Monday, 22 October 2018

dec-sanskar



यमुना नदी के किनारे सफेद पत्थरों से निर्मित ताजमहल को दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल किया गया है। भारत के मशहूर इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने ताजमहल को हिंदू संरचना साबित किया था था कि ताजमहल मकबरा नहीं बल्कि तेजोमहालय नाम का हिंदू स्मारक था। तब नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उनका खूब मजाक उड़ाया था, लेकिन अब अमेरिका के पुरातत्वविद प्रो. मार्विन एच मिल्स ने ताजमहल को हिंदू भवन माना है। उन्होंने अपने शोध पत्र में सबूत के साथ स्थापित किया है।
न्यूयॉर्क स्थित प्रैट इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध पुरात्वविद तथा प्रोफेसर मार्विन मिल्स ने ताजमहल का विस्तृत अध्ययन किया और उस पर अपना शोध पत्र भी लिखा। ताजमहल पर लिखा उनका शोध पत्र उस समय न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित हुआ था।
मिल्स ने अपने शोध पत्र में जोर देते हुए कहा है कि शुरू में ताजमहल एक हिंदू स्मारक था, जिसे बाद में मुगलों ने कब्जा कर उसे मकबरे में बदल दिया। ताजमहल की बाईं ओर एक भवन है जो अब मसजिद है। उसका मुख पश्चिम की ओर है। सवाल उठता है कि अगर उसे मूल रूप से मसजिद के रूप में बनाया गया होता तो उसका मुख पश्चिम की बजाय मक्का की ओर होता।
ताज महल के चारों ओर बनाई गई मीनारें भी कब्र या मसजिद के हिसाब से उपयुक्त नहीं है। तर्क के साथ देखें तो इन चारों मीनारों को मसजिद के आगे होना चाहिए, क्योंकि यह जगह नमाजियों के लिए होती हैं।
मिल्स ने कहा है कि वैन एडिसन की किताब ताज महल तथा जियाउद्दीन अहमद देसाई की लिखी किताब द इल्यूमाइंड टॉम्ब में काफी प्रशंसनीय आंकड़े और सूचनाएं हैं। जो इनलोगों ने ताजमहल के उद्भव और विकास के लिए समकालीन स्रोतों के माध्यम से एकत्रित किए थे। इनमें कई फोटो चित्र, इतिहासकारों के विवरण, शाही निर्देशों के साथ-साथ अक्षरों, योजनाओं, उन्नयन और आरेखों का संग्रह शामिल है। दोनों इतिहासकारों ने प्यार की परिणति के रूप में ताजमहल के उद्भव की बात को सिरे से खारिज कर ताजमहल के उद्भव को मुगलकाल का मानने से भी इनकार कर दिया है।
मिल्स ने ताजमहल पर खड़े किए ये सवाल
ताजमहल के दोनों तरफ बने भवनों को कहा जाता है कि इसमें से एक मसजिद के रूप में कार्य करता है तो दूसरे का अतिथि गृह के रूप में उपयोग किया जाता। दोनों भवनों की बनावट एक जैसी है। जो शाहजहां अपनी बीवी के प्रेम में ताजमहल बनवा सकता है क्या वे दो प्रकार के कार्य निष्पादन करने के लिए एक ही प्रकार का भवन बनवाया होगा ?
दूसरा सवाल है आखिर ताजमहल परिसर की दीवारें रक्षात्मक क्यों थीं? सवाल उठता है कि कि कब्र के लिए सुरक्षात्मक दीवार की आवश्यकता क्यों? (जबकि किसी राजमहल के लिए ऐसा होना अनिवार्य होता है )
तीसरा सवाल है कि आखिर ताजमहल के उत्तर दिशा में टेरेस के नीचे 20 कमरे यमुना की तरफ करके क्यों बनाए गए? किसी कब्र को 20 कमरे कि क्या जरूरत है? जबकि राजमहल की बात अलग है क्योंकि कमरे का अच्छा उपयोग हो सकता था।
चौथा सवाल है कि ताजमहल के दक्षिण दिशा में बने 20 कमरों को आखिर सील कर क्यों रखा गया है। आखिर विद्वानों को वहां प्रवेश क्यों नहीं है ? विद्वानों को अंदर जाकर वहां रखी चीजों का अध्ययन करने की इजाजत क्यों नहीं दी जाती है?
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर यहां जो मसजिद है वह मक्का की तरफ नहीं होकर पश्चिम की ओर क्यों है ?
छठा सवाल उठता है कि आखिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने ताजमहल की वास्तविक तारीख तय करने के लिए कार्बन -14 या थर्मो-लुमिनिस्कनेस के उपयोग को ब्लॉक क्यों कर रखा है? अगर इसकी इजाजत दे दी जाती है तो ताजमहल के उद्भव को लेकर उठने वाले विवाद तुरंत शांत होंगे क्योंकि इस विधि से आसानी से पता लगाया जा सकता है कि ताजमहल कब बना था? लेकिन न तो इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तैयार है न ही भारत सरकार।
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, हमारे देश में 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले, पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है, 
पर मुश्किल से पाँच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या मे करते हैं।
आम तौर पर केले की पत्तियो में खाना परोसा जाता है।
प्राचीन ग्रंथों में केले की पत्तियों पर परोसे गये भोजन को, स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है।
आजकल महँगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले की पत्तियों का यह प्रयोग होने लगा है।
1. पलाश के पत्तल में भोजन करने से, स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है।
2. केले के पत्तल में भोजन करने से, चाँदी के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है।
3. रक्त की अशुद्धता के कारण होने वाली बीमारियों के लिये, पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है।
पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी, इसका उपयोग होता है।
आम तौर पर लाल फूलों वाले पलाश को हम जानते हैं,
पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है।
इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासीर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है।
4. जोड़ों के दर्द के लिये, करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है।
पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना मे अधिक उपयोगी माना जाता है।
5. लकवा (पैरालिसिस) होने पर, अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलों को उपयोगी माना जाता है।
इसके अन्य लाभ~
1. सबसे पहले तो उसे धोना नहीं पड़ेगा, इसको हम सीधा मिट्टी में दबा सकते है।
2. न पानी नष्ट होगा।
3. न ही कामवाली रखनी पड़ेगी, मासिक खर्च भी बचेगा।
4. न केमिकल उपयोग करने पड़ेंगे।
5. न केमिकल द्वारा शरीर को आंतरिक हानि पहुँचेगी।
6. अधिक से अधिक वृक्ष उगाये जायेंगे, जिससे कि अधिक ऑक्सीजन भी मिलेगा।
7. प्रदूषण भी घटेगा।
8. सबसे महत्वपूर्ण जूठे पत्तलों को एक जगह गाड़ने पर, खाद का निर्माण किया जा सकता है एवं मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।
9. पत्तल बनाए वालों को भी रोजगार प्राप्त होगा।
10. सबसे मुख्य लाभ, आप नदियों को दूषित होने से बहुत बड़े स्तर पर बचा सकते हैं, जैसे कि आप जानते ही हैं, कि जो पानी आप बर्तन धोने में उपयोग कर रहे हो, वो केमिकल वाला पानी, पहले नाले में जायेगा, फिर आगे जाकर नदियों में ही छोड़ दिया जायेगा, जो जल प्रदूषण में आपको सहयोगी बनाता है।
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इस मंदिर में केवल दलित महिलाएं ही करती हैं पूजा..//
ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिले के सतभाया गांव में स्थित यह मंदिर पूरे देश के मन्दिरो से अलग है। यहां सिर्फ महिलाएं ही पूजा करती हैं और खासतौर पर स्थानीय मछुआरा समुदाय की विवाहित दलित महिलाओं को ही मंदिर की पूजा-पाठ गतिविधियों को करने की इजाजत है। मां पंचबाराही के मंदिर में पांच मूर्तियां स्थापित हैं, लेकिन कोई भी पुरुष इन्हें हाथ नहीं लगा सकते हैं।
पिछले 300 वर्षों से मुख्य पुजारी दलित महिला रही हैं। अभी इस मंदिर की मुख्य पुजारी जानकी हैं जो दलित हिन्दू महिला हैं। उन्हें यह अधिकार उनकी सास से मिला हैं जो पहले इस मंदिर की मुख्य पुजारी थी। जानकी बताती हैं कि जब सुकदेव दलाई से उनका विवाह हुआ और वह पहली बार केंद्रापाड़ा के इस सतभाया गाँव आयी तो उनकी सास उन्हें पंचुबराही गांव के मंदिर में ले गयीं और वहां उन्होंने उनको मंदिर का धार्मिक अनुष्ठान सिखाया, और तबसे वह इस दायित्व का निर्वहन कर रही हैं। यह मंदिर कितना प्राचीन हैं इसके लिए कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है
मन्दिर में पाँच महिला पुजारी हैं जो 15-15 दिन के क्रम पर मन्दिर की प्रतिदिन में पूजापाठ करती है। जानकी कहती हैं, ‘हम जारा सबर के वंशज हैं, जिन्होंने गलती से भगवान श्री कृष्ण को तीर मारा था जिसकी वजह से श्रीकृष्ण ने अपने मानव शरीर का त्याग किया था। उसी के पश्चाताप करते हुए जारा सबर श्री कृष्ण की पूजा करते हुए उनका अनन्य भक्त बन गए थे।
वही मन्दिर की दूसरी महिला पुजारी सुजाता बताती हैं कि “हमारे पति मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन देवताओं को छू नहीं सकते। वे भक्तों से फल और फूल इकट्ठा करते हैं और देवी को अर्पित करने के लिए उन्हें सौंप देते हैं।’ ‘हम यहां आने वाले भक्तों के लिए हमारे देवताओं से आशीर्वाद मांगते हैं।’
केंद्रापाड़ा के पूर्व राजाओं ने इस मंदिर की देखभाल और उसके देवताओं के पूजापाठ के लिए पांच परिवारों को चुना था। वर्तमान में, सतभाया गांव में ऐसे पांच चुनिंदा परिवार हैं, और आम तौर पर पुजारी की पदवी वंशानुगत उत्तराधिकार में इन परिवारों की सबसे बड़ी बहुओं को दिया जाता है। इस मंदिर में इन महिला पुजारियों को पूजा-पाठ का कोई वेतन नही दिया जाता, बल्कि जिन 15 दिनों में इनकी ड्यूटी मन्दिर में होती हैं उन दिनों में यह घर का भी कोई कार्य नही करती, और मन्दिर के कार्यो के लिए ही पूरी तरह से समर्पित रहती हैं।
1971 में, जब ओडिशा में चक्रवात ने अपार तबाही मचाई, तो 700 से ज्यादा ग्रामीण बंगाल की खाड़ी में बह गए थे। और सतभया के 3,440 एकड़ में फैले हुए 16 गांव में से कुछ गांव समुंद्र की भेंट चढ़ गए फिर भी इस मंदिर की महिला पुजारी किसी चट्टान की तरह मन्दिर के देवताओ के साथ अडिग रही।
पिछले काफी समय से गांव में जल स्तर बढ़ रहा था 50 साल पहले समुद्र से इस मंदिर का फासला पांच किलोमीटर का था लेकिन अब कुछ ही मीटर का रह गया है। ऐसे में पूजा-पाठ और भजन के बीच मूर्तियों को मंदिर से हटाया गया और नई जगह स्थापित किया। प्रतिमाओं का वजन काफी था और अकेली महिलाओं से इनको उठाना मुश्किल हो रहा था। प्रतिमाओं को उठाने के लिए महिला पुजारियों ने पुरुषों को मंदिर के अंदर आने की इजाजत दी।  
यही वह समय था जब सदियों में पहली बार पुरुषों को मंदिर में तीन भारी मूर्तियों को उठाने, जिनमें से प्रत्येक का वजन छः क्विंटल हैं, उन्हें अपने नए मंदिर ले जाने की अनुमति दी गई थी। स्थानांतरण के बाद, पुजारिनों ने फिर से मुर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की व पुनः पुरुषों का मंदिर में प्रवेश निषेध कर दिया गया।
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सिंघाड़े का सेवन करना शुरू कर दीजिये
आज हम एक ऐसी चीज के बारे में बात करने जा रहे है, जिसे आपने कई बार खाया होगा. मगर इसके फायदों के बारे में शायद आप नहीं जानते होंगे. जी हां यह एक ऐसी चीज है, जिसे आप व्रत के दौरान भी खा सकते है. बरहलाल यह चीज खाने में भी काफी स्वादिष्ट लगती है. वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दे कि हम यहाँ किसी और चीज की नहीं बल्कि सिंघाड़े की बात कर रहे है. गौरतलब है कि सिंघाड़ा एक ऐसा फल है, जो आमतौर पर पानी में ही उगता है. यहाँ तक कि इसका रंग भी दो तरह का होता है. आपको जान कर हैरानी होगी कि इसका रंग लाल भी होता है और हरा भी होता है.
केवल इतना ही नहीं इसके इलावा कुछ लोग तो ऐसे भी होते है जो कच्चा सिंघाड़ा खाना ज्यादा पसंद करते है. वही कुछ लोग ऐसे होते है, जो सिंघाड़े को उबाल कर नमक लगा कर खाना ज्यादा पसंद करते है. मगर ये खाने में काफी स्वादिष्ट होता है. इसलिए लोग इसे बड़े चाव के साथ खाते है. गौरतलब है कि सिंघाड़े में कई तरह के पौष्टिक तत्व पाएं जाते है. जो शरीर को कई तरह की बीमारियों से बचाते है. यानि अगर हम सीधे शब्दों में कहे तो यह केवल खाने में ही स्वादिष्ट नहीं होता, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी काफी लाभदायक होता है.
बता दे कि सिंघाड़े में मौजूद आयोडीन और मैगजीन जैसे मिनरल्स शरीर को थाइराइड और घेंघा नामक रोग से सुरक्षित रखते है. इसके इलावा भी सिंघाड़ा खाने से हमारे शरीर को काफी सारे लाभ होते है. तो चलिए अब आपको इसके फायदों के बारे में विस्तार से बताते है. यक़ीनन इसके फायदों के बारे में जान कर आप भी हैरान रह जायेंगे.
 अगर आपकी एड़ियां फ़टी हुई है, तो सिंघाड़े खाने से आपकी एड़ियों को काफी राहत मिलेगी. इसके साथ ही अगर आपको शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द हो रहा हो या कही भी सूजन हो तो आप इसका लेप बना कर उस जगह पर लगा भी सकते है. जी हां इससे न केवल आपका दर्द कम हो जाएगा, बल्कि आपकी सूजन भी खत्म हो जाएगी.
आपकी जानकारी के लिए बता दे कि इसमें पॉलीफेनॉलिक और फ्लेवोनॉयड जैसे एंटी आक्सीडेंट पाएं जाते है. केवल इतना ही नहीं इसके साथ ही यह एंटी बैटीरियल, एंटी वायरल और एंटी कैंसर जैसे कई गुणों से भरपूर भी होता है. यानि अगर हम सीधे शब्दों में कहे तो सिंघाड़े का सेवन करने से आपको एक साथ कई बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है.
 प्रेगनेंसी में सिंघाड़ा खाना माँ और बच्चे दोनों के लिए काफी फायदेमंद होता है. यहाँ तक कि इसका सेवन करने से गर्भपात होने का खतरा भी कम रहता है. वही जिन लोगो को बवासीर की समस्या है, उन्हें तो सिंघाड़े का सेवन जरूर करना चाहिए. बरहलाल अस्थमा के रोगियों के लिए भी सिंघाड़े का सेवन करना काफी फायदेमंद होता है. बता दे कि यह पेट से संबंधित सभी समस्याओ को दूर करने में मदद करता है.

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 मोबाइल...आपके साथ हादसा भी हो सकता है.
 आज के समय में मोबाइल लोगो की जिंदगी बन चुका है. यहाँ तक कि कुछ लोग तो ऐसे होते है जो दिन रात मोबाइल पर लगे रहते है. केवल इतना ही नहीं इसके इलावा जब मोबाइल की बैटरी पूरी तरह से खत्म होने वाली होती है, तब चार्जिंग पर लगाने के बाद भी मोबाइल का इस्तेमाल करना नहीं छोड़ते. जी हां आज के समय में मोबाइल लोगो के लिए एक नशा सा बन चुका है. जिसे लोग कभी नहीं छोड़ सकते.
 अगर जरूरत से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल किया जाएँ तो आपके साथ हादसा भी हो सकता है. यहाँ तक कि इससे आपकी जान तक जा सकती है. इसलिए मोबाइल का इस्तेमाल करते समय आपको थोड़ी सी सावधानी तो बरतनी चाहिए. कुछ लोगो को मोबाइल एकदम अपने तकिए के पास रख कर सोने की आदत होती है. तो वही कुछ लोग इसे हाथ में पकड़े पकड़े ही सो जाते है. मगर  इसका बुरा असर आपके स्वास्थ्य पर ही पड़ता है.
 मोबाइल का इस्तेमाल करते समय आपको इन खास बातों का ध्यान रखना चाहिए.  मोबाइल की बैटरी लिथियम आयन से बनी होती है. ऐसे में जब इस बैटरी को चार्ज किया जाता है. तब यह गर्म हो जाती है. यहाँ तक कि कई बार इसका कम इस्तेमाल करने के बावजूद भी यह ज्यादा गर्म हो जाती है. अगर आपके मोबाइल की बैटरी भी जल्दी गर्म हो जाती है, तो आपको फ़ौरन अपने मोबाइल को बदल देना चाहिए. क्यूकि अगर आपने ऐसा नहीं किया, तो आगे चल कर आपके साथ कोई बड़ा हादसा हो सकता है. इसके इलावा अगर आपके मोबाइल की बैटरी फूल गई हो तो यह कभी भी फट सकती है. ऐसे में आपको तुरंत बैटरी को बदल देना चाहिए. आपको जान कर हैरानी होगी कि ऐसी स्थिति में मोबाइल को फेंकने से भी बैटरी फटने का खतरा रहता है.
इसके साथ ही फोन को चार्ज करते समय भूल कर भी इसका इस्तेमाल न करे. बता दे कि ऐसा करने से बैटरी फटने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. गौरतलब है कि फोन को कभी भी लोकल चार्जर से चार्ज न करे. इसका बुरा असर फोन की बैटरी पर पड़ता है. इसके इलावा जब फोन चार्जिंग पर लगा हुआ हो तो फोन से कभी बात न करे.
इन 4 खतरनाक गलतियों के कारण कभी भी फट सकता है आपका मोबाइल
१. सही चार्जर का इस्तेमाल.. कंपनी द्वारा दिया गया चार्जर ही इस्तेमाल करे. वो इसलिए क्यूकि यह बढ़िया क्वालिटी का होता है और इससे चार्जिंग भी जल्दी होती है. बरहलाल अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपको और आपके मोबाइल को नुक्सान भी हो सकता है.
२.  कुछ लोग रात के समय मोबाइल को चार्जिंग पर लगा कर सो जाते है. जिसके कारण मोबाइल रात भर चार्ज होता रहता है. यहाँ तक कि जब चार्जिंग पूरी हो जाती है, उसके बाद भी मोबाइल चार्ज होता रहता है.इससे आपके मोबाइल की बैटरी जल्दी खराब होती है और आपके मोबाइल फट भी सकता है.
३.  मोबाइल को कही भी रखते समय इस बात का ध्यान रखे कि आपके मोबाइल पर सूर्य की सीधी किरणे न पड़े. यानि आपके मोबाइल पर सीधी धूप न पड़े. बता दे कि जब आप फोन का इस्तेमाल करते है, तब फोन वैसे ही काफी गर्म हो जाता है. ऐसे में अगर आप उसे धूप में रख देंगे, तो ज्यादा गर्मी के कारण वो फट सकता है.

४. मोबाइल कवर का कम इस्तेमाल करे..  जो लोग लम्बे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते उन्हें मोबाइल पर कवर नहीं लगाना चाहिए, क्यूकि इससे मोबाइल में गर्मी पैदा होने लगती है. इसलिए कवर का इस्तेमाल कम ही करे.
अगर मोबाइल में घुस जाएँ पानी तो
जब किसी व्यक्ति का मोबाइल पानी में गिर जाता है, तो वह उसे ऑन करने की कोशिश करता है. ऐसा करना गलत है.  ऐसा करने से मोबाइल में शार्ट सर्किट होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए अपने मोबाइल को स्विच ऑफ कर दे. फ़ौरन उसकी बैटरी निकाल दे. हालांकि अगर आपके मोबाइल की बैटरी न निकल रही हो, तो उसे जबरदस्ती निकालने की कोशिश न करे. इसके बाद अपने सिम कार्ड और मेमोरी कार्ड को मोबाइल से निकाल ले. जी हां इसे धूप में सुखाने के लिए रख दे. वैसे आप चाहे तो इसे सुखाने के लिए हेयर ड्रायर का इस्तेमाल भी कर सकते है.
 जब मोबाइल पूरी तरह से सूख जाएँ तब इसे चावल के बर्तन में रख दे. ताकि इसमें जरा सी भी नमी न बचे. दरअसल चावल पानी का बहुत अच्छा अवशोषक होता है. इसके बाद आप अपने मोबाइल को ऑन कर सकते है.
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ये बात तो हम सभी जानते हैं की स्वस्थ रहने के लिए खानपान और अपनी सेहत पर ध्यान देना जरूरी है वहीं सेहत बनाने के कई लोग कई अलग अलग तरह के काम करते हैं। ये तो हो गई शारीरीक तंदूरूस्ती की बात लेकिन क्या आपको पता है की दिमाग की तंदूरूस्ती के लिए हर कोई एक चीज का सेवन करता है। जी हां और वो है बादाम आपको बता दें की इस दुनिया में जितने भी लोग मौजूद हैं हर कोई दिमाग के लिए बादाम का सेवन करता हे क्योंकि ऐसा माना जाता है की इसके सेवन से मनुष्य का दिमाग काफी ज्यादा तेज हो जाता है।

लोगों का ऐसा भी मानना होता है कि अगर कोई व्यक्ति बादाम को भिगोकर खाता है तो ऐसे में उसके शरीर को बहुत ही ज्यादा ऊर्जा मिलती है। लेकिन वहीं दूसरी ओर लोगों को यह बात बिल्कुल भी मालूम नहीं होती कि लोगों को कब सूखा बादाम और कब बादाम को भिगोकर सेवन करना चाहिए। इसलिए आज हम आपको इस विषय के बारे में बताने जा रहे है।
आपको बता दें की बादाम का सेवन करने से इसका सीधा असर लोगों की याददाश्त के ऊपर पड़ता है। एक शोध के अनुसार पाया गया है, जो लोग रोज बादाम खाते है उनकी आयु ना खाने वालो की अपेक्षा 20% ज्यादा होती है, यानि उनके आयु अधिक होती है| बता दें की बादाम के अंदर भरपूर मात्रा में विटामिन और मिनरल पाए जाने की वजह से बचपन के दिनों में ज्यादातर बच्चों को बादाम खिलाए जाते हैं। बादाम में मग्निशियम, प्रोटीन व आयरन होता है। इसके अलावा इसमें कॉपर, विटामिन B2 व फास्फोरस भी होता है, मतलब एक मुट्ठी में इतने सारे फायदे आपको मिलेंगे। इसमें 161 कैलोरी, 2.5 कार्बोहाइड्रेट होता है।
वैसे माना जाता है की बादाम बेहद ही ज्यादा गर्म होता है जिसकी वजह सके इसके अंदर मौजूद हर एक पोषक तत्व को अच्छे तरीके से अवशोषित करने के लिए ही ही रात भर इस पानी में भिगोकर रखा जाता है। बादाम के ऊपरी सतह पर मौजूद होने वाला टनिन नाम का पदार्थ पोषक तत्वों का अवशोषण करने से रोकता है। यही वजह है की कहा जाता है बादाम को रात में भिगोकर रखते हैं जिससे कि उसका छिलका आसानी से निकल जाए।
वहीं आपको ये भी बता दें की अगर कोई व्यक्ति को दिल की बिमारी है तो उस व्यक्ति को अपने भोजन में भीगे हुए बादाम को जरूर शामिल करना चाहिए। भीगे हुए बादाम का सेवन करने से व्यक्ति का ब्लड प्रेशर हमेशा सुचारू रूप से चलता है। इसके साथ ही ये भी बता दें की ऐसे व्यक्ति को भी भीगे हुए बादाम का सेवन करना चाहिए।
इतना ही नहीं इसके अलावा ये भी बता दें की गर्भवती महिलाओं को उनके पेट में पल रहे बच्चों के मस्तिष्क को तेज बनाने के लिए भी बादाम का सेवन करना चाहिए।
गर्भवती महिलाओं और हार्ट के मरीजों के अलावा जिन लोगों के शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ी होती है उन लोगों को भी बादाम का सेवन करना चाहिए जिससे कि उनका कोलेस्ट्रोल लेवल हमेशा नियंत्रण में बना रहे।
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भारत की शान महाराजा रणजीत सिंह जी .
महाराजा रणजीत सिंह का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी। लेकिन इसको उन्होंने कभी भी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया ..किशोरावस्था से ही चुनौतीयों का सामना करते आये रणजीत सिंह जब केवल 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु (वर्ष 1792) हो गयी थी। खेलने -कूदने कीउम्र में ही नन्हें रणजीत सिंह को मिसल का सरदार बना दिया गया था, और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया।
महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता की उच्च भावना के लिए प्रसिद्द थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करने के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था। महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी।
महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे।
अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया।
Maharaja Ranjit Singh का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उनकी सास का नाम सदा कौर था। सदा कौर की सलाह और प्रोत्साहन पा कर रणजीत सिंह नें रामगदिया पर आक्रमण किया था, परंतु उस युद्ध में वह सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे।
उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके। वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।

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दीपावली के दिन लक्ष्मी का पूजन क्यों होता है

इस बार बच्चा 6 महीने बाद गुरुकुल जब घर आया और उसने एक शानदार सवाल किया
हम दिवाली क्यों मनाते हैं
तो जाहिर सी बात है सीधा सा जवाब दिया इस दिन भगवान राम लंका पर विजय पाकर वापस लौटे थे अयोध्या तो उस के उपलक्ष में कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है
बड़ी गंभीर मुद्रा में उसने सवाल किया तो फिर राम क्यों नहीं पूजे जाते लक्ष्मी का पूजन क्यों करते हैं इस पूरी पूजा में राम तो कहीं नहीं गणेश जी को पूजा लक्ष्मी जी को पूजा कुबेर जी को पूजा दीपावली के दिन लक्ष्मी का पूजन क्यों होता है
सबाल तो सटीक था और घर के बाकी सारे सदस्य अगल बगल झांकने लगे तो लगा चलो आपको भी बता दे कि इस दिन लक्ष्मी पूजन क्यो ओर इस दिन क्या क्या ओर हुआ
कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दिवाली के साथ और क्या क्या होता हे..?
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही ...... देवी लक्ष्मी जी का प्राकट्य: होना ..देवी लक्ष्मी जी कार्तिक मॉस की अमावस्या के दिन समुन्दर मंथन में से अवतार लेकर प्रकट हुई थी।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही भगवन विष्णु द्वारा लक्ष्मी जी को बचाना: ..भगवान विष्णु ने आज ही के दिन अपने पांचवे अवतार वामन अवतार में देवी लक्ष्मी को राजा बलि से मुक्त करवाया था।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही ....नरकासुर वध कृष्ण द्वारा:
इस दिन भगवन कृष्ण ने राक्षसों के राजा नरकासुर का वध कर उसके चंगुल से 16000 औरतों को मुक्त करवाया था। इसी ख़ुशी में दीपावली का त्यौहार दो दिन तक मनाया गया। इसे विजय पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही .....) पांडवो की वापसी:
महाभारत में लिखे अनुसार कार्तिक अमावस्या को पांडव अपना 12 साल का वनवास काट कर वापिस आये थे जो की उन्हें चौसर में कौरवो द्वारा हरये जाने के परिणाम स्वरूप मिला था। इस प्रकार उनके लौटने की खुशी में दीपावली मनाई गई।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही .....) राम जी की विजय
रामायण के अनुसार ये चंद्रमा के कार्तिक मास की अमावस्या के नए दिन की शुरुआत थी जब भगवन राम माता सीता और लक्ष्मण जी अयोध्या वापिस लौटे थे रावण और उसकी लंका का दहन करके। अयोध्या के नागरिकों ने पुरे राज्य को इस प्रकार दीपमाला से प्रकाशित किया था जैसा आजतक कभी भी नहीं हुआ था।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही .....) राजा विक्रमादित्य का राजतिलक:
आज ही के दिन भारत के महान राजा विक्रमदित्य का राज्याभिषेक हुआ था। इसी कारण दीपावली अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना भी है।
.★ ★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही ...) आर्य समाज के लिए प्रमुख दिन:
आज ही के दिन कार्तिक अमावस्या को एक महान व्यक्ति स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदुत्व का अस्तित्व बनाये रखने के लिए आर्य समाज की स्थापना की थी।
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही ...जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण दिन:
महावीर तीर्थंकर जी ने कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही मोक्ष प्राप्त किया था। और जैन नव वर्ष वीर संवत आज ही से सुरु होता हे...
.★ कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही सिखों के लिए महत्व:
तीसरे सिख गुरु गुरु अमरदास जी ने लाल पत्र दिवस के रूप में मनाया था जिसमे सभी श्रद्धालु गुरु जी से आशीर्वाद लेने पहुंचे थे और 1577 में अमृतसर में हरिमंदिर साहिब का शिलान्यास किया गया था।
1619 में सिख गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में 52 राजाओ के साथ मुक्त किया गया था जिन्हें मुगल बादशाह जहांगीर ने नजरबन्द किया हुआ था। इसे सिख समाज बंदी छोड़ दिवस के रूप में भी जानते हैं।

अब आप सोचिए इतना कुछ और आपको क्यो नही पता ....क्यो की हम मन्दिर में सिर्फ #घण्टा बजाने जाते है ...ओर हमारे लिए यही हिन्दू धर्म है..... सिंपल...
#manishsoni,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एक राजा जिसने भारत को बनाया सोने की चिड़िया
आपने बचपन से कई बार एक बात जरूर सुनी होगी की भारत पहले सोने की चिड़िया था और भारत को सोने कहा जाता था। परह पर क्या आप ये जानते है कि भारत को सोने कि चिड़िया आखिर किसने बनाया था। नहीं ना तो हम बताते है कि वो राजा थे विक्रनादित्य।बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य।
बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। विक्रमादित्य का इतिहास भारत के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है आइए जानते हैं विक्रमादित्य के बारे में....
विक्रमादित्य के समय में हमारे देश की आर्थिक दशा काफी अच्छी थी। वो ऐसा समय था जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाया और सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया था। महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है।
विदेश जाता था कपड़ा
 विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे। इसी कारण वो कपड़े का व्यापार और सोने के सिक्कों के टलन ने भारत को सोने की चिड़िया का नाम दिया गया था।
न्याय के लिए प्रसिद्ध था ये काल
आपने शुरु से ही किताबों में राजा विक्रमादित्य के न्याय की कहानियां जरूर सुनी होंगी। ऐसा माना जाता है कि उनके न्याय से प्रसन्न होकर कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे, विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय, राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी। इसी कारण राजा विक्रमादित्य को न्याय का प्रतीक माना जाता है।
खो गए थे रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ
 आज रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ आपके पास ना होते। रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया।
राजा के नौरत्नों में एक थे कालिदास विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे। विक्रमादित्य के इतिहास को सदा के लिए याद किया जाता रहेगाइस समय तो ऐसा देखने को मिल जाएगा कि जनता विक्रमादित्य को भूलती जा रही है। जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाने के लिए इतना संघर्ष किया आज उसी राजा का नाम हमारी पीढी नहीं जानती है। किताबों से उनका नाम मिटता जा रहा है। जो कि आने वाली पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।
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मेघालय के शिलोंग की #उमनगोट नदी,
यह नदी कांच की तरह दिखने वाली भारत की सबसे स्वच्छ नदी है, यह नदी आगे चलकर बांग्लादेश बॉर्डर पर मिलकर डोकई नदी बन जाती है

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"सबरीमाला मंदिर और प्राचीन परम्परा"
भगवान शिव और विष्णु की संतान हैं अयप्‍पा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयप्पा को भगवान शिव और मोहिनी ( भगवान विष्णु का एक अवतार) का पुत्र माना जाता है। इनका एक नाम हरिहरपुत्र भी है।

हरि यानी विष्णु और हर यानी शिव, इन्हीं दोनों भगवानों के नाम पर हरिहरपुत्र नाम पड़ा। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है।

अय्यप्पा स्वामी को माना जाता है ब्रह्मचारी
केरल में शैव और वैष्णवों में बढ़ते वैमनस्य के कारण एक मध्य मार्ग की स्थापना की गई थी, जिसमें अय्यप्पा स्वामी का सबरीमाला मंदिर बनाया गया था।

इसमें सभी पंथ के लोग आ सकते हैं। ये मंदिर लगभग 800 साल पुराना माना जाता है। अयप्पा स्वामी को ब्रह्मचारी माना गया है, इसी वजह से मंदिर में उन महिलाओं का प्रवेश वर्जित था जो रजस्वला हो सकती थीं।

इस मंदिर का निर्माण राजा राजसेखरा ने कराया था। उन्हें पंपा नदी के किनारे अयप्पा भगवान बाल रूप में मिले थे, इसके बाद वो उन्हें अपने साथ महल ले आए थे।

इसके कुछ समय बाद ही रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। अयप्पा के बड़े होने के कारण राजा उन्हें राज सौंपना चाहते थे, लेकिन रानी इसके लिए तैयार नहीं थीं।

एक बार रानी ने अपनी तबीयत खराब होने का बहाना बनाया और कहा कि उनकी बीमारी केवल शेरनी के दूध से ही ठीक हो सकती है। अयप्पाजी जंगल में दूध लेने चले गए। इस दौरान उनका सामना एक राक्षसी से हुआ, जिसे उन्होंने मार दिया।

खुश होकर इंद्र ने उनके साथ शेरनी को महल में भेज दिया। शेरनी को उनके साथ देखकर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ।

इसके बाद पिता ने अयप्पा को राजा बनने को कहा तो उन्होंने इससे मना कर दिया। इसके बाद वो वहां से गायब हो गए। इससे दुखी होकर उनके पिता ने खाना त्याग दिया। इसके बाद भगवान अयप्पा ने पिता को दर्शन दिए और इस स्थान पर अपना मंदिर बनवाने को कहा। इसके बाद इस जगह पर मंदिर का निर्माण कराया गया।

यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा है। यहां आने वाले श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं।

वह पोटली नैवेद्य (भगवान को चढ़ाई जानी वाली चीज़ें, जिन्हें प्रसाद के तौर पर पुजारी घर ले जाने को देते हैं) से भरी होती है। मान्यता है कि तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर और सिर पर नैवेद्य रखकर जो भी व्यक्ति आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

यहां आने वाले सभी लोग काले कपड़े पहनते हैं. यह रंग दुनिया की सारी खुशियों के त्याग को दिखाता है. इसके अलावा इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी जाति के होने के बाद भी अयप्पा के सामने सभी बराबर हैं.

इसके अलावा सबरीमाला आने वाले भक्तों को यहां आने से 40 दिन पहले से बिल्कुल आस्तिक और पवित्र जीवन जीना होता है. इस मंदिर के जैसे रिवाज आपको देश में कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे.

क्योंकि यहां दर्शन के दौरान भक्त ग्रुप बनाकर प्रार्थना करते हैं. एक 'दलित' भी इस प्रार्थना को करवा सकता है और अगर उस ग्रुप में कोई 'ब्राह्मण' है तो वह भी उसके पैर छूता है.

साथ ही यहां पर उन भक्तों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, जो मंदिर में ज्यादा बार आए होते हैं न कि उनको जिनकी जाति को समाज तथाकथित रूप से ऊंचा मानता हो.

वर्तमान में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जो विवाद बड़ा है , उसमें सर्वजन समाज जिसमें वहां की सभी औरतें भी मंदिर के पक्ष में खड़ी हैं ।

फिर ये विवाद किसका और कौन घुसना चाहता है मन्दिर में । कम्युनिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता के वेश में ईसाई-मुस्लिम महिला और एक्टिविस्ट कुछ तथाकथित महिलाएं मन्दिर की पुरानी परम्पराओं को तोड़कर घुसना चाहती हैं ।

ये एक्टिविस्ट घुसने को तत्पर हैं, समझ में ये नहीं आ रहा ये धार्मिक स्थान है या पर्यटन का? यदि धार्मिक तो इनका क्या काम है? वहां की सरकार इनको पुलिस जैकेट देकर कैसे घुसाने का रास्ता दे रही?

इंडियन कोर्ट के न्यायधीशों को कोई अधिकार नहीं हैं कि वो हिन्दुओं की धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप करें

संविधान की आढ़ लेकर हिन्दू धर्म की परंपराओं, मंदिरों की मर्यादाओं व संस्कृति को नष्ट क्या जा रहा हैं, अन्य धर्म के लिए होता तो अभी तक न्यायधीशों को दण्ड मिल चुका होता, संसद में कानून बदल दिए होते। नया कानून बन चुका होता, हिन्दू समाज के बहुसंख्यक नेता दोगले, साई, बुद्ध, गांधी, अम्बेडकर व मुहम्मद के भक्त हैं तथा हिन्दुओं के विश्वासघाती हैं, फिर भी हिन्दू सहष्णु है, संविधान पर अत्याधिक विश्वास करता हैं और निद्रा अवस्था में ज्यादा रहता है ।

#विट्ठलदासव्यास
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यह आठ चिरंजीवी हैं,,,,,,
हिंदू इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे सात व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह परामनोविज्ञान जैसा है, जो परामनोविज्ञान और टेलीपैथी विद्या जैसी आज के आधुनिक साइंस की विद्या को जानते हैं वही इस पर विश्वास कर सकते हैं। आओ जानते हैं कि हिंदू धर्म अनुसार कौन से हैं यह सात जीवित महामानव।
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

प्राचीन मान्यताओं के आधार पर यदि कोई व्यक्ति हर रोज इन आठ अमर लोगों (अष्ट चिरंजीवी) के नाम भी लेता है तो उसकी उम्र लंबी होती है।
१. हनुमान - कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं और हनुमानजी भी इन अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। अजर-अमर का अर्थ है कि जिसे ना कभी मौत आएगी और ना ही कभी बुढ़ापा। इस कारण भगवान हनुमान को हमेशा शक्ति का स्रोत माना गया है क्योंकि वे चीरयुवा हैं।
२. कृपाचार्य- महाभारत के अनुसार कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे। कृपाचार्य गौतम ऋषि पुत्र हैं और इनकी बहन का नाम है कृपी। कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था। कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा हैं। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य ने भी पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था।
३. अश्वथामा- ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।
अश्वथाम के संबंध में प्रचलित मान्यता... मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।
४. ऋषि मार्कण्डेय- भगवान शिव के परम भक्त हैं ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि के कारण चिरंजीवी बन गए।

५. विभीषण- राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया।
६. राजा बलि- शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था। इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे।
७. ऋषि व्यास- ऋषि भी अष्ट चिरंजीवी हैँ और इन्होंने चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) का सम्पादन किया था। साथ ही, इन्होंने ही सभी 18 पुराणों की रचना भी की थी। महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना भी वेद व्यास द्वारा ही की गई है। इन्हें वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए।
८. परशुराम- भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। परशुराम का जन्म समय सतयुग और त्रेता के संधिकाल में माना जाता है। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था।
परशुराम का प्रारंभिक नाम राम था। राम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हुए और राम को अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

समाज सेवा तो कोई पद्मश्री सुहासिनी मिस्त्री से सीखे...
इस तस्वीर में चप्पल और सुती साड़ी में जिस महिला को आप देख रहे हैं उनका नाम सुहासिनी मिस्त्री... इन्हें इस साल पद्म श्री से सम्मानित किया गया है...
70 साल की सुहासिनी मिस्त्री कोलकाता में रहती हैं... 23 साल की उम्र में सुहासिनी मिस्त्री ने अपने पति को खो दिया.... फिर सुहासिनी ने सब्जी बेचकर बच्चों को पाला....
50 साल पहले जब पति का साथ छूटा था तो उस वक्त सुहासिनी के पास पैसे नहीं थे कि वो उनका इलाज करा सके... आज सुहासिनी मिस्त्री 70 साल की हैं और उनके चेहरे पर सुकून है.... सुकून इस बात का कि अब वह अपने खुद के बनाए हॉस्पिटल में गरीबों का इलाज कर पा रही हैं....
दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने ये सब सब्जी बेचकर और जूते पॉलिश कर जुटाए पैसों से किया है.... सुहासिनी मिस्त्री एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने खुद गरीबी में अपना जीवन काटकर लोगों की सेवा की है....
1996 में सुहासिनी ने गरीबों के लिए हॉस्पिटल बनाया... फिलहाल बंगाल में उनके दो हॉस्पिटल हैं....एक हॉस्पिटल इनके गांव हंसखाली में है जबकि दूसरा सुंदरबन में...
पद्मश्री से सम्मानित किए जाने पर उन्होंने कहा कि मैं काफी खूश हूं.... और मैं दुनियाभर के हॉस्पिटल से अनुरोध करती हूं कि जिसे भी तुंरत इलाज की जरूरत हो वो उन्हें मना न करें.... मेरे पति की मौत इसलिए हो गई थी क्यों उनके इलाज के लिए हॉस्पिटल ने मना कर दिया था.... मैं नहीं चाहती किसी और के साथ ऐसा हो’’....नमन है ऐसे निस्वार्थ भाव के समाज सेवकों को.......
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भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है l*

*भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास*
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे, रामायण के बालकाण्ड के सर्ग, 70 / 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है, जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे, जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था, जिनकी पुत्री सीता जी थीं, जिनका विवाह राम से हुआ था l राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी l केशव दास रचित ”रामचन्द्रिका“ पृष्ठ 354 (प्रकाशन संवत 1715) के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे l

*भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा*
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावतीl कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है, और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

*थाईलैंड की अयोध्या*
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं, क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है “क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

*असली राम राज्य थाईलैंड में है*
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं, इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

*थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है*
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं, फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में ”राम कियेन” कहते हैं l जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी, जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है, जो नाम के हिन्दू हैं, हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग हैं l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-
1. राम (राम)
2. लक (लक्ष्मण)
3. पाली (बाली)
4. सुक्रीप (सुग्रीव)
5. ओन्कोट (अंगद)
6. खोम्पून ( जाम्बवन्त )
7. बिपेक ( विभीषण )
8. तोतस कन (दशकण्ठ) रावण
9. सदायु ( जटायु )
10. सुपन मच्छा (शूर्पणखा)
11. मारित ( मारीच )
12. इन्द्रचित (इंद्रजीत) मेघनाद

*थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता*
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है, उनके नाम इस प्रकार हैं
1. ईसुअन (ईश्वन) ईश्वर शिव
2. नाराइ (नारायण) विष्णु
3. फ्रॉम (ब्रह्म) ब्रह्मा
4. इन ( इंद्र )
5. आथित (आदित्य) सूर्य
6 . पाय ( पवन ) वायु

*थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़*
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है, जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The Brahminy Kite ) कहा जाता है, इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur Indus” है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco Indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था l इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं, और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है, और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं, इसलिए उन्होंने ”गरुड़” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

*सुवर्णभूमि हवाई अड्डा*
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य, क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पर हैं l जैसे हुमायूँ रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड इत्यादि, इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि हैl यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ हैl पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l अपनी संस्कृति की उपेक्षा कर के कोई भी समाज अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती।
आजकल सेकुलर गिरोह के मरीच सनातन संस्कृति की उपेक्षा और उपहास एक सोची समझी साजिश के तहत कर रहे हैं और अपनी संस्कृति से अनजान नवीन पीढ़ी अन्धो की तरह उनका अनुकरण कर रही है।
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दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कों में से 3 भारत मे है. ये सड़कें ड्राइवरों को डराती हैं. जानिए इन 10 सड़कों को.
श्रीनगर-लेह हाईवे
443 किलोमीटर लंबा ये हाईवे भारत की कश्मीर घाटी को लेह से जोड़ता है. जोजिला पास से गुजरने वाली यह सड़क सर्दियों में पूरी तरह बर्फ से दबी रहती है. गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद हाईवे पर कीचड़ से फिसलन भी रहती है. पत्थर गिरने और बर्फीले तूफान का खतरा भी बना रहता है.
माचू पिचू रोड
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू की यह सर्पीली सड़क माचू पिचू को आगुआस कालिएतेंस को जोड़ती है. खड़े पहाड़ पर बनी इस सड़क में 11 तीखे हेयरपिन बैंड हैं. 8.9 किलोमीटर लंबे इस हिस्से को पार करने में बहुत से लोगों की हालत खस्ता हो जाती है.
फ़ेडरल हाइवे
अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में फेडरल हाईवे 20 है. बर्फीले पहाड़ों और मोहक वादियों वाली इस सड़क पर सर्दियों में गाड़ी चलाना नामुमकिन सा हो जाता है. बर्फ के चलते इस सड़क पर ट्रक तक फिसलने लगते हैं.
स्किपर्स कैनियन
न्यूजीलैंड के क्वींसटाउन में यह सड़क 40 साल पहले भेड़ों और चरवाहों के लिए बनाई गई. बाद में इस पर गाड़ियां भी चलने लगीं. यह सड़क बेहद पतली और तीखे मोड़ों वाली है. सामने से आने वाली भेड़ें और गाड़ियां मुश्किल पैदा करती हैं.
किन्नूर वैली
हिमाचल प्रदेश की किन्नूर घाटी तक जाने वाली सड़क अथाह गहरी खाई के बराबर चलती है. कई जगहों पर कड़ी चट्टानें काटकर यह सड़क बनाई गई तो कहीं भूस्खलन वाले इलाकों पर. रोड का बड़ा हिस्सा सिंगल लेन है. जरा सी चूक होने पर सैकड़ों मीटर गहरी खाई.
सा कोलोब्रा रोड
स्पेन के मशहूर द्वीप मयोर्का के सा कोलोब्रा गांव तक पहुंचने वाली सड़क ऐसी दिखती है. 13 किलोमीटर लंबी इस सड़क में कई तीखे मोड़ हैं. बस और ट्रक इस सड़क पर बैक होकर वापस नहीं जा सकते. मोड़ों पर दो बड़ी गाड़ियां बमुश्किल पास ले पाती हैं.
जॉर्ज दे गालामू
फ्रांस की सड़क ड्राइवरों के लिए बहुत बड़ा चैलेंज है. इस सड़क पर कुछ जगहों पर बिल्कुल एक कार के बराबर जगह है. अगर सामने से कोई और गाड़ी आ जाए तो एक वाहन को बहुत दूर तक रिवर्स कर पास लेने के लिए जगह बनानी पड़ती है.
गुओलियांग टनल
चीन के शिनचियांग प्रांत की यह सड़क कड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई है. गुओलियांग गांव को जोड़ने वाली इस रोड को बनाना आसान नहीं था. 1970 के दशक में निर्माण के दौरान चट्टानी इलाके में तीन दिन में सिर्फ एक मीटर रोड काटी जा सकी. इस रोड में तीखे और संकरे मोड़ व खड़ी खाइयां हैं.
जी टी रोड
अमृतसर को एक ओर कोलकाता और चटगांव और दूसरी ओर लाहौर और पेशावर से जोड़ने वाली ग्रैंड ट्रंक रोड एशिया का सबसे पुराना हाईवे है. करीब 2,700 किलोमीटर की लंबाई, अलग अलग भूगोल और अत्यंत व्यस्त ट्रैफिक इस रूट को खतरनाक सड़कों की लिस्ट में जोड़ता है.
रोड ऑफ डेथ
बोलिविया की इस सड़क को "रोड ऑफ डेथ" कहा जाता है. 400 किलोमीटर लंबी यह संकरी सड़क पहाड़ों से गुजरते हुए 4,000 मीटर की ऊंचाई तक जाती है. राजधानी ला पाज को कोरुएरो से जोड़ने वाली इस सड़क का 50 किलोमीटर का हिस्सा बहुत ही खतरनाक माना जाता है.
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दूर्वा
दूर्वा को दरोब, दूब, अमृता,अनंता, गौरी,महौषधि,शतपर्वा,भार्गवी आदि नामों से जाना जाता हैं...।
सभी जगह आसानी से मिल जाने वाली यह घाँस ज़मीन पर पसरते हुए चलती हैं ...हमारे देश मे सेकड़ो प्रकार की घाँस हैं जिनमे सबसे श्रेष्ठ दूर्वा को ही माना गया हैं.... इसका उल्लेख आयुर्वेद ही नही हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता हैं जो इसके गुणकारी पक्ष को बताता हैं.... हमारे वार-त्योहार, संस्कार एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग सदैव से होता आया हैं....।
भगवान गणेश की अतिप्रिय दूर्वा से जुड़ी कथा हैं कि समुंद्र मंथन में निकले अमृत को सर्वप्रथम जिस जगह पर रखा था वहाँ दूर्वा घाँस थी इसी कारण इसे अमृता कहा हैं, वही भगवान गणेश ने किसी राक्षस को निगल लिया तब गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठे पिलाई ,जिससे उनके पेट की अग्नि शांत हुई ,,इसी कारण भगवान गणेश को 21 गांठे दरोब की चढ़ाई जाती हैं....।
अन्य मौसम की अपेक्षा वर्षा काल के दौरान दूब घास अधिक वृद्धि करती है तथा वर्ष में दो बार सितम्बर-अक्टूबर और फ़रवरी-मार्च में इसमें फूल आते है... दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है...वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल होता है... इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती है... दूब की जड़ों में हवा तथा भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है....।।
प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ओर पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया... ।
हमारे शास्त्रों के साथ ही अनेक विद्वानों ने इसके अनेक गुणों का परीक्षण कर इसे एक अति गुणकारी महाओषधि माना हैं .... दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं...दूब के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियाँ इन सभी का चिकित्सा क्षेत्र में भी अपना विशिष्ट महत्व है....आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है...विभिन्न पैत्तिक एवं कफज विकारों के शमन में दूब का निरापद प्रयोग किया जाता है....
दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ प्राप्त करते हैं.......।
इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है और अनेक विकार शांत हो जाते है.....।
दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है....।
दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है.....।
नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है....।
इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते है.....।
दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है।
इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है...।
यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है....।
दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है...।
इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है....।
दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है....।
इसके रस में बारीक पिसा नाग केशर और छोटी इलायची मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे बच्चों को नस्य दिलाने से वे तंदुरुस्त होते है....।



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अमरबेल एक पराश्रयी लता हैं जो अक्सर हमे पेड़ो पर झूलती हुई दिखाई देती हैं.... यह मानव स्वास्थ्य के लिये एक संजीवनी है जो लगभग पूरे भारत वर्ष में पाई जाती है.....अमर बेल को आकाशबल्ली, कसूसे हिन्द, स्वर्ण लता, निर्मुली, अलकजरिया,आलोक लता, रस बेल, आकाश बेल, डोडर, अंधा बेल आदि नामो से जाना जाता है..अमर बेल हमेशा पेड़ पौधों पर चलती है मिट्टी से इसका कोई नाता नही होता इस कारण इसे आकाश बेल भी कहते हैं.।
यह एक प्रकार की लता है जो ठंड के दिनों में बहुत तेज गति से वृद्धि करती है ,वृक्ष पर एक पीले जाल के रूप में लिपटी रहती है.... यह परजीवी पौधा है जिसमें पत्तियों का पूर्णत: अभाव होता है ,यह जिस पेड़ पर डाल दे वहाँ पनप जाती है और धीरे धीरे उस पेड़ को सूखा तक देती है...।
कई बार यह फसलों को भी चपेट में ले लेती हैं,यह केवल ज्वार, मक्का,बाजरा,धान, गेंहू पर यह नही पनपती...।।
#औषधीय_गुण
अमर बेल का आर्युवेद जगत में विशेष स्थान है
अमरवेल का काढ़ा घाव धोने के लिए #टिंक्चर की तरह काम करता है....वहीँ यह घाव को पकने भी नहीं देता है.....बरसात में पैर के उंगलियों के बीच घाव या गारिया होने पर अमरबेल पौधे का रस दिन में 5-6 बार लगाया जाए तो आराम मिल जाता है..... #आम के पेड़ पर लगी अमरबेल को पानी में उबाल कर स्नान किया जाए तो बाल मजबूत और पुन: उगने लगते है......वहीँ अमरबेल को कूटकर उसे तिल के तेल में 20 मिनट तक उबालते हैं और इस तेल को कम बाल या गंजे सर में लगाने से काफी लाभ मिलता है....।
अमरबेल को #लक्ष्मी का प्रतीक भी मानते है ...हर शुभ कार्य में इसकी पूजा की जाती है...।
#निवेदन- हमेशा ध्यान रखे कि अमरबेल को तोड़कर किसी फलदार छावदार पेड़ पर ना डाले... यदि आप इसकी वृद्धि चाहते हैं तो अनचाही झाड़ियों पर उपजा सकते हैं..।



राजस्थान में हरियाली लाने वाले
श्री राणाराम जी विश्नोई

राजस्थान के जोधपुर जिले से 100 किलोमीटर दूर के रहने वाले श्री राणाराम विश्नोई जी को भले आज की युवा पीढ़ी नहीं जानती हो पर उन्होंने वो कर दिखाया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी है ।
राजस्थान के रेगिस्तान में पौधे को पेड़ बनाना कितना कठिन है ये हम सब जानते हैं...।
विश्नोई जी की अभी उम्र 70 साल को हो गई है पर पिछले 50 साल में उन्होंने 35,000 से अधिक पेड़ लगा कर रेगिस्थान को हरित बना दिया .....विश्नोई जी ने बताते है की धीरे धीरे पेड़ खत्म हो रहे थे तो उनमे मन में पीड़ा हुई और सोचा की अगर ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले समय में साँस लेना भी मुश्किल हो जाएगा तो उन्होंने प्रण करके पेड़ लगाने शुरू किए पर आस पास पानी नहीं होने से पेड़ लगने मुश्किल थे तो उन्होंने घड़ा कंधे पर उठाया और सुदूर कुँए से पानी लाकर पेड़ो को देना शुरू किया आज वो 35 हजार से अधिक पेड़ लगा कर बड़े कर चुके और प्रयास आज भी जारी है...आज उनका क्षेत्र रेगिस्थान से हरियाली में बदल चूका है ।


कबीट"(कैथ)
कबीट को कैथ,कैथा, कोठा,कोटबड़ी, कपित्थ आदि नामों से जाना जाता हैं....।
कबीट भगवान श्री गणेश का प्रिय फल हैं,,गांव में बड़े बुजुर्ग कहते है कि दशहरे के पूर्व कबीट का सेवन नही करना चाहिये,,इसके पीछे धारणा यही रही होगी कि कबीट पूर्ण रूप से इस समय तक तैयार हो सके .....कबीट स्वाद में बड़ा खट्टा-मीठा होता हैं ,,पर दुर्भाग्य से औषधीय गुणों से भरपूर #कबीट अब कई क्षेत्रो से विलुप्त होने की कगार पर है,आज की नई पीढ़ी तो इसे पहचानती तक नही......।
इसका पेड़ काफी बड़ा और लम्बी उम्र का होता है......।
आयुर्वेद में कबीट को पेट के रोगों का विशेषज्ञ माना गया है ....वहीं इसकी चटनी भी खूब पसंद की जाती है।
कच्चे कबीट में "एस्ट्रीजेंट्स" होते हैं जो मानव शरीर के लिए बहुत ही लाभप्रद है......वही डायरिया और डीसेंट्री के मरीजों के लिए काफी लाभदायक है.....कबीट के सेवन से मसूड़ों तथा गले के रोग ठीक हो जाते हैं ......बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से जो गोंद निकलती है वो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है।
आओ कबीट को जाने समझे और अपने गाँव-शहर में इसको रोपने का अभियान छेड़े...।।
 राम वी. सुतार..
वह बुजुर्ग शिल्पकार जिसने बनाई सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा ...
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' (Statue of Unity) का अनावरण करेंगे. यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी. गुजरात में नर्मदा नदी के किनारे सरदार सरोवर बांध के नजदीक स्थापित होने वाली इस प्रतिमा को इंस्टाल किया जा चुका है
इस प्रतिमा के पीछे शिल्पकार हैं राम वी. सुतार....... स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पद्मभूषण से सम्मानित 92 वर्षीय शिल्पकार राम वी. सुतार की कल्पना है और उन्होंने ही इस प्रतिमा को डिजाइन किया है. इससे पहले भी वे सैकड़ों प्रतिमाएं बना चुके हैं. जिसमें संसद भवन परिसर में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा भी शामिल है.
राम वी. सुतार मूल रूप से महाराष्ट्र के एक गांव (गोंदूर) के रहने वाले हैं. उनके पिता कारपेंटर थे और इस नाते उन्हें शिल्प कला विरासत में मिली थी. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव में ही हुई और उसी दौरान गुरु श्रीराम कृष्ण जोशी से मिट्टी में जान डालने की कला यानी शिल्पकारी सीखना शुरू किया
इसके बाद राम वी. सुतार ने शिल्प कला के लिए मशहूर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला ले लिया और यहां तमाम बारीकियां सीखीं. पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ दिनों तक नौकरी भी की. इसके बाद वर्ष 1958 में वह दिल्ली आ गए. शुरुआत में कुछ दिनों तक लक्ष्मीनगर रहे और उसके बाद नोएडा में अपना स्टूडियो स्थापित किया.
राम वी. सुतार द्वारा डिजाइन की गयी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का कुल वजन 1700 टन है और ऊंचाई 522 फिट यानी 182 मीटर है. प्रतिमा अपने आप में अनूठी है. इसके पैर की ऊंचाई 80 फिट, हाथ की ऊंचाई 70 फिट, कंधे की ऊंचाई 140 फिट और चेहरे की ऊंचाई 70 फिट है.
राम वी. सुतार इन दिनों मुंबई के समुंदर में लगने वाली शिवाजी की प्रतिमा की डिजाइन भी तैयार करने में जुटे हैं. पिछले दिनों अमृतसर के वॉर मेमोरियल में लगाई गई दुनिया की सबसे लंबी तलवार को भी सुतार ने ही तैयार किया था.
देश-विदेश में अपनी शिल्प कला का लोहा मनवाने वाले राम वी. सुतार को साल 2016 में सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था. इससे पहले वर्ष 1999 में उन्हें पद्मश्री भी प्रदान किया जा चुका है. इसके अलावा वे बांबे आर्ट सोसायटी के लाइफ टाइम अचीवमेंट समेत अन्य पुरस्कार से भी नवाजे गए हैं.I

कर दिया काम ...//  केरल नन रेप केस: आरोपी फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ प्रमुख गवाह फादर कुरियाकोस पंजाब के जालंधर में मृत अवस्था में पाए गए ...
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ये 72 शंकराचार्य और सैकड़ों मठाधीश सबरीमाला पर कुछ क्यों नहीं बोलते?
क्या इन्हे कोर्ट का अवमानना का डर है?
मौलवी/पादरी तो नहीं डरते कोर्ट से तो फिर शंकराचार्य क्यों डरते हैं।
यदि शबरीमला मन्दिर के लिए सभी आखाडों के प्रतिनिधि और सभी जगद्गुरू एक साथ खडे होकर शबरीमला को सपोर्ट करने लगे तो बहुत कुछ हो सकता है हिन्दुओं की ताकत बढ सकती है
Sanjay Dwivedy
अब मीलॉर्डों को वेटिकन चस्मा उतार कर चीजों को भारतीय मूल्यों के परिपेक्ष्य में ही देखना होगा अन्यथा स्थिति भयावह होगी जिसका जिम्मेवार भी सुप्रीम कोर्ट ही होगा


, सबरीमाला के कारण आदिवासि, दलित ,ब्राह्मण सब एक हैं।ईसाईकरण नहीं हो पा रहा। षड़यंत्र 1950 से है सन 1950 में सबरीमाला मंदिर में भीषण आग लगा दी गयी थी और मूर्ति तोड़ने का प्रयास भी किया गया ।  उसके बाद 1980 में क्रॉस गाड़ा गया मंदिर के प्रांगण में। RSS स्वयंसेवक शिशुपालनजी के नेतृत्व में आंदोलन हुआ ,फिर हटा,और अब मैरी जेन और रेहाना फातिमा की मंदिर को अपवित्र करने की कोसिस ।
अगर अभी भी किसी को लगता है ये वुमन इम्पावरमेंट का मामला है तो उसको इलाज की जरूरत है
सबरीमाला हमेसा से वामीयों मिशनरियों और जेहादियों के निशाने पर रहा है । सन 1980 में सबसे छिपा कर इन लोगों ने नीलक्क़ल के पवित्र अय्यपा गार्डेन (बगीचे) में एक क्रॉस लगा दिया था ओर क्लेम किया गया कि ये 2000 साल पुराना सेंट थॉमस क्रास है और एक छोटे चर्च का निमार्ण कर लिया गया ।
इस क्रॉस को हटाने की लड़ाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जी सिशुपालन ने लड़ी जिसकी वजह से उन्हें अपनी सरकारी नौकरी भी खोनी पड़ी पर अंत मे जीत उनकी हुई । नीचे फ़ोटो में शिशुपालनजी हैं
  केरल राज्य के इंस्पेक्टर जनरल द्वारा सब्मिट 1950 की रिपोर्ट 
इस केस की जाँच तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल ने की थी इस रिपोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे ।
1 श्रीकोविल का गेट तोड़ा गया था और मूर्ति को छति पहुंचाने की कोसिस की गई थी ।
2- रिपोर्ट ये भी कहती है कि चोरी करने के उद्देश्य से ऐसा नही किया गया था क्योंकि मंदिर के आभूषण आदि चुराये नही गये थे बस मूर्तियों को छति पहुंचाने की कोसिस की गई थी ।
3- ऑर्थोडॉक्स क्रिस्चियनस के कुछ संगठन बहुत समय से यंहा एक पुराने चर्च के होने दावा स्थापित करने की कोसिस में लगे थे ।
4- रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सबरीमाला मंदिर हिंदुओं को एक करने में लगा था जंहा एक ब्राम्भन और आदिवासी या दलित सभी कंधे से कंधा रगड़ते थे । जिस वजह से धर्म परिवर्तन की गति धीमी थी ।
5- रिपोर्ट में  सबरीमला की पहाड़ियों में गतिविधियों में लिप्त कई क्रिस्चियन संगठनों को संदेह के दायरे में रखा गया था ।
6- इस मामले में किसी को सजा नही हुई क्योंकि इस आग और तोड़फोड़ की जानकारी 20 दिन बाद पुलिस को मिल पाई थी और अधिकतर सबूत नष्ट हो चुके थे ।
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केरल का कट्टरपंथी इसाई विधायक PC George अब मंदिर के नियमो की रक्षा का ऐलान कर रहा है इसका कारण है हिन्दू एकता...
पीसी जोर्ज हिन्दुओ की एकता को देखते हुए मंदिर की रक्षा में उतरा है, वामपंथियों को उम्मीद थी कि हिंदुओ को तो आदत है जलील होने की, हिन्दुओ को ऐसे ही दबायेंगे । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ खुद लाखों हिन्दू महिलाएं सड़कों पर है, केरल में पहली बार हिन्दू अपने धर्म और मंदिर के लिए इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर आया है, और हिन्दुओ की एकजुटता को देखते हुए इसाई विधायक PC George भी मंदिर के नियमो की रक्षा का प्रण ले रहा है।
पीसी जोर्ज ने तो यहाँ तक कहा की – सुप्रीम कोर्ट का सबरीमाला मंदिर पर चाहे कोई भी फैसला हो, मैं 1 भी महिला को सबरीमाला मंदिर की तरफ जाने ही नहीं दूंगा, पीसी जोर्ज ने कहा की – मंदिर की तरफ दो तिहाई लोग मेरे ही विधानसभा इलाके से होकर जाते है, मैं 1 भी महिला को मंदिर की तरफ जाने ही नहीं दूंगा, मंदिर के नियमो की रक्षा करूँगा, सुप्रीम कोर्ट को जो कहना है करना है करने दो।
हिन्दुओ के लिए ये सीख है, आप एकजुट हुए तो सब आपको सम्मान देंगे, बिखरे रहे तो सिर्फ अपमान ही अपमान मिलेगा, एकजुट होना मुश्किल नहीं है, बस किसी जाति से ऊपर होकर हिन्दू हो जाइए, PC George जैसे कट्टरपंथी आपको सम्मान देने में लग जायेंगे ।
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तीन छात्रों ने शुरू किया
पुआल से कप-प्लेट बनाने का स्टार्टअप..//
अब फसल अपशिष्टों से भी ईको-फ्रेंडली उत्पाद बनाने की पद्धति विकसित हो चुकी है। आईआईटी, दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े 'क्रिया लैब्स' स्टार्टअप के तीन छात्रों अंकुर कुमार, कनिका प्रजापत और प्रचीर दत्ता धान के पुआल से कप और प्लेट बना रहे हैं।
दिल्ली में हवा के प्रदूषण से निपटने के लिए इमरजेंसी एक्शन प्लान लागू हो गया है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए गत सोमवार से इमरजेंसी प्लान लागू किया है।
आईआईटी-दिल्ली के छात्र अंकुर कुमार, कनिका प्रजापत और प्रचीर दत्ता ने चार साल पहले ग्रीष्मकालीन परियोजना के रूप में पराली (धान का पुआल) से कप और प्लेट बनाने का 'क्रिया लैब्स' स्टार्टअप शुरू किया था। उस समय वे बी.टेक कर रहे थे। उनका विचार था कि फसल अपशिष्टों से जैविक रूप से अपघटित होने योग्य बर्तन बनाने की तकनीक विकसित हो जाए तो प्लास्टिक से बने प्लेट तथा कपों का इस्तेमाल कम किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने एक प्रक्रिया और उससे संबंधित मशीन विकसित की और पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया। अंकुर कुमार बताते हैं कि जल्द ही हमें यह एहसास हो गया कि मुख्य समस्या कृषि कचरे से लुगदी बनाने की है, न कि लुगदी को टेबलवेयर में परिवर्तित करने की।
'क्रिया लैब्स' के मुख्य संचालन अधिकारी अंकुर कुमार बताते हैं कि इस तकनीक की मदद से किसी भी कृषि अपशिष्ट या लिग्नोसेल्यूलोसिक द्रव्यमान को होलोसेल्यूलोस फाइबर या लुगदी और लिग्निन में परिवर्तित किया जा सकता है। लिग्निन को सीमेंट और सिरेमिक उद्योगों में बाइंडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लगभग उसी समय, दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या उभरी और पराली जलाने से इस खोज का संबंध एक बड़ा मुद्दा बन गया। उसी दौरान हमने इस नयी परियोजना पर काम करना शुरू किया था। हमारी कोशिश कृषि अपशिष्टों से लुगदी बनाना और उससे लिग्निन-सिलिका के रूप में सह-उत्पाद को अलग करने की थी। हमने सोचा कि अगर किसानों को उनके फसल अवशेषों का मूल्य मिल जाए तो वे पराली जलाना बंद कर सकते हैं।
इस प्रकार सितंबर 2017 में 'क्रिया लैब्स' को स्थापित किया गया। अभी स्थापित की गई यूनिट में प्रतिदिन 10 से 15 किलोग्राम कृषि अपशिष्टों का प्रसंस्करण किया जा सकता है।
गौरतलब है कि हर साल सर्दियों की शुरुआत होते ही पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में लाखों टन पराली (धान का पुआल, जड़ें) जला दी जाती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, इस मौसम में अब तक पराली जलाने की पंजाब में 700 और हरियाणा में 900 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। नासा के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में फसल अवशेष जलाने के कारण धुएं और धुंध का गुबार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा तक फैल रहा है।
धान की पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए कई उपाय किये जा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े स्टार्टअप 'क्रिया लैब्स' ने अब फसल अपशिष्टों से ईको-फ्रेंडली कप और प्लेट जैसे उत्पाद बनाने की पद्धति विकसित की है। अपनी नयी विकसित प्रक्रिया का उपयोग करके तीनों छात्रों ने धान के पुआल को कप और प्लेट के निर्माण के लिए एक इकाई स्थापित की है, जो आमतौर पर प्रचलित प्लास्टिक प्लेटों का विकल्प बन सकती है।
धान के पुआल में 10 प्रतिशत तक सिलिका होती है, जिसकी वजह से अधिकतर औद्योगिक प्रक्रियाओं में इसका उपयोग करना मुश्किल होता है। शोधकर्ताओं ने एक विलायक-आधारित प्रक्रिया विकसित की है, जिसकी मदद से सिलिका कणों के बावजूद फसल अवशेषों को औद्योगिक उपयोग के अनुकूल बनाया जा सकता है। फिलहाल, 'क्रिया लैब्स' के संस्थापक-निर्माता छात्र धान के पुआल से बनी लुगदी से टेबलवेयर बना रहे हैं। उनका कहना है कि अब वे इससे जुड़ा पायलट प्लांट स्थापित करना चाहते हैं, जिसकी मदद से प्रतिदिन तीन टन फसल अवशेषों का प्रसंस्करण करके दो टन लुगदी बनायी जा सकेगी। इस तरह के प्लांट उन सभी क्षेत्रों में लगाए जा सकते हैं, जहां फसल अवशेष उपलब्ध हैं। 'क्रिया लैब्स' को अगर रणनीतिक पार्टनर और निवेशक मिलते हैं तो बाजार की मांग के अनुसार वह उत्पादन इकाइयों में परिवर्तन करके उसे फाइबर और बायो-एथेनॉल जैसे उत्पाद बनाने के लिए भी अनुकूलित कर सकते हैं।
दिल्ली में हवा के प्रदूषण से निपटने के लिए इमरजेंसी एक्शन प्लान लागू हो गया है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए गत सोमवार से इमरजेंसी प्लान लागू किया है। इस बीच नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने कुछ सेटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं, जिससे यह साबित हो रहा है कि पिछले साल की तुलना में इस साल पराली जलाने का स्तर घटा है। नासा की उपग्रह तस्वीरों से पता चलता है कि पंजाब और हरियाणा में किसानों ने इस महीने के शुरू में पराली जलाना शुरू किया है। नासा ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि पंजाब और हरियाणा में पिछले 10 दिनों में, खासकर अमृतसर, अंबाला, करनाल, सिरसा और हिसार समेत इनके आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाए जाने का स्तर बढ़ा है।
यद्यपि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(एनजीटी) पहले ही पंजाब के साथ ही हरियाणा व उत्तर प्रदेश में इस पर रोक लगाने का आदेश दे चुका है, राजधानी दिल्ली में पराली से उत्पन्न प्रदूषण के चलते हवा की क्वालिटी लगातार खराब हो रही है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कल ही इस मुद्दे पर पंजाब, हरियाणा और केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यह समझ से परे है कि पूरे एक साल तक केंद्र, पंजाब और हरियाणा की सरकारों की तरफ से आश्वासन के बावजूद पराली समस्या की रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पराली न जलाने की एवज में किसानों को सौ रुपये प्रति क्विंटल मुआवजा देने की मांग की है। केंद्रीय वित्त आयोग के मुताबिक, सिर्फ पराली से नहीं, बल्कि उद्योग-धंधों, निर्माण कार्यों, वाहनों से भी प्रदूषण फैल रहा है। किसानों के खेत में फसली अवशेष के निस्तारण के लिए वित्त आयोग हरियाणा व पंजाब को आर्थिक मदद की पेशकश कर सकता है। पंजाब और हरियाणा के गांवों में पराली जलाए जाने के बाद जहां पिछले साल राजधानी दिल्ली पर स्मॉग का अंधेरा छाया रहा था, वहीं इस बार भी पराली जलाने के चलते प्रशासन अलर्ट है। लोगों के जेहन में यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या फिर से वायु प्रदूषण का मुख्य कारण हरियाणा में जलाई जाने वाली पराली है।
गौरतलब है कि नासा द्वारा उतारी गई तस्वीरों के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा में किसानों ने इस महीने की शुरुआत में पराली जलाना शुरू कर दिया था। पराली की वजह से बढ़ते प्रदूषण की समस्या को देखते हुए हरियाणा जिले के करनाल में उपायुक्त डॉक्टर आदित्य दहिया ने चेतावनी जारी कर दी है कि किसान खेतों में पराली न जलाएं। नाभा (पंजाब) के गांव कलार माजरा नाम के किसान बीर दलविंदर सिंह पराली न जलाने की सरकार की अपील को अपने पड़ोसियों और गांववालों तक पहुंचा रहे हैं। नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भी गांव के इस पर्यावरण सहयोगी कदम की तारीफ की है। अब गांव के करीब 70 प्रतिशत लोगों ने पराली न जलाने का फैसला किया है। गांव ने इससे निपटने का एक सरल और कारगर तरीका अपनाया है। खेत जोतकर पराली को मिट्टी में दबा देते हैं।
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मिले ना फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली।

किसी तरह से बसर हमने जिंदगी कर ली।
नजर मिली भी न थी और उनको देख लिया।
जुबां खुली भी ना थी और बात भी कर ली।
मिले ना फूल तो...
अब आगे जो भी हो अंजाम देखा जाएगा।
खुदा तराश लिया और बंदगी कर ली।
मिले ना फूल तो...
वो जिनको प्यार है चांदी से इश्क सोने से।
वही कहेंगे कभी हमने खुदकुशी कर ली।
मिले ना फूल तो..
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सबरीमाला के मुसलिम कलेक्टर ने बढ़ाई सांप्रदायिकता

वही आईजी ने मांगी भगवान अयप्पा से माफ़ी!

सबरीमाला के कलक्टर मोहम्मद नूह ने सीपीएम के कुछ नेताओं तथा कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए षड्यंत्रके तहत उन्होंने पोर्न एक्ट रेहाना फातिमा को आमंत्रित किया था। ताकि सबरीमाला को अपमानित करने के साथ हिंदुओं को उकसाया जा सके। समानता तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के नाम पर केरल की वामपंथी सरकार प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने का खेल खेल रही है। प्रदेश के आईजी पर दो एक्टिविस्ट महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिलाने का दबाव डालती है।

मुख्यमंत्री विजयन ने कलक्टर मोहम्मद नूह के साथ मिलकर केरल के आईजी श्रीजीत पर दो एक्टिविस्ट महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिलाने का दबाव डाला यह खुलासा स्वंय आईजी श्रीजीत ने किया है। भगवान श्री अयप्पा के सामने श्रीजीत का धैर्य, आंसू में बदलकर बह निकले उससे समझा जा सकता है कि उनपर केरल सरकार का कितना दबाव रहा होगा।

तभी तो आम नागरिकों ने कलेक्टर मोहम्मद नूह को तत्काल हटाने की मांग की है। उनकी मंशा सबरीमाला मंदिर के निरादर करने के साथ ही हिंदुओं को उकसाने की है ताकि सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाया जा सके।

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इस्लामिक आतंकी दल लश्कर के पैसे से हरियाणा के पलवल में मस्जिद बनाने के मामले का खुलासा होने के बाद सुरक्षा एजेन्सियों के कान खड़े हो गए हैं. सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि देश के और भी कई हिस्सों में इसी तर्ज पर आतंकवादी संगठनों के पैसे का इस्तेमाल करके स्थानीय नेटवर्क खड़ा किया जा रहा है. पलवल की मस्जिद में हाफिज सईद से मिले पैसे का खुलासा करने के बाद एनआईए अपनी जांच का दायरा बढ़ाने पर विचार कर रही है.


एनआईए के सूत्रों के मुताबिक आतंकी फंड से मस्जिद बनाने की मामला मात्र हरियाणा के पलवल तक ही सीमित नहीं है. एजेन्सी की जांच के दायरे में अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिले भी आ गए हैं क्योंकि यहां आतंकी फंडिंग को लेकर पहले भी गिरफ्तारियां की जा चुकी हैं. अब वह लोग पैसे के जरिए देश के अंदर ही आतंकी नेटवर्क खड़ा करने की फिराक में हैं. इसके लिए हवाला के जरिए पैसा देश में लाया जा रहा है और उससे आलीशान इमारतें खड़ी की जा रही हैं.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस साल दूसरा सम्मान मिला, अक्टूबर में यूएन का चैम्पियन ऑफ द अर्थ अवॉर्ड मिला था भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि में योगदान के लिए सोल शांति पुरस्कार 2018 के लिए चुना गया है।प्रधानमंत्री इस प्रतिष्ठित सम्मान को हासिल करने वाली दुनिया की 14वीं हस्ती बन गए

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चाणक्य ने कहा है :- यदि आप बंदर के सामने केले और बहुत सारे पैसे रखेंगे तो बंदर केले उठाएगा पैसे नहीं क्योकि वह नहीं जानता है की पैसों से बहुत सारे केले खरीदे जा सकते है ।


ठीक उसी प्रकार आज यदि वास्तविकता में भारत की जनता को निजी हित निजी स्वार्थ पूरे करने और राष्ट्रीय सुरक्षा में से किसी एक का विकल्प चयन करने का कहें तो वो निजी स्वार्थ ही चयन करेंगे। क्योकी वो नहीं समझ पा रहे हैं की राष्ट्र सुरक्षित नहीं रहा तो फिर निजी हितों की गठरी बाँध के कहाँ ले जाओगे।


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सीबीआई में विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के पक्ष मे़ पाकिस्तान से चल रहा है ट्वीटर अभियान! अहमद पटेल, मोइन कुरैशी और ISI एजेंट दानिश शाह शक के घेरे में!

निदेशक बनाए जाने के पहले से ही राकेश अस्थाना जांच के घेरे में हैं, लेकिन जिस प्रकार उनकी नियुक्ति के बाद से सीबीआई की शाख पर बट्टा लगना शुरू हुआ है उससे किसी बड़े षड्यंत्र की आशंका थी। अस्थाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की खबर बाहर आते ही उनके समर्थन में पाकिस्तान से लेकर पोर्न स्टारों के ट्वीट का अंबार लग गया।


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वेटिकन देश के महाराज पोप फ्रांसिस ने अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन DC के आर्चबिशप डोनाल्ड वुर्ल का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया। डोनाल्ड पर आरोप था कि वे जब पेनसिलवानिया के बिशप थे, तब उन्होंने बच्चों पर कामासक्त रहने वाले पादरियों से निपटने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं की थी।डोनाल्ड ने अपने बिशपिया कार्यकाल में यौन उत्पीड़न के ढेरों काण्ड सामने आने पर त्यागपत्र देने की इच्छा प्रकट की थी। पोपराज ने डोनाल्ड की ‘नेकनीयती’ की प्रशंसा करते हुए उनका इस्तीफा लिया। अमेरिकी जूरी की रिपोर्ट में रहस्योद्घाटन हुआ था कि पेनसिलवानिया कैथोलिक चर्च ने चर्चों में हजारों बच्चों के साथ कामुकुकर्मों को बरसों छिपाए रखा।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों पाकिस्तान की सेना और वहां की सरकार के हाथों की कठपुतली बन गए हैं। पाकिस्तान की शह पर राहुल गांधी मोदी सरकार को बदनाम करने का कोई मौका नहीं चूकते हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि मोदी सरकार के खिलाफ राहुल गांधी कुछ भी बोलते हैं तो पाकिस्तान में उसका भरपूर समर्थन किया जाता है। ताजा वाकया राहुल गांधी के एक ट्वीट से जुड़ा हुआ है। राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे सीबीआई चीफ को हटाए जाने को लेकर, जो ट्वीट किया है, उसे राहुल के पाकिस्तानी आकाओं ने हाथों-हाथ लिया है। राहुल के इस ट्वीट को पाकिस्तानी सेना के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से रीट्वीट किया गया है। इतना ही नहीं पाक आर्मी चीफ और पाक सरकार के तमाम मंत्रियों ने भी इसे रीट्वीट किया है।

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पुलिस और अदालत के आगे अड़े रहे केरल के हिन्दू.. सबरीमाला मंदिर के पट हुए बंद लेकिन एक भी महिला पूरी नहीं कर सकी अपनी जिद
























Wednesday, 10 October 2018



आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी द्वारा कही गई कुछ बड़ी और महत्वपूर्ण बातें"


🙌 सबरीमाला मुद्दे पर


📌 यह परंपरा बहुत पुरानी है और लोग इसका अनुसरण कर रहे थे. जो लोग इसके खिलाफ याचिका दायर करते हैं वे मंदिर नहीं जाएंगे. महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इस आस्था का पालन करता है. उनकी भावनाओं पर विचार नहीं किया गया.
📌 स्त्री पुरुष समानता अच्छी बात है, लेकिन इतने सालों से चली आ रही परंपरा और उसका पालन करने वालों लोगों की भावना का सम्मान नहीं किया गया, उनकी नहीं सुनी गई.
📌 धर्म के मामलों में संबंधित धर्म के धर्माचार्यों से बातचीत करना आवश्यक होता है सबको साथ लेकर भी धीरे धीरे बदलाव किया जा सकता है.
📌 हमारी सांस्कृतिक जागरण की परंपरा हमारे देश में लगातार चल रही है राजनीति को लेकर हमारे देश में अभिनव प्रयोग हुए.
📌 अपने देश की भाषा, भ्रमण और भोजन में संस्कार देखने की जिम्मेदारी हमारी है.


🙌 राम मंदिर मुद्दे पर


📌 बाबर नाम की एक बर्बर आंधी ने हमारे समाज पर अत्याचार किया.

📌 राम जन्माभूमि की जगह अभी तक आवंटित नहीं की गई है, हालांकि सबूतों ने पुष्टि की है कि उस जगह एक मंदिर था.

📌 अगर राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता तो मंदिर बहुत पहले बनाया गया होता.

📌 हम चाहते हैं कि सरकार कानून के माध्यम से निर्माण के लिए रास्ता साफ करे.

📌 राम मंदिर हिन्दू-मुसलमान का मसला नहीं है. यह भारत का प्रतीक है और जिस भी रास्ते से मंदिर निर्माण संभव है, मंदिर का निर्माण होना चाहिए.

📌 कुछ लोग राजनीति की वजह से जानबूझकर राम मंदिर मामले को आगे खींचते जा रहे हैं.

📌 रामजन्मभूमि पर जल्द से जल्द राम मंदिर बनना चाहिए. सरकार को कानून बनाकर मंदिर निर्माण करना चाहिए.

📌 राम मंदिर का बनना गौरव की दृष्टि से आवश्यक है, मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा.


🙌 चुनाव में मतदान/NOTA के मुद्दे पर


📌 चुनाव में मतदान न करना अथवा NOTA के अधिकार का उपयोग करना, मतदाता की दृष्टि में जो सबसे अयोग्य उम्मीदवार है उसी के पक्ष में जाता है, इसलिए राष्ट्रहित सर्वोपरि रखकर 100 प्रतिशत मतदान आवश्यक है.

📌 मतदान लोगों का अधिकार है, वे इसके प्रयोग के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन #NOTA का प्रयोग बुद्धिमानी नहीं है.


🙌 देश की सुरक्षा के मुद्दे पर


📌 हम दुनिया में किसी से शत्रुता नहीं करते लेकिन हमसे शत्रुता करने वाले कई लोग हैं, हमें उनसे सतर्क रहने की जरूरत है.

📌 कोई हमसे लड़ाई करने की हिम्मत ना करे हम इतने बलवान बनेंगे तो दुनिया में भी शांति होगी और हमारे यहां भी.

📌 ऐसे लोगों से बचने का एक ही तरीका है कि हम इतना बलवान बने कि किसी की आक्रमण करने की हिम्मत ही न पड़े.

📌 हमारी सुरक्षा के लिए जो सीमा पर बंदूक ताने खड़े हैं उनके परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी और हमारे समाज की है.

📌 सुरक्षा के क्षेत्र में हमें स्वावलंबी होने की आवश्यकता है, सीमा की लड़ाई अंदर की सुरक्षा पर निर्भर करती है.

📌 पड़ोस में सरकार बदल गई लेकिन उनकी नीयत नहीं बदली है.

📌 सेना तथा रक्षक बलों का नीति धैर्य बढ़ाना, उनको साधन-सम्पन्न बनाना, नई तकनीक उपलब्ध कराना आदि बातों का प्रारम्भ होकर उनकी गति बढ़ रही है, दुनिया के देशों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने का यह भी एक कारण है.

📌 हमारे देश को तोड़ने वाली शक्तियों को पाकिस्तान और इटली से समर्थन मिलता है.


🙌 शहरी नक्सलवादियों/माओवादियों के मुद्दे पर


📌 कुछ लोग हैं जो भारत के टुकड़े होने की बात करते हैं, संविधान को नहीं मानना चाहते, जो आतंकवादियों से संबंध रखते हैं.

📌 माओवाद हमेशा अर्बन ही रहा है, ये लोग समाज के उपेक्षित तबके का लाभ उठाते हैं, अभावग्रस्त छात्रों को भड़काते हैं.

📌 नए लोग जो उनके इशारे पर काम करें उन्हें स्थापित करने की कोशिश करते हैं ये अर्बन माओवादी.

📌 अर्बन नक्सल राष्ट्रविरोधी आन्दोलनों में अग्रपंक्ति में दिखाई देते हैं.


🙌 अन्य मुद्दों पर


📌 प्रबोधन से मन परिवर्तन करना होगा फिर समाज परिवर्तन स्वीकार कर लेता है.

📌 अगर हमारा सांस्कृतिक जागरण होता रहा तो निश्चित तौर पर भारत विश्वगुरू बनेगा.

📌 हमें बहुत ज्यादा चिंतित रहना पड़े ऐसी स्थिति आज भी नहीं है, लेकिन हमें सतर्क और सजग रहने की जरूरत है.

📌 समय पर न मिलने वाली मदद फिर मदद नहीं रह जाती, अनुसूचित जातियों के लिए योजनाएं तो बनती हैं लेकिन हर जगह समय पर लागू नहीं हो पाती.

📌 सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा सरकार ने वह नहीं किया इससे ही विभेद हो जाता है इसे समाज ठीक कर सकता है, अन्याय की प्रतिक्रिया में हम दूसरा अन्याय ना करें.

📌 समाज में सब कमियों को दूर कर उसके शिकार हुए समाज के अपने बंधुओं को स्नेह व सम्मान से गले लगाकर समाज में सद्भावपूर्ण व आत्मीय व्यवहार का प्रचलन बढ़ाना पड़ेगा.

📌 भारत में होने वाली आंतरिक हिंसा हमारे देश के लिए ठीक नहीं है, हमें इस पर काम करने की जरूरत है.

📌 नैतिक बल के आधार पर बोस जैसे महानुभाव ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की और स्वतंत्र भारत की पहली सरकार विदेश में बनाई, उसे भी 150 साल हुए हैं.


#RssIdeology

गुजरात में 'कांग्रेस कार्यकर्ता भड़का रहे हिंसा - सीएम विजय रूपाणी


गुजरात में बच्ची से रेप की घटना के बाद से यूपी-बिहार के लोगों पर हमले हो रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर गुजरात में बंद पड़े कारखानों और बेरोजगारी को हिंसा की वजह बताया. राज्य के सीएम विजय रूपाणी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.

रूपाणी ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए. उन्होंने kha, 'कांग्रेस पहले हिंसा भड़काती है. कांग्रेस पार्टी हिंसा के खिलाफ टिप्पणी करते हैं. कांग्रेस पार्टी को क्या कोई शर्म नहीं है?'

गुजरात में #उतर_भारतीयों के साथ हो रहा है...वो मैडम की पार्टी के कमीनेपन का ठेका लेने वाली कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ बनाई गई रणनीति तहत हो रहा है.....!!

यह सब दिल्ली वाले 10 लथपथ के आर्डर पर हो रहा है...ऐसा करने की जिम्मेदारी गुजरात में 5 लोग़ को दी गई है....

1-अमित चावडा-गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष,2-परेश धनाणी-गुजरात विपक्ष का नेता,3-हार्दिक पटेल-कांग्रेसियो का करीबी,4 -अल्पेश ठाकोर-काग्रेसी MLA राधनपुर,5-जिग्नेश मेवाणी-कांग्रेस के समर्थन से विधायक हैं.. इस साजिश मे और भी कई बड़े अजगर शामिल हैं..

अभी और नंगी होगी यह पार्टी...

.यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष तौफीक_आलम को गुजरात पुलिस ने बड़ौदा से गिरफ्तार किया है। तौफ़ीक़_आलम_ गैर गुजरातियों को मारकर गुजरात से बाहर खदेड़ देने के ज़हरीले मैसेज लोगों को भेजकर अपना बिहारी_भगाओ अभियान सोशल मीडिया में वॉट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर लगातार चला रहा था। ठाकोर सेना के उत्तर भारतीय विरोधी सारे भड़काऊ संदेशों को भी _तौफ़ीक़_आलम बहुत बड़े पैमाने पर लोगों के पास भेज रहा था। गुजरात पुलिस उस पर दो दिनों से नज़र रखे हुए थी। आज उसके खिलाफ बहुत पुख्ता सबूतों को इकट्ठा करने के बाद पुलिस ने तौफ़ीक़_आलम_ को संगीन धाराओं में गिरफ्तार कर लिया है।

गुजरातियों के पक्ष और उत्तर भारतीयों के खिलाफ इस मुसलमान_कांग्रेसी_नेता का खून क्यों खौल रहा था.? इसका जवाब स्वयं से पूछिए, उत्तर तत्काल मिल जाएगा।


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....................... कुल मिला कर मोदी को किसी तरह बदनाम करो और 2019 का चुनाव शुरू होने से पहले पूरे देश में अफरा तफरी का माहौल बना कर अपने कुटिल सत्ता लक्ष्य को कपट से हासिल किया जाय..


........................ प्रदूषण मुक्त दिवाली, होली,दुर्गापूजा,गणेश चतुर्थी करते-करते

कहीं त्योहार मुक्त हिंदू और हिंदू मुक्त हिंदुस्तान ना बन जाए।


............vyang................शादी अपने से बड़ी उम्र की लड़की से कीजिये,ताकि जब जब वो डांटे,तो दिल को तसल्ली दे सको,चलता है बड़ी है तो डाँटेगी ही...


........मूर्ख सेकुलर हिंदुओं...कब्र मजार दरगाह में सिजदा करने से मन्नत पूरी होती तो मोदी कभी PM नही बन पाते..


.......................mediya......चर्च_के_पाप........एक ईसाई महिला अमेरिका से भारत आकर चर्च के कुकृत्यों से सारा ध्यान मोड़कर Me_Tooकी तरफ लगा दिया ...वेटिकन एजेंट तनु श्री दत्ता.....वो तुम्हे Me_Too के लिए उकसायेंगे तुम बच्चा चोर गिरोह और फादर द्वारा बलात्कार पर अड़े रहना ...Me_too ki आड़ में क्रिस्चन फादरों द्वारा किये गए बलात्कार के कु-कृत्य छिपाये जा रहे हैं ...तनुश्री दत्ता मतांतरित ईसाई है....ये कैसा संयोग है की Me_Tooके शिकार सभी कलाकार हिन्दू और राष्ट्रवादी सोच के रहे हैं ?ये एक सुनियोजित षड्यंत्र है..//..........वो तुम्हे Me_Too बताएँगे लेकिन तुम सबरीमाला और राम मंदिर पर अड़े रहनाहालीवुड और विदेशों का चलन #meetoo का भसड़ अब भारत भी आ गया ..लेकिन निशाने पर कौन है ये सोचिये....


एमजे अकबर 13 सालो तक नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के सबसे बड़े आलोचक थे ।। मोदी के खिलाफ खूब जहर उगलते थे । तब उन पर किसी भी महिला ने कोई आरोप नही लगाया .. लेकिन जैसे ही वो मोटा भाई के आबे जमजम से पवित्र हो गए और केंद्रीय मंत्री बन गए तो अब चुनावी वर्ष में 5 महिला पत्रकार उनके ऊपर आरोप लगा रही हैं कि उन्होंने कई बार उन्हें गलत तरीके से छुआ था


मतलब जब इन महिलाओं को छुआ था तब उन्हें नहीं पता चला कि उन्हें सही तरीके से छुआ जा रहा है कि गलत तरीके से लेकिन 20 साल 25 साल बाद अचानक इन महिलाओं को याद आने लगा फलाने ने उन्हें गलत तरीके से छुआ था


अब नाना पाटेकर और विवेक अग्निहोत्री जैसे लोगों को देख लीजिए यह लोग ट्विटर पर और दूसरे माध्यमों में वामपंथियों को जमकर लतियाते हैं उनके खिलाफ अचानक दो तीन महिलाएं सामने आती हैं और कहती है 25 साल पहले मेरे साथ ही उन्होंने गलत व्यवहार किया था


यह एक नया ट्रेंड जो बेहद खतरनाक है अब 20 साल पहले या 25 साल पहले ना तो कोई सुबूत बचा होगा ना ही कोई ऐसा गवाह बचा बचा होगा फिर अब आरोप लगाकर वह भी ट्विटर पर या फेसबुक पर वह महिला क्या हासिल करना चाहती है


एक और ट्रेंड मैंने देखा है कि ज्यादातर वही महिलाएं आरोप लगा रही है या तो जिनका घर टूट चुका है या जो वक्त की मार से बेहद मोटी और कुरूप हो चुकी है और ऐसे पुरुषों पर आरोप लगा रही हैं जो अब शांत सुखी दांपत्य जीवन बिता रहे हैं

पुरुषों के लिए #YouTo #WeTo जैसी केम्पेन चलानी चाहिए , माचिस की तीली बगैर माचिस के मसाला लगे सिरे पर रगड़ें नही जलती ?

इन्हें तीन चार शादी किये आमिर ,शाहरुख , जावेद भी नही दिखेंगे ,या 300 के साथ सोने की घोषणा करने वाले संजय दत्त या महेश भट्ट या कोई और

#मीटू #यूटू #वीटू #WeTo #YouTo


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.......... जिस कांग्रेस से चीन पाकिस्तान और लश्कर- ए-तैयबा खुश हो, वो मेरे देश के लिए कैसे अच्छी हो सकती है?


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जूलिया रोबर्ट्स के बाद एक और हॉलीवुड मेगास्टार विल स्मिथ, पूरी विधि से की भगवान् शिव की पूजा, गंगा आरती, बढ़ रहा सनातनहालीवुड मेगास्टार विल स्मिथ ने किया रुद्राभिषेक,

यूरोप में भी कई चर्च मंदिर बन गए हैं,

धीरे धीरे विदेशी भी अपने मूल धर्म सनातन धर्म

में घरवापसी क्र रहर हैं..







अमेरिका की प्रतिबंध लगाने की धमकी के बावजूद भारत और रूस के बीच 40 हजार करोड़ के एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम का समझौता हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत भारत को रूस से सतह से हवा में मार करने वाली आधुनिक ट्रायम्फ मिसाइल स्क्वॉड्रन 2020 में मिलेगी। दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष में सहयोग को लेकर भी करार हुआ। इसके तहत भारत का एक मॉनिटरिंग स्टेशन रूस के साइबेरिया स्थित नोवोसिबिर्स्क में स्थापित किया जाएगा। इससे पहले रूस ने सिर्फ चीन को ये डिफेंस सिस्टम दिया है। वहीं तुर्की के साथ भी उसका करार हो चुका है।




गगनयान अभियान में हमारा सहयोग करेगा रूस- मोदी

पीएम मोदी ने कहा- 'भारत और रूस के बीच सहयोग का विस्तार अतीत के दायरों के पार ले जाएगा। भारत की विकास यात्रा में रूस हमेशा साथ रहा है। हमारा अंतरिक्ष में अगला लक्ष्य गगनयान में भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजना है। रूस ने पूरे सहयोग का आश्वासन दिया है। भारत और रूस के प्रतिभा संपन्न बच्चे अपने इनोवेटिव आइडिया बताएंगे। हमने ऐसे प्रयासों पर विचार किया है, जिससे लोगों के बीच संबंध मजबूत हों। मैं विश्वास से कह सकता हूं की भारत और रूस की दोस्ती अनूठी है। इस रिश्ते के लिए पुतिन की प्रतिबंद्धता से ये दोस्ती और मजबूत होगी। हम नई बुलंदियों पर पहुंचेंगे।'




पुतिन ने मोदी को दिया रूस आने का न्योता

पुतिन ने कहा- दोनों देश दोस्ती के अटूट धागे से जुड़े हैं। भारत ने हमेशा रूस के साथ अपने रिश्तों को प्राथमिकता दी है। मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मैं मोदी को अगले व्लादिवोस्तोक फोरम में एक बार फिर मुख्य अतिथि के तौर पर न्योता दे रहा हूं।




डील अमेरिकी कानून का उल्लंघन

ये डील काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए) का उल्लंघन मानी जाएगी। इसके तहत अमेरिकी संसद (कांग्रेस) ने रूस से हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। हालांकि, कुछ अमेरिकी सांसदों का कहना है कि इस मामले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से विशेष छूट मिल सकती है।







सीरिया में तैनात है एस-400

एस-400 मिसाइल सिस्टम, एस-300 का अपडेटेड वर्जन है। जमीन से हवा में मार करने वाला यह सिस्टम दुश्मन देशों के लड़ाकू जहाजों, मिसाइलों और ड्रोन को पलक झपकते ही खत्म कर देगा। रूस ने इस सिस्टम को सीरिया में तैनात कर रखा है। एयर डिफेंस सिस्टम मिसाइलों और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को भी 400 किलोमीटर के दायरे में आते ही खत्म कर देगा।







डिफेंस सिस्टम एक तरह से मिसाइल शील्ड का काम करेगा। यह पाकिस्तान और चीन की एटमी क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से भारत को सुरक्षा देगा। यह सिस्टम अमेरिका के सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट एफ-35 को भी गिरा सकता है। यह सिस्टम 36 परमाणु क्षमता वाली मिसाइलों को एकसाथ नष्ट कर सकता है। अगर सौदा होता है तो चीन के बाद इस सिस्टम को खरीदने वाला भारत दूसरा देश होगा।

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राफेल पे कोंग्रेसियों के "तथ्य" को नीचे दिए गए प्रश्नो के आधार पे जांचिए.


1. क्या प्रधानमंत्री मोदी ने दास्सो से अनुबंध किया?


उत्तर: नहीं. कॉन्ट्रैक्ट फ्रेंच राष्ट्रपति के साथ साइन हुआ था और भारत का पैसा फ्रांस के सरकारी खजाने में गया था.


2. क्या ऑफसेट क्लॉज़ में केवल रिलायंस को कॉन्ट्रैक्ट मिला?

उत्तर: नहीं.


3. अगर कांग्रेस का आरोप सही है, तो क्या प्रधानमंत्री मोदी ने बाकी की 71 ऑफसेट कंपनियों - जिनमे एल एंड टी, महिंद्रा समूह, रिलायंस, कल्याणी समूह, गोदरेज एंड बॉयस, टाटा समूह सम्मिलित है - के लिए भी पैरवी की?

उत्तर: नहीं.


4. फिर इन निजी कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट कैसे मिल गया?


उत्तर: शहज़ादे से पूछिए.


5. क्या एल एंड टी, महिंद्रा समूह, कल्याणी समूह, गोदरेज एंड बॉयस, टाटा समूह को डिफेन्स क्षेत्र में कार्य का अनुभव है?


उत्तर: नहीं.


6. क्या DRDO - जो एक सरकारी उपक्रम है - को कॉन्ट्रैक्ट मिला?


उत्तर: हाँ. ऑफसेट की एक तिहाई रकम.


7. रिलायंस को अमेरिका से उनकी नौ सेना के जहाजों की मेंटेनेंस के लिए 15000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मिला. क्या यह कॉन्ट्रैक्ट भी प्रधानमंत्री मोदी की पैरवी से मिला?


उत्तर: नहीं.


8. क्या प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के पहले रिलायंस के मालिक सड़क पे चाट बेचते थे?


उत्तर: नहीं.


9. राडिया टेप में मुकेश अम्बानी किस सरकार के लिए कह रहे थे कि वह सरकार उनकी जेब में है?


उत्तर: सोनिया सरकार.


अमित सिंघल जी की पोस्ट


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"एनएसजी को मिला कमीकाजी ड्रोन"




आतंकियों के खिलाफ आपरेशंस को धार देने के लिए नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के ब्लैक कैट कमांडो को अब ‘कमीकाजी’ ड्रोन्स का भी साथ मिलेगा. ये ड्रोन स्वदेशी तकनीक से विकसित किए गए हैं, एनएसजी के 34वें स्थापना दिवस पर कमीकाजी ड्रोन का लाइव डेमो के साथ अनावरण किया गया.

भारत में निर्मित कमीकाजी ड्रोन रिमोट से संचालित मानव रहित एरियल व्हीकल (यूएवी) है, इसका उद्देश्य ब्लैक कैट्स को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करना है, जुड़वा कमीकाजी ड्रोन गेमचेंजर बन सकता है,

भारतीय कंपनी वोर्टेक्स यूएएस की ओर से बनाए गए कमीकाजी में दो ड्रोन्स के सेट का इस्तेमाल किया जाता है. पहला ड्रोन विस्फोटक से लक्षित इमारत की खिड़की को तोड़ता है. दूसरा सुसाइड ड्रोन डेटोनेटर ले जाता है, जो सीधा आतंकी के सिर पर जाकर फट सकता है.

दोनों ड्रोन में एक मुलभुत अंतर है, ब्लैक हार्नेट आपके फोन के वजन के बराबर का है जिसके जरिये मुठभेड़ स्थल का लाईव टेलीकास्ट तथा जासूसी आतंकियों के ठिकाने की सटीक लोकेशन के जरिये जीपीएस आधारित हथियारों का उपयोग संभव है, तथा दुसरे कामिकाजी ड्रोन हमला करने वाले ड्रोन है.

सुसाइड ड्रोन खुद फट सकता है या बचे भी रह सकता है, जिससे कि जरूरत के हिसाब से उसका दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सके. एनएसजी के महानिदेशक सुदीप लखटकिया ने बताया कि हमने सशस्त्र ड्रोन को अपनी तकनीक को उन्नत बनाने के हिस्से के तौर पर साथ जोड़ा है.




Tuesday, 9 October 2018

सुलेमान के घर से हथियारों का जखीरा जप्त, 5 गिरफ्तार – रातों रात शहरों पर कब्जे की तैयारी-- 09/10/2018
आप शायद इन घटनाओं को छोटा मानकर ले रहे है, आपको बता दें की फिलीपींस में लोग सोये अगली सुबह उठे तो कईयों को मार दिया गया और शहर पर ISIS कब्ज़ा हो गया, क्यूंकि उनके पास हथियार थे
सेना को लगाना पड़ा कई दिन लगे पर ISIS ने फिलिपींस के शहर को कब्जाकर लोगों को बंधक बनाया कईयों को मारा, आतंकवाद का पूरा नंगा नाच किया, ऐसा ही सीरिया और इराक में किया गया
आप रात को सोयेंगे, कल उठेंगे तो शायद आप बंधक होंगे या आप सुनेंगे की आपके शहर को कब्जे में ले लिया गया है, पुलिस वालो को मार कर शहर पर कब्ज़ा हो चूका है, और हजारों को बंधक बनाया जा चूका है, और सेना और आतंकियों में संघर्षं चल रहा है
भारत में इसी काम की तैयारी चल रही है, कहीं से AK-47 का जखीरा, तो कहीं से सेना भी न टिके ऐसा केमिकल हथियार, तो कहीं पर बम की फैक्ट्री तो कहीं पर यूरेनियम भी मिल रहा है
अब मेरठ में पुलिस को कुछ ऐसा मिला है जिसने पुलिस को भी सक्ते में डाल दिया, दिल्ली की स्पेशल सेल ने सोमवार रात सटीक जानकारी पर मेरठ के लिसाड़ी गेट में छापा मारा, यहाँ सुलेमान नामक व्यक्ति के घर से हथियारों का जखीरा पकड़ा गया है, बताया जा रहा है की 84 पिस्टल तो बने हुए रेडी हालात में जप्त किये गए है, इसके साथ साथ सैंकड़ो पिस्टल बनाने का समान जप्त किया गया है
ये तो हथियार फैक्ट्री थी जो सुलेमान के घर के बेस मेंट में चल रही थी यहाँ से हथियार बनकर अलग अलग जगह सप्लाई होना था, इस मामले में 5 को गिरफ्तार किया गया है, सब एक ही समुदाय के है
ANI
@ANI
Delhi Police Special Cell has busted a manufacturing unit of illegal arms in Meerut and recovered raw materials. 5 persons arrested, 84 pistols recovered.
7:56 AM - Oct 9, 2018
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Suleman Meerut Arms Factory : इसके अलावा मेरठ के ही बुधना में भी छापेमारी की खबर है जहाँ से 2 को गिरफ्तार किया गया है जिनके नाम – उम्मीद अहमद और मंसूर अहमद है, इनके यहाँ भी हथियार की फैक्ट्री चल रही थी, दोनों सगे भाई है, इसके अलावा एक शख्स जिसका नाम इंतज़ार खान है वो फरार बताया जा रहा है
तैयारी पूरी चल रही है, किसी दिन किसी शहर, या कुछ शहरों पर हमला कर पुलिस वालो को कण्ट्रोल कर शहर के लोगों को बंधक बनाकर ISIS का खेल करने की, गजवा हिन्द की ये ही मानसिकता है
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दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हथियारों का ऐसा जखीरा बरामद किया है, जिसे देख लगता है कि भारत में भी जिहाद की बड़े पैमाने पर तैयारियां की जा रही हैं.
बिहार से तो ऑटोमैटिक राइफलें पकड़ी जा ही रही हैं, बंगाल में देसी बम बनाने के कारखाने घर-घर में चल रहे हैं, यूपी के मैनपुरी में भी मोर्टार बरामद हुआ है. अब खबर है कि जिहादियों का अड्डा बन चुके मेरठ में अवैध हथियारों की एक बड़ी फैक्ट्री का पर्दाफ़ाश हुआ है. फैक्ट्री में काम करने वाले मोहम्मद शब्बीर, मोहम्मद इंतियाज़, मोहम्द ओबैतद, मोहम्मद शैदुल्ला ओर नसीम को गिरफ्तार किया है. पांचों आरोपियों में से तीन मुंगेर के हथियार बनाने वाले कारीगर हैं.. आरोपियों के कब्ज़े से करीब 84 घातक हथियार और बड़ी मात्रा में हथियार बनाने वाला रॉ मैटेरियल और असलाह और औजार बरामद किया है. पुलिस अब इनके नेटवर्क से जुड़े अन्य बदमाशो की तलाश में छापेमारी कर रही है.इस फैक्टरी को चलाने वाला सरगना सैदुल्लाह को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है. इसकी कई दिनों से दिल्ली पुलिस को तलाश थी.
कैसे हुआ इस फैक्ट्री का पर्दाफाश
कुछ समय पहले दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने हथियार सप्लाई करने वाले कुछ तस्करों को दबोचा था. आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि ये अवैध हथियार और कारतूस मेरठ और मुंगेर से लाकर सप्लाई किये जा रहे है.दिल्ली पुलिस दानिश नाम के आरोपी को साथ लेकर मेरठ के थाना लिसाड़ी गेट क्षेत्र के लक्खीपुरा गली नम्बर दो में पहुंची थी और पुलिस ने फुरकान नाम के मिस्त्री के घर दबिश दी तो यहां मकान के तहखाने में हथियार बनाने की एक फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ. इस फैक्ट्री में पुलिस ने मुंगेर के रहने वाले ओवैसी हसन, मिंटू और सिद्धू को गिरफ्तार किया है.
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 माओवादी आंदोलन के गर्भ से उदित हुआ मिटू कैम्पेन 
हिन्दू समाज को दुष्चरित्र सिद्ध करने का कुत्सित प्रयत्न
माओवादियों ने आरम्भ किया था मिटू अभियान "मिटू अरबन नक्सल" कहते हुए ट्विटर ट्रेंड आरम्भ किया गया था शहरी माओवादियों द्वारा जब गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, और पी वारवरा राव नाम के पांच दुर्दांत शहरी माओवादियों की गिरफ्तारी हुई थी पुणे पुलिस द्वारा।
माओवादियों ने इनकी गिरफ्तारी पर लंबी चर्चा न हो इसीलिये उस समय एससीएसटी एक्ट और नोटा का मुद्दा उठाया विषय भटकाने के लिए। और अब उन पांचों को जेल भेजने वाली सुनवाई होने वाला है इसीलिये नया छिछोरापन का सिंथेटिक डिस्कोर्स मिटू नाम से चलाया जा रहा है।
मूर्खता का स्तर अच्छा खासा है भारत के हिन्दू समाज में। उसका ही लाभ उठाकर ऐसे सिंथेटिक डिस्कोर्स चलाये जा रहे हैं। उनको पता है कि कुछ भी न जानने वाला, अज्ञान में धंसा हुआ मूर्ख हिन्दू इस सिंथेटिक चर्चा को आगे बढ़ाएगा।
माना कि अनेक लोगों ने अपने जीवन में पाप-दुष्कर्म इत्यादि किया होगा। यदि कोई भी महिला ऐसे किसी भी घृणित कर्म से पीड़ित हुई है कभी भी तो उसके लिए पुलिस और न्यायपालिका की व्यवस्था है। भारत में कानून व्यवस्था है। यहाँ पाकिस्तान की तरह जंगल राज नहीं है। लोगों को पुलिस में या न्यायालय में जाकर न्याय पाने का मौलिक अधिकार भारतीय संबिधान ने उन्हें दिया हुआ है। फिर ये लोग पुलिस थाने में या जिला न्यायालय में क्यों नहीं जा रहे हैं? और सोसल मीडिया एवम मीडिया में ऐसे हंगामें की आवश्यक्ता क्या है?
किसी अपराध या बलात्कार के उपरांत पीड़ित या आरोपित का मुंह ढंककर न्यायालय में प्रस्तुत किये जाने का विधान है। बलात्कार पीड़िता का नाम गुप्त रखनेका विधान है। उसका नाम बदलकर मीडिया में समाचार छापा जाता है। फिर इस सरेआम बेशर्मी का कारण क्या है? माओवादियों मार्क्सवादियों द्वारा वेश्यावृति भारत में फैलाने का कुत्सित प्रयत्न है यह मिटू कैम्पेन।
भारत में यदि पुलिस न होती, न्यायालय न होता तो यह समझा भी जा सकता था कि लोग अपनी पीड़ा के लिए न्याय पाने का प्रयत्न कर रहे हैं नई मीडिया और नए प्लेटफॉर्म पर। किन्तु जब सबके लिए न्याय का अधिकार संबिधान ने सुनिश्चित करते हुए सम्पूर्ण न्यायतंत्र विकसित किया गया है भारत में फिर ऐसा कैम्पेन भारत को अरेबियन देश या यूरोपियन देश की भाँति चरित्रहीन सिद्ध करने का प्रयास मात्र है।
~मुरारी शरण शुक्ल।







Sunday, 7 October 2018

 बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिशनरियां...
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कई वर्ष पहले दूर दक्षिण भारत से बाबा माधवदास नामक एक संन्यासी दिल्ली में ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ प्रकाशन के कार्यालय पहुँचे। उन्होंने सीताराम गोयल की कोई पुस्तक पढ़ी थी, जिसके बाद उन्हें खोजते-खोजते वह आए थे। मिलते ही उन्होंने सीताराम जी के सामने एक छोटी सी पुस्तिका रख दी। यह सरकार द्वारा 1956 में बनी सात सदस्यीय जस्टिस नियोगी समिति की रिपोर्ट का एक सार-संक्षेप था। यह संक्षेप माधवदास ने स्वयं तैयार किया, किसी तरह माँग-मूँग कर उसे छपाया और तब से देश भर में विभिन्न महत्वपूर्ण, निर्णयकर्ता लोगों तक उसे पहुँचाने, और उन्हें जगाने का अथक प्रयास कर रहे थे। किंतु अब वह मानो हार चुके थे और सीताराम जी तक इस आस में पहुँचे थे कि वह इस कार्य को बढ़ाने का कोई उपाय करेंगे।
माधवदास ने देश के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ स्वयं ध्यान से देखी थीं। उन्हें यह देख बड़ी वेदना होती थी कि मिशनरी लोग हिन्दू धर्म को लांछित कर, भोले-भोले लोगों को छल से जाल में फँसा कर, दबाव देकर, भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर आदि विधियों से ईसाइयत में धर्मांतरित करते थे। सबसे बड़ा दुःख यह था कि हिन्दू समाज के अग्रगण्य लोग, नेता, प्रशासक, लेखक इसे देख कर भी अनदेखा करते थे। यह भी माधवदास ने स्वयं अनुभव किया। वर्षों यह सब देख-सुन कर अब वे सीताराम जी के पास पहुँचे थे। सीताराम जी ने उन्हें निराश नहीं किया। उन्होंने न केवल जस्टिस नियोगी समिति रिपोर्ट को पुनः प्रकाशित किया, वरन ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की ऐतिहासिक क्रम में समीक्षा करते हुए ‘छद्म-पंथनिरपेक्षता, ईसाई मिशन और हिन्दू प्रतिरोध’ नामक एक मूल्यवान पुस्तिका भी लिखी। पर ऐसा लगता है कि हिन्दू उच्च वर्ग की की काहिली और अज्ञान पर शायद ही कुछ असर पड़ा हो।
उदाहरण के लिए, सात वर्ष पहले जब ‘तहलका’ ने साप्ताहिक पत्रिका आरंभ की तो अपना प्रवेशांक (7 फरवरी 2004) भारत में ईसाई विस्तार के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र पर केंद्रित किया। इस के लिए अमेरिकी सरकार तथा अनेक विदेशी चर्च संगठनों द्वारा भारी अनुदान, अनेक मिशनरी संगठनों के प्रतिनिधियों से बात-चीत, उनके दस्तावेज, मिशनरियों द्वारा भारत के चप्पे-चप्पे का सर्वेक्षण और स्थानीय विशेषताओं का उपयोग कर लोगों का धर्मांतरण कराने के कार्यक्रम आदि संबंधी भरपूर खोज-बीन और प्रमाण ‘तहलका’ ने जुटा कर प्रस्तुत किया था। किंतु उस पर भारतीय नेताओं, बुद्धिजीवियों, प्रशासकों की क्या प्रतिक्रिया रही? कुछ नहीं, एक अभेद्य मौन! मानो उन्होंने कुछ न सुना हो। जबकि मिशनरी संगठनों में उस प्रकाशन से भारी चिंता और बेचैनी फैली (क्योंकि वे उस पत्रिका को संघ-परिवार का दुष्प्रचार बताकर नहीं बच सकते थे!)। उन्होंने तरह-तरह के बयान देकर अपना बचाव करने की कोशिश की। मगर हिन्दू समाज के प्रतिनिधि निर्विकार बने रहे! हमारे जिन बुद्धिजीवियों, अखबारों, समाचार-चैनलों ने उसी तहलका द्वारा कुछ ही पहले रक्षा मंत्रालय सौदों में रिश्वतखोरी की संभावना का पर्दाफाश करने पर खूब उत्साह दिखाया था, और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस समेत सबके इस्तीफे की माँग की थी। वही लोग उसी अखबार के इस पर्दाफाश पर एकदम गुम-सुम रहे। मानो इस में कोई विशेष बात ही न हो।
ठीक यही पचपन वर्ष पहले नियोगी समिति की रिपोर्ट आने पर भी हुआ था। जहाँ मिशनरी संगठनों में खलबली मच गई थी, वहीं हमारे नेता, बुद्धिजीवी, अफसर, न्यायविद सब ठस बने रहे। अंततः संसद में सरकार ने यह कह कर कि समिति की अनुशंसाएं संविधान में दिए मौलिक अधिकारों से मेल नहीं खाती, मामले को रफा-दफा कर दिया। कृपया ध्यान दें – किसी ने यह नहीं कहा कि समिति का आकलन, अन्वेषण, तथ्य और साक्ष्य त्रुटिपूर्ण है। बल्कि सबने एक मौन धारण कर उसे चुप-चाप धूल खाने छोड़ दिया। (उसके तैंतालीस वर्ष बाद, 1999 में, यही जस्टिस वधवा कमीशन रिपोर्ट के साथ भी हुआ, जिसने उड़ीसा में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या के संबंध में विस्तृत जाँच की थी)। हिन्दू सत्ताधारियों व बौद्धिक वर्ग की इस भीरू भंगिमा को देख कर सहमे हुए मिशनरी संगठनों का साहस तुरत स्वभाविक रूप से बढ़ गया। सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में उनकी गतिविधियाँ इतनी अशांतिकारक हो गईं कि उड़ीसा व मध्य प्रदेश की सरकारों को क्रमशः 1967 और 1968 में धूर्तता और प्रपंच द्वारा धर्मांतरण कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने पड़े। उस से माधवदास जैसे दुखियारों को कुछ प्रसन्नता मिली। मगर वह क्षणिक साबित हुई क्योंकि उन कानूनों को लागू कराने में किसी ने रुचि नहीं ली। जिन स्थानों में मिशनरी सक्रिय थे, वहाँ इन कानूनों को जानने और उपयोग करने वाले नगण्य थे। जबकि शहरी क्षेत्रों में जो हिन्दू यह सब समझने वाले और समर्थ थे, उन्होंने रुचि नहीं दिखाई कि इन कानूनों के प्रति लोगों को जगाकर चर्च के विस्तारवादी आक्रमण को रोकें।
एक अर्थ में आश्चर्य है कि ब्रिटिश भारत में मिशनरी विस्तारवाद के विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध सशक्त था, जबकि स्वतंत्र भारत में यह मृतप्राय हो गया। 1947 से पहले के हमारे राष्ट्रीय विचार-विमर्श, साहित्य, भाषणों आदि में इस का नियमित उल्लेख मिलता है कि विदेशी मिशनरी भारतीय धर्म-संस्कृति को लांछित, नष्ट करने और भारत को विखंडित कर जहाँ-जहाँ संभव हो स्वतंत्र ईसाई राज्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। तब हमारे नेता, लेखक, पत्रकार अच्छी तरह जानते थे कि यूरोपीय साम्राज्यवाद और ईसाई विस्तारवाद दोनों मूलतः एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। इसलिए 1947 से पहले के राष्ट्रीय लेखन, वाचन में इस के प्रतिकार की चिंता, भाषा भी सर्वत्र मिलती है। किंतु स्वतंत्रता के बाद स्थिति विचित्र हो गई। स्वयं देश के संविधान में धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान देकर मिशनरी विस्तारवाद को सिद्धांततः वैधता दे दी गई!
जबकि स्वतंत्रता से पहले गाँधीजी जैसे उदार व्यक्ति ने भी स्पष्ट कहा था कि यदि उन्हें कानून बनाने का अधिकार मिल जाए तो वह “सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे जो अनावश्यक अशांति की जड़ है”। पर उन्हीं गाँधी के शिष्यों ने, यह सब जानते हुए भी कि कौन, किन तरीकों, उद्देश्यों से धर्मांतरण कराते हैं, मिशनरियों को उलटे ऐसी छूट दे दी जो उन्हें ब्रिटिश राज में भी उपलब्ध न थी। देशी-विदेशी मिशनरी संगठनों को यह देख आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई, जो उन्होंने छिपाई भी नहीं! उन्होंने भारत को अपने प्रमुख निशाने के रूप में चिन्हित कर लिया। परिणामस्वरूप अंततः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अलगाववाद की आँच सुलग उठी। इसके पीछे असंदिग्ध रूप से मिशनरी प्रेरणाएं थीं।
इसी पृष्ठभूमि में हम बाबा माधवदास जैसे देशभक्तों की वेदना समझ सकते हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता ने हिन्दू धर्म-संस्कृति व समाज की सुरक्षा निश्चित करने के बदले, उल्टे उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है। विदेशी, साम्राज्यवादी, सशक्त संगठनों को खुल कर खेलने से रोकने का कोई उपाय नहीं किया। उन का अवैध, धूर्ततापूर्ण खेल देख-सुन कर भी स्वतंत्र भारत के नेता, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी उस से मुँह चुराने लगे। नियोगी समिति ने जो प्रमाणिक आकलन किया था, उसका महत्व इस में भी है कि स्वतंत्र भारत के मात्र पाँच-सात वर्षों में मिशनरी धृष्टता कितनी बेलगाम हो चली थी। उस रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस की एक-एक बात और अनुशंसाएं आज भी उतनी ही समीचीन हैं। कम से कम हम उसे पढ़ भी लें तो बाबा माधवदास की आत्मा को संतोष होगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में ईसाई मिशनरी संगठनों को भय था कि अब उन का कारोबार बाधित होगा। आखिर स्वयं गाँधीजी जैसे सर्वोच्च नेता ने खुली घोषणा की थी कि कानून बनाने का अधिकार मिलने पर वह सारा धर्मांतरण बंद करवा देंगे। किंतु मिशनरियों की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि उन की दुकान बंद कराने के बदले, भारतीय संविधान में धर्मांतरण कराने समेत धर्म प्रचार को ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में उच्च स्थान मिल गया है! इसमें किसी संदेह को स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने दूर कर दिया था। नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने पत्र (17 अक्तूबर 1952) में स्पष्ट कर दिया, “वी परमिट, बाई अवर कंस्टीच्यूशन, नॉट ओनली फ्रीडम ऑफ कांशेंस एंड बिलीफ बट आलसो प्रोजेलाइटिज्म”। और यह प्रोजेलाइटिज्म मुख्यतः चर्च-मिशनरी करते हैं और किन हथकंडों से करते है, यह उस समय हमारा प्रत्येक नेता जानता था!
जब स्वतंत्र भारत का संविधान बन रहा था, तो संविधान सभा में इस पर हुई पूरी बहस चकित करने वाली है। कि कैसे हिंदू समाज खुली आँखों जीती मक्खी निगलता है। एक ही भूल बार-बार करता, दुहराता है, चोट खाता है, फिर भी कुछ नहीं सीखता! धर्मांतरण कराने समेत ‘धर्म-प्रचार’ को मौलिक अधिकार बनाने का घातक निर्णय मात्र एक-दो सदस्यों की जिद पर कर दिया गया। इसके बावजूद कि धर्म-प्रचार के नाम पर इस्लामी और ईसाई मिशनरियों द्वारा जुल्म, धोखा-धड़ी, रक्तपात और अशांति के इतिहास से हमारे संविधान निर्माता पूर्ण परिचित थे। इसीलिए संविदान सभा में पुरुषोत्तमदास टंडन, तजामुल हुसैन, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, हुसैन इमाम, जैसे सभी सदस्य ‘धर्म-प्रचार’ के अधिकार को मौलिक अधिकार में जोड़ना अनुचित मानते थे। फिर भी केवल “ईसाई मित्रों का ख्याल करते हुए” उसे स्वीकार कर बैठे! यह उस हिन्दू भोलेपन का ही पुनः अनन्य उदाहरण था जो ‘पर-धर्म’ को गंभीरता-पूर्वक न जानने-समझने के कारण इतिहास में असंख्य बार ऐसी भूलें करता रहा है।
इसीलिए स्वतंत्र भारत में मिशनरी कार्य-विस्तार की समीक्षा करते हुए जेसुइट मिशनरी फेलिक्स अलफ्रेड प्लैटर ने अपनी पुस्तक द कैथोलिक चर्च इन इंडियाः येस्टरडे एंड टुडे (1964) में भारी प्रसन्न्ता व्यक्त की। उन्होंने सटीक समझा कि भारतीय संविधान ने न केवल भारत में चर्च को अपना धंधा जारी रखने की छूट दी है, बल्कि “टु इनक्रीज एंड डेवलप हर एक्टिविटी ऐज नेवर बिफोर विदाउट सीरियस हिंडरेंस ऑर एंक्जाइटी”। यह निर्विघ्न, निश्चिंत, अपूर्व छूट पाने का ही परिणाम हुआ कि चार-पाँच वर्ष में ही कई क्षेत्रों में मिशनरी गतिविधियाँ अत्यंत उछृंखल हो गईं। तभी सरकार ने मिशनरी गतिविधियों का अध्ययन करने और उस से उत्पन्न समस्याओं पर उपाय सुझाने के लिए 1954 में जस्टिस बी. एस. नियोगी की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय समिति का गठन किया। इस में ईसाई सदस्य भी थे। समिति ने 1956 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसका संपूर्ण आकलन आँखें खोल देने वाला था। किंतु कोई कार्रवाई नहीं हुई। न किसी ने उस के तथ्यों, साक्ष्यों को चुनौती दी, न खंडन किया। केवल मौन के षड्यंत्र द्वारा उसे इतिहास के तहखाने में डाल दिया गया।
तब से आधी शती बीत गई, किंतु उस के आकलन और अनुशंसाएं आज भी सामयिक हैं। जो सामग्री नियोगी समिति ने इकट्ठा की उस से वह इस परिणाम पर पहुँची कि मिशनरी गतिविधियाँ किसी राज्य या देश की सीमाओं में स्वायत्त नहीं है। उनका चरित्र, संगठन और नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय है। जब समिति ने कार्य आरंभ किया तब पहले तो ईसाई मिशनों ने सहयोग की भंगिमा अपनाई। किंतु जब उन्होंने देखा कि समिति अपने काम में गंभीर है तब उन्होंने बहिष्कार किया। फिर नागपुर उच्च न्यायालय जाकर इस का कार्य बंद कराने का प्रयास किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि समिति का गठन और कार्य किसी नियम के विरुद्ध नहीं है।
अपनी जाँच-पड़ताल के सिलसिले में नियोगी समिति चौदह जिलों में, सतहत्तर स्थानों पर गई। वह ग्यारह हजार से अधिक लोगों से मिली, उस ने लगभग चार सौ लिखित बयान एकत्र किए, इसकी तैयार प्रश्नावली पर तीन सौ पचासी उत्तर आए जिस में पचपन ईसाइयों के थे और शेष गैर-ईसाइयों के। समिति ने सात सौ गाँवों से भिन्न-भिन्न लोगों का साक्षात्कार लिया। समिति ने पाया कि कहीं किसी ने ईसा की निंदा नहीं की, सभी जगह केवल अवैध तरीकों से धर्मांतरण कराने पर आपत्ति थी। यह आपत्तियाँ सुदूर क्षेत्रों में, जहाँ यातायात न होने के कारण शासन या प्रेस का ध्यान नहीं, वहाँ गरीब लोगों को नकद धन देने; स्कूल-अस्पताल की बेहतर सुविधाएं देने के लोभ; नौकरी देने; पैसे उधार देकर दबाव डालने; नवजात शिशुओं को आशीर्वाद देने के बहाने जबरन बप्तिस्मा करने; आपसी झगड़ों में किसी को मदद कर के बाद में दबाव डालने; छोटे बच्चों और स्त्रियों का अपहरण करने; तथा विदेशों से आने वाले धन के सहारे इन्हीं तरीकों से किसी क्षेत्र में पर्याप्त धर्मांतरण करा कर पाकिस्तान जैसा स्वतंत्र ईसाई राज्य बना लेने के प्रयासों, आदि संबंधी थीं।
समिति ने पाया कि लूथरन और कैथोलिक मिशनों द्वारा नीतिगत रूप से धर्मांतरित ईसाइयों में अलगाववादी भाव भरे जाते हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि धर्म बदल लेने के बाद उनकी राष्ट्रीयता भी वही नहीं रहती जो पहले थी। अतः अब उन्हें स्वतंत्र ईसाई राज्य का प्रयास करना चाहिए। मिशनरी दस्तावेजों, पुस्तकों, कार्यक्रमों आदि का अध्ययन कर समिति ने पाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत के प्रति मिशनरी नीतियाँ हैं – (1) राष्ट्रीय एकता का प्रतिरोध करना, (2) भारत और अमेरिका के बीच सहअस्तित्व के सिद्धांत से मतभेद, (3) भारतीय संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए मुस्लिम लीग जैसी ईसाई राजनीतिक पार्टी बनाकर अंततः एक स्वतंत्र राज्य बनाना अथवा कम से कम एक जुझारू अल्पसंख्यक समुदाय बनाना। भारतीय संविधान की उदारता देखकर यूरोप और अमेरिका में मिशनरी सूत्रधारों ने अपना ध्यान भारत पर केंद्रित किया, समिति ने इसके भी प्रमाण पाए।
किंतु समिति की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण अंश मध्य प्रदेश में मिशनरी गतिविधियों की स्थिति पर था। उस ने पाया कि जिन क्षेत्र में स्वतंत्रता से पहले स्वायत्त रजवाड़ो का शासन था और मिशनरियों पर अंकुश था, अब वहाँ उनकी गतिविधियाँ तीव्र हो गई हैं। इन नए खुले क्षेत्रों में पिछड़े आदिवासियों को धर्मांतरित कराने के लिए विदेशी धन उदारता से आ रहा है। ‘आज्ञाकारिता में भागीदारी’ नामक सिद्धांत के अंतर्गत चर्च को बताया जाता है कि वे जमीन से जुड़े रहें, किंतु अपनी निष्ठा और आज्ञाकारिता को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखें। समिति ने ईसाई स्त्रोतों से ही पाया कि वे मानते हैं कि उन के कार्य में सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति केवल धन है, हर जगह, हर समय, हर चीज धन पर ही निर्भर है। यहाँ तक कि जो भी व्यक्ति मिशनरियों से मिलने आता है केवल धन के लिए। भारतीय ईसाई विदेशी मिशनरियों का स्वागत भी केवल पैस के लिए करते हैं। कहीं किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक चर्चा या प्रेरणा का नामो-निशान नहीं था।
यह तथ्य एक लाक्षणिक उदाहरण भर था कि ‘नेशनल क्रिश्चियन काऊंसिल ऑफ इंडिया’ के खर्च का मात्र बीसवाँ अंश ही भारतीय स्त्रोतों से आता है, शेष बाहर से। कमो-बेश आज भी स्थिति वही है। यह कितनी विचित्र बात है कि जब जोर-जबर्दस्ती, छल-प्रपंच आदि द्वारा ईसाइयत विस्तार कार्यक्रमों पर चिंता होती है, तो ईसाइयत को भारत में दो हजार वर्ष पुराना, इसलिए, ‘भारतीय’ धर्म बताया जाता है। किंतु जब उसे राष्ट्रीय और आत्मनिर्भर होने के लिए कहा जाता है, तो उसे निर्बल होने के कारण विदेशी सहायता की आवश्यकता का तर्क दिया जाता है! जो भी हो, नियोगी समिति ने विदेशी स्त्रोतों से मिशनरी कार्यों के लिए आने वाले धन का भी हिसाब किया था और पाया कि ‘शिक्षा और चिकित्सा’ के लिए आए धन का बड़ा हिस्सा धर्मांतरण कराने पर खर्च किया जाता है।
जिन तरीकों से यह कार्य होता है वह आज भी तनिक भी नहीं बदले हैं। नियोगी समिति ने ठोस उदाहरण नोट किए थे। हरिजनों, आदिवासी छात्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें दी जानी वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ईसाई प्रार्थनाओं में शामिल होने की शर्त से जोड़ा जाता है। बाइबिल कक्षा में शामिल न होने को पूरे दिन की अनुपस्थिति के रूप में दंडित किया जाता है। स्कूल के उत्सवों का उपयोग ईसाई चिन्ह की अन्य धर्मों के चिन्हों पर विजय दिखाने के लिए किया जाता है। अस्पतालों में गरीब मरीजों को ईसाई बनने के लिए दबाव दिया जाता है। सबसे जोरदार फसल अनाथालयों में काटी जाती है जहाँ बाढ़, भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदा में तबाह परिवारों के बच्चों को लाकर सबको ईसाई बना लिया जाता है। अधिकांश धर्मांतरण अनिच्छा से होते हैं, क्योंकि सबमें किसी न किसी लाभ-लोभ की प्रेरणा रहती है। समिति ने पाया कि किसी ने अपने नए धर्म का कोई अध्ययन या विचार जैसा कभी कुछ नहीं किया। धर्मांतरित लोग केवल साधारण आदिवासियों के झुंड थे जिनकी चुटिया कटवा कर बस उन्हें ईसाई के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।
रोमन कैथोलिक मिशनरी जरूरतमंदों को उधार देकर बाद में उसे वापस न करने के बदले ईसाई बनाने की विधि में सिद्धहस्त हैं। अन्य ईसाई मिशनरियों ने ही नियोगी समिति को यह बात बतायी। यदि कोई वापस करना चाहे तो उसे कड़ा ब्याज देना पड़ता है। कर्ज पाने की शर्त में भी कर्ज माँगने वाले को अपने हिन्दू चिन्ह छोड़ने, जैसे सिर की चोटी कटाने को कहा जाता है। कई लेनदार किशोर उम्र के और मजदूर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति कर्ज लेता है, तो मिशनरी रजिस्टर में उस के पूरे परिवार को संभावित धर्मांतरितों में नोट कर लिया जाता है। कर्ज लेते समय ही एक वर्ष का ब्याज उस में से काट लिया जाता है। समिति को अपने संपूर्ण आकलन, अन्वेषण के दौरान एक भी ऐसा धर्मांतरित ईसाई न मिला जिस ने धन के लोभ या दबाव के बिना ईसाई बनना स्वीकार किया हो!
कितने आश्चर्य है कि जो प्रगतिवादी लेखक संगठन और वामपंथी नाट्यकर्मी प्रेमचंद की कहानी ‘सवा सेर गेहूँ’ पर हजारों नाटक मंचित कर चुके हैं, वे मिशनरियों की इस स्थायी, अवैध और घृणित महाजनी पर कभी कोई नाटक क्यों नहीं करते! मगर इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि भारतीय वामपंथियों को वैसा हर साम्राज्यवाद प्रिय है जिसका निशाना हिन्दू समाज हो।
मिशनरी साहित्य में हिन्दू देवी-देवताओं की छवियों और उन की पूजा पर अत्यंत भद्दे आक्षेप रहते हैं। स्कूलों में मंचित नाटकों में उनकी हँसी उड़ाई जाती है। उनका मखौल बनाने वाले गाने लिखे, गाए जाते हैं। हिन्दू ग्रंथों को विकृत करके प्रस्तुत किया जाता है। संविधान बनने के बाद से सरगुजा जिले में बने ईसाइयों की एक सूची सरकार ने समिति को दी थी। नियोगी समिति ने पाया कि वहाँ दो वर्ष में चार हजार उराँव ईसाई बने। उन में एक वर्ष से साठ वर्ष के पुरुष, स्त्री शामिल थे। समिति ने पाया कि उन में अपने नए धर्म का कहीं, कोई भाव लेश मात्र न था। प्रायः लोगों को झुंड में थोक भाव में धर्मांतरित करा लिया जाता है। किंतु रोमन कैथोलिक मिशनों ने समिति को अपने द्वारा धर्मांतरित कराए लोगों का विवरण नहीं दिया। क्योंकि उस से यह सच्चाई सामने आ जाती कि वह स्वेच्छा से नहीं, बल्कि संगठित, प्रायोजित हुआ था।
नियोगी समिति का प्रमाणिक निष्कर्ष था कि धर्मांतरण लोगों को राष्ट्रीय भावनाओं से विलग करता है (यही अपने समय में गाँधीजी ने भी कहा था)। धर्मांतरित ईसाइयों को सचेत रूप से इस दिशा में धकेला जाता है। उन से ‘राम-राम!’ या ‘जय हिन्द’ जैसे अभिवादन छुड़वा कर ‘जय यीशू’ कहना सिखाया जाता है। मिशनरी स्कूलों के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर ईसाई झंडा लगाया जाता है। ईसाई अखबारों में गोवा पर पुर्तगाल की औपनिवेशिक सत्ता बने रहने के पक्ष में लेख रहते थे, और इस बात की आलोचना की जाती थी कि भारत उसे अपना अंग बनाना चाहता है (तब गोवा पुर्तगाल के अधिकार में था)।
मिशनरी गतिविधियों की एक तकनीक समिति ने नोट की कि वह स्थानीय शासन और सरकार पर नियमित आरोप और शिकायतें करके एक दबाव बनाए रखते हैं, ताकि कोई उन की अवैध कारगुजारियों पर ध्यान देने का विचार ही न करे। यह एक जबरदस्त तकनीक है जो आज भी बेहतरीन रूप से कारगर है। समिति ने पाया कि मध्य प्रदेश शासन मिशनरी सक्रियता के क्षेत्रों में पूरी तरह तटस्थ रहा है, उस ने कभी कोई हस्तक्षेप किया हो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिला। किंतु मिशनरी संगठन सरकार पर प्रायः कोई न कोई भेद-भाव जैसी शिकायत करते रहने की आदत रखते हैं। समिति ने पाया था कि यह प्रशासनिक अधिकारियों को रक्षात्मक बनाए रखने की पुरानी मिशनरी तकनीक रही है। यही आज भी देखा जाता है, जब दिल्ली, गुजरात, झारखंड, उड़ीसा या मध्य-प्रदेश में मिशनरी संगठन अकारण या उलटी बयानबाजी करके सरकार को रक्षात्मक बने रहने के लिए विवश करते हैं। उलटा चोर कोतवाल को डाँटे जैसी सफल तकनीक।
नियोगी समिति ने अनेकानेक मिशनरी दस्तावेजों का अध्ययन करके पाया था कि भारत में मिशनरी धर्मांतरण गतिविधियाँ एक वैश्विक कार्यक्रम के अंग हैं जो पूरे विश्व पर पश्चिमी दबदबा पुनर्स्थापित करने की नीति से जुड़ी हुई हैं। उस में कोई आध्यात्मिकता का भाव नहीं, बल्कि गैर-ईसाई समाजों की एकता छिन्न-भिन्न करने की चाह है। जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। समिति की राय में ईसाई मिशन भारत के ईसाई समुदाय को अपने देश से विमुख करने का प्रयास कर रहे हैं। यानी, धर्मांतरण कार्यक्रम कोई धार्मिक दर्शन नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य के अंग हैं। भारत के चर्च स्वतंत्र नहीं, बल्कि उन के प्रति उत्तरदायी हैं जो उनके रख-रखाव का खर्च वहन करते हैं। समिति के अनुसार धर्मांतरण दूसरे तरीके से राजनीति के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
यह संयोग नहीं है कि नियोगी समिति ने अवैध, राष्ट्र-विरोधी, समाज-विरोधी मिशनरी गतिविधियों को रोकने के लिए जो अनुशंसाएं दी थीं, उन का आज भी उतना ही मूल्य है। वे अनुशंसाएं यह थीं – (1) जिन विदेशी मिशनों का प्राथमिक कार्य मात्र धर्मांतरण कराना है, उन्हें देश से चले जाने के लिए कह देना चाहिए, (2) चिकित्सा और अन्य सेवाओं के माध्यम से धर्मांतरण बंद करने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए, (3) किसी की विवशता, बुद्धिहीनता, अक्षमता, असहायता आदि का लाभ उठाते हुए धोखे या दबाव से धर्मांतरण को पूर्णतः प्रतिबंधित करना चाहिए, (4) विदेशियों द्वारा तथा छल-प्रपंच से धर्मांतरण रोकने के लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन होना चाहिए, (5) अवैध तरीकों से धर्मांतरण बंद करने के लिए नए कानून बनने चाहिए, (6) अस्पतालों में नियुक्त डॉक्टरों, नर्सों और अन्य अधिकारियों के रजिस्ट्रेशन में ऐसे संशोधन करने चाहिए जिस से उनके द्वारा किसी मरीज के ईलाज और सेवा के कार्यों के दौरान उस का धर्मांतरण न होने की शर्त हो, (7) बिना राज्य सरकार की अनुमति के धार्मिक प्रचार वाले साहित्य के वितरण पर प्रतिबंध हो।
जब नियोगी समिति की यह रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो मिशनरी संगठनों ने इसे तानाशाही की ओर बढ़ने का उपाय बताकर निंदा की। किंतु किसी ने इस रिपोर्ट के तथ्यों, आकलनों को मिथ्या कहने का साहस नहीं किया। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे नेताओं, प्रशासकों, बुद्धिजीवियों ने समिति की किसी अनुशंसा को लागू करने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि रोग, उस के फैलने के तरीके, उस से होने वाली हानि और देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा भी यथावत है। इस अर्थ में नियोगी समिति की ऐतिहासिक रिपोर्ट आज पचपन वर्ष बाद भी सामयिक और पठनीय है।
बाबा माधवदास संभवतः अब नहीं हैं, किंतु उनकी वेदना का कारण यथावत है। न रोग दूर हुआ, न उस के निदान की कोई चिंता है। कंधमाल (उड़ीसा) की घटनाएं इस का नवीनतम प्रमाण हैं। नियोगी समिति ने उस के सटीक उपचार के लिए जो सुचिंतित, विवेकपूर्ण अनुशंसाएं दी थीं। वह आज भी उतनी ही आवश्यक हैं जितनी तब थीं। परंतु उस के प्रति हिन्दू उच्च वर्ग की उदासीनता भी लगभग वैसी ही है। इन में वैसे हिन्दू भी हैं जो सभी बातें जानते हैं, किंतु अपने सुख-चैन में खलल डाल कोई कार्य नहीं करना चाहते। कोई दूसरा कर दे तो उन्हें अच्छा ही लगता है। पर उसके लिए एक शब्द कहने तक का कष्ट वह उठाना नहीं चाहते।
इस भीरू प्रवृत्ति को महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने ‘म्यूनिख भावना’ की संज्ञा दी थी। इस मुहावरे की उत्पत्ति 1938 में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के बीच हुए म्यूनिख समझौते के बाद हुई। उस समझौते में महत्वपूर्ण यूरोपीय देशों ने चेकोस्वोवाकिया को हिटलरी जर्मनी की दया पर छोड़ कर स्वयं को सुरक्षित समझ लिया था। अपने नोबेल पुरस्कार भाषण (1970) में सोल्झेनित्सिन ने कहा था, “The spirit of Munich is a sickness of the will of successful people, it is the daily condition of those who have given themselves up to the thirst after prosperity at any price, to material well-being as the chief goal of earthly existence. Such people – and there are many in today’s world – elect passivity and retreat, just so that their accustomed life might drag on a bit longer, just so as not to step over the threshold of hardship today – tomorrow, you’ll see, it will all be all right. (But it will never be alright! The price of cowardice will only be evil; we shall reap courage and victory only when we dare to make sacrifices.)” भारत के उच्च वर्गीय हिन्दुओं में यह भावना केवल ईसाई मिशनरियों के आध्यात्मिक आक्रमण के प्रति ही नहीं, बल्कि इस्लामी आतंकवाद, कश्मीरी मुस्लिम अलगाववाद और नक्सली विखंडनवाद जैसे उन सभी घातक परिघटनाओं के प्रति है जिनका निहितार्थ उन्हें मालूम है। किंतु इन से लड़ने के लिए वे कोई असुविधाजनक कदम उठाना तो दूर, दो सच्चे शब्द कहने से भी वे कतराते हैं।
साभार: डॉ० शंकर शरण

Friday, 5 October 2018

 आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध.!
 अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की।
 यदि  बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा , उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।
एक बार जब गौतम बुद्ध के मित्र प्रसेनादी को पता चला कि उन की पत्नी पूरी शाक्य नहीं, बल्कि एक दासी से उत्पन्न शाक्य राजा की पुत्री है, तब उस ने उस का और उस से हुए अपने पुत्र का परित्याग कर दिया। किन्तु बुद्ध ने अपने मित्र को समझा कर उस का कदम वापस करवाया। तर्क यही दिया कि पंरपरा से संतान की जाति पिता से निर्धारित होती है, इसलिए शाक्य राजा की पुत्री शाक्य है। यदि बुद्ध को जाति-प्रथा से कोई विद्रोह करना होता, या नया मत चलाना होता, तो उपयुक्त होता कि वे सामाजिक, जातीय परंपराओं का तिरस्कार करने को कहते। बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं किया। कभी नहीं किया।
बुद्ध का यह व्यवहार सुसंगत था। तुलनात्मक धर्म के प्रसिद्ध ज्ञाता डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने इस पर बड़ी मार्के की बात कही है कि जिसे संसार को आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो, वह सामाजिक मामलों में कम से कम दखल देगा। कोई क्रांति करना, नया राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाना तो बड़ी दूर की बात रही! एल्स्ट के अनुसार, ‘यदि किसी आदमी के लिए अपनी ही मामूली कामनाएं संतुष्ट करना एक विकट काम होता है, तब किसी कल्पित समानतावादी समाज की अंतहीन इच्छाएं पूरी करने की ठानना कितना अंतहीन भटकाव होगा!’
अतः यदि बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था, तो यह तर्कपूर्ण था कि वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में कम-से-कम हस्तक्षेप करते। उन की चिन्ता कोई ‘ब्राह्मण-वाद के विरुद्ध विद्रोह’, राजनीतिक कार्यक्रम, आदि की थी ही नहीं, जो आज के मार्क्सवादी, नेहरूवादी या कुछ अंबेदकरवादी उन में देखते या भरते रहते हैं। इसीलिए स्वभावतः बुद्ध के चुने हुए शिष्यों में लगभग आधे लोग ब्राह्मण थे। उन्हीं के बीच से वे अधिकांश प्रखर दार्शनिक उभरे, जिन्होंने समय के साथ बौद्ध-दर्शन और ग्रंथों को महान-चिंतन और गहन तर्क-प्रणाली का पर्याय बना दिया।
यह भी एक तथ्य है कि भारत के महान विश्वविद्यालय बुद्ध से पहले की चीज हैं। तक्षशिला का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गौतम बुद्ध के पहले से था, जिस में बुद्ध के मित्र बंधुला और प्रसेनादी पढ़े थे। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ पढ़े थे। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि बौद्धों ने उन्हीं संस्थाओं को और मजबूत किया जो उन्हें हिन्दू समाज द्वारा पहले से मिली थी। बाद में, बौद्ध विश्वविद्यालयों ने भी आर्यभट्ट जैसे अनेक गैर-बौद्ध वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया। इसलिए, वस्तुतः चिंतन, शिक्षा और लोकाचार किसी में बुद्ध ने कोई ऐसी नई शुरुआत नहीं की थी जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान, परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जा सकता हो।
ध्यान दें, बुद्ध ने भविष्य में अपने जैसे किसी और ज्ञानी (‘मैत्रेय’, मित्रता-भाईचारा का पालक) के आगमन की भी भविष्यवाणी की थी, और यह भी कहा कि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा। यदि बुद्ध के लिए कुल, जाति और वंश महत्वहीन होते, तो वे ऐसा नहीं कह सकते थे। उन्होंने अपने मित्र प्रसेनादी को वही समझाया, जो सब से प्राचीन उपनिषद में सत्यकाम जाबालि के संबंध में तय किया गया था। कि यदि उस की माता दासी भी थी, तब भी परिस्थिति उस के पिता को ब्राह्मण कुल का ही कोई व्यक्ति दिखाती थी, अतः वह ब्राह्मण बालक था और इस प्रकार अपने गुरू द्वारा स्वीकार्य शिष्य हुआ। उसी पारंपरिक रीति का पालन करने की सलाह बुद्ध ने अपने मित्र को दी थी।
इसीलिए वास्तविक इतिहास यह है कि पूर्वी भारत में गंगा के मैदानों वाले बड़े शासकों, क्षत्रपों ने गौतम बुद्ध का सत्कार अपने बीच के विशिष्ट व्यक्ति के रूप में किया था। क्योंकि बुद्ध वही थे भी। उन्हीं शासकों ने बुद्ध के अनुयायियों, भिक्षुओं के लिए बड़े-बड़े मठ, विहार बनवाए।
जब बुद्ध का देहावसान हुआ, तब आठ नगरों के शासकों और बड़े लोगों ने उन की अस्थि-भस्मी पर सफल दावा किया थाः ‘हम क्षत्रिय हैं, बुद्ध क्षत्रिय थे, इसलिए उन के भस्म पर हमारा अधिकार है।’ बुद्ध के देहांत के लगभग आधी शती बाद तक बुद्ध के शिष्य सार्वजनिक रूप से अपने जातीय नियमों का पालन निस्संकोच करते मिलते हैं। यह सहज था, क्योंकि बुद्ध ने उन से अपने जातीय संबंध तोड़ने की बात कभी नहीं कही। जैसे, अपनी बेटियों को विवाह में किसी और जाति के व्यक्ति को देना, आदि।
अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।
पुराने बौद्ध विहारों, मठों, मंदिरों को भी देखें तो उन में वैदिक प्रतीकों और वास्तु-शास्त्र की बहुतायत मिलेगी। वे पुराने हिन्दू नमूनों का ही अनुकरण करते रहे हैं। बौद्ध मंत्रों में, भारत से बाहर भी, वैदिक मंत्रों की अनुकृति मिलती है। जब बुद्ध धर्म भारत से बाहर फैला, जैसे चीन, जापान, स्याम, आदि देशों में, तो यहाँ से वैदिक देवता भी बाहर गए। उदाहरण के लिए, जापान के हरेक नगर में देवी सरस्वती का मंदिर है। सरस्वती को वहाँ ले जाने वाले ‘धूर्त ब्राह्मण’ नहीं, बल्कि बौद्ध लोग थे!
अपने जीवन के अंत में बुद्ध ने जीवन के सात सिद्धांतों का उल्लेख किया था, जिन का पालन करने पर कोई समाज नष्ट नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने सुंदर उपन्यास ‘सप्त-शील’ (1960) में उसी को वैशाली गणतंत्र की पृष्ठभूमि में अपना कथ्य बनाया है। इन सात सदगुणों में यह भी हैं – अपने पर्व-त्योहार का आदर करना एवं मनाना, तीर्थ व अनुष्ठान्न करना, साधु-संतों का सत्कार करना। हमारे अनेक त्योहार वैदिक मूल के हैं। बुद्ध से समय भी पर्व-त्योहार अपने से पहले के ही थे। महाभारत में भी नदी किनारे तीर्थ करने के विवरण मिलते हैं। सरस्वती और गंगा के तटों पर बलराम और पांडव तीर्थ करने गए थे। 
 जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों की बात है, बुद्ध ने कभी पुराने व्यवहारों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। यदि कुछ कहा, तो उन का आदर और पालन करने के लिए ही। इस प्रकार, कोई विद्रोही या क्रांतिकारी होने से ठीक उलट, गौतम बुद्ध पूरी तरह परंपरावादी थे। उन्होंने चालू राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सलाह दी थी। वे आजीवन एक हिन्दू दार्शनिक रहे। डॉ. एल्स्ट के शब्दों में, ‘बुद्ध अपने पोर-पोर में हिन्दू थे।’ लेकिन ठीक इसी बात को नकारने के लिए बुद्ध धर्म की भ्रांत व्याख्या की जाती रही है। इसे परखना चाहिए।
( लेखक : डॉ० शंकर शरण )
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Opus_Dei 
 काँग्रेस_और_भारत
Opus Dei लैटिन में ओपस डी का अर्थ होता है भगवान का काम…!!
ओपस डी की स्थापना स्पेन में की गई थी और बीबीसी संवाददाता मैक्स सीट्ज़ के अनुसार इस संगठन कैथोलिक धर्म का सबसे प्रभावशाली संगठन माना जा सकता है...इस संगठन पर ईसाई धर्म को मानने वालों को भटकाने का आरोप लगता रहा है जिसे संगठन खारिज करता है , स्पेन की सड़कों पर लोगों से बातचीत करने पर वो कहते हैं कि ओपस डी एक गुप्त संस्था है जो राजनीति और व्यवसाय को प्रभावित करता है,,ओपस डी का दावा है कि पूरी दुनिया में उसके 85000 सदस्य हैं जिसमें से एक तिहाई स्पेन में हैं.
सदस्यों को कहा है जाता है कि वो और लोगों को अपने काम के ज़रिए ईसाई बनने के लिए प्रेरित करें , तीन साल पहले 2002 में ओपस डी के संस्थापक जोसे मारिया एस्क्रिवा को उनकी मौत के मात्र 27 साल बाद जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने सम्मानित किया था तो उस समारोह में दुनिया भर से हज़ारों ओपस डी सदस्य वैटिकन पहुंचे थे.
पोप ने ओपस डी को विशेष दर्ज़ा दिया जिससे संगठन कई प्रकार की सुविधाएं मिल गई. यह भी कहा जाता है कि पोप जॉन पॉल द्वितीय के समय में ओपस डी अत्यधिक प्रभावी हो गया.
हालांकि ओपस डी संगठन के प्रवक्ता जैक वलेरो इसका खंडन करते हैं वो कहते हैं ” वैटिकन में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो ओपस डी के सदस्य हैं. पांच या छह लोग हैं मात्र जिनमें से एक पोप के प्रवक्ता जोआक्विन नवारो वाल्स भी हैं.
वैटिकन पर ओपस डी के प्रभाव को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है. “आलोचकों का कहना है कि दुनिया में ऐसे पादरियों की संख्या बहुत अधिक है जो ओपस डी से जुड़े हुए हैं. इससे चर्च के अलावा चर्च जैसी एक और संस्था का भ्रम होता है, दुनिया भर की कई सरकारों के नेता और अधिकारीगण भी ओपस डी से जुड़े हुए हैं. इनमें से एक नाम ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री रुथ केली का भी है..!!
 कोलंबिया के राष्ट्रपति अल्वारो उरीबे भी ओपस डी के सदस्य कहे जाते हैं लेकिन उन्होंने इन ख़बरों की पुष्टि नहीं की है, प्रवक्ता जैक वलेरो का कहना है कि धर्म एक ऐसी चीज़ है जो निजी होती है और ओपस डी की सदस्यता भी निजी मसला है, यह पता करना मुश्किल काम है कि ओपस डी के पास पैसा कितना है लेकिन इतना तय है कि दुनिया भर की कई संस्थाएं ओपस डी चलाती है और उसे अपने सदस्यों से भारी रकम मिलती है,ऐसी ही एक पूर्व न्यूमरेरी कारमेन चारो कहती हैं कि इन केंद्रों में जीवन एक सपने जैसा होता है,वो कहती हैं ” इन केंद्रों में आपकी दुनिया कोई और ही चलाता है. उन पर धार्मिक गुरुओं का नियंत्रण रहता है. आपके पैसे पर और आपकी पूरी ज़िदगी उनके हाथ में होती है , “हालांकि ओपस डी कहता है कि ऐसे केंद्रों में लोग अपनी मर्ज़ी से आते हैं और संगठन छोड़ने के लिए वो पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं,प्रवक्ता जोसे मारिया कहते हैं कि यह संगठन भी लोग ही चलाते हैं और उनसे ग़लतियां भी हो सकती हैं..!
विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने भी कांग्रेस व यूपीऐ अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया था कि वे ईसाई धर्म के लिए काम करनेवाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘ओपस डी’ के नेटवर्क का हिस्सा हैं।

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Monday, 1 October 2018



खोपड़ी ना हिल जाये तो कहना :
१५ साल की उम्र में गाँधी जी वेश्या की चोखट से हिम्मत न जुटा पाने के कारण वापस लौट आये .
१६ साल की उम्र में पत्नी से सम्भोग की इच्छा से मुक्त नहीं हो पाए जब उनके पिता मृत्यु शैया पर थे .
२१ साल की उम्र में फिर उनका मन पराई स्त्री को देखकर विकारग्रस्त होता है .
२८ साल की उम्र में हब्सी स्त्री के पास जाते है लेकिन शर्मसार होकर वापिस आ जाते है .
३१ साल की उम्र में १ बच्चे के पिता बन जाते है .
४० साल की उम्र में अपने दोस्त हेनरी पोलक की पत्नी के साथ आत्मीयता महसूस करते है ,
४१ साल की उम्र में मोड नाम की लड़की से प्रभवित होते है .
४८ की उम्र में २२ साल की एस्थर फेरिंग के मोहजाल में फंस जाते है .
५१ की उम्र में ४८ साल की सरला देवी चोधरानी के प्रेम में पड़तेहै .
५६ की उम्र में ३३ साल की मेडलिन स्लेड के प्रेम में फंसते है .
६० की उम्र में १८ साल की महाराष्ट्रियन प्रेमा के माया जाल में फंस जाते है .
६४ की उम्र में २४ साल की अमेरिकाकी नीला नागिनी के संपर्क में आते है .
६५ की उम्र में ३५ साल की जर्मन महिला मार्गरेट स्पीगल को कपडे पहनना सिखाते है .
६९ की उम्र में १८ साल की डॉक्टर शुशीला नैयर से नग्न होकर मालिश करते है.
७२ की उम्र में बाल विधवा लीलावती आसर,पटियाला के बड़े जमींदार की बेटी अम्तुस्स्लाम ,कपूरथला खानदान की राजकुमारी अमृत कौर तथा मशहूर समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती जैसी महिलाओ के साथ सोते है .
७६ की उम्र में १६ साल की आभा .वीणा और कंचन नाम की युवतिओं को नग्न होने को कहते है . जिस पर ये लडकिया कहती है की उन्हें ब्रह्मचर्य के बजाय सम्भोग की जरूरत है .
७७ की उम्र मे महात्मा गाँधी अपनी पोती मनु की साथ नोआखाली की सर्द रातें शरीर को गर्म रखने के लिए नग्न सोकर गुजारते है . और
७९ के गाँधी जी महात्मा जीवन के अंतिम क्षणों तक आभा और मनु के साथ एक साथ बिस्तर पर सोते है………………….
आपको इनके बारे मे क्या कहना है??
वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे।।
हरी ॐ
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मोहनदास करमचंद गांधी मुसलमानो से डर गए थे -
यह एक विवादस्पद मगर सच है कि १९०८ में एक घटना के बाद गाँधी जी में मुसलामानों के प्रति कड़ा रवैया बदलकर पक्षपात करना शुरू किया। हुआ यूं कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार ने वहां रहने वाले भारतीयों पर ३ पौंड का टेक्स लगाया, गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से इस विषय में बहस की जिसे मुसलामानों ने सहयोग नहीं दिया तब गाँधी जी ने इसकी जबरदस्त आलोचना की एक सामूहिक वकतव्य में इस्लाम पर कड़ी बात भी कही जिससे मुसलामानों में रोष बढ़ा, १० फरवरी १९०८ को मीर आलम नामक पठान की अगुआई में एक दस्ते ने गाँधी जी की उनके निवास पर बेरहमी से पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी भी दी। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि इस घटना के बाद गाँधी जी ने आपत्तिजनक वक्तव्य तो देने बंद कर ही दिए, साथ ही उनकी सभी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहे और उनके अपराध तक को शह देने लगे।

२३ दिसंबर १९२६ : श्रद्धानंद स्वामी जब बीमार थे और बिस्तर पर लेटे थे तब अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उन्हें चाकू से गोद कर मार डाला, श्रद्धानंद स्वामी एक आर्य समाज के प्रचारक थे और धर्म परिवर्तन कर चुके मुसलामानों को शुद्धि योजना द्वारा वापस हिन्दू धर्म में लाना चाहते थे, गाँधी जी का बड़ा बेटा हीरालाल जो मुसलमान बन चूका था इन्ही स्वामी द्वारा वापस हिन्दू बना था। एक मुसलमान महिला, जो स्वामी के पास हिन्दू धर्म में वापस जाने के लिए आयी तब उसके मुस्लिम पति के अदालत का सहारा लेकर स्वामी पर इलज़ाम भी लगाया लेकिन अदालत ने स्वामी को बरी कर दिया इस घटना से कई मुस्लिम खफा हो गए और कुछ ही दिनों में उनकी हत्या कर दी गयी। तब गाँधी जी ने कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में कांग्रेस की कांफ्रेंस में कहा – भाई रशीद का जुर्म मैं नहीं मानता बल्कि नफरत फैलाने वाले ही जिम्मेदार हैं यानिकी उनहोंने स्वामी जी को ही दोषी ठहराया।

धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के जरिये गाँधी जी का यही मुस्लिम तुष्टिकरण देश के विभाजन का भी कारण बना, जब २६ मार्च १९४० को जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अवधारणा पर जोर दिया तब गाँधी जी का वक्तव्य था – अन्य नागरिकों की तरह मुस्लिम को भी यह निर्धारण करने का अधिकार है कि वो अलग रह सके, हम एक संयुक्त परिवार में रह रहे हैं ( हरिजन , ६ अप्रैल १९४० ).

अगर इस देश के अधिकांश मुस्लिम यह सोचते हैं कि एक अलग देश जरूरी है और उनका हिदुओं से कोई समानता नहीं है तो दुनियाँ की कोई ताक़त उनके विचार नहीं बदल सकती और इस कारण वो नए देश की मांग रखते है तो वो मानना चाहिए, हिन्दू इसका विरोध कर सकते है ( हरिजन , १८ अप्रैल १९४२ ).

१२ जून १९४७ को जब कांग्रेस सेशन में बंटवारे के मुद्दे पर विचार हुआ तब पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविन्द वल्लभ पन्त, चैतराम गिडवानी आदि ने इसका तर्क के साथ घोर विरोध किया था तब गाँधी जी ने सारे वक्ताओं को किनारे कर ४५ मिनट की जो स्पीच दी उसका सार इस प्रकार है अगर कांग्रेस ने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया तो कुछ और ग्रुप ( संभवतः नेता जी सुभाष चन्द्र बोस) कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देंगे और देश में भूचाल जैसा आ जाएगा। दुसरे शब्दों में गाँधी जी ने मुसलामानों को पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित ही किया। इस घटना के बाद वल्लभ भाई ने भी बंटवारा स्वीकार करने का फैसला किया।

बंटवारे के बाद भी गाँधी जी की नीतियों ने देश का जो नुक्सान किया वो इस प्रकार है, २३ % मुस्लिम जनसँख्या के लिए ३२ % भूमि पाकिस्तान को दी गयी, बंटवारे के बाद मुख्य कदम था जल्द से जल्द पापुलेशन एक्सचेंज, यानिकी मुस्लिम को पाकिस्तान और हिन्दुओं को भारत में पुनर्वास दिलाना, जिसकी वकालत जिन्ना और माउंट बेटन दोनों ने की थी और मुस्लिम लीग के प्रस्ताव में यह मुद्दा शामिल था। लेकिन गाँधी जी ने कुछ मुसलामानों की अनिच्छा के चलते गाँधी जी ने इसे “इम्प्रक्टिकल” करार दिया, बिहार में दंगे भड़कने पर भी मुस्लिम लीग का यह प्रस्ताव लागू नहीं किया गया। माउंट बेटन ने जब नेहरु पर दबाव डाला तब नेहरु ने गाँधी की ओर देखा और गाँधी जी ने इसे स्वीकार नहीं किया, नतीज़तन हिन्दुओं ( मुख्यतया सिख और सिन्धी) का भारत में पलायन तो हुआ लेकिन मुसलामानों का पाकिस्तान में न के बराबर और जिनका पाकिस्तान पलायन हुआ वो मुहाजिर कहलाये यानि दोयम दर्जे के पाकिस्तानी।
गाँधी जी के विरोध के कारण ही “वन्दे मातरम” राष्ट्रगान नहीं बन पाया, दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी इसे बहुत पसंद करते थे उन्होंने लिखा था ” यह संवेदना में आदर्श है और मधुर भी, यह सिर्फ देशभक्ति जगाता है और भारत को माँ की तरह गुण गाता है ” परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ मुस्लिम इसे नापसंद करते है तब उनहोंने सामूहिक सभा में गाना बंद कर दिया और जन गण मन राष्ट्रगीत बनाया गया। बंटवारे के बाद जब सिन्धी और पंजाबी दिल्ली में केम्प में रह रहे थे तब गाँधी जी ने वहां का दौरा किया और कहा- मुस्लिम अगर पाक को हिन्दू विहीन करते हैं तो हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि हौसला रखना चाहिए

इस प्रकार गाँधी जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण का इतिहास रच कर दिखा दिया और कांग्रेस उनके नक़्शे कदम पर चलकर आगे बढती रही और धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा ही रच दी !चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, पाठ
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राजीव गांधी की हत्या को उचित बताया

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को ईसाई प्रचारक अगस्टाईन जेबाकुमार ने उचित बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने श्रीलंका में गए भारतीय शांति सेना को हत्यारी सेना का नाम दिया है। ऐसा नहीं कि वह पहले ईसाई हैं जिसने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को उचित बताया हो और भारतीय सेना को अपमानित किया हो। इससे पहले भी ईसाई प्रचारक मोहन लेजैरस भी भारतीय साधु संत के साथ धार्मिक स्थलों का अपमान कर चुका है। लेजैरस ने तमिलनाडु में स्थापित मंदिरों को शैतानो का अड्डा बताया था। जबकि सारे व्यभिचार चर्च में होते हैं। अधिकांश चर्चो के बिशप पर रेप का आरोप है। हाल ही में केरल की एक नन ने बिशप फ्रैंक मुलाक्कल पर कई बार रेप का आरोप लगाया है। लेकिन ये लोग मंदिर को अपमानित करते रहते हैं।

जेबाकुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वाइरल हुआ है। यह वीडियो बिना किसी तारीख का है। इस वीडियो में उन्होंने कहा है कि जिस प्रकार भारती शांति सेना ने श्रीलंका के आम लोगों को प्रताड़ित किया, विशेष कर वहां की महिलाओं पर अत्याचार किया उससे वहां की महिलाएं भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से काफी नाराज थी। उन्होंने कहा कि श्रीलंका की महिलाओं की नाराजगी के कारण ही राजीव गांधी की हत्या की गई। उन्होंने कहा है कि भले ही राजीव गांधी की हत्या के लिए महिला माध्यम बनी लेकिन इसका असली दोषी भारतीय शांति सेना है। क्योंकि भारतीय सेना की करतूत का खामियाजा राजीव गांधी को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा।