Friday, 21 September 2018

sangh



1925 को राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संगठन यानी संघ (आरएसएस) की स्‍थापना के 92 साल बाद साल 2018 में संगठन के तीन दिवसीय व्‍याख्‍यानमाला के आयोजन को टर्निंग प्‍वाइंट इसलिए माना जा रहा है क्‍योंकि पहली बार संघ ने इसके माध्‍यम से आम जन से सीधा संवाद किया है.
अपने प्रति आरोपों, आलोचनाओं, पूर्वाग्रहों, आशंकाओं को लेकर सीधे तौर पर जनता के समक्ष सरसंघचालक ने संघ के नजरिये को पेश किया है. संघ ने बदलते भारत और विश्‍व के संदर्भ में अपनी भविष्‍य की सोच का खाका सीधेतौर पर जनता के समक्ष पहली बार पेश किया है. यह आयोजन इसलिए भी ऐतिहासिक कहा जाएगा क्‍योंकि इसमें संघ के संबंध में मिथक बन चुकी कई धारणाओं से उलट बातें संघ ने कहीं.

संघ प्रभुत्‍व नहीं चाहता
"अगर संघ के प्रभुत्व के कारण कोई बदलाव होगा तो यह संघ की पराजय होगी. हिंदू समाज की सामूहिक शक्ति के कारण बदलाव आना चाहिए."

संघ को महिलाओं का सक्रिय सहयोग
महिलाएं संघ का विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय सहयोग कर रही हैं और समाज के कल्याण में उन्हें शामिल करने के लिए एक समानांतर संगठन की स्थापना की गई है. संघ केवल ‘‘संन्यासियों’’ का नहीं है. संघ के ऐसे भी स्वयंसेवक हैं जो विवाहित हैं और उनकी पत्नी एवं माता सक्रिय रूप से संघ की गतिविधियों में सहयोग करती हैं.और महिलाओं के लिए एक समानांतर संगठन, राष्ट्र सेविका समिति है जोकि समाज के कल्याण के लिए संघ की विचारधारा पर कार्य करती है

‘‘हमने कभी स्वयंसेवक से किसी पार्टी विशेष के लिए काम करने को नहीं कहा. हमने उनसे राष्ट्रीय हित के लिए काम करने वालों का समर्थन करने को अवश्य कहा है. आरएसएस राजनीति से दूर रहता है किन्तु राष्ट्रीय हितों के मुद्दे पर उसका दृष्टिकोण है.’’ उन्होंने कहा कि संघ का मानना है कि संविधान की परिकल्पना के अनुसार सत्ता का केंद्र होना चाहिए तथा यदि ऐसा नहीं है तो वह इसे गलत मानता है.

हिंदू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि इसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं

‘‘संघ सार्वभौमिक भाईचारे की दिशा में काम करता है और इस भाईचारे का मूलभूत सिद्धांत विविधता में एकता है. यह विचार हमारी संस्कृति से आता है जिसे दुनिया हिंदुत्व कहती है. इसलिए हम इसे हिंदू राष्ट्र कहते हैं.’’ संघ की विचारधारा को सभी को साथ में लेकर चलने वाला बताते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘‘हिंदू राष्ट्र का यह मतलब नहीं है कि उसमें मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं है. जिस दिन ऐसा कहा जाएगा, तो यह हिंदुत्व नहीं रहेगा. हिंदुत्व वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है.’’

यह धारणा "बिल्कुल गलत" है कि संघ मुख्यालय नागपुर से कॉल किया जाता है और (उसके तथा सरकारी पदाधिकारियों के बीच) बातचीत होती है. यह धारणा इसलिए भी है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसों का नाता संघ से रहा है. आरएसएस कभी अपने स्वयंसेवकों को किसी राजनीतिक दल के लिए काम करने को नहीं कहता है. संघ सलाह नहीं देता है, बल्कि मांग जाने पर सुझाव पेश करता है.

‘‘यह पूछा जाता है कि उनके इतने सारे लोग एक ही पार्टी में क्यों हैं. यह हमारी चिंता नहीं है. वे अन्य पार्टियों के साथ क्यों नहीं जुड़ना चाहते, यह उन्हें विचार करना है. हम कभी भी किसी स्वयंसेवक को किसी खास राजनीतिक दल के लिए काम करने को नहीं कहते.’’

अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं
संघ अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं है और यह पुरुष तथा महिला के बीच तालमेल का मुद्दा है. अगर अंतरजातीय विवाहों की गिनती करा ली जाए तो उनमें अधिकतम मामले संघ से होंगे.

संघ अंग्रेजी के खिलाफ नहीं
संघ अंग्रेजी सहित किसी भी भाषा का विरोधी नहीं है लेकिन यह किसी भारतीय भाषा का स्थान नहीं ले सकती. भागवत ने कहा, "आपको अंग्रेजी समेत किसी भी भाषा का विरोधी नहीं होना चाहिए और इसे हटाया नहीं जाना चाहिए." "हमारी अंग्रेजी के साथ कोई शत्रुता नहीं है. हमें कुशल अंग्रेजी वक्ताओं की जरूरत है.

गोरक्षा पर जोर

लेकिन लेकिन हिंसा को नकारा और कहा कि इस मुद्दे पर किसी को भी कानून अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए. संघ प्रमुख ने यह भी कहा, ‘‘हमें दोहरे मापदंडों से भी बचना चाहिए. गो-तस्‍करों की ओर से होने वाली हिंसा पर कोई बात नहीं होती.

’अवैध तरीके से धर्मांतरण गलत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए को स्वीकार नहीं करता है. ये अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देते हैं. हिंदुत्व के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है और इसकी स्वीकार्यता दुनियाभर में बढ़ रही है. महिलाओं की सुरक्षा और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि हमें ऐसा माहौल बनाना होगा जहां महिलाएं सुरक्षित महसूस करें. उन्होंने कहा कि पुरुषों को महिलाओं का सम्मान करना सीखना होगा.

एलजीबीटीक्यू समुदाय को अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि वे समाज का हिस्सा हैं. साथ ही समलैंगिकों के अधिकार ही एकमात्र ज्वलंत मुद्दा नहीं है जिस पर चर्चा की जानी चाहिये. समय बदल रहा है और समाज को ऐसे मुद्दों पर फैसला करना चाहिये

अयोध्या में राम मंदिर का शीघ्र निर्माण होना चाहिए.

इससे हिंदुओं एवं मुस्लिमों के बीच तनाव खत्म हो जाएगा. उन्होंने कहा, “एक संघ कार्यकर्ता, संघ प्रमुख और राम जन्मभूमि आंदोलन के एक हिस्से के तौर पर मैं चाहता हूं कि भगवान राम की जन्मभूमि (अयोध्या) में जल्द से जल्द भव्य राम मंदिर बनाया जाए.” ‘‘अब तक यह हो जाना चाहिए था. भव्य राम मंदिर का निर्माण हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव की एक बड़ी वजह को खत्म करने में मदद करेगा और अगर मंदिर शांतिपूर्ण तरीके से बनता है तो मुस्लिमों की तरफ अंगुलियां उठनी बंद हो जाएंगी.

आबादी का संतुलन कायम रखने की जरूरत
मोहन भागवत ने देश में आबादी का संतुलन कायम रखने के लिए एक नीति बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इसके दायरे में समाज के सभी वर्ग होने चाहिए. उन्होंने कहा कि शुरुआत उन लोगों से की जानी चाहिए जिनके अधिक बच्चे हैं और उनके पालन-पोषण के लिए सीमित साधन हैं. उन्होंने कहा कि इस प्रकार की नीति को वहां पहले लागू करना चाहिए जहां समस्या है (आबादी की). उन्होंने कहा, ‘‘जहां अधिक बच्चे हैं किन्तु उनका पालन करने के साधन सीमित हैं...यदि उनका पालन पोषण अच्छा नहीं हुआ तो वे अच्छे नागरिक नहीं बन पाएंगे.’’

आरक्षण और एससी/एसटी एक्‍ट
उन्होंने दलितों को उत्पीड़न से राहत दिलाने वाले चर्चित कानून का भी समर्थन किया किन्तु यह भी कहा कि इसका दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. ‘‘आरक्षण कोई समस्या नहीं है किन्तु इसे लेकर राजनीति करना एक समस्या है.’’ पिछड़े वर्गों को समाज में बराबरी पर लाने की जरूरत है. ऊपर के लोग नीचे वालों से मिलजुल जाएं और नीचे वाले उठने का प्रयास करें.

‘‘आरएसएस सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है. आरक्षण की निरंतरता के बारे में निर्णय उन लोगों से विचार विमर्श करके किया जाना चाहिए जिन्हें यह प्रदान किया गया है. उन्हें जब यह लगेगा कि यह आवश्यक नहीं है, वे तय करेंगे.’’

जाति व्‍यवस्‍था
उन्होंने मौजूदा जाति व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह गलत शब्द है. जाति व्यवस्था को अंधकार बताते हुए उन्होंने कहा कि इस पर चिल्लाने से यह नहीं जाएगी. ‘‘यह तभी जाएगी जब दीपक जलाया जाएगा. संघ यही कर रहा है.’’ भागवत ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बारे में हाल में लाये गये चर्चित कानून के बारे में कहा कि आरएसएस इसका पूरी तरह से समर्थन करता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस कानून का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए.

Thursday, 20 September 2018

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मोदी जी 2024 तक PM बने रहे तो भारतीय सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना होगी:-

जनरल विपिन रावत

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14 अरब के स्मारक घोटाले में मुश्किल में घिर सकती हैं मायावती, हाईकोर्ट ने तलब की विजिलेंस रिपोर्ट...........
अदालत ने यूपी सरकार से स्टेटस रिपोर्ट एक हफ्ते में कोर्ट में पेश करने को कहा है. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले में सुनवाई के दौरान तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा है कि जनता के धन का दुरूपयोग करने का कोई भी दोषी बचना नहीं चाहिए. दोषी कितना भी रसूखदार हो, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए.
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"फूल बॉडी ट्रक स्कैनर : भारतीय सीमा व्यापार को सुरक्षित करने की ओर एक कदम"
2015 में मोदी सरकार ने एक्स रे पर आधारित फुल बॉडी ट्रक स्कैनर सिस्टम (FBTSS) भारत-पाकिस्तान, भारत-नेपाल, और भारत-बांग्लादेश सीमा के 5 चेक-इन पोस्ट पर ड्रग व हथियार तस्करी को रोकने के लिए लगाने की मंजूरी दी थी।

अभी इन वाघा-अटारी सीमा पर यह एक्सरे उपकरण लगाया जा चुका है, बहुत जल्द यह अन्य सीमाओं पर भी लगाया जाएगा...
यह मशीन : अटारी - वाघा इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट, भारत - बांग्लादेश पेट्रापोल इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट, भारत - नेपाल रक्सौल इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट, उरी - सलामाबाद चेक पोस्ट और पूंछ - चक्कां - दा - बाग़ चेक पोस्ट पर लगाई जा रही है।
लगभग 120 करोड़ की लागत से 5 फुल बॉडी ट्रक स्कैनर लगाए जा रहे है। ट्रक स्कैनर स्थापित हो जाने के बाद सीमा पार व्यापार में होने वाली तस्करी को रोका जा सकता है, नशीले पदार्थों, हथियार या गोला बारूद को छुपाने के लिए हर एक ट्रक की जांच की जाएगी....
बता दें अटारी वाघा बॉर्डर पार ट्रक स्कैनर लगाने की मंजूरी 2012 में मिली थी, पर वही कांग्रेस सरकार की अटकाना, लटकाना भटकाना नीति के चलते यह महत्वपूर्ण कार्य इतने वर्षों तक लटका रहा और 2014 में जब मोदी सरकार आयी तो इस कार्य में तेजी आई है और लगभग 6 वर्षों बाद यह महत्वपूर्ण कार्य पूरा होने जा रहा है, अक्टूबर 2018 से ट्रकों को इस स्कैनर से गुजरना होगा....
अटारी वाघा आईसीपी पर लग रहा ट्रक स्कैनर भारत का पहला फुल बॉडी ट्रक स्कैनर होगा, इसके साथ साथ 108 हाई डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे 130 एकड़ आईपीसी सीमा पर लगाए गए है....
ये है मोदी सरकार में देश की सुरक्षा नीति, हर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, मोदी सरकार ने क्या किया है कहने वालों जरा गौर से देख लीजिए देश की सुरक्षा की दृष्टि से यह कार्य कितना महत्वपूर्ण है, जिसको मोदी सरकार पूरा कर रही है...

सोहराबुद्दीन के भाई ने किया
कांग्रेस का पर्दाफाश...//
बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में सोहराबुद्दीन शेख के भाई नयाबुद्दीन शेख ने सीबीआई कोर्ट में बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि CBI ने अपने आप ही भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात पुलिस ऑफिसर अभय चुडास्मा का नाम इस मामले में जोड़ा था.

आज तक मीडिया रिपोर्ट मुताबिक नयामुद्दीन ने हादसे के दिन का जिक्र करते हुए कोर्ट को बताया कि उसने अपने भाई और भाभी को बस स्टैंड पर छोड़ा था. वो दोनों हैदराबाद जा रहे थे. उन्होंने कहा कि सीबीआई ने इस केस में तुलसीराम का नाम भी जानबूझ कर प्लांट किया.

नयाबुद्दीन शेख ने अपने जबरन लिए गए बयान पर कहा मैंने उस बयान में इस हिस्से को कभी बोला ही नहीं. बता ये बयान सीबीआई अफसर डीएस डागर ने लिया था.
जबरन बयान दिलवाये गए

याद दिला दें साल 2010 में नयाबुद्दीन शेख से ये बयान दिलवाया गया था “जब मैंने चुडास्मा को बताया कि हम अपनी याचिका वापस नहीं लेंगे, तब उन्होंने मुझे धमकाया और कहा कि मेरा हाल भी सोहराबुद्दीन जैसा ही होगा. मैं इस बारे में अमित भाई(अमितशाह) से बात करूंगा और ये मध्यप्रदेश में ही हो जाएगा. वहां पर भी उनकी ही सरकार है.”

अमित शाह ने कभी नहीं धमकाया

इस बयान पर नयामुद्दीन ने खुलासा करते हुए कहा कि उसपर कभी भी बीजेपी की तरफ से दबाव नहीं बनाया गया था, मैंने कभी नहीं कहा कि चूड़ास्मा ने उन्हें 50 लाख का ऑफर दिया और याचिका वापस लेने की बात कही थी. नयामुद्दीन ने साफ कहा कि अमित शाह और चुडास्मा ने कभी भी उसे नहीं धमकाया.

यानी कि अब ये केस आईने की तरह साफ़ हो गया है कांग्रेस ने ही मुस्लिम तुष्टिकरण व वोट बैंक के लिए सीबीआई का गलत इस्तेमाल किया और सीबीआई अफसरों ने इस एनकाउंटर को फर्जी एनकाउंटर बना दिया. साथ ही झूठे बयान दिलवाकर अमितशाह और अमितशाह से नरेंद्र मोदी तक को गिरफ्तार करने की बेहद सनसनीखेज़ साज़िश रची गयी थी.
आखिर कौन था सोहराबुद्दीन शेख?

सोहराबुद्दीन मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के झिरन्या गाँव का रहने वाला एक हिस्‍ट्रीशीटर था। गुजरात पुलिस ने 26 नवंबर 2005 को उसे एक कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। उसकी पत्‍नी कौसर बी को भी गुजरात पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया था. इसके एक साल बाद 26 दिसंबर 2006 को शेख के अंडवर्ल्‍ड साथी तुलसीराम प्रजापति को भी एक मुठभेड़ में गुजरात पुलिस ने मार गिराया था. तुलसी प्रजापति को सोहराबुद्दीन शेख के मुठभेड़ का चश्‍मदीद गवाह बनाकर पेश किया गया था। सोहराबुद्दीन शेख पर 90 के दशक में ही हथियारों की तस्‍करी का मामला दर्ज था.

सोहराबुद्दीन शेख के मप्र के झिरन्‍या गांव स्थित घर से वर्ष 1995 में 40 एके-47 राइफल बरामद हुआ था.उस पर गुजरात व राजस्‍थान के मार्बल व्‍यापारियों से हफ्ता वसूली और हत्‍या का मुकदमा भी दर्ज था। सोहराबुद्दीन अंडवर्ल्‍ड डॉन दाउद इब्राहिम के गुर्गे छोटा दाउद उर्फ शरीफखान पठान, अब्‍दुल लतीफ, रसूल पर्ती और ब्रजेश सिंह से जुड़ा था। लश्‍कर-ए-तोइबा व पाकिस्‍तान के आईएसआई से भी उसके संबंध थे.

1992 में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद आतंक फैलाने के लिए अब्‍दुल लतीफ ने करांची में रह रहे छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान से 40 एके 47 मंगवाया था, जिसे सोहराबुद्दीन ने रउफ नामक एक अन्‍य व्‍यक्ति के साथ मिल कर अमहमदाबाद स्थित दरियापुर से अपने गांव झिरन्‍या पहुंचा और वहां उसने हथियारों को कुएं में छिपा दिया था.

अपने शासन वाल महाराष्‍ट्र के थाने में सोहराबुद्दीन शेख के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बावजूद कांग्रेस सीबीआई के जरिए सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर को फर्जी साबित करने में लगी रही और इसके लिए उसने सीबीआई का गलत इस्‍तेमाल किया.
सोहराबुद्दीन को कांग्रेस ने बताया था शहीद

2007 में पूर्व डीआईजी डी.जी बंजारा सहित कई वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारियों को इसमें गिरफ्तार किया गया था। भाजपा का आरोप था कि कांग्रेस गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह को फंसाने के लिए एक खतरनाक अपराधी के नाम पर राजनीति कर रही है. गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए दोनों सोहराबुद्दीन को ‘मौलाना’ यानी अपराधी की जगह ‘एक शहीद’ बनाने की कोशिश में लगे रहे, जो देश की सुरक्षा के लिए बेहद घातक था. इस केस को खोलने का श्रेय दैनिक भास्‍कर अखबार को जाता है.

अदालतों में परिवारवाद का
कांग्रेसी कनेक्शन समझना जरूरी है...!
–जस्टिस रंजन गोगोई 03 अक्टूबर को असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता स्वर्गीय केशव चन्द्र गोगोई के सुपुत्र जस्टिस रंजन गोगोई भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाल लेंगे।
– जस्टिस रंजन गोगोई 2 अक्टूबर को अवकाश ग्रहण कर रहे, ओडिशा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय रघुनाथ मिश्रा के सुपुत्र और देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र के भतीजे, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की जगह लेंगे।
– जस्टिस दीपक मिश्रा से कुछ समय पहले कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत देवी सिंह ठाकुर के सुपुत्र श्री टीएस ठाकुर भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। देवी सिंह ठाकुर भी जम्मू कश्मीर हाइकोर्ट में जज थे। जज की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर सीधे शेख मोहम्मद सरकार में वित्त मंत्री बने। फिर शेख मोहम्मद के दामाद गुलाम मोहम्मद सरकार में उपमुख्यमंत्री।
यह इत्तेफाक है या सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियक्ति प्रक्रिया की खामियां हैं कि लगातार तीन चीफ जस्टिस कांग्रेस पार्टी के नेता, मंत्री और मुख्यमंत्री के पुत्र हैं?
परम्परा के अनुसार वर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने बाद के दूसरे नंबर के न्यायधीश के नाम की सिफारिश भारत के राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा ने वही किया जिस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुहर लगा दी। लिहाजा 3 अक्टूबर को जस्टिस रंजन गोगई भारत के मुख्यन्यायधीश हो जाएंगे। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब इतना सहज है जितना दिखता है? क्या यह महज संयोग है कि हाल में जितने भी मुख्य न्यायाधीश बने उनके पिता केंद्र में कांग्रेस की सरकार में कद्दावर नेता थे!
दरअसल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी नहीं है कि राष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दे। न ही भारत के मुख्य न्यायाधीश की यह मनमर्जी है कि वो अगले मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए किसी भी नाम की सिफारिश कर दे, लेकिन क्या यह महज इत्तेफाक है कि कांग्रेसी नेताओं के पुत्र ही सीजेआई के पद प्राप्त करते जा रहे हैं?
आपको बता दें कि अगस्त महीने की शुरुआत में केन्द्र सरकार ने पहली बार जजों की नियुक्ति के मामले में परिवारवाद का मुद्दे पर अपनी बात रखी। लिखित तौर पर अपनी राय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से साझा करते हुए केंद्र ने पहली बार जजों की नियुक्ति के लिए भेजे गए नाम में शामिल वकीलों और मौजूदा और रिटायर्ड जजों के साथ बकायदा संबंधों का जिक्र करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजा। इलाहाबाद हाई कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजी गईं 33 अनुशंसाओं में कम से कम 11 वकीलों और उनके संबंधों का जिक्र किया गया।
केंद्र ने अन्य सक्षम वकीलों के लिए भी बराबर के मौके मिलने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के साथ ‘परिवारवाद’ की व्यापक डिटेल साझा की। सरकार ने वकीलों की पात्रता, निजी और पेशेवर ईमानदारी समेत न्यायिक बिरादरी में उनकी साख जैसे मामलों के संदर्भ में अपने जांच निष्कर्षों से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को अवगत कराया।
आपको बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से दो साल पहले ठीक इसी तरह की अनुशंसाएं की गई थीं। उस दौरान हाई कोर्ट कॉलेजियम ने 30 वकीलों के नाम भेजे थे। उस वक्त के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर 11 वकीलों के नाम नाम खारिज कर केवल 19 की अनुशंसा करते हुए हाई कोर्ट जज के रूप में सिफारिश की थी। 2016 की लिस्ट में भी जजों और नेताओं के सगे-संबंधी शामिल थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने 12 मार्च को रिपोर्ट दी थी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कलीजियम द्वारा भेजी गई लिस्ट में मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज के बहनोई, एक के चचेरे भाई के अलावा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व जजों के संबंधी शामिल थे। 15 अप्रैल को प्रकाशित दूसरी रिपोर्ट में टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया था कि परिवारवाद का यह मामला पीएमओ तक पहुंचा है और इलाहाबाद बार एसोसिएशन से मिलीं शिकायतों के आधार कानून मंत्रालय पारदर्शी प्रक्रिया अपना रहा है।
इस मामले में एक रोचक पहलू यह भी है कि सरकार ने 33 अनुशंसाओं में से केवल 11-12 वकीलों को जज बनने के सक्षम पाया था। फरवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट, कलीजियम द्वारा भेजी गई अनुशंसाओं में.एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व बिल्कुल न के बराबर था।
कांग्रेस पर आरोप रहे हैं कि कि न्यायपालिका और न्यायाधीशों का राजनीतिकरण करने से भी नहीं चूकती है। 12 जून को हाई कोर्ट के जज रहे अभय महादेव थिप्से ने जब कांग्रेस पार्टी का दामन थामा तो इसके स्पष्ट प्रमाण भी सामने आ गए। जाहिर है सवाल उठने लगे हैं कि हाई कोर्ट के जज के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान जज अभय महादेव थिप्से कितने निष्पक्ष रहे होंगे?
रिटायर जज महादेव थिप्से ने थामा कांग्रेस का हाथ
राहुल गांधी के साथ जज अभय महादेव थिप्से की ये तस्वीरें कांग्रेस और जजों के पर्दे के पीछे के रिश्तों की कहानी कहती है। गौरतलब है कि इससे पहले भी कई जजों ने रिटायर होने के बाद ऐसे पद लिए जिन्हें राजनीतिक माना जाता रहा है। लेकिन किसी हाई कोर्ट के जज का इस तरह से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का संभवत: यह पहला मामला है।
कांग्रेस की लाइन लेंथ पर चलते रहे हैं पूर्व जज अभय महादेव थिप्से
बेस्ट बेकरी केस में गवाहों के मुकरने के बाद भी चार आरोपियों को दोषी करार दिया
2004 में कहा, “मुझे एक चिट्ठी लिखकर कहा गया कि मैं एक हिंदू की तरह पेश आऊं”
थिप्से ने अपने कार्यकाल में कई माओवादियों-आतंकवादियों को जमानत दी
थिप्से ने 5600 करोड़ के NSE घोटाले में जिग्नेश शाह को जमानत दी थी
थिप्से महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी कानून मकोका के भी विरोधी हैं
थिप्से ने कहा था, ”सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में न्याय नहीं हुआ’’
थिप्से ने कहा था, ”अदालतें मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करती हैं’’
कांग्रेस के कहने पर चार जजों ने किया था प्रेस कान्फ्रेंस!
जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों चेलमेश्वर, मदन लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ ने मीडिया के सामने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार ने इसे कोर्ट का अंदरूनी मामला बताया, लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक पार्टियों के बीच की लड़ाई बनाने की कोशिश की। चारों जजों के प्रेस कांफ्रेंस के आयोजक 10 जनपथ से करीबी ताल्लुक रखने वाले पत्रकार शेखर गुप्ता थे। जाहिर है कि इसके पीछे कांग्रेस की मिलीभगत थी।
जस्टिस के एम जोसेफ की नियुक्ति के लिए तोड़ी मर्यादा
उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस नहीं बनाने पर भी कांग्रेस ने राजनीति की। दरअसल केंद्र सरकार ने कोलेजियम की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया था। केंद्र ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं, जिन्हें केरल हाई कोर्ट से पदोन्नत किया गया है। ऐसे में केरल हाई कोर्ट से एक और पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की सरंचना के हिसाब से ठीक नहीं होगी।



Monday, 17 September 2018

इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की कहानी देश के हर नागरिक को जाननी चाहिए ।
नंबी नारायणन को 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट टेक्नोलॉजी दुश्मन देश को बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
तब ये मामला कई दिन अखबारों की सुर्खियों में रहा था, मीडिया ने बिना जांचे-परखे पुलिस की थ्योरी पर भरोसा करते हुए उन्हें गद्दार मान लिया था।
गिरफ्तारी के समय नंबी नारायणन रॉकेट में इस्तेमाल होने वाले स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने के बेहद करीब पहुंच चुके थे।
इस गिरफ्तारी ने देश के पूरे रॉकेट और क्रायोजेनिक प्रोग्राम को कई दशक पीछे धकेल दिया था।
उस घटना के करीब 24 साल बाद इस महान वैज्ञानिक को अब जाकर इंसाफ मिला है।
वैसे तो नंबी नारायणन 1996 में ही आरोपमुक्त हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपने सम्मान की लड़ाई जारी रखी और अब 24 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ के सारे नेगेटिव रिकॉर्ड को हटाकर उनके सम्मान को दोबारा बहाल करने का आदेश दिया है
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने केरल सरकार को आदेश दिया है कि नारायणन को उनकी सारी बकाया रकम, मुआवजा और दूसरे लाभ दिए जाएं।
ये रकम केरल सरकार देगी और इसकी रिकवरी उन पुलिस अधिकारियों से की जाएगी जिन्होंने उन्हें जासूसी के झूठे मामले में फंसाया , साथ ही सभी सरकारी दस्तावेजों में नंबी नारायणन के खिलाफ दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि उन्हें हुए नुकसान की भरपाई पैसे से नहीं की जा सकती है, लेकिन नियमों के तहत उन्हें 75 लाख रुपये का भुगतान किया जाए। कोर्ट का आदेश सुनने के लिए 76 साल के नंबी नारायणन खुद कोर्ट में मौजूद थे।
नंबी नारायण के खिलाफ लगे आरोपों की जांच सीबीआई से करवाई गई थी और सीबीआई ने 1996 में उन्हें सारे आरोपों से मुक्त कर दिया था I
जांच में यह बात सामने आ गई कि भारत के स्पेस प्रोग्राम को डैमेज करने की नीयत से केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने नंबी नारायण को फंसाया था, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।
सीबीआई की जांच में ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के इशारे पर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने नंबी को साजिश का शिकार बनाया
एक इतने सीनियर वैज्ञानिक को न सिर्फ गिरफ्तार करके लॉकअप में बंद किया गया, बल्कि उन्हें टॉर्चर किया गया कि वो बाकी वैज्ञानिकों के खिलाफ गवाही दे सकें।
ये सारी कवायद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने की नीयत से हो रही थी, ये वो दौर था जब भारत जैसे देश अमेरिका से स्पेस टेक्नोलॉजी करोड़ों रुपये किराये पर लिया करते थे।
भारत के आत्मनिर्भर होने से अमेरिका को अपना कारोबारी नुकसान होने का डर था। जिसके लिए सीआईए ने वामपंथी पार्टियों को अपना हथियार बनाया।
एसआईटी के जिस अधिकारी सीबी मैथ्यूज़ ने नंबी के खिलाफ जांच की थी, उसे कम्युनिस्ट सरकार ने बाद में राज्य का डीजीपी बना दिया , सीबी मैथ्यूज के अलावा तब के एसपी केके जोशुआ और एस विजयन के भी इस साजिश में शामिल होने की बात सामने आ चुकी है।
1994 की केरल सरकार के अलावा तब केंद्र की सरकार की भूमिका भी संदिग्ध है, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के खिलाफ साजिश पर अांखें बंद कर ली थीं।
अगर नंबी नारायण के खिलाफ साजिश नहीं हुई होती तो भारत को अपना पहला क्रायोजेनिक इंजन 15 साल पहले मिल गया होता और इसरो आज पूरी दुनिया से पंद्रह वर्ष आगे होता।
उस दौर में भारत क्रायोजेनिक इंजन को किसी भी हाल में पाना चाहता था। अमेरिका ने इसे देने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद रूस से समझौता करने की कोशिश हुई, रूस से बातचीत अंतिम चरण में थी, तभी अमेरिका के दबाव में रूस मुकर गया।
इसके बाद नंबी नारायणन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि वो और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएंगे ।
उनका ये मिशन सही रास्ते पर चल रहा था कि तब तक वो साजिश के शिकार हो गए नंबी नारायण ने अपने साथ हुई साजिश पर ‘रेडी टु फायर’ नाम से एक किताब भी लिखी।
पहचानिए 'गद्दारों' को :-जानिए पर्दे के पीछे का पूरा सच... देखिये । समझिए ।
तारीख बुधवार 23 मई 2018 ।
दिल्ली का पांच सितारा भव्य हॉल,  लेखक असद दुर्रानी की पुस्तक का विमोचन समारोह (प्रकाशक हार्पर कोलिन्स )
 विमोचन किया, नामों को ध्यान से पढ़िए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, ओमर अब्दुल्ला, बरखा दत्त, फारूख अब्दुल्ला, कपिल सिब्बल, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, यशवंत सिन्हा, शिव शंकर मेनन आदि ने, पुस्तक ‘द स्पाई क्रॉनिकल्स : रॉ, आईएसआई एंड द इलूजन ऑफ पीस’  ।
इस पुस्तक को दुर्रानी के साथ सह लेखक के रूप में रॉ के पूर्व उपमुखिया ए एस दुलत और पत्रकार आदित्य सिन्हा द्वारा लिखे जाने का समाचार सामने आया ।
पहले तो जानिए दुर्रानी को । असद दुर्रानी पाकिस्तान की खुफिया आतंकी एजेंसी ISI के चीफ रहे हैं। इन्ही दुर्रानी साहब ने पाकिस्तान के इशारे पर अपनी एक किताब लिखी है जिसमें भारत को गलत ढंग से दर्शाया गया है। भारत की नीतियों को गलत, दादागिरी भरी व दुर्भावना से ग्रसित बताया है। इस पुस्तक में उन्होंने भारत की बेहतरीन खुफिया एजेंसी RAW और भारतीय सेना पर भी गंभीर झूठे आरोप लगाये हैं ।इस किताब में उन्होंने वर्तमान NSA चीफ अजित डोवाल की भी बहुत बुराई की है । इसमे वर्तमान भारत सरकार की नीतियों और मोदी की भी आलोचना की गई है ।मजा देखिये कांग्रेस का पूरा समर्थन इस दुर्रानी को मिला ।
 दुर्भाग्य देखिये । 2 कौड़ी का भाड़े का टट्टू असद दुर्रानी जो कल तक भारत मे आतंकवाद फैलाता था, जो कल तक भारत मे आतंकवादी भेजता था, जिसकी ISI ने कसाब को भेज कर मुम्बई पर हलमा करवाया था ; आज वही असद दुर्रानी जब सेनानिवृत हो गया तब इसने पाकिस्तान की सेना और ISI द्वारा फेंके गए टुकड़ों की ख़ातिर भारत के खिलाफ एक किताब लिख डाली । कांग्रेस का पूरा समर्थन इस  को मिला ।
 इस पुस्तक को भारत मे भव्य पैमाने पर लांच करने का कार्यक्रम बना । मोदी सरकार ने इन्हें बुक लॉन्च के लिए भारत आने के लिए वीज़ा देने से साफ इनकार कर दिया। अब जब वीजा नही तो दुर्रानी मियां भारत आ नही सकते । देश विरोधी बुक लॉन्च खटाई में पड़ गया... हिम्मत देखिये दुश्मन देश की खुफिया एजेंसी का चीफ भारत मे पहले तो आतंकवाद फैलाता है । फिर भारत के खिलाफ किताब लिखता है और फिर उसे भारत मे लॉन्च करने भी आने की हिम्मत दिखाता है । जानते हैं क्यों? क्योकि इस देश मे उसके कई दोस्त उसकी मदद को तैयार बैठे हैं। वे बाहें फैलाये उसे गले लगाने का इंतज़ार कर रहे हैं ।
 पूरे विश्व मे जब भी कोई मोदी विरोध करे तो भला कांग्रेस कैसे चुप बैठ सकती है? सो कांग्रेस जो बाहें फैलाये ex ISI चीफ का इस्तकबाल करने का प्लान बनाया । लेकिन वीजा नही मिला । पूरी कांग्रेस बहुत मायूस हुई और इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी खत्म करने वाला कदम बता दिया । कांग्रेस के साथ इनकी पूरी गैंग भी मैदान में उतर आई । कांग्रेस ने बाकायदा एक 5-Star होटल में आयोजन कर इस पुस्तक को रिलीज़ करवाया ।
 कांग्रेस ने कार्यक्रम में  पूर्व ISI Chief असद दुर्रानी को वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए इस पूरे कार्यक्रम का हिस्सा बनाया। यह एक चैलेंज है कि लो देशवासियों अब उखाड़ लो जो उखाड़ना है । हमने तो बुला लिया और किताब का विमोचन भी करवा दिया ।
 ये सब कांग्रेसी मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हैं कि अब देश विरोध तक पर उतर आए हैं? मोदी विरोध तो ठीक है पर भारत सरकार का विरोध? RAW का विरोध? भारतीय सेना का विरोध? भारतीय संवैधानिक संस्थाओं का विरोध कहाँ तक ठीक है?
हां पूर्व रॉ अधिकारी दुलत का शामिल होना एक गंभीर संकेत है । क्या पिछले 70 सालों से सुरक्षा तंत्र में इतने बड़े स्तर के अधिकारी भी बतौर काँग्रेसी एजेंट कार्य कर रहे थे । देखिये । समझिए ।