Saturday, 17 January 2015

पाक हिंदू लड़कियों का हाथ थामेंगे यूपी के युवा
सहारनपुर। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंध कभी सामान्य भले ही न हो, लेकिन सहारनपुर के मिरगपुर गांव में युवाओं को सीमापार से आने वाली दुल्हनों का इंतजार है। जी हां। मिरगपुर में रहनेवाले इतिहासकार सुरेंद्र कोछड और संत कमलानंद ने पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू परिवारों की बेटियों का हिंदुस्तान में रिश्ता कराने और उन्हें बेहतर जिंदगी देने का बीड़ा उठाया है।
उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू लड़कियों से शादी करने के लिए तैयार युवाओं का न सिर्फ बायोडाटा मंगाया है, बल्कि उन्होंने खुद ही इन रिश्तों का पैगाम सीमापार भेजने का जिम्मा भी लिया है। इस कोशिश के तहत पाकिस्तान में रह रहे हिंदू परिवारों को न सिर्फ हिंदुस्तान से जोड़ने है बलकि उन परिवारों को भी हिंदूस्तान में बसाने की कोशिश की जाएगी, जो पाकिस्तान में नहीं रहना चाहते।
इसी कोशिश के तहत सहारनपुर के मिरगपुर गांव के इतिहासकार सुरेंद्र कोछड और संत कमलानंद की पहल से पाक में रह रही हिन्दू बेटियों को गांव में बसाने की मुहिम चल रही है। जिसमें सिर्फ एक दिन में ही 150 युवाओं ने शादी के लिये अपने बायोडाटा दिये है। जिसके बाद अब इनके रिश्ते की बात पाकिस्तान में रह रहे परिवारों से की जाएगी। वहां से हरी झंडी मिलने के बाद दोनों पक्षों को मिलाकर शादी की बात आगे बढ़ाई जाएगी।
मिरगपुर गांव में चल रही इस पहल से पाक हिन्दुओं में भी खुशी का माहौल है। वहां रह रहे हिंदू परिवार भी अपनी बेटियों की शादी के लिए राजी है। अब ऐसे में अगर सबकुछ ठीक रहा तो जल्द ही मिरगपुर में गांव में पाकिस्तान से दुल्हन आ सकती है।
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भारत एक ऐसा सेकुलर देश है जहाँ एक धर्म के लोग चार पत्नियाँ रख सकतें हैं, बाकी लोग अगर चार बच्चों की बात भी करें तो गुनाह है।
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हिरण को मारने पर सलमान को जेल और गाय को काटने पर सब्सीडी ,साला इस देश मे इंसान तो इंसान जानवरो के लिये भी अलग अलग कानून है…
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Thursday, 15 January 2015

sanskar

सायंकाल में देवता के समक्ष दीप क्‍यों जलायें ?

१. संधिकाल और संधिकाल में आचारपालन का महत्त्व

संधिकालकी परिभाषा : ‘प्रातः सूर्योदयके पूर्व और सायंकाल सूर्यास्तके उपरांत ४८ मिनटोंके (दो घटिकाओंके) कालको ‘संधिकाल’ कहते हैं ।
संधिकालका पर्यायवाची शब्द : ‘पर्वकाल’
संधिकालमें आचारपालनका महत्त्व : संधिकाल अनिष्ट शक्तियोंके आगमनका काल है । उनसे रक्षण होनेके लिए धर्मने इस कालमें आचारपालनको महत्त्व दिया है । पर्वकालमें कोई भी हिंसात्मक कृत्य नहीं करते ।
 २. सायंकाल घर में धूप दिखाएं
‘इस आचारद्वारा वास्तुके साथ ही कपडोंकी भी शुद्धि होनेमें सहायता होती है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
 ३. सायंकाल देवताके समक्ष दीप जलाकर उसे नमस्कार करें
सायंकाल संध्या करें और देवताके समक्ष दीप जलाएं । इसी समय आंगनमें तुलसीके पास भी दीप जलाएं ।
देवताके सामने २४ घंटे दीप जलाए रखना चाहिए । सायंकाल दीपककी बातीपर आई कालिख निकालें । आजकल अधिकांश लोगोंके घरमें २४ घंटे दीप नहीं जलता है । इसलिए वे सायंकाल होनेपर देवताके समक्ष दीप जलाएं ।
‘संध्यासमय, अर्थात् दीप जलानेके समय देवता और तुलसीके समीप दीप जलानेसे घरके चारों ओर देवताओंकी सात्त्विक तरंगोंका सुरक्षाकवच निर्माण होता है । वातावरणमें अनिष्ट शक्तियोंके संचारसे प्रक्षेपित कष्टदायक तरंगोंसे घरकी तथा व्यक्तियोंकी इस कवचसे रक्षा होती है । इसलिए यथासंभव दीप जलानेके समयसे पूर्व घर लौटें अथवा दीप जलानेके उपरांत घरसे बाहर न निकलें । अधिकांश लोगोंको संध्यासमय अनिष्ट शक्तियोंकी बाधा सर्वाधिक होती है । अघोरी विद्याके उपासक संध्यासमय वातावरणकी परिधिमें प्रविष्ट अनिष्ट शक्तियोंको अपने वशमें कर उनसे अनिष्ट कृत्य करवाते हैं ।
इसलिए संध्यासमय अधिक मात्रामें दुर्घटनाएं और हत्याएं होती हैं या बलात्कारके कृत्य होते हैं । इस कालको ‘साई सांझ’ अर्थात् ‘कष्टदायक या विनाशका समय’ कहते हैं ।’
४. देवता के पास दीप जलाने के उपरांत श्लोक बोलें ।

४ अ. श्लोकपाठके लाभ

‘शुभं करोति कल्याणं …’ जैसे श्लोक बोलनेसे दीपकी स्तुतिद्वारा अनिष्ट शक्तियोंको निरस्त करनेका मारक कार्य साध्य किया जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
‘स्तोत्रपाठद्वारा निर्मित सात्त्विक स्पंदनोंसे घरकी शुद्धि होती है । इसलिए अनिष्ट शक्तियोंकी पीडा भी कम होती है ।
दीप जलानेके उपरांत स्तोत्रपाठ करनेसे बच्चोंकी स्मरणशक्ति बढती है, वाणी शुद्ध होती है एवं उच्चारण भी स्पष्ट होनेमें सहायता मिलती है ।’


शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा ।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ।।
अर्थ : हे दीपज्योति, तुम शुभ और कल्याणकारी हो, स्वास्थ्य एवं धनसंपदा प्रदान करती हो और शत्रुबुद्धिका नाश करती हो; अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूं ।
दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ।।
अर्थ : दीपका प्रकाश परब्रह्मस्वरूप है । दीपकी ज्योति जगत्का दुख दूर करनेवाला परमेश्वर है । दीप मेरे पाप दूर करे । हे दीपज्योति, आपको नमस्कार करता हूं।
 ५. श्लोकपाठ के उपरांत देवता की आरती और प्रार्थना करें ।
दीप जलानेके समय घरके सभी सदस्य उपस्थित रहें । सभी उपस्थित रहनेके लाभ :
अ. ‘दीप जलानेके समय घरके सभी सदस्य उपस्थित रहनेसे छोटे बच्चोंपर अच्छे संस्कार होते हैं ।
आ. प्रार्थनाके समय परिवारके सभी व्यक्तियोंका एकत्र होना, छोटोंका बडोंको अभिवादन करना, एक-दूसरेकी पूछताछ करना, कोई त्यौहार हो, तो उसका महत्त्व छोटे बच्चोंको समझाना इत्यादि घरके वातावरणको बनाए रखनेमें सहायक होते हैं ।
आजकल दूरचित्रवाहिनीके शोर-गुलमें स्तोत्रपाठ की ध्वनि कहीं खो गई है । आज विभक्त परिवारपद्धतिके कारण हो रही हानि हम देख ही रहे हैं । इसके लिए कौन उत्तरदायी है ? दूरदर्शन, माता-पिता, अध्यात्मविहीन शिक्षाप्रणाली, समाज या प्रत्येक व्यक्ति ?’
 ६. संध्या समय छोटे बच्चों का लगी कुदृष्टिका प्रभाव उतारना (नजर उतारना)
छोटे बच्चोंपर कुदृष्टिका प्रभाव शीघ्र पडता है । कुदृष्टि-निवारणका अर्थ है – कुदृष्टिके कारण देहमें निर्माण हुए कष्टदायक स्पंदनोंको विशिष्ट पदार्थोंमें खींचकर, उनके माध्यमसे व्यक्तिका कष्ट दूर करना । कुदृष्टि उतारनेके लिए खडा नमक-राई, खडा नमक-लाल मिर्च, पानीवाले नारियल इत्यादिका प्रयोग करते हैं । जिसे अनिष्ट शक्तिका कष्ट है, उसकी भी कुदृष्टि इसी पद्धतिसे उतार सकते हैं ।
 ७. सायंकाल के संधिकाल में बताई गई निषिद्ध बातें
संधिकालमें अनिष्ट शक्तियां प्रबल होनेके कारण इस कालमें निम्नलिखित बातें निषिद्ध बताई हैं ।
अ. सोना, खाना-पीना और भोजन करना
आ. शुभ कार्यका प्रारंभ
इ. वेदमंत्रोंका पाठ
ई. दूसरेको श्वेत वस्तु देना
उ. धनका लेन-देन
ऊ. अश्रुमोचन (रोना)
ए. यात्राके लिए निकलना
ऐ. शपथ लेना; गालियां देना; झगडे करना और अभद्र एवं असत्य बोलना
ओ. गर्भवती स्त्री यह न करे –
१. चौखटपर खडे रहना : इससे गर्भको हानि होती है ।
२. सायंकाल घर लौटनेवाले प्राणियोंको देखना : भूत-पिशाच प्राणियोंके पैरोंमें प्रवेश कर घरमें घुसनेका प्रयत्न करते हैं । इसलिए सायंकाल घर लौटते हुए प्राणियोंको न देखें ।
औ. अग्निहोत्रियोंके लिए : अग्निहोत्री संधिकालके पूर्व ही अग्नि प्रज्वलित करते हैं; परंतु संधिकाल बीतनेके उपरांत होम करते हैं ।
अं. यथासंभव गंगाके अतिरिक्त अन्य नदियोंके तटपर न बैठें ।
आरोहणं गवां पृष्ठे प्रेतधूमं सरित्तटम् ।
बालतपं दिवास्वापं त्यजेद्दीर्घं जिजीविषुः ।

– स्कंदपुराण, ब्रह्म. धर्मा. ६. ६६-६७
अर्थ : जो दीर्घकाल जीवित रहना चाहता है, वह गाय-बैलकी पीठपर न बैठे, चिताका धुंआ अपने शरीरको न लगने दे, (गंगाके अतिरिक्त दूसरी) नदीके तटपर न बैठे, उदयकालीन सूर्यकी किरणोंका स्पर्श न होने दे तथा दिनके समय सोना छोड दे ।
यथासंभव संध्यासमय गंगाके अतिरिक्त अन्य नदियोंके किनारे न बैठनेका आधारभूत शास्त्र
‘गंगा नदीको ‘गंगोत्री’ (सात्त्विक तरंगोंका शिवरूपी स्रोत प्रदान करनेवाली)’ भी कहते हैं । गंगाके जलसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगोंके कारण गंगातटका वायुमंडल शुद्ध और चैतन्यमय बना रहता है । इसलिए इस वातावरणमें अनिष्ट शक्तियोंद्वारा पीडा होनेकी आशंका अत्यल्प होती है । इसके विपरीत, अन्य नदियोंके तटपर सात्त्विकता अपेक्षाकृत कम होती है । इसलिए नदीके किनारे बैठे जीवको अनिष्ट शक्तियोंके संचारके कारण कष्ट होनेकी आशंका अधिक होती है । नदीके किनारे विचरनेवाली कनिष्ठ स्तरकी अनिष्ट शक्तियोंमें पृथ्वी और आपतत्त्व प्रबल होनेसे, ये शक्तियां पृथ्वी और आपतत्त्वोंसे बनी मानवीय देहके साथ अल्पावधिमें एकरूप हो सकती हैं । इसलिए यथासंभव संध्या समय नदीके तटपर न बैठें एवं नदीके तटपर घूमनेसे बचें ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)

८. रात्रिकाल में पालन करने योग्य आचार

८ अ. रात्रिकाल में दर्पण न देखें !

दर्पणके प्रतिबिंबपर वातावरणमें प्रबल अनिष्ट शक्तियां तुरंत ही आक्रमण कर सकती हैं; इसलिए रातमें दर्पण देखना निषिद्ध
‘रातका समय रज-तमात्मक वायुसंचार हेतु पूरक होता है । अतः वह सूक्ष्म रज-तमात्मक गतिविधियों और अनिष्ट शक्तियोंकी सजगतासे संबंधित होता है । दर्पणमें दिखाई देनेवाले देहका प्रतिबिंब देहसे प्रक्षेपित जीवकी सूक्ष्म-तरंगोंसे अधिक संबंधित होता है, इसलिए इस प्रतिबिंबपर वातावरणमें स्थित प्राबल्यदर्शक अनिष्ट शक्तियां तुरंत ही आक्रमण कर सकती हैं ।
इसके विपरीत सवेरे वायुमंडल सात्त्विक तरंगोंसे युक्त होता है । अतः दर्पणमें दिखाई देनेवाले सूक्ष्म-प्रतिबिंबपर, वायुमंडलमें स्थित सात्त्विक तरंगोंकी सहायतासे आध्यात्मिक उपाय होते हैं और स्थूलदेह अपनेआप ही हलका हो जाता है । इसलिए प्रातः दर्पणमें प्रतिबिंब देखना लाभदायक है, तथापि वही प्रतिबिंब रज-तमात्मक गतिविधियोंके लिए पूरक रात्रिकालमें देखना हानिकारक हो सकता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
दर्पणमें प्रतिबिंबपर वातावरणकी प्राबल्यदर्शक अनिष्ट शक्तियोंद्वारा आक्रमणका व्यक्तिपर क्या परिणाम होता है ?
‘प्रतिबिंबमें जीवसे संबंधित तरंगें उसके सूक्ष्मदेहसे अधिक संलग्न होती हैं । इस कारण अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणका अधिक परिणाम, जीवको आध्यात्मिक स्तरपर अनिष्ट शक्तिकी पीडा होनेमें होता है । इस आक्रमणका परिणाम जीवके शरीर और मनपर होता है । प्राणशक्ति कम होना, थकान होना, अस्वस्थ लगना, मनमें आत्महत्याके विचार आना, अनिष्ट शक्तिका देहमें प्रवेश होना, अनिष्ट शक्तिके प्रभावके कारण अपना अस्तित्व कम होना इत्यादि आध्यात्मिक कष्टोंका जीवको सामना करना पड सकता है ।’ – सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
प्रत्यक्ष व्यक्तिपर आक्रमण करनेकी अपेक्षा व्यक्तिके प्रतिबिंबके माध्यमसे व्यक्तिपर आक्रमण करना अनिष्ट शक्तियोंके लिए अधिक लाभदायक क्यों होता है ?
‘व्यक्तिके प्रतिबिंबके माध्यमसे अनिष्ट शक्तियोंको जीवका एक सूक्ष्म-रूप ही प्रत्यक्ष दर्शरूपमें मिल सकता है । जीवके सूक्ष्म-रूपपर आक्रमण करनेसे उसका परिणाम दीर्घकालतक बना रहता है । परिणामस्वरूप देहपर गहरा प्रभाव पडनेसे उसका अनुचित लाभ उठाकर अनिष्ट शक्तियोंके लिए जीवके देहके सूक्ष्म-कोषोंमें काली शक्तिका स्थान बनाना सरल होता है । इसके लिए स्थूलदेहपर आक्रमण करनेकी अपेक्षा व्यक्तिके प्रतिबिंबके सूक्ष्म-रूपका उपयोग कर जीवको दीर्घकालतक कष्ट देना और उसके देहमें प्रत्यक्ष प्रवेश करना अनिष्ट शक्तियोंके लिए सरल हो सकता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
अनिष्ट शक्तियोंद्वारा दर्पणमें उभरे व्यक्तिके प्रतिबिंबके माध्यमसे व्यक्तिपर आक्रमण करना और प्रत्यक्ष व्यक्तिपर आक्रमण करना – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)

८ आ. होहल्ला न मचाएं अथवा सीटी न बजाएं !

अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट न हो; इसलिए रातके समय होहल्ला मचाना अथवा सीटी बजाना निषिद्ध : ‘होहल्ला मचाने’ को मांत्रिककी भाषामें ‘चित्कार’ कहते हैं । इस प्रकारकी ध्वनि उत्पन्न कर मांत्रिक कनिष्ठ स्तरकी दास्य अनिष्ट शक्तियोंको बुलाते हैं । अघोरी विधिद्वारा सीटी समान ध्वनि उत्पन्न कर कनिष्ठ स्तरकी अनिष्ट शक्तियोंकी शक्ति जगाते हैं और उन्हें अनिष्ट कर्म करनेके लिए प्रेरित करते हैं । इसलिए ‘होहल्ला मचाना’ तामसिकताका अर्थात् अनिष्ट शक्तियोंका आवाहन करनेका, जबकि ‘सीटी बजाना’ रजोगुणका, अर्थात् अनिष्ट शक्तियोंमें विद्यमान कार्यशक्तिको जगानेका लक्षण है । अतः रज-तमोगुणके लिए पोषक रात्रिकालमें सीटी न बजाएं अथवा होहल्ला न मचाएं ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
 ८ इ. मद्यपान कर नाच-गानेसे बचें !
रात्रिके समय मदिरा पीकर नाचना, गाने गाना इत्यादिके कारण व्यक्तिको अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट होकर उसके आस-पास और घरका वातावरण दूषित होना : ‘रातके समय मनोरंजन, रुचि अथवा समय बितानेके लिए मद्यपान कर डान्सबारमें (मद्य पीकर संगीतकी तालपर नृत्य करनेका स्थान) नाचने और गाना गानेसे अल्पावधिमें तमोगुण अत्यधिक बढता है । इससे व्यक्तिको अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट होनेकी आशंका रहती है तथा व्यक्तिमें बढे हुए तमोगुणका परिणाम उसके आस-पासके और घरके वातावरणपर होता है । परिणामस्वरूप वातावरण भी दूषित हो जाता है ।’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे)
झाडू लगाते समय पूर्व दिशा की ओर कूडा क्‍यों ना ढकेलें ?

१. झाडू कब लगाएं ?

‘यदि घर अस्वच्छ हो गया हो, तो नामजप भावपूर्वक करते हुए क्षात्रभावसे, किसी भी समय झाडू लगाएं । ऐसा करनेसे ही झाडू लगानेकी कृतिसे निर्मित कष्टदायक स्पंदनोंका देहपर प्रभाव नहीं होगा ।
कर्मबंधनके आचाररूपी नियम स्वयंपर लागू कर दिनमें ही, अर्थात् रज-तमात्मक क्रियाका अवरोध करनेवाले समयमें ही यह कर्म कर लें ।

सायंकाल झाडू न लगाना

दिनमें एक बार ही झाडू लगाएं । सायंकालके समय झाडू न लगाएं; क्योंकि इस कालमें वायुमंडलमें रज-तमात्मक स्पंदनोंका संचार अधिक मात्रामें होता है । इसलिए झाडू लगानेकी रज-तमात्मक क्रियासे संबधित इस प्रक्रियासे घरमें अनिष्ट शक्तियोंके प्रवेशकी आशंका अधिक रहती है । दिनमें वायुमंडल सत्त्वप्रधान होता है, इसलिए झाडू लगानेकी रज-तमात्मक क्रियासे निर्मित कष्टदायक स्पंदनोंपर यह वायुमंडल यथायोग्य अंकुश लगाए रखता है । अतः इस क्रियासे किसीको भी कष्ट नहीं होता ।

त्रिकालसंध्यासे पूर्व झाडू लगाना

संकलनकर्ता : दिनभर घरमें एकत्रित हुआ कूडा संध्याके समय निकालनेसे, उसके उपरांत आनेवाले रज-तमात्मक स्पंदन वास्तुमें कम मात्रामें आकृष्ट होते हैं । इसलिए संध्यासमय भी झाडू लगाते हैं । आपने ऐसा क्यों बताया है कि ‘सायंकालमें झाडू न लगाएं ?’
एक विद्वान : कलियुगके जीव रज-तमप्रधान हैं । अतः जहांतक हो सके, वे रज-तमात्मक स्पंदनोंको आकृष्ट करनेवाले कर्म सायंकालमें न करें । सायंकालमें वायुमंडलमें रज-तमात्मक तरंगोंका संचार बढ जाता है । झाडू लगानेकी घर्षणात्मक कृतिद्वारा भूमिसे संलग्नता साध्य होती है । इससे पातालके कष्टदायक स्पंदनोंकी गतिमें वृद्धि हो जाती है ।
कूडा बाहर फेंकनेकी कृतिकी अपेक्षा नादके स्तरपर सूक्ष्म स्वरूपमें वास्तुमें रज-तमात्मक स्पंदनोंके घूमते रहनेकी मात्रा अधिक हो जाती है । इसीलिए जहांतक संभव हो, त्रिकालसंध्याका समय बीतनेपर झाडू न लगाएं । अतः कहा गया है कि, ‘यथासंभव, सायंकालमें झाडू न लगाएं ।’ त्रिकालसंध्यासे पूर्व झाडू लगाते समय उत्पन्न नादसे रज-तमात्मक तरंगें कम आकृष्ट होती हैं ।
ऐसा कहते हैं कि, त्रिकालसंध्याके समय घरमें लक्ष्मी आती है । अर्थात् त्रिकालसंध्यासे पूर्व झाडू लगाकर त्रिकालसंध्याके समय तुलसीके निकट दीप जलानेसे शक्तिरूपी तरंगें दीपकी ओर आकृष्ट होकर वास्तुमें प्रवेश करती हैं । इस तेजदायी देवत्वके कारण सायंकालके कष्टदायक स्पंदनोंसे रक्षण होता है ।’
२. झाडूसे कूडा कैसे निकालें ?

२ अ. झाडू लगाते समय कमरकी दाहिनी ओर झुककर दाहिने हाथमें झाडू लेकर, पीछेसे आगेकी ओर कूडा धकेलते हुए ले जाएं ।

कमर झुकानेसे होनेवाली प्रक्रिया : ‘कूडा निकालते समय कमरसे झुकनेसे नाभिचक्रपर दबाव पडनेसे पंचप्राण जागृत होते हैं । घुटने झुकाकर कभी भी कूडा न निकालें; क्योंकि इस मुद्रासे घुटनेके रिक्त स्थानमें संग्रहित अथवा घनीभूत रज-तमात्मक वायुधारणाको गति प्राप्त होनेकी आशंका रहती है । इस मुद्रासे झाडू लगानेपर पातालसे वायुमंडलमें ऊत्सर्जित कष्टदायक स्पंदन देहकी ओर आकृष्ट होनेका भय रहता है । इसलिए यथासंभव, देहमें रज-तमात्मकताका संवर्धन करनेवाली ऐसी कृति न करें ।
दाहिनी ओरसे झुकनेसे होनेवाली प्रक्रिया : दाहिनी ओर झुककर कूडा निकालनेसे देहकी सूर्य नाडी जागृत रहती है तथा तेजके स्तरपर, भूमिसे उत्सर्जित कष्टदायक स्पंदनोंसे रक्षण होता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २६.१०.२००७, दोपहर ५.२०)

२ आ. पूर्व दिशाके अतिरिक्त अन्य किसी भी दिशाकी ओर कूडा ढकेलें ।

‘पूर्व दिशाकी ओरसे देवताओंकी सगुण तरंगोंका पृथ्वीपर आगमन होता है । कूडा रज-तमात्मक होता है, इसलिए पश्चिमसे पूर्वकी ओर कूडा ढकेलते समय कूडा और धूलका प्रवाह पूर्व दिशामें होता है तथा इसके माध्यमसे रज-तम कण एवं तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । इससे पूर्व दिशासे आनेवाली देवताओंके सगुण तत्त्वकी तरंगोंके मार्गमें बाधा निर्माण होती है । अतः झाडू लगाते हुए पूर्वकी ओर जाना अयोग्य है । पूर्व दिशाके अतिरिक्त अन्य किसी भी दिशाकी ओर झाडू लगाते हुए जा सकते हैं ।’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, २८.११.२००७, रात्रि १०.५५)
झाडू लगाते समय अंदरसे बाहरकी दिशामें, अर्थात् द्वारकी दिशामें ढकेलते हुए आगे ले जाएं ।

२ इ. कूडा आगे ढकेलते समय झाडूको भूमिसे विपरीत दिशामें रगडकर न ले जाएं ।

‘झाडू लगाते समय उसे आगेकी ओर ढकेलते हुए ले जाएं । एक बार कूडा आगे करनेके उपरांत झाडूको पुनः पीछेकी ओर घिसते हुए झाडू न लगाएं; क्योंकि इस घर्षणात्मक क्रियासे भूमिपर घडीकी सुइयोंकी विपरीत दिशामें घूमनेवाले गतिमान भंवरोंकी निर्मिति होती है । झाडू लगाते समय भूमिके निकटके पट्टेसे पातालसे उत्सर्जित कष्टदायक स्पंंदन इन भंवरोंमें घनीभूत होते हैं । इस कारण कूडा निकालनेके उपरांत भी सूक्ष्म दृष्टिसे वास्तुमें अशांति ही रहती है । अतः झाडू विपरीत दिशामें, पीछे ले जाकर कूडा न निकालें । प्रत्येक बार आगेसे पीछे आते समय झाडू भूमिको बिना घिसे उठाकर पीछे ले जाएं, फिर उसे भूमिपर रखकर कूडा निकालें ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)

२ ई. झाडू भूमिपर न पटकें और न ही उसे बलपूर्वक घिसकर कूडा निकालें ।

‘कूडा निकालते समय झाडू भूमिपर मारने अथवा बलपूर्वक घिसकर कूडा निकालने जैसी कृतियोंसे कष्टदायक नाद उत्पन्न होते हैं । इससे पातालके तथा वास्तुके कष्टदायक स्पंदन कार्यरत होते हैं । कालांतरसे इन तरंगोंका वातावरणमें प्रक्षेपण आरंभ होता है एवं वास्तुमें अनिष्ट शक्तियोंका संचार भी बढता है । इसलिए ऐसी कृतियां न करें । उपरोक्त सभी कृतियां तमोगुणी वृत्तिकी प्रतीक हैं ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
(‘सन् २००४ में गोवाके फोंडा स्थित सनातनके आश्रममें कूडा निकालनेके संदर्भमें विविध प्रयोग किए गए । तब अनुभव हुआ कि, ऊपर बताए अनुसार कूडा निकालनेपर अधिक लाभ होता है । प्रत्येक बार ईश्वर पहले अनुभूति देते हैं, तदुपरांत ज्ञान देते हैं । २६.१०.२००७ को प्राप्त ज्ञान एक अन्य उदाहरण है ।’ –हिंदू जनजागृति समितीके प्रेरणास्थान, प. पू.  डॉ. जयंत आठवले)
 ३. कूडा एकत्रित करनेवाले निर्वात यंत्रसे (वैक्यूम क्लीनरसे) वातावरणमें रज-तमका प्रदूषण बढना
‘कूडा एकत्रित करनेवाले निर्वात यंत्रसे वायुकी आकर्षणशक्तियुक्त तेज-वायुयुक्त वेगधारी ऊर्जासे भूमिसे संलग्न कूडा संपूर्णतः खींच लिया जाता है । इस प्रकार भूमिको घिसनेवाले तेज-वायुयुक्त प्रवाहसे कण-कण कूडा यंत्ररूपी थैलीमें खींच लिया जाता है । तब भी वायुके भूमिसे होनेवाले (तेज-वायुरूपी घर्षणात्मक स्तरपर) स्पर्शसे पातालकी अनिष्ट शक्तियोंके काली शक्तिके स्थान कार्यरत होते हैं । उसी समय फुवारेके समान वायुमंडलमें काली शक्तिका फुवारा उडाते हैं । अर्थात् बाह्य स्तरपर मनुष्यको लगता है कि ‘पूरा परिसर स्वच्छ हो गया’; परंतु ऐसी प्रक्रिया नहीं होती । संपूर्ण वायुमंडल कष्टदायक वेगधारी ऊर्जासे आवेशित होता है । भूमिसे लगभग पांचसे छः फुट ऊंचाईतक इस कष्टदायक ऊर्जाका कार्यक्षेत्र निर्माण हो जाता है । साधारण पुरुषकी ऊंचाईका क्षेत्र कष्टदायक स्पंदनोंसे आवेशित होता है । इस कारण बाह्यतः इस स्वच्छ परिसरमें विचरण करनेवाला मनुष्य संपूर्णतः काली शक्तिके स्पंदनोंमें रहता है एवं इन काले आवरणोंमें ही दिनभर अपना व्यवहार पूर्ण करता है । इसलिए वह जिस स्थानपर जाता है, उस स्थानके वायुमंडल तथा उसके संपर्कमें आनेवाले मनुष्यदेहको भी सूक्ष्म-स्तरपर दूषित कर देता है ।
इसीलिए विदेशमें प्रचलित स्वच्छताकी यांत्रिक पद्धति सूक्ष्म-स्तरपर वायुमंडलको दूषित बनानेमें ही अग्रसर होती है । इससे यही स्पष्ट होता है कि, वहांका वातावरण बाह्यतः सर्व आधुनिक सुख-सुविधाओंसे युक्त तथा स्वच्छताको प्रोत्साहित करता हुआ प्रतीत होता है; परंतु सूक्ष्म-स्तरपर रज-तमात्मक प्रक्रियाकी निर्मिति करनेके स्तरपर अत्यंत पिछडा हुआ है । यह विदेशमें प्रत्येक जीवको रज-तमात्मक स्पंदनोंसे आवेशित कर नरकप्राप्ति करवाता है ।’
– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)

आधुनिकताकी ओर नहीं; अपितु विनाशकी ओर ले जानेवाला विज्ञान

विश्वका शोध करनेवाले ऋषि-मुनियोंकी झाडूसे कूडा निकालनेकी पद्धतिको ‘जंगली’ कहकर, उसकी घृणा करनेवाले तथा कूडा एकत्र करनेवाले निर्वात यंत्रका (वैक्यूम क्लीनरका) आविष्कार कर मानवजातिको विनाशकी ओर ले जानेवाले वर्तमान वैज्ञानिक उन्नत नहीं हैं; अपितु पिछडे हुए हैं !
(‘मनुष्य अध्यात्मका जितना आधार लेगा, उतना वह सुखी रहेगा’, यह सभी ध्यान रखें ।’ – हिंदू जनजागृति समितीके प्रेरणास्थान, प. पू.  डॉ. जयंत आठवले)
 ४. कूडेका विनियोग कैसे करें ?
‘कूडा निकालनेके उपरांत उसे घरके बाहर रखे कूडेदानमें डालकर अग्निकी सहायतासे जलाएं ।
कूडा यदि तत्काल बाहर फेंकना संभव न हो तो घरके कोनेमें रखे कूडेदानमें फेंकें । कोनेमें विद्यमान इच्छाशक्तितत्त्वात्मक तरंगोंकी घनीभूत धारणामें कूडेकी कष्टदायक स्पंदनोंको एकत्र करनेकी क्षमता रहती है । इससे कूडेके कष्टदायक स्पंदन सर्वत्र नहीं फैलते ।’
– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
 ५. पोंछा कैसे लगाएं ?
कूडा निकालनेके उपरांत तत्काल पोंछा लगाएं ।

५ अ. पोंछा लगानेके लिए उपयोग किए जानेवाले पानीमें चुटकीभर विभूति डालें ।

विभूतिमें सात्त्विक शक्ति होती है । विभूतियुक्त जलसे पोंछा करनेसे, भूमिपर आई अनिष्ट शक्तियोंकी काली परत नष्ट होनेमें सहायता मिलती है ।
जलदेवतासे प्रार्थना : पोंछा लगानेसे पूर्व जलदेवतासे प्रार्थना करें, ‘अनिष्ट शक्तियोंके कारण भूमिपर आया काला आवरण पानीके चैतन्यद्वारा नष्ट होने दें’ ।

५ आ. नीचे झुककर दाहिने हाथसे गीले कपडेसे पोंछा लगाएं ।

झुककर दाहिने हाथसे भूमिपर पोंछा लगानेसे होनेवाली प्रक्रिया
‘झुककर दाहिने हाथसे भूमि पोंछनेपर निर्माण होनेवाली मुद्रासे मणिपूर-चक्रमें विद्यमान पंचप्राण कार्यरत स्थितिमें आते हैं । इससे देहकी तेजरूपी चेतना अल्पावधिमें कार्य करने हेतु तत्पर होती है । इस सिद्धतासे ही सूर्य नाडी जागृत होती है । दाहिने हाथसे तेजका प्रवाह पोंछेके कपडेमें संक्रमित होनेसे वह जलके आपतत्त्वके स्तरपर भूमिसे संलग्न तेजका निर्माण करती है । इसलिए भूमिपर पोंछा लगानेकी यह प्रक्रिया एक प्रकारसे भूमिपर तेजका कवच निर्माण करती है । इससे पातालसे प्रक्षेपित कष्टदायक स्पंदनोंका अवरोध होता है तथा वास्तुकी रक्षामें सहायता मिलती है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)
भूमि पोंछने हेतु प्रयुक्त गीले कपडेको समय-समयपर स्वच्छ जलसे धो लें ।
भूमि पोंछनेके उपरांत उदबत्ती जलाकर घरमें निर्मित सात्त्विकता बनी रहे, इसके लिए वास्तुदेवतासे प्रार्थना करें ।
 ६. यंत्रकी सहायतासे भूमि पोंछनेसे संभावित हानि

वास्तु दूषित होना

‘यंत्रकी सहायतासे भूमि पोंछनेपर संलग्न घर्षणात्मक नादकी ओर पातालकी कष्टदायक तरंगें तीव्रगतिसे आकृष्ट होती हैं । ये तरंगें जलमें स्थित आपतत्त्वकी सहायतासे भूमिपर प्रसारित होती हैं । इस कारण यांत्रिक पद्धतिसे भूमि पोंछनेसे कष्टदायक तरंगोंका आवरण भूमिपर निर्माण होता है तथा भूमि इन तरंगोंको स्वयंमें घनीभूत करनेके लिए सिद्ध होती है । इससे वास्तु दूषित होती है ।

अस्थि और स्नायुरोग होना

यांत्रिक पद्धतिसे भूमि पोंछनेसे निर्माण होनेवाली कष्टदायक तरंगोंके कारण पैरमें स्नायुरोग, अस्थिरोग, अस्थिक्षय, जोडोंमें वेदना इत्यादि कष्ट हो सकते हैं ।

अनिष्ट शक्तियोंसे अधिक कष्टकी आशंका होना

यंत्रसे भूमि पोंछते हुए शरीर अधिकांशतः झुका हुआ नहीं होता, हम खडे-खडे ही भूमि स्वच्छ करते हैं । ऐसेमें शरीरकी विशिष्ट मुद्राके अभावके कारण सूर्य नाडी जागृत नहीं होती । परिणामस्वरूप यंत्रसे भूमि पोंछनेकी कृतिद्वारा निर्मित कष्टदायक तरंगोंसे देहमंडलका भी रक्षण नहीं हो पाता । इस कारण जीवको अनिष्ट शक्तियोंसे कष्ट अधिक हो सकता है । इसलिए झुककर यंत्रविरहित, अर्थात् दाहिने हाथसे भूमि पोंछना अधिक लाभदायक है ।’
– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे)











Sunday, 11 January 2015



क्या है संस्कृति, धर्म एवं कर्म ? और क्यों है "हिंदुत्व" सर्वश्रेष्ठ ?
(1) मानव द्वारा प्रश्नों के उत्तर को खोजने के क्रम में, कुछ ऐसे शब्दों का उद्भव हुआ जिनका स्पष्ट अर्थ क्या है, ये अभी भी स्पष्ट होना शेष ही है । जिन शब्दों में संस्कृति, धर्म एवं कर्म तीन ऐसे प्रमुख शब्द हैं जिनका तो, अर्थ के आभाव में अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है । कहने का तात्पर्य, यदि इन तीनों शब्दों का स्पष्ट एवं एकमात्र अर्थ, हमारे समक्ष ठोस रूप में प्रस्तुत होता तो क्या, हमारे समक्ष प्रस्तुत तथाकथित विभिन्न प्रकार के संस्कृति, धर्म और कर्मों का विशाल अम्बार होता ? और क्या अर्थ के अभाव में आपसी खींचा-तानी के कारण, इन तीनों का अस्तित्व संकट में होता ? ये एक सोचने का विषय है । मेरे अनुसार तो कदापि नहीं होता । आपके अनुसार ?
अतः एक सामान्य दृष्टि के आधार पर, इन तीनों ही शब्दों के ठोस अर्थ को खोजने के क्रम में, आपके समक्ष प्रस्तुत है, एक तर्क पूर्ण नवीनतम शोध । जिसके माध्यम से मात्र इन तीनों शब्दों का अर्थ ही स्पष्ट नहीं होगा, अपितु “हिंदुत्व ही सर्वश्रेष्ठ है”, ये भी निर्विवाद रूप से प्रमाणित होगा । जो इस प्रकार है :-
(2) हममें क्रमशः चेतना और ज्ञान आने के उपरांत, हमारे जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण एवं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यदि कोई हैं तो वो है -
“मैं कौन हूँ या हम कौन हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है” ।
क्योंकि ये वही अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनसे टकरा- टकराकर ही हम, क्रमानुसार पहले अकर्ता से कर्ता बने और फिर कर्ता से सर्वश्रेष्ठ कर्ता अर्थात जीवों में श्रेष्ठ जीव मानव बने ।
अतः इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों को शोध का आधार बनाते हुए, एक समीकरण के रूप में, प्रथम बार प्रस्तुत है संस्कृति, धर्म एवं कर्म का वास्तविक अर्थ । जो निम्नांकित है -
संस्कृति (अर्थात संस्कार में मिला वो ज्ञान, जिसके आधार पर हम, जीवन में आगे की ओर सोचना आरम्भ करते हैं), जहाँ 'स्वयं के अस्तित्व’ को समझने का उत्तरोत्तर (लगातार) किया गया "प्रयास” है (क्योंकि, किसी भी विषय पर सोचना प्रयास ही है) तो वहीं, धर्म उस प्रयास को सफल बनाने की “विधि” है (जिसे जानना अभी भी शेष है), और उस विधि को खोजने हेतु किया गया अनुसन्धान (प्रयोग एवं शोध) ही, “कर्म” है ।
(3) अतः उपरोक्त “समीकरण” के आधार पर -
यदि हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, आदि समस्त संस्कृतियों की आपस में सूक्ष्म एवं निरपेक्ष रूप से तुलना की जाये तो, प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष रूप में यही स्पष्ट होकर हमारे समक्ष आता है कि, इन सभी संस्कृतियों में यदि कोई सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है तो वो है हिन्दू संस्कृति, नाकि कोई अन्य ।
क्योंकि, हिन्दू संस्कृति ही एकमात्र ऐसी विशिष्ट संस्कृति है जिसने, “मैं कौन हूँ या हम कौन हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है” प्रश्न का स्पष्ट उत्तर प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम विधिवत अनुसन्धान (कर्म) *आरम्भ* किया । *आरम्भ* शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया गया है क्योंकि, अन्य कर्म तो मात्र प्राकृतिक एवं जीवन को व्यतीत करने वाले कर्म हैं, नाकि 'स्वयं के अस्तित्व' को समझने से सम्बन्धी कर्म ।
(4) जिसका (अनुसंधानों का) ठोस प्रमाण है कि, ‘स्वयं के अस्तित्व और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है’ को समझने के प्रयास में, हिन्दु वैज्ञानिकों ने (तथाकथित ऋषि, मुनि, तपस्वी, आदि ने), उत्तरोतर विधिवत अनुसन्धान करते - करते, 1 या 2 नहीं, अपितु 33 कोटि भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं को खोज निकाला । यही नहीं, ‘स्वयं के अस्तित्व’ को समझने के प्रयास में, किसी ने परमात्मा के रूप में विष्णु को खोज निकला, तो किसी ने शिव को, तो किसी ने कृष्ण को, तो किसी ने निराकार परब्रम्ह तक को खोज निकाला । जिनके अनुसंधानों का प्रमाण हमें, नियमित जप, तप, मन्त्र, ध्यान, यज्ञ, आदि अनेक रूपों में, हिन्दू धार्मिक *पवित्र* पुस्तकों के माध्यम से विस्तारपूर्वक मिलता है । *पवित्र* इसलिए क्योंकि ये पुस्तकें हिन्दु वैज्ञानिकों द्वारा, अपनी-अपनी सोच एवं परिस्थिति के आधार पर कालान्तर में किये गए भिन्न-भिन्न अनुसंधानों का !दुर्लभ संग्रह! हैं, नाकि सामान्य पुस्तकें । और साथ ही साथ इन अनुसन्धानों का ही परिणाम है कि, आगे चलकर एक ऐसे नवीन प्रणाली का उद्भव हुआ, जिसे आज हम ‘आधुनिक विज्ञान’ कहते हैं । जिस पर कोई एक नहीं, अपितु विश्व की समस्त संस्कृतियाँ आधारित होने के लिए विवश हैं ।
(5) जबकि, अन्य किसी भी संस्कृति में, वैज्ञानिक पद्यति (विधिवत अनुसन्धान) का प्राविधान, है ही नहीं । जिसका मुख्य कारण है कि, इन संस्कृति वालों नें कभी भी ‘स्वयं के अस्तित्व’ को समझने का प्रयास किया ही नहीं । जिसका ठोस प्रमाण है इनके तथाकथित धर्म-पुस्तक, जिनमें ना तो किसी मानव अनुसंधनकर्ता का वर्णन है और नाहीं किसी भी अनुसन्धान का । जिसकी पुष्टि आप, इनके धर्म-पुस्तकों का अध्ययन करके, कर सकते हैं ।
(6) अतः निष्कर्ष रूप में देखा जाए तो हिन्दू संस्कृति उद्देश्यपूर्ण होने के साथ ही साथ, एकमात्र ऐसी संस्कृति (विचारधारा) है जिसमें, धर्म रूपी विधि को खोजने हेतु कर्म रूपी अनुसन्धान का पूर्ण रूप से समावेश है । जबकि, अन्य संस्कृतियाँ मात्र धर्म एवं कर्म से ही रहित नहीं, अपितु निरुद्देश्य होने के साथ ही साथ समाज को पूर्णतया दिग-भ्रमित करने वाली भी हैं । प्रमाण के लिए - कुरान के अनुसार, खुदा कयामत के दिन कब्र से निकाल कर सभी मुर्दों को जीवित कर देंगे, जिनकी कभी भी मृत्यु नहीं होगी और बाइबिल के अनुसार, यीशु एक दिन मृत्यु को ही मारकर सबको अमर कर देंगे ।
(7) और अंत में, हिन्दू संस्कृति का मूल-स्वभाव व्यवसायिक ना होने के कारण ही, हिन्दू समुदाय की संख्या में अनुपाततः उतनी वृद्धि नहीं हो पायी जितनी कि, अन्य संस्कृतियों में हुई । क्योंकि, हिन्दू संस्कृति (विचारधारा) ने जहाँ एक तरफ “वैज्ञानिक पद्यति” में विश्वास व्यक्त किया तो वहीं दूसरी तरफ, अन्य संस्कृतियों का स्वभाव उत्पत्ति के समय से ही उद्देश्यहीन होने के कारण, व्यवसायी के रूप में मात्र अपनी संख्या बढ़ाना, अपना वर्चस्व सिद्ध करना, किसी भी मूल्य पर जीवन व्यतीत करना और साथ ही साथ अन्य सभी संस्कृतियों को समूल नष्ट करना ही रहा है ।
जिसका दुष-परिणाम ही है कि सम्पूर्ण विश्व, विनाश की ओर निरंतर बढ़ता ही जा रहा है और हम भी उनके दुष-प्रभाव में आकर, उनको उद्देश्यपूर्ण पथ पर लाने के स्थान पर, अपनी क्षमता (संस्कृति, विचारधारा) को भूलकर, स्वयं उनके ही निरुद्देशिय जीवन-पथ पर चलने के लिए विवश हो गए हैं ।


यूरोपीय देशों मैं कैसे रहते है मुस्लिम ?
सामान्यत: यूरोप के सभी प्रमुख देशों-ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, आदि में मुसलमानों के अनेक सामाजिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध है।
प्राय: सभी यूरोपीय देशों में मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने तथा मीनारों के निर्माण तथा उस पर लाउडस्पीकर लगाने पर प्रतिबंध है।
बिट्रेन में इंडियन मुजहीद्दीन सहित 47 मुस्लिम आतंकवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा हुआ है। ब्रिटेन का कथन है कि ये संगठन इस्लामी राज्य स्थापित करने और शरीयत कानून को लागू करने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हिंसा का प्रयोग करते हैं।
जर्मनी में भी बुर्के पर पाबन्दी है। जर्मनी के एक न्यायालय ने मुस्लिम बच्चों के खतना (सुन्नत) को ‘मजहबी अत्याचार’ कहकर प्रतिबंध लगा दिया है तथा जो डाक्टर उसमें सहायक होगा, उसे अपराधी माना जाएगा। जर्मनी के कोलोन शहर की अदालत ने बुधवार को सुनाए गए एक फैसले में कहा कि धार्मिक आधार पर शिशुओं का खतना करना उनके शरीर को कष्टकारी नुकसान पहुंचाने के बराबर है.और प्राकृतिक नियमों में हस्तक्षेप है
जर्मनी में मुस्लिम समुदाय इस फैसले का कड़ा विरोध कर रहे हैं और वे इस बारे में कानूनविदों से मशविरा कर रहे हैं. आशा है विश्व के सारे देश जल्द ही जर्मनी का अनुसरण करने लगेंगे.
इसी तरह फ्रांस विश्व का पहला यूरोपीय देश था जिसने पर्दे (बुर्के) पर प्रतिबंध लगाया।

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आतंक की 'इंटर्नशिप' में भारत के डिग्रीधारी युवा
आईबीएन-7 | 10-Jan 13:32 PM
नई दिल्ली। फ्रांस में ही नहीं भारत में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब प्रोफेशनल डिग्री धारी नौजवान तक आतंक की तरफ मुड़ गए। दुनिया के सबसे बेरहम आतंकी संगठन आईएसआईएस का मोहरा भारतीय नौजवानों के दिमाग में नफरत के जेहाद का जहर भर रहा है।
ये फ्रांस में खूनी खेल खेलने वाले सईद क्वाचि का फेसबुक एकाउंट है तो भारत में गिरफ्तार हुए 25 साल के इंजीनियर मेहदी मसरुर बिस्वास का ट्विटर एकाउंट है। मेहदी पर दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस के पक्ष में शमी विटनेस नाम से ट्विटर हैंडल चलाने का आरोप है।

Wednesday, 7 January 2015

संस्कृत शब्दों का अनुचित अंग्रेजी अनुवाद

डॉक्टर राजीव मल्होत्रा की एक अतिशय उम्दा पुस्तक है "Being Different", अर्थात "विभिन्नता". संक्षेप में कहूँ तो "हम अलग हैं" (अथवा सनातन धर्म दूसरों से अलग क्यों है) को इसमें बेहतरीन पद्धति से समझाया गया है. सौभाग्य से इस पुस्तक के अनुवाद का मौका मुझे मिल सका. चूँकि राजीव जी की पुस्तक बेहद विस्तृत मंच पर, गहन शोध एवं अध्ययन पर आधारित है, ज़ाहिर है कि कहीं-कहीं भाषा क्लिष्ट हो गई है. परन्तु लगभग उसी "थीम" से सम्बन्धित आनंद कुमार जी का यह फेसबुक नोट, नए विद्यार्थियों को सनातन शब्दों के मूल अर्थ समझाने के लिए आसान है... संस्कृत के कई शब्दों का अंग्रेजी अनुवाद किया ही नहीं जा सकता. इसे पढ़िए और समझिए कि Why we are DIFFERENT... 

किसी विदेशी को कभी रसगुल्ले का स्वाद समझाने बैठ जाइये | क्या समझायेंगे ? मीठा होता है | वो पूछेगा कैसा मीठा ? चीनी जैसा, केक जैसा, सेब जैसा ? फिर आप समझायेंगे छेना एक चीज़ होती है जो दूध से बनाते है वैसा | वो फिर परेशान होगा, पनीर जैसा, चीज़ जैसा, बटर जैसा? ऐसे में समझाने का एक ही तरीका होता है की आप उसे रसगुल्ला चखा दें | बताने में रसगुल्ले का अनुभव खो जाता है | रसगुल्ला मुलायम है ये आप छु के महसूस करते हैं उसका स्वाद फिर महसूस करते हैं किसी दूसरी इन्द्रिय से | अगर एक तीसरी ही इन्द्रिय यानि की सुनने के जरिये आप दो – दो का काम लेना चाहेंगे तो काम जरा मुश्किल होगा |

ऐसा ही कुछ हमारे धर्म के साथ है | धर्म का अनुवाद हो जाता है Religion, जो की धर्म को आधा अधूरा सा समझाता है | जैसे धर्म पिता भी कहना हिंदी में सही होगा, लेकिन इसका अनुवाद Religious Father तो नहीं कर सकते ? वैसे ही किसी धार्मिक व्यक्ति को religious कह देने से किसी कर्म – कांडी तिलक लगाये ब्राम्हण वाली सी तस्वीर आती है दिमाग में, यहाँ Pious कहना थोड़ा ज्यादा सही अर्थ समझाता है | कमी फिर भी रह जाती है, जैसा सौम्य, हँसता मुस्कुराता सा धार्मिक व्यक्ति मन में आता है वैसा Religious या Pious नहीं होता | यहीं से असली समस्या हमारे रीती-रिवाज़ों और धार्मिक मान्यताओं को समझने की शुरू होती है |




कुछ 200 साल पहले जब संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी अनुवाद शुरू हुआ तो संस्कृत के शब्दों के लिए अंग्रेजी के सबसे करीबी शब्द इस्तेमाल कर लिए गए | ये तरीका ही गलत था, या तो संस्कृत के शब्दों का ही सीधा इस्तेमाल होना चाहिए था या फिर नए शब्द बनाये जाने थे इनके लिए | आगे के लेखक और उन्ही अनुवादों को पढ़कर बने तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के लिए गलत सीखना एक नियति बन गई |

जैसे की विद्या हमेशा से भारत में दान की वस्तु रही है, अब दान शब्द को भीख या Alms, Charity, Donation जैसे शब्दों से समझा ही नहीं जा सकता | दान के साथ सबसे महत्वपूर्ण होता है की ये उचित पात्र को दिया जाए | जो वस्तु दी जा रही है उसमे किसी किस्म की कमी या कोई खोटनहीं हो | आप अपना पुराना स्वेटर या पुराने कपड़े किसी को दे कर उसे दान नहीं कह सकते | ऐसे ही अगर हम अपने मित्रों या अन्य रिश्तेदारों को भगवतगीता दे दें और उनकी उसे पढ़ने में रूचि ही न हो तो भी उसे दान नहीं कहेंगे | दान में गाय देने की परंपरा का यही कारण रहा है की दान पाने वाला व्यक्ति एक तो दूध से लाभ पाए लेकिन साथ ही गाय को पालने के लिए श्रम भी करे | फिर एक पूज्य मानने की परंपरा रही है गाय को, तो दान में मिली गाय का उचित सम्मान भी होगा | संस्कृत भी ऐसे ही दान स्वरुप अन्य भाषाविदों को सिखाई गई होगी | भाषा का उचित सम्मान हुआ या नहीं इसे बाद की चर्चा के लिए छोड़ते हुए आइये कुछ और शब्दों को देखते हैं | 



एक और शब्द जो अध्यात्म में अक्सर प्रयुक्त होता है वो है “आत्मा” | अजर, अमर, अविनाशी, आदि विशेषण इसके साथ अक्सर ही जुड़े हुए पाए जायेंगे | इसके लिए जो अंग्रेजी शब्द प्रयोग किया जाता है, वो है Soul जो की गलत है | Soul शब्द से प्राण कहने जैसा अनुभव तो आएगा, लेकिन उस से आत्मा का बोध नहीं होता | जैसे हम अपने प्रिय सभी लोगों को “आत्मीय” कह सकते हैं लेकिन अंग्रेजी का Soul mate सिर्फ़ पति-पत्नी ही एक दुसरे के लिए इस्तेमाल करेंगे| “आत्मा” की तरह Soul अनेक जन्मों तक अपने कर्म का बोझ भी नहीं ढोती, जैसे ही इस शरीर से मुक्त हुए Soul का काम भी ख़त्म हो गया |


भारत के तैतीस करोड़ देवी देवताओं के होने का भेद भी यहाँ से देखा जा सकता है | “सप्त कोटि बुद्ध” को मान्यता देने की परंपरा बौद्ध धर्म के अनुयायियों में रही है | जब बौद्ध धर्म चीन में पहुंचा और वहां बाद में अंग्रेजी में भी अनुवादित होने लगा तो वहां भी Seven Crore Buddha की समस्या आई थी | लेकिन तिब्बत प्रान्त वहां पास ही था और चीनी हमारी तरह सहिष्णु भी नहीं होते | उसके अलावा उन्होंने उतनी लम्बी गुलामी नहीं झेली थी जितनी की भारतियों ने, इसलिए तुरंत ही इसका विरोध हुआ और आज सात करोड़ बुद्ध नहीं “सप्त कोटि बुद्ध” ही मान्य है | भारत में प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अपनी दास मानसिकता को कभी त्याग नहीं पाया | बारह आदित्य, ग्यारह रूद्र, आठवसु इन्हें उत्पन्न करने वाले प्रजापति ब्रह्म और सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मिलाकर तैंतीस अलग अलग कोटि यानि की श्रेणी दी गई हैं जिसमे अपने कृत्यों के अनुसार पूजनीय का वर्गीकरण किया जाता है (Satapatha-brahmana 4.5.7.2) | ये लेकिन अभी भी 33 करोड़ कहकर ही भारतीय देवताओं की गिनती की जाती है |

नाम की बात आई है तो “शिव” को विनाश का, “ब्रह्मा” को जन्म देने का और “विष्णु” का पालन का कर्तव्य निर्धारित है | लेकिन यहाँ भी अर्थ में भेद होता है | हर एक अलग अलग समय में अलग अलग कोटि में चला जाता है | जैसे शिव के डमरू के स्वर से ही “माहेश्वरसूत्र” निकले है, जिन पर पूरा व्याकरण आधारित है | नृत्य और संगीत की शुरुआत भी नटराज से ही हुई मानी जाती है | दरअसल Deconstruction भौतिकी (Physics) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, इसका अर्थ छोटे हिस्सों में तोड़कर किसी चीज़ को समझना होता है | हर बार विनाश उद्देश्य नहीं होता लेकिन आज शिव को आप विनाश का देवता मानते हैं | जबकि शिव शब्द ही “शव” और “ई” से बना है, इनका क़रीबी मतलब होता है Mass और Energy जो सबसे करीब से “Physics is science dealing with mass and energy and the phenomena related to it” के जरिये समझा जा सकता है | सीधा कोई करीबी अंग्रेजी शब्द उठा कर विनाश का देवता बना देने पर होने वाली बड़ी गलती !

ऐसे ही हिंदी या संस्कृत में इस्तेमाल होने वाले साधू, संत, ऋषि, सन्यासी या योगी के लिए Prophet या फिर Saint शब्द का इस्तेमाल होता है | Saint रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा दी जाने वाली एक उपाधी की तरह है | हमारे धर्म में किसी को संत, या योगी घोषित कर देने की कोई परंपरा नहीं है, ना ही कोई संस्था है जो ऐसा कर सके | Saint बीमारों को किसी दैवीय शक्ति द्वारा ठीक कर देने के लिए भी जाने जाते हैं, अगस्त्य, विश्वामित्र, सप्त ऋषि कोई भी ऐसे चमत्कारों के लिए नहीं जाने जाते | योगी भी बरसों की योग साधना से व्यक्ति अपने आप को बनाता है, आप किसी को योगी की उपाधी नहीं दे सकते | जैसे सीधा चर्च से बह के Religion एक धारा की तरह आ जाती है वैसे हमारे पास नहीं होता | अलग अलग स्थान, अलग अलग परिवेश से उठकर कोई भी स्थापित परम्पराओं को चुनौती दे सकता है | अष्टावक्र भी होते हैं, व्यास भी, नारद भी यहाँ भक्ति सिखाते हैं तो ऐतरेय भी ब्राम्हणों की रचना करते हैं |

आज की अंग्रेजी देखें तो ऐसे शब्दों का समावेश होने लगा है | Pundit का सीधा सीधा अंग्रेजी में मतलब होता है किसी विषय का विशेषज्ञ, पुरानी अंग्रेजी में किसी पोंगा पंथी को पण्डित कह दिया करते थे | अवतार के अर्थों में कभी नबी तो कभी Jeasus भी कह दिया जाता था | आज Avatar अंग्रेजी का भी एक शब्द है, और निराकार को एक रूप, शरीर की सीमाओं में बांधना उसका अर्थ निकलता है |

एक जगह जहाँ काम अभी भी बाकि रहता है वो है जाति या वर्ण को Caste कह देना | इस से भारतीय समाज का जितना नुकसान हुआ है वो शायद ही किसी अन्य शब्द ने किया होगा| वर्ण का एक अर्थ रंग भी होता है, लेकिन भारतीय समाज में रंग के आधार पर भेद भाव का कोई प्रमाण अभी तक प्रस्तुत नहीं किया जा सका है | तो वर्ण व्यवस्था को किसी किस्म के भेदभाव का आधार मान लेना अनुचित होगा | ऐसे ही जाति को सीधा सीधा अंग्रेजी का caste कहना भी ठीक नहीं है | किसी और समय में किसी और समाज में ये किसी और तरीके से प्रयोग में लायी जा रही थी | इसके अधकचरे ज्ञान को एक शब्द में ढाल कर भारतीय समाज के चेहरे पे कालिख मल दी गई है | 

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साभार :- आनंद कुमार 

Tuesday, 6 January 2015

एक गांव में राजपूत, ब्राह्मण, बनिये, तेली, हरिजन आदि जाती के लोग रहते थे, सभी मिलजुल कर शांति से रहते थे। एक दिन गांव के मुखिया के पास एक मुस्लिम अपनी पत्नी और आठ बच्चों के साथ आया और गांव मे रहने की भिख मांगने लगा। गांव वालों ने फैसला किया ओर उस मुस्लिम को रहने की अनुमति दी लेकिन तेली ओर हरिजनों ने इसका विरोध किया पर राजपूतों ओर ब्राह्मणों ने नहीं माना ओर मुस्लिम को गांव मे रहने की अनुमति दी। दिन गुजरते गये और मुस्लिम के आठो बच्चे बड़े हो गए जब उनकी शादी की बारी आई तो मुस्लिम पहले राजपूतों के पास गया और बोला कि हुजूर बच्चों की शादी होने वाली है और मेरे पास एक ही घर हैं तो राजपूतों ने उसको एक बंजर जमीन दी ओर कहा कि तुम उस पर घर बना कर रहो । इसके बाद मुस्लिम बनिये के पास गया और उससे पैसे उधार लिए । कुछ समय बाद उन आठों बच्चों के 64 बच्चे हुए और देखते ही देखते लगभग 30 सालों मे उस गांव में मुस्लिमों की जनसंख्या 50% हो गई। अब मुस्लिम लड़के अपनी आदत अनुसार हिन्दुओं से झगड़ा करने लगे ओर उनकी औरतों को छेडने लगे । धिरे धिरे ब्राह्मणों ओर बनियो ने वो गांव छोड़ दिया। एक दिन गांव के मुख्य मंदिर को मुस्लिमों ने तोड़ दिया और उस पर मस्जिद बनाने लगे तब वहां पर राजपूत उनको रोकने लगे तो वो मुस्लिम बोला कि जो अल्लाह के काम में रुकावट डाले उसे काट डालो। इस तरह राजपूतों ने वो गांव छोड़ दिया और जाते जाते तेली ओर हरिजनों से बोले की हमने तुम्हारी बात न मानकर उस मुल्ले पर भरोसा किया और आज हमें गांव छोड़कर जाना पड़ रहा है। इस प्रकार उस गांव का नाम पंचवटी से बदलकर रहिमाबाद हो गया है तथा यह गांव महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित हैं।

Monday, 5 January 2015

'मुझे बच्चों सहित जबरन बनाया मुस्लिम, फिर से बनूंगा हिंदू'

यूपी में बड़ौत के गांव गढ़ी कंगरान निवासी
शीशपाल शर्मा से मोहम्मद अब्दुल्ला बना 40 वर्षीय यह व्यक्ति अपनी पत्नी और चार बच्चों समेत रविवार को 12 बजे से पहले दिल्ली बस स्टैंड पर विहिप के जिलाध्यक्ष सहदेव सिंह से मिला। इसके बाद बड़ौत कोतवाली पहुंचा। सीओ बड़ौत सीपी सिंह ने उससे पूछताछ की। उसने बताया पांच साल पहले बड़ौत के ही एक मौलाना ने उसे बहला फुसलाकर गुमराह किया था। शामली का एक मौलाना भी उसके साथ था। वह उनकी बातों में आकर उनके साथ मुजफ्फरनगर के मीरापुर क्षेत्र के धर्म परिवर्तन के लिए चर्चित एक बड़े मदरसे में गया था।

वहां उसका और उसके तीन बच्चों मुकुल (10), शिवम (11) और तनु (आठ) का धर्म परिवर्तन कराकर तीनों के नाम क्रमश: सलमान, समीर और आयशा किए थे। सलमान को मदरसे में पढ़ने को जयपुर, समीर को पंजाब भेजा। जबकि आयशा को उसी मदरसे में रखा, जहां धर्म परिवर्तन कराया। इसके बाद वह लोनी में रह कर वॉल पेंटिंग का काम करने लगा।

शीशपाल शर्मा से मोहम्मद अब्दुल्ला बने व्यक्ति ने बताया कि अब तक इसलिए चुप रहा, क्योंकि उसे उसके बच्चों से नहीं मिलने दिया जा रहा था। उसे डर था कि अगर पुलिस से शिकायत की तो बच्चों के साथ कुछ गलत न हो जाए। अब जैसे ही बच्चे उसके पास आए, वह पुलिस के पास आ गया।