Monday, 5 January 2015

अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देने वाले भारतीय सेकुलरो ने समय समय पर कई बार अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटा हैं...
जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है" सैटेनिक वर्सेज"...
"सैटेनिक वर्सेज" एक ऐसा उपन्यास, जिसका भारत में सभी राजनीतिक दलों और NDTV जैसे चैनलों ने भारी विरोध किया था ..
सैटेनिक वर्सेज यानी शैतान की आयतें।
अपने इस उपन्यास में इस्लाम धर्म की पवित्र किताब कुरान की चर्चा सलमान रश्दी ने की है । रश्दी ने यह सच बताने का प्रयास किया है कि कुरान दुबारा लिखा गया । पहली बार मोहम्मद साहब ने उस समय प्रचलित मूर्ती पूजा को अपनाते हुये तीन
देवियों को अल्लाह की जगह पर भगवान के रुप में वर्णित किया, परन्तु बाद में उसमे बदलाव लाया गया क्योंकि उस समय प्रचलित मूर्ती पूजा के विरोध में हीं तो उन्हें इस्लाम को स्थापित
करना था।
इसी सच को रशदी ने रोचक तरीके से अपने उपन्यास के
माध्यम से बताने का प्रयास किया है..
इस उपन्यास की कहानी भारतीय चरित्रों के
आसपास गुंथी गई है, इस उपन्यास के शुरु में दो व्यक्ति जो भारतीय सिनेमा के चरित्र हैं हवाई जहाज से जमीन पर से आते हैं और इस्लाम की स्थापना का प्रयास करते हैं। उपन्यास में यह सच बताया गया है कुरान की रचना मानव ने की है, पहले
मिस्र में तीन देवियों की पूजा होती थीं.., अल उजा , अलात और मनत । इस्लाम की स्थापना काल में इनकी मुर्तियों को खंडित कर दिया गया । कुछ
मुर्तियां जो है जो अब भी म्यूजियम में उपलब्ध हैं ,
इसके अलावा इस उपन्यास में आयेशा बीबी और
मोहम्मद साहब की अन्य पत्नियों के
सबंधो का भी जिक्र हैं... उपन्यास में इस्लाम के बीच
के विरोधाभाष को भी बखूबी दर्शाया गया है ...
कुल मिलाकर यह उपन्यास पढने और विचार करने योग्य
है । अगर इस उपन्यास पर भारत की सरकार ने प्रतिबंध
नहीं लगाया होता तो इसका हिंदी अनुवाद बहुत हीं रोचक होता...
लेकिन अफसोस.. अभिव्यक्ति की दुहाई देने वाले आमिर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों के मुंह में दही जम जाता हैं ऐसे मामलों पर .,

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* सभी न्यूज़ चैनल कुशीनगर और बहराइच में ईसाईयों द्वारा करवाए धर्मपरिवर्तन पर खामोश
* सभी न्यूज़ चैनल मुजफ्फरनगर में मुल्लों द्वारा मंदिर पर मांस टांगने और इस्लाम कबूल करने की धमकी पर खामोश

* सभी न्यूज़ चैनल बुखारी द्वारा लव जेहाद कर हिन्दू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन कर उनसे शादी करने वाले बयान पर खामोश
* सभी न्यूज़ चैनल बीएमएसी के अध्यक्ष सलीम द्वारा मोदी जी को जान से मारने, संसद पर हमला करने और हथियार उठाकर हिन्दुओं को मारने वाले बयान पर खामोश
*आजम खान खुले आम बार बार आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी और स्वयंसेवक संगठन की तुलना तालिबान से कर देता है पर हमारी मिडिया के नज़रों में ये साम्प्रदायिक नहीं है
*न्यूज़ चैनलों पर लगातार और बार-बार कांग्रेस, सपा, आआपा और मुल्ले खुले आम सभी हिंदुत्ववादी संगठनो की तुलना पाकिस्तानी आतंकवाद से करके ना सिर्फ अन्तराष्ट्रीयस्तर पर हिन्दुत्ववादी संगठनों की अपितु हिन्दुओं की छवि पर भी दाग लगाते हैं पर न्यूज़ चैनलों की नजर में ये साम्प्रदायिक नहीं है
पर हाफिज सईद के बयान को हिन्दुस्तान में बार-बार दिखाया जाता है, जिससे की हिन्दुस्तानी मुल्लों के मन में मोदी जी के प्रति जहर भर कर पाकिस्तान की तरह यहाँ भी जेहादी तैयार किये जा सकें.
सभी न्यूज़ चैनलों द्वारा हिन्दुत्ववादी संगठनों पर लगातार जहर उगल कर बार बार उन्हें आतंकवादी बताया जा रहा है....... बात चाहे शांतिपूर्वक चलाये जा रहे "घर-वापसी" कार्यक्रम की हो या गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की, बात चाहे राम मंदिर की हो या हिन्दुओं के पक्ष में कही कोई भी बात.
इन न्यूज़ चैनलों द्वारा इन बातों को इस तरह से मिर्च-मसाला लगाकर विवादास्पद और साम्प्रदायिक दिखाया जा ता ह�

Saturday, 3 January 2015

लीला सैमसन की सेकुलर एवं आर्थिक लीलाएँ...

आजकल पीके फिल्म की वजह से सेंसर बोर्ड की वर्तमान अध्यक्षा लीला सैमसन ख़बरों में हैं. पीके फिल्म में हिन्दू धर्म और भगवान शिव की खिल्ली उड़ाने जैसे कुछ दृश्यों पर मचे बवाल और कई संगठनों के विरोध के बावजूद लीला सैमसन ने स्पष्ट कर दिया है कि वे पीके फिल्म से एक भी सीन नहीं काटेंगी. ये बात और है कि कुछ समय पहले ही रिलीज़ हुई एक और फिल्म “कमाल धमाल मालामाल” में एक ईसाई पादरी (असरानी) के नृत्य पर चर्च की आपत्ति के बाद उस दृश्य को हटा दिया गया था. इससे पहले कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम के कुछ दृश्यों पर मुस्लिम संगठनों की आपत्ति और हिंसक विरोध के बाद कुछ दृश्यों को हटाया गया था. लीला सैमसन की ऐसी “सेकुलर मेहरबानियाँ” कोई नई बात नहीं है. बहरहाल एक यहूदी पिता और कैथोलिक माता की संतान, लीला सैमसन का विवादों और काँग्रेस से पुराना गहरा नाता रहा है.



चेन्नई स्थित अंतर्राष्ट्रीय भरतनाट्यम संस्थान कलाक्षेत्र के छात्रा रही लीला सैमसन इसी संस्थान में एकल नृत्यांगना, सदस्य एवं अध्यक्ष पद तक पहुँची थीं. महान नृत्यांगना रुक्मणी देवी अरुंडेल द्वारा 1936 में स्थापित यह संस्थान एक महान परंपरा का वाहक है. स्वयं रुक्मिणी जी के शब्दों में, जब लीला को यहाँ भर्ती के लिए लाया गया, तब उसकी कैथोलिक/यहूदी पृष्ठभूमि के कारण उसे प्रवेश देने में मुझे कुछ आपत्तियां थीं, हालाँकि बाद में लीला को भर्ती कर लिया गया, वह नृत्यांगना तो अच्छी सिद्ध हुई, परन्तु भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के प्रति उसकी समझ एवं बौद्धिक विकास समुचित नहीं हुआ, बल्कि कई बार दुर्भावनापूर्ण ही था. तरक्की करते-करते सन 2005 में लीला सैमसन को कलाक्षेत्र का निदेशक बना दिया गया. जल्दी ही, अर्थात 2006 में सैमसन ने भरतनाट्यम नृत्य कथानकों में से आध्यात्मिक जड़ों को हटाना शुरू कर दिया. सैमसन के एवेंजेलिस्ट इरादे तब ज़ाहिर होने शुरू हुए, जब श्रीश्री रविशंकर ने कलाक्षेत्र के छात्रों को उनके आर्ट ऑफ लिविंग के  स्वास्थ्य एवं आशीर्वाद संबंधी एक कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया. तमिल साप्ताहिक आनंद विकतन के अनुसार लीला सैमसन ने छात्रों को इसमें भाग लेने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि यह श्रीश्री का यह समारोह हिन्दू धर्म को महिमामंडित करता था. लीला सैमसन का अगला सेकुलर कृत्य था कलाक्षेत्र संस्थान में स्थित सभी गणेश मूर्तियों को हटाने का फरमानतमिल हिन्दू वॉईस” अखबार के अनुसार जब इस निर्णय का कड़ा विरोध हुआ एवं छात्रों ने भूख हड़ताल की धमकी दी, तब लीला सैमसन ने सिर्फ एक गणेश मूर्ति को पुनः लगाने की अनुमति दी, लेकिन बाकी की मूर्तियां दोबारा नहीं लगने दीं. लीला सैमसन का कहना था कि कलाक्षेत्र में सिर्फ दीप प्रज्ज्वलन करके कार्यक्रम की शुरुआत होनी चाहिए, किसी देवी-देवता की पूजा से नहीं. लीला सैमसन ने अपनी ही गुरु रुक्मिणी अरुंडेल की उस शिक्षा की अवहेलना की, जिसमें उन्होंने कहा था कि जिस प्रकार भगवान नटराज जीवंत नृत्य का प्रतीक हैं, उसी प्रकार भगवान गणेश भी प्रत्येक शुभारंभ के आराध्य हैं. लेकिन लीला सैमसन को इन सबसे कोई मतलब नहीं था.


कलाक्षेत्र” में होने वाली प्रभात प्रार्थनाओं के बाद लीला सैमसन अक्सर छात्र-छात्राओं को मूर्तिपूजा अंधविश्वास है, एवं इस परंपरा को कलाक्षेत्र संस्था में खत्म किया जाना चाहिए, इस प्रकार की चर्चाएँ करती थीं एवं उनसे अपने विचार रखने को कहती थीं. उन्हीं दिनों लीला सैमसन के चमचे किस्म के शिक्षकों ने गीत–गोविन्द” नामक प्रसिद्ध रचना को बड़े ही अपमानजनक तरीके से प्रस्तुत किया था, जिसे बाद में विरोध होने पर मंचित नहीं किया गया. छात्राओं को भरतनाट्यम में पारंगत होने के बाद जो प्रमाणपत्र दिया जाता है, उसमें रुक्मिणी अरुंडेल द्वारा भगवान शिव का प्रतीक चिन्ह लगाया था, जो लीला सैमसन के आने के बाद हटा दिया गया. अभी जो सर्टिफिकेट दिया जाता है, उसमें किसी भगवान का चित्र नहीं है. हिन्दू कथानकों एवं पौराणिक चरित्रों की भी लीला सैमसन द्वारा लगातार खिल्ली उड़ाई जाती रही, वे अक्सर छात्रों के समक्ष प्रसिद्ध नाट्यकुमार-संभव” को समझाते समय, हनुमान जी, पार्वती एवं भगवान कृष्ण की तुलना वॉल्ट डिज्नी के बैटमैन तथा स्टार वार्स के चरित्रों से करती थीं. तात्पर्य यह है कि लीला सैमसन के मन में हिंदुओं, हिन्दू धर्म, हिन्दू आस्थाओं, भगवान एवं संस्कृति के प्रति मिशनरी कैथोलिक दुर्भावना शुरू से ही भरी पड़ी थी, ज़ाहिर है कि ऐसे में पद्मश्री और सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष पद के लिए एंटोनिया माएनो उर्फ सोनिया गाँधी की पहली पसंद लीला सैमसन ही थी. ऐसे में स्वाभाविक ही है कि फिल्म कमाल धमाल मालामाल में नोटों की माला पहने हुए पादरी का दृश्य तो लीला को आपत्तिजनक लगा लेकिन फिल्म पीके में भगवान शिव के प्रतिरूप को टायलेट में दौड़ाने वाले दृश्य पर उन्हें कोई दुःख नहीं हुआ. यहाँ भी लीला सैमसन अपनी दादागिरी दिखाने से बाज नहीं आईं, सेंसर बोर्ड के अन्य सदस्यों द्वारा अपना विरोध करवाने के बावजूद उन्होंने फिल्म PK को बिना किसी कैंची के जाने दिया. अपुष्ट ख़बरों के अनुसार इस काम के लिए राजू हीरानी ने लीला सैमसन को चार करोड़ रूपए की रिश्वत दी है, इसलिए इस आरोप की जाँच बेहद जरूरी हो गई है.

ऐसा भी नहीं कि लीला सैमसन ने सिर्फ सेकुलर लीलाएँ की हों, काँग्रेस की परंपरा के अनुसार उन्होंने कुछ आर्थिक लीलाएँ भी की हैं. इण्डिया टुडे पत्रिका में छपे हुए एक स्कैंडल की ख़बरों के अनुसार 2011 में लीला सैमसन ने कलाक्षेत्र संस्थान में बिना किसी टेंडर के, बिना किसी सलाह मशविरे के कूथाम्बलम ऑडिटोरियम में आर्किटेक्चर तथा ध्वनि व्यवस्था संबंधी बासठ लाख रूपए के काम अपनी मनमर्जी के ठेकेदार से करवा लिए और उसका कोई ठोस हिसाब तक नहीं दिया. उन्हीं के सताए हुए एक कर्मचारी टी थॉमस ने जब एकRTI लगाई, तब जाकर इस लीला का खुलासा हुआ. पाँच वर्ष के कार्यकाल में लीला सैमसन ने लगभग आठ करोड़ रूपए के काम ऐसे ही बिना किसी टेंडर एवं अनुमति के करवाए गए, जिस पर तमिलनाडु के CAG ने भी गहरी आपत्ति दर्ज करवाई थी, परन्तुकाँग्रेस की महारानी का वरदहस्त होने की वजह से उनका बाल भी बाँका नहीं हुआ. इसके अलावा कलाक्षेत्र फाउन्डेशन की निदेशक के रूप में सैमसन ने एक निजी कम्पनी मेसर्स मधु अम्बाट को अपनी गुरु रुक्मिणी अरुंडेल के नृत्य कार्यों का समस्त वीडियो दस्तावेजीकरण करने का ठेका तीन करोड़ रूपए में बिना किसी से पूछे एवं बिना किसी अधिकार के दे दिया और ताबड़तोड़ भुगतान भी करवा दिया. शिकायत सही पाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एस मोहन ने सभी अनियमितताओं की जाँच की तब यह पाया गया कि जिस कंपनी को वीडियो बनाने का ठेका दिया गया था, उसे ऐसे किसी काम का कोई पूर्व अनुभव भी नहीं था.

(अपनी गुरु रुक्मिणी अरुंडेल की मूर्ति के पास बैठीं लीला सैमसन) 

दोनों ही घोटालों के बारे में जब CAG ने लीला सैमसन से पूछताछ एवं स्पष्टीकरण माँगे, तब उन्होंने पिछली तारीखों के खरीदे हुए स्टाम्प पेपर्स पर उस ठेके का पूरा विवरण दिया, जिसमें सिर्फ छह नाटकों का वीडियो बनाने के लिए नब्बे लाख के भुगतान संबंधी बात कही गई. दैनिक पायनियर ने जब इस सम्बन्ध में जाँच-पड़ताल की तो पता चला कि ये स्टाम्प पेपर 03 सितम्बर 2006 को ही खरीद लिए गए थे, जिस पर 25अक्टूबर 2006 को रजिस्ट्रेशन नंबर एवं अनुबंध लिखा गया, ताकि जाँच एजेंसियों की आँखों में धूल झोंकी जा सके. (यह कृत्य गुजरात की कुख्यात सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड से मेल खाता है, उसने भी ऐसे ही कई कोरे स्टाम्प पेपर खरीद रखे थे और गवाहों को धमकाने के लिए उनसे हस्ताक्षर लेकर रखती थी).

बहरहाल, तमाम आर्थिक अनियमितताओं की शिकायत जस्टिस मोहन ने केन्द्रीय संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी को लिख भेजी, परन्तु लीला सैमसन पर कोई कार्रवाई होना तो दूर रहा, उनसे सिर्फ इस्तीफ़ा लेकर उन्हें और बड़ा पद अर्थात संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद से नवाज़ दिया गया. जैसा कि सभी जानते हैं, अम्बिका सोनी एवं लीला सैमसन पक्की सखियाँ हैं, और दोनों ही एक खुले रहस्य” की तरह सोनिया गाँधी की करीबी हैं.ज़ाहिर है कि लीला सैमसन का कुछ बिगड़ना तो बिलकुल नहीं था, उलटे आगे चलकर उन्हें सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष पद भी मिला...

तो मित्रों, अब आप समझ गए होंगे कि PK फिल्म के बारे में इतना विरोध होने, सेंसर बोर्ड के सदस्यों द्वारा विरोध पत्र देने के बावजूद लीला सैमसन इतनी दादागिरी क्यों दिखाती आई हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि प्रशासन एवं बौद्धिक(?) जगत में शामिल सेकुलर गिरोहउनके पक्ष में है. मोदी सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती प्रशासन के हर स्तर पर फ़ैली हुई ऐसी ही प्रगतिशील कीचड़युक्त गाद को साफ़ करना है. देखना है कि नरेंद्र मोदी में यह करने की इच्छाशक्ति और क्षमता है या नहीं.... वर्ना तब तक आए-दिन हिंदुओं एवं हिन्दू संस्कृति का अपमान होता रहेगा और हिन्दू संगठन सिर्फ विरोध दर्ज करवाकर अगले अपमान” का इंतज़ार करते रहेंगे
गोडसे के नाम पर बन रही फिल्म 'देशभक्त नाथूराम गोडसे' पर विवाद फिल्म पर बैन लगाने की मांग की गई है और मामला कोर्ट तक पहुंच गया है। फिल्म हिंदू महासभा की ओर से बनाई गई है और 30 जनवरी को रिलीज होनी है।इस संबंध में अन्ना हजारे के सहयोगी सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत पाटील ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा के खिलाफ
मुकदमा दायर किया है।
पुणे की एक सिविल कोर्ट 29 दिसंबर को यह बताएगी कि मामले पर सुनवाई उसके अधिकार क्षेत्र में है या नहीं।30 जनवरी को गांधी की पुण्यतिथि है।गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में गांधी का वध किया था।
हेमंत पाटील ने आरोप लगाया है कि फिल्म सांप्रदायिक आधार पर लोगों की भावनाएं भड़का सकती है, इसलिए इस पर बैन लगाया जाए।याचिका में पाटील ने आरोप लगाया है कि महासभा की ओर से मीडिया में कहा था कि फिल्म में गांधीबध करने वाला नाथूराम
गोडसे को देशभक्त और गांधी को हिंदू- विरोधी दिखाया गया है । हालांकि नाथूराम गोडसे की पोती हिमानी सावरकर ने फिल्म पर बैन लगाने की मांग को सरासर गलत बताया है
हाल ही मे सुप्रीम कोंर्ट न ेPK फिल्म पर ये कह कर बेन लगानेसे इंकार कर दिया था की जिसे पसंद नहीं है वो फिल्म ना देखे ,देखते है अब गोडसे की फिल्म पर कोर्ट अपने पिछले वक्तव्य की तरह रहेगा या कोर्ट भी दोगलापांति मे विश्वाश रखता है??

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 बच्चों को दुश्मनों से मुकाबला करने से लेकर भारीभरकम हथियार चलाने व नृशंस हत्या की ट्रेनिंग दे रहा है। माना जा रहा है कि ये तस्वीरें इस्लामिक स्टेट की कथित राजधानी रक्का के पास खींची गई हैं।
‘मिनी स्कूल ऑफ जिहाद’ बताकर आईएसआईएस कैसी घिनौनी हरकत कर रहा है। विचलित कर देने वाली इस तस्वीर को ‘अल शरिया’ नामक स्कूल बताया जा रहा है। ट्विटर पर आईएसआईएस समर्थकों द्वारा इसे तेजी से शेयर किया जा रहा है। एक कार्यकर्ता समूह की मानें, तो अल शरिया स्कूल में 16 साल के कम उम्र के लड़कों को विशेषकर मिलिट्री ट्रेनिंग दी जा रही है।
हैरानी की बात ये है कि आईएसआईएस बच्चों को बरगला कर हिटलर शासनकाल में दी गई यातनाओं के तरीकों की तालीम दे रहा है। यही नहीं, सुन्नी आतंकी इस्लाम के नाम पर बच्चों को आत्मघाती हमलावर बनने के लिए भी उकसा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन बच्चों को शरिया कैंप में आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
अंग्रेजी वेबसाइट वाइस (जिहादी गतिविधियों को कवर करने वाले) की डॉक्यूमेंट्री में आईएसआईएस का मीडिया प्रवक्ता अबु मौसा (मर चुका) इस तरह की बातें कर चुका है।
http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/44919220.cms
येशु मसीह की जीवनी पर बानी फिल्म "डा विन्ची कोड" और वैटिकन में पोप के पद के लिए होती हत्याओं पर आधारित कहानी "एंजेल्स एंड डीमॉन्स" तथा मुसलमानो के पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी पर बनी "इन्नोसेंस ऑफ़ मुस्लिम्स " को भी दिखाना चाहिए! जितनी PK चढ़ी है सब उतर जाएगी!
याद रहे इन तीन फिल्मो पर भारतीय सेंसर बोर्ड ने क्रिस्चियन और मुसलमानो धार्मिक भवनाएं आहत होने के कारण बैन लगाया था!
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 हिन्दू ह्यूमन राइट की बात  हिन्दू कट्टरता को दर्शाता है ??
 केरल मे एक महिला को पीरियड हो रहे थे उस ने Sanitary टावल Use कर लिया तो उस फैक्ट्री के अधिकारियों से सभी महिलयों को को नंगा करने के ये देखने का आदेश दे दिया कि किस के Period चल रहे है और उधर एक दार्जिलिंग के एक ईसाई स्कूल मे कक्षा 7 की बच्ची को गौ मांस खाने के लिए परेशान किया तो उस ने आत्महत्या कर ली थी परंतु ये किसी मीडिया ने नही दिखाया क्यूकि दोनों खबर हिन्दू ह्यूमन राइट से संबन्धित है जबकि खराब खाने देने के लिए विरोध के तौर पर एक रोजा रखने वाले को खाना खिलाने पर मीडिया ने हँगामा कर दिया था अब जब हिन्दू से संबन्धित खबर को मीडिया नही दिखाता तो क्या हम भी मौन हो कर अपने छवि का आचार दाबा के घर मे बैठे  ?

edhar--udhar---

हमने दिल्ली की सडकों पर कई सभ्य परिवार के से लगने वाले छोटे बच्चे भीख मागते देखे थे, जिसकी जाँच कराने के लिए पीएमओ साहब से निवेदन कर एक चिट्ठी लिखी थी, जिसपर जाँच के आदेश आ गये हैं, अब सभी बच्चों ओर उनके माता-पिता की डीएनए जाँच होगी, यदि वे उनके बच्चे नहीं निकले तो कड़ी इन्क्वायरी कर उनके असली माता-पिता को खोजा जायेगा, ओर सभी छोटे बच्चों से भीख माँगनी बन्द कराई जायेगी,..
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भगवद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने के जो खिलाफ है उनको सुनाने के लिए ।
जानिए भगवद् गीता के 9 बेहतरीन मैनेजमेंट सूत्र जिनमे किसी भी व्यक्ति को अपनी हर परेशानी का हल मिल सकता है ।
धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए प्रतिवर्ष इस तिथि को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है।
गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है, जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती हैं। आज हम आपको इस लेख में गीता के 9 चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों से रूबरू करवा रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-
1.श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।
मैनेजमेंट सूत्र- भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।
2.श्लोक
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
अर्थ- हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योग युक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।
3.श्लोक
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।
अर्थ- योग रहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।
मैनेजमेंट सूत्र - हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।
4.श्लोक
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:। निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
अर्थ- जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।
मैनेजमेंट सूत्र - यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।
5.श्लोक
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
अर्थ- कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
मैनेजमेंट सूत्र- बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रूप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।
6.श्लोक
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
अर्थ- तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
मैनेजमेंट सूत्र- श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।
7.श्लोक
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थ- श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।
8.श्लोक
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
अर्थ- ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही कराए।
मैनेजमेंट सूत्र- ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।
9.श्लोक
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। म वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
अर्थ- हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए, जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।
लंदन: ईसाई धर्म की मान्यताओं के अनुसार, देवपुत्र माने जाने ईसा मसीह के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है।
ईसा मसीह ने एक वेश्या मैरी मैगडेलिन से शादी की थी और उनके दो बच्चे भी थे।
यह दावा ब्रिटिश लाइब्रेरी में रखे 1500 साल पुराने एक दस्तावेज के आधार पर किया गया है.
इन दोनों के संबंधों को दर्शाने वाली कई हॉलीवुड फिल्में भी बन चुकी हैं
लेकिन इन फिल्मों में दिखाए जाने वाले तथ्यों को मात्र एक कल्पना बताकर झुठलाया जाता रहा है.
ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के अनुसार ब्रिटिश लाइब्रेरी में 1500 साल पुराना एक दस्तावेज मिला है.
प्रोफेसर बैरी विल्सन और लेखक सिमचा जैकोविक ले को 'लोस्ट गौस्पेल' के नाम से चर्चित इस दस्तावेज को अरामाइक भाषा से ट्रांसलेट करने में महीनों का समय लगा.
इन्होंने दावा किया है कि वर्जिन मैरी वास्तव में ईसा मसीह की मां नहीं, बल्कि उनकी पत्नी मैरी मैगडेलीन हैं.
इसके अनुसार ईशा ने न सिर्फ मैरी से शादी की थी बल्कि उनके दो बच्चे भी थे.
अखबार ने बुधवार को ईसा मसीह के बच्चों के नाम का खुलासा करने का भी वादा किया है.
इससे पहले भी ईसा मसीह के बारे में लिखी गई किताबों में मैरी का अक्सर जिक्र होता रहा है और ईसा मसीह के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में उनकी मौजूदगी रही है. ट्रांसलेटेड किताब को पीगैसस प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

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Jitendra Pratap Singh
एबीपी न्यूज़ बहस कर रहा है की फिल्म पीके पर प्रतिबन्ध की मांग क्यों ? ये चैनेल इस बात पर बहस क्यों नही करता की आखिर सलमान रश्दी की बेहद जानकारी भरी किताब सेटेनिक वर्सेज यानी शैतानी आयते पर भारत सरकार ने प्रतिबन्ध क्यों लगा दिया ? क्या सिर्फ मुस्लिमो की भावनाए ही आहत होती है ? और वो भी जो किसी भी विज्ञान पर नही आधारित है .. आधारित है तो सिर्फ खून कत्लेआम हिंसा और औरतो को दोगला समझने पर ..

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