Saturday, 22 September 2018

भारतीय इतिहास में अंग्रेजी ​हुकूमत के खिलाफ पहला विद्रोह 1857 है, मगर जब हम आदिवासियों के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं यह विद्रोह 1771 में ही तिलका मांझी ने शुरू कर दिया था।

वहीं 30 जून 1855 को संताल आदिवासियों ने सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो के नेतृत्व में साहेबगंज जिले के भोगनाडीह में 400 गांव के 40,000 आदिवासियों ने अंग्रेजों को मालगुजारी देने से साफ इंकार कर दिया। इस दैरान सिदो ने कहा था — अब समय आ गया है फिरं‍गियों को खदेड़ने का। इसके लिए “करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो” का नारा दिया गया था। अंग्रेजों ने तुरंत इन चार भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया। गिरफ्तार करने आये दारोगा को संताल आंदोलनकारियों ने गर्दन काटकर हत्या कर दी। इसके बाद संताल परगना के सरकारी अधिकारियों में आतंक छा गया।

बताया जाता है जब कभी भी आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और उनके जल, जंगल जमीन को विघटित करने का प्रयास किया गया है, प्रतिरोध की चिंगारी भड़क उठी। 30 जून 1855 का हूल इसी कड़ी का एक हिस्सा है। महाजनों, जमींदारों और अंग्रेजी शासन द्वारा जब आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया गया तब उनके खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा इतना परवान चढ़ा कि इस लड़ाई में सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो सहित लगभग 20 हज़ार संतालो ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। इसके पूर्व गोड्डा सब-डिवीजन के सुंदर पहाड़ी प्रखंड की बारीखटंगा गांव का बाजला नामक संताल युवक की विद्रोह के आरोप में अंग्रेजी शासन द्वारा हत्या कर दी गई थी। अंग्रेज इतिहासकार विलियम विल्सन हंटर ने अपनी किताब ‘द एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है कि अंग्रेज का कोई भी सिपाही ऐसा नहीं था जो आदिवासियों के बलिदान को लेकर शर्मिंदा न हुआ हो। अपने कुछ विश्वस्त साथियों के विश्वासघात के कारण सिदो और कान्हू को पकड़ लिया गया और भोगनाडीह गांव में सबके सामने एक पेड़ पर टांगकर फांसी दे दी गयी। 20 हज़ार संतालों ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी थी।

यह भी पढ़ें : फोटो फीचर : तिलका मांझी (11 फरवरी 1750 – 13 जनवरी 1785)

अंग्रेजों ने प्रशासन की पकड़ कमजोर होते देख आंदोलन को कुचलने के लिए सेना को मैदान में उतारा और मार्शल लॉ लगाया गया। हजारों संताल आदिवासियों को गिरफ्तारी किया गया, लाठियां चली, गोलियां चलायी गयी। यह लड़ाई तब तक जारी रही, जब तक अंतिम आंदोलनकारी जिंदा रहा।


सिदो-कान्हू की पेंटिंग

इसके पूर्व 1771 से 1784 तक तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा। पहाड़िया लड़ाकों में सरदार रमना अहाड़ी और अमड़ापाड़ा प्रखंड (पाकुड़, संताल परगना) के आमगाछी पहाड़ निवासी करिया पुजहर और सिंगारसी पहाड़ निवासी जबरा पहाड़िया भारत के आदिविद्रोही हैं। दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। इन पहाड़िया लड़ाकों में सबसे लोकप्रिय आदि विद्रोही जबरा या जौराह पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हैं। इन्होंने 1778 ई. में पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़ कर कैंप को मुक्त कराया। 1784 में जबरा ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में जबरा की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ जिसमें कई लड़ाके मारे गए और जबरा को गिरफ्तार कर लिया गया। कहते हैं उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। पर मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह तिलका मांझी जीवित था। बतया जाता है कि खून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल-लाल आंखें ब्रितानी राज को डरा रही थीं। अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली। हजारों की भीड़ के सामने जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। तारीख थी संभवतः 13 जनवरी 1785। बाद में आजादी के हजारों लड़ाकों ने जबरा पहाड़िया का अनुसरण किया और फांसी पर चढ़ते हुए जो गीत गाए – हांसी-हांसी चढ़बो फांसी …! – वह आज भी हमें इस आदिविद्रोही की याद दिलाते हैं।

तिलका मांझी संताल थे या पहाड़िया इसे लेकर विवाद है। आम तौर पर तिलका मांझी को मूर्म गोत्र का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। परंतु तिलका के संताल होने का कोई ऐतिहासिक दस्तावेज और लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है। वहीं, ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार संताल आदिवासी समुदाय के लोग 1770 के अकाल के कारण 1790 के बाद संताल परगना की तरफ आए और बसे।


सिदो-कान्हू की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी किया गया डाक टिकट

‘द एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’, 1868 के पहले खंड(पृष्ठ संख्या 219-227) में सर विलियम विल्सर हंटन ने साफ लिखा है कि संताल लोग बीरभूम से आज के सिंहभूम की तरफ निवास करते थे। 1790 के अकाल के समय उनका पलायन आज के संताल परगना तक हुआ। हंटर ने लिखा है, ‘1792 से संतालों का नया इतिहास शुरू होता है’ (पृ. 220)। 1838 तक संताल परगना में संतालों के 40 गांवों के बसने की सूचना हंटर देते हैं जिनमें उनकी कुल आबादी 3000 थी (पृ. 223)। हंटर यह भी बताता है कि 1847 तक मि. वार्ड ने 150 गांवों में करीब एक लाख संतालों को बसाया (पृ. 224)।

1910 में प्रकाशित ‘बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना’, वोल्यूम 13 में एल.एस.एस. ओ मेली ने लिखा है कि जब मि. वार्ड 1827 में दामिने कोह की सीमा का निर्धारण कर रहा था तो उसे संतालों के 3 गांव पतसुंडा में और 27 गांव बरकोप में मिले थे। वार्ड के अनुसार, ‘ये लोग खुद को सांतार कहते हैं जो सिंहभूम और उधर के इलाके के रहने वाले हैं।’ (पृ. 97) दामिनेकोह में संतालों के बसने का प्रामाणिक विवरण बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना के पृष्ठ 97 से 99 पर उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त आर. कार्सटेयर्स जो 1885 से 1898 तक संताल परगना का डिप्टी कमिश्नर रहा था, उसने अपने उपन्यास ‘हाड़मा का गांव’ की शुरुआत ही पहाड़िया लोगों के इलाके में संतालों के बसने के तथ्य से की है।

बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की है। अपने इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी को मुर्मू गोत्र का संताल आदिवासी बताया है।

वहीं हिंदी के उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हूल पहाड़िया’ में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है।

बहरहाल, हूल विद्रोह की जो वजहें 19वीं सदी में थीं, उसी तरह की परिस्थितियां आज भी आदिवासी इलाकों में कायम हैं। पूंजीवादी घरानों के लिए आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से वंचित किया जा रहा है। विरोध करने पर उन्हें नक्सली कहकर उनका सरकारी नरसंहार भी जारी है। झारखंड में ही सीएनटी और एसपीटी एक्ट में बदलाव के जरिए आदिवासियों की जमीन को हड़ने की साजिश हो रही है। दिखावे के लिए उड़ता हाथी दिखाया जा रहा है। ऐसे में हूल विद्रोह की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

(कॉपी एडिटर : नवल)



संस्कृत में 
हर अक्षर, स्वर और व्यंजन के संयोग से बनता है,
.जैसे कि “क” याने क् (हलन्त) अधिक अ । “स्वर” सूर/लय सूचक है, और “व्यंजन” शृंगार सूचक ।
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संस्कृत वर्णॅ-माला में 13 स्वर, 33 व्यंजन और 2 स्वराश्रित ऐसे कुल मिलाकर के 49 वर्ण हैं । स्वर को ‘अच्’ और ब्यंजन को ‘हल्’ कहते हैं ।
अच् – 14
हल् – 33
स्वराश्रित – 2
14 स्वरों में से 5 शुद्ध स्वर हैं; अ, इ, उ, ऋ, लृ
और 9 अन्य स्वर: आ, ई, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ
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मुख के अंदर स्थान-स्थान पर हवा को दबाने से भिन्न-भिन्न वर्णों का उच्चारण होता है । मुख के अंदर पाँच विभाग हैं, जिनको स्थान कहते हैं । इन पाँच विभागों में से प्रत्येक विभाग में एक-एक स्वर उत्पन्न होता है, ये ही पाँच शुद्ध स्वर कहलाते हैं ।
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स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही आवाज में बहुत देर तक बोला जा सके ।
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33 व्यंजनों में 25 वर्ण, वर्गीय वर्ण हैं याने कि वे पाँच–पाँच वर्णों के वर्ग में विभाजित किये हुए हैं । बाकी के 8 व्यंजन विशिष्ट व्यंजन हैं, क्यों कि वे वर्ग़ीय व्यंजन की तरह किसी एक वर्ग में नहीं बैठ सकतें । वर्गीय व्यंजनों का विभाजन उनके उच्चारण की समानता के अनुसार किया गया है ।
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* कंठ से आनेवाले वर्ण “कंठव्य” कहलाते हैं उ.दा. क, ख, ग, घ
* तालु की मदत से होनेवाले उच्चार “तालव्य” कहलाते हैं उ.दा. च, छ, ज, झ
* ‘मूर्धा’ से (कंठ के थोडे उपर का स्थान) होनेवाले उच्चार “मूर्धन्य” हैं उ.दा. ट, ठ, ड, ढ, ण
* दांत की मदत से बोले जानेवाले वर्ण “दंतव्य” हैं उ.दा. त, थ, द, ध, न; औ
* होठों से बोले जानेवाले वर्ण “ओष्ठव्य” कहे जाते हैं उ.दा. प, फ, ब, भ, म
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कंठव्य / ‘क’ वर्ग – क् ख् ग् घ् ङ्
तालव्य / ‘च’ वर्ग – च् छ् ज् झ् ञ्
मूर्धन्य / ‘ट’ वर्ग – ट् ठ् ड् ढ् ण्
दंतव्य / ‘त’ वर्ग – त् थ् द् ध् न्
ओष्ठव्य / ‘प’ वर्ग – प् फ् ब् भ् म्
विशिष्ट व्यंजन - य् व् र् ल् श् ष् स् ह्
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स्वर और व्यंजन के अलावा “ं” (अनुस्वार), और ‘ः’ (विसर्ग) ये दो ‘स्वराश्रित’ कहे जाते हैं, और इनके उच्चार कुछ खास नियमों से चलते हैं जो आगे दिये गये हैं ।
इन 49 वर्णों को छोडकर, और भी कुछ वर्ण सामान्य तौर पे प्रयुक्त होते हैं जैसे कि त्र, क्ष, ज्ञ, श्र इत्यादि । पर ये सब किसी न किसी व्यंजनों के संयोग से बने गये होने से उनका अलग अस्तित्व नहि है; और इन्हें संयुक्त वर्ण भी कहा जा सकता है ।
‘य’, ‘व’, ‘र’, और ‘ल’ ये विशिष्ट वर्ण हैं क्यों कि स्वर-जन्य (स्वरों से बने हुए) हैं, ये अन्तःस्थ व्यञ्जन भी कहे जाते हैं । देखिए:
इ / ई + अ = य (तालव्य)
उ / ऊ + अ = व (दंतव्य तथा ओष्ठव्य)
ऋ / ऋ + अ = र (मूर्धन्य)
लृ / लृ + अ = ल (दंतव्य)
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इनके अलावा ‘श’, ‘ष’, और ‘स’ के उच्चारों में बहुधा अशुद्धि पायी जाती है । इनके उच्चार स्थान अगर ध्यान में रहे, तो उनका उच्चारण काफी हद तक सुधारा जा सकता है ।
श = तालव्य
ष = मूर्धन्य
स = दंतव्य
ह = कण्ठ्य
ये चारों ऊष्म व्यंजन होने से विशिष्ट माने गये हैं ।
पञ्चमाक्षर की गलतियाँ
पञ्चमाक्षरों के नियम का सही ज्ञान न होने से बहुधा लोग इनके आधे अक्षरों की जगह अक्सर 'न्' का ही गलत प्रयोग करते हैं जैसे 'पण्डित' के स्थान पर 'पन्डित', 'विण्डोज़' के स्थान पर 'विन्डोज़', 'चञ्चल' के स्थान पर 'चन्चल' आदि। ये अधिकतर अशुद्धियाँ 'ञ्' तथा 'ण्' के स्थान पर 'न्' के प्रयोग की होती हैं।
नियम: वर्णमाला के हर व्यञ्जन वर्ग के पहले चार वर्णों के पहले यदि अनुस्वार की ध्वनि हो तो उस वर्ग का पाँचवा वर्ण आधा (हलन्त) होकर लगता है। अर्थात कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा ङ (ङ्), चवर्ग (च, छ, ज, झ, ञ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा ञ (ञ्), टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) के पहले चार वर्णों से पहले आधा ण (ण्), तवर्ग (त, थ, द, ध, न) के पहले चार वर्णों से पहले आधा न (न्) तथा पवर्ग (प, फ, ब, भ, म) के पहले चार वर्णों से पहले आधा म (म्) आता है। उदाहरण:
कवर्ग - पङ्कज, गङ्गा
चवर्ग - कुञ्जी, चञ्चल
टवर्ग - विण्डोज़, प्रिण्टर
तवर्ग - कुन्ती, शान्ति
पवर्ग - परम्परा, सम्भव
आधुनिक हिन्दी में पञ्चमाक्षरों के स्थान पर सुविधा हेतु केवल अनुस्वार का भी प्रयोग कर लिया जाता है यद्यपि यह देवनागरी की सुन्दरता को कम करता है। जैसे: पञ्कज - पंकज, शान्ति - शांति, परम्परा - परंपरा। विशेषकर ञ तथा ङ् का प्रयोग काफी कम हो गया है।
यहूदियों ने
मदीना में मोहम्मद को दी थी शरण
सिर्फ 5 साल में मदीना से यहूदियों को साफ़ कर दिया गया
-- मधु किश्वर
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 शोनार बांग्ला..?
,प.बंगाल जिसे लोग मोमता-दी का बांग्लादेश कहते हैं...वहाँ आधिकारिक मोमिन आवादी 28-30 प्रतिशत कही जाती है,लेकिन असल मे यह 35-40 प्रतिशत से ज़्यादा है...जब तक कम्युनिस्ट राज करते रहे... प.बंगाल को बांग्लादेशी अभ्यारण्य बनाते रहे...बची-खुची कसर ममता बनर्जी ने पूरी कर दी...बंगाल और असम तो वो गेट हैं जिनसे घुसकर बांग्लादेशी घुसपैठिए पूरे देश मे फैल गए हैं...
अब अधिकांश के पास नागरिकता प्रमाणित करने के सभी दस्तावेज हैं...इनका अनेक व्यवसायों और अनेक श्रमिक कार्यों पर पूर्ण कब्ज़ा हो चुका है...अनेक के पास तो भारतीय पासपोर्ट तक पाए जाते हैं...संपत्ति-संपदा है...भारतीय महिलाओं से विवाह भी किये हैं...प्रजनन क्षमता चूहों,सुअरों और दीमक से भी ज़्यादा है... रोहिंज्ञाओं को जोड़ लें तो 15-20 साल बाद भारत के मालिक यही लोग होंगे...हिन्दू कहाँ रहेगा ? क्या खाएगा ? हिंदुओं की लगभग सारी प्रोपर्टी छीनी जा चुकी होगी ! मंदिरों के ऊपर गुम्बदें और...मीनारें होंगी...पार्लियामेंट और देश की सभी विधान सभाओं में बड़ी-बड़ी मस्जिदे होंगीं...
उदाहरण के लिए पिछले साल कोलकाता के काली मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर राज्य सरकार के एक मुस्लिम मंत्री की नियुक्ति हुई है...मंदिर संचालन,मंदिर प्रोपर्टी और मंदिर के खजाने पर मुस्लिम मंत्री काबिज़ हो गया... शिकायत करने गए हिंदुओं को ममता बनर्जी ने दौड़ा लिया...मोहर्रम पर विसर्जन नहीं...रात दस बजे के बाद गणेश -दुर्गा पंडाल बन्द करने के आदेश हैं....आज भी एक पंडाल में गाय के अवशेष डाल कर अपवित्र कर दिया गया...दुर्गा और गणेश प्रतिमायें तो साल भर अब तोड़ी जाती हैं,बंगाल में ! हिंदु भी अब ज़्यादा बुरा भी नही मानते क्योकि उन्होंने इसे अपनी नियति मान लिया है....राज्य में सिर्फ उर्दू शिक्षकों की नियुक्तियां होने का रिवाज है...शेष नौकरियों में उर्दू जानने वालों को प्राथमिकता दी जा रही है !!
Pawan Saxena
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#मिस्र - मिस्र ने 24 राफेल विमान, 1750 करोड रुपए प्रति विमान के हिसाब से 42 हजार करोड रुपए में खरीदे.
#कतर - कतर ने 24 राफेल विमान 2083 करोड़ रुपए प्रति विमान के हिसाब से कुल 50 हजार करोड़ रुपए में खरीदे.
#भारत - भारत ने 36 राफेल विमान कुल 1611 करोड रुपए प्रति विमान के हिसाब से कुल 58 हजार करोड रुपए में खरीदे.
इस प्रकार भारत ने अन्य देशों के मुकाबले, सस्ती कीमत पर फ्रांस से राफेल विमान खरीदे हैं. इसलिए कांग्रेस फिजूल ही मोदी सरकार को बदनाम कर रही है.
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कॉलेजियम  से बने  जज... हिंदुओं से  दिक्कत 
एक एनजीओ है जिसका नाम है आवाज फाऊंडेशन ..उसे एक मुस्लिम सुमेरा अब्दुल अली चलाती हैं  इनके NGO के सदस्य जगह-जगह पंडालों के पास डेसिबल मीटर खड़े होकर रिकॉर्डिंग करते हैं और फिर मुंबई हाईकोर्ट में जाकर बताते हैं कि यह देखिए फलाना जगह आवाज का स्तर इतना ज्यादा है लोग बहरे हो जाएंगे लोगों को सुनाई देना बंद हो जाएगा और वामपंथी विचारधारा के ये जज  तुरंत इस पर फैसला सुना देते हैं
अभी मुंबई हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि जो भी गणेश पांडाल ज्यादा आवाज फैलाएगा उसके साजोसामान सामान जप्त कर लिए जाएंगे .   आजादी के बाद से लेकर अब तक सिर्फ 400 परिवारों के जज ही देश के विभिन्न हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज बने हैं, .मस्जिदों में बीसों लाउडस्पीकर लगाकर बेहद तेज आवाज में दिन में 5 बार अजान दिया जाता है वह भी सुबह के 4:30 बजे जब आदमी गाढ़ निद्रा में सोता रहता है।



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मार्क्सवादी इतिहासकारों के प्रपंच को उजागर करती नीरज अत्री और मुनीश्वर सागर की ऐतिहासिक किताब ‘BRAINWASHED REPUBLIC’
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हमारे देश में स्कूली बच्चों का इतिहास के माध्यम से शुरू से ब्रेनवाश करने की कोशिश की गई है। स्वतंत्रता के बाद से भारतीय अकादमिक संस्थाओँ पर मार्क्सवादियों के बर्चस्व के कारण उसी वर्ग के लेखकों को आधिकारिक इतिहासकार माना गया। जबकि सच्चाई ये है कि सरकारी संरक्षण प्राप्त ये लेखक इतिहास की किताबें लिखी नहीं हैं बल्कि उसकी रचना की है। इस लिहाज से उन्होंने तथ्यात्मकता को कभी तरजीह दी ही नहीं। उन्होंने कहानीनुमा किताबों की रचनाकर अपने संरक्षक को खुश किया। उस समय की सरकार तथा इतिहासकारों का प्रपंच आज भी तथ्यात्मक चूक के रूप में विद्यमान है।
 ईसाई मिशनरियां अब सनातन धर्म की पुरानी पुस्तकों को निशाना बना रही हैं...//
 पुराणों और दूसरे ग्रंथों में वो इस तरह के शब्द घुसाने में जुटे हैं जिनके आधार पर कुछ साल बाद साबित किया जा सके कि हिंदू धर्म के ग्रंथों में जिस भगवान की बात कही गई है वो कोई और नहीं बल्कि ईसा मसीह हैं। इसी तरह हिंदू धर्म को ईसाई धर्म से पैदा हुआ बताने की कोशिश भी चल रही है। ताकि यूरोप में ईसाई से हिंदू धर्मांतरण को रोका जा सके।
पहला निशाना बना ईशवास्य उपनिषद
ईशवास्य या ईशोपनिषद  एक उपनिषद है। इसमें ब्रह्म और आत्म का ज्ञान समाया हुआ है। हाल ही में पता चला कि अमेज़न की वेबसाइट पर इसी नाम से एक किताब बिक रही है, जिसमें ईशवास्य उपनिषद को ईसा मसीह से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसे लिखने वाले प्रोफेसर एम एम निनान ने इसी तरह से हिंदू धर्म की कई और किताबों को ईसाई धर्म से जोड़ने की कोशिश की है। एम एम निनान दरअसल एक ठग है, जिसे हिंदू धर्म को नीचा दिखाने की सुपारी दी गई है।
 इसी लेखक ने एक किताब ऋग्वेद पर लिखी है जिसमें ऊल-जलूल तर्कों के आधार पर साबित करने की कोशिश की है कि ऋग्वेद कुछ साल पहले ही लिखा गया था और इसमें बाइबिल से सारी बातें कॉपी की गई हैं। एक किताब में लेखक ने हिंदू धर्म को ईसाई धर्म से पैदा हुआ बताया है।
धर्म के नाम पर धोखेबाजी की कोशिश
दरअसल ईसाई धर्म यूरोप और अमेरिका में ही अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। रूस और कई दूसरे देशों में ईसाई धर्म की संस्थाएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। शांति की तलाश में लोग हिंदू और बौद्ध जैसे सनातन धर्मों की तरफ बढ़ रहे हैं। इस प्रक्रिया को रोकने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हिंदू धर्म की बिल्कुल गलत तस्वीर पेश करने की नीयत से ये किताबें बीते कुछ साल में लिखवाई गई हैं।
 इस साजिश में अमेज़न जैसे पोर्टल भी शामिल हैं। जो इन फर्जी किताबों को इंटरनेट के जरिए दुनिया भर में फैलाने में जुटे हैं। सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने इस तरह की कोशिशों पर विरोध दर्ज कराया है।
कुमार अवधेश सिंह
जबरन थोपे जा रहे उर्दू का किया विरोध, तो बंगाल में 2 हिन्दू छात्रों को उतारा मौत के घाट
21/09/2018
: बंगाल में 2 हिन्दू छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया है और कई अन्य छात्रों को बर्बरता से मारा गया है
और ये सब इसलिए क्यूंकि ये छात्र जबरजस्ती थोपे जा रहे उर्दू का विरोध कर रहे थे और बंगाल में बंगाली का समर्थन कर रहे थे जो की बंगाल की मूल भाषा है, उर्दू का विरोध करने के कारण 2 हिन्दू छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया है
मामला बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर जिले के इस्लामपुर के द्वारिभितहाई स्कुल का है, जहाँ पर छात्र 3 उर्दू शिक्षको को भेजे जाने का विरोध कर रहे थे, असल में स्कुल में 3 शिक्षको की कमी थी, इसमें से 1 गणित का शिक्षक था, 1 साइंस का था और एक बंगाली भाषा का शिक्षक था
छात्र कई दिनों से 3 शिक्षको को भेजने की मांग कर रहे थे क्यूंकि उनकी पढाई का नुक्सान हो रहा था, वो गणित, साइंस और बंगाली भाषा के शिक्षक का इंतज़ार कर रहे थे
पर ममाता बनर्जी की सरकार ने 3 शिक्षक भेजे पर तीनो उर्दू के, जबकि स्कुल में छात्रों के पास उर्दू का सब्जेक्ट नहीं, और न ही वो उर्दू पढना ही चाहते है, पर ममाता बनर्जी छात्रों को जबरन उर्दू पढ़ाना चाहती है इसलिए गणित, साइंस और बंगाली की जगह 3 उर्दू शिक्षक भेज दिए
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असल में ममाता उर्दू शिक्षको की भर्ती करती है सभी मुसलमान ही होते है, अब इनको किसी स्कुल में तो रखना ही होगा तो जिस स्कुल में उर्दू शिक्षको का स्थान नहीं है वहां भी उर्दू शिक्षक भेजती है
अब इसका छात्रों ने विरोध शुरू किया, तो ममाता बनर्जी की सेक्युलर सरकार का विरोध करने की हिम्मत कैसे हुई, ममाता सरकार ने पुलिस को भेजकर छात्रों पर, बच्चों पर गोलियां चलवा दी और 2 हिन्दू छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया
मृतक हिन्दू छात्र राजेश सरकार
मृतक हिन्दू छात्र तपोश बर्मन
ममाता बनर्जी की पुलिस ने पास से बन्दुक लगाकर राजेश सरकार को गोली मार दी, और दूसरा छात्र तपोश बर्मन उसे ऐसे मारा की अस्पताल में उसकी मौत हो गयी
नोट : कृपया कमजोर ह्रदय के लोग नीचे का विडियो न चलायें, विडियो विचलित कर सकता है
PritamDutta
@Pritam__Dutta
Ex student #RajeshSarkar of
#DarvitSchool Of #Islampur killed by the bullet of @aitc police 4 demanding education in their mother tongue as
@MamataOfficial appointed
#Urduteachers in
#BengaliSchool@rashtrapatibhvn
@PMOIndia @HMOIndia
@UNHumanRights@republic
#MamataMustResign
12:06 AM - Sep 21, 2018 · Kolkata, India
2 See PritamDutta's other Tweets
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Hindu students killed in Bengal over Urdu Imposition : ये बच्चे है स्कूली बच्चे, जिनके साथ ऐसा किया गया क्यूंकि इन्होने उर्दू का विरोध किया, 2 हिन्दू छात्रों को अबतक मौत के घाट बंगाल सरकार ने उतार दिया है, कई छात्र घायल है, मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है !
उर्दू का विरोध करने पर, गणित, साइंस और बंगाल में बंगाली पढने की मांग को लेकर हिन्दू बच्चों को मौत के घाट उतारा गया है ! मीडिया मामले को अधिक से अधिक दबाने का पूरा प्रयास कर रही है

Thursday, 20 September 2018




सोहराबुद्दीन के भाई ने किया

कांग्रेस का पर्दाफाश...//

बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में सोहराबुद्दीन शेख के भाई नयाबुद्दीन शेख ने सीबीआई कोर्ट में बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि CBI ने अपने आप ही भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात पुलिस ऑफिसर अभय चुडास्मा का नाम इस मामले में जोड़ा था.




आज तक मीडिया रिपोर्ट मुताबिक नयामुद्दीन ने हादसे के दिन का जिक्र करते हुए कोर्ट को बताया कि उसने अपने भाई और भाभी को बस स्टैंड पर छोड़ा था. वो दोनों हैदराबाद जा रहे थे. उन्होंने कहा कि सीबीआई ने इस केस में तुलसीराम का नाम भी जानबूझ कर प्लांट किया.




नयाबुद्दीन शेख ने अपने जबरन लिए गए बयान पर कहा मैंने उस बयान में इस हिस्से को कभी बोला ही नहीं. बता ये बयान सीबीआई अफसर डीएस डागर ने लिया था.

जबरन बयान दिलवाये गए




याद दिला दें साल 2010 में नयाबुद्दीन शेख से ये बयान दिलवाया गया था “जब मैंने चुडास्मा को बताया कि हम अपनी याचिका वापस नहीं लेंगे, तब उन्होंने मुझे धमकाया और कहा कि मेरा हाल भी सोहराबुद्दीन जैसा ही होगा. मैं इस बारे में अमित भाई(अमितशाह) से बात करूंगा और ये मध्यप्रदेश में ही हो जाएगा. वहां पर भी उनकी ही सरकार है.”




अमित शाह ने कभी नहीं धमकाया




इस बयान पर नयामुद्दीन ने खुलासा करते हुए कहा कि उसपर कभी भी बीजेपी की तरफ से दबाव नहीं बनाया गया था, मैंने कभी नहीं कहा कि चूड़ास्मा ने उन्हें 50 लाख का ऑफर दिया और याचिका वापस लेने की बात कही थी. नयामुद्दीन ने साफ कहा कि अमित शाह और चुडास्मा ने कभी भी उसे नहीं धमकाया.




यानी कि अब ये केस आईने की तरह साफ़ हो गया है कांग्रेस ने ही मुस्लिम तुष्टिकरण व वोट बैंक के लिए सीबीआई का गलत इस्तेमाल किया और सीबीआई अफसरों ने इस एनकाउंटर को फर्जी एनकाउंटर बना दिया. साथ ही झूठे बयान दिलवाकर अमितशाह और अमितशाह से नरेंद्र मोदी तक को गिरफ्तार करने की बेहद सनसनीखेज़ साज़िश रची गयी थी.

आखिर कौन था सोहराबुद्दीन शेख?




सोहराबुद्दीन मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के झिरन्या गाँव का रहने वाला एक हिस्‍ट्रीशीटर था। गुजरात पुलिस ने 26 नवंबर 2005 को उसे एक कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। उसकी पत्‍नी कौसर बी को भी गुजरात पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया था. इसके एक साल बाद 26 दिसंबर 2006 को शेख के अंडवर्ल्‍ड साथी तुलसीराम प्रजापति को भी एक मुठभेड़ में गुजरात पुलिस ने मार गिराया था. तुलसी प्रजापति को सोहराबुद्दीन शेख के मुठभेड़ का चश्‍मदीद गवाह बनाकर पेश किया गया था। सोहराबुद्दीन शेख पर 90 के दशक में ही हथियारों की तस्‍करी का मामला दर्ज था.




सोहराबुद्दीन शेख के मप्र के झिरन्‍या गांव स्थित घर से वर्ष 1995 में 40 एके-47 राइफल बरामद हुआ था.उस पर गुजरात व राजस्‍थान के मार्बल व्‍यापारियों से हफ्ता वसूली और हत्‍या का मुकदमा भी दर्ज था। सोहराबुद्दीन अंडवर्ल्‍ड डॉन दाउद इब्राहिम के गुर्गे छोटा दाउद उर्फ शरीफखान पठान, अब्‍दुल लतीफ, रसूल पर्ती और ब्रजेश सिंह से जुड़ा था। लश्‍कर-ए-तोइबा व पाकिस्‍तान के आईएसआई से भी उसके संबंध थे.




1992 में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद आतंक फैलाने के लिए अब्‍दुल लतीफ ने करांची में रह रहे छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान से 40 एके 47 मंगवाया था, जिसे सोहराबुद्दीन ने रउफ नामक एक अन्‍य व्‍यक्ति के साथ मिल कर अमहमदाबाद स्थित दरियापुर से अपने गांव झिरन्‍या पहुंचा और वहां उसने हथियारों को कुएं में छिपा दिया था.




अपने शासन वाल महाराष्‍ट्र के थाने में सोहराबुद्दीन शेख के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बावजूद कांग्रेस सीबीआई के जरिए सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर को फर्जी साबित करने में लगी रही और इसके लिए उसने सीबीआई का गलत इस्‍तेमाल किया.

सोहराबुद्दीन को कांग्रेस ने बताया था शहीद




2007 में पूर्व डीआईजी डी.जी बंजारा सहित कई वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारियों को इसमें गिरफ्तार किया गया था। भाजपा का आरोप था कि कांग्रेस गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह को फंसाने के लिए एक खतरनाक अपराधी के नाम पर राजनीति कर रही है. गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए दोनों सोहराबुद्दीन को ‘मौलाना’ यानी अपराधी की जगह ‘एक शहीद’ बनाने की कोशिश में लगे रहे, जो देश की सुरक्षा के लिए बेहद घातक था. इस केस को खोलने का श्रेय दैनिक भास्‍कर अखबार को जाता है.



अदालतों में परिवारवाद का
कांग्रेसी कनेक्शन समझना जरूरी है...!
– असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता स्वर्गीय केशव चन्द्र गोगोई के सुपुत्र जस्टिस रंजन गोगोई 2 अक्टूबर को अवकाश ग्रहण कर रहे,
-- ओडिशा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय रघुनाथ मिश्रा के सुपुत्र और देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र के भतीजे, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की जगह लेंगे।
– जस्टिस दीपक मिश्रा से कुछ समय पहले कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत देवी सिंह ठाकुर के सुपुत्र श्री टीएस ठाकुर भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। देवी सिंह ठाकुर भी जम्मू कश्मीर हाइकोर्ट में जज थे। जज की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर सीधे शेख मोहम्मद सरकार में वित्त मंत्री बने। फिर शेख मोहम्मद के दामाद गुलाम मोहम्मद सरकार में उपमुख्यमंत्री।
यह इत्तेफाक है या सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियक्ति प्रक्रिया की खामियां हैं कि लगातार तीन चीफ जस्टिस कांग्रेस पार्टी के नेता, मंत्री और मुख्यमंत्री के पुत्र हैं?
परम्परा के अनुसार वर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने बाद के दूसरे नंबर के न्यायधीश के नाम की सिफारिश भारत के राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा ने वही किया जिस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुहर लगा दी। क्या यह महज संयोग है कि हाल में जितने भी मुख्य न्यायाधीश बने उनके पिता केंद्र में कांग्रेस की सरकार में कद्दावर नेता थे ! क्या यह महज इत्तेफाक है कि कांग्रेसी नेताओं के पुत्र ही सीजेआई के पद प्राप्त करते जा रहे हैं ?
अगस्त महीने की शुरुआत में केन्द्र सरकार ने पहली बार जजों की नियुक्ति के मामले में परिवारवाद का मुद्दे पर अपनी बात रखी। लिखित तौर पर अपनी राय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से साझा करते हुए केंद्र ने पहली बार जजों की नियुक्ति के लिए भेजे गए नाम में शामिल वकीलों और मौजूदा और रिटायर्ड जजों के साथ बकायदा संबंधों का जिक्र करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजा। इलाहाबाद हाई कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजी गईं 33 अनुशंसाओं में कम से कम 11 वकीलों और उनके संबंधों का जिक्र किया गया।
सरकार ने वकीलों की पात्रता, निजी और पेशेवर ईमानदारी समेत न्यायिक बिरादरी में उनकी साख जैसे मामलों के संदर्भ में अपने जांच निष्कर्षों से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को अवगत कराया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से दो साल पहले उस दौरान हाई कोर्ट कॉलेजियम ने 30 वकीलों के नाम भेजे थे। उस वक्त के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर 11 वकीलों के नाम नाम खारिज कर केवल 19 की अनुशंसा करते हुए हाई कोर्ट जज के रूप में सिफारिश की थी। 2016 की लिस्ट में भी जजों और नेताओं के सगे-संबंधी शामिल थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने 12 मार्च को रिपोर्ट दी थी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कलीजियम द्वारा भेजी गई लिस्ट में मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज के बहनोई, एक के चचेरे भाई के अलावा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व जजों के संबंधी शामिल थे। 15 अप्रैल को प्रकाशित दूसरी रिपोर्ट में टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया था कि परिवारवाद का यह मामला पीएमओ तक पहुंचा है और इलाहाबाद बार एसोसिएशन से मिलीं शिकायतों के आधार कानून मंत्रालय पारदर्शी प्रक्रिया अपना रहा है। सरकार ने 33 अनुशंसाओं में से केवल 11-12 वकीलों को जज बनने के सक्षम पाया था। फरवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट, कलीजियम द्वारा भेजी गई अनुशंसाओं में.एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व बिल्कुल न के बराबर था।
कांग्रेस न्यायपालिका और न्यायाधीशों का राजनीतिकरण करने से भी नहीं चूकती है। 12 जून को हाई कोर्ट के जज रहे अभय महादेव थिप्से ने जब कांग्रेस पार्टी का दामन थामा तो इसके स्पष्ट प्रमाण भी सामने आ गए। सवाल उठने लगे हैं कि हाई कोर्ट के जज के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान जज अभय महादेव थिप्से कितने निष्पक्ष रहे होंगे?
रिटायर जज महादेव थिप्से ने थामा कांग्रेस का हाथ
राहुल गांधी के साथ जज अभय महादेव थिप्से की ये तस्वीरें कांग्रेस और जजों के पर्दे के पीछे के रिश्तों की कहानी कहती है। गौरतलब है कि इससे पहले भी कई जजों ने रिटायर होने के बाद ऐसे पद लिए जिन्हें राजनीतिक माना जाता रहा है। लेकिन किसी हाई कोर्ट के जज का इस तरह से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का संभवत: यह पहला मामला है।
कांग्रेस की लाइन लेंथ पर चलते रहे हैं पूर्व जज अभय महादेव थिप्से
-- बेस्ट बेकरी केस में गवाहों के मुकरने के बाद भी चार आरोपियों को दोषी करार दिया
-- थिप्से ने अपने कार्यकाल में कई माओवादियों-आतंकवादियों को जमानत दी
-- थिप्से ने 5600 करोड़ के NSE घोटाले में जिग्नेश शाह को जमानत दी थी
-- थिप्से महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी कानून मकोका के भी विरोधी हैं
-- थिप्से ने कहा था, ”सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में न्याय नहीं हुआ’’
-- थिप्से ने कहा था, ”अदालतें मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करती हैं’’
कांग्रेस के कहने पर चार जजों ने किया था प्रेस कान्फ्रेंस!
जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों चेलमेश्वर, मदन लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ ने मीडिया के सामने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार ने इसे कोर्ट का अंदरूनी मामला बताया, लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक पार्टियों के बीच की लड़ाई बनाने की कोशिश की। चारों जजों के प्रेस कांफ्रेंस के आयोजक 10 जनपथ से करीबी ताल्लुक रखने वाले पत्रकार शेखर गुप्ता थे। जाहिर है कि इसके पीछे कांग्रेस की मिलीभगत थी।
जस्टिस के एम जोसेफ की नियुक्ति के लिए तोड़ी मर्यादा
उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस नहीं बनाने पर भी कांग्रेस ने राजनीति की। दरअसल केंद्र सरकार ने कोलेजियम की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया था। केंद्र ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं, जिन्हें केरल हाई कोर्ट से पदोन्नत किया गया है। ऐसे में केरल हाई कोर्ट से एक और पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की सरंचना के हिसाब से ठीक नहीं होगी।