Wednesday, 29 November 2017

हिन्दू परम्पराओं से जुड़े है ये वैज्ञानिक तथ्य...

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं
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वैज्ञानिक कारण –
एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम था
उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है “सेपरेशन ऑफ़ जींस” मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए
क्योकि नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने की 100% चांस होती है.
फिर बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया की आखिर “हिन्दूधर्म” में हजारों-हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया है ?
हिंदुत्व में गोत्र होते है और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.
उस वैज्ञानिक ने कहा की आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की “हिन्दूधर्म ही” विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है
जो “विज्ञान पर आधारित” है !
हिंदू परम्पराओं से जुड़े कुछ और वैज्ञानिक तर्क:
1- कान छिदवाने की परम्परा:
भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।
2- माथे पर कुमकुम/तिलक :
महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं
वैज्ञानिक तर्क-
आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है।
माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है।
इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता !
3- जमीन पर बैठकर भोजन :
भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है
वैज्ञानिक तर्क-
पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही
खुद-ब-खुद दिमाग से 1 सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये !
4- हाथ जोड़कर नमस्ते करना –
जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है,
ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें।
दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते।
अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।
5- भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से –
जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क-
तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं इससे पाचन तंत्र ठीक से संचालित होता है
अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है इससे पेट में जलन नहीं होती है
6- पीपल की पूजा –
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है
7- दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना –
दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे भूत प्रेत का साया आयेगा, आदि इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें !
वैज्ञानिक तर्क-
जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है।
शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है
यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है
8- सूर्य नमस्कार –
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते नमस्कार करने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है
9- सिर पर चोटी –
हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे आज भी लोग रखते हैं
वैज्ञानिक तर्क-
जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं
इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता सोचने की क्षमता बढ़ती है।
10- व्रत रखना – कोई भी पूजा-पाठ, त्योहार होता है तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं
शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है हृदय संबंधी रोगों,मधुमेह,आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते !
11- चरण स्पर्श करना –
हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें तो उसके चरण स्पर्श करें यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं ताकि वे बड़ों का आदर करें !
वैज्ञानिक तर्क-
मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं
इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक !
12- क्यों लगाया जाता है सिंदूर –
शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं
वैज्ञानिक तर्क-
सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है
इससे स्ट्रेस कम होता है।
13- तुलसी के पेड़ की पूजा –
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क-
तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है लिहाजा अगर घर में पौधा होगा तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।
भीष्म क्षत्रिये थे, तो उनके भाई वेद व्यास ब्राह्मण कैसे
 इसे समझना है बहुत जरुरी है ...
अब हम आपको इतिहास के कुछ उदाहरण देते है जिसपर आप गौर कीजिये, दशरथ और विश्वामित्र भाई लगते थे, जी हां, विश्वामित्र भी एक राजा ही थे, आधी उम्र वो क्षत्रिय ही थे, पर आज हम विश्वामित्र को ब्राह्मण कहते है, वो ऋषि हो गए, कैसे ? भला कोई क्षत्रिये बाद में ब्राह्मण कैसे हो सकता है
अब दूसरा उदाहरण देखिये, वेद व्यास जिन्होंने महाभारत श्री गणेश के हाथों से लिखवाई, वो ब्राह्मण है, पर उनके भाई भीष्म क्षत्रिय, जी हां वेद व्यास और भीष्म जिनका असली नाम देवव्रत था, वो दोनों ही भाई थे, पर एक भाई ब्राह्मण और दूसरा क्षत्रिये, ऐसा कैसे ?
और उदारहण लीजिये, एकलव्य आदिवासी बालक था, पर आगे चलकर सेनापति बना, और क्षत्रिये कहलाया, कर्ण शूद्र के घर में बड़े हुए, पर आगे चलकर राजा बने और वो भी क्षत्रिये कहलाये, भैया ये सब इसलिए क्यूंकि जाति व्यवस्था कर्म के आधार पर बनाई गयी थी, हमारे पूर्वजो ने कर्म के आधार पर ये व्यवस्था बनाई थी , पर समाज द्रोहियों ने जाति को धर्म के आधार पर घोषित कर दिया
विश्वामित्र क्षत्रिये तबतक थे जबतक वो क्षत्रिये कर्म करते थे, जब उन्होंने पूजा पाठ शुरू कर दिया, लोगों को शिक्षा देना शुरू कर दिया तो वो ब्राह्मण हो गए, और आज हम विश्वामित्र को ब्राह्मण ही कहते है, उन्होने अपना काम, अपना कर्म बदला और उनकी जाति भी बदल गयी, जाति कर्म के आधार पर होती है जन्म के आधार पर नहीं, इसलिए समाज को जाति का भेद छोड़ कर एकजुट रहना चाहिए, ताकि समाज ताकतवर बना रहे ।
इस्लामिक हमलावरों, फिर अंग्रेजो और फिर अब सेकुलरों और वामपंथियों ने मिलकर हिन्दू समाज और भारत को बर्बाद किया है, इन लोगों ने हिन्दुओ में जातिवाद भरा है, और ये बड़े षड्यंत्र के तहत भरा गया है ताकि हिन्दू समाज रहे ही न, जातियों में बंटकर हमेशा कमजोर बना रहे
अब हिन्दू एकजुट रहेगा तो हिन्दू ही जीतेगा, पर हिन्दुओ को जातियों में तोडा जायेगा तभी तो दुश्मनो के लिए रास्ता खुलेगा, स्कोप बनेगा, उदाहरण के तौर पर गुजरात, हिन्दू एकजुट रहे तो कांग्रेस का कोई स्कोप नहीं, जहाँ हिन्दू टुटा वहीँ कांग्रेस का स्कोप शुरू----विट्ठलव्यास
शिवांश के इस निर्णय को सहस्त्र प्रणाम
एक ये युवा जो आज के युवाओं के लिए मिसाल है वो युवा है उत्तराखंड के रामनगर कस्बे का शिवांश जोशी.अपनी बारहवीं की परीक्षा 96.8%मार्क्स से साथ पास की उसके बाद शिवांश ने NIT और JEEE की परीक्षा भी उच्चाक से पास की और IIT ने चयनित हुए.यहां एक बात का उल्लेख आवश्यक है ये सब परीक्षाएं शिवांश ने बिना कोचिंग के पास की है.
लेकिन शिवांश ने इसके बाद जो किया वो आज की पीढ़ी के सामने एक आदर्श मिसाल है.24 अपैल 17 को शिवांश ने NDA(राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी)परीक्षा दी और पूरे देश से 371 चयनित युवाओं में 97%मार्क्स लाकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और IIT में चयनित होने के बावजूद आराम की नौकरी के बजाय देश को तरजीह दी और NDA के माध्यम से भारतीय थल सेना में जाने का निर्णय लिया.
शिवांश के इस निर्णय को सहस्त्र प्रणाम.शिवांश के ये निर्णय देश की युवा पीढ़ी को भारतीय सेना में जाने की प्रेरणा देगा.
शिवांश को देखकर लगता है कि हमारे देश का युवा देश के प्रति कितना सन्मान और प्रेम रखता है.
काउंसलिंग - *मेरी उम्र 17+ है, मैं स्कूल बस के 25+ के ड्राइवर से प्रेम करती हूँ। मेरे माता पिता मेरा विरोध कर रहे हैं? मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूँ?क्या प्रेम करना गुनाह है? क्या मुझे मेरी जिंदगी मेरे हिसाब से जीने का अधिकार नहीं? मैं अमीर घर की हूँ तो क्या प्रेम ग़रीब अमीरी सोच के तो नहीं कर सकते। मुझे उससे शादी करनी है, वो और उसका परिवार तैयार है।*
बेटा प्रेम करना बिल्कुल गुनाह नहीं है। युगऋषि कहते हैं क़ि प्रेम संकुचित नहीं होना चाहिये, प्रेम तो जीव मात्र से करना चाहिए।
अभी आप 12वीं में हो, और एग्जाम पास होने के लिए पढ़ाई पर ध्यान नहीं दोगे तो फ़ेल हो जाओगे।
निम्नलिखित काम करो, जिससे विवाह के बाद सुखी रहो और सांसारिक वस्तुओं के आभाव में झगड़ा न हो, तलाक़ न हो:-
1- तुम्हारे होने वाला पति ग़रीब है, पिता की मर्जी के ख़िलाफ़ शादी करने पर वो तुम्हें कोई हेल्प करेंगे नहीं। तुम्हें पति के घर की परिस्थिति के अनुसार रहने की आदत डालनी चाहिए।
2- उसके घर में AC नहीं है, बिना AC के सोने की आदत डालो।
3- उसके पास तुम्हारी मन पसन्द चीज़े ख़रीदने के पैसे नहीं होंगे, अतः ख़र्च को कण्ट्रोल करो।
4- बिना गाड़ी के पैदल चलने की आदत डालो, जिससे गाड़ी का आभाव तुम्हें न खले।
5- मॉल जाओ लेकिन बिना कुछ ख़रीदे वापस कई बार आओ।
6- ऑनलाइन शॉपिंग की वेबसाईट विजिट करो लेकिन कुछ मत ख़रीदो।
7- पैसे के आभाव को महसूस करो और अत्यंत कम ख़र्च में एक वर्ष निकालो।
8- शादी के बाद बच्चा अवश्य होगा, तुम माँ बनोगी ही। ईश्क की रोटी खा के और ईश्क के घर में प्रेमी रह सकते हैं, लेकिन बच्चा नहीं रहेगा। उसे घर भी चाहिए, अच्छा खाना भी चाहिए, अच्छा स्कूल चाहिए और वो समस्त फैसिलिटी चाहिए जो आज आप एन्जॉय कर रहे हो। अग़र तुम यह सब उन्हें न दे पाओ तो क्या तुम दुःखी होगी? या स्वयं को सम्हाल लोगी।
9- तुम शाकाहारी हो, और वो मांसाहारी है। अतः पहले यह तय करो क़ि तुम मांसाहारी बनोगे या वो शाकाहारी बनेगा? यदि तुम उसके प्रेम में स्वयं को बदलने की सोच रही हो तो कसाई की दुकान जाओ और वहां पशुओं को अपनी आँखों के सामने कटते देख़ो। पशुओं का आर्त नाद, दर्द भरी कराह चीख़ पुकार सुनकर भी स्वयं को सम्हाल लो। क्यूंकि किचन में जब यह बने तो मन मजबूत हो।
10- विवाह जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं होता, यह मात्र एक जीवन की गाड़ी का स्टेशन है जहाँ एक हमसफ़र आपके साथ गाड़ी पर बैठता है। जो सुख दुःख में आपका साथ निभाता है। जीवन का सफ़र बहुत लम्बा है, आगे इसी गाड़ी में आपके बच्चे भी बैठेंगे।
आगे जो भी होगा देखा जाएगा, ऐसा बेवकूफ़ बोलते हैं। मेरे पास मेरे भविष्य का प्लान ऑफ़ एक्शन है ऐसा बुद्धिमान् बोलते हैं।
🙏🏻 तुम्हारे पास दो रास्ते हैं, पहला माता पिता का विरोध करो, और स्वेच्छा से बस ड्राइवर से शादी कर लो।
🙏🏻दूसरा रास्ता, सुनहरे भविष्य के लिए स्वयं पढ़ाई करो और उसे भी पढ़ने या बिज़नेस के लिए प्रेरित करो। कुछ बड़ा बनने और करने के लिए प्रेरित करो। सफ़ल व्यक्तियों की कहानियां सुनाओ। युगऋषि की लिखी पुस्तक - 📚 *सफ़ल जीवन की दिशा धारा* और *आगे बढ़ने की तैयारी* तुम दोनों पढ़ो।
🙏🏻इस रिलेशनशिप को पकने के लिए वक़्त दो, स्वयं को किसी बड़े लक्ष्य से जोड़कर एक उच्च पद प्रतिष्ठा तक पहुंचा दो। जो जिंदगी तुम्हारे पिता ने तुम्हे दी, उससे बेहतर जिंदगी अपने बच्चों को दे सको ऐसा संकल्प लो।
🙏🏻फ़िर शान से तुम दोनों सफ़ल व्यक्ति बनकर शादी करो और देश समाज के लिए प्रेरक उदाहरण बनो।
अभी तुमने कहा, क़ि तुम उसके लिए जान दे सकती हो, जान तो कोई भी दे सकता है। उसके और स्वयं के सुनहरे भविष्य के लिए पढ़ाई कर लो, उसके और उसके होने वाले बच्चे के लिए घर और शानदार जीवन की व्यवस्था कर दो। जिसकी तुम पत्नी बनो उसे अपने पिता से भी ज्यादा सफ़ल और सुखी बना दो।
निर्णय तुम्हारे हाथ में है क़ि तुम क्या चाहती हो, जल्दबाज़ी में ग़लत निर्णय या सोच समझकर धैर्य के साथ सही निर्णय। मरना बहुत आसान है ईश्क में, जीना बहुत मुश्किल है। वो सही तरीके से मैच्योर निर्णय के साथ तो मुश्किल है। कायर मरते हैं, और बहादुर अपनी अच्छी तक़दीर लिखते हैं। तुम बहादुर हो, ऐसा मेरा विश्वास है।
अधिकार और सम्मान भीख़ में नहीं मिलता, इसे अर्जित करना पड़ता है। सुखी जीवन स्वयं के हाथ की लकीरों में मत ढूँढो, इस हाथ और दिमाग़ का सही उपयोग कर सुखी जीवन अपना बनाओ।
ईश्वर तुम्हे सही राह दे, सफ़ल सुखी बनकर विवाह करना और अपने जोड़े के साथ सम्मान मुझसे मिलने जरूर आना।
तुम्हारी बहन
🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाईन इण्डिया यूथ एसोसिएशन

Tuesday, 28 November 2017

tarik fatah on islam ,history gazwa-e-hind

https://www.facebook.com/hindapna/videos/400994597001473
सुप्रीम कोर्ट की मक्कारी देख भड़के राष्ट्रपति कोविंद
 हक्के-बक्के रह गए मी-लार्ड ...
 केवल हिन्दुओं के खिलाफ बड़े-बड़े फैसले सुना रहे व् अन्य फैसलों को लगातार ताले जा रहे सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति कोविंद ने जबरदस्त लताड़ लगाई है. विधि दिवस की पूर्व संध्या को आयोजित सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने न्यायपालिका को खरी-खरी सुनाई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी खुद को सरकार से भी ऊपर समझने वाले जजों के दिमाग ठिकाने लगा दिए.
 दिवाली पर पटाखे बैन जैसे फैसले फ़टाफ़ट लेने वाले कोर्ट भ्रष्टाचारी नेताओं के फैसलों को सालों-साल तारीख पर तारीख देते जाते हैं. अमीर तो गरीबों को अपनी गाडी से कुचल कर भी साफ़ बच निकलते हैं और गरीबों को न्याय मिलना नामुमकिन ही हो चुका है 
 प्रीम कोर्ट में जजों के नाम पर रिश्वतखोरी ,भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी अदालतों को फटकार लगाते हुए माननीय राष्ट्रपति ने गरीबों को न्याय मिलने में कठिनाई, देरी और न्यायिक व्यवस्था में निचले वर्ग के कम प्रतिनिधित्व खासतौर से महिलाओं के प्रतिनिधित्व का उल्लेख किया और कहा हर चार न्यायाधीशों में से केवल एक महिला होती है. उन्होंने कहा कि तीनों अंगों- न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को अच्छे व्यवहार का मॉडल बनना होगा.
वहीं लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कोलेजियम सिस्टम को बदलने की जरूरत बताई, जिसका कोर्ट बहुत सख्ती से बचाव करता रहा है. दरअसल अंग्रेजों द्वारा कोलेजियम सिस्टम इसलिए बनाया गया था, ताकि गुलाम भारत में अपनी मर्जी के लोगों को आसानी से जजों के पद पर नियुक्ति दिलवा सकें.  पिछले 60 सालों में कांग्रेस ने इस सिस्टम को नहीं बदला और  दुरूपयोग करके अपने पालतू चाटुकारों को सुप्रीम कोर्ट व् हाई कोर्ट्स में जज बनवाते रहे.यही वजह है कि कभी देश में किसी भ्रष्टाचारी नेता को शायद ही सजा होती हो. जज बनवाने के लिए रिश्वत देने तक के मामले सामने आते रहे हैं.
मोदी सरकार  इसकी जगह और भी पारदर्शी सिस्टम लाने के पक्ष में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट  ऐसा करने नहीं दे रही है. सुमित्रा महाजन और कानून राज्य मंत्री पीपी चौधरी ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के कोलेजियम सिस्टम और न्यायिक सक्रियता पर सवाल उठाए. देश में जहाँ एक ओर लाखों-करोड़ों केस पेंडिंग हैं, वहीँ सुप्रीम कोर्ट सरकार के कामों में हस्तक्षेप में ही व्यस्त रहता है. जबसे मोदी सरकार आयी है, तब से सरकार को क्या-कैसे करना चाहिए, इसमें अदालतों के जज अपनी राय जबरदस्ती ही थोपते आये हैं. न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि नियुक्तियों पर बारीकी से काम हो. वहीँ सम्मेलन में मौजूद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने बात समझने की जगह उलटा अपनी ही सफाई देना शुरू कर दिया.

एक गोरे विदेशी ने जो कुछ लिखा है
 वह हिन्दुओं की आँखें खोलनेवाला है :
प्रत्येक मन्दिर पर एक IAS मुखिया बनकर बैठा हुआ है । पर किसी भी मस्जिद या चर्च पर नहीं ......The Hindu Religious and Charitable Endowment Act, 1951 राज्य सरकारों तथा नेताओं को यह अधिकार देता है कि वह हजारों हिन्दू मंदिरों पर अधिकार कर सकते हैं तथा उनपर एवं उनकी सम्पत्ति पर पूरा नियंत्रण रख सकते हैं। कहा गया है कि वे मंदिरों की सम्पत्ति को बेच सकते हैं और उन पैसों का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं...
यह आरोप किसी मंदिर के पदाधिकारी ने नहीं, बल्कि एक विदेशी लेखक , Stephen_Knapp ने अपनी किताब (Crimes Against India and the Need to Protect Ancient Vedic Tradition) में लगाया है, जो अमेरिका से छपी है। इसे पढ़ने पर आप चौंक जाएंगे।http://www.stephen-knapp.com/crimes_against_india.htm

नोट करनेवाली बात है कि जिन भक्त राजाओं ने ये मन्दिर बनवाए उनमें से किसी ने भी उन मन्दिरों पर कोई अधिकार नहीं जताया। कइयों ने तो अपना नाम तक नहीं छोड़ा है। मन्दिरों और उनके धन पर नियंत्रण की तो बात ही छोड़िये, इन राजाओं ने भूमि तथा अन्य संपत्तियों को इन मन्दिरों के नाम कर दिया, जिनमें इनके आभूषण भी शामिल हैं। उन्होंने मंदिरों की सिर्फ सहायता की, उनपर किसी प्रकार का दावा नहीं ठोका। और होना भी यही चाहिये।
आज की सरकारों ने कोई भी बड़ा मन्दिर नहीं बनवाया (कुछेक को छोड़कर) और उन्हें इनमें से किसी भी मन्दिर -- उनके धन, प्रशासन अथवा पूजा पद्धति पर कोई अधिकार नहीं है। इन मंदिरों का धन सिर्फ इन मन्दिरों के प्रशासन, उनके रखरखाव, पारिश्रमिक, उनसे जुड़ी आधारभूत संरचनाओं तथा सुविधाओं पर खर्च होना चाहिये तथा जो बच जाय अन्य गौण मन्दिरों, खासकर पुराने मन्दिरों की मरम्मत पर खर्च होना चाहिये।
परंतु , एक Temple Endowment Act के तहत, आंध्रप्रदेश में 43000 मंदिर सरकार के नियंत्रण में आ गए हैं, और इन मंदिरों का सिर्फ 18% राजस्व इन मंदिरों को लौटाया गया है, शेष 82% को अज्ञात कार्यों में लगाया गया है।
यहाँ तक कि विश्व प्रसिद्ध तिरुमाला तिरुपति मंदिर को भी नहीं बख्शा गया । Knapp के अनुसार, इस मंदिर में प्रतिवर्ष 3100 करोड़ से भी अधिक रूपये जमा होते हैं और राज्य सरकार ने इस आरोप का खण्डन नहीं किया है कि इस राशि का 85% राजकोष में जमा हो जाता है, और इसमें से अधिकतर उन मदों में व्यय होता है जो हिन्दू समुदाय से संबद्ध नहीं हैं।
एक और आरोप जो लगाया गया है वो ये कि आंध्र सरकार ने कम से कम 10 मंदिरों को गोल्फ कोर्स बनाने के लिये तोड़ने की अनुमति दी है। Knapp लिखते हैं, कल्पना कीजिये अगर 10 मस्जिद तोड़ दिये जाते तो कितना बवेला मचता?
ऐसी आशंका है कि कर्नाटक में जो लगभग 2 लाख मंदिरों से 79 करोड़ वसूले गए, उनमें से मंदिरों को सिर्फ 7 करोड़ मिले , मुस्लिम मदरसों और हज सब्सिडी में 59 करोड़ दिये गए और चर्चों को लगभग 13 करोड़ दिये गए।
Knapp लिखते हैं कि इसके कारण 2 लाख मंदिरों में से 25% यानि लगभग 50,000 मंदिर संसाधनों के अभाव में कर्नाटक में बंद कर दिये जाएंगे और उनके अनुसार सरकार के इस कृत्य के लिये सिर्फ हिंदुओं की लापरवाही और सहिष्णुता ही जिम्मेदार है।
Knapp फिर केरल का उल्लेख करते हैं जहाँ, वो कहते हैं, गुरुवयूर मंदिर के फण्ड को दूसरी सरकारी योजनाओं में लगा दिया गया है जिससे 45 हिन्दू मंदिरों का विकास रुक गया है। #अयप्पा_मन्दिर की भूमि पर कब्ज़ा कर लिया गया है तथा चर्च, विस्तृत वन क्षेत्र को -- सबरीमाला के निकट हजारों एकड़ भूमि को -- अतिक्रमण से दबाकर बैठी है।
केरल की कम्युनिस्ट राज्य सरकार एक अध्यादेश पारित करना चाहती है ताकि वह Travancore & Cochin Autonomous Devaswam Boards (TCDBs) को समाप्त कर दे तथा 1800 हिन्दू मंदिरों पर उनके सीमित स्वतंत्र अधिकारों को हथिया ले। अगर लेखक का कहना सही है, तो महाराष्ट्र सरकार भी राज्य में 450,000 मन्दिरों पर कब्ज़ा करना चाहती है जो राज्य के दिवालियेपन को हटाने के लिये विशाल राजस्व जुटाएंगे।
और इससे भी बढ़कर, Knapp कहते हैं कि उड़ीसा में राज्य सरकार #जगन्नाथ_मन्दिर की 70,000 एकड़ से भी अधिक दान में मिली भूमि को बेचना चाहती है, जिसकी राशि से इसके अपने ही मन्दिर कुप्रबंधन से उपजे वित्तीय घाटे को पूरा किया जाएगा।
Knapp के अनुसार, इन बातों की जानकारी इसलिये नहीं हो पाती क्योंकि भारतीय मीडिया, खासकर इंग्लिश टेलीविज़न और प्रेस, हिन्दू विरोधी हैं और हिन्दू समुदाय को प्रभावित करनेवाली किसी भी बात को न तो कवरेज देना चाहती हैं, और न ही उनसे कोई सहानुभूति रखती हैं। अतः, सरकार के सभी हिन्दू विरोधी कार्य बिना किसी का ध्यान खींचे चलते रहते हैं।
संभव है कि कुछ लोगों ने पैसे कमाने के लिये मन्दिर खड़े कर लिये हों। पर सरकार को भला इससे क्या सरोकार होना चाहिये? सारी आमदनी को हड़प लेने की बजाय, सरकार मंदिरों को फण्ड के प्रति जवाबदेह बनाने के लिये कमिटियों की स्थापना कर सकती है -- ताकि उस धन का सिर्फ मन्दिर के उद्देश्य से समुचित उपयोग हो सके।
Knapp का कहना है कि: स्वतंत्र लोकतान्त्रिक देशों में कहीं भी धार्मिक संस्थाओं को सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता और देश के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाता।
पर भारत में ये हो रहा है। सरकारी अधिकारियों ने हिन्दू मंदिरों का नियंत्रण अपने हाथों में ले रखा है, क्योंकि उन्हें इसमें पैसों की गंध लगती है, वे हिंदुओं की लापरवाही से परिचित हैं, वे जानते हैं कि हिन्दू हद दर्जे के सहिष्णु और धैर्यवान हैं, वे ये भी जानते हैं कि सड़कों पर प्रदर्शन करना , संपत्ति का नुकसान करना, धमकी, लूट, हत्या, ये सब हिंदुओं के खून में नहीं है ।
हिन्दू चुपचाप बैठे अपनी संस्कृति की हत्या देख रहे हैं। उन्हें अपने विचार स्पष्ट और बुलंद आवाज में व्यक्त करने चाहिये। समय आ गया है कि कोई सरकार से कहे कि सभी तथ्यों को सामने रखे ताकि जनता को पता चले कि उसकी पीठ पीछे क्या हो रहा है। पीटर को लूट कर पॉल का पेट भरना धर्मनिरपेक्षता नहीं है। और मंदिर लूटने के लिये नहीं हैं।
हम तो समझ रहे थे कि महमूद ग़ज़नवी मर चुका है, पर कहाँ ?