Monday, 18 June 2018


वेमुला की मां ने कहा कि केरल मुस्लिम लीग ने उन्हें देश भर में मोदी सरकार के खिलाफ बोलने के लिए 20 लाख रुपए देने का वायदा किया था लेकिन बाद में मात्र 2 लाख का चेक दिया और वह चेक भी बाउंस हो गया @KapilMishra_IND @ippatel @Shehzad_Ind @sardanarohit @kanhaiyakumar @Shehla_Rashid https://t.co/2YavObqTaGJitendra Pratap Singh


 
#सेकुलर_खुजली

स्कूल का मालिक हिन्दू... पढ़ने वाले 95-99% बच्चे हिन्दू...

लेकिन वामपंथियों द्वारा पिछले साठ साल में फैलाई "दिमागी गन्दगी" ऐसी भलभला कर बहती है, कि उन हिन्दू बच्चों और उनके माता-पिता को मजबूर कर दिया कि वे भी अपने बच्चों को "जिहादी जोकर" बनाएँ, काल्पनिक सेंटा क्लाज़ के लाल कपड़े धारण करें... 

यही काँग्रेस-वामपंथ-खबरंडी की मिलीजुली सफलता है, कि इस मूर्खता पर आपको गर्व करना सिखाया जाता है, लेकिन उतने ही "शातिर-धूर्त-हरामी पद्धति" से यह छिपा लिया जाता है, कि "सेंट" नामधारी स्कूलों में हिन्दू लड़कियाँ मेहंदी लगाकर नहीं जा सकतीं, हिन्दू बच्चे तिलक लगाकर नहीं जा सकते... मदरसे में इस्कॉन से आया हुआ मध्यान्ह भोजन स्वीकार नहीं किया जाता, नवरात्रि या रामजन्मोत्सव मनाना तो बहुत दूर की बात है...

यह "एकतरफा सेकुलर खुजाल" केवल हिंदुओं में ही पाई जाती है, इस्लाम और ईसाईयत इस मामले में एकदम क्लियर हैं कि वे "सेकुलर" नहीं हैं... 
Suresh Chiplunkar
3 घंटे 

Sunday, 17 June 2018


तमिलनाडु के तूतीकोरिन में चर्च ने फैलाया था दंगा! अलग तमिल देश बनाने की साजिशों का खुलासा!


चेन्नई स्थित वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर (VSRC) की जो आंतरिक रिपोर्ट सामने आई है इससे यह जाहिर हो गया है कि तमिलनाडु के तूतीकोरिन में जो दंगा हुआ था वह स्वतः स्फुर्त नहीं, बल्कि प्रायोजित था। वीएसआरसी की आंतरिक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया गया है कि तूतीकरोरिन में चर्च ने दंगा फैलाया था। इस रिपोर्ट में यह साबित हो गया है कि दंगाइयों और चर्च के बीच में साठगांठ था। तूतीकोरिन में दंगा फैलाने में फादर गास्पर और मोहन लेजारस की अहम भूमिका भी सामने आई है।इस मामले में पेशेवरो के एक समूह द्वारा किए गए अध्ययन के जो परिणाम सामने आए हैं वह तो और भी चौंकाने वाले हैं। आंतरिक सुरक्षा, सुरक्षा बलों, न्यायपालिका तथा राजनीतिक विश्लेषकों से मिली जानकारी के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष से अगर कोई संकेत मिलता है तो यही कि तमिलनाडु चर्च, मुसलमान, वामपंथी, माओवादी तथा पेरियारों का एक प्रयोगशाला बन चुका है। ये सभी तमिलनाड को भारत से अलग कर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम(Ltte) की तरह ही ‘तमिल इलम’ के नाम से अलग क्रिश्चियन देश बनाना चाहते हैं।तूतीकोरिन में हुए दंगे के बाद तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई स्थित वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर (वीएसआरसी) जैसे विचार मंच ने पूरे प्रदेश में एक अध्ययन किया। अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने आंतरिक सुरक्षा, सुरक्षा बल, राजनीतिक विश्लेषण तथा न्यायापालिका जैसे हर क्षेत्र के लोगों से बातचीत की। उनके अध्ययन से जो निष्कर्ष निकल कर सामने आया है उससे तो यही संकेत मिले हैं कि यह राज्य एक प्रकार से उबल रहा है, जिसे खाद-पानी देने के काम में देश विरोधी और हिंदू विरोधी ताकतें जुटी हुई है। इनमें चर्च से लेकर मुसलमान, वामपंथी, माओवादी तथा पेरियार सब शामिल हैं।


इनलोगों ने तो तमिलनाडु को देश से तोड़कर अलग करने के लिए अपना एक ध्रुव भी बना लिया है। वीएसआरसी के अध्ययन के दौरान इसको अंजाम देने में जो लोग लगे हुए हैं उनमें से दो लोगो का नाम महत्वपूर्ण रूप से सामने आया है। एक का नाम गैस्पर है और दूसरे का मोहन लेजारस। ये दोनों पूर्व पादरी रहे हैं।अपने अध्ययन के आधार पर वीएसआरसी ने एक आंतरिक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में यह साबित हो गया है कि मई-2018 में तूतीकोरिन में जो दंगा हुआ था उसे चर्च ने ही दंगाइयों के साथ मिलकर अंजाम दिया था। दंगे में जिन 15 लोगों की जान चली गई थी इसके लिए यही राष्ट्र विरोधी ध्रुव जिम्मेदार है। इस दंगा को बढ़ाने में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के हाथ होने की बात को लेकर वीएसआरसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी भूमिका की अभी जांच की जानी है।


वीएसआरसी की त्रुटिरहित जांच में यह बात स्पष्ट हो गई है तूतीकोरिन में हुए दंगे में चर्च ने खुले रूप से दंगाइयों का साथ दिया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि तूतीकोरियन स्थित के स्टरलाइट कॉपर यूनिट के खिलाफ किए गए विरोध प्रदर्शन चर्च प्रायोजित था तथा इसके पीछे चर्च के विभिन्न गुट लगे हुए थे।रिपोर्ट ने तूतीकोरिन इलाके में फैले प्रदूषण के लिए सिर्फ स्टरलाइट कॉपर को जिम्मेदार ठहराने के आरोप पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया है। तूतीकोरिन में सैकड़ों रासायनिक फैक्ट्रियां हैं। अब सवाल उठता है कि जब वहां सैंकड़ों रासायनिक उद्योग हैं तो फिर स्टरलाइट कॉपर को ही क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है? आरोप तो यहां तक है कि यहां दंगा करने के लिए एक निजी सेना का गठन किया था जिसे चर्च ने फंड किया था।
रानीलक्ष्मीबाई के चहेते बेटे और रियासत के मालिक दामोदर राव की जिंदगी को लेकर बहुत कम पढ़ने को मिलता है। वह भले ही रानी के दत्तक पुत्र थे, लेकिन रानी के नहीं रहने पर अंग्रेजों ने उनका ये हाल कर दिया था कि उन्हें भीख मांगकर जिंदगी गुजारनी पड़ी थी। जबकि वह 25 लाख की रियासत के मालिक थे।
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विश्व इतिहास की ताकतवर महिलाओं में शुमार रानी लक्ष्मी बाई के बेटे का जिक्र इतिहास में भी बहुत कम हुआ है। यही वजह है कि यह असलियत लोगों के सामने नहीं आ पाई। कहा तो यहां तक जाता है कि रानी के शहीद होने के बाद उन्हें जंगलों में भी भटकना पड़ा था और उन्होंने बेहद गरीबी में अपना जीवन बिताया। अंग्रेजों की उनपर हर पल नजर रहती थीं।
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इतिहास में जब भी पहले स्वतंत्रता संग्राम की बात होगी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जिक्र सबसे पहले होगा। उनकी वीरता की आज भी मिसाल दी जाती है। इतिहासकारों ने रानी को खूब लिखा। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी रानी पर खूब कलम चलाई, लेकिन यह कलम दामोदर राव के बारे में बताने के पहले ही रुक गई। दामोदर के बारे में कहा जाता है कि इंदौर के ब्राह्मण परिवार ने उनका लालन-पालन किया था।
रानी का परिवार आज भी जी रहा है गुमनामी की जीवन
कहा जाता है कि 18 जून 1858 में ग्वालियर में रानी की शहादत आजादी की लड़ाई के लिए एक नई सुबह थी। जिस बालक को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों के पर सैलाब बनकर रानी टूट पड़ी थीं। वह राजकुमार गुमनाम हो गया। उसे भीख मांगकर पेट भरने को मजबूर होना पड़ा। रानी लक्ष्मीबाई का परिवार आज भी गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। दामोदर राव का असली नाम आनंद राव था। इसे भी बहुत कम लोग जानते हैं। उनका जन्म झांसी के राजा गंगाधर राव के खानदान में ही हुआ था।
पेंशन के सहारे जिंदा रहा राजा
इसे दुर्भाग्य कहेंगे कि जिस रानी पर देश गर्व करता है, वह अपने ही देश में पेंशन के सहारे जिंदगी को बिताया। कहा जाता है कि दामोदर राव जब भी अपनी मां झांसी की रानी के साथ महालक्ष्मी मंदिर जाते थे, तो 500 पठान अंगरक्षक उनके साथ होते थे। घोड़ों पर सिपाही तलवार-भाले लेकर चलते थे।
कभी शाही ठाठ में रहने वाले इस राजकुमार दामोदर को मेजर प्लीक द्वारा इंदौर भेज दिया गया। पांच मई 1860 को इंदौर के रेजिडेंट रिचमंड शेक्सपियर ने दामोदर राव का लालन-पालन मीर मुंशी पंडित धर्मनारायण कश्मीरी को सौंप दिया। दामोदर राव को सिर्फ 150 रुपए महीने पेंशन राशि दी जाती थी। इससे से ही उनका गुजारा होता था।
28 मई 1906 को इंदौर में हुआ था दामोदर का निधन
लोगों का यह भी कहना है कि दामोदर राव कभी 25 लाख रुपए की सालाना रियासत के मालिक थे, जबकि दामोदर के असली पिता वासुदेव राव नेवालकर के पास खुद चार से पांच लाख रुपए सालाना की जागीर थी। बेहद संघर्षों में जिंदगी जीने वाली दामोदर राव 1848 में पैदा हुए थे। उनका निधन 28 मई 1906 को इंदौर में बताया जाता है।
इंदौर में हुआ था दामोदर राव का विवाह
रानी लक्ष्मीबाई के बेटे के निधन के बाद 19 नवंबर 1853 को पांच वर्षीय दामोदर राव को गोद लिया गया था। दामोदर के पिता वासुदेव थे। वह बाद में जब इंदौर रहने लगे तो वहां पर ही उनका विवाह हो गया दामोदर राव के बेटे का नाम लक्ष्मण राव था। लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए। कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए।
लक्ष्मण राव को बाहर जाने की नहीं थी इजाजत
23 अक्टूबर वर्ष-1879 में जन्मे दामोदर राव के पुत्र लक्ष्मण राव का चार मई 1959 को निधन हो गया। लक्ष्मण राव को इंदौर के बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। इंदौर रेजिडेंसी से 200 रुपए मासिक पेंशन आती थी, लेकिन पिता दामोदर के निधन के बाद यह पेंशन 100 रुपए हो गई। वर्ष-1923 में 50 रुपए हो गई। 1951 में यूपी सरकार ने रानी के नाती यानी दामोदर राव के पुत्र को 50 रुपए मासिक सहायता आवेदन करने पर दी थी, जो बाद में 75 रुपए कर दी गई।
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकार ओम शंकर असर के अनुसार, रानी लक्ष्मीबाई दामोदर राव को पीठ से बांध कर चार अप्रैल 1858 को झांसी से कूच कर गई थीं। 18 जून 1858 को तक यह बालक सोता-जागता रहा। युद्ध के अंतिम दिनों में तेज होती लड़ाई के बीच महारानी ने अपने विश्वास पात्र सरदार रामचंद्र राव देशमुख को दामोदर राव की जिम्मेदारी सौंप दी। दो वर्षों तक वह दामोदर को अपने साथ लिए रहे। वह दामोदर राव को लेकर ललितपुर जिले के जंगलों में भटके।
दामोदर राव के दल के सदस्य भेष बदलकर आटा, दाल, नमक घी लाते थे। दामोदर के दल में कुछ उंट और घोड़े थे। इनमें से कुछ घोड़े देने की शर्त पर उन्हें शरण मिलती थी। शिवपुरी के पास जिला पाटन में एक नदी के पास छिपे दामोदर राव को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर उन्हें मई, 1860 में अंग्रेजों ने इंदौर भेज दिया गया था।
सौजन्य से फोटो कलेक्सन
http://www.liveindia.com/free…/jhansi_ki_rani_laxmi_bai.html
http://ramrahmandelhi.blogspot.in/…/rani-lakshmibai-postcar…

Friday, 15 June 2018

कुछ दिन पहले जब "कमाण्डो औरंगजेब(photo)" ने आतंकी समीर टाइगर को नेस्तनाबूत कर दिया .. तब भारत की आतंक समर्थक टीवी मीडिया ने कमाण्डो औरंगज़ेब का चेहरा अपने चैनलों पर दिखाया था ..! (मतलब कमाण्डो औरंगजेब का चेहरा दिखाकर मीडिया आतंकियों को यह बताना चाहती थी कि ये रहा तुम्हारा कातिल, इसको पहचानो और बदला लो)
कई पूर्व सैनिकों ने इस पर अपना विरोध जताते हुए कहा था कि इस प्रकार इस बच्चे को मीडिया में दिखाना इसकी जान के लिए खतरा हो सकता है।
वही हुआ , आतंकियो ने औरंगजेब की पहचान कर ली। वो जानते थे,ये ईद पर घर ज़रूर जायेगा। टारगेट सेट किया,रास्ते से उसे अगवा किया। उसे बेरहमी से पीटा और बेतरतीबी से क़त्ल कर दिया।
औरंगज़ेब का दोषी "भारतीय मीडिया" है।
केंद्र सरकार को जरा भी शर्म हो तो वो मीडिया पर क्रशिंग कारवाई करें …




भीमा-कोरेगांव हिंसा केस: नागपुर यूनिवर्सिटी ने गिरफ्तार प्रफेसर शोमा सेन को निलंबित किया !
भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार की गईं नागपुर यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रफेसर को निलंबित कर दिया गया है। पुणे पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। उनके ऊपर गैरकानूनी गतिविधियों में भाग लेने, आपराधिक साजिश करने, शत्रुता बढ़ाने और दंगे करवाने के आरोप लगाए गए हैं।पिछले दिनों पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव जातीय हिंसा के मामले में कई गिरफ्तारियां की थीं। शोमा सेन के अलावा सुरेंद्र गाडलिंग, महेश राउत, सुधीर धावले और रोना विल्सन को अलग-अलग शहरों से गिरफ्तार किया गया। बताया जाता है कि उनके माओवादियों से संबंध होने के शक में पहले से उन पर नजर रखी जा रही थी। नागपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है।

patr vishesh



तनिक इधर भी गौर फरमाये
सिर्फ एक विजय माल्या ही नहीं थे जिसको कांग्रेस सरकार ने 8040 करोड़ का लोन दिया और वो फुर्र हो गए । कांग्रेस ने अपने मित्र उद्योगपतियों को किस दरियादिली से लोन बांटे एक बानगी देखिए -
 भूषण स्टील 90,000. करोड़,वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज 58,000. करोड़,जेपी ग्रुप 55,000. ,एस्सार लिमिटेड 50,000.,जिंदल ग्रुप 38,000.
.आलोक इंडस्ट्रीज 25,000,लैंको 19,000. ,एबीजी शिपयार्ड 15,000. ,पुंज लॉयड 14,000., इलेक्ट्रोस्टील 14,000  , अबान होल्डिंग 13,000.
. मोंनेट इस्पात 12,000. ,.प्रयागराज पावर 12,000. एरा ग्रुप। 7,000. करोड़
 कांग्रेस के युवराज चीख चीख कर देश को गुमराह कर रहे हैं कि देश की सारी पूंजी सिर्फ कुछ उद्योगपतियों के हाथ मे है और उन्हें बचाया जा रहा है और किसानों का कर्ज माफ नही किया जा रहा । कितनी बेशर्मी से कांग्रेस अपनी करनी का हिसाब मोदी सरकार से मांग रही है ।देखिए इन शैतानो ने देश की अर्थव्यवस्था के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ किया ।
पर फिर भी सरकार चुप नहीं बैठी है  हाल ही में बनाये गए नए बैंकरप्सी इंसाल्वेंसी कानून के मदत से कुल 30 ऐसे डिफॉल्टरों,जो 95% एनपीए के जिम्मेदार हैं, से फ़ेज्ड मैनर में वसूली करने जा रही है । प्रथम चरण में 12 ऐसे लोगों के खिलाफ जो 25 % कुल एनपीए के जिम्मेदार हैं से वसूली के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है । अगले चरण में बाकियों पर शिकंजा कसने जा रहा है । बचेगा कोई नहीं चाहे कितनी कोशिश कर ले ।  --  अरून शुक्ला
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बाबर ने ..राम मंदिर क्यो तोड़ा. ? 
क्या बाबर का श्री राम जी के साथ कोई झगड़ा हुआ था ? मोहम्मद गजनवी ने भगवान शंकर का सोमनाथ मंदिर क्यो तोड़ा ? क्या गजनवी का भगवान शंकर के साथ कोई झगड़ा हुआ था ? औरंगजेब ने काशीविश्वनाथ और कृष्णा जन्मभूमि क्यो तोड़ी ?
मोहम्मद अली जिन्ना और उसके सहयोगी मुल्लो ने भारत माता क्यो तोड़ी ? मुम्बई की ट्रेन में सफर करने वाले यात्री क्या किसी के दूश्मन थे?
हनुमानजी के दर्शन करने वाले भक्त क्या किसी के दूश्मन थे ? गोदरा की ट्रेन मेँ जिंदा जलाए गए कारसेवक क्या किसी के दूश्मन थे ?
इन प्रश्नो के उत्तर जब तक नही ढूँढेगे .....तब तक हिन्दू धरती पर सुरक्षित नही रह पाएगा ...।  --  अरून शुक्ला
बिना कुछ मेहनत किये, बैठ के ऐयाशी कैसे की जाय...
वत्स, इन जोंकों से दूर रहो, इनका इलाज यही है कि जहाँ दिखें इनको कठोर जूतों से मसल दो। इनसे बहस मत करो, क्योंकि इन्होने अपनी सारी जिन्दगी कुतर्कों में ही गुजारी होती है। आप पढ़ लिख कर डॉक्टर इंजीनियर, दुकानदार, सेठ बनते हैं,... लेकिन ये JNU जैसे संस्थानों से जोंकगिरी ही सीख कर बाहर आते हैं, वामपंथ ही सीख कर आते हैं। बिना कुछ मेहनत किये, बैठ के ऐयाशी कैसे की जाय, उसी के तर्क सीख कर आते हैं। ...लेकिन ये भी सच है कि इनकी मौत भी ऐसी ही होती है। इनके खुद के बीबी बच्चे छोड़ कर चले जाते हैं, और एक दिन नकारा होने के बाद इन्हीं के साथी इनको क्रांति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं।
अगर ये सच में आदिवासियों, पिछड़े और दलितों के उत्थान, उनकी प्रगति के लिए काम करने का जज्बा रखते, तो पश्चिम बंगाल में 30-35 साल की "निर्विरोध" वामपंथी सरकार के शासन के दौरान, अब तक पश्चिम बंगाल दुनिया का सबसे ज्यादा विकसित राज्य बन चुका होता !!
गुरूजी जी अपने शिष्यों के साथ एक पहाड़ी से गुजर रहे थे। एक तरफ देखा तो एक शानदार बंगला बन रहा था। बाबा जी के मुंह से निकला,. "अहा, यहाँ प्रकृति की गोद में बंगला बनवा के रहने वाला कितना भाग्यशाली होगा।"
एक शिष्य ने आगे बढ़ कर कहा,.. "लेकिन गुरु जी, आप जरा ध्यान से देखें, तो दिखेगा कि बंगले के आस पास छोटी छोटी झोंपड़ियाँ हैं। इनमें रहने वाले लोग गरीब हैं। ये बड़ा मकान इन झोंपड़ियों को छोटा करके ही बना है। उस बंगले में रहने वाले सेठ ने इन गरीबों का हक़ मारकर ही इतनी संपत्ति अर्जित की है। अगर यह बड़ा मकान ना होता तो सारे झोंपड़े बड़े होते। माओवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद ये कहता है कि इस बंगले को तोड़ कर इन गरीबों में बाँट देना चाहिए।"
गुरुजी बहुत जोर से चौंके,.. फिर शिष्य से पूछे,. "अच्छा??, और ये दिव्य ज्ञान तुम्हें कहाँ से मिला?"
शिष्य ने कहा,.. "गुरुजी, पिछले जिले में भ्रमण के दौरान जब मैं कुछ आवश्यक सामग्री खरीदने बाजार गया,.. तो वहां एक गरीबों का नेता आया हुआ था। वही एक स्टेज पर चढ़कर सबको ये बता रहा था, और उसकी बातें इतनी सत्य लग रही थीं कि लोग दिलचस्पी से सुन रहे थे। उसने कहा कि,.. "ये अमीरों का ही खेल है, वे हमारी ही संपत्तियां लूट कर हमें ही गुलाम बना कर रखते हैं। इन अमीरों के हाथों से सबकुछ छीन कर, हमें गरीबों में बांटना है, यही हमारा संकल्प है।"अपने वक्तव्य के अंत में उसने प्रभावित अंदाज में चिल्ला कर कहा,.. "हम लड़ेंगे साथी, हम मरते दम तक लड़ेंगे,.. लाल सलाम।" और उसके इस नारे के बाद उपस्थित भीड़ मदहोश होकर,.. लाल सलाम,.. लाल सलाम के नारे लगाने लगी।
गुरूजी मुस्कुराये,.. और बोले,. "अच्छा, मुझे इतनी गूढ़ बातें नहीं पता थीं। चलो चलकर सामने उन झोंपड़ी वालों से मिलते हैं, जरा जानने की कोशिश करते हैं कि,.. इस बड़े बंगले वाले ने कितने जुल्म ढाए हैं इनपर? कितना कुछ लूट लिया है इनका?"
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गुरूजी को घेर कर बैठ गए थे झोंपड़ी वाले। ....गुरूजी ने शिष्य से हुई सारी बात उन गरीबों को बता कर पूछा,.. "अब आपलोग बताइए, इस बड़े बंगले वाले सेठ की क्या कहानी है? इसने कितना लूटा है आपलोगों को?"
उन झोंपड़ी वालों की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईं। एक बूढ़ा खड़ा हुआ और एक तरफ ऊँगली दिखा कर कहने लगा,.. "बाबा, हम लोग उस पहाड़ के पीछे रहते हैं। हम लोग भेंड़ बकरी पालते थे, और उन्हीं का दूध वगैरह शहर में बेंच कर अपना जीवन यापन करते थे। एक दिन एक हमारा जान पहचान का ठेकेदार आया। वो पहले भी हमें काम दिलवा चुका था, उसने कहा कि शहर में रहने वाले एक सेठ ने अपने बुढ़ापे के लिए कुछ जमीन खरीदा है। वहां वो एक बंगला और मंदिर बनवाना चाहता है। तुमलोगों को काम करना है तो बोलो, जो ठीक मजदूरी होगी वो मिल जाएगी।"
अब बाबा, हमें और क्या चाहिए था? हम यहाँ आ गए, और इस बंगले के बनने में मदद करने लगे। रोज के रोज हमारी मजदूरी मिल जाती है, और कभी कभी तो जब सेठ जी आते हैं, तो अपनी तरफ से बढियां भोज भी कराते हैं। अब इसमें कहाँ से उन्होंने हमारी जमीन हड़प ली, कहाँ से उन्होंने हमारे पैसे लूट लिए? किसी भी दिन हमपर कोई जुल्म भी नहीं हुआ। और अगर जुल्म होता भी, तो हम यहाँ काम ही क्यों करते? हम ये सब छोड़ छाड़ के चल नहीं देते?"
"अरे बाबा, इस बड़े बंगले की वजह से ही तो वजूद है हमारी झोंपड़ियों का। ये बंगला है तो हम हैं, ये बंगला नहीं होता तो हम यहां क्यों होते?? "
गुरूजी ने मुस्कुराते हुए कहा,.. "हम ही गलत समझ बैठे थे। हमें क्षमा करियेगा।" कहकर उन गरीबों को धन्यवाद दिया और अपनी मण्डली के साथ चल दिए।
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गुरूजी ने उस शिष्य से पूछा,.. "कुछ समझ आया?"
शिष्य मुस्कुरा के बोला,.. "गुरुजी यहाँ की बात तो समझ गया। मैं समझ गया कि बहुत ही साधारण सा यह रिश्ता है विक्रेता (मजदूर) और ग्राहक (सेठ) के बीच। सही बात है कि जब मजदूरों को उनकी मजदूरी के पैसे सेठ दे ही रहा है, तो दिक्कत, शोषण जैसा कुछ है ही नहीं। लेकिन उलझन ये है कि फिर वो गरीबों, मजदूरों का नेता,.... इन दोनों के बीच कहाँ से फिट हो रहा है?"
गुरूजी ने भी मुस्कुराते हुए कहा,.. "वो सेठ अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर ढेर सारा पैसा कमाया। इन पैसों से मजदूर को मजदूरी के पैसे देकर और ज्यादा धन कमाया। एक विशालकाय घर, मंदिर, पुल, सड़क इत्यादि के निर्माण में सिर्फ ईंट ढोने वाले मजदूर नहीं होते हैं, उनमें उनका सुपरवाईजर भी होता है, मिस्त्री भी, माल ढोने वाला ट्रेक्टर चालक भी, इंजिनियर, आर्किटेक्ट इत्यादि बहुत से लेवल के लोग जुड़ते हैं। ये सब एक तरह से मजदूर ही हैं, और सबको अपनी योग्यतानुसार मजदूरी मिलती है।
लेकिन दुनिया में एक कौम होती है, जो पैदायशी धूर्त और मक्कार होते हैं। इनको कोई मेहनत का काम करके पैसा कमाना नहीं आता है। ये जोंक की तरह परजीवी होते हैं। इनका काम होता है एक दुसरे को उकसा कर लडाना, और दोनों से अपना फायदा उठाना। वो पहले कई महीनों तक सधे हुए पैंतरों से,.. कम दिमाग वालों को अपने जाल में फंसाते हैं। ऐसे ही सेठों, फैक्ट्री मालिक, सरकार के खिलाफ उनको भड़काते हैं। इस भड़काने में कई धूर्तता वाली चालें चलते हैं। जैसे किसी मजदूर की बेटी का चुपके से रेप करके उन्हें मार देना, और फिर इल्जाम सेठ पर डाल देना।
अब सेठ तो रोज रोज अपने को सही साबित करने आएगा नहीं। ...अगर पुलिस में केस भी होगा, प्रथम जाँच में ही पुलिस को पता चल जायेगा कि,.. ये सेठ का काम नहीं है, और पुलिस उस सेठ को छोड़ देती है। और ऐसा होते ही ये वामपंथी, एक बाजारू औरत की तरह ताली बजाते हुए मजदूर से कहेंगे कि,.. "देखा, मैंने कहा था ना कि ये सेठ लोगों से,.. पुलिस और शासन, प्रशासन सब मिले होते हैं।
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अब फिर ऐसे अनपढ़ मजदूरों को भड़का कर, उन्हें हथियार पकड़ा कर घोषित अपराधी बना देते हैं। फिर उसी सेठ के पास जाते हैं, और कहते हैं कि तुमको हमारे साथी उठा लेंगे, तुम्हारी फैक्ट्री, घर सब जला देंगे। नहीं तो इतना पैसा दो, और मौज करो। अब बेचारा सेठ क्या करेगा? मजबूरन उसको पैसा देना पड़ता है जिसको ये वामपंथी अपने NGO के द्वारा ले लेते हैं। अब उस आधे पैसे से इनकी मंहगी शराब और ऐयाशियों चलती हैं, तथा कुछ पैसे से हथियार खरीद कर ये फिर से उन मजदूरों को माओवादी बना कर उनके बीच बाँट देते हैं। और ये चक्र चलता ही रहता है, जब तक कि चीन के जैसे कोई दृढ़ विचारों वाली पार्टी सत्ता में आकर इनका समूल नाश ना कर दे।
जरा सोचो तो कितना बढ़िया धंधा है ये। खुद रहना है दिल्ली के पॉश कॉलोनियों में, और जंगलों में लड़ते वही मजदूर और प्रशासन हैं, मरते भी वही हैं। लेकिन इन वामपंथियों की मौज बनी रहती है इस उगाही और ऐसे ही और धंधों से, .....हींग मिले ना फिक्टरी, और रंग भी चोखा होय..! उन्हीं माओवादियों (नक्सलियों) के सेना, पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मर जाने पर,.. उनको मजदूर बता कर सरकार पर दबाव बनाने की नौटंकी भी करते हैं। क्योंकि सरकार पर दबाव बनेगा, तो सरकार विकास से पीछे हटेगी। सरकार पीछे हटेगी तो देश की प्रगति रूकती है। देश की प्रगति रूकती है, तो पडोसी दुश्मन देश हमारे देश से आगे निकल जाते हैं। ....इसीलिए ये दुश्मन देश भी इनके NGO को पैसा, हथियार देते रहते हैं, जिससे ये वामपंथी नामक जोंकें और फलती फूलती मोटी होती हैं, तथा दुगने रफ़्तार से खून चूसती हैं।
इन जोंकों का कोई सगा नहीं होता है। बहुत बार तो सरकार पर दबाव बनाने के लिए, अपनी साथी किसी जोंक को, जो इनकी असलियत जान लेता है, जैसे रोहित वेमुल्ला,.. इत्यादि को ही मारकर सरकार पर इल्जाम लगा देते हैं। इनके शासन काल के दौरान, पश्चिम बंगाल में ऐसे कितने लोग गुमनाम मर गए जिनकी लाशें तक नहीं मिलीं। एक स्ट्रिंग ऑपरेशन में इनका ही एक नेता एक बार कबूल रहा था,.. गड्ढा खोद कर उसमें बॉडी डाल कर ऊपर से नमक डाल देते हैं, हड्डियाँ तक गल जाती हैं। ...और इस कबूलनामे के बाद उसकी खुद की बॉडी का पता नहीं चला।
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- मूल लेखक का पता नहीं