Thursday, 21 September 2017

*अन्न के स्थूल भाग से रक्त मज़्ज़ा और शारीरिक कोष बनते हैं, अन्न की ऊर्जा से प्राणमय कोष बनते हैं और अन्न के संस्कार से मनोमय कोष बनता है।* आहार चयन में विशेष सावधानी बरते, कृषि द्वारा प्राप्त अन्न जिसे दुबारा बोने पर पुनः पौधे निकल सकें, ऐसे सात्विक अन्न को बलिवैश्व में भोग लगा के संस्कारित करके खाने से स्वस्थ शरीर के साथ, श्रेष्ठ प्राण ऊर्जा और श्रेष्ठ मन बनता है जो मानव मात्र के लिए उत्तम है।
पशु जिनमें सम्वेदना व्यक्त करने की क्षमता हो, दर्द पर छटपटाहट हो, ऐसे जीव को मारकर खाने पर मॉस में पशु का श्राप होता है। स्थूल शरीर हेतु तो कुछ लाभ मिल भी सकता है मांस भक्षण से लेकिन, मर्मान्तक हत्या द्वार प्राप्त माँस से प्राण ऊर्जा नहीं मिलती और दूषित मन का निर्माण होता है।
अन्न के संस्कार के आधार पर ही- इसे सात्विक, तामसिक और राजसिक भागों में बाँटा गया है।
ऐसा जीव जो स्वतः मरा हो, उसका भक्षण करने पर उतना मन पर बुरा असर नहीं पड़ता, जितना जबरन स्वाद हेतु हत्या कर, तड़फ़ाकर हलाले माँस को खाने पर पड़ता है। कुत्सित कुंठित असंवेदनशील निर्दयी मन का निर्माण करती है, जो मानवमात्र के लिए घातक होता है।
🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाईन इण्डिया यूथ एसोसिएशन
नूर इस्लाम नामक रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी, जिसे आस्ट्रेलियन सरकार निशुल्क भोजन, आवास,मेडिकल सुविधाएं देती है ,सुबह दस बजे ,मेलबोर्न,आस्ट्रेलिया के कामनवेल्थ बैंक में पहुचता है और फ्री आर्थिक सहायता वाली क्यू में लग जाता है,जहां अगले दिन आने को कहा जाता है ! रोहिंग्या शरणार्थी का जिहाद जाग जाता है वह कामनवेल्थ बैंक के पास के ही एक सर्विस स्टेशन पर जाता है और पेट्रोल से भरी केन लेकर वापस बैंक लौटता है,बैंक में दर्जनों ग्राहक मौजूद हैं ! रोहिंग्या, ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े और खूबसूरत इंफ्रास्ट्रक्चर वाले इस बैंक में पेट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है !
बैंक की रु तीन सौ करोड़ मूल्य की संपत्ति जल कर नष्ट हो गई ! 28 आस्ट्रेलियन नागरिक पेट्रोल की आग से जलकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं,कुछ अभी भी अस्पतालों में पड़े हुए हैं ! नूर इस्लाम पकड़ लिया गया ! मगर उसने खुद को 'पागल' दर्शाना शुरू कर दिया ! रोहिंग्या 'शरणार्थी' फिलहाल रिहैबिलिटेशन सेंटर में मौज ले रहा है !
"प्रिय रोहिंग्या, हम आपका भारत मे स्वागत करते हैं?
Jitendra Pratap Singh
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कोलकाता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के सरकारी वकील से पूछा कि यदि वह दुर्गा विसर्जन के लिए मुहर्रम का जुलूस क्यों नहीं रोक रहे ?? मुहर्रम के लिए यदि आप दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन रोक सकते हैं तो फिर दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए आप मोहर्रम का जुलूस भी रोक सकते हैं लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि आपकी नियत में खोट है आप वोट बैंक की गंदी पॉलिटिक्स कर रहे हैं और न्यायालय इस गंदी पॉलिटिक्स पर चुप नहीं बैठेगी

Jitendra Pratap Singh
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एक रसूल,एक अल्लाह,एक कुरान बोलकर जो मौलवी रोहंगिया मुस्लिमो को अपना भाई बता रहे हैं, कल को वो इसी आधार पर पाकिस्तानियों को भी अपना भाई बता सकते हैं ।
युद्ध की परिस्तिथि में हो सकता हैं कि एक युद्ध सेना पाकिस्तानियो से सीमा पर लड़े और दूसरा युद्ध इनके भारत मे रहने वाले भाईयों से।
Rajesh Jindal
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दो खबरों पर गौर करें -
पहली खबर - जैसे ही एक लाख रोहीन्गया बंग्लादेश मे धुसने मे सफल हुए वैसे ही 20 रूपये किलो, आलु 50 रूपये और 30 रूपये लिटर दुध, 60 रूपये हो गया ! 
सोचीये जब मात्र एक लाख रोहीन्गया को शरणार्थी स्वीकार करने से एक देश की आर्थिक स्थिति इतनी बदल जाती है तब हमारे देश में 3 करोड़ बंग्लादेशी घुसपैठियों का हमारी अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा प्रभाव पड रहा होगा ? 
दूसरी खबर - बंग्लादेशी शरणार्थी गौ तस्करों ने हमारे देश के फौजी की निर्मता पुर्वक हत्या कर दी ताकि वह गौ तस्करी निर्भयता पुर्वक कर सकें !
सोचीए क्या शरणार्थी कभी देशभक्त हो सकते हैं ?
आप को आश्चर्य क्यों है जब बंगाल में "बंगाल मांगे आजादी " के नारे लगने लग जाते है ? जब वहां के डेढ करोड़ निवासी आपके बंगाल के बंगाली नही बंग्लादेशी है !
मनन करें क्या बंग्लादेश कभी अपने इन नागरिकों को वापस लेगा ?
अगर आप बंग्लादेशी धुसपैठीयो को आजतक नहीं निकल सके तो आप कल क्या रोहीन्गयाऔ को निकाल सकेगें ?
अगर आप सोचते है बंगाल या कश्मीर मे आजादी के नारों के बिच बंग्लादेशी घुसपैठिये या रोहीन्गया, हिन्दुस्तानी तिरंगे तले लडेंगे तब आपको निश्चित ही जल्द से जल्द नजदीकी मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहीए क्योंकि आपको वहीं वामपंथी किडा काट गया है जो सोवियत संघ को काट गया था और वह तब मरा जब सोवीयत संघ कई हिस्सों मे बंट चुका था !
Farida Khanam

*पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है*
*पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजार्बर है, बरगद 80% और नीम 75 %*
*अब सरकार ने इन पेड़ों से दूरी बना ली तथा इसके बदले विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है*
*इस पेड़ को लगाना इंदिरा गांधी ने चालू किया. आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है*
*अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही*
*हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा*
*वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए*
पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं।
*जब सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे तब मंत्रियों और सांसदों के आवास के अंदर से सभी नीम और पीपल के पेड़ कटवा दिए थे*
*मीडिया में बड़ा मुद्दा नहीं बना, क्यूँकि मीडिया को इससे कोई लाभ नही था*
वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,
सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,
वृक्षराज नमस्तुते।
*अब करने योग्य कार्य*
*इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाय*
*आइये हम सब मिलकर अपने "हिंदुस्तान" को प्राकृतिक आपदाओं से बचाए
बांग्लादेश ने भी माना, 'साझा दुश्मन' हैं रोहिंग्या जिहादी ...
लश्कर-ए-तैयबा समर्थित अराकन रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (ARSA) जैसे जिहादी संगठनों को बांग्लादेश ने भी खतरा मान लिया है। बांग्लादेश ने कहा है कि इस तरह के रोहिंग्या जिहादी संगठन उसके व भारत और म्यांमार के लिए साझा दुश्मन हैं।
 पीएम शेख हसीना के राजनीतिक सलाहकार तौफीक इमाम ने कहा है कि खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान की आईएसआई रोहिंग्या मुद्दे का इस्तेमाल म्यांमार के साथ लगी सीमा पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए लिए कर रही है। ARSA का कनेक्शन बांग्लादेश में सक्रिय प्रमुख इस्लामिक आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से भी है ।  आईएसआई 1969 से ही रोहिंग्या अलगाववाद का समर्थन कर रही है। तब मैं अविभाजित पाकिस्तान में सिविल सर्वेंट था और चिटगान्ग में अपनी सेवा दे रहा था।'  आईएसआई एक बार फिर इसी रणनीति को अपनाकर साउथ और साउथ ईस्ट एशिया के रणनीतिक तौर पर अहम हिस्से में जिहाद की जमीन तैयार कर रही है। 
इमाम ने कहा कि इसी बहाने हसीना सरकार को अस्थिर करने की भी साजिश की जा रही है। आईएसआई दुर्गा पूजा के दौरान सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए रोहिंग्या का इस्तेमाल कर सकती है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश ने म्यांमार को रोहिंग्या जिहादियों के खिलाफ साझा मिलिटरी अभियान की भी पेशकश कर रखी है।
 उन्होंने आगे कहा कि सबसे अहम बात यह है कि यह एक मानवीय समस्या है। यही वजह है कि बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं।
.आइंस्टीन का सापेक्षिता का सिद्धांत और वेद...!
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वेदो के भाष्य पुराणों में एक कथा है..... कुछ इस प्रकार कि राजा रैवतक की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे। थक हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए।
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राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।
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गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा कहो, कैसे आना हुआ?
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राजा ने कहा हे ब्रह्मदेव..... मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं??????
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ब्रह्मा जी जोर से हँसे और बोले जब तुम आये तब तक तो नहीं...... पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर 27 चतुर्युग बीत चुके हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है....अब तुम वहाँ जाओ...... और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो... अच्छा हुआ कि तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।
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अब विज्ञान की ओर आइए.... प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन की एक थ्योरी पढ़ाई जाती है... थ्योरी आफ रिलेटिविटी ....
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आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है कि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये.... तो वापस आने पर उसकी आयु मात्र 66 वर्ष की होगी जबकि धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे।....
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अब आप स्वयं सोचिए.... जो बात वैज्ञानिकों को जानने में इतना समय लगा... वो बात काफी पहले ही सनातन वैदिक ग्रंथों में सन्निहित थी....यानि कि तब के विद्वान इसके बारे में काफी कुछ जानते थे,,,,
और इस महान सनातन धर्म के होते हुए धरती को चपटी बताने वाले मजहब के लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ बतायें तो इससे बड़ा मजाक कुछ नहीं हो सकता...!

नेहरू ने आजादी मिलने के बाद अपने नाम के आगे जानबूझकर पं. लगाना शुरू कर दिया और खुद को कश्मीरी बताने लगे

जो सर्वविदित तथ्य हैं उनके अलावा जो कुछ ध्यान देने वाली बातें हैं-
नेहरू ने आजादी मिलने के बाद अपने नाम के आगे जानबूझकर पं. लगाना शुरू कर दिया और खुद को कश्मीरी बताने लगे ताकि कश्मीर के प्रति उनके रूख को लोग पक्षपाती न कह सकें।
 आजाद भारत का सेनाध्यक्ष ये किसी अंग्रेज जनरल को बनाना चाहते थे परन्तु तत्कालीन भारतीय सेना के तीन सबसे अनुभवी भारतीय अधिकारियों के विरोध के कारण फील्ड मार्शल करियप्पा को प्रथम सेनाध्यक्ष बनाया गया लेकिन फिर भी अपने मंसूबों को सफल करने के लिए कश्मीर युद्ध में जानबूझकर अंग्रेज जनरल रोचर को भारतीय सैना का सर्वेसर्वा बनाकर भारतीय सैनाध्यक्ष को प्रभावहीन कर दिया। 
फिर भी जब भारतीय सेना कश्मीर में सफल होने लगी और जनरल करियप्पा बार बार नेहरू से अनुरोध करते रहे कि हमे बस 13 दिन का वक्त और दे दीजिए 3 दिन में हम मुजफ्फराबाद जीत लेंगे और 13 दिनों में पूरा कश्मीर उसी वक्त नेहरू का संयुक्त राष्ट्र भागना और सीज फायर की घोषणा आखिर क्या साबित करती है?
 हैदराबाद प्रकरण से आप सब वाकिफ हैं ही। 
              अब बात करते हैं चीन युद्ध की हम सबको बताया जाता है कि चीन ने हमें धोका दिया, नेहरू को चीन के रूख का अंदेशा नहीं था। क्या सच में? हमें सिर्फ चीन ने धोखा दिया? सन् 1951 भारतीय सेना ने कुछ घुसपैठिये चीनी सैनिकों को गिरफ्तार किया, उनके पास से ऐसे नक्शे मिले जिनमें भारतीय क्षेत्रों जैसे अक्साई चिन, लद्दाख, अरूणांचल आदि को चीन का हिस्सा दिखाया गया था। भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने तुरंत नेहरू को सूचित किया और चीन को भारत के लिए खतरा बताते हुए तैयार रहने और तिब्बत पर चीन के कब्जे का विरोध करने को कहा लेकिन नेहरू ने उन्हें लताड़ दिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सेना को बेज्जत करते हुए कहा कि सेना हमें ना सिखाए कि कौन देश का शत्रु है और कौन मित्र। 1953 में जनरल करियप्पा रिटायर हो गए उन्हें वो सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे। अब बात करते हैं दूसरे फील्ड मार्शल श्री सैम बहादुर मानेकशॉ जी की। लेकिन पहले कुछ और बातों पर ध्यान देते हैं भारत के रक्षामंत्री और नेहरू के लाडले कृष्णा मेनन की। जनाब ने ना जाने किसके निर्देश पर सन् 1957-58 में अचानक अॉर्डिनेन्स फैक्ट्रीज में रक्षा उत्पादन बंद करवा कर कप प्लेट और कॉस्मेटिक बनवाना शुरू कर दिया। सन् 1961 में ईस्टर्न कमांड के कमांडिंग अॉफीसर जनरल मानेकशॉ पर यह कहकर इन्क्वायरी बैठा दी की आपकी कार्यशैली पर अंग्रेजों का प्रभाव है जबकी स्वयं मि.मेमन अधिकांश समय लंदन में ही रहते थे। यानी एक अनुभवी और कुशल जनरल को हटाकर एक सप्लाई कोर के ब्रिगेडियर को कमांडिंग अॉफीसर बनाया गया जिसे कांबैट प्लानिंग और टैक्टिक्स का कोई अनुभव नहीं था या यूं कहें कि ये ब्रिगेडियर सहगल मेनन और नेहरू के यस मैन थे। चीनी मोर्चों की कहानी हम सब जानते हैं लेकिन एक बात कुछ अजीब सी नहीं लगती कि जिन भी मोर्चों पर भारतीय सेना मजबूत थी उन पर चीन की विजय से पहले 2-3दिनों से एम्यूनेशन और रसद की सप्लाई रूकी होती थी? हमसे कहा गया कि भारतीय सेना तैयार नहीं थी, अच्छा!! और इतनी बुरी तरह हारने के बाद जब सेना के संसाधनो और देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से डूब जाती है ठीक 3 साल के बाद ही चीन से भी अधिक इन्टैन्सिटी से किये गये हमले को भारतीय सेनाऐं कुचल के रख देतीं हैं! बदलाव क्या हुआ था इन 3 सालों में? नेतृत्व! ताशकंद में शास्त्री जी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाये जाते हैं आखिर उनका जीवित रहना किसके लिए और क्यों घातक था? क्योंकि वो कश्मीर को भारत को वापस करने की शर्त पर ही संघर्ष विराम के लिए राजी थे? अगर उनको पाकिस्तान या रशिया ने मरवाया तो भारत की नयी प्रधानमंत्री ने समझौते को संदिग्ध मान कर पुनः वार्ता की मेज पर आने का दबाव क्यों नहीं डाला? बात करते हैं 1971 की आप कहेंगे इंदिरा की शौर्य गाथा, अरे जरा ठहरिए जनाब। मैं कहूंगा की वर्तमान कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में देने और बांग्लादेश को कश्मीर की तरह नासूर बनाने के षड्यंत्र की कोशिश जिसे जनरल मानेकशॉ की अद्भुत रणनीति,जनरल जैकब की गजब की चतुरता और जनरल अरोड़ा के जुझारूपन ने धूल में मिला दिया और इस तरह बांग्लादेश का उदय हुआ और इंदिरा ना चाहते हुए भी इसके लिए जिम्मेदार बन गयीं। जी हां भारतीय सेना को दो बिल्कुल विपरीत मोर्चों पर आकस्मिक लडाई के आदेश दिये गये थे हमसे कहा जाता है कि जनरल मानेकशॉ ने पहली बार एकदम से मना कर दिया था जोकि पूरा सच नहीं है जनरल मानेकशॉ ने बड़ी चालाकी से युद्ध का आदेश अपने पास रख लिया और समय के निर्धारण के लिए स्वयं को अधिकृत कर लिया और युद्ध के आदेश के आधार पर तैयारी के लिए आकस्मिक बजट आवंटित करवा लिया जिसे तीनो सेनाओं को देकर युद्ध के लिए आवश्यक तैयारियां की गयीं ये बजट देना इंदिरा की मजबूरी थी क्योंकि हमले का लिखित आदेश जनरल मानेकशॉ के पास था और तैयारी का समय देने की मजबूरी इसलिए थी क्योंकि युद्ध की रणनीति और हमले के समय का निर्धारण सेनाध्यक्ष का विशेषाधिकार होता है। आपको मालूम है कि उस युद्ध में भी इंदिरा ने संयुक्त राष्ट्र के सुझाव के आधार पर सेना को युद्ध विराम करने का आदेश दिया था? जिसका अर्थ था बांग्लादेश का भी कश्मीर की तरह सरदर्द बनकर रह जाना लेकिन जिस समय ये आदेश जनरल जैकब के पास बांग्लादेश पहुंचा वो जनरल नियाजी से सरेंडर करदेने की बात करने निकल रहे थे उन्होंने आदेश उनके निकल जाने के बाद पहुंचना दर्ज करने को कहा। मीटिंग में नियाजी ने सीजफायर की मंशा जताई लेकिन वो सरेंडर करने को राजी नहीं था लेकिन जनरल जैकब ने उसे भारत सरकार का आदेश ना बताते हुए 30 मिनट में सरेंडर अथवा बांग्ला मुक्तीवाहिनी सर्पोटेड बाइ इण्डियन आर्मी द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों के उनके परिवार सहित मारे जाने की धमकी दी गई। जनरल जैकब ने बहुत बड़ा रिस्क लिया था क्योंकि उन्होंने मिनट्स अॉफ मीटिंग में यह दर्ज करवा दिया की नियाजी ने इन्सट्रूमेंट अॉफ सरेंडर पर दस्तखत कर दिये जबकी नियाजी की सहमती उसके 40 मिनट बाद पहुंची थी। जिन्हें इंदिरा की भूमिका पर अब भी संदेह हो वो ये बतायें कि इतनी बड़ी जीत, दुश्मन देश के 90000 pow, दुश्मन देश की नेवी को 90%और एयर फोर्स को 60% तबाह कर देने के बाद भी, सोवियत संघ के आपके पक्ष में खड़े होने के बाद भी आप कश्मीर तो क्या 1 रुपए भी पाकिस्तान से नहीं लेतीं बल्कि हारे हुए पाकिस्तान को विजेता बनकर निकल जाने देतीं हैं क्यों?आपको पता है जनरल मानेकशॉ से बीबीसी रिपोर्टर ने एक बार ये पूछा कि अगर आप बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए होते तो क्या होता तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में ये कह दिया कि तो 71 में पाकिस्तान जीत जाता। सिर्फ इस बात के लिए सहिष्णु और सैनिकों का सम्मान करने वाली कांग्रेस ने उनकी पेंशन में कटौती कर दी, उनकी सरकारी कार, सरकारी घर और स्पोर्टिंग स्टाफ छीन लिए गए जो उन्हें असहिष्णु एवं राष्ट्रविरोधी बीजेपी के सत्ता में आने और एपीजे के राष्ट्रपति बनने के बाद ही वापस मिलीं। सोचिये सन् 2008 में इतने कद्दावर सैनिक और फील्ड मार्शल की अंत्येष्टि में ना राष्ट्रपति जाता है न प्रधानमंत्री ना रक्षामंत्री ना ही कोई सेना प्रमुख। शर्म आती है इन पर ये कहते हैं कि इन्होंने देश को आजादी दिलाई सच मे?