Sunday, 26 November 2017

vakt ke jhrokhe se.....kashmeer

भारतवर्ष और कश्मीर (शारदादेश) का महत्त्व !

नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनी ।
त्वामहं प्रार्थयो नित्यं विद्यादानं च देहि मे ।

(चित्र POK स्थित शारदापीठ)

वसुंधरापर सौंदर्यताका प्रतीक : 
कश्मीर,आज आतंकवादी कार्यवाहियों का अड्डा बन गया है । १९ जनवरी १९९० को संपूर्ण कश्मीर से हिंदुओंको निकल जानेके आदेश दिए गए थे । धर्म बचानेके लिए कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी भूमि,संपत्ति और स्मृतियां,सब का परित्याग कर दिया । चारुदत्त पिंगले जी द्वारा मार्गदर्शन के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं । भूमंडल में सबसे पवित्रतम भूमि अर्थात यह भारतवर्ष है ! अनेक ऋषिमुनि,अवतार एवं विद्वज्जनों ने भारत भूमि को गौरवशाली बनाया है। 

विश्वके सबसे सुसंस्कृत वंशके रूप में सुप्रसिद्ध आर्य संस्कृति का विकास इस देश में ही हुआ । ऐसा भारत देश हमारी सांस है, तो हिंदू संस्कृति हमारी आत्मा !प्रारूप में दिखने वाला भारत,राष्ट्रपुरुष की देह है । उसका जम्मू-कश्मीर प्रांत प्रत्यक्ष हमारा दिमाग अर्थात बुद्धि है । यदि भारतवर्ष कश्मीर विहीन हो गया, तो भारत की अवस्था बुद्धिहीन मानव जैसी,अर्थात पशुवत हो जाएगी !

शारदा देश का महत्त्व 

कश्मीर भारतवर्षकी बुद्धि है, इसका आध्यात्मिक कारण मां सरस्वती का शारदापीठ है ! ब्रह्मदेवने सृष्टिकी रचना की । तत्पश्चात उन्होंने मानवको पृथ्वी पर भेजा । 

मानवने ब्रह्मदेव से प्रार्थना की, "हे भगवन्,आप विविध देवताओं को,हमारा उत्कर्ष एवं भला हो,इस हेतु पृथ्वी वर भेजें । तदुपरांत (पृथ्वीपर ) विविध स्थानोंपर देवताओं ने अपने-अपने स्थान बनाए। इसी क्रम से ज्ञान की देवी सरस्वती ने जो स्थान पसंद किया,वह कश्मीर है । अत: कश्मीर का नाम शारदा देश भी है ।भारतीय संस्कृति में हिंदू प्रतिदिन शारदादेवी के श्लोक का पठन करते समय कहते हैं,

नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनी ।
त्वामहं प्रार्थयो नित्यं विद्यादानं च देहि मे ।।

अर्थ : हे कश्मीरवासिनी सरस्वती देवी,आपको मेरा प्रणाम । आप हमें ज्ञान दें,यह मेरी आपसे नित्य प्रार्थना है ।

वर्तमान में कश्मीर स्थित यह शारदापीठ पाकिस्तान व्याप्त कश्मीर में है, क्या इस श्लोक का पठन करने वाले यह बात जानते हैं ? प्रार्थना में श्री शारदादेवी के जिस स्थान का हम निर्देश करते हैं,अब उसका पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है,तथा वहां जाने पर हिंदुओं को पापस्थान से (पाकिस्तानसे ) प्रतिबंध किया जाता है, यह बडा क्लेशदायी है ।

(चित्र POK स्थित शारदापीठ)

ध्यान रखें,हम सरस्वतीपुत्र अर्थात ज्ञान के उपासक हैं । अपना शारदापीठ पुन: भारतभूमि ज्ञान की धरोहर बनाने हेतु हमें अपना कर्तव्य करना है । कश्मीर का पौराणिक इतिहास है।

कश्मीरकी स्थापना करनेवाले कश्यप ऋषि !

कश्यप ऋषि के नामसे इस भूभाग को ‘कश्मीर’ नाम प्राप्त हुआ । असुरों का नाश कर सज्जनों को अभय देने हेतु कश्यप ऋषि ने कश्मीर उत्पन्न किया । भारत के सारे क्षेत्रों से सुसंस्कृत तथा सुविद्य लोगों को वहां बसने का आमंत्रण देकर महर्षि कश्यप ने यह प्रदेश बसाया है ।

कश्मीरभूमि शिवभक्तों हेतु ही है !

महाभारत के युद्ध में सारे राजाओंने धर्मयुद्ध में हिस्सा लिया;किंतु कश्मीर के राजा गोकर्ण ने उसमें हिस्सा नहीं लिया । तब श्रीकृष्णने उस अधर्मीका वध किया तथा उसके स्थानपर उसकी पत्नी यशोमती का अभिषेक किया । इस प्रकार विश्वमें पहली बार एक महिला को शासनकर्ता बनाया गया तथा उसका आरंभ भी कश्मी से ही हुआ । उसका अभिषेक करते समय स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया कि कश्मीर की भूमि साक्षात पार्वती का रूप है । इस भूमि पर केवल शिवतत्त्व प्राप्त करने हेतु प्रयत्नरत रहनेवालोंको ही राज करने का अधिकार है । जो शिवतत्त्वकी दिशामें अर्थात धर्म की दिशा में प्रयास नहीं करते,उन्हें इस भूमि पर रहने का कोई अधिकार नहीं ।आज के कश्मीर में अधर्मी अथवा असुर कौन हैं,तथा शिव प्रेमी कौन हैं, सूज्ञ व्यक्तियों को यह अलगसे बताने की आवश्यकता नहीं !

कश्मीरी संस्कृतिकी भारतीयता !

कश्मीरका निर्देश हिंदू धर्मके अनेक प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमें दिखता है । ‘शक्ति-संगमतंत्र’ ग्रंथमें कश्मीरकी व्याप्ति आगे दिए अनुसार है ।

शारदामठमारभ्य कुडःकुमाद्रितटान्तकम् ।
तावत्काश्मीरदेशः स्यात् पन्चाशद्योजानात्मकः ।।

अर्थ : शारदा मठसे केशरके पर्वत तक ५० योजन(१ योजन ४ कोस) विस्तृत भूभाग कश्मीर देश है । महाभारत में इसका निर्देश ‘कश्मीरमंडल’ है । 
(भीष्म. ९.५३)

भगवान श्रीकृष्ण तथा भगवान बुद्ध इन दो महात्माओं ने कश्मीर में रहकर सम्मान प्रदान किया है । युधिष्ठिर के राज्याभिषेकमें कश्मीर का राजा गोनंद उपस्थित था । इससे कश्मीर हिंदू संस्कृतिसे एकरूप है, यह बात आसानीसे समझमें आती है ।

इ.स. पूर्व २७३-२३२ की इस कालावधि में सम्राट अशोक ने श्रीनगरी राजधानी की स्थापना की । यही श्रीनगर है ! आज जहां श्रीनगर हवाई अड्डा है, उसके बाजू में सम्राट अशोक का पोता दामोदर का विशाल प्रासाद (भवन) था । कश्मीर स्थित सारे स्थानों के नाम परिवर्तन किए गए अथवा उनका इस्लामीकरण किया गया; किंतु आज भी श्रीनगरका नाम परिवर्तन नहीं कर सके, यह सत्य ध्यानमें रखें ! 

जिस कश्मीरकी राजधानी ही श्रीनगर है, वह राज्य अपना हिंदुत्व कैसे छुपा सकता है ? ख्रिस्त जन्मपूर्व ३००० वर्ष कश्मीर का अस्तित्व था,ऐसा पुरातत्वीय आधार दिया जाता है । उस समय इस्लाम का कोई प्रतिनिधि अस्तित्व़ में नहीं था; किंतु ओमर का कोई पूर्वज निश्चित ही उस समय कश्मीर में रहता होगा । यदि उसे पूछा जाए,तो कश्मीर भारत में कब का विलय हो गया,ऐसा वह बताएगा ।

धार्मिकदृष्टिसे

१. हिंदू संस्कृति में १६ संस्कारों का विशेष महत्त्व है । जो उपनयन संस्कार करते हैं, वे उसके पश्चात बच्चे को सात कदम उत्तर की दिशा में,अर्थात कश्मीर की दिशा में चलने हेतु कहते हैं । इससे हिंदू संस्कारों की दृष्टिसे कश्मीर का महत्त्व ध्यान में आएगा ।

२. हिंदू संस्कृति, मंदिर संस्कृति है । संपूर्ण कश्मीर घाटी एक समय भव्य दिव्य तथा ऐश्वर्यशाली मंदिरों हेतु सुप्रसिद्ध था । इस्लामी कुदृष्टि पडनेसे आज सर्वत्र इन मंदिरोंके भग्नावशेष ही देखने को मिलते हैं । कश्मीरके गरूरा गांव में ‘जियान मातन’ नाम का दैवी तालाब था । इस तालाब के किनारे ६०० वर्ष पूर्व ७ मंदिर थे । 

सिकंदर भूशिकन नामके काश्मीर के मुसलमान राजा ने उनमें से ६ मंदिर गिराए । सातवां मंदिर गिराने की सिद्धता में था कि उस तालाब से खून बहने लगा । इस घटना से सिकंदर भूशिकन आश्चर्यचकित हुआ तथा घबराकर वहां से भाग गया । इस प्रकार उस क्रूरकर्मीके चंगुल से सातवा मंदिर मुक्त हुआ,जो आज भी विद्यमान है । यह मंदिर आज क्यों खडा है ? कश्मीर हिंदू संस्कृति है,इसकी पहचान बताने हेतु ही !

अध्यात्मिकदृष्टि से

१. श्रीविष्णु-लक्ष्मी एवं शारदादेवी एक साथ कभी भी नहीं रहतीं, ऐसा कहा जाता है; किंतु केवल कश्मीर में ही लक्ष्मी एवं शारदादेवी एकसाथ रहती आई हैं । यहां एक स्थानपर शारदाका तथा दूसरे स्थानपर श्रीलक्ष्मीका स्थान है ।

२. कश्मीरकी नागपूजक संस्कृति : 
नागपूजन हिंदू धर्मका अविभाज्य अंग है । कश्मीरमें प्राचीन कालसे नागपूजा प्रचलित है । अत: अनेक तालाब तथा झरनोंको नागदेवताओं के नाम प्राप्त हुए हैं । उदाहरण,नीलनाग,अनंतनाग,वासुकीनाग, तक्षकनाग आदि । नाग उसके संरक्षकदेवता थे । 
अबुल फजलने आईने अकबरीमें कहा है कि उस क्षेत्रमें लगभग सातसौ स्थान पर नाग की आकृतियां खोदी हुई दिखती हैं । विष्णु ने वासुकीनाग को सपरिवार यहां रहने की आज्ञा दी थी तथा यहां उसे कोई मारेगा नहीं,ऐसा वचन भी दिया था । क्या अरबस्थान में नागपूजन होता है ?वहां तो मू्र्तिपूजा भी नहीं होती, नाग की आकृतियां खोदनेका प्रश्न ही नहीं उठता !

सांस्कृतिकदृष्टिसे

प्राचीन कालसे कश्मीरमें उच्च संस्कृतिकी 
देखभाल होती आ रही है । 
विद्या एवं कलाओंका उत्कर्ष वहां दो सहस्र 
वर्षों से चला आ रहा है ।

१. संस्कृत भाषा हिंदू संस्कृतिका केंद्रबिंदू है । इस देववाणीमें सब धार्मिक विधियोंकी रचना हुई है । ये सारी धार्मिक विधियां कश्मीर से केरल तक केवल संस्कृत भाषामें ही पठन की जाती हैं । इससे कश्मीरका केवल केरलसे ही नहीं, अपितु सारे भारतवर्षसे भाषिक,सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंध समझमें आएगा ।

२. क्षेमेंद्र,मम्मट,अभिनवगुप्त,रुद्रट,कल्हण जैसे पंडितोंने अनेक विद्वत्तापूर्ण संस्कृत ग्रंथों की रचना की । धर्म तथा तत्त्वज्ञानके क्षेत्रोंमें कश्मीरी लोगोंने प्रशंसनीय कार्य किया था । पंचतंत्र,यह सुबोध देनेवाला हिंदू संस्कृति का ग्रंथ कश्मीरमें लिखा गया, यह बात कितने लोग जानते हैं ?

३. कुछ सहस्र वर्ष कश्मीर संस्कृत भाषा एवं विद्या का सबसे बडा तथा श्रेष्ठ अध्ययन केंद्र था ।
दसवें शतकतक भारतके सारे क्षेत्रोंसे छात्र अध्ययन हेतु वहां जाते थे 

तत्त्वज्ञान,धर्म,वैद्यक,ज्योतिर्शास्त्र,शिल्प,अभियांत्रिकी,चित्रकला,संगीत,नृत्य आदि अनेक विषयोंमें कश्मीर निष्णात था । हिंदुओंके सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक ग्रंथोंमें उनका अभिमानपूर्ण निर्देश है; किंतु आज इस गौरवशाली इतिहास को भीषण एवं प्रचंड वर्तमान ने पोंछ दिया है । हमें यह परिस्थिति परिवर्तन करनी है ।

४. ललितादित्य,अवंतिवर्मा,यशस्कर,हर्ष इन राजाओंने अनेक विद्वानों तथा कलाकारों को आश्रय देकर संस्कृतिके विकासमें सहयोग लिया । अनेक भव्य सुंदर मंदिर निमार्ण कर शिल्पकलाके स्मारक बनाकर रखे हैं ।

५. ‘प्रत्यभिज्ञादर्शन’ नामक एक नया दर्शन कश्मीर में ही उत्पन्न हुआ । अत: वह ‘काश्मीरीय’ नामसे प्रसिद्ध हुआ । वसुगुप्त (इ.स. का ८ वा शतक) कश्मीरी महापंडित इस दर्शनके मूल प्रवर्तक हैं ।

६. कश्मीरी क्रियापदमें भारतीय आर्य विशेषताएं स्पष्ट रूपसे समझमें आती हैं । कश्मीरी साहित्यका विकास भी उसकी भारतीय आर्य परंपराका निर्देशक है । यह भाषा अरबी अथवा जंगली उर्दू से उत्पन्न नहीं है, अपितु देववाणी संस्कृतकी कन्या है,यह ध्यानमें रखें !

नैसर्गिकदृष्टिसे

१. भारतका नंदनवन : कालिदासने कश्मीर अर्थात दूसरा स्वर्ग ही है,ऐसा लिखकर रखा है । पृथ्वीपर कैलास सर्वोत्तम स्थान,कैलासपर हिमालय सर्वोत्तम स्थान तथा हिमालयमें कश्मीर सर्वोत्तम स्थान,इतिहासकार कल्हणने कश्मीरका ऐसा ही वर्णन लिखकर रखा है ।

२. सर वाल्टर लॉरेन्सने कहा है कि एक समय काश्मीर में इतनी समृद्धि तथा निरामयता थी कि वहांकी स्त्रियां सृजन शीलतामें जैसे भूमि से स्पर्धा करती थीं । भूमि जैसे सकस धानसंपदा देती है, वहा की स्त्रियां वैसी ही सुदृढ संततिको जनम देती थीं । किंतु आज क्या हो रहा है ? उसी कश्मीर घाटीमें ३० वर्षकी इन महिलाओंकी माहवारी बंद हो रही है । यह सब दुर्भाग्यपूर्ण है !

स्त्रियोंको राज्यकर्ताका पद देनेकी परंपरा 
देनेवाला कश्मीर !

दिद्दा,सुगंधा,सूर्यमती जैसी अनेक कर्तव्यनिष्ठ राज्यकर्ता स्त्रियां भी कश्मीरके इतिहास में प्रसिद्ध हुर्इं । उन्होंने बडी कुशलतासे राजकारोबार किया तथा प्रजाको सुखी रखा ।

पूरे विश्वमें हिंदू धर्मप्रचारक भेजनेवाला देश !

सम्राट कनिष्कके राजमें विद्वान वसुमित्र की अध्यक्षतामें एक विशाल धर्मपरिषद आयोजित की गई थी । भारतके कोने-कोनेसे ५०० धर्मपंडित वहां नीती नियमोंका विचार-विमर्श करने हेतु गए थे । परिषद संपन्न होनेके पश्चात वहींसे युवा धर्मपंडित तिब्बत,चीन एवं मध्य एशिया गए तथा उन्होंने हिंदू दर्शनके सत्यज्ञान का प्रसार किया । चीनमें भारतके अन्य क्षेत्रोंसे जितने धर्म प्रसारक गए,उससे अधिक धर्मप्रसारक केवल कश्मीरसे गए हैं,एक समय उस क्षेत्रमें ऐसा अभिमानसे कहा जाता था ।

कश्मीरी हिंदुओं का स्वभूमि से विस्थापन, धोखे की घंटी !

एक समय सुंदरताकी धरोहरके रूप में भारत की प्रतिष्ठामें सम्मानका सिरपेंच धारण करनेवाला कश्मीर आज आतंकवादियों की कार्यवाहियों का केंद्र बन गया है । कश्मीर का वर्तमान राजनैतिक,सामाजिक एवं शैक्षणिक जीवन देखें, तो 68 वर्ष स्वतंत्रता का उपभोग लेनेवाले भारत की दृष्टिसे कश्मीर एक कलंक ही होगा ।

अतीत की जो बातें अपने सामने आती रहती हैं, उन्हें सुनकर भी अनसुना करना, समझकर भी नासमझ बनना, तथा देखकर भी अनदेखा करना, इसके जैसा दूसरा भ्रम नहीं होगा । १९ जनवरी १९९० को संपूर्ण कश्मीरसे हिंदू निकल जाएं, स्थान-स्थानपर ऐसा आदेश दिया गया । खुले आम कहा गया, समाचारपत्रोंमें आवेदन दिए गए, और पूरे हिंदू समाजको वहांसे निकल जाना पडा । 

उनके सामने तीन पर्याय थे । एकतो धर्म बदलें,जिहादमें सम्मिलित हों, अथवा वहांसे चले जाएं । उन हिंदुओंने बहुत बडा त्याग किया । धर्म बचाने हेतु अपनी भूमि,सम्पत्ति,अपनी यादें,बचपन,सारे मृदु (नाजुक) धागे अपने हाथोंसे तोडकर ये लोग दूसरे स्थानपर जाकर रहे ।

हिंदू धर्म जीवित रखनेका दायित्व भाग्य का नहीं !

अनेक कश्मीरी हिंदुओंने बताया, १९९० में जब यह सब हुआ, उससे पूर्व यदि मुझे कोई बताता कि २० वर्ष पश्चात आपको यह सब छोडकर जाना पडेगा, तो उसका विश्वास कभी भी न करता; किंतु २० वर्ष पश्चात वह वास्तविकता हमारी आंखों के सामने प्रत्यक्ष उपस्थित थी । यदि हम कुछ न करें,तो कुछ वर्ष पश्चात यह वास्तविकता हमारे सामने उपस्थित होगी, इस विषयमें मेरे मनमें तिलमात्र संदेह नहीं; क्योंकि यह विधिका विधान है । 

हम यदि केवल अपने लिए जीवन जीकर हिंदू धर्म हेतु कुछ भी नहीं करेंगे, तो हिंदू धर्म जीवित रखनेका दायित्व ईश्वरपर नहीं । ईश्वरका नियम है कि जो अपनी जडें दृढ पकडकर खडा होता है,वही टिक पाता है । जो अपनी जडें दृढतासे पकडकर खडा नहीं होता, उसे अस्तित्वकाकोई अधिकार नहीं । हम उस हेतु क्या प्रयास करनेवाले हैं, यही महत्त्वपूर्ण बात है ।

हिंदू धर्म,धर्मीय तथा राष्ट्रकी रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा करें !

अपने सामने आए शत्रु शस्त्रोंसे सज्ज हैं, उनके पास आर्थिक सामर्थ्य है, उनकी तरफ प्रसारमाध्यम हैं, तथा सबकुछ उनके अनुकूल है । अत: कोई छोटा कृत्य कर अल्पसंतुष्ट रहने का कोई अर्थ नहीं है । हमें सहस्रों हाथोंसे,सहस्रों मुखोंसे कार्य करने हैं, तथा यह कार्य करनेका समय यही है । यदि यह आज नहीं किया,कल करनेका मन किया, तो कुछ उपयोग नहीं होगा, यह अच्छी तरह जान लें ।

sanskar

महर्षि दधीचि

योऽध्रुवेणात्मना नारायण न धर्मं न यशः पुमान्।
ईहेत भूतदया स शोच्यः स्थावरैरपि ।।
(श्रीमद्भा○ 6/10/8)

'जो पुरुष नाशवान शरीर के द्वारा समर्थ होकर भी प्राणियों पर दया करके धर्म या यश प्राप्त करने की इच्छा, चेष्टा, प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्ष-पर्वतादि के द्वारा भी शोचनीय है ; क्योंकि वन-पर्वतादि भी अपने शरीर के द्वारा प्राणियों की सेवा करते हैं ।'

देवराज इन्द्र ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि 'जो कोई अश्विनी कुमारों को ब्रहमविद्या का उपदेश करेगा, उसका मस्तक मैं वज्र से काट डालूँगा।' वैद्य होने के कारण अश्विनीकुमारों को देवराज हीन मानते थे ।अश्विनी कुमारों ने महर्षि दधीचि से ब्रह्मविद्या का उपदेश करने की प्रार्थना की।एक जिज्ञासु अधिकारी प्रार्थना करे तो उसे किसी भय या लोभवश उपदेश न देना धर्म नहीं है।महर्षि ने उपदेश देना स्वीकार कर लिया ।अश्विनी कुमारों ने ऋषि का मस्तक काटकर औषध द्वारा सुरक्षित करके अलग रख दिया और उनके सिर पर घोड़े का मस्तक लगा दिया ।इसी घोड़े के मस्तक से उन्होंने ब्रह्मविद्या का उपदेश किया ।इन्द्र ने वज्र से जब ऋषि का वह मस्तक काट दिया, तब अश्विनी कुमारों ने उनका पहला सिर उनके धड़ से लगाकर उन्हें जीवित कर दिया ।इस प्रकार ब्रह्मपुत्र अथर्वा ऋषि के पुत्र ये दधीचि जी घोड़े का सिर लगने से अश्वसिरा भी कहे जाते हैं ।
जब त्वष्टा के अग्निकुण्ड से उत्पन्न होकर वृत्रासुर ने इन्द्र के स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं ने अपने जिन अस्त्रों से उस पर आघात किया, उन अस्त्र-शस्त्रों को भी वह असुर निगल गया, तब निरस्त्र देवता बहुत डरे।कोई और उपाय न देखकर देवता ब्रह्मा जी की शरण में गये ।ब्रह्मा जी ने भगवान की स्तुति की।भगवान ने प्रकट होकर दर्शन दिया और बताया ---- 'महर्षि दधीचि की हड्डियाँ उग्र तपस्या के प्रभाव से दृढ़ तथा तेजस्विनी हो गयी हैं ।उन हड्डियों से वज्र बने, तभी इन्द्र उस वज्र से वृत्र को मार सकते हैं ।महर्षि दधीचि मेरे आश्रित हैं, अतः उन्हें बलपूर्वक कोई मार नहीं सकता ।तुम लोग उनसे जाकर याचना करो।माँगने पर वे तुम्हें अपना शरीर दे देंगे ।'
देवता साभ्रमती तथा चन्द्रभागा के संगम पर दधीचि ऋषि के आश्रम में गये ।उन्होंने नाना प्रकार से स्तुति करके ऋषि को सन्तुष्ट किया और उनसे उनकी हड्डियाँ माँगीं।महर्षि ने कहा कि उनकी इच्छा तीर्थ यात्रा करने की थी ।इन्द्र ने नैमिषारण्य में सब तीर्थों का आवाहन किया ।वहाँ स्नान करके दधीचि जी आसन लगाकर बैठ गये।जिस इन्द्र ने उनका सिर काटना चाहा था, उन्हीं के लिए ऋषि ने अपनी हड्डियाँ देने में भी संकोच नहीं किया ।शरीर से उन्हें तनिक भी आसक्ति नहीं थी।एक न एक दिन तो शरीर छूटेगा ही।यह नश्वर देह किसी के भी उपयोग में आ जाय, इससे बड़ा और कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता ।महर्षि ने अपना चित्त भगवान में लगा दिया ।मन तथा प्राणों को हृदय में लीन करके वे शरीर से ऊपर उठ गये।जंगली गायों ने अपनी खुरदरी जीभों से महर्षि के शरीर को चाट चाटकर चमड़ा, मांसादि अलग कर दिया ।इन्द्र ने ऋषि की हड्डी ले ली।उसी हड्डी से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया और उस वज्र से इन्द्र ने वृत्र को मारा।इस प्रकार एक तपस्वी के अनुपम त्याग से इन्द्र की, देवलोक की वृत्र से रक्षा हुई।
(भक्त चरितांक)
(कल्याण -40)वो एक त्यागी ब्राह्मण था और मैं भी एक ब्राह्मण हूँ।

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मॉरीशस में भी  सनातन हिन्दू धर्म ...

विश्व के कई देशों में भारतीय मूल के लोग बसे हुए हैं !! अंग्रेजों ने गन्ने की खेती के लिए लगभग 200 वर्षों पूर्व लाखों भारतियों (अधिकांश बिहार एवं यूपी) को एक विशेष Agreement के तहत मजदूर बना कर ले जाया गया। इन्हें अपने देश भारत आने पर रोक था किन्तु उस Agreement के कारण धर्म ना परिवर्तन की स्व्तंत्रता थी। फलस्वरूप ये प्रवासी मॉरीशस में भी अपनी सनातन हिन्दू धर्म की पहचान को बनाये रख सके।
आम भारतियों के लिए ये "एग्रिमेंटिया" मजदूर थे जो कि कालान्तर में अपभ्रंश वश "गिरमिटिया" मजदूर कहलाने लगे। जहाँ-जहाँ भारतीय हिंदू हैं,वहाँ-वहाँ उनके देवी-देवता और देवालय।उनसे जुड़े व्रत-त्योहार भी उतनी ही श्रद्धा एवं उल्लास से मनाए जाते हैं।
शिव,शिवालय और शिवरात्रि की त्रयी इस कथन का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। अपने देश के पड़ोसी हिंदू राष्ट्र नेपाल से लेकर सुदूर मॉरीशस,सूरीनाम,गुयाना, त्रिनिदाद,फीजी इत्यादि देशों में शिवरात्रि का पर्व किसी न किसी रूप में उसी श्रद्धा से मनाया जाता है,जितनी श्रद्धा से अपने यहाँ मनाते हैं।
तेरहवाँ ज्योतिर्लिंग : मॉरीशसेश्वर
प्राय: बारह ज्योतिर्लिंगों की प्रतिष्ठा है। ये भारत में ही हैं लेकिन विश्व का तेरहवाँ शिव ज्योतिर्लिंग मॉरीशस में हैं। इस बात को कम ही लोग जानते हैं। मॉरीशस का प्रसिद्ध 'मॉरीशसेश्वर नाथ' नामक शिव मंदिर ही तेरहवाँ ज्योतिर्लिंग हैं। इसे हम मॉरीशस का केदारनाथ अथवा रामेश्वर कह सकते हैं।
यों तो मॉरीशस बहुत ही सुंदर द्वीप है। हिंद महासागर के हरित नील वर्णी जल में रखे चमकीले मोती-जैसा एक आकर्षक टापू। लेकिन वह इंद्रधनुषों का देश है और अपनी संस्कृति में वैविध्यपूर्ण। इसीलिए सांस्कृतिक अभिरुचि के अध्येताओं के लिए यह एक आश्चर्यजनक समाज है। विभिन्न धर्मों के लोग यहाँ निवास करते हैं। फिर भी वे रुचिपूर्वक कुल आबादी के ५२ प्रतिशत भारतीय समाज के त्योहारों में सम्मिलित होते हैं।इन त्योहारों में यहाँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण त्योहार है - शिवरात्रि।
आस्था का आयाम
प्राकृतिक झरनों,झीलों और सागर के विभिन्न रंगों ने मिलकर मॉरीशस को जो सुंदरता सौंपी हैं,उसको आस्था का आयाम देकर मनुष्य ने एक नया विस्तार तथा अर्थवत्ता दे दी है।
इसका सर्वोत्तम उदाहरण है यहाँ के परी-तालाब अथवा गंगा सरोवर के तट पर स्थित मॉरीशसेश्वरनाथ शिव-मंदिर। प्रतिवर्ष शिवरात्रि के पर्व पर हज़ारों की संख्या में मॉरीशसवासी गंगा सरोवर के तट पर आते हैं। शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। प्रतिमाएँ विसर्जित करते है और गंगा सरोवर का पवित्र जल श्रद्धापूर्वक अपने घरों को ले जाते हैं।
मॉरीशस की गंगा
ग्रैंड बेसिन में स्थित गंगा सरोवर वास्तव में एक सुरम्य प्राकृतिक झील है। इसे 'परी तालाब' भी कहा जाता है। लोग कहते हैं कि इस तालाब के बीच में जो धरती का टुकड़ा है,वहाँ परियों की नाट्यशाला थी। रोज़ रात को परियाँ यहाँ नृत्य करती थीं। एक ग्वाला उन परियों का नृत्य रातभर छिप-छिपकर देखता था। एक दिन वह सूर्योदय से पूर्व चुपचाप  घर नहीं लौट सका। परियों ने उसे देख लिया और वह पत्थर का हो गया।आज 'मुड़िया पहाड़' के रूप में मॉरीशस का जो सबसे महत्त्वपूर्ण पहाड़ दिखायी देता है,वह वही ग्वाला है।
इस पहाड़ की आकृति ठीक ऐसी है कि लगता है कोई मानव आकृति न जाने कब से यों ही पत्थर बनी बैठी हैं।
लेकिन यह 'परितालाब' अब 'गंगा सरोवर' है।लोगों का विश्वास है कि यहाँ गंगा का अवतरण हुआ था। यहाँ के वासियों के लिए यह झील ही गंगा है।अवतरण : दिव्य ज्योति का गंगा सरोवर के तट पर एक भव्य शिव-मंदिर बनाया गया है। 
इस मंदिर के साथ एक चमत्कारिक घटना
जुड़ी हुई है।
बताया जाता है कि 'मॉरीशसेश्वर नाथ शिव' की प्रतिष्ठापना समारोह के अवसर पर पाँचवे दिन २ मार्च १९८९ को शाम लगभग ५ बजे आकाश में घनघोर घटाएँ छा गईं। बिजली चमकने लगी तथा मूसलाधार बारिश होने लगी। मंदिर के गुंबद पर एक दिव्य ज्योति उतरी और त्रिशूल से होती हुई शिवलिंग में प्रवेश कर गई। यह सब एक क्षण में पलक झपकते ही हो गया।
तब जब कमांडिंग अफसर 'कलश' के निकट महाज्योति प्रज्ज्वलित करने जा रहे थे। उस क्षण में अचानक बिजली चली गई,किंतु मंदिर के २१ बल्ब तत्क्षण जगमगा उठे। जनसमूह की उपस्थिति में एक गंभीर,मनोहर और आनंदमयी ध्वनि उत्पन्न हुई।
त्रिशूल से जल टपकने लगा एवं तिलक के सामने रखे मखमली कपड़े पर किसी प्रौढ़ मनुष्य के दाहिने पैर का-सा चिह्न उभर आया। कुछ देर बाद यह पग-चिह्न हाथी के चेहरे में बदल गया। 'गंगा सरोवर' का जलस्तर अनपेक्षित स्तर तक बढ़ गया क्यों कि धारासार वर्षा लगभग एक घंटे से लगातार हो रही थी।
तालाब तक आनेवाली सड़कें पानी में डूब गयीं। मुख्य नदी में बाढ़ आ गई। यातायात रुक गया। एक घंटे बाद समूचा वातावरण प्रशांत,निरभ्र हो गया तथा गंगा सरोवर पर एक श्वेत कुहासे की चादर छा गई।संपूर्ण गंगा-सरोवर-- जैसे दिव्य अनुभूति से भर गया।
दिव्यता के प्रत्यक्षदर्शी
अभिषेक के अवसर पर घटित इस अभूतपूर्व घटना को अनेक धर्मों के श्रद्धालुओं ने देखा था।आठवें दिन सबके सामने गणेश की पूजा-आरती करते समय गणेश का प्रतिनिधित्व करनेवाले 'कलश' ने हाथी के चेहरेवाले गणेश भगवान का रूप ग्रहण कर लिया !शिवलिंग पर स्वत: ही नाग तथा स्वस्तिक के चिह्न उभर आए।
गंगा सरोवर नामक इस प्राकृतिक सुनील झील के तट पर कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर एक और शिव-मंदिर है। इसके ठीक सामने ऊँचाई पर बनाया गया है भक्त प्रवर हनुमान का मंदिर तथा तट पर राम-सीता का छोटा-सा मंदिर।मुख्य शिव मंदिर में गणेश,देवी-दुर्गा,नवगृह,आदि की सुंदर मूर्तियाँ हैं।
सांस्कृतिक निष्ठा
मॉरीशस में भारतीयों की संख्या लगभग १५० वर्ष पूर्व ब्रिटिशराज के समय बढ़नी शुरू हुई थी।भारत के विभिन्न प्रांतों से प्रवासी श्रमिक यहाँ लाए गए थे। कुछ ही लोग स्वेच्छा से आए थे,अधिकांश या तो जबरन लाए गए अथवा यहाँ की मिट्टी में सोने की खान होने का लालच देकर!
इन लोगों ने अपना घर-गाँव छोड़ा,किंतु अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी। कुछ लोग अपने धर्म के प्रति इतने जागरूक थे कि उन्होंने लिखित आश्वासन ले लिया था कि उनका धर्म न बदला जाए,और सच तो यह है कि ऐसे ही जागरूक अनपढ़ श्रमिकों ने अपनी धर्म-ध्वजा इस अजनबी द्वीप पर फहराई, जो आज भी उसी गौरव से फहरा रही है।
इसी धर्म-ध्वजा की छाया में प्रतिवर्ष मॉरीशस का शिवरात्रि राष्ट्रीय धार्मिक पर्व उसी उल्लासके साथ मनाया जाता है।  लोग व्रत रखते हैं,इस गंगा सरोवर का पवित्र जल अपने-अपने घरों को ले जाते हैं। कहा जाता है कि यह जल भी गंगा के समान शुद्ध है और महीनों तक खराब नहीं होता।
---#उषा_खुराना;;
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महाराणा प्रताप की इस #तलवार से उनकी ऊँचाई ; ताकत और दीर्ध शरीर की आप कल्पना कर सकते हैं |


example laghu -katha

 यही फर्क है .. हममें और दूसरों में ...
1994-95 में जब अमेरिकन शू ब्रांड 'रिबॉक' भारत में पैर जमाने की कोशिश कर रहा था . तब रिबॉक की प्लानिंग देश भर में 50 शोरूम खोलने की थी. रिबॉक इंडिया को पता था कि भारत में फिल्म स्टार और क्रिकेटर की पहुँच घर घर तक होती है इसलिये उन्होने रिबॉक के विज्ञापन के लिये पकड़ा .. तब के भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन को .
एक डिज़ाइनर आर्टिकल भी लांच किया गया अजहर के नाम पर . उस आर्टिकल पर मोहम्मद अजहरुद्दीन के हस्ताक्षर भी थे. आर्टिकल मार्केट में आया. उस पर अजहरुद्दीन के पूरे सिग्नेचर थे ..'मोहम्मद अजहरुद्दीन' और ये सिग्नेचर थे इनसोल पर मतलब जूते के अंदर जहाँ हम पैर डालते है .. बिल्कुल एड़ी के नीचे. इसका फोटो अखबार में छपते ही हंगामा हो गया. हैदराबाद के उर्दू अखबारों ने अज़हर को कोसते हुए आर्टिकल छाप दिये कि .. 'कैसे कोई मोहम्मद साहब का नाम जूते जैसी अपवित्र जगह पर लिख सकता है'. फौरन इस आर्टिकल को मार्केट से हटाने की माँग करते हुए और अज़हर से माफी माँगने की माँग पर प्रदर्शन शुरू हो गये .
अजहर ने फौरन सफाई दी कि..' मैंने कही ऑटोग्राफ नही किये और मुझसे बिना पूछे मेरा नाम इनसोल पर लिखा गया है . इसके लिये मैँ सबसे माफी माँगता हूं. रिबॉक ने भी वो इंसोल बदल दिये.
नाम तो नाम होता है .. जैसे दुर्गा किसी का भी नाम हो सकता है तो मोहम्मद अजहरुद्दीन भी . जब 1995 में मुसलमानों को दिक्कत हुई थी तब मैंने कहीं नही पढ़ा कि किसी ने उन्हें कट्टर या दकियानुसी बोला हो . ना किसी हिंदू ना और ना ही किसी मुस्लिम ने या किसी राजनीतिक दल ने ... तो वही नियम कायदे 'दुर्गा' पर भी लागू होते है .
एक मुसलमान होने के नाते भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान अजहरुद्दीन ने फौरन माफी माँग ली थी लेकिन दोगले और घटिया हिंदू ही दुर्गा का समर्थन कर रहे है और एस.दुर्गा नाम रखने वाले भी हिंदू ही है .. यही फर्क है .. हममें और दूसरों में .
Ashish Retarekar जी की कलम से 💐
श्री_गुरुजी_ने_चित्तौड़गढ़_के_गाइड_को_फटकारा -

"चुप रहो, बकवास बंद करो, जो राजपूत मूंछ के बाल के लिए प्राण न्यौछावर कर देते हैं, क्या वे अपनी रानी महारानी को दर्पण में दिखायेंगे ? "
बात तब की है जब तत्कालीन परम पूजनीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी चित्तौड़गढ़ दर्शन के लिए पधारे.
ज्ञातव्य है कि हिंदुत्व अभिमानी श्री गुरुजी सूक्ष्म दृष्टि के धनी थे. वे कहते थे कि यदि महाराणा प्रताप न होते तो छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रादुर्भाव ही नहीं होता.
दुर्ग दर्शन के समय प्रांत प्रचारक श्री ब्रह्मदेव जी, विभाग प्रचारक श्री लक्ष्मणसिंह जी शेखावत तथा उदयपुर के तृतीय वर्ष शिक्षित कार्यकर्ता श्री नारायण जी शर्मा श्री गुरु जी के साथ थे और दुर्ग के स्थान और घटनाओं का विवरण बता रहे थे.
महारानी पद्मिनी के जल प्रासाद को देखते समय एक गाइड बीच में कूद पड़ा और बोला कि इस शीशे में पद्मिनी को ख़िलजी को दिखाया गया था.
गाइड का ऐसा बोलना था कि श्री गुरु जी शांत गंभीर चेहरा आक्रोश से भर गया और और दकाल पड़े उस अयोग्य गाइड पर. बेचारा गाइड हक्का बक्का रह गया.
सब कार्यकर्ताओं को भी समझ में आ गया कि हिंदुत्व के गढ़ में भी हिंदू की आन बान को तोड़ मोड़ कर दिखाया जा रहा है और इसलिए हिन्दू के लिए कार्य कर रहे व्यक्ति को हिन्दू अस्मिता का शूक्ष्मता से विचार करना चाहिए.
- पूर्व संघ प्रचारक बाबा निरंजन नाथ अवधूत

Saturday, 25 November 2017


बताओ भला... जो लोग अपने मुर्दे को अनंतकाल तक जमीन में गाड़ कर रखते हों, जो पुनर्जन्म में विश्वास भी नहीं करते हों... वे "मोक्ष" की बात कर रहे हैं...

"पास्टर सलीम खान" द्वारा आयोजित कार्यक्रम में "आचार्य" विकास मैसी, पंजाब के सिखों को समझा रहे हैं कि मोक्ष क्या होता है... दिमाग चकरा गया न???

इतना वैचारिक घालमेल... इतनी धूर्तता... इतना झूठ... इतना दोगलापन... सब कुछ खुलेआम... कोई रोकटोक नहीं... "शर्म-निरपेक्षता" का इससे बेहतर उदाहरण भारत के अलावा और कहाँ मिलेगा??

sharab mat peena

https://www.facebook.com/khussbu/videos/1025767487567576/

Friday, 24 November 2017



जो पढ़ी थी कभी टाट-पट्टी वाले स्कूल में

आज वो बैठती है IAS की कुर्सी पर...
यूनिवर्सिटी टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट सतना की सुरभि गौतम को 2016 के सीविल सर्विसिज़ एग्ज़ाम में 50वीं रैंक हासिल हुई थी। इनकी 12वीं तक की पढ़ाई गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से हुई। सुरभि उन लोगों के लिए एक करारा जवाब हैं, जिन्हें या तो अपने हिंदी होने पर शर्म आती है या फिर जो हिंदी को बहुत गया गुज़रा समझते हैं, लेकिन सुरभि गर्व से कहती हैं कि उनकी पहली से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम स्कूल से हुई है।


IAS बनने का सपना सुरभि ने 10वीं क्लास से ही देखा शुरू कर दिया था। दसवीं में सुरभि को 93.4 प्रतिशत अंक मिले थे। सुरभि सतना के अमदरा गांव की रहने वाली हैं। पिता मैहर सिविल कोर्ट में वकील हैं और मां सुशीला गौतम शिक्षिका।
IAS अॉफिसर सुरभि गौतम ने वो सब कर दिखाया जो अंग्रेजी से पढ़ने वाले भी करते हैं। ज़िंदगी में कुछ भी बेहतर करने के लिए कभी भाषा रुकावट नहीं बनती, वो तो हमारे समाज ने खुद को भाषाओं की बेड़ियों में बांध रखा है। ये वहीं बेड़ियां हैं, जो कभी-कभी देश को दो हिस्सों में बांटती हैं, एक हिस्सा अंग्रेजी और दूसरा हिस्सा हिंदी!

किसी ने सही ही कहा, पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं। ऐसा ही कुछ हाल सतना के अमदरा गांव की बेटी सुरभि गौतम का भी है। सुरभि के पिता मैहर सिविल कोर्ट में वकील हैं और मां डॉ. सुशीला गौतम अमदरा हायर सैकेंड्री स्कूल में शिक्षिका हैं। सुरभि बचपन से ही पढ़ने में मेधावी रही हैं। हाईस्कूल में सुरभि को 93.4 प्रतिशत अंक मिले थे। यही वो नंबर थे, जिन्होंने सुरभि के सपनों और सफलता की नींव रखी। इन्हीं नंबरों के बाद से सुरभि ने कलेक्टर बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था। इनकी सफलता ने उन सभी एशो आरामों को खारिज किया है, जिनकी मदद से बड़े-बड़े पद हासिल किये जाते हैं।

सुरभि एक छोटे से गांव अमदरा की रहने वाली हैं। अमदरा से ही उन्होंने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई की। 12वीं तक वो एक ऐसे स्कूल में पढ़ीं, जिस स्कूल में मूलभूत जरूरतों का गहरा अभाव था। वहां न तो अच्छे टीचर थे और न ही पढ़ाई लिखाई की अच्छी व्यवस्था। किताबें समय पर नहीं मिलती थीं। सुरभि के गांव में बिजली पानी की अच्छी व्यवस्था नहीं थी। बचपन के दिनों में सुरभि को लाटेन जला कर रात में पढ़ाई करनी पड़ती थी।

बारहवीं के बाद सुरभि ने स्टेट इंजीनियरिंग का एंट्रेंस एग्ज़ाम दिया। एंट्रेंस एग्ज़ाम में उनके काफी अच्छे नंबर आये, जिससे वो शहर के किसी भी सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए मान्य हो गईं। सुरभि ने भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन्स में इंजीनियरिंगकी। यहां भी उन्होंने टॉप करने की आदत नहीं छोड़ी और गोल्ड मेडल हासिल करने के साथ-साथ यूनिवर्सिटी टॉप कर ली।

कॉलेज के बाद सुरभि ने BARC (एक साल न्यूक्लियर साईंटिस्ट के तौर पर जुड़ी रहीं) , GATE, ISRO (अॉल इंडिया दूसरा स्थान मिला), SAIL (इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर उन्हें कॉल भी आया) , MPPSC PRE, SSC LGL, दिल्ली पुलिस और FCI की परीक्षाएं अच्छे नंबरों से पास कीं। 2013 के IES एग्ज़ाम में सुरभि को अॉल इंडिया फर्स्ट रैंक मिली और इन सबके बाद 2016 के IAS एग्ज़ाम में उन्हें अॉल इंडिया 50वीं रैंक मिली। सुरभि की प्रतिभा सचमुच बहुत दुर्लभ हैं। उन्होंने हर परीक्षा फर्स्ट अटैंप्ट में ही पास की है, वो भी अच्छे नंबरों से।

सुरभि ने कभी किसी भी विषय के लिए ट्यूशन नहीं लिया। उन्होंने सेल्फ स्टडी से सबकुछ हासिल किया। न तो उन्हें सही समय पर किताबें मिलती थीं और न ही अच्छा स्कूल मिला, लेकिन उन्होंने वो कर दिखा, जो अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी नहीं कर पाते। सुरभि कहती हैं, "मेरा स्कूल और वहां का एजुकेशन सिस्टम काफी खराब था। स्कूल में कोई पढ़ाई नहीं होती थी, तो मेरी पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी मुझ पर और मेरे पेरेंट्स पर ही थी। मैं हमेशा सोचती थी, कि मुझे भी अच्छा स्कूल मिलता, काश मेरे स्कूल की भी एक बस होती, मैं भी यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल जाती, लेकिन उसके लिए मैं अफसोस नहीं करती, क्योंकि मेरे अभावों ने ही मुझे एंबिशियस बना दिया और मैं हर फील्ड में सबसे अच्छा करने की कोशिश करती थी।"गांव की टॉपर सुरभि जब स्कूल के बाद कॉलेज में आईं तो उसके सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं।

गांव और शहर दोनों जगहों के माहौल में एक बड़ा अंतर था। सुरभि को जो सबसे बड़ी समस्या फेस करनी पड़ी, वो थी इंग्लिश। सुरभि की इंग्लिश काफी कमज़ोर थी। उनके कॉलेज में अधिकतर बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूलों से थे और सुरभि हिंदी मीडियम से थीं। सुरभि के साथ वहीं सब हो रहा था, जो हिंदी मीडियम बच्चों के साथ होता है। लेकिन वो उन आम बच्चों जैसी तो थीं नहीं, कि उनके इंग्लिश हउव्वा जैसा हो। उन्होंने उस पर भी जीत हासिल कर ली। सुरभि कहती हैं, "मैं गांव में अपनी क्लास में पहली सीट पर बैठने वाली लड़की थी, लेकिन जब शहर में आई तो इंग्लिश न आने की वजह से सबसे पीछे बैठती थी। मुझे बहुत बुरा लगता था। मैं सोचती थी, मैं कहां आ गई। यहां तो मुझे कोई जानता ही नहीं। मेरे लिए ये सबकुछ बहुत अजीब था, जिसके चलते मैंने खूब मेहनत की। बाकि सबजेक्ट्स के साथ साथ इंग्लिश पर भी अपनी पकड़ बनाई और फर्स्ट सेमिस्टर में ही यूनिवर्सिटी टॉप कर ली और मुझे चांसलर अवॉर्ड मिल गया। इंग्लिश सुधारने के लिए मैंने बहुत ज्यादा मेहनत की। किताबों से स्पेलिंग ढूंढ-ढूंढ कर सीखती थी। रोज़ अंग्रेजी के नये 5-10 शब्द लिखकर दिवारों पर चिपका लेती थी और सुबह उठकर उन्हें देखती थी। सोते समय उन्हें देखती थी और उन शब्दों को उठाकर खुद से बातें करती थी। कोई भी नया अंग्रेज़ी का शब्द सुनने के बाद मन में बार बार रिवाईज़ करती थी। अपनी इन्हीं कोशिशों से मैंने धीरे-धीरे अपनी इंग्लिश सीखी और उसे ग्रामिटिकली इंप्रूव भी किया।"

अंग्रेजी के सीखने की ललक सुरभि के ज़ेहन में ऐसी सवार हुई, कि कॉलेज के दिनों से लेकर अब तक उनके सपने हिंदी में आने की बजाय अंग्रेजी में आते हैं। उनकी बातों पर जायें, तो उनके सपनों में लोग हिंदी में नहीं अंग्रेजी में बात करते हैं। कॉलेज के दिनों में सुरभि बाकी के बच्चों की तरह नहीं थी। वो न तो फिल्में देखने जाती थीं और न ही घूमने-फिरने में अपना वक़्त ज़ाया करती थीं। ये सबके करने के लिए उनके सामने पूरी एक उम्र पड़ी थी। पहले वो कुछ बन जाना चाहती थीं। वो जानती थीं, कि वो एक छोटे से गांव से आई हैं और इस तरह कुछ करने का मौका उन्हें अपनी मेहनत के बल पर मिला था। उस मौके को वो गंवाना नहीं चाहती थीं। सुरभि ने कॉलेज के दिनों दोस्तों के साथ समय गंवाने की बजाय अपनी पर्सनेलिटी, अपने बायोडेटा और मार्क्स इंप्रूवमेंट पर फोकस किया।



कॉलेज के बाद सुरभि का पहला प्लेसमेंट TCS (टाटा कंसलटेन्सी) में हुआ था लेकिन उन्होंने उस नौकरी को जॉइन नहीं किया, क्योंकि उनकी दुनिया और सपने इससे भी बड़े थे। कॉलेज के बाद ही 2द साल की उम्र में सुरभि ने BARC की परिक्षा दी और इंटरव्यू निकाल लिया। BARC का इंटरव्यू काफी मुश्किल होता है। इस इंटरव्यू को क्लियर करने के बाद सुरभि का कॉन्फिडेंस काफी बढ़ा। ट्रेनिंग के दौरान ही सुरभि ने IAS की तैयारी की। उन्होंने अपनी सिविल सर्विसिज़ की पूरी तैयारी सेल्फ स्टडीज़ से की। बिना किसी की मदद लिए, वो भी इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग जैसा मुश्किल सब्जेक्ट चुन कर। सुरभि अपना 25वां जन्मदिन मसूरी की LBSNAA (लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकेडमी अॉफ एडमिनिस्ट्रेशन) में मनाना चाहती थीं और उनकी चाहत साकार भी हो गई। वो कहती हैं, कि "सपने देखिये, सपने देखने के पैसे नहीं लगते और बड़े सपने देखिये। उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करिये। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यदि मैं आगे बढ़ सकती हूं, इतने सारे एग्ज़ाम्स क्लियर कर सकती हूं, टॉप कर सकती हूं, तो आप क्यों नहीं? सपने सच होते हैं, बस आपको उन पर भरोसा होना चाहिए।"