधी के शिष्यों ने, यह सब जानते हुए भी कि कौन, किन तरीकों, उद्देश्यों से धर्मांतरण कराते हैं, मिशनरियों को उलटे ऐसी छूट दे दी जो उन्हें ब्रिटिश राज में भी उपलब्ध न थी। देशी-विदेशी मिशनरी संगठनों को यह देख आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई, जो उन्होंने छिपाई भी नहीं! उन्होंने भारत को अपने प्रमुख निशाने के रूप में चिन्हित कर लिया। परिणामस्वरूप अंततः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अलगाववाद की आँच सुलग उठी। इसके पीछे असंदिग्ध रूप से मिशनरी प्रेरणाएं थीं।
इसी पृष्ठभूमि में हम बाबा माधवदास जैसे देशभक्तों की वेदना समझ सकते हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता ने हिन्दू धर्म-संस्कृति व समाज की सुरक्षा निश्चित करने के बदले, उल्टे उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है। विदेशी, साम्राज्यवादी, सशक्त संगठनों को खुल कर खेलने से रोकने का कोई उपाय नहीं किया। उन का अवैध, धूर्ततापूर्ण खेल देख-सुन कर भी स्वतंत्र भारत के नेता, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी उस से मुँह चुराने लगे। नियोगी समिति ने जो प्रमाणिक आकलन किया था, उसका महत्व इस में भी है कि स्वतंत्र भारत के मात्र पाँच-सात वर्षों में मिशनरी धृष्टता कितनी बेलगाम हो चली थी। उस रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस की एक-एक बात और अनुशंसाएं आज भी उतनी ही समीचीन हैं। कम से कम हम उसे पढ़ भी लें तो बाबा माधवदास की आत्मा को संतोष होगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में ईसाई मिशनरी संगठनों को भय था कि अब उन का कारोबार बाधित होगा। आखिर स्वयं गाँधीजी जैसे सर्वोच्च नेता ने खुली घोषणा की थी कि कानून बनाने का अधिकार मिलने पर वह सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे। किंतु मिशनरियों की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि उन की दुकान बंद कराने के बदले, भारतीय संविधान में धर्मांतरण कराने समेत धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान मिल गया है! इसमें किसी संदेह को स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने दूर कर दिया था। नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने पत्र (17 अक्तूबर 1952) में स्पष्ट कर दिया, “वी परमिट, बाई अवर कंस्टीच्यूशन, नॉट ओनली फ्रीडम ऑफ कांशेंस एंड बिलीफ बट आलसो प्रोजेलाइटिज्म”। और यह प्रोजेलाइटिज्म मुख्यतः चर्च-मिशनरी करते हैं और किन हथकंडों से करते है, यह उस समय हमारा प्रत्येक नेता जानता था!
जब स्वतंत्र भारत का संविधान बन रहा था, तो संविधान सभा में इस पर हुई पूरी बहस चकित करने वाली है। कि कैसे हिंदू समाज खुली आँखों जीती मक्खी निगलता है। एक ही भूल बार-बार करता, दुहराता है, चोट खाता है, फिर भी कुछ नहीं सीखता! धर्मांतरण कराने समेत ‘धर्म-प्रचार’ को मौलिक अधिकार बनाने का घातक निर्णय मात्र एक-दो सदस्यों की जिद पर कर दिया गया। इसके बावजूद कि धर्म-प्रचार के नाम पर इस्लामी और ईसाई मिशनरियों द्वारा जुल्म, धोखा-धड़ी, रक्तपात और अशांति के इतिहास से हमारे संविधान निर्माता पूर्ण परिचित थे। इसीलिए संविदान सभा में पुरुषोत्तमदास टंडन, तजामुल हुसैन, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, हुसैन इमाम, जैसे सभी सदस्य ‘धर्म-प्रचार’ के अधिकार को मौलिक अधिकार में जोड़ना अनुचित मानते थे। फिर भी केवल “ईसाई मित्रों का ख्याल करते हुए” उसे स्वीकार कर बैठे! यह उस हिन्दू भोलेपन का ही पुनः अनन्य उदाहरण था जो ‘पर-धर्म’ को गंभीरता-पूर्वक न जानने-समझने के कारण इतिहास में असंख्य बार ऐसी भूलें करता रहा है।
इसीलिए स्वतंत्र भारत में मिशनरी कार्य-विस्तार की समीक्षा करते हुए जेसुइट मिशनरी फेलिक्स अलफ्रेड प्लैटर ने अपनी पुस्तक द कैथोलिक चर्च इन इंडियाः येस्टरडे एंड टुडे (1964) में भारी प्रसन्न्ता व्यक्त की। उन्होंने सटीक समझा कि भारतीय संविधान ने न केवल भारत में चर्च को अपना धंधा जारी रखने की छूट दी है, बल्कि “टु इनक्रीज एंड डेवलप हर एक्टिविटी ऐज नेवर बिफोर विदाउट सीरियस हिंडरेंस ऑर एंक्जाइटी”। यह निर्विघ्न, निश्चिंत, अपूर्व छूट पाने का ही परिणाम हुआ कि चार-पाँच वर्ष में ही कई क्षेत्रों में मिशनरी गतिविधियाँ अत्यंत उछृंखल हो गईं। तभी सरकार ने मिशनरी गतिविधियों का अध्ययन करने और उस से उत्पन्न समस्याओं पर उपाय सुझाने के लिए 1954 में जस्टिस बी. एस. नियोगी की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय समिति का गठन किया। इस में ईसाई सदस्य भी थे। समिति ने 1956 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसका संपूर्ण आकलन आँखें खोल देने वाला था। किंतु कोई कार्रवाई नहीं हुई। न किसी ने उस के तथ्यों, साक्ष्यों को चुनौती दी, न खंडन किया। केवल मौन के षड्यंत्र द्वारा उसे इतिहास के तहखाने में डाल दिया गया।
तब से आधी शती बीत गई, किंतु उस के आकलन और अनुशंसाएं आज भी सामयिक हैं। जो सामग्री नियोगी समिति ने इकट्ठा की उस से वह इस परिणाम पर पहुँची कि मिशनरी गतिविधियाँ किसी राज्य या देश की सीमाओं में स्वायत्त नहीं है। उनका चरित्र, संगठन और नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय है। जब समिति ने कार्य आरंभ किया तब पहले तो ईसाई मिशनों ने सहयोग की भंगिमा अपनाई। किंतु जब उन्होंने देखा कि समिति अपने काम में गंभीर है तब उन्होंने बहिष्कार किया। फिर नागपुर उच्च न्यायालय जाकर इस का कार्य बंद कराने का प्रयास किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि समिति का गठन और कार्य किसी नियम के विरुद्ध नहीं है।
अपनी जाँच-पड़ताल के सिलसिले में नियोगी समिति चौदह जिलों में, सतहत्तर स्थानों पर गई। वह ग्यारह हजार से अधिक लोगों से मिली, उस ने लगभग चार सौ लिखित बयान एकत्र किए, इसकी तैयार प्रश्नावली पर तीन सौ पचासी उत्तर आए जिस में पचपन ईसाइयों के थे और शेष गैर-ईसाइयों के। समिति ने सात सौ गाँवों से भिन्न-भिन्न लोगों का साक्षात्कार लिया। समिति ने पाया कि कहीं किसी ने ईसा की निंदा नहीं की, सभी जगह केवल अवैध तरीकों से धर्मांतरण कराने पर आपत्ति थी। यह आपत्तियाँ सुदूर क्षेत्रों में, जहाँ यातायात न होने के कारण शासन या प्रेस का ध्यान नहीं, वहाँ गरीब लोगों को नकद धन देने; स्कूल-अस्पताल की बेहतर सुविधाएं देने के लोभ; नौकरी देने; पैसे उधार देकर दबाव डालने; नवजात शिशुओं को आशीर्वाद देने के बहाने जबरन बप्तिस्मा करने; आपसी झगड़ों में किसी को मदद कर के बाद में दबाव डालने; छोटे बच्चों और स्त्रियों का अपहरण करने; तथा विदेशों से आने वाले धन के सहारे इन्हीं तरीकों से किसी क्षेत्र में पर्याप्त धर्मांतरण करा कर पाकिस्तान जैसा स्वतंत्र ईसाई राज्य बना लेने के प्रयासों, आदि संबंधी थीं।
समिति ने पाया कि लूथरन और कैथोलिक मिशनों द्वारा नीतिगत रूप से धर्मांतरित ईसाइयों में अलगाववादी भाव भरे जाते हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि धर्म बदल लेने के बाद उनकी राष्ट्रीयता भी वही नहीं रहती जो पहले थी। अतः अब उन्हें स्वतंत्र ईसाई राज्य का प्रयास करना चाहिए। मिशनरी दस्तावेजों, पुस्तकों, कार्यक्रमों आदि का अध्ययन कर समिति ने पाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत के प्रति मिशनरी नीतियाँ हैं – (1) राष्ट्रीय एकता का प्रतिरोध करना, (2) भारत और अमेरिका के बीच सहअस्तित्व के सिद्धांत से मतभेद, (3) भारतीय संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए मुस्लिम लीग जैसी ईसाई राजनीतिक पार्टी बनाकर अंततः एक स्वतंत्र राज्य बनाना अथवा कम से कम एक जुझारू अल्पसंख्यक समुदाय बनाना। भारतीय संविधान की उदारता देखकर यूरोप और अमेरिका में मिशनरी सूत्रधारों ने अपना ध्यान भारत पर केंद्रित किया, समिति ने इसके भी प्रमाण पाए।
किंतु समिति की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण अंश मध्य प्रदेश में मिशनरी गतिविधियों की स्थिति पर था। उस ने पाया कि जिन क्षेत्र में स्वतंत्रता से पहले स्वायत्त रजवाड़ो का शासन था और मिशनरियों पर अंकुश था, अब वहाँ उनकी गतिविधियाँ तीव्र हो गई हैं। इन नए खुले क्षेत्रों में पिछड़े आदिवासियों को धर्मांतरित कराने के लिए विदेशी धन उदारता से आ रहा है। ‘आज्ञाकारिता में भागीदारी’ नामक सिद्धांत के अंतर्गत चर्च को बताया जाता है कि वे जमीन से जुड़े रहें, किंतु अपनी निष्ठा और आज्ञाकारिता को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखें। समिति ने ईसाई स्त्रोतों से ही पाया कि वे मानते हैं कि उन के कार्य में सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति केवल धन है, हर जगह, हर समय, हर चीज धन पर ही निर्भर है। यहाँ तक कि जो भी व्यक्ति मिशनरियों से मिलने आता है केवल धन के लिए। भारतीय ईसाई विदेशी मिशनरियों का स्वागत भी केवल पैस के लिए करते हैं। कहीं किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक चर्चा या प्रेरणा का नामो-निशान नहीं था।
यह तथ्य एक लाक्षणिक उदाहरण भर था कि ‘नेशनल क्रिश्चियन काऊंसिल ऑफ इंडिया’ के खर्च का मात्र बीसवाँ अंश ही भारतीय स्त्रोतों से आता है, शेष बाहर से। कमो-बेश आज भी स्थिति वही है। यह कितनी विचित्र बात है कि जब जोर-जबर्दस्ती, छल-प्रपंच आदि द्वारा ईसाइयत विस्तार कार्यक्रमों पर चिंता होती है, तो ईसाइयत को भारत में दो हजार वर्ष पुराना, इसलिए, ‘भारतीय’ धर्म बताया जाता है। किंतु जब उसे राष्ट्रीय और आत्मनिर्भर होने के लिए कहा जाता है, तो उसे निर्बल होने के कारण विदेशी सहायता की आवश्यकता का तर्क दिया जाता है! जो भी हो, नियोगी समिति ने विदेशी स्त्रोतों से मिशनरी कार्यों के लिए आने वाले धन का भी हिसाब किया था और पाया कि ‘शिक्षा और चिकित्सा’ के लिए आए धन का बड़ा हिस्सा धर्मांतरण कराने पर खर्च किया जाता है।
जिन तरीकों से यह कार्य होता है वह आज भी तनिक भी नहीं बदले हैं। नियोगी समिति ने ठोस उदाहरण नोट किए थे। हरिजनों, आदिवासी छात्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें दी जानी वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ईसाई प्रार्थनाओं में शामिल होने की शर्त से जोड़ा जाता है। बाइबिल कक्षा में शामिल न होने को पूरे दिन की अनुपस्थिति के रूप में दंडित किया जाता है। स्कूल के उत्सवों का उपयोग ईसाई चिन्ह की अन्य धर्मों के चिन्हों पर विजय दिखाने के लिए किया जाता है। अस्पतालों में गरीब मरीजों को ईसाई बनने के लिए दबाव दिया जाता है। सबसे जोरदार फसल अनाथालयों में काटी जाती है जहाँ बाढ़, भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा में तबाह परिवारों के बच्चों को लाकर सबको ईसाई बना लिया जाता है। अधिकांश धर्मांतरण अनिच्छा से होते हैं, क्योंकि सबमें किसी न किसी लाभ-लोभ की प्रेरणा रहती है। समिति ने पाया कि किसी ने अपने नए धर्म का कोई अध्ययन या विचार जैसा कभी कुछ नहीं किया। धर्मांतरित लोग केवल साधारण आदिवासियों के झुंड थे जिनकी चुटिया कटवा कर बस उन्हें ईसाई के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।
रोमन कैथोलिक मिशनरी जरूरतमंदों को उधार देकर बाद में उसे वापस न करने के बदले ईसाई बनाने की विधि में सिद्धहस्त हैं। अन्य ईसाई मिशनरियों ने ही नियोगी समिति को यह बात बतायी। यदि कोई वापस करना चाहे तो उसे कड़ा ब्याज देना पड़ता है। कर्ज पाने की शर्त में भी कर्ज माँगने वाले को अपने हिन्दू चिन्ह छोड़ने, जैसे सिर की चोटी कटाने को कहा जाता है। कई लेनदार किशोर उम्र के और मजदूर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति कर्ज लेता है, तो मिशनरी रजिस्टर में उस के पूरे परिवार को संभावित धर्मांतरितों में नोट कर लिया जाता है। कर्ज लेते समय ही एक वर्ष का ब्याज उस में से काट लिया जाता है। समिति को अपने संपूर्ण आकलन, अन्वेषण के दौरान एक भी ऐसा धर्मांतरित ईसाई न मिला जिस ने धन के लोभ या दबाव के बिना ईसाई बनना स्वीकार किया हो!
कितने आश्चर्य है कि जो प्रगतिवादी लेखक संगठन और वामपंथी नाट्यकर्मी प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूँ’ पर हजारों नाटक मंचित कर चुके हैं, वे मिशनरियों की इस स्थायी, अवैध और घृणित महाजनी पर कभी कोई नाटक क्यों नहीं करते! मगर इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि भारतीय वामपंथियों को वैसा हर साम्राज्यवाद प्रिय है जिसका निशाना हिन्दू समाज हो।
मिशनरी साहित्य में हिन्दू देवी-देवताओं की छवियों और उन की पूजा पर अत्यंत भद्दे आक्षेप रहते हैं। स्कूलों में मंचित नाटकों में उनकी हँसी उड़ाई जाती है। उनका मखौल बनाने वाले गाने लिखे, गाए जाते हैं। हिन्दू ग्रंथों को विकृत करके प्रस्तुत किया जाता है। संविधान बनने के बाद से सरगुजा जिले में बने ईसाइयों की एक सूची सरकार ने समिति को दी थी। नियोगी समिति ने पाया कि वहाँ दो वर्ष में चार हजार उराँव ईसाई बने। उन में एक वर्ष से साठ वर्ष के पुरुष, स्त्री शामिल थे। समिति ने पाया कि उन में अपने नए धर्म का कहीं, कोई भाव लेश मात्र न था। प्रायः लोगों को झुंड में थोक भाव में धर्मांतरित करा लिया जाता है। किंतु रोमन कैथोलिक मिशनों ने समिति को अपने द्वारा धर्मांतरित कराए लोगों का विवरण नहीं दिया। क्योंकि उस से यह सच्चाई सामने आ जाती कि वह स्वेच्छा से नहीं, बल्कि संगठित, प्रायोजित हुआ था।
नियोगी समिति का प्रमाणिक निष्कर्ष था कि धर्मांतरण लोगों को राष्ट्रीय भावनाओं से विलग करता है (यही अपने समय में गाँधीजी ने भी कहा था)। धर्मांतरित ईसाइयों को सचेत रूप से इस दिशा में धकेला जाता है। उन से ‘राम-राम!’ या ‘जय हिन्द’ जैसे अभिवादन छुड़वा कर ‘जय यीशू’ कहना सिखाया जाता है। मिशनरी स्कूलों के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर ईसाई झंडा लगाया जाता है। ईसाई अखबारों में गोवा पर पुर्तगाल की औपनिवेशिक सत्ता बने रहने के पक्ष में लेख रहते थे, और इस बात की आलोचना की जाती थी कि भारत उसे अपना अंग बनाना चाहता है (तब गोवा पुर्तगाल के अधिकार में था)।
मिशनरी गतिविधियों की एक तकनीक समिति ने नोट की कि वह स्थानीय शासन और सरकार पर नियमित आरोप और शिकायतें करके एक दबाव बनाए रखते हैं, ताकि कोई उन की अवैध कारगुजारियों पर ध्यान देने का विचार ही न करे। यह एक जबरदस्त तकनीक है जो आज भी बेहतरीन रूप से कारगर है। समिति ने पाया कि मध्य प्रदेश शासन मिशनरी सक्रियता के क्षेत्रों में पूरी तरह तटस्थ रहा है, उस ने कभी कोई हस्तक्षेप किया हो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिला। किंतु मिशनरी संगठन सरकार पर प्रायः कोई न कोई भेद-भाव जैसी शिकायत करते रहने की आदत रखते हैं। समिति ने पाया था कि यह प्रशासनिक अधिकारियों को रक्षात्मक बनाए रखने की पुरानी मिशनरी तकनीक रही है। यही आज भी देखा जाता है, जब दिल्ली, गुजरात, झारखंड, उड़ीसा या मध्य-प्रदेश में मिशनरी संगठन अकारण या उलटी बयानबाजी करके सरकार को रक्षात्मक बने रहने के लिए विवश करते हैं। उलटा चोर कोतवाल को डाँटे जैसी सफल तकनीक।
नियोगी समिति ने अनेकानेक मिशनरी दस्तावेजों का अध्ययन करके पाया था कि भारत में मिशनरी धर्मांतरण गतिविधियाँ एक वैश्विक कार्यक्रम के अंग हैं जो पूरे विश्व पर पश्चिमी दबदबा पुनर्स्थापित करने की नीति से जुड़ी हुई हैं। उस में कोई आध्यात्मिकता का भाव नहीं, बल्कि गैर-ईसाई समाजों की एकता छिन्न-भिन्न करने की चाह है। जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। समिति की राय में ईसाई मिशन भारत के ईसाई समुदाय को अपने देश से विमुख करने का प्रयास कर रहे हैं। यानी, धर्मांतरण कार्यक्रम कोई धार्मिक दर्शन नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य के अंग हैं। भारत के चर्च स्वतंत्र नहीं, बल्कि उन के प्रति उत्तरदायी हैं जो उनके रख-रखाव का खर्च वहन करते हैं। समिति के अनुसार धर्मांतरण दूसरे तरीके से राजनीति के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
यह संयोग नहीं है कि नियोगी समिति ने अवैध, राष्ट्र-विरोधी, समाज-विरोधी मिशनरी गतिविधियों को रोकने के लिए जो अनुशंसाएं दी थीं, उन का आज भी उतना ही मूल्य है। वे अनुशंसाएं यह थीं – (1) जिन विदेशी मिशनों का प्राथमिक कार्य मात्र धर्मांतरण कराना है, उन्हें देश से चले जाने के लिए कह देना चाहिए, (2) चिकित्सा और अन्य सेवाओं के माध्यम से धर्मांतरण बंद करने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए, (3) किसी की विवशता, बुद्धिहीनता, अक्षमता, असहायता आदि का लाभ उठाते हुए धोखे या दबाव से धर्मांतरण को पूर्णतः प्रतिबंधित करना चाहिए, (4) विदेशियों द्वारा तथा छल-प्रपंच से धर्मांतरण रोकने के लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन होना चाहिए, (5) अवैध तरीकों से धर्मांतरण बंद करने के लिए नए कानून बनने चाहिए, (6) अस्पतालों में नियुक्त डॉक्टरों, नर्सों और अन्य अधिकारियों के रजिस्ट्रेशन में ऐसे संशोधन करने चाहिए जिस से उनके द्वारा किसी मरीज के ईलाज और सेवा के कार्यों के दौरान उस का धर्मांतरण न होने की शर्त हो, (7) बिना राज्य सरकार की अनुमति के धार्मिक प्रचार वाले साहित्य के वितरण पर प्रतिबंध हो।
जब नियोगी समिति की यह रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो मिशनरी संगठनों ने इसे तानाशाही की ओर बढ़ने का उपाय बताकर निंदा की। किंतु किसी ने इस रिपोर्ट के तथ्यों, आकलनों को मिथ्या कहने का साहस नहीं किया। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे नेताओं, प्रशासकों, बुद्धिजीवियों ने समिति की किसी अनुशंसा को लागू करने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि रोग, उस के फैलने के तरीके, उस से होने वाली हानि और देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा भी यथावत है। इस अर्थ में नियोगी समिति की ऐतिहासिक रिपोर्ट आज पचपन वर्ष बाद भी सामयिक और पठनीय है।
बाबा माधवदास संभवतः अब नहीं हैं, किंतु उनकी वेदना का कारण यथावत है। न रोग दूर हुआ, न उस के निदान की कोई चिंता है। कंधमाल (उड़ीसा) की घटनाएं इस का नवीनतम प्रमाण हैं। नियोगी समिति ने उस के सटीक उपचार के लिए जो सुचिंतित, विवेकपूर्ण अनुशंसाएं दी थीं। वह आज भी उतनी ही आवश्यक हैं जितनी तब थीं। परंतु उस के प्रति हिन्दू उच्च वर्ग की उदासीनता भी लगभग वैसी ही है। इन में वैसे हिन्दू भी हैं जो सभी बातें जानते हैं, किंतु अपने सुख-चैन में खलल डाल कोई कार्य नहीं करना चाहते। कोई दूसरा कर दे तो उन्हें अच्छा ही लगता है। पर उसके लिए एक शब्द कहने तक का कष्ट वह उठाना नहीं चाहते।
इस भीरू प्रवृत्ति को महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने ‘म्यूनिख भावना’ की संज्ञा दी थी। इस मुहावरे की उत्पत्ति 1938 में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के बीच हुए म्यूनिख समझौते के बाद हुई। उस समझौते में महत्वपूर्ण यूरोपीय देशों ने चेकोस्वोवाकिया को हिटलरी जर्मनी की दया पर छोड़ कर स्वयं को सुरक्षित समझ लिया था। अपने नोबेल पुरस्कार भाषण (1970) में सोल्झेनित्सिन ने कहा था, “The spirit of Munich is a sickness of the will of successful people, it is the daily condition of those who have given themselves up to the thirst after prosperity at any price, to material well-being as the chief goal of earthly existence. Such people – and there are many in today’s world – elect passivity and retreat, just so that their accustomed life might drag on a bit longer, just so as not to step over the threshold of hardship today – tomorrow, you’ll see, it will all be all right. (But it will never be alright! The price of cowardice will only be evil; we shall reap courage and victory only when we dare to make sacrifices.)” भारत के उच्च वर्गीय हिन्दुओं में यह भावना केवल ईसाई मिशनरियों के आध्यात्मिक आक्रमण के प्रति ही नहीं, बल्कि इस्लामी आतंकवाद, कश्मीरी मुस्लिम अलगाववाद और नक्सली विखंडनवाद जैसे उन सभी घातक परिघटनाओं के प्रति है जिनका निहितार्थ उन्हें मालूम है। किंतु इन से लड़ने के लिए वे कोई असुविधाजनक कदम उठाना तो दूर, दो सच्चे शब्द कहने से भी वे कतराते हैं।
साभार: डॉ० शंकर शरण

Friday, 5 October 2018

 आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध.!
 अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की।
 यदि  बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा , उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।
एक बार जब गौतम बुद्ध के मित्र प्रसेनादी को पता चला कि उन की पत्नी पूरी शाक्य नहीं, बल्कि एक दासी से उत्पन्न शाक्य राजा की पुत्री है, तब उस ने उस का और उस से हुए अपने पुत्र का परित्याग कर दिया। किन्तु बुद्ध ने अपने मित्र को समझा कर उस का कदम वापस करवाया। तर्क यही दिया कि पंरपरा से संतान की जाति पिता से निर्धारित होती है, इसलिए शाक्य राजा की पुत्री शाक्य है। यदि बुद्ध को जाति-प्रथा से कोई विद्रोह करना होता, या नया मत चलाना होता, तो उपयुक्त होता कि वे सामाजिक, जातीय परंपराओं का तिरस्कार करने को कहते। बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं किया। कभी नहीं किया।
बुद्ध का यह व्यवहार सुसंगत था। तुलनात्मक धर्म के प्रसिद्ध ज्ञाता डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने इस पर बड़ी मार्के की बात कही है कि जिसे संसार को आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो, वह सामाजिक मामलों में कम से कम दखल देगा। कोई क्रांति करना, नया राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाना तो बड़ी दूर की बात रही! एल्स्ट के अनुसार, ‘यदि किसी आदमी के लिए अपनी ही मामूली कामनाएं संतुष्ट करना एक विकट काम होता है, तब किसी कल्पित समानतावादी समाज की अंतहीन इच्छाएं पूरी करने की ठानना कितना अंतहीन भटकाव होगा!’
अतः यदि बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था, तो यह तर्कपूर्ण था कि वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में कम-से-कम हस्तक्षेप करते। उन की चिन्ता कोई ‘ब्राह्मण-वाद के विरुद्ध विद्रोह’, राजनीतिक कार्यक्रम, आदि की थी ही नहीं, जो आज के मार्क्सवादी, नेहरूवादी या कुछ अंबेदकरवादी उन में देखते या भरते रहते हैं। इसीलिए स्वभावतः बुद्ध के चुने हुए शिष्यों में लगभग आधे लोग ब्राह्मण थे। उन्हीं के बीच से वे अधिकांश प्रखर दार्शनिक उभरे, जिन्होंने समय के साथ बौद्ध-दर्शन और ग्रंथों को महान-चिंतन और गहन तर्क-प्रणाली का पर्याय बना दिया।
यह भी एक तथ्य है कि भारत के महान विश्वविद्यालय बुद्ध से पहले की चीज हैं। तक्षशिला का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गौतम बुद्ध के पहले से था, जिस में बुद्ध के मित्र बंधुला और प्रसेनादी पढ़े थे। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ पढ़े थे। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि बौद्धों ने उन्हीं संस्थाओं को और मजबूत किया जो उन्हें हिन्दू समाज द्वारा पहले से मिली थी। बाद में, बौद्ध विश्वविद्यालयों ने भी आर्यभट्ट जैसे अनेक गैर-बौद्ध वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया। इसलिए, वस्तुतः चिंतन, शिक्षा और लोकाचार किसी में बुद्ध ने कोई ऐसी नई शुरुआत नहीं की थी जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान, परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जा सकता हो।
ध्यान दें, बुद्ध ने भविष्य में अपने जैसे किसी और ज्ञानी (‘मैत्रेय’, मित्रता-भाईचारा का पालक) के आगमन की भी भविष्यवाणी की थी, और यह भी कहा कि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा। यदि बुद्ध के लिए कुल, जाति और वंश महत्वहीन होते, तो वे ऐसा नहीं कह सकते थे। उन्होंने अपने मित्र प्रसेनादी को वही समझाया, जो सब से प्राचीन उपनिषद में सत्यकाम जाबालि के संबंध में तय किया गया था। कि यदि उस की माता दासी भी थी, तब भी परिस्थिति उस के पिता को ब्राह्मण कुल का ही कोई व्यक्ति दिखाती थी, अतः वह ब्राह्मण बालक था और इस प्रकार अपने गुरू द्वारा स्वीकार्य शिष्य हुआ। उसी पारंपरिक रीति का पालन करने की सलाह बुद्ध ने अपने मित्र को दी थी।
इसीलिए वास्तविक इतिहास यह है कि पूर्वी भारत में गंगा के मैदानों वाले बड़े शासकों, क्षत्रपों ने गौतम बुद्ध का सत्कार अपने बीच के विशिष्ट व्यक्ति के रूप में किया था। क्योंकि बुद्ध वही थे भी। उन्हीं शासकों ने बुद्ध के अनुयायियों, भिक्षुओं के लिए बड़े-बड़े मठ, विहार बनवाए।
जब बुद्ध का देहावसान हुआ, तब आठ नगरों के शासकों और बड़े लोगों ने उन की अस्थि-भस्मी पर सफल दावा किया थाः ‘हम क्षत्रिय हैं, बुद्ध क्षत्रिय थे, इसलिए उन के भस्म पर हमारा अधिकार है।’ बुद्ध के देहांत के लगभग आधी शती बाद तक बुद्ध के शिष्य सार्वजनिक रूप से अपने जातीय नियमों का पालन निस्संकोच करते मिलते हैं। यह सहज था, क्योंकि बुद्ध ने उन से अपने जातीय संबंध तोड़ने की बात कभी नहीं कही। जैसे, अपनी बेटियों को विवाह में किसी और जाति के व्यक्ति को देना, आदि।
अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।
पुराने बौद्ध विहारों, मठों, मंदिरों को भी देखें तो उन में वैदिक प्रतीकों और वास्तु-शास्त्र की बहुतायत मिलेगी। वे पुराने हिन्दू नमूनों का ही अनुकरण करते रहे हैं। बौद्ध मंत्रों में, भारत से बाहर भी, वैदिक मंत्रों की अनुकृति मिलती है। जब बुद्ध धर्म भारत से बाहर फैला, जैसे चीन, जापान, स्याम, आदि देशों में, तो यहाँ से वैदिक देवता भी बाहर गए। उदाहरण के लिए, जापान के हरेक नगर में देवी सरस्वती का मंदिर है। सरस्वती को वहाँ ले जाने वाले ‘धूर्त ब्राह्मण’ नहीं, बल्कि बौद्ध लोग थे!
अपने जीवन के अंत में बुद्ध ने जीवन के सात सिद्धांतों का उल्लेख किया था, जिन का पालन करने पर कोई समाज नष्ट नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने सुंदर उपन्यास ‘सप्त-शील’ (1960) में उसी को वैशाली गणतंत्र की पृष्ठभूमि में अपना कथ्य बनाया है। इन सात सदगुणों में यह भी हैं – अपने पर्व-त्योहार का आदर करना एवं मनाना, तीर्थ व अनुष्ठान्न करना, साधु-संतों का सत्कार करना। हमारे अनेक त्योहार वैदिक मूल के हैं। बुद्ध से समय भी पर्व-त्योहार अपने से पहले के ही थे। महाभारत में भी नदी किनारे तीर्थ करने के विवरण मिलते हैं। सरस्वती और गंगा के तटों पर बलराम और पांडव तीर्थ करने गए थे। 
 जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों की बात है, बुद्ध ने कभी पुराने व्यवहारों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। यदि कुछ कहा, तो उन का आदर और पालन करने के लिए ही। इस प्रकार, कोई विद्रोही या क्रांतिकारी होने से ठीक उलट, गौतम बुद्ध पूरी तरह परंपरावादी थे। उन्होंने चालू राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सलाह दी थी। वे आजीवन एक हिन्दू दार्शनिक रहे। डॉ. एल्स्ट के शब्दों में, ‘बुद्ध अपने पोर-पोर में हिन्दू थे।’ लेकिन ठीक इसी बात को नकारने के लिए बुद्ध धर्म की भ्रांत व्याख्या की जाती रही है। इसे परखना चाहिए।
( लेखक : डॉ० शंकर शरण )
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Opus_Dei 
 काँग्रेस_और_भारत
Opus Dei लैटिन में ओपस डी का अर्थ होता है भगवान का काम…!!
ओपस डी की स्थापना स्पेन में की गई थी और बीबीसी संवाददाता मैक्स सीट्ज़ के अनुसार इस संगठन कैथोलिक धर्म का सबसे प्रभावशाली संगठन माना जा सकता है...इस संगठन पर ईसाई धर्म को मानने वालों को भटकाने का आरोप लगता रहा है जिसे संगठन खारिज करता है , स्पेन की सड़कों पर लोगों से बातचीत करने पर वो कहते हैं कि ओपस डी एक गुप्त संस्था है जो राजनीति और व्यवसाय को प्रभावित करता है,,ओपस डी का दावा है कि पूरी दुनिया में उसके 85000 सदस्य हैं जिसमें से एक तिहाई स्पेन में हैं.
सदस्यों को कहा है जाता है कि वो और लोगों को अपने काम के ज़रिए ईसाई बनने के लिए प्रेरित करें , तीन साल पहले 2002 में ओपस डी के संस्थापक जोसे मारिया एस्क्रिवा को उनकी मौत के मात्र 27 साल बाद जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने सम्मानित किया था तो उस समारोह में दुनिया भर से हज़ारों ओपस डी सदस्य वैटिकन पहुंचे थे.
पोप ने ओपस डी को विशेष दर्ज़ा दिया जिससे संगठन कई प्रकार की सुविधाएं मिल गई. यह भी कहा जाता है कि पोप जॉन पॉल द्वितीय के समय में ओपस डी अत्यधिक प्रभावी हो गया.
हालांकि ओपस डी संगठन के प्रवक्ता जैक वलेरो इसका खंडन करते हैं वो कहते हैं ” वैटिकन में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो ओपस डी के सदस्य हैं. पांच या छह लोग हैं मात्र जिनमें से एक पोप के प्रवक्ता जोआक्विन नवारो वाल्स भी हैं.
वैटिकन पर ओपस डी के प्रभाव को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है. “आलोचकों का कहना है कि दुनिया में ऐसे पादरियों की संख्या बहुत अधिक है जो ओपस डी से जुड़े हुए हैं. इससे चर्च के अलावा चर्च जैसी एक और संस्था का भ्रम होता है, दुनिया भर की कई सरकारों के नेता और अधिकारीगण भी ओपस डी से जुड़े हुए हैं. इनमें से एक नाम ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री रुथ केली का भी है..!!
 कोलंबिया के राष्ट्रपति अल्वारो उरीबे भी ओपस डी के सदस्य कहे जाते हैं लेकिन उन्होंने इन ख़बरों की पुष्टि नहीं की है, प्रवक्ता जैक वलेरो का कहना है कि धर्म एक ऐसी चीज़ है जो निजी होती है और ओपस डी की सदस्यता भी निजी मसला है, यह पता करना मुश्किल काम है कि ओपस डी के पास पैसा कितना है लेकिन इतना तय है कि दुनिया भर की कई संस्थाएं ओपस डी चलाती है और उसे अपने सदस्यों से भारी रकम मिलती है,ऐसी ही एक पूर्व न्यूमरेरी कारमेन चारो कहती हैं कि इन केंद्रों में जीवन एक सपने जैसा होता है,वो कहती हैं ” इन केंद्रों में आपकी दुनिया कोई और ही चलाता है. उन पर धार्मिक गुरुओं का नियंत्रण रहता है. आपके पैसे पर और आपकी पूरी ज़िदगी उनके हाथ में होती है , “हालांकि ओपस डी कहता है कि ऐसे केंद्रों में लोग अपनी मर्ज़ी से आते हैं और संगठन छोड़ने के लिए वो पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं,प्रवक्ता जोसे मारिया कहते हैं कि यह संगठन भी लोग ही चलाते हैं और उनसे ग़लतियां भी हो सकती हैं..!
विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने भी कांग्रेस व यूपीऐ अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया था कि वे ईसाई धर्म के लिए काम करनेवाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘ओपस डी’ के नेटवर्क का हिस्सा हैं।

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Monday, 1 October 2018



खोपड़ी ना हिल जाये तो कहना :
१५ साल की उम्र में गाँधी जी वेश्या की चोखट से हिम्मत न जुटा पाने के कारण वापस लौट आये .
१६ साल की उम्र में पत्नी से सम्भोग की इच्छा से मुक्त नहीं हो पाए जब उनके पिता मृत्यु शैया पर थे .
२१ साल की उम्र में फिर उनका मन पराई स्त्री को देखकर विकारग्रस्त होता है .
२८ साल की उम्र में हब्सी स्त्री के पास जाते है लेकिन शर्मसार होकर वापिस आ जाते है .
३१ साल की उम्र में १ बच्चे के पिता बन जाते है .
४० साल की उम्र में अपने दोस्त हेनरी पोलक की पत्नी के साथ आत्मीयता महसूस करते है ,
४१ साल की उम्र में मोड नाम की लड़की से प्रभवित होते है .
४८ की उम्र में २२ साल की एस्थर फेरिंग के मोहजाल में फंस जाते है .
५१ की उम्र में ४८ साल की सरला देवी चोधरानी के प्रेम में पड़तेहै .
५६ की उम्र में ३३ साल की मेडलिन स्लेड के प्रेम में फंसते है .
६० की उम्र में १८ साल की महाराष्ट्रियन प्रेमा के माया जाल में फंस जाते है .
६४ की उम्र में २४ साल की अमेरिकाकी नीला नागिनी के संपर्क में आते है .
६५ की उम्र में ३५ साल की जर्मन महिला मार्गरेट स्पीगल को कपडे पहनना सिखाते है .
६९ की उम्र में १८ साल की डॉक्टर शुशीला नैयर से नग्न होकर मालिश करते है.
७२ की उम्र में बाल विधवा लीलावती आसर,पटियाला के बड़े जमींदार की बेटी अम्तुस्स्लाम ,कपूरथला खानदान की राजकुमारी अमृत कौर तथा मशहूर समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती जैसी महिलाओ के साथ सोते है .
७६ की उम्र में १६ साल की आभा .वीणा और कंचन नाम की युवतिओं को नग्न होने को कहते है . जिस पर ये लडकिया कहती है की उन्हें ब्रह्मचर्य के बजाय सम्भोग की जरूरत है .
७७ की उम्र मे महात्मा गाँधी अपनी पोती मनु की साथ नोआखाली की सर्द रातें शरीर को गर्म रखने के लिए नग्न सोकर गुजारते है . और
७९ के गाँधी जी महात्मा जीवन के अंतिम क्षणों तक आभा और मनु के साथ एक साथ बिस्तर पर सोते है………………….
आपको इनके बारे मे क्या कहना है??
वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे।।
हरी ॐ
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मोहनदास करमचंद गांधी मुसलमानो से डर गए थे -
यह एक विवादस्पद मगर सच है कि १९०८ में एक घटना के बाद गाँधी जी में मुसलामानों के प्रति कड़ा रवैया बदलकर पक्षपात करना शुरू किया। हुआ यूं कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार ने वहां रहने वाले भारतीयों पर ३ पौंड का टेक्स लगाया, गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से इस विषय में बहस की जिसे मुसलामानों ने सहयोग नहीं दिया तब गाँधी जी ने इसकी जबरदस्त आलोचना की एक सामूहिक वकतव्य में इस्लाम पर कड़ी बात भी कही जिससे मुसलामानों में रोष बढ़ा, १० फरवरी १९०८ को मीर आलम नामक पठान की अगुआई में एक दस्ते ने गाँधी जी की उनके निवास पर बेरहमी से पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी भी दी। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि इस घटना के बाद गाँधी जी ने आपत्तिजनक वक्तव्य तो देने बंद कर ही दिए, साथ ही उनकी सभी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहे और उनके अपराध तक को शह देने लगे।

२३ दिसंबर १९२६ : श्रद्धानंद स्वामी जब बीमार थे और बिस्तर पर लेटे थे तब अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उन्हें चाकू से गोद कर मार डाला, श्रद्धानंद स्वामी एक आर्य समाज के प्रचारक थे और धर्म परिवर्तन कर चुके मुसलामानों को शुद्धि योजना द्वारा वापस हिन्दू धर्म में लाना चाहते थे, गाँधी जी का बड़ा बेटा हीरालाल जो मुसलमान बन चूका था इन्ही स्वामी द्वारा वापस हिन्दू बना था। एक मुसलमान महिला, जो स्वामी के पास हिन्दू धर्म में वापस जाने के लिए आयी तब उसके मुस्लिम पति के अदालत का सहारा लेकर स्वामी पर इलज़ाम भी लगाया लेकिन अदालत ने स्वामी को बरी कर दिया इस घटना से कई मुस्लिम खफा हो गए और कुछ ही दिनों में उनकी हत्या कर दी गयी। तब गाँधी जी ने कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में कांग्रेस की कांफ्रेंस में कहा – भाई रशीद का जुर्म मैं नहीं मानता बल्कि नफरत फैलाने वाले ही जिम्मेदार हैं यानिकी उनहोंने स्वामी जी को ही दोषी ठहराया।

धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के जरिये गाँधी जी का यही मुस्लिम तुष्टिकरण देश के विभाजन का भी कारण बना, जब २६ मार्च १९४० को जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अवधारणा पर जोर दिया तब गाँधी जी का वक्तव्य था – अन्य नागरिकों की तरह मुस्लिम को भी यह निर्धारण करने का अधिकार है कि वो अलग रह सके, हम एक संयुक्त परिवार में रह रहे हैं ( हरिजन , ६ अप्रैल १९४० ).

अगर इस देश के अधिकांश मुस्लिम यह सोचते हैं कि एक अलग देश जरूरी है और उनका हिदुओं से कोई समानता नहीं है तो दुनियाँ की कोई ताक़त उनके विचार नहीं बदल सकती और इस कारण वो नए देश की मांग रखते है तो वो मानना चाहिए, हिन्दू इसका विरोध कर सकते है ( हरिजन , १८ अप्रैल १९४२ ).

१२ जून १९४७ को जब कांग्रेस सेशन में बंटवारे के मुद्दे पर विचार हुआ तब पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविन्द वल्लभ पन्त, चैतराम गिडवानी आदि ने इसका तर्क के साथ घोर विरोध किया था तब गाँधी जी ने सारे वक्ताओं को किनारे कर ४५ मिनट की जो स्पीच दी उसका सार इस प्रकार है अगर कांग्रेस ने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया तो कुछ और ग्रुप ( संभवतः नेता जी सुभाष चन्द्र बोस) कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देंगे और देश में भूचाल जैसा आ जाएगा। दुसरे शब्दों में गाँधी जी ने मुसलामानों को पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित ही किया। इस घटना के बाद वल्लभ भाई ने भी बंटवारा स्वीकार करने का फैसला किया।

बंटवारे के बाद भी गाँधी जी की नीतियों ने देश का जो नुक्सान किया वो इस प्रकार है, २३ % मुस्लिम जनसँख्या के लिए ३२ % भूमि पाकिस्तान को दी गयी, बंटवारे के बाद मुख्य कदम था जल्द से जल्द पापुलेशन एक्सचेंज, यानिकी मुस्लिम को पाकिस्तान और हिन्दुओं को भारत में पुनर्वास दिलाना, जिसकी वकालत जिन्ना और माउंट बेटन दोनों ने की थी और मुस्लिम लीग के प्रस्ताव में यह मुद्दा शामिल था। लेकिन गाँधी जी ने कुछ मुसलामानों की अनिच्छा के चलते गाँधी जी ने इसे “इम्प्रक्टिकल” करार दिया, बिहार में दंगे भड़कने पर भी मुस्लिम लीग का यह प्रस्ताव लागू नहीं किया गया। माउंट बेटन ने जब नेहरु पर दबाव डाला तब नेहरु ने गाँधी की ओर देखा और गाँधी जी ने इसे स्वीकार नहीं किया, नतीज़तन हिन्दुओं ( मुख्यतया सिख और सिन्धी) का भारत में पलायन तो हुआ लेकिन मुसलामानों का पाकिस्तान में न के बराबर और जिनका पाकिस्तान पलायन हुआ वो मुहाजिर कहलाये यानि दोयम दर्जे के पाकिस्तानी।
गाँधी जी के विरोध के कारण ही “वन्दे मातरम” राष्ट्रगान नहीं बन पाया, दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी इसे बहुत पसंद करते थे उन्होंने लिखा था ” यह संवेदना में आदर्श है और मधुर भी, यह सिर्फ देशभक्ति जगाता है और भारत को माँ की तरह गुण गाता है ” परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ मुस्लिम इसे नापसंद करते है तब उनहोंने सामूहिक सभा में गाना बंद कर दिया और जन गण मन राष्ट्रगीत बनाया गया। बंटवारे के बाद जब सिन्धी और पंजाबी दिल्ली में केम्प में रह रहे थे तब गाँधी जी ने वहां का दौरा किया और कहा- मुस्लिम अगर पाक को हिन्दू विहीन करते हैं तो हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि हौसला रखना चाहिए

इस प्रकार गाँधी जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण का इतिहास रच कर दिखा दिया और कांग्रेस उनके नक़्शे कदम पर चलकर आगे बढती रही और धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा ही रच दी !चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, पाठ
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राजीव गांधी की हत्या को उचित बताया

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को ईसाई प्रचारक अगस्टाईन जेबाकुमार ने उचित बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने श्रीलंका में गए भारतीय शांति सेना को हत्यारी सेना का नाम दिया है। ऐसा नहीं कि वह पहले ईसाई हैं जिसने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को उचित बताया हो और भारतीय सेना को अपमानित किया हो। इससे पहले भी ईसाई प्रचारक मोहन लेजैरस भी भारतीय साधु संत के साथ धार्मिक स्थलों का अपमान कर चुका है। लेजैरस ने तमिलनाडु में स्थापित मंदिरों को शैतानो का अड्डा बताया था। जबकि सारे व्यभिचार चर्च में होते हैं। अधिकांश चर्चो के बिशप पर रेप का आरोप है। हाल ही में केरल की एक नन ने बिशप फ्रैंक मुलाक्कल पर कई बार रेप का आरोप लगाया है। लेकिन ये लोग मंदिर को अपमानित करते रहते हैं।

जेबाकुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वाइरल हुआ है। यह वीडियो बिना किसी तारीख का है। इस वीडियो में उन्होंने कहा है कि जिस प्रकार भारती शांति सेना ने श्रीलंका के आम लोगों को प्रताड़ित किया, विशेष कर वहां की महिलाओं पर अत्याचार किया उससे वहां की महिलाएं भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से काफी नाराज थी। उन्होंने कहा कि श्रीलंका की महिलाओं की नाराजगी के कारण ही राजीव गांधी की हत्या की गई। उन्होंने कहा है कि भले ही राजीव गांधी की हत्या के लिए महिला माध्यम बनी लेकिन इसका असली दोषी भारतीय शांति सेना है। क्योंकि भारतीय सेना की करतूत का खामियाजा राजीव गांधी को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा।






sochna padega


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जानिये और समझिये कि सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है।

,,,,,,,,,,,,,,box,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ये महिला रेहाना फातिमा है जो सबरीमाला के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विरोध में चल रहे आंदोलन में पुलिस के वेश पहन कर पहुंची है.

क्या रेहाना फातिमा स्वामी अय्यप्पा की भक्त है?

इस को पुलिस की वर्दी कौन पहना रहा है?

केरल के मुख्यमंत्री पी.विजयन क्या चाहते हैं?



केरल में सबरीमला के मशहूर स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं।
इस बात को समझने के लिये हमें केरल के इतिहास और यहां इस्लामी और राज्य में बीते 4-5 दशक से चल रही ईसाई धर्मांतरण की कोशिशों को भी समझना होगा।
मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था को तोड़ना है, ताकि इस पूरे इलाके में बसे लाखों हिंदुओं को ईसाई और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में लाया जा सके।
केरल में चल रहे धर्मांतरण अभियानों में सबरीमला मंदिर बहुत बड़ी रुकावट बनकर खड़ा है।
पिछले कुछ समय से इसकी पवित्रता और इसे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा था।
लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी।
लेकिन आखिरकार महिलाओं के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों ने न सिर्फ सबरीमला के अयप्पा मंदिर बल्कि पूरे केरल में हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है।
सबरीमला के इतिहास को समझिये...
1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे।
70 और 80 के दशक का यही वो समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिये थे।
उन्होंने सबसे पहला निशाना गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बनाया।
इस दौरान बड़े पैमाने पर यहां लोगों को ईसाई बनाया गया। इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही।
इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था।
सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं है किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता है।
सबरीमला में स्वामी अयप्पा को जागृत देवता माना जाता है।
यहां पूजा में जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है।
मान्यता है कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं जो लोग व्रत को ठीक ढंग से नहीं पूरा करते उन्हें यह दर्शन नहीं होते।
जिसे एक बार इस चंद्रमा के दर्शन हो गए माना जाता है कि उसके पिछले सभी पाप धुल जाते हैं।
सबरीमला से आया सामाजिक बदलाव...
सबरीमला मंदिर की पूजा विधि देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग और कठिन है।
यहां दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा दी जाती है इस दौरान रुद्राक्ष जैसी एक माला पहननी होती है।
साधक को रोज मंत्रों का जाप करना होता है।
इस दौरान वो काले कपड़े पहनता है और जमीन पर सोता है।
जिस किसी को यह दीक्षा दी जाती है उसे स्वामी कहा जाता है।
यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा इसके बजाय वो स्वामी कहलायेगा।
इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया।
मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाये।
ऐसे लोगों का समाज में बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है।
यानी यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वो उच्च स्थान देने का काम कर रहा था जो कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती है।
ईसाई मिशनरियों के लिये मुश्किल
सबरीमला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिये उन्होंने पाया कि जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वो भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमला मंदिर में ‘स्वामी’ के तौर पर दीक्षा ले ली।
यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था।
अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली हझ।
इन सभी ने भी मंदिर में रहकर दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा ली है इस दौरान उन्होंने चप्पल पहनना मना होता था और उन्हें भी उन्हीं रास्तों से गुजरना होता था जहां उनके साथ कोई रिक्शेवाला, कोई जूते-चप्पल बनाने वाला स्वामी चल रहा होता था।
नतीजा यह हुआ कि ईसाई संगठनों ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे।
ईसाई धर्म के इस फर्जीवाड़े के बावजूद सबरीमला मंदिर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही थी।
नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी।
यह याचिका कोर्ट में एक हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई।
1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था।
फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये।
उस वक्त आरएसएस के नेता जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था और वो इसमें सफल भी हुये थे।
इस आंदोलन के बदले में राज्य सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया था।


केरल में
 हिंदुओं पर सबसे बड़ा हमला
केरल के हिंदुओं के लिए यह इतना बड़ा मसला इसलिये है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है।
राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का उनके लिये यह आखिरी मौका है।
केरल में गैर-हिंदू आबादी तेज़ी के साथ बढ़ते हुए 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है।
अगर सबरीमला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं।
ऐसे में ‘चंद्र दर्शन’ कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी।
नतीजा धर्मांतरण के रूप में सामने आएगा।
यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि जिन तथाकथित महिला एक्टिविस्टों ने अब तक मंदिर में प्रवेश की कोशिश की है वो सभी ईसाई मिशनरियों की करीबी मानी जाती हैं।
जबकि जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है वो खुद ही उन्हें रोकने के लिये मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं।
सबरीमाला पर वामपंथियों की नौटंकी अब सीमाएं लांग रही है,
रिहाना फातिमा नामक मुस्लिम महिला आज जबरदस्ती सबरीमाला मन्दिर में प्रवेश करने की नौटंकी करने आई है तथा केरला पुलिस के ढाई सौ कमांडो उसे सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं, और अयप्पा के भक्त उसके विरोध में खड़े हुए हैं,
यह रिहाना फातिमा एक घोर हिंदू विरोधी औरत है जो सोशल मीडिया पर हिंदू आस्था के प्रतीकों पर अश्लील पोस्ट डालने और अपनी स्वयं की अर्धनग्न फोटोज डालने के लिये बदनाम है,
इन क्रिस्लामो-कॉमियों ने हिंदुओं की आस्था को एक मजाक बनाकर रख दिया है, जिन लोगों को ना हिंदू धर्म में आस्था है, ना भगवान अयप्पा में, जो कि सदैव से हिंदू धर्म के विरोधी रहे हैं, और समय-समय पर सार्वजनिक रूप से सनातन मान्यताओं-परंपराओं पर कटाक्ष करते रहे हैं, उनका उपहास उड़ाते रहे हैं और उन पर अश्लील टिप्पणियां करते रहे हैं, आज वही सबरीमाला मंदिर में जबरदस्ती घुसने का प्रयास कर रहे हैं, यहां इनकी इच्छा दर्शन कि नहीं अपितु हिंदुओं के पवित्र स्थल को अपवित्र करने और हिंदुओं को नीचा दिखाने की है, यह नौटंकी अब उस स्तर पर पहुंच गई है जिसके दुष्परिणाम अत्यंत घातक भी हो सकते हैं, और संभवत ये क्रिस्लामो-कॉमी यही चाहते भी हैं,
कल्पना करिए कि मक्का मदीना में यदि इस प्रकार की नौटंकी होती, कोई भी गैर मुस्लिम वहां घुसने का प्रयास भी करता, तो सऊदी सरकार उसके संग क्या करती ?
उसी दिन उसका सर बीच सड़क पर धड़ से काट दिया जाता, या उसको जमीन में आधा गाड़ कर पत्थर मार-मार कर मार डाला गया होता, किंतु इन जिहादियों को भारत में जितनी आजादी मिली हुई है यह उसका दोहन कर रहे हैं
मैं तो भगवान अय्यप्पा के उन भक्तों को साधुवाद देता हूं जो केरल राज्य की पुलिस फोर्स, राज्य सरकार, और पूरे प्रशासन द्वारा सबरीमाला मंदिर की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने के षड्यंत्र को विफल करने और सबरीमाला मंदिर की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वीरता पूर्वक वहां खड़े होकर विरोध कर रहे हैं, किंतु ये भी सत्य है कि सहन करने की भी एक सीमा होती है, और यहां तो निरंतर ही न केवल उकसाया जा रहा है अपितु वामपंथी राज्य सरकार भी पूर्ण रूप से इस उकसावे के षड्यंत्र में सम्मिलित है।
(पोस्ट के संग रिहाना फातिमा द्वारा पोस्ट किए गए कुछ फोटो संलग्न कर रहा हूँ, जानता हूँ कि ये असभ्य व अश्लील फोटो हैं, पोस्ट करने योग्य भी नही हैं, किंतु यहां वास्तविकता समझाने हेतु ऐसा करना पड़ रहा है।)
🇮🇳Rohan Sharma🇮🇳
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हिन्दुस्तान और हिन्दुओ को चौतरफा खतरा
एक तरफ इस्लाम और दूसरी तरफ ईसाइयत तीसरी तरफ वामपंथी और चौथी ओर सेकुलर ।
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मैं प्रमुख मस्जिदों में जाकर गायत्री साधना और यज्ञ हवन करना चाहता हूं तथा प्रमुख ईसाई चर्च में जाकर भगवत गीता पर प्रवचन करना चाहता और भागवत कथा का भी आयोजन करना है ।
क्या माननीय सर्वोच्च न्यायालय में इसकी अनुमति मिलने की संभावना है ?
कृपा कर कोई माननीय अधिवक्ता बताएं तो मैं याचिका दायर करने की पहल करुं।
(संदर्भ:सबरीमाला प्रकरणमें भांति भांति की धर्म विरोधी परन्तु स्त्री देह धारिणी व्यक्तियों का प्रवेश)
रामेश्वर मिश्र पंकज
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केरल सरकार देश मे बड़े पैमाने पर धार्मिक दंगा करवाना चाहती हैं, मुस्लिम ऐक्टिवेस्ट महिला को सबरीमाला मन्दिर में प्रवेश कराने के लिए 200 पुलिसकर्मीओ की सुरक्षा दे रही हैं, मुस्लिम कबसे भगवान अयप्पा के भक्त हो गए?
यह हिन्दुओ को नीचा दिखाने की कोशिश हैं।
सबरीमाला जाने के लिये एक मुस्लिम महिला मरी जा रही है ,
मोहतरमा पहले मस्जिद मे तो जा के दिखा
Sanjay Dwivedy,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कुर्सी मिले तो
देश को लूट डालो
न मिले ...
तो हिंदुओं में फूट डालो..//
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राफेल व S-400 दोनों की लागत 1लाख 2 हजार 4 सौ करोड़ कॉमनवेल्थ में छातो और कुर्सियों का किराय1लाख 76 हजार करोड़ फिर भी मोदी चोर है❓
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अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, इराक, मिस्र, सऊदी अरब, मलेशिया, कश्मीर ......ये पुराने ज़माने के कैराना ही है ....,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
आखिर कॉंग्रेस को क्यूँ ???
1. वंदे मातरम से थी दिक्कत
2. सोमनाथ मन्दिर का विरोध
3. BHU मे हिन्दू शब्द से एतराज़
4. हज के लिए सब्सिडी शुरू की
5. 26/11 के पीछे हिन्दुओं का नाम लगाना
6. मंदिर जाने वाले छेड़खानी करते हैं
7. राम सेतु पर हलफनामा
8. सेना मे फूट डालने की कोशिशSanjay Dwivedy
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आर्य समाज के नाम पर  खोले लव जिहाद के दुकान
 देश की राजधानी में चल रहा है गोरखधंधा। मुस्लिम लड़के नाम बदलकर हिंदू होने का दिखावा करते हैं और  लड़की को प्यार जाल में फंसाकर उनका जीवन बर्बाद कर देते हैं। ट्रूकॉलर पर भी नंबर मुस्लिमों के नाम, फिर भी कई हिंदू लड़कियाँ हो रही शिकार, तुरन्त शादी करवाई जाती,वकील सांठगांठ से मैरिज रजिस्ट्रार से उसी दिन सर्टिफिकेट भी बनवाता ग़ाज़ियाबाद में राकेश मार्ग पर,भी "आर्य मेर्रिज bureau" jiska twitter id @aryamarriage है ये भी यही करवा रहा..लव जिहाद का अड्डा बन चुके हैं 
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विवेक ने UrbanNaxals को नंगा कर दिया,
नाना ने कट्टर राष्ट्रवाद का साथ दिया,
उन्हें टारगेट करने के लिए तनुश्री दत्ता को लाया गया !
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ज्यादातर प्राचीन मंदिरों को इस्लामिक शासकों द्वारा ध्वस्त/खंडित किया गया है, चाहे खिलजी हो यक चाहे बाबर, और सिर्फ मंदिरों को ही नही बल्कि पुस्तकालयों को भी..और ये जानते हुए भी माननीय कोर्ट राम मंदिर पर अपना फैसला नही सुना रहा, ये सिर्फ हिन्दू धर्म की नही सच्चाई की हार है..
सुप्रीम कोर्ट जिसे हम न्याय का मंदिर कहते हैं,उसका भी वोट बैंक के लिए राजनीति करण हो गया है, न्याय के मंदिर में बैठे कुछ लोग भी राजनीतिक तबके से आते हैं,Sanjay Dwivedy
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अमेरिका को दूसरा झटका
रूस से S-400 डील करने के बाद अब
अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भी ईरान से तेल आयात जारी रखेगा भारत ...//
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एक नये समाज और एक नई व्यवस्था का जन्म हो रहा है जिसकी प्रसव पीड़ा बहुतों को हो रही है

और कुछ को अभी होनी शेष है
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सबक
तमिलनाडु के तिरूनेलवेली में 14 सित. को ईस्लामियों ने गणेश प्रतिमा नष्ट कर दी , गांव के तमाम हिन्दुओं ने मुसलमानों की दुकानों से सामान लेना बन्द कर दिया , भूखे मरने लगे तो 30 सितंबर को हाथ जोड़ते हुए हिन्दुओं के पास आये और माफी मांगी।
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आगामी लोकसभा चुनाव भारत के इतिहास का सबसे प्रचंड और खतरनाक किस्म का लोकसभा चुनाव होगा ....इसमें देश के आतंरिक और बाह्य दुश्मन ऐसी ऐसी साजिशे और चाल चलेंगे कि...बड़े से बड़े देश चिंतंक और देश प्रेमी , प्राचीन किस्म के राष्ट्रवादी , यहाँ तक की संघ और अन्य हिन्दू संगठनो के सदस्यों का कपाल चटकने लगेगा ,
जातिवाद उतंड होने लगेगा .आर्थिक हितो पर खतरा दिखने लगेगा ...लेकिन इस महासमर में जो लोग देश के आतंरिक और बाह्य दुशमनो के चाल और चरित्र से पूरी गहराई और गंभीरता से परिचित होगे सिर्फ ऐसे ही लोग अडिग रहेगे ...आगामी लोकसभा चुनाव से पहले देश में बहुत खतरनाक माहौल होगा ...बड़े बड़े लोगो की निष्ठाए जर्जर होकर कापने लगेगी ...#पवन_अवस्थी.......................................
FAKE NEWS का अंबार है, Headline पढ़ कर तांडव करने से बचें,

किसी News को कम से कम 3 बार क्रॉस वेरीफाई अवश्य करें, स्पष्ट है Congress और Opposition ने लुट्येन इकोसिस्टम और बिकाऊ मीडिया के सहारे झूँठ, अफवाहों, अधूरी व भ्रामक खबरें चला चला कर Modi को हटाने की ठानी है, Cambridge Analytica का सहारा लिया जा रहा है ! बहोत से मोदी विरोधी, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का चोला ओढ़े भी बैठे हैं ! सावधान रहें, 2019 एक युद्ध है इसे याद रखियेगा, Modi के लिए हम भले ही इम्पोर्टेन्ट न हों पर हमारे लिए और देश के लिए Modi निश्चित रूप से इम्पोर्टेन्ट है !

Sanjeev Tripathi


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गजवा-ए-हिन्द..?
काफिर (मूर्तिपूजक, गैर-इस्लामी) को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को 'गजवा' कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे 'गाजी' कहते हैं।
गजवा-ए-हिन्द का मतलब है कि भारत में सभी गैर-मुस्लिमों पर इस्लामिक शरिया लागू करना जिसके लिए या तो इनको मार कर खत्म करना या इनको इस्लाम स्वीकार कराना या उन्हें तब तक जिन्दा रखना जब तक ये अपनी कमाई का एक हिस्सा 'जजिया कर' के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहें।
गजवा-ए-हिन्द के 7 चरण हैं-
1. 'अल-तकिया' - यह वह अवस्था है जब मुस्लिम कमजोर या कम संख्या में होते हैं। इस स्थिति में काफिरों से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना जायज माना जाता है।
2. काफिरों के मन में भय पैदा करना।
3. हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना।
4. काफिरों की ताकत की थाह लेना।
5. ठिकाने या शिविर बनाना - इसके लिए बस्ती और मस्जिद का इस्तेमाल किया जाता है, जहाँ पर लोगों को इकट्ठा करना और हथियार रखना शामिल है। गतिविधि वाले शिविरों और क्षेत्रों में किसी न किसी बहाने से सभी काफिरों को भगाना भी इसमें शामिल है, ताकि संवेदनशील सूचनायें लीक न हो जायें।
6. सरकारी सुरक्षा-तंत्र को कमजोर करना।
7. व्यापक दंगे - 'गजवा-ए-हिन्द' का अंतिम पड़ाव जिसमें कम समय में अधिक से अधिक काफिरों या गैर-मुस्लिम मर्दो को मौत के घाट उतारना होता है। इस काम के लिए जेहादियों को मरने पर जन्नत में 72 युवा-सुन्दर हूरें मिलने का और जीतने पर जवान काफिर महिलाओं के साथ बलात्कार करने का लालच दिया जाता है।

ऐसा में नही, खुद इस मुल्क के मुसलमान कहते भी है और मदरसों में अपनी कौम वालों को पढ़ाते भी है..!
सेक्युलरों कभी मुस्लिम बहुल इलाकों में कुछ वक्त गुजारकर तो देखो..!
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नेहरु ने क्यों किया था बैन इस गीत को :
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से

फिल्म : तलाक (1958)
गायक : मन्ना डे

54 वर्ष पूर्व (1958) महान राष्ट्रभक्त कवि प्रदीप ने खरे शब्दों में सीधी चेतावनी देते हुए इस अमर गीत की रचना की थी. तत्कालीन नेहरु सरकार को यह चेतावनी रास नहीं आयी थी. अतः गीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.
1965 में पाक के नापाक हमले से आँखें खुली तो गीत से भी प्रतिबन्ध हटा था. सुनिए और सोचिये की आज भी कितना प्रासंगिक है यह गीत.
बिगुल बज रहा आजादी का, गगन गूंजता नारों से
मिला रही है आज हिंद की मिट्टी नजर सितारों से
एक बात कहनी है लेकिन, आज देश के प्यारो से
जनता से, नेताओ से, फौजों की खड़ी कतारों से
कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरोदारों से
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से
झांक रहे हैं अपने दुश्मन अपनी ही दीवारों से
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से
ए भारत माता के बेटों, सुनो समय की बोली को
फैलाती जो फूट यहाँ पर, दूर करो उस टोली को
कभी न जलने देना फिर से, भेद भाव की होली को
जो गांधी को चीर गयी थी, याद करो उस गोली को
सारी बस्ती जल जाती है, मुट्ठी भर अंगारों से
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से
जागो तुमको बापू की जागीर की रक्षा करनी है
जागो लाखों लोगों की तक़दीर की रक्षा करनी है
अभी बनी है जो उस तस्वीर की रक्षा करनी है
होशियार तुमको अपने, कश्मीर की रक्षा करनी है
आती है आवाज यही, मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों से
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से
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देश के हिन्दुओं ने "धर्मो रक्षति रक्षितः" का असली मतलब समझ लिया है अर्थात "तुम धर्म की रक्षा करो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा"...इसलिए हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए #केरल की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहें हैं



शहरी माओवादियों की  बस्तर में शांति यात्रा
 जब माओवाद की कमर टूटती जा रही है सुरक्षा बलों की मार से तो ये शहरी माओवादी शांति यात्रा निकाल रहे हैं 2 अक्टूबर से। ऐसी यात्राओं के बारे में सरकार में बैठे माओवादी लॉबी के लोग सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों के मन में एक विभ्रम निर्माण करते हैं जिससे माओवादियों के विरुद्ध सर्च ऑपरेशन रुक जाए और उनके हथियार बंद दस्तों को पुनर्संगठित होने के लिए पर्याप्त समय मिल जाए ताकि वो दुबारा संगठित होकर पुनः पूरी ताकत से सुरक्षा बलों पर आक्रमण कर सकें।
 ऐसा ये प्रायः करते हैं अपने लड़ाकू संगठन को ऑक्सीजन देने की नीयत से। फिर ये हरिजनों और अदिवासियों के नाम पर इमोशनल कार्ड भी खेलते हैं जिससे इनकी फेस सेविंग हो सके और व्यापक सामाजिक सहयोग इनको मिल सके।
 यात्रा में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड छः राज्यों के लोग सम्मिलित होंगे। इस यात्रा में नंदिनी सुंदर जैसी खतरनाक शहरी माओवादी के साथ मनीष कुंजाम, अरविंद नेताम, वीबी चंद्रशेखरन, बसंता गोपालन, शांता सिन्हा और माओवादी पत्रकार रामशरण जोशी समेत 150 पदयात्री भी सम्मिलित होंगे। इन पदयात्रियों में माओवादी आदिवासी, गाँधीवादी, माओवाद के युवा शोधार्थी, माओवादी सामाजिक संगठन के संचालक और माओवादी पत्रकार सम्मिलित होंगे।
 लोगों को झांसा देने के लिए और संभावित पुलिस कार्यवाई न हो इस यात्रा पर इसके लिये इनलोगों ने विद्यार्थियों को भी सम्मिलित किया है और 80-82 वर्ष के बुजुर्ग गांधीवादियों को भी। पुलिस इन दोनों आयु वर्ग के लोगों को गिरफ्तार करने में असहजता का अनुभव करती है।
यात्रा का संयोजक माओवादी पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी का कहना है- "बस्तर के जंगलों में शांति कायम हो, आदिवासियों को उनका हक मिले और नक्सलवाद का खात्मा हो। कई मंचों पर यह बात तो होती है। मगर कैसे? इसकी रूपरेखा क्या होगी? इस पर ठोस संवाद कम ही होते हैं।
अब प्रश्न उठता है बस्तर के जंगलों में अशांति फैलाया किसने? बस्तर को खून से लथपथ किया किसने? आदिवासियों को उनके हक से वंचित किया किसने? आदिवासियों के गांवों को विकसित होने से रोका किसने?  आदिवासियों के भले का काम कौन से राज्य में आज तक किया है माओवादियों ने? माओवादियों ने न केवल आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा से दूर रखा है वरन अनेकानेक क्षेत्रों में आदिवासियों की व्यापक स्तर पर हत्या भी किया है।
 ये दुष्ट आतंक भी फैलाना चाहते हैं किंतु बिना पुलिसिया एक्शन के। ये अबतक सरकारों में लॉबी बनाकर उनके माध्यम से यह पुलिसिया कार्यवाई रुकवाते रहे हैं। किंतु भाजपा के शासनकाल में उनका यह तिकड़म काम नहीं आ रहा। और उनके खिलाफ लगातार सर्च ऑपरेशन और कॉम्बिंग ऑपरेशन चल रहा है। इनके एक एक किले दिन पर दिन ढहते जा रहे हैं। जंगल का नेटवर्क भी ध्वस्त हो रहा है और इनके शहरी माओवादी आका भी एक एक करके जेल जा रहे है।
जीएन साईबाबा जो माओवादियों का एशिया हेड हुआ करता था जेल गया और पांच लोगों के साथ आजीवन कारावास की सजा हुई उसको। हेम मिश्रा, प्रशांत राही, महेश तिर्की एवं पांडु नरौटे को प्रोफेसर जीएन साईं बाबा के साथ आजीवन कारावास हुआ। 
जीएन साईबाबा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आंनद कॉलेज में अंग्रेजी का प्रोफेसर था। इनसे मिली जानकारी के आधार पर रोना विलसन, सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धावले, सोमा सेन और महेश राउत की गिरफ्तारी हुई। इस गिरफ्तारी से प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की माओवादी साजिश का भंडाफोड़ हुआ। इन पांचों की गिरफ्तारी से मिले इनपुट के आधार पर अभी गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, पी बारबरा राव, अरुण फेरेरा एवं वर्नोन गोंजाल्विस की गिरफ्तारी हुई जिन्हें अभी हाउस अरेस्ट में रखा गया है। माओवाद के बड़े बड़े पुरोधा नप गए  जिनपर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है उनमें नंदिनी सुंदर भी एक हैं।
 इस यात्रा के झांसे में स्थानीय सरकार और पुलिस को नहीं पड़ना चाहिए। उल्टा इस यात्रा में सम्मिलित एक एक व्यक्ति का प्रोफ़ाइल बनाना चाहिए और उनको माओवादी आतंकी मानकर उनको जांच के राडार पर लेना चाहिए। उनके भाषणों को रिकॉर्ड करना चाहिए और उनके वक्तव्य को माओवादी साहित्य से तालमेल करके इनकी हिंसक माओवादी मनसा की व्यख्या करना चाहिये। कहीं दोषी सिद्ध हुए तो इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करना चाहिए।
 विगत 12 वर्षों में 2700 सुरक्षाबलों की हत्या की बात की गई इनके यात्रा वृतांत में। इसके साथ ही 9300 आदिवासियों की हत्या की चर्चा की गई है। इतने सुरक्षाबलों और इतने आदिवसियों की हत्या करने के बाद ये माओवादी शांति यात्रा की बात करते हैं तो यह सौ चूहे खाकर हज करने वाली बात हो गई। 
आतंकवादियों की शांति यात्रा, शांति वार्ता और शांति डायलॉग का कोई अर्थ नहीं है। या तो इनका इनकाउंटर होना चाहिए, इनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए या फिर इनका सरेंडर। इन तीन के अतिरिक्त किसी चौथे विकल्प पर किसी संवाद का कोई अर्थ नहीं है।
~मुरारी शरण शुक्ल।
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आतंकवाद का धंधा...
-📌आतंकवाद केवल उन्ही देशो में होता है...जहा की जनता भेड़ हो...और नेता बिकाऊ...
📌आतंकी हमलो में केवल सामान्य लोग मरते हैं...लेकिन इसका bisness view देखे तो पैसो की बारिश होती है...
📌आतंकवादी आते नही, उनको वही के 2 न. के उच्चवर्गीय लोग बुलाते है...इसलिए तो VIP/VVIP/सेलिब्रिटी आतंकियों में इंटरेस्ट लेते हैं...
📌आतंकी हमले की प्लानिंग सेडुल, समय, जगह, मरने वाले लोग सब फिक्स किया जाता है...
इसीलिए कभी कोई VIP,VVIP,सेलिब्रिटी आतंकी हमलो में नही मरता...आतंकी हमले तभी हो सकते हैं...जब सरकार खुद चाहे... क्युकी पुलिस, आर्मी और इंटेलिजेंस के हाथ बाधना, काम में टांग अड़ना, सही ऑफिसर को मरवा देना...उनकी रिपोर्ट गायब करना,,अपने बिकाऊ लोग नियुक्त करना... ये सब केवल सम्वैधानिक पद पर बैठे नेता ही कर सकते हैं
नही तो कोई देश कैसा भी हो...वहा एक सामान्य नागरिक भी एक आतंकवादी को चीर देने का गुस्सा और दम दोनों रखता है...
👉🏻 मई 2014 में मोदी जी के PM बनने के बाद से भारत में आतंकवाद का धंधा बंद हो गया...और जो जो दो न. के उच्चवर्गीय भारतीय जनता को मरवाकर पैसे बनाते थे... वो बिलबिला गये हैं...
और किसी भी कीमत पर मोदी जी को हटाना/मरवाना चाहते हैं...
खुद सोचो ... क्या आप भेड़ हो.?. क्या आप चाहते हो.?आपके अपने लोग फिर से मरे,,,और कोई पैसे कमाए...
अब हाथ से भीख का कटोरा हटा दो... मनुष्य बनो...राष्ट्ररक्षा ही धर्मरक्षा है...भैरवी साध्वी
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