Monday, 22 May 2017

आज भी जल रही है वो अग्नि, जिसके फेरे लेकर भगवान शिव-पार्वती ने की थी शादी!

त्रियुगी नारायण मंदिर’ जो की उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित है। यहां की यात्रा बहुत ही पवित्र मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने सतयुग में माता पार्वती के साथ इसी जगह पर विवाह किया था और आपको जानकर हैरानी होगी कि आज भी इस हवन कुंड से ज्वाला प्रज्जलित हो रही है जिसको उन्होंने साक्षी मानकर विवाह किया था।
त्रियुगी नारायण मंदिर काफी प्रसिद्ध माना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड की वादियों के बीच बहुत खूबसूरत नजर आता है। चारों तरफ हरियाली के बीच आए हुए यात्रियों के लिए यह मंदिर उनके लिए यहां एक समां बांध देता है। इसकी खूबसूरती आंखों को बहुत ही ठंडा देती है। ऐसा कहा जाता है कि इस हवन कुंड से निकलने वाली राख भक्तों के विवाहित जीवन को सुखमय बना देती है।
हरिद्वार के पास कनखल मे राजा हिमालय रहते थे। जहां माता पार्वती का जन्म हुआ था। क्योंकि वह एक पर्वत पुत्री थीं इसलिए उनका नाम पार्वती रखा गया था। जैसे ही माता पार्वती बड़ी हुई उनका विवाह शिव जी के साथ इसी जगह पर किया गया था। जिस जगह को आज हम त्रियुगी नारायण मंदिर के नाम से जानते हैं। क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विष्णु जी को इस विवाह का साक्षी बनाया गया था। इसलिए यहां पर विष्णु जी का भी मंदिर है जिसकी पूजा भी लोग बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं।
वैसे तो इस मंदिर में जाने के लिए बहुत रास्ते आपको मिल जाएंगे। परंतु गौरीकुंड जाने के लिए आपको दो ही मार्ग मिलेगे। जब आप गौरीकुंड से 6 किलोमीटर दूर गुप्तकाशी की तरफ जाएंगे तो वहां सोनप्रयाग आता है। यहां से भी आप त्रियुगी नारायण मंदिर जा सकते हैं वहां से आपको त्रियुगी मंदिर 12 से 13 किलोमीटर दूर पड़ेगा। अगर आप यहां से नहीं जाना चाहते हैं तो एक और रास्ता है जो कि पैदल जाता है।


अगर आप पैदल जाना चाहते हैं तो आपको सिर्फ 6 से 7 किलोमीटर ही पैदल चलना पड़ेगा। सबसे पहले आपको सोनप्रयाग जाना पड़ेगा। वहां से सौ मीटर गौरीकुंड की तरफ पहले आप जाएंगे। वहां पर आपको एक लोहे का पुल मिलेगा। उस पुल के पहले ही आपको एक गुमनाम सी पगडंडी मिलेगी। जो ऊपर की तरफ जाती हुई दिखाई देगी।
इस रास्ते से आपको आगे जाना है। यह रास्ता घने जंगल से होकर जाता है। इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि जब आप थोड़ी दूर जाएंगे तो वहां आपको छोटी सी जलधारा दिखाई देती है। उससे पहले पैदल चलते आपको बहुत प्यास लग सकती है इसलिए आप अपने साथ पानी ले कर जाएं।
यह मंदिर तो देखने में बहुत खूबसूरत है ही आप इसके साथ रुद्रकुंड, विष्णुकुंड और ब्रह्मकुंड भी देख सकते हैं।








Sunday, 21 May 2017

mediya

सहारनपुर की तथाकथित भीम आर्मी जातिगत राजनीत चमकाने का तुष्टिकरण खेल है। वास्तव में भीम आर्मी का चोला ओढ़कर ये नक्सलियों और वामपंथियों का झुंड है जो अम्बेडकर के नाम दुरप्रयोग कर रहे है।
उमा शंकर सिंह
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पृथ्वीराज के बाद यहाँ हिन्दू शासन खत्म हो
गया था, उसके बाद 500 साल मुग़लों ने 200 साल अंग्रेजो ने राज किया......
फिर 700 साल दलितों का शोषण किसने किया ?

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ऐसे ऐसे मादरचोदो को कांग्रेस सरकार ने देश की राष्ट्रीय एकता परिषद् का सदस्य बनाया था .....भारत में तैनात पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल बासित के साथ एकांत में पॉइंट नोट कराता हुआ जॉन दयाल नाम का एक दल्ला ..........बामपंथी मीडिया इसकी असलियत छिपा के इसे पत्रकार के रूप में जनता के सामने पेश करती है !!!
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कांग्रेसियों के अनुसार सम्पूर्ण कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है ........!!!

तमिलनाडु काँग्रेस ने स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर आज एक पेपर एड दिया है, जिसमें भारत के नक्शे से कश्मीर का वो हिस्सा गायब है, जिसे पाकिस्तान और चीन के अलावा पूरी दुनिया हमारा मानती है और हमारे हिस्से में दिखाती है..यहां तक कि इटली भी..लेकिन चापलूस नेताओं ने शायद सोचा होगा कि सोनिया जी इसे अपना न मानती हों...क्या पता, शायद न भी मानती हो .
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क्या आप जानते है की नेहरु और माउंटबेटन हैदराबाद राज्य [आज का पूरा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] को आजाद देश बनाने के पक्ष में थे .......
अगर सरदार पटेल और कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी [के एम मुंशी ] नही होते तो आज आंध्रप्रदेश और तेलंगाना अलग देश होते ...
जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद.
अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82698 वर्ग मील था जो कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.
हैदराबाद की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिंदू लोग थे जबकि अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.
उस पर तुर्रा ये भी था कि कट्टरपंथी क़ासिम राज़वी के नेतृत्व मे रज़ाकार हैदराबाद की आज़ादी के समर्थन में जन सभाएं कर रहे थे और उस इलाक़े से गुज़रने वाली ट्रेनों को रोक कर न सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम यात्रियों पर हमले कर रहे थे बल्कि हैदराबाद से सटे हुए भारतीय इलाक़ों में रहने वाले हिन्दुओ का कत्लेआम कर रहे थे.
आजाद भारत का सबसे पहला आतंकी सन्गठन इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन था और आजाद भारत का पहला आतंकी कासिम रिजवी था .. हैदराबाद के निजाम ने कासिम रिजवी को हिन्दुओ का कत्लेआम करने का जिम्मा सौपा था .. कासिम रिजवी के समर्थकों को रजाकार कहा जाता था .. इस संगठन के पास बहुत हथियार थे और निजाम का समर्थन था ..इसलिए हैदराबाद स्टेट में हिन्दुओ का कत्लेआम होने लगा ..
नेहरु और माउन्टबेटन हैदराबाद को भारत में शामिल करने के पक्ष में नही थे .. लेकिन सरदार पटेल किसी भी कीमत पर हैदराबाद स्टेट को भारत गणराज्य में मिलाने के पक्ष में थे ...
सरदार पटेल ने के एम मुंशी को हैदराबाद में एजेंट-जनरल बनाकर भेजा .. मुंशी जी बिना वेतन इस पद पर जाने को राजी हुए .. और हैदराबाद की पल पल की खबर प्रधानमंत्री नेहरु को न देकर गृहमंत्री सरदार पटेल को दे रहे थे ...
निजाम ने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे? हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली लगातार पाकितानी प्रधानमंत्री के सम्पर्क में था .. उसी समय गुप्त खबर आई की पाकिस्तान ने पुर्तगाली सरकार के साथ समझौता किया .. जिसके अनुसार उस समय पुर्तगाली सरकार के अधीन गोवा में हैदराबाद स्टेट के लिए नौसेना बेस बनेगा ..बदले में गोवा पर भारत के हमले की स्थिति में करांची से पाकिस्तान गोवा की मदद करेगा ...
निज़ाम के सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एल एदरूस ने अपनी किताब 'हैदराबाद ऑफ़ द सेवेन लोव्स' में लिखा है कि निज़ाम ने उन्हें ख़ुद हथियार ख़रीदने यूरोप भेजा था. लेकिन वह अपने मिशन में सफल नहीं हो पाए थे क्योंकि हैदराबाद को एक आज़ाद देश के रूप में मान्यता नहीं मिली थी.
मज़े की बात ये थी कि एक दिन अचानक वह लंदन में डॉर्सटर होटल की लॉबी में माउंटबेटन से टकरा गए. माउंटबेटन ने जब उनसे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहे हैं तो उन्होंने झेंपते हुए जवाब दिया था कि वह वहाँ अपनी आंखों का इलाज कराने आए हैं.
माउंटबेटन ने मुस्कराते हुए उन्हें आँख मारी. लेकिन इस बीच लंदन में निज़ाम के एजेंट जनरल मीर नवाज़ जंग ने एक ऑस्ट्रेलियाई हथियार विक्रेता सिडनी कॉटन को हैदराबाद को हथियारों की सप्लाई करने के लिए राज़ी कर लिया.
भारत को जब ये पता चला कि सिडनी कॉटन के जहाज़ निज़ाम के लिए हथियार ला रहे हैं तो उसने इन उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया.
सरदार पटेल के कड़े रुख से परेशान जब निज़ाम को लगा कि भारत हैदराबाद के विलय के लिए दृढ़संकल्प है तो उन्होंने ये पेशकश भी की कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेशी मामलों, रक्षा और संचार की ज़िम्मेदारी भारत को सौंप दी जाए... लेकिन वो रज़ाकारों के प्रमुख क़ासिम राज़वी को इसके लिए राज़ी नहीं करवा सके.
रज़ाकारों की गतिविधियों ने पूरे भारत का जनमत उनके ख़िलाफ़ कर दिया. 22 मई को जब इत्तेहाद-ऊल-मुसलमीन के आतंकी यानी रजाकरो ने ट्रेन में सफ़र कर रहे हिंदुओं पर गंगापुर स्टेशन पर हमला बोला और तीस हिन्दुओ की हत्या की तो पूरे भारत में भारत सरकार की आलोचना होने लगी कि वो उनके प्रति नर्म रुख़ अपना रही है.
भारतीय सेना के पूर्व उपसेनाध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट में लिखते हैं, "मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं. दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाई अड्डे से सीधे पटेल के घर गए. मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पाँच मिनट में बाहर आ गए. बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सीधा सवाल पूछा जिसका उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया."
सरदार ने उनसे पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे?
करियप्पा ने इसका एक शब्द का जवाब दिया 'हाँ' और इसके बाद बैठक ख़त्म हो गई.
इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया. भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे. उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई पर बम गिरा सकती है.
दो बार हैदराबाद में घुसने की तारीख़ तय की गई लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इसे रद्द करना पड़ा. निज़ाम ने गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से व्यक्तिगत अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें.
राजा जी और नेहरू की बैठक हुई और दोनों ने कार्रवाई रोकने का फ़ैसला किया. निज़ाम के पत्र का जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एचएम पटेल और वीपी मेनन की बैठक बुलाई गई.
उस समय हैदराबाद स्टेट में चार संस्थाए सक्रिय थी
१- इत्तेहाद-ऊल- मुसलमीन जो पूरी तरह से भारत सरकार के खिलाफ थी और हैदराबाद स्टेट को अलग देश बनाने के पक्ष में थी ...
२- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया --ये भी रजाकरो यानि इत्तेहाद के साथ थी और हैदराबाद को अलग देश बनाने के पक्ष में थी .
३- हैदराबाद राज्य कांग्रेस -- ये हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थी
4- आर्य समाज और आरएसएस -- ये दोनों पूरी तरह से हिन्दुओ के साथ थे और इत्तेहाद रजाकरो के कहर से हिन्दुओ को बचाने ले लगे थे और ये भी हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थे ..
फिर जब खबर मिली की हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गया और वहाँ से सैनिक मदद लेने का जुगाड़ कर रहा है तो सरदार पटेल में भारतीय सेना को हैदराबाद पर हमला करने का आदेश दिया
नेहरू और राजा जी चिंतित थे कि इससे पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित हो सकता है लेकिन चौबीस घंटे तक पाकिस्तान की तरफ़ से कुछ नहीं हुआ तो उनकी चिंता मुस्कान में बदल गई.
हाँ, जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई ऐक्शन ले सकता है?
बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी (जो बाद में एयर चीफ़ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने) ने कहा ‘नहीं.’
लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा ‘क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं?’
एलवर्दी का जवाब था कि हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ़ दो काम कर रहे हैं.' इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा.'
भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे.
पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई में 1373 रज़ाकार मारे गए. हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी रहे. मारे ..भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए.
रजाकरो का नेता कासिम अली पाकिस्तान भाग गया ...
और इस तरह से हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] भारत के हिस्से बने
फोटो में सरदार पटेल में सामने समर्पण करते हुए हैदराबाद स्टेट के निजाम
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*अगर आप ब्लैक होल में गिर जाएँ तो क्या होगा...?*
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विज्ञान की अद्भुत और रहस्यमई सवाल का जवाब ढूंढता लेख।
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साभार
अमांदा गेफ़्टर के अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद
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अगर आप ब्लैक होल में गिर जाएं तो क्या होगा? शायद आप सोचते हों कि आपकी मौत हो जाएगी. लेकिन ऐसी स्थिति में आपके साथ इससे अलग कई और चीज़ें भी हो सकती हैं.
ब्लैक होल स्पेस में वो जगह है जहाँ भौतिक विज्ञान का कोई नियम काम नहीं करता. इसका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र बहुत शक्तिशाली होता है.
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इसके खिंचाव से कुछ भी नहीं बच सकता. प्रकाश भी यहां प्रवेश करने के बाद बाहर नहीं निकल पाता है. यह अपने ऊपर पड़ने वाले सारे प्रकाश को अवशोषित कर लेता है.
आइंस्टाइन बता चुके हैं कि किसी भी चीज़ का गुरुत्वाकर्षण स्पेस को उसके आसपास लपेट देता है और उसे कर्व जैसा आकार दे देता है.
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जलकर राख हो जाएं, ये ज़रूरी नहीं
हो सकता है कि आप किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश में निकले हों या फिर अंतरिक्ष यान से बाहर निकले हों और तभी ब्लैक होल की चपेट में आए जाएं.
आपका अनुमान होगा कि ब्लैक होल आपको कुचल देगा. हालांकि वास्तविकता इससे काफी अलग हो सकती है.
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अगर आप ब्लैकहोल की चपेट में आ गए हों, तो आपके साथ दो बातें हो सकती हैं. या तो आप तुरंत ही जलकर राख हो जाएंगे या फिर आप बिना किसी नुकसान झेले ब्लैक होल में फंस जाएंगे.
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जब कोई विशाल तारा अपने अंत की ओर पहुंचता है तो वह अपने ही भीतर सिमटने लगता है. धीरे धीरे वह भारी भरकम ब्लैक होल बन जाता है और सब कुछ अपने में समेटने लगता है.
स्टीफ़न हॉकिंग का इवेंट हॉराइज़न
इसके बाहरी हिस्से को इवेंट हॉराइज़न कहते हैं. क्वांटम प्रभाव के चलते इससे गर्म कण टूट-टूट कर ब्रह्माण्ड में फैलने लगते हैं.
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स्टीफ़न हॉकिंग की खोज के मुताबिक हॉकिंग रेडिएशन के चलते एक दिन ब्लैक होल पूरी तरह द्रव्यमान मुक्त हो कर ग़ायब हो जाता है.
जब आप ब्लैक होल के अंदर पहुंचते हैं, केंद्र तक वो असीम घुमावदार होता है. वहां आकर समय और स्पेस दोनों अपना अर्थ खो देते हैं और भौतिक विज्ञान को कोई नियम काम नहीं करता.
यहां पहुंचने के बाद क्या होगा, कोई नहीं जानता. क्या कोई दूसरा यूनिवर्स आ जाएगा या फिर आप सब कुछ भूल कर नई दुनिया में पहुंच जाएगे. यह रहस्य अब तक बना हुआ है.
आपको देखता एक काल्पनिक साथी
मान लीजिए कि आपके इस सफर में एक साथी ज़ेन भी है. वह बाहर से खड़ी होकर ब्लैक होल के अंदर आपको जाते हुए देख रही है. अगर आप इवेंट हॉराइज़न की ओर आते हैं तो ज़ेन आपको ऐसा पाती है जैसे कि मैग्नीफाईंग ग्लास से आपको देख रही हो.
आप उसे स्लो मोशन में नज़र आते हैं. आप उसे आवाज़ देकर कुछ नहीं बता सकते. क्योंकि वहां कोई हवा नहीं है. हो सकता है कि आप अपने आईफोन से एक ऐप के ज़रिए संदेश भेजें (यदि ऐसा ऐप उपलब्ध हो).
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क्योंकि आपके शब्द तो बहुत देरी से पहुंच रहे होंगे जिसका कारण ये है कि ब्लैक होल के अंदर फ्रीक्वेंसी लगातार कम होती जाएगी.
जब आप हॉरिजन तक पहुंचेंगे ज़ेन आपको फ्रीज हुआ पाएगी मानो किसी ने आपका पॉज़ बटन दबा दिया हो. आपमें कोई गति नहीं होगी और आप हॉराइज़न की भीषण गर्मी की चपेट में आप आ चुके होंगे.
हॉकिंग रेडिएशन के चलते ब्लैक होल के अंधकार तक पहुंचने से पहले ही आप राख में तब्दील हो जाएंगे.
जब तक हम आपके अंतिम संस्कार के बारे में सोचें, ज़ेन के बारे में हम भूल जाते हैं और आपके नजरिए से सोचते हैं. यह बहुत ही विचित्र अनुभव हो सकता है.
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सारी उम्र ब्लैक होल में?
ब्लैक होल में गिरने पर आप प्रकृति के रहस्यों को खोजते हुए, बिना किसी झटके के, ब्लैक होल में गिरते चले जाएंगे. यह फ़्री फ़ॉल जैसा होगा, जिसे आइंस्टाइन ने 'हैप्पीएस्ट थॉट' कहा था.
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इवेंट हॉराइज़न नाम की कोई चीज़ अगर होती भी है तो ये आपकी चिंता का विषय अभी नहीं है.
ये ज़रूर है कि अगर ब्लैक होल का आकार छोटा हुआ तो आपको दिक्कत हो सकती है. गुरुत्वाकर्षण का बल तब आपके पांव मं ज्यादा महसूस होगा, सिर के बजाए. लेकिन मान लेते हैं कि ये ब्लैक होल हमारे सूर्य से भी काफी बड़ा है.
एक हकीकत ये भी है कि बड़े ब्लैक होल में आप अपना पूरा जीवन सामान्य तौर पर बिता सकते हैं. वैसे कितना सामान्य हो सकता है, ये सोचने की बात है.
क्योंकि इसमें स्पेस और टाइम का कोई मतलब नहीं होगा. आपकी कोई इच्छा काम नहीं करेगी. आप दूसरी ओर पलट भी नहीं सकते हैं.
जब आप इसके बारे में सोचते हैं तो पाते हैं कि ये समय से जुड़ा अनुभव है. समय केवल आगे बढ़ता है. पीछे की ओर नहीं बढ़ता है. यह हमारी इच्छाओं के खिलाफ भी बढ़ता है और हमें पीछे टर्न लेने से रोकता है.
यानी साफ है कि आप ब्लैक होल में पलट नहीं सकते हैं और ना ही ब्लैक होल को छोड़ कर भाग सकते हैं.
ऐसे वक्त में आपके दिमाग में एक सवाल ज़रूर कौंधेगा कि ज़ेन के साथ क्या हुआ था, वह आपको इवेंट हॉराइज़न की सतह पर क्योंकि जलाने पर उतारू थी.
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दरअसल ज़ेन तार्किक ढंग से सोच रही थी. उसके नजरिए से आप ब्लैक होल के हॉराइज़न पर जल जाएंगे.
ये कोई भ्रम की स्थिति नहीं है. वह आपके अवशेष को जमा करके आपके परिवार के लोगों को भी भेज सकती है.
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लेकिन ब्लैक होल के अंदर जाते ही ज़ेन के भौतिक विज्ञान के नियम आप पर काम नहीं करेंगे.
वहीं दूसरी ओर भौतिक विज्ञान के नियमों के मुताबिक आप हॉराइज़न के अंदर सीधे जा सकते हैं. बिना गर्म कणों से टकराए....नहीं तो आइंस्टाइन के हैप्पीएस्ट थॉट और सापेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा.
तो इस लिहाज से भौतिक विज्ञान के मुताबिक आपके साथ दोनों में से कोई भी स्थिति हो सकती है. आप ब्लैक होल की बाहरी सतह पर जल कर खाक हो सकते हैं या फिर उसके अंदर आसानी से पहुंच सकते हैं.
अंतरिक्ष में दूर की वस्तुओं में जुड़ाव
2012 की गर्मियों में अहमद अल्मेहिरी, डोनाल्ड मारोल्क, जोए पोलचिंस्की और जेम्स सुले (इन्हें साथ में एएमपीएस भी कहा जाता है) ने ब्लैक होल को लेकर अब तक की हमारी राय को बदला.
इन चारों भौतिक वैज्ञानिकों के मुताबिक ये संभव है ब्लैक होल के इवेंट हॉराइज़न के अंदर जाए बिना अंदर की जानकारी मिल सके.
इसके लिए इन चारों ने क्वांटम मैकेनिक्स और आइंस्टाइन के सिद्धांतों का ही सहारा लिया. उनके मुताबिक अंतरिक्ष में एक दूसरे से, दूर की वस्तुओं का आपस में जुड़ाव हो सकता है. वे एक के ही दो हिस्से होते हैं.
हालांकि इस सिद्धांत से भी कोई नतीजा नहीं निकला. यह मूलभूत भौतिक विज्ञान का सबसे विवादास्पद सवाल अब भी बना हुआ है.
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न्यूजर्सी स्थित प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के डेनिएल हारलो और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी कैलिफोर्निया के पैट्रिक हायडन ने ये पता लगाने की कोशिश की स्पेस की दो वस्तुओं यानी आपका और ब्लैक होल के हॉराइज़न के अंदर के हिस्से का जुड़ाव किस तरह का है.
2013 में इन दोनों ने पाया कि अगर सबसे तेज कंप्यूटर से भी ये पता लगाने की कोशिश की गई तो इस जुड़ाव का पता लगाने में काफी वक्त लगेगा, इसको डिकोड करने में इतना वक्त भी लग सकता है, जब तक कि ब्लैक होल खुद ही पूरी तरह नष्ट हो जाएगा.
जाहिर है ऐसे में ब्लैक होल के अंदर गिरने पर आपके साथ क्या होगा, इसको लेकर दोनों जवाब अपनी अपनी जगह बने हुए हैं.



Saturday, 20 May 2017

नक्सलवाद अंतर्राष्ट्रीय साजिश है

 ताकि देश सुपर पॉवर ना बन पाए ...

: आईजी कल्लूरी

 छत्तीसगढ़ के चर्चित आईजी एसआरपी कल्लूरी ने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में विद्यार्थियों और देशभर से आए गणमान्य नागरिकों को संबोधित किया।  आईजी कल्लूरी ने कहा कि यह एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश है कि भारत की आतंरिक सुरक्षा को लेकर खतरा बना रहे ताकि देश कभी सुपर पॉवर ना बन पाए। विदेशी ताकतें आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी देशविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए भटके हुए बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल करती हैं। इनका केवल यही उद्देश्य है कि हमारा देश आर्थिक ताकत ना बन जाए। केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों और एक्शन की तारीफ करते हुए आईजी कल्लूरी ने कहा कि जमीनी स्तर पर बहुत अच्छा काम हो रहा है।
 आईजी एसआरपी कल्लूरी को बोलने से रोकने के लिए नक्सलियों के शहरी नेटवर्क ने पूरी ताकत लगा दी थी। कथित छात्रों ने हाथों में तख्तियां लेकर आईजी से वापस जाने के नारे भी लगवाए।  निमंत्रण पत्र में आईजी कल्लूरी का नाम देखने के बाद इस तरह का माहौल बनाया गया कि संस्थान उनका आमंत्रण रद्द कर दे। लेकिन IIMC ने अपना कार्यक्रम यथावत् रखा।
टीचर: देखता हूँ मेरे इन पांच प्रश्नों का सबसे पहले उत्तर कौन देता है।
1. दिल्ली में किस पार्टी की सरकार है ?
2. जम्मू कश्मीर की मुख़्य मंत्री कौन है ?
3. अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव कितने वर्षों में होता है ?
4. लोक सभा में कितने सदस्य हैं ?
5. व्हेल मछली अंडे देती है या बच्चे देती है ?
इन पांचों प्रश्नो का जब एक बच्चे ने एक साथ उत्तर दिया तो अर्थ का अनर्थ हो गया।
सर जी,
*आप की, महबूबा, चार वर्ष में, 545, बच्चे देती है।*
टीचर अभी भी बेहोश है।
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Friday, 19 May 2017

राष्ट्रपति ट्रम्प कर रहे हैं गीता का अध्यन

 वाइट हाउस में रखवाया है गीता : स्टीव बंनों

स्टीव बंनों अमरीका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मुख्य स्ट्रेटेजिस्ट हैं यानि डोनाल्ड ट्रम्प अलग अलग मुद्दों पर, फैसलों से पहले जिन लोगों से चर्चा करते है, उन लोगों के प्रमुख हैं स्टीव बंनों 
डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद स्टीव बंनों वाइट हाउस के मुख्य स्ट्रेटेजिस्ट बने, इस से पहले स्टीव बंनों डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव प्रचार में भी मुख्य भूमिका निभाते रहे स्टीव बंनों ने बताया है की, वो सालों से ही भारत के धर्मग्रन्थ भागवत गीता के फॉलोवर रहे हैं और भागवत गीता से प्रेरणा लेते रहे है स्टीव बंनों ने बताया की उन्होंने भागवत गीता के बारे में राष्ट्रपति ट्रम्प को भी जानकारी दी जिसके बाद से राष्ट्रपति ट्रम्प पिछले कई महीनो से भागवत गीता का अध्यन कर रहे है स्टीव बंनों ने ये भी बताया की डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने निवास यानि वाइट हाउस में गोल्ड प्लेटेड भागवत गीता रखवाया है 
स्टीव बंनों का कहना है की, भागवत गीता से कर्म और धर्म का ज्ञान मिलता है और उसी को सीख रहे हैं डोनाल्ड ट्रम्प , राष्ट्रपति ट्रम्प चुनाव प्रचार में भी कहा था की, वो भारत से बहुत प्रभावित हैं और हिन्दुओ के फैन हैं
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी लेकिन नाथूराम गोड़से घटना स्थल से फरार नही हुआ बल्कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया | नाथूराम गोड़से समेत 17 अभियुक्तों पर गांधी जी की हत्या का मुकदमा चलाया गया | इस मुकदमे की सुनवाई के दरम्यान न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर जनता को सुनाने की अनुमति माँगी थी जिसे न्यायमूर्ति ने स्वीकार कर लिया था | हालाँकि सरकार ने नाथूराम के इस वक्तव्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन नाथूराम के छोटे भाई और गांधी जी की हत्या के सह-अभियोगी गोपाल गोड़से ने 60 साल की लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में विजय प्राप्त की और नाथूराम का वक्तव्य प्रकाशित किया गया | नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी 150 दलीलें न्यायलय के समक्ष प्रस्तुति की | देसी लुटियंस पेश करते है “नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के मुख्य अंश”
1. नाथूराम का विचार था कि गांधी जी की अहिंसा हिन्दुओं को कायर बना देगी |कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था महात्मा गांधी सभी हिन्दुओं से गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह अहिंसा के मार्ग पर चलकर बलिदान करने की बात करते थे | नाथूराम गोड़से को भय था गांधी जी की ये अहिंसा वाली नीति हिन्दुओं को कमजोर बना देगी और वो अपना अधिकार कभी प्राप्त नहीं कर पायेंगे |

Source
2.1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड के बाद से पुरे देश में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आक्रोश उफ़ान पे था | भारतीय जनता इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाने की मंशा लेकर गांधी जी के पास गयी लेकिन गांधी जी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से साफ़ मना कर दिया।

Source
3. महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया | महात्मा गांधी खुद को मुसलमानों का हितैषी की तरह पेश करते थे वो केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के 1500 हिन्दूओं को मारने और 2000 से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाये जाने की घटना का विरोध तक नहीं कर सके |

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4. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गांधी जी ने अपने प्रिय सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे | गांधी जी ने सुभाष चन्द्र बोस से जोर जबरदस्ती करके इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया |

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5. 23 मार्च 1931 को भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी | पूरा देश इन वीर बालकों की फांसी को टालने के लिए महात्मा गांधी से प्रार्थना कर रहा था लेकिन गांधी जी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए देशवासियों की इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया।

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6. गांधी जी कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह से कहा कि कश्मीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है अत: वहां का शासक कोई मुसलमान होना चाहिए | अतएव राजा हरिसिंह को शासन छोड़ कर काशी जाकर प्रायश्चित करने | जबकि हैदराबाद के निज़ाम के शासन का गांधी जी ने समर्थन किया था जबकि हैदराबाद हिन्दू बहुल क्षेत्र था | गांधी जी की नीतियाँ धर्म के साथ, बदलती रहती थी | उनकी मृत्यु के पश्चात सरदार पटेल ने सशक्त बलों के सहयोग से हैदराबाद को भारत में मिलाने का कार्य किया | गांधी जी के रहते ऐसा करना संभव नहीं होता |

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7. पाकिस्तान में हो रहे भीषण रक्तपात से किसी तरह से अपनी जान बचाकर भारत आने वाले विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली | मुसलमानों ने मस्जिद में रहने वाले हिन्दुओं का विरोध किया जिसके आगे गांधी नतमस्तक हो गये और गांधी ने उन विस्थापित हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

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8. महात्मा गांधी ने दिल्ली स्थित मंदिर में अपनी प्रार्थना सभा के दौरान नमाज पढ़ी जिसका मंदिर के पुजारी से लेकर तमाम हिन्दुओं ने विरोध किया लेकिन गांधी जी ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया | लेकिन महात्मा गांधी एक बार भी किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ नहीं कर सके |

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9. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से विजय प्राप्त हुयी किन्तु गान्धी अपनी जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया | गांधी जी अपनी मांग को मनवाने के लिए अनशन-धरना-रूठना किसी से बात न करने जैसी युक्तियों को अपनाकर अपना काम निकलवाने में माहिर थे | इसके लिए वो नीति-अनीति का लेशमात्र विचार भी नहीं करते थे |

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10. 14 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, लेकिन गांधी जी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि गांधी जी ने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा। न सिर्फ देश का विभाजन हुआ बल्कि लाखों निर्दोष लोगों का कत्लेआम भी हुआ लेकिन गांधी जी ने कुछ नहीं किया |

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11. धर्म-निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के जन्मदाता महात्मा गाँधी ही थे | जब मुसलमानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया तो महात्मा गांधी ने सहर्ष ही इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी की जगह हिन्दुस्तानी (हिंदी + उर्दू की खिचड़ी) को बढ़ावा देने लगे | बादशाह राम और बेगम सीता जैसे शब्दों का चलन शुरू हुआ |

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12. कुछ एक मुसलमान द्वारा वंदेमातरम् गाने का विरोध करने पर महात्मा गांधी झुक गये और इस पावन गीत को भारत का राष्ट्र गान नहीं बनने दिया |

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13. गांधी जी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। वही दूसरी ओर गांधी जी मोहम्मद अली जिन्ना को क़ायदे-आजम कहकर पुकारते थे |

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14. कांग्रेस ने 1931 में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र ध्वज बनाने के लिए एक समिति का गठन किया था इस समिति ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र को भारत का राष्ट्र ध्वज के डिजाइन को मान्यता दी किन्तु गांधी जी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

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15. जब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया तब गांधी जी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

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16. भारत को स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को एक समझौते के तहत 75 करोड़ रूपये देने थे भारत ने 20 करोड़ रूपये दे भी दिए थे लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया | केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण से क्षुब्ध होकर 55 करोड़ की राशि न देने का निर्णय लिया | जिसका महात्मा गांधी ने विरोध किया और आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 55 करोड़ की राशि भारत ने पाकिस्तान दे दी ।
महात्मा गांधी भारत के नहीं अपितु पाकिस्तान के राष्ट्रपिता थे जो हर कदम पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़े रहे, फिर चाहे पाकिस्तान की मांग जायज हो या नाजायज | गांधी जी ने कदाचित इसकी परवाह नहीं की |

उपरोक्त घटनाओं को देशविरोधी मानते हुए नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया | नाथूराम ने न्यायालय में स्वीकार किया कि माहात्मा गांधी बहुत बड़े देशभक्त थे उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश सेवा की | मैं उनका बहुत आदर करता हूँ लेकिन किसी भी देशभक्त को देश के टुकड़े करने के ,एक समप्रदाय के साथ पक्षपात करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ | गांधी जी की हत्या के सिवा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था |
नाथूराम गोड़से जी ……
द्वारा अदालत में दिए बयान के मुख्य अंश…..
मेने गांधी को नहीं मारा
मेने गांधी का वध किया हे
गांधी वध
वो मेरे दुश्मन नहीं थे परन्तु उनके निर्णय राष्ट्र के लिए घातक साबित हो रहे थे
जब व्यक्ति के पास कोई रास्ता न बचे तब वह मज़बूरी में सही कार्य के लिए गलत रास्ता अपनाता हे
मुस्लिम लीग और पाकिस्तान निर्माण की गलत निति के प्रति गांधीजी की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने ही मुझे मजबूर किया
पाकिस्तान को 55 करोड़ का भुकतान करने की गैरवाजिब मांग को लेकर गांधी जी अनशन पर बेठे
बटवारे में पाकिस्तान से आ रहे हिन्दुओ की आपबीती और दूरदशा ने मुझे हिला के रख दिया था
अखंड हिन्दू राष्ट्र गांधी जी के कारण मुस्लिम लीग के आगे घुटने टेक रहा था
बेटो के सामने माँ का खंडित होकर टुकड़ो में बटना
विभाजित होना असहनीय था
अपनी ही धरती पर हम परदेशी बन गए थे
मुस्लिम लीग की सारी गलत मांगो को गांधी जी मानते जा रहे थे
मेने ये निर्णय किया के भारत माँ को अब और विखंडित और दयनीय स्थिति में नहीं होने देना हे तो मुझे गांधी को मारना ही होगा
और मेने इसलिए गांधी को मारा…..
मुझे पता हे इसके लिए मुझे फ़ासी होगी
में इसके लिए भी तैयार हु
और हा यदि मातृभूमि की रक्षा करना अपराध हे तो में यह अपराध बार बार करूँगा
हर बार करूँगा
और जब तक सिन्ध नदी पुनः अखंड हिन्द में न बहने लगे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन नहीं करना
मुझे फ़ासी देते वक्त मेरे एक हाथ में केसरिया ध्वज
और दूसरे हाथ में अखंड भारत का नक्शा हो
में फ़ासी चढ़ते वक्त अखंड भारत की जय जय बोलना चाहूँगा
हे भारत माँ
मुझे दुःख हे में तेरी इतनी ही सेवा कर पाया….
नाथूराम गोडसे
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