Sunday, 17 December 2017

ब्रह्मोस के लिए तैयार किये जा रहे हैं 40 सुखोई लड़ाकू विमान

देश के 40 सुखोई लड़ाकू विमानों में परिवर्तन करने का काम शुरू किया जा रहा है, ताकि वे भारतीय वायुसेना की महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करते हुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को लॉन्च कर सकें। दुनिया की सबसे तेज रफ्तार सुपरसोनिक मिसाइल के आकाश से मार करने वाले संस्करण का सुखोई-30 लड़ाकू विमान से 22 नवंबर को सफल प्रक्षेपण किया गया। इसके साथ ही भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।
भारत को पिछले वर्ष मिसाइल टेक्नॉलजी कंट्रोल रेजीम (एमटीसीआर) की पूर्ण सदस्यता मिल गई थी, जिसके बाद उसपर लगे कुछ तकनीकी प्रतिबंध हटने के चलते इस मिसाइल की क्षमता को बढ़ाकर 400 किलोमीटर तक किया जा सकता है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम वाला ब्रह्मोस मिसाइल सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के साथ तैनात किया जाने वाला सबसे भारी हथियार होगा।
सरकारी हिन्दुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में इन 40 सुखोई विमानों में संरचनात्मक बदलाव किये जाएंगे। ढाई टन वजनी यह मिसाइल ध्वनि की गति से तीन गुना तेज, मैक 2.8 की गति से चलती है और इसकी मारक क्षमता 250 किलोमीटर है।  यह परियोजना 2020 तक पूरी हो जाएगी।

Saturday, 16 December 2017

link -----keshv sangh nirmata

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Friday, 15 December 2017

vyang

*परिवर्तन देखिये*
1. पहले शादियों में घर की औरतें खाना बनाती थीं और नाचने वाली बाहर से आती थीं। अब खाना बनाने वाले बाहर से आते हैं और घर की औरतें नाचती हैं।
2- पहले लोग घर के दरवाजे पर एक आदमी तैनात करते थे ताकि कोई कुत्ता घर में न घुस जाये। आजकल घर के दरवाजे पर कुत्ता तैनात करते हैं ताकि कोई आदमी घर में न घुस जाए।
3- पहले आदमी खाना घर में खाता था और लैट्रीन घर के बाहर करने जाता था। अब खाना बाहर खाता है और लैट्रीन घर में करता है।
4- पहले आदमी साइकिल चलाता था और गरीब समझा जाता था। अब आदमी कार से ज़िम जाता है साइकिल चलाने के लिए।

चारों महत्वपुर्ण बदलाव हैं !
वाह रे मानव तेरा स्वभाव....
।। लाश को हाथ लगाता है तो नहाता है ...
पर बेजुबान जीव को मार के खाता है ।।
यह मंदिर-मस्ज़िद भी क्या गजब की जगह है दोस्तो.
जंहा गरीब बाहर और अमीर अंदर 'भीख' मांगता है..
विचित्र दुनिया का कठोर सत्य..
बारात मे दुल्हे सबसे पीछे
और दुनिया आगे चलती है,
मय्यत मे जनाजा आगे
और दुनिया पीछे चलती है..
यानि दुनिया खुशी मे आगे
और दुख मे पीछे हो जाती है..!
अजब तेरी दुनिया
गज़ब तेरा खेल
मोमबत्ती जलाकर मुर्दों को याद करना
और मोमबत्ती बुझाकर जन्मदिन मनाना...
Wah re duniya !!!!!
 लाइन छोटी है,पर मतलब बहुत बड़ा है ~
उम्र भर उठाया बोझ उस कील ने ...
और लोग तारीफ़ तस्वीर की करते रहे ..

 पायल हज़ारो रूपये में आती है, पर पैरो में पहनी जाती है
और.....
बिंदी 1 रूपये में आती है मगर माथे पर सजाई जाती है
इसलिए कीमत मायने नहीं रखती उसका कृत्य मायने रखता हैं.

 एक किताबघर में पड़ी गीता और कुरान आपस में कभी नहीं लड़ते,
और
जो उनके लिए लड़ते हैं वो कभी उन दोनों को नहीं पढ़ते....

 नमक की तरह कड़वा ज्ञान देने वाला ही सच्चा मित्र होता है,
मिठी बात करने वाले तो चापलुस भी होते है।
इतिहास गवाह है की आज तक कभी नमक में कीड़े नहीं पड़े।
और मिठाई में तो अक़्सर कीड़े पड़ जाया करते है...

 अच्छे मार्ग पर कोई व्यक्ति नही जाता पर बुरे मार्ग पर सभी जाते है......
इसीलिये दारू बेचने वाला कहीं नही जाता ,
पर दूध बेचने वाले को घर-घर
गली -गली , कोने- कोने जाना पड़ता है ।
 दूध वाले से बार -बार पूछा जाता है कि पानी तो नही डाला ?
पर दारू मे खुद हाथो से पानी मिला-मिला कर पीते है ।
Very nice line
इंसान की समझ सिर्फ इतनी हैं
कि उसे "जानवर" कहो तो
नाराज हो जाता हैं और
"शेर" कहो तो खुश हो जाता हैं!
जबकि शेर भी जानवर का ही नाम है 
जाती निर्माण पर एक शब्द है #caste जिसका अनुवाद हमारे ज्ञानियों जाति किया अब देखना यह है की क्या जाति के भी वही मायने थे जो caste के हैं ??? #जायते_इति_जाति माने समान जन्म वाले सजातीय होते हैं जैसे मनुष्य एक जाति है सभी का जन्म सामान ही होता है दूसरा फ़ण्डा था #जन्मना_जायते_शूद्र_संस्कारेत_द्विज_उच्चयतेजन्म से सभी शूद्र ही होते हैं संस्कार या कर्म से उनका वर्ग निर्धारण होता है
यह हमारे मनीषियों और ऋषियों का दिया हुआ मंत्र था इसको षड्यंत्र पूर्वक जातीय श्रेष्ठता का षड्यंत्र साबित किया गया की ब्रह्मणो ने ख़ुद को सबसे ऊपर और श्रेष्ठ रखा इत्यादि जो की पहले ही लिख चुका हूँ की यह हॉरिज़ॉंटल वर्गीकरण था कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं था सबका अपना अलग महत्व था
#शूद्र वर्ग जो की मुख्यतः मैन्युफ़ैक्चरिंग करता था उनको टार्गट किया गया उनके उद्योग और व्यवसाय छीन लिए गए जिसमें मुख्यतः सूती वस्त्र उद्योग और नमक का व्यवसाय सबसे बुरी तरह छीन लिया गया सूती वस्त्र उद्योग पहले भी लिख चुका हूँ हर घर में था और नमक को कुछ ख़ास लोग पैदा करते थे
शूद्रो की हालत इस क़दर दयनीय हो गई थी की लाखों लोग भुखमरी से मर गए कुछ चित्र नीचे दे रहा हूँ उनको देखकर भी यदि इन मलनिवासियों का मन विचलित न हो तो मैं कुछ नहीं कर सकता उस भयंकर भुखमरी के समय ऐसा नहीं था की देश में अनाज न था अनाज था लेकिन उसको ख़रीदने का धन नहीं था लोगों के पास भारी लगान के चलते किसान भी भूख से मरने लगे थे
उसके बाद असली खेल चालू किया गया caste शब्द का जन्म हुआ जबकि caste जैसी कोई चीज़ भारतमें नहीं थी यह पूर्ण रूप से आभारतिय है #caste is derived from the word casta (Spanish and Portuguese word) which means (Race lineage or breed )
यहाँ से सुरु हुई रेस थियरी अब सारे वामपंथियों दलहित चिंतकों से कोई यह पूछे की जाति ( मैन्युफ़ैक्चरर भारत के सम्बंध में ) का मतलब यही होता है क्या race नशल ??
ब्रीड ??? यह तो क़तई न था यहाँ जाति थी लोहार जो लोहे का समान बनाता है कुम्भकार जो मिट्टीका समान बनाता है यह सब मैन्युफ़ैक्चरिंग (sub division) या नशल था मूर्खों ???
आर्यों की अलग नशल जब की आर्य मात्र एक सम्बोधन है जिसका मतलब सतजन साधू ( अमर कोश) होता है बाक़ी लोग अनार्य माने मूलनिवासी भैंचो इतना कचरा सायद ही किसी देश का हुआ हो
अब तर्क दिया जाता है की ब्रह्मणो ने शूद्रो का शोषण किया आधार क्या है मनुस्मृति पूछो पढ़ी है नहीं मैक्स मुल्लर बाबा ने बताया और उन्ही का अनुवाद किया हुआ डॉक्टर अम्बेडकर ने पढ़ लिया थे तो वह भी मैकाले शिक्षित ही क्या करते जीवनी लिखी who were soordas लिख दिया "soodrs were born from feet of brhama so they were allotted to menial jobs " बस हो गया गुण गोबर !
उसके बाद आए #रिश्ले_महात्मा जिन्होंने नाक की चौड़ाई को आधार बनाया और जातियों का वर्गीकरण सुरु किया माने जिसकी नाक जितनी चौड़ी और भद्दी वो उतना नीचे और जिसकी नाक सुडौल वो उतना उच्च कोटि का यही आधार लेकर महात्मा रिश्ले ने प्रथम जातिगत जनगणना की सायद १८६५ में हुई थी अभी ठीक से याद नहीं लेकिन हुई अठहरवि शदी के बाद ही यह कन्फ़र्म है जिसमें वही नाक की चौड़ाई का आधार था उसके पहले की जनगणना कर्म आधारित व्यवसाय आधारित ही हुई है अगर किसी को लगता है की ग़लत है तो वह साबित करे
मैन्युफ़ैक्चरिंग डिविज़न को कास्ट में तब्दील कर दिया गया और आर्थिक हालात गोरंग ईसाइयों के शोषण के उपरांत थी ही भूखे मरने के तो बोला गया की ब्रह्मणो ने तुम्हारे हाथ का पानी न पिया अबे तो अंग्रेज़ कौन सा तुमको गले में लेकर घूमते थे जिनको तुम बाप बनाए बैठे हो उन्होंने भी तो लिखा था न की "INDIAN AND DOGS ARE NOT ALLOWED " ऐसा ब्राह्मणी ने भी लिखा है क्या कहीं पर ???
इसी को आधार बनाकर आज भी तुमको रोज़ बर्ग़लाया जाता है तुम मान भी जाते हो और मत परिवर्तन करके काले वाले माने हैम वाले जो शापित थे वही हलेलुइया बनते जा रहे हो उनके यहाँ भी कोई विधान है क्य #उच्चयते टाइप वाला ??
खतरे की घंटी
हमारे चारो ओर खतरे की घंटियां निरन्तर बज रही हैं,और हम बेखबर है। हम जिन्दा हैं,स्वस्थ हैं - ये ही आश्चर्य का विषय है,न कि बीमार हैं,मर रहे हैं...क्यों कि मरने का सामान हमारे पास अधिक इकट्ठा हो गया है,जीने के साधन की तुलना में। खाद्य –पदार्थ से लेकर वायु और जल तक दूषित ही नहीं अतिशय प्रदूषित हो चुका है,या कहें हमने कर लिया है। और सबकुछ दूषित हो चुका है,तो फिर विचार तो दूषित होना ही है न ! 
परन्तु कमाल की बात तो ये है कि इसे ही हमने विकास मान लिया है। कृत्रिमता के गिरफ्त में हम इस कदर जकड़ते जा रहे हैं कि मूल ही निर्मूल होता जा रहा है। रुप,रस,गन्ध सब कुछ बनावटी हो गया है। हम खुश हैं कि हमने कृत्रिम लहु भी बना लिया है, कृत्रिम हृदय भी...किन्तु दुःख की बात है कि हमारे रिश्ते-नाते,सम्बन्ध भी कृत्रिम ही हो चले हैं। नौ महीने गर्भ के पले बच्चे और टेस्टट्यूब बेबी में आंखिर बिलकुल साम्य कहां से पा सकते हैं ! औरस और दत्तक एक कैसे हो सकता है ! 
निरापद जीवनयापन के लिए कभी विचार करना भी चाहते हैं कि क्या करें,क्या खायें-पीयें,कैसे रहें,कहां रहें....तो थक-हार कर जो सामने दीखता है,उसे ही अंगीकार करने को विवश होजाते हैं। काम और कामनाओं से जकड़े मनुष्य की आबादी भेड़-बकरियों सी बढ़ने लगी,तो हमने विविध निरोधों का सहारा लिया,किन्तु ‘निरोध’शब्द की व्युतपत्ति और मूलार्थ को ही विसार कर। हम ‘अवरोध’ को ही निरोध मान बैठे। ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ में चित्तवृत्तियों का शमन-दमन नहीं है,अवरोध तो बिलकुल ही नहीं है। 
खैर,हम यहां विचार कर रहे थे निरापद जीवन यापन की,जो दिनोदिन दुर्लभ होता जा रहा है। जनसंख्या नियंत्रण के सारे हथकंडे अपना लेने के बावजूद सन्तोष नहीं हुआ ,तो संसाधनों का ही खींचतान करने लगे। जनसंख्या तो बढ़ती रही,पर जमीन को खींच कर बढ़ाना कैसे होता,अतः कृषिभूमि को बढ़ाने में असमर्थता के कारण पैदावार को ही बढ़ाने में जुट गये,ताकि गुणन गति से बढ़ती जनसंख्या की उदर पूर्ति की जासके। प्राकृतिक खाद को विसार कर,कृत्रिम खाद का धुंआधार प्रयोग करने लगे। यूरिया,फॉसफेट और पोटाश के साथ-साथ विविध कीटनाशकों(जानलेवा विष)का प्रचुर प्रयोग इस कदर बढ़ा कि पांच साल के बच्चे को भी यूरिक एसिड की समस्या झेलनी पड़ रही है। आंखिर इस जहर से हम बच भी कैसे सकते हैं? खाद्यान्न से लेकर फल-सब्जियों तक को भयंकर रसायनिक गिरफ्त में धकेल दिया गया है- कुछ विकास के नाम पर,कुछ संरक्षण के नाम पर। फल-सब्जियों तक को इन्जेक्शन लगाया जा रहा है। मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्रीय महासूत्र की सार्थकता सिद्ध करने हेतु हम अनर्थ पर अनर्थ किये जा रहे हैं। पूंजीवादी विकास धारा ने इस कदर अंधा बना दिया है कि परिणामवाद पर विचार करने का जरुरत ही नहीं समझते। जैसे भी हो जितना जल्दी हो सके अधिक से अधिक पैसे पैदा कर लेना है। चार दिनों बाद तैयार होने वाले कद्दू को एक रात में ही पिट्यूसीन देकर तैयार कर लेते हैं। एक किलो दूध देने वाली गाय को पिट्यूसीन देकर चार किलो दूध उतार लेते हैं। बछड़े को तो हम पहले ही मार देते हैं,ताकि उसके हिस्से का दूध भी हम पी सकें,और जो अपने गर्भ के बच्चे की चिन्ता नहीं करता वो भला गाय के बच्चे की क्या चिन्ता करेगा! 
खाद्य-संरक्षण का एक दूसरा पहलु है ,जो आलस्य और आरामतलबी के गर्भ से पैदा हुआ है। रोटी सेंकने में कठिनाई होती है,अतः ब्रेड खाना पसन्द करते हैं,और ये जानना जरुरी भी नहीं समझते कि इसके निर्माण में पोटैशियम ब्रोमेट,पोटैशियम आयोडेट जैसे घातक रसायन का प्रचुर प्रयोग किया गया है,जो कैंसर का महाजनक है,थायरॉयड का परम सहयोगी भी। ऐसे घातक रसायनों का प्रयोग पिज्जा,वर्गर,बन,विस्कुट, आदि लगभग सभी संरक्षित खाद्य पदार्थों में धड़ल्ले से किया जाता है मानक क्षमता की धज्जियां उड़ाकर । नूडल हंगामा अभी हाल का उदाहरण है। शीतल पेय पदार्थों की तो बात ही न करें,वो तो पहले से ही महान हैं- मानवजीवन से खिड़वाड़ करने में,और उनका सहारा है सोडियम बेन्जोयेट,और पता नहीं क्या क्या। विश्वप्रसिद्ध ‘जॉनसन प्रोडक्ट’ जिसे हम अपने नवजात भविष्य का रक्षक मानकर इठलाते हैं,उनकी कहानी भी हम सुन चुके हैं,जिन पर हजारों की संख्या में शिकायतें दर्ज हैं,और उनके ही देश की सरकार ने अरबों रुपये का जुर्माना भी लगाया है। क्या ये भी महज राजनैतिक खेल है,जैसा कि हमारे यहां आमतौर पर होता है। बेचारे नेता जी तो अपराध करते ही नहीं हैं,वे तो विरोधी दल के साजिश का शिकार सिर्फ होते हैं। 
कोई दुर्घटना होती है,हो हंगामा होता है,तो जनता को फुसलाने के लिए तत्काल जांच कमेटी बैठा दी जाती है,और फिर जांच तो जांच ही है न। नियमानुसार ये जांच पहले ही किया जाता रहा होता तो ये नौबत ही क्यों आती? गौरतलब है कि जिस रसायन को सन्1992 में ही विभिन्न देशों में बैन कर दिया गया,इन्टरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने जिसे 1999 में ही घातक सिद्ध कर दिया था, सेन्टर फॉर सायन्स एंड एनवायर्मेन्ट ने भी लाल कलम लगाये जिनपर ,उसे भी हम आज ढोये जा रहे बेरहमी और बेशर्मी पूर्वक। 
अभी हाल में ही सुनने-जानने को मिला कि 80% डॉक्टर बेशर्मी पूर्वक सिर्फ कमीशन के लोभ में बड़े-बड़े जांच लिखते हैं,और उन दवाओं को खाने का भी सुझाव देते हैं,जिन्हें कठोरता पूर्वक अवैध और घातक घोषित कर दिया गया है। कमाल की बात तो ये है कि जिस जांच-रिपोर्ट पर आँखमूंद कर हमारे तथाकथित भगवान भरोसा कर लेते हैं,उस जांच को करने वाला एक्सपर्ट भी कोई ननमैट्रिक या अर्डरग्रैजुयेट भटकता बेरोजगार ही होता है,जो चन्द रुप्पलों के लिए लैब में काम कर रहा होता है। अब भला आम आदमी उन 20%सही डॉक्टर का चुनाव(जांच) किस लेबोरेट्री से कराये,जो पूर्ण रुप से डॉक्टर यानी मानव-जीवन-रक्षक हो?
हमारी सजगता,संयम और सावधानी ही हमारा एकमात्र रक्षक हो सकता है- मुझे तो ऐसा ही लगता है। शायद आपको भी !
ओशो का प्रवचन पवित्र कुरआन के संबंध में ---
॥पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है॥
मुसलमानों की पवित्र किताब कुरान इतनी बचकानी है, इतनी आदिम है उसका कारण है मोहम्मद अनपढ थे। वह खुद लिख नहीं सकते थे। उन्होंने कहा होगा और किसी और ने लिखा होगा।
उन्हें खुद धक्का लगा था जब उन्होंने आवाज सुनी थी। वे पहाड़ पर अपनी भेड़ों और बकरीयों को चरा रहे थे। उन्हें सुनाई पड़ा,"लिखो!" उन्होंने सब तरफ देखा कोई नजर नहीं आया। दुबारा उन्होंने सुना,"लिखो!" उन्होंने कहा,"मैं निरक्षर हूं, मैं लिख नहीं सकता। और तुम कौन हो? वहां कोई नहीं था। वे बहुत कंप रहे थे, बहुत भयभीत हो गये थे। और यह एक अस्थिर मन का लक्षण है, जो अपने अचेतन से आ रही आवाज को बाहर से आ रही आवाज समझने की गलती कर रहा था।
यह उनका खुद का अचेतन था। परंतु चेतन के लिए अचेतन बहुत दूर है। वह भीतर ही है। परंतु यदि मन असंतुलित हो...और मोहम्मद का चित्त असंतुलित था इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनका पूरा जीवन एक धर्मांध का जीवन रहा है - लोगों को मारना और मारकर धर्मांतरित करना : "या तुम अनुयायी बनो नहीं तो मरने के लिए तैयार रहो!" इस्लाम ने दुनिया की इक तिहाई लोगों को धर्मांतरित किया है तर्क से नहीं बल्कि तलवार से। वे तर्क करने के लिए सक्षम नहीं थे और ना ही उनकी क्षमता थी पढने, लिखने या विचार करने की।
तो जब उन्होंने इस अचेतन आवाज को सुना तो वे कंपते हुए, ज्वरग्रस्त और भयभीत होकर घर की तरफ दौड़े। वे बिस्तर में घुस गये और अपनी पत्नी से कहा,"मैं किसी से नहीं कह सकता कि खुद ईश्वर ने मेरे साथ बातचीत की है, मैं खुद भरोसा नहीं कर पा रहा हूं!" लगता है मैं पागल हुआ हूं - शायद रेगिस्तान और पहाड़ियों की बहुत ज्यादा गर्मी में टहलने के कारण मैं भ्रांति में हूं या ऐसा ही कुछ है। मैंने सुना ...और मैं तुम्हें बताना चाहता हूं ताकि मैं भारमुक्त हो जाऊंगा!"
उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया। इसलिए मैं तुमसे बार बार कहता हूं, कि नेताओं को अनुयायीयों की जरूरत होती है खुद को यह विश्वास दिलाने के लिए की वे नेता है। उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया कि वह सच में ईश्वर ही था: "तुम पागल नहीं हो, ईश्वर सच में तुमसे बोला है!" वह स्त्री निश्चित ही मोहम्मद से प्रेम करती थी, क्योंकि उसकी उम्र चालीस साल की थी और वह सिर्फ छब्बीस साल का था। और वह गरीब, असंस्कृत, अशिक्षित था फिर भी उस अमीर स्त्री ने उससे शादी की थी : तो निश्चित ही वह स्त्री उस आदमी के प्रेम में थी। उसने उसे विश्वास दिलाया : "तुम चिंता मत करो। और आवाजें आयेगी। यह निश्चित ही शुरूआत है, इसलिए ईश्वर ने कहा "लिखो!" अगर तुम लिख नहीं सकते, तो फिकर मत करो। तुम सिर्फ इतना बता दो कि तुम्हें क्या कहा गया है हम उसे लिखेंगे!" इस तरह कुरान लिखी गई। और यह एक दिन, एक महीने या एक साल में नहीं लिखी गई है, क्योंकि मोहम्मद सुस्पष्ट व्यक्ति नहीं थे। उसे पूरी जिंदगी लगी। कभी कभार कोई बात निकलती थी और वह कहता था "लिखो!"
कुरान को लिखने में कई साल लगे है, और उसमें से जो निकला है वह करीब-करीब निरर्थक है। यह एक समझदार मनुष्‍य से भी नहीं निकली है, ईश्वर का तो क्या कहना - अगर कहीं कोई ईश्वर है तो! अगर यह किताबें उस ईश्वर का प्रमाण है तो वह ईश्वर सच में नासमझ है। अब कुरान अजीब चीजों के बारे में कहती है जिनका मुसलमान अनुगमन करते है क्योंकि वह एक पवित्र किताब है।
मोहम्मद की खुद की नौ पत्नीयां थी। वह गरीब था। उसमें एक पत्नी संभालने का भी सामर्थ्य नहीं था। परंतु चूंकि एक अमीर स्त्री उसके प्रेम में पड़ी थी, वह चालीस साल की थी और वह छब्बीस साल का, वह स्त्री जल्‍दी ही मर जाएगी फिर उसे उसका सारा धन मिलेगा। इसलिए उसने किसी भी तरह की सुंदर स्त्री से शादी करने की शुरुआत की जो उसे मिल सकती थी। और उसने कुरान में कहा कि हर मुसलमान को चार पत्नीयां करने का अधिकार है - यह ईश्वर का मुसलमानों को दिया गया विशेष उपहार है।
दूसरा कोई भी धर्म चार पत्नीयां करने की अनुमति नहीं देता है। अब तुम्हें चार पत्नियां कहां मिलेंगी? प्रकृति में पुरुष और स्त्री हमेशा लगभग समान अनुपात में होते है, लिहाजा एक पुरूष, एक पत्नी यह बहुत ही प्राकृतिक व्यवस्था लगती है क्योंकि उनका अनुपात समान है। परंतु यदि एक पुरुष चार पत्नियों से शादी कर रहा है, वह दूसरे तीन पुरूषों की पत्नियां ले रहा है। अब वे दूसरे तीन आदमी, वे क्या करेंगे? यह इस्लाम की अच्छी कूटनीति बनी। इन दूसरें तीन मुसलमानोंने दूसरों की पत्नीयों छीनना, मुस्लिम की नहीं बल्कि गैर-मुस्लीमों की और उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करना।
वस्तुत: जब भी कोई स्त्री मुसलमान से शादी करती है तब वह भी मुसलमान बनती है, किसी विशेष धर्मांतरण की आवश्यकता नहीं होती है। और खासतौर से भारत से उन्होंने हजारों स्त्रियों को पकड़ा। हिंदू समाज संकट में था और यहुदीयों की तरह हिंदू भी धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते है। यह दों सबसे पुराने धर्म हैं जो धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते है। यहुदी जन्म से यहुदी बनता है और हिंदू जन्म से हिंदू बनता है। और एक बार कोई हिंदू स्त्री मुसलमान बन गई तो वह पतित हो जाती है। वह अछूत बन गई, उसको हिंदू धर्म में वापस नहीं लिया जा सकता है। तो उन्होंने हर जगह से स्त्रियों को खोजा जिससे उन्हें उनकी आबादी अत्याधिक रूप से बढाने में मदद मिली। आप तथ्य देखते हो? अगर ज्यादा स्त्रियां उपलब्ध हो तो आदमी चाहे जितने बच्चे पैदा कर सकता है, परंतु एक स्त्री एक साल में एक ही बच्चे को जन्म दे सकती है। उसे दुसरे बच्चे को जन्म देने के लिए एक साल और लगता है। मुसलमानों की आबादी जल्द बढी क्योंकि हर मुसलमान को चार पत्नीयां करने का अधिकार दिया गया है।
और तलवार से ... यह बहुत आश्चर्यजनक है कि लोग इसमें विश्वास करते है। कुरान कहती है कि, "अगर आप किसी को इस्लाम में धर्मांतरित नहीं कर सकते हो, तो बेहतर होगा कि उसे मार डालो, क्योंकि आपने उसे मुक्ति दिलाई है एक गलत जिंदगी जीने से, जो वह जीने जा रहा था। उसकी भलाई के लिए उसे मुक्त कर दो!" इस तरह उन्होंने बेहिसाब लोगों को मुक्ति दिलवायी और मुक्ति दिलवाते गये। दोनों में से किसी भी एक तरीके से आप मुक्त हो सकते है, अगर आप इस्लाम धर्म स्वीकार करते है तब भी, क्योंकि ईश्वर दयालु है।
मुसलमान होने के लिए तीन चीजों में आस्था होनी चाहिए : एक ईश्वर, एक पैगंबर मोहम्मद और एक पवित्र किताब कुरान। बस यह तीन आस्थाएं और आप बच जाते है। अगर आप इन तीन आस्थाओं से बचना नहीं चाहते हो तो तलवार तुरंत आपको छुटकारा देगी। परंतु वे आपको गलत जीवन जीने की अनुमति नहीं देते। वे जानते है सही जीवन क्या है और उनके जीवन जीने के तरीके के अलावा बाकी सब जीवन जीने के तरीके गलत है।
यह सब पवित्र किताबें है। इन पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है। तो सबसे पहले मैं तुम्हें कहना चाहता हूं कि मेरी सहित कोई भी किताब पवित्र नहीं है। सब मनुष्य निर्मित है। हां वहां कुछ अच्छी तरह लिखी गई किताबें और कुछ अच्छी तरह ना लिखी गई किताबें है। परंतु वहां पवित्र और अपवित्र जैसी श्रेणियों में कोई किताब नहीं है।
ओशो : फ्रॉम अनकांशसनेस टू कांशसनेस, प्रवचन~१७
अभी तो हम इसी में खुश हैं कि चलो विदेशियों ने हमारे राम-सेतु को भगवान राम से जोड़ा और इसके प्राकृतिक न होने तथा मानवनिर्मित होने का सर्टिफिकेट तो दे ही दिया , भले ही इसे मात्र पाँच हजार साल ही पुराना माना । अब बेचारा हिन्दु पाँच हजार साल को थोड़ा पीछे ले जाकर दस-बीस हजार साल तक तो मान सकता है , पर वैज्ञानिक सोच को धारण करते हुए वह कैसे माने कि हमारे आराध्य भगवान श्री राम सत्रह लाख साल पहले इस धरा पर अवतरित हुए थे । ऐसा कहते ही उसे घोर पुरातनपंथी और दकियानूसी सोच रखने वाला घोषित कर दिया जायेगा ।
ऐसे भय के माहौल में मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही है कि मैं लाखों नहीं बल्कि करोड़ों साल पहले देवों और असुरों के बीच हुए समुद्र-मंथन के सत्यता पर बहस छेड़ूँ । लगभग पाँच करोड़ साल तो हिमालय को उत्पन्न हुए हुआ है । उससे पहले वहाँ टेथिंस सागर का अस्तित्व था । प्लेट टेक्टॉनिक थियरी के आधार पर इस सागर के ऊपर दबाव के परिणामस्वरूप हिमालय की उत्पत्ति हुई ।
जब उस स्थान पर समुद्र हुआ करता था , तभी उसी समुद्र में अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन किया गया । ये घटना करोड़ वर्ष पहले की है या अरब वर्ष पहले की है , इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता । इस समुद्र-मंथन से मुख्य रूप से चौदह रत्न निकले थे ।
अभी पिछले महीने मैं बाँका में मंदार पर्वत पर किसी कार्यक्रम में गया था । यह वही मंदार पर्वत है जिसका प्रयोग समुद्र-मंथन के समय मथनी के रूप में किया गया था , इसे सुमेरु पर्वत के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ संयोग से एक स्वंयसेवक मित्र राहुल डोकानिया जी से परिचय हुआ । ये बहुत अध्यात्यमिक और गुरू भक्त हैं । इन्होंने मुझे बताया कि इनके गुरू जी ने इनसे बताया है कि समुद्र-मंथन के परिणामस्वरूप मात्र चौदह रत्न ही नहीं निकले थे बल्कि हजार से अधिक वस्तुएं निकली थीं जो आज भी इस पर्वत में छिपी हुई हैं । इसके प्रमाण में उनके गुरू जी ने एक विशाल शंख का पता बताया कि एक निश्चित स्थान पर जल के भीतर एक प्राचीन शंख है । उनके बताए मार्गदर्शन के आधार पर राहुल डोकानिया जी ने उस विशाल शंख को खोज निकाला ।
इसके बाद राहुल डोकानिया जी ने बहुत प्रयास करके पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण दल को वहाँ बुलवाया । सर्वेक्षण दल ने शंख प्राप्ति की सूचना को सूचीबद्ध तो कर लिया है पर वर्षों से मंदार पर्वत पर अन्य किसी भी प्रकार के नये खोज में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है । इसके साथ ही पुरातत्व विभाग ने मंदार पर्वत पर किसी भी प्रकार के नये खोज करने से राहुल डोकानिया जी पर प्रतिबंध लगा रखा है । वे अब इस दैविय विषय को लेकर केंद्र सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि शायद ये हिन्दुवादी सरकार अपने प्राचीन वैभवशाली स्वर्णिम इतिहास को संसार के सामने उजागर होने का अवसर प्रदान करे ।