Sunday, 8 January 2012

स्वामी विवेकानन्द क़ी उम्मीदें.. आपसे और मुझसे ...

आज सारी दुनिया में चार बड़ी हलचलें चर्चा में हैं .. 
1.पूंजीवाद से निर्मित तथाकथित आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और भुखमरी.. 
2..धर्म के नाम पर शोषण, उपनिवेशवाद और ईश्वर के तथा कथित फरमान के चलते घोर प्रताड़ना, हिंसा, और आतंकवाद ..
3..जीवन के विकृत सिद्धांतों को मान लेने और उन पर आचरण करने से प्राकृतिक असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, भूकम्प और हर ओर प्रदूषण का बढना ..
4..हर व्यक्ति के लिये आदर्श आचार संहिता पर आम सहमती नही होने से उत्पन्न टकराव, परिवारों का बिखरना .. इसी प्रकार जीवन के मिथ्या सिद्धांतों को स्वीकार कर लेने क़ी वजह से स्वार्थ, भोग, छल-कपट, ईर्ष्या -द्वेष तथा अप्राकृतिक जीवन शैली का बढना. फल स्वरूप रोगों का विस्तार तथा कानून और व्यवस्था का नियन्त्रण से बाहर हो जाना ..

हर देश में.. सरकारों, सामाजिक संगठनों और कबीलों व जन पंचायतों पर निपट स्वार्थियों का कब्जा है.. ये सभी बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं.. पहले के लोग.. भाट, चारण जैसे लोगों को रखा करते थे, आज के लोग, मीडिया को मैनेज करके अपनी-अपनी जयजयकार करवाते हैं.. जनता का मनोबल और आत्मविश्वास तब भी गिरा हुआ था, आज भी गिरा हुआ है..

दरिद्र ही नारायण -
उन्हें पीड़ा थी क़ी ईश्वर ने जब सारे मनुष्यों को एक जैसा ही बनाया है तब समाज के नेतृत्व कर्ता, पिछड़े या दरिद्र वर्ग से क्यों नही निकल रहे ?. उस पूरे वर्ग को, भूख, अशिक्षा और समस्त कमजोरियों से मुक्त करा कर विश्व व्यवस्था को  सुधारना यही उनका लक्ष्य था..
वे भी जानते थे यह कार्य आसान नही है .. अज्ञान से लड़ने और कमजोरियों पर विजय पाने के लिये भी 'मैन पावर ' और साधनों क़ी जरूरत थी.. वेद और उपनिषद उनके लिये शक्ति प्रदाता थे.. गीता में वर्णित सांख्ययोग और कर्मयोग को उनके जीवन आचरण में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.. इसे ही उन्होंने औरों के लिये भी सुझाया था.. उनकी मान्यता थी क़ी हिंदुत्व को धारण किये अपने समाज में, लम्बे समय से सुधार नही किया गया तो अनेक विकृत मान्यताओं और परम्पराओं ने स्थान बना लिया है.. यही हमारी कमजोरी का कारण है..
वे भारत ही नही... विश्व रत्न थे.. जब उनहोंने अपने विचार विश्व मंच पर रखे, तो आम जनता ने उन्हें सर माथे पर लिया था .. लूट, हिंसा, शोषण तथा शक्तिवानों के हर तरह के निरंकुश भ्रष्टाचार से निपटने के लिये, उन्होंने जो विचार प्रकट किये वे सुधारवादी ही नही, सहज व्यावहारिक भी थे. उन्होंने एक माहौल बना दिया था, लोगों क़ी आँखे खोल दी थीं. लोगों ने उसे दीवानों क़ी तरह पसंद भी किया था ..
उनका रास्ता आम जनता को समझदार और सशक्त बना देने वाला था. बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और उच्चतर ज्ञान के अलावा ईश्वर से साझेदारी, जैसे विषय उनकी कार्य सूची में थे .. हम उनके हिसाब से चलते तो तथाकथित धार्मिक  दुकानदारियाँ अब तक दिवालिया हो चुकीं होतीं. इसलिए न तो धर्म के ठेकेदारों नें, ना ही सरकारों ने उनके सुझावों पर कोई कार्य किया .. साम्राज्यवाद तो शोषक था ही समाजवाद और साम्यवाद को भी लोगों ने ठुकरा दिया है ... अब फिर से विवेकानन्द क़ी याद आ रही है .. 

पश्चिम क़ी जीवन शैली.. बचकाना प्रयोग ..
तलवार और दबाव के द्वारा, भोले-भाले लोगों को अपने धर्म में शामिल करना, उनको ज्ञान से वंचित करके उन्हें अपनी सत्ता का साधन बनाना यही पश्चिम क़ी रीत रही है. उन्होंने जिस प्रकार हिन्दुओं क़ी कुरीतियों को नकार दिया था, उसी प्रकार ईसा और मुहम्मद क़ी शिक्षाओं का अपने साम्राज्य के लिये दुरूपयोग करने वालों का भी उन्होंने जम कर विरोध किया था.. अपने से भिन्न धर्म वालों को स्वीकार नही करना, जो मूर्ती पूजा करता है, हमारे पैगम्बर और हमारे धर्म को नही मानता, उसे हमारा धर्म स्वीकार करना पड़ेगा या मरना पड़ेगा, ऐसी मान्यता के वे घोर विरोधी थे ..
आज पश्चिम क़ी जीवन शैली ने दुनिया में भयंकर संकट पैदा कर दिया है.. किन्तु उन्होंने तो आज से 130 वर्षो पूर्व ही इन यूरोपीय, अमेरिकी देशो क़ी व्यवस्था को नजदीक से देखा परखा और रिजेक्ट कर दिया था.. उन्होंने जो कारण और तर्क दिए थे, वे आज भी खरे प्रमाणित देखे जा सकते हैं, उनकी मान्यता थी क़ी उपस्थित विकृति के बावजूद भी हिन्दू समाज हजारों वर्षों से एक व्यवस्था बनाये हुए है, जबकि वहां वे जिस तरह समाज को स्थापित करने जा रहे हैं वह तो बनने के पहले ही बिखरते जा रहा है.. ऐसी अवस्था में हिंदुत्व क़ी स्थापित व्यवस्था को छोड़ देना कभी भी बुद्धिमानी क़ी बात नही हो सकती.. बल्कि यह तो सीधी सीधी मूर्खता ही है.. आवश्यकता है वेदों और उपनिषदों के वर्णित सिद्धांतों पर स्थापित अपने समाज में ही, अपेक्षित सुधार कर लिये जाएँ.. क्योंकि इस सिस्टम में आज विकार दिख रहे हैं फिर भी, अपनी इस विकृत अवस्था में भी यह समाज व्यवस्था पश्चिम से तो लाख दर्जे बेहतर है...

विवेकानन्द क़ी प्रासंगिकता --
पश्चिमी सोच रखने वाले और धार्मिक रूप से असहिष्णु लोगों का आज सभी ओर वर्चस्व दिख रहा है.. हिन्दुओं में भी पढ़ा -लिखा सम्भ्रांत वर्ग स्वयं भोगों में लिप्त और शक्तिहीन है.. ऐसे में उम्मीदें शेष भारत से ही हैं.. विशेष कर शेष भारत के युवाओं से.. शक्ति वहीं से खड़ी हो सकती है, उनके दिलों में आज भी हिंदुत्व के प्रति श्रद्धा विद्यमान है, उनमें कष्ट सहने का माद्दा भी है, लेकिन वे आर्थिक रूप से कमजोर हैं, दरिद्र हैं, हमें पहले उनकी सेवा करनी है....
आज क़ी स्थिति बड़ी विचित्र है.. आज साक्षात् विवेकानन्द भी दिल्ली के संसद भवन में खड़े होकर हिंदुत्व और वेदांत क़ी शिक्षाओं को जीवन में उतारने क़ी बात कहें.. तो मुझे इस बात में कोई शक नही है क़ी आज की संसद उन्हें भी साम्प्रदायिक करार दे.. आज तो उन पर भी प्रतिबन्ध लगाने के लिये हल्ला मच जाएगा.. ईसा को सूली पर चढ़ा देने वाली मानसिकता के ही लोगों का वर्चस्व है.. हमारी समस्त आशाओं का केंद्र तो वह हिदू समाज है जो हजारों वर्षों से पीड़ित, उपेक्षित पड़ा है... हमें उसे शक्ति सम्पन्न बनाना है.. इसके लिये लोग आगे आएं..
भारत फिर से शक्तिशाली बनें.. और विश्व को बेहतर दिशा दे .यही विवेकानन्द चाहते हैं...
 -- विवेक गोविन्द सुरंगे    

Thursday, 15 December 2011

गृह संसद और सामाजिक संसद सर्वत्र बनें ..


सहारा ,सुरक्षा और उचित मार्गदर्शन के आभाव से आज हर परिवार और समाजके लोग परेशान हैं ....विवाहों का टूटना ,नशे का बढना ,अत्याचार ,और उपेक्षा क़ी ओर ध्यान नही दिया जाना हमारे लिये  ,अनेक समस्याओं का कारण बना हुवा है ...
परिवार और समाज को हम समय नही दे रहे ...जबकि समस्याएँ यहीं से उपज रहीं हैं ...आत्म केन्द्रित व्यक्ति इन्हीं हालातों क़ी उपज हैं ...जीवन में तेज गति ,और सबकुछ स्वयम बटोर लेने क़ी भावना ,यहीं से बल पाती है ...मूल इच्छा पइसा बटोरने क़ी नही सम्मान पूर्वक और सुख पूर्वक जीने  क़ी है ...न तो कोई तनाव चाहता है ,नहीं यह चाहता है क़ी वह इनके चलते रोगों का शिकार बने ...
हमारे पास अभी भी समय है ...शिक्षा ,मार्गदर्शन ,संस्कार ,सुरक्षा और निश्चिंतता क़ी सुव्यवस्था करने वाले पारिवारिक  एवं सामाजिक तन्त्र का महत्व समझा जाय ...समझदार लोग इस कार्य को प्राथमिकता से करें ...यही हमारी एकता ,शक्ति ,सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य का आधार है ...यही हमारी संस्कृति का सारऔर हिंदुत्व क़ी पहिचान है ...इसी तन्त्र के महत्व को देख कर हमने ,ज्ञान दे वाले गुरु ,जन्म देने वाले माता पिता ही नही, सन्मार्ग दिखाने वाले पंचों कोभी परमेश्वर का दर्जा देकर उनका मान बढ़ाया है ...  
विवेक सुरंगे

Thursday, 17 November 2011

'' गृह संसद'' को अपने यहाँ कैसे शुरू करें ?


'' गृह संसद'' को अपने यहाँ कैसे शुरू करें ?
 गृह संसद चलती कैसे है ?
कौन से मुद्दे आएंगे -
यह पारिवारिक पंचायत क़ी तरह है ..महीनें में एक दिन परिवारों को एक साथ किसी शक्ति पीठ में बुलाते हैं . गायत्री मन्त्र से औपचारिक प्रारम्भ करते हैं उस दिन केलिए अध्यक्ष उपाध्यक्ष क़ी घोषणा क़ी जाती है .हर सभा के प्रारम्भ में नये सदस्य परिवार को शपथ दिलाई जाती है .जिसे सभी लोग दोहराते हैं .  बच्चों के गीत भजन के बाद प्रतिभाओं का सम्मान किया जाता है ..इसके बाद बच्चों का समूह अलग किया जाता है जिनके लिए खेल और कहानियों के द्वारा उनके सामान्य ज्ञान और संस्कार में वृद्धि का प्रयास किया जाता है ...इधर संसद क़ी बैठक अलग चलती है .सदन केसामने सामयिक मुद्दे सदस्यों द्वारा बारी बारी से उठाये जाते हैं.. हर सदस्य हाथ उठा कर अध्यक्ष क़ी अनुमति से अपने विचार सदन में रखता है .सदस्य द्वारा उठाये जाने वाले मुद्दे ,सभा के प्रारम्भ में ही सदस्य द्वारा लिखित में जमा कर दिए जाते हैं 
कौन से मुद्दे आएंगे -
पारिवारिक सामाजिक व्यवस्था ,स्वास्थ्य ,शिक्षा ,संस्कृति ,पर्व एवं परम्पराएँ ,सामाजिक सहयोग ,स्वावलम्बन ,राष्ट्रिय चेतना का जागरण जैसे मुद्दे सदन में उठाये जासकते है .सचिव अपने स्वविवेक से ,उपस्थित मुद्दों क़ी सूचि अध्यक्ष को देते हैं ..तब अध्यक्ष जो सदस्य हाँथ उठाते हैं उन्हें  पारी पारी से बोलने क़ी अनुमति देते हैं .बीच बीच में अध्यक्ष या विशेष प्रतिनिधि विषय को स्पष्ट करने में मदद करते हैं 
इसके बाद भोजन अवकाश होता है 
.जिसके बाद विशिष्ट जानकारी ,सामूहिक पर्व ,काव्य गोष्ठी ,वृत्त चित्रों का प्रदर्शन ,सुगम संगीत और विशिष्ट परिचय के आयोजन हो सकते हैं ..आगामी कार्यक्रम क़ी रूप रेखा बनती है ,सदस्यों केलिए विविध प्रशिक्षणों क़ी व्यवस्था अलग से भी क़ी जा सकती है .यात्राओं का आयोजन अथवा विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी हो सकता है 
नोट ...-सदस्य  परिवारों के लिये सदयता शुल्क रखा जाता है ,उद्घाटन कार्यक्रम भारत माता क़ी सामूहिक आरती से होता है ,विभिन्न सामाजिक एवं अच्छे संगठनो से सम्पर्क करके उनका एक सामूहिक मिलन का क्षेत्र बनाने का प्रयास किया जाता है विशेष जानकारी के लिये फोल्डर  पढ़ें 

Sunday, 23 October 2011


नित्य प्रार्थना -
 सतबुद्धि ,सन्मार्ग , और कार्य का संकल्प देना ..
अडिग रहे विश्वास तुम पर ,  ऐसा अन्तह करदेना  ,
मेरे हृदय में आने में  ,तुह्में कोई संकोच न हो ..
हे गुरुदेव मुझे नजरों से ,दूर कभी न होने देना ...    -विवेक 


नित्य प्रार्थना -
 सतबुद्धि ,सन्मार्ग , और कार्य का संकल्प देना ..
अडिग रहे विश्वास तुम पर ,  ऐसा अन्तह करदेना  ,
मेरे हृदय में आने में  ,तुह्में कोई संकोच न हो ..
हे गुरुदेव मुझे नजरों से ,दूर कभी न होने देना ...    -विवेक 

इस बदलती हुई दुनिया में भी हमारे दिल के किसी कोने में संस्कारों का दीपक आज भी टीम टिमा रहा है ..सीमाओं पर डटे सैनिक भी अपनी बंकर के किसी कोने में दीपावली का एक दीपक अवश्य जलाएँगे .इन भावनाओं और संस्कारों में सभी के कल्याण  क़ी चाहत है ...आप क्या कहते हैं ?






जीवन का लक्ष तय है, तो वही कीमती है ,याद रखना 
 आदमी टूटे भी ,तो कोई बात नही ,याद रखना 
बहुत सस्ता है ,लोगों क़ी ठोकरों से सीख मिल जाए यदि ,
इंसानी सम्बन्धों क़ी सचाई..... हमेशा याद रखना ...
सुख दुःख, मन क़ी ही हार जीत है ,और कुछ भी  नही..
जो कुछ हम करेंगे ,वही दिखेगा ,वही मिलेगा याद रखना ...
---विवेक  

क्या है हमारी बेचैनी का राज ?.....


क्या है हमारी बेचैनी का राज ?.....
.जिसकी योजना से हमारा जन्म हुआ है ,जिस उद्देश्य क़ी पूर्ती केलिए हमारा जन्म हुआ है ...उस कारण में छिपा है यह रहस्य .
.यह भाषण बाजी का नही ..आत्म साक्षात्कार का विषय है ...हम अपने प्रिय संस्कारों के अनुसार ही जी रहे हैं ..हमारी चाह्त और अस्वीकृति  वहीं से उपजती है .
.यहीं हम क्रिया -प्रतिक्रिया में उलझे रहते हैं ..मन क़ी अनुकूलता  हमें हसाती  है ,और प्रतिकूलता दर्द का अहसास देती है 
जिन्दगी कविता है ..वह खूबसूरत भी है और कल्याणकारी भी ,पर तभी ,जब उसका व्याकरण और प्रस्तुतीकरण भी सही हो ....--.विवेक