Monday, 19 November 2018

jan-srijan

न्यायपालिका व CJI के प्रति फूटा जनता का गुस्सा! माननीयों के समक्ष साख बचाने की चुनौती!
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सुबह न्यूज़ चैनल वाली बोली थी आइये हम आपको सीधे मुंबई लेकर चलते हैं तब से तैयार होकर बैठा हूँ अभी तक नहीं आई!

Friday, 16 November 2018

*🅾 क्रांतीसूर्य - बिरसा मुंडा 🅾*_
एक अधूरा सपना
(अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज)
१४१ वा जयंती स्मरण
_जन्म_ : 15 नवंबर 1875
_शहीद_ : *9 जून 1900*
_माता_ : सुगना मुंडा
_पिता_ : करमी हातू मुंडा
_गाँव_ : मेंराँची का उलीहातू गाँव
_जन्मस्थल_ : खूँटी झारखंड
_मृत्युस्थल_ : राँची झारखंड
_आन्दोलन_ : भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
_उनकी उपाधी_ : १.क्रांतीसूर्य
२.धरतीआबा
३.भगवान
_उनकी स्मृति_ : १.बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार राँची
२.बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा राँची
_उनका विद्रोह_ : १.संथाल विद्रोह
२.कोल विद्रोह
३.गोंड विद्रोह
४.खासी विद्रोह
५.मानगढ का विद्रोह
_*आदिवासी जननायक*_
_बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनके नेतृत्व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में मुंडाओं के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजते हैं।_
_*आरंभिक जीवन*_
_सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म १५ नवम्बर १८७५ को झारखंड प्रदेश मेंराँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढ़ने आये। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुंडा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया। कॉलेज स्कुली वाद-विवाद में हमेशा प्रखरता के साथ आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे। उन्हीं दिनों एक पादरी डॉ. नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो वे मुंडा सरदारों की छीनी हुई भूमि को वापस करा देंगे. लेकिन 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बल्की ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भर्त्सना की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा। उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया। फलत: 1890 में बिरसा तथा उसके पिता चाईबासा से वापस आ गए। 1886 से 1890 तक बिरसा का चाईबासा मिशन के साथ रहना उनके व्यक्तित्व का निर्माण काल था। यही वह दौर था जिसने बिरसा मुंडा के अंदर बदले और स्वाभिमान की ज्वाला पैदा कर दी. बिरसा मुंडा पर संथाल विद्रोह, चुआर आंदोलन, कोल विद्रोह का भी व्यापक प्रभाव पड़ा. अपनी जाति की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी. उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि मुंडाओं का शासन वापस लाएंगे तथा अपने लोगों में जागृति पैदा करेंगे. १८९४ में मानसून के छोटानागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की।_
_*बिरसाइत धर्म की स्थापना*_
_गांधी से पहले गांधी की अवधारणा के तत्व के उभार के पीछे भी बिरसा का समाज एवं पड़ोस के सूक्ष्म अवलोकन एवं उसे नयी अंतर्दृष्टि देने का तत्व ही था। तभी तो उन्होंने गांधी के समान समस्याओं को देखा-सुना, फिर चिंतन-मनन किया। उनका मुंडा समाज को पुनर्गठित करने का प्रयास अंग्रेजी हुकूमत के लिए विकराल चुनौती बना। उन्होंने नए बिरसाइत धर्म की स्थापना की तथा लोगों को नई सोच दी, जिसका आधार सात्विकता, आध्यात्मिकता, परस्पर सहयोग, एकता व बंधुता था। उन्होंने 'गोरो वापस जाओ' का नारा दिया एवं परंपरागत लोकतंत्र की स्थापना पर बल दिया, ताकि शोषणमुक्त 'आदिम साम्यवाद' की स्थापना हो सके। उन्होंने कहा था- 'महारानी राज' जाएगा एवं 'अबुआ राज' आएगा. बिरसा के द्वारा स्थापित बिरसाइत पंथ आज भी कायम है। खूंटी जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर जंगल के बीच बिरसाइतों का गांव है अनिगड़ा। कभी इस गांव में बिरसाइतों की काफी संख्या थी। अब ये नाममात्र के रह गए हैं। ये अपनी गरीबी से अधिक सरकारी उपेक्षा से दुखी हैं। ज्ञातव्य है कि यदि अंग्रेजों ने शोषण किया तो आजाद भारत की सरकार ने भी इनके साथ कम धोखा नहीं किया है। आजादी के बाद भी मुंडाओं को लगान-सूद से मुक्ति नहीं मिली तथा जल, जंगल, जमीन पर अधिकार नहीं मिला। 'अबुआ दिशुम' का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है।_
_*मुंडा विद्रोह का नेतृत्व*_
_1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजों से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।_
_*विद्रोह में भागीदारी*_
_बिरसा मुण्डा का राँची स्थित स्टेच्यू 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।_
_*संथाल विद्रोह*_
_राम दयाल मुंडा के अनुसार ब्रिटिश शासन को रेलवे के लिए संथाल क्षेत्र चाहिए था। इसके अलावा उन्हें राजस्व का भी लोभ था। जंगलों को साफ कर खेत बनाने पर जोर दिया जा रहा था। ऐसा करने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जा रहा था। आदिवासियों के लिए पहाड़ी क्षेत्र में जो भी भूमि थी, फल फूल थे, वे उसी के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। राम दयाल मुंडा का मानना है कि मैदानी भारत एक तरह से समर्पण करता गया वहीं पहाड़ों में विरोध होता रहा। अंग्रेज आमने सामने की लड़ाई में भले ही शक्तिशाली थे मगर गुरिल्ला युद्ध के लिए वे तैयार नहीं थे और न ही उनकी सेना में ऐसे युद्ध के लिए कोई इकाई थी। बहरहाल वे किसी प्रकार आंदोलन को कुचलने में सफल रहे। वर्ष १८५५ में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संथाली जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'। यह उनके विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु, कानु और चाँद इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे। १८५२ में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था।_
_*ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण का विरोध*_
_बिरसा मुंडा की गणना महान देशभक्तों में की जाती है. उन्होंने वनवासियों और आदिवासियों को एकजुट कर उन्हें अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तैयार किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय आदिवासी संस्कृति की रक्षा करने के लिए धर्मान्तरण करने वाले ईसाई मिशनरियों का विरोध किया. ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले आदिवसियो को उन्होंने अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की जानकारी दी और अंग्रेजों के षडयन्त्र के प्रति सचेत किया._
_*अंग्रेजों द्वारा गिरफ़्तारी*_
_जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। 3 फरवरी 1900 को सेंतरा के पश्चिम जंगल में बने शिविर से बिरसा को गिरफ्तार कर उन्हें तत्काल रांची कारागार में बंद कर दिया गया। बिरसा के साथ अन्य 482 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ 15 आरोप दर्ज किए गए। शेष अन्य गिरफ्तार लोगों में सिर्फ 98 के खिलाफ आरोप सिध्द हो पाया। बिरसा के विश्वासी गया मुंडा और उनके पुत्र सानरे मुंडा को फांसी दी गई। गया मुंडा की पत्नी मांकी को दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी गई।_
_*अन्तिम साँस*_
_मुकदमे की सुनवाई के शुरुआती दौर में उन्होंने जेल में भोजन करने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। अदालत में तबियत खराब होने की वजह से जेल वापस भेज दिया गया। 1 जून को जेल अस्पताल के चिकित्सक ने सूचना दी कि बिरसा को हैजा हो गया है और उनके जीवित रहने की संभावना नहीं है। 9 जून 1900 की सुबह सूचना दी गई कि बिरसा नहीं रहे यही उनकी अंतिम सांस रही। इस तरह एक क्रातिकारी जीवन का अंत हो गया। बिरसा के संघर्ष के परिणामस्वरूप छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 बना। जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकार की रक्षा के लिए शुरु हुए आंदोलन एक के बाद एक श्रृंखला में गतिमान रहे तथा इसकी परिणति अलग झारखंड राय के रूप में हुई। आजादी के बाद औद्योगिकीकरण के दौर ने उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जिसकी स्थापना के लिए बिरसा का उलगुलान था। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है. अपने पच्चीस साल के छोटे जीवन में ही उन्होंने जो क्रांति पैदा की वह अतुलनीय है. बिरसा मुंडा धर्मान्तरण, शोषण और अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का संचालन करने वाले महान सेनानायक थे._
_*बिरसा मुण्डा की समाधी*_
_बिरसा मुण्डा की समाधि राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित है। वहीं उनका स्टेच्यू भी लगा है। उनकी स्मृति में रांची में बिरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा भी है। राम दयाल मुंडा के अनुसार बिरसा के देहांत के बाद काफी असर हुआ और रैयतों के हित में कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। बाद में छोटानागपुर टेनेंसी कानून बना। झारखंड में काफी बड़ी संख्या में लोगों का बिरसा के साथ भावनात्मक लगाव है और उनके जन्मदिवस 15 नवंबर के मौके पर झारखंड राज्य का गठन हुआ। उनके अनुसार बिरसा ने जिन मुद्दों को लेकर संघर्ष किया, उसकी प्रासंगिकता अब भी बरकरार है।_
_*अधुरा सपना - अबुआ: दिशोम*_
''अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज"
(अर्थात हमारे देश में हमारा शासन)
_का नारा देकर भारत वर्ष के छोटा नागपुर क्षेत्र के आदिवासी नेता भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों की हुकुमत के सामने कभी घुटने नहीं टेके, सर नहीं झुकाया बल्कि जल, जंगल और जमीन के हक के लिए अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' अर्थात क्रांति का आह्वान किया।
[11/15, 9:56 AM] Kaniram Ji: _*🅾 क्रांतीसूर्य - बिरसा मुंडा 🅾*_
एक अधूरा सपना
(अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज)
१४१ वा जयंती स्मरण
_जन्म_ : 15 नवंबर 1875
_शहीद_ : *9 जून 1900*
_माता_ : सुगना मुंडा
_पिता_ : करमी हातू मुंडा
_गाँव_ : मेंराँची का उलीहातू गाँव
_जन्मस्थल_ : खूँटी झारखंड
_मृत्युस्थल_ : राँची झारखंड
_आन्दोलन_ : भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
_उनकी उपाधी_ : १.क्रांतीसूर्य
२.धरतीआबा
३.भगवान
_उनकी स्मृति_ : १.बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार राँची
२.बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा राँची
_उनका विद्रोह_ : १.संथाल विद्रोह
२.कोल विद्रोह
३.गोंड विद्रोह
४.खासी विद्रोह
५.मानगढ का विद्रोह
_*आदिवासी जननायक*_
_बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनके नेतृत्व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में मुंडाओं के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजते हैं।_
_*आरंभिक जीवन*_
_सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म १५ नवम्बर १८७५ को झारखंड प्रदेश मेंराँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढ़ने आये। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुंडा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया। कॉलेज स्कुली वाद-विवाद में हमेशा प्रखरता के साथ आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे। उन्हीं दिनों एक पादरी डॉ. नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो वे मुंडा सरदारों की छीनी हुई भूमि को वापस करा देंगे. लेकिन 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बल्की ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भर्त्सना की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा। उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया। फलत: 1890 में बिरसा तथा उसके पिता चाईबासा से वापस आ गए। 1886 से 1890 तक बिरसा का चाईबासा मिशन के साथ रहना उनके व्यक्तित्व का निर्माण काल था। यही वह दौर था जिसने बिरसा मुंडा के अंदर बदले और स्वाभिमान की ज्वाला पैदा कर दी. बिरसा मुंडा पर संथाल विद्रोह, चुआर आंदोलन, कोल विद्रोह का भी व्यापक प्रभाव पड़ा. अपनी जाति की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी. उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि मुंडाओं का शासन वापस लाएंगे तथा अपने लोगों में जागृति पैदा करेंगे. १८९४ में मानसून के छोटानागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की।_
_*बिरसाइत धर्म की स्थापना*_
_गांधी से पहले गांधी की अवधारणा के तत्व के उभार के पीछे भी बिरसा का समाज एवं पड़ोस के सूक्ष्म अवलोकन एवं उसे नयी अंतर्दृष्टि देने का तत्व ही था। तभी तो उन्होंने गांधी के समान समस्याओं को देखा-सुना, फिर चिंतन-मनन किया। उनका मुंडा समाज को पुनर्गठित करने का प्रयास अंग्रेजी हुकूमत के लिए विकराल चुनौती बना। उन्होंने नए बिरसाइत धर्म की स्थापना की तथा लोगों को नई सोच दी, जिसका आधार सात्विकता, आध्यात्मिकता, परस्पर सहयोग, एकता व बंधुता था। उन्होंने 'गोरो वापस जाओ' का नारा दिया एवं परंपरागत लोकतंत्र की स्थापना पर बल दिया, ताकि शोषणमुक्त 'आदिम साम्यवाद' की स्थापना हो सके। उन्होंने कहा था- 'महारानी राज' जाएगा एवं 'अबुआ राज' आएगा. बिरसा के द्वारा स्थापित बिरसाइत पंथ आज भी कायम है। खूंटी जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर जंगल के बीच बिरसाइतों का गांव है अनिगड़ा। कभी इस गांव में बिरसाइतों की काफी संख्या थी। अब ये नाममात्र के रह गए हैं। ये अपनी गरीबी से अधिक सरकारी उपेक्षा से दुखी हैं। ज्ञातव्य है कि यदि अंग्रेजों ने शोषण किया तो आजाद भारत की सरकार ने भी इनके साथ कम धोखा नहीं किया है। आजादी के बाद भी मुंडाओं को लगान-सूद से मुक्ति नहीं मिली तथा जल, जंगल, जमीन पर अधिकार नहीं मिला। 'अबुआ दिशुम' का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है।_
_*मुंडा विद्रोह का नेतृत्व*_
_1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजों से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।_
_*विद्रोह में भागीदारी*_
_बिरसा मुण्डा का राँची स्थित स्टेच्यू 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।_
_*संथाल विद्रोह*_
_राम दयाल मुंडा के अनुसार ब्रिटिश शासन को रेलवे के लिए संथाल क्षेत्र चाहिए था। इसके अलावा उन्हें राजस्व का भी लोभ था। जंगलों को साफ कर खेत बनाने पर जोर दिया जा रहा था। ऐसा करने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जा रहा था। आदिवासियों के लिए पहाड़ी क्षेत्र में जो भी भूमि थी, फल फूल थे, वे उसी के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। राम दयाल मुंडा का मानना है कि मैदानी भारत एक तरह से समर्पण करता गया वहीं पहाड़ों में विरोध होता रहा। अंग्रेज आमने सामने की लड़ाई में भले ही शक्तिशाली थे मगर गुरिल्ला युद्ध के लिए वे तैयार नहीं थे और न ही उनकी सेना में ऐसे युद्ध के लिए कोई इकाई थी। बहरहाल वे किसी प्रकार आंदोलन को कुचलने में सफल रहे। वर्ष १८५५ में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संथाली जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'। यह उनके विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु, कानु और चाँद इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे। १८५२ में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था।_
_*ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण का विरोध*_
_बिरसा मुंडा की गणना महान देशभक्तों में की जाती है. उन्होंने वनवासियों और आदिवासियों को एकजुट कर उन्हें अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तैयार किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय आदिवासी संस्कृति की रक्षा करने के लिए धर्मान्तरण करने वाले ईसाई मिशनरियों का विरोध किया. ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले आदिवसियो को उन्होंने अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की जानकारी दी और अंग्रेजों के षडयन्त्र के प्रति सचेत किया._
_*अंग्रेजों द्वारा गिरफ़्तारी*_
_जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। 3 फरवरी 1900 को सेंतरा के पश्चिम जंगल में बने शिविर से बिरसा को गिरफ्तार कर उन्हें तत्काल रांची कारागार में बंद कर दिया गया। बिरसा के साथ अन्य 482 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ 15 आरोप दर्ज किए गए। शेष अन्य गिरफ्तार लोगों में सिर्फ 98 के खिलाफ आरोप सिध्द हो पाया। बिरसा के विश्वासी गया मुंडा और उनके पुत्र सानरे मुंडा को फांसी दी गई। गया मुंडा की पत्नी मांकी को दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी गई।_
_*अन्तिम साँस*_
_मुकदमे की सुनवाई के शुरुआती दौर में उन्होंने जेल में भोजन करने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। अदालत में तबियत खराब होने की वजह से जेल वापस भेज दिया गया। 1 जून को जेल अस्पताल के चिकित्सक ने सूचना दी कि बिरसा को हैजा हो गया है और उनके जीवित रहने की संभावना नहीं है। 9 जून 1900 की सुबह सूचना दी गई कि बिरसा नहीं रहे यही उनकी अंतिम सांस रही। इस तरह एक क्रातिकारी जीवन का अंत हो गया। बिरसा के संघर्ष के परिणामस्वरूप छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 बना। जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकार की रक्षा के लिए शुरु हुए आंदोलन एक के बाद एक श्रृंखला में गतिमान रहे तथा इसकी परिणति अलग झारखंड राय के रूप में हुई। आजादी के बाद औद्योगिकीकरण के दौर ने उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जिसकी स्थापना के लिए बिरसा का उलगुलान था। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है. अपने पच्चीस साल के छोटे जीवन में ही उन्होंने जो क्रांति पैदा की वह अतुलनीय है. बिरसा मुंडा धर्मान्तरण, शोषण और अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का संचालन करने वाले महान सेनानायक थे._
_*बिरसा मुण्डा की समाधी*_
_बिरसा मुण्डा की समाधि राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित है। वहीं उनका स्टेच्यू भी लगा है। उनकी स्मृति में रांची में बिरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा भी है। राम दयाल मुंडा के अनुसार बिरसा के देहांत के बाद काफी असर हुआ और रैयतों के हित में कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। बाद में छोटानागपुर टेनेंसी कानून बना। झारखंड में काफी बड़ी संख्या में लोगों का बिरसा के साथ भावनात्मक लगाव है और उनके जन्मदिवस 15 नवंबर के मौके पर झारखंड राज्य का गठन हुआ। उनके अनुसार बिरसा ने जिन मुद्दों को लेकर संघर्ष किया, उसकी प्रासंगिकता अब भी बरकरार है।_
_*अधुरा सपना - अबुआ: दिशोम*_
''अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज"
(अर्थात हमारे देश में हमारा शासन)
_का नारा देकर भारत वर्ष के छोटा नागपुर क्षेत्र के आदिवासी नेता भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों की हुकुमत के सामने कभी घुटने नहीं टेके, सर नहीं झुकाया बल्कि जल, जंगल और जमीन के हक के लिए अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' अर्थात क्रांति का आह्वान किया।

Thursday, 15 November 2018

jan-sanskar


वीर दुर्गादास राठौड़ : मारवाड़ का शेर जिसने अपने दम पर ओरंगजेब को धुल चटाई

जिसने इस देश का पूर्ण इस्लामीकरण करने की औरंगजेब की साजिश को विफल कर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी.....उस महान यौद्धा का नाम है वीर दुर्गादास राठौड़..समय - सोहलवीं - सतरवी शताब्दी स्थान - मारवाड़ राज्य वीर दुर्गादास राठौड का जन्म मारवाड़ में करनोत ठाकुर आसकरण जी के घर सं. 1695 श्रावन शुक्ला चतुर्दसी को हुआ था। आसकरण जी मारवाड़ राज्य की सेना में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंत सिंह जी की सेवा में थे ।अपने पिता की भांति बालक दुर्गादास में भी वीरता कूट कूट कर भरी थी,एक बार जोधपुर राज्य की सेना के ऊंटों को चराते हुए राईके (ऊंटों के चरवाहे) आसकरण जी के खेतों में घुस गए, बालक दुर्गादास के विरोध करने पर भी चरवाहों ने कोई ध्यान नहीं दिया तो वीर युवा दुर्गादास का खून खोल उठा और तलवार निकाल कर झट से ऊंट की गर्दन उड़ा दी,इसकी खबर जब महाराज जसवंत सिंह जी के पास पहुंची तो वे उस वीर बालक को देखने के लिए उतावले हो उठे व अपने सेनिकों को दुर्गादास को लेन का हुक्म दिया ।अपने दरबार में महाराज उस वीर बालक की निडरता व निर्भीकता देख अचंभित रह गए,आस्करण जी ने अपने पुत्र को इतना बड़ा अपराध निर्भीकता से स्वीकारते देखा तो वे सकपका गए।परिचय पूछने पर महाराज को मालूम हुवा की यह आस्करण जी का पुत्र है,तो महाराज ने दुर्गादास को अपने पास बुला कर पीठ थपथपाई और इनाम तलवार भेंट कर अपनी सेना में भर्ती कर लिया।उस समय महाराजा जसवंत सिंह जी दिल्ली के मुग़ल बादशाह औरंगजेब की सेना में प्रधान सेनापति थे,फिर भी औरंगजेब की नियत जोधपुर राज्य के लिए अच्छी नहीं थी और वह हमेशा जोधपुर हड़पने के लिए मौके की तलाश में रहता था ।सं. 1731 में गुजरात में मुग़ल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह को दबाने हेतु जसवंत सिंह जी को भेजा गया,इस विद्रोह को दबाने के बाद महाराजा जसवंत सिंह जी काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने हेतु चल दिए और दुर्गादास की सहायता से पठानों का विद्रोह शांत करने के साथ ही वीर गति को प्राप्त हो गए । उस समय उनके कोई पुत्र नहीं था और उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थी,दोनों ने एक एक पुत्र को जनम दिया,एक पुत्र की रास्ते में ही मौत हो गयी और दुसरे पुत्र अजित सिंह को रास्ते का कांटा समझ कर ओरंग्जेब ने अजित सिंह की हत्या की ठान ली,ओरंग्जेब की इस कुनियत को स्वामी भक्त दुर्गादास ने भांप लिया और मुकंदास की सहायता से स्वांग रचाकर अजित सिंह को दिल्ली से निकाल लाये व अजित सिंह की लालन पालन की समुचित व्यवस्था करने के साथ जोधपुर में गदी के लिए होने वाले ओरंग्जेब संचालित षड्यंत्रों के खिलाफ लोहा लेते अपने कर्तव्य पथ पर बदते रहे।अजित सिंह के बड़े होने के बाद गद्दी पर बैठाने तक वीर दुर्गादास को जोधपुर राज्य की एकता व स्वतंत्रता के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ी,ओरंग्जेब का बल व लालच दुर्गादास को नहीं डिगा सका जोधपुर की आजादी के लिए दुर्गादास ने कोई पच्चीस सालों तक सघर्ष किया,लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में दुर्गादास को मारवाड़ छोड़ना पड़ा ।महाराज अजित सिंह के कुछ लोगों ने दुर्गादास के खिलाफ कान भर दिए थे जिससे महाराज दुर्गादास से अनमने रहने लगे वस्तु स्तिथि को भांप कर दुर्गादास ने मारवाड़ राज्य छोड़ना ही उचित समझा ।और वे मारवाड़ छोड़ कर उज्जेन चले गए वही शिप्रा नदी के किनारे उन्होने अपने जीवन के अन्तिम दिन गुजारे व वहीं उनका स्वर्गवास हुवा ।दुर्गादास हमारी आने वाली पिडियों के लिए वीरता, देशप्रेम, बलिदान व स्वामिभक्ति के प्रेरणा व आदर्श बने रहेंगे ।१-मायाड ऐडा पुत जाण, जेड़ा दुर्गादास । भार मुंडासा धामियो, बिन थम्ब आकाश ।२-घर घोड़ों, खग कामनी, हियो हाथ निज मीत सेलां बाटी सेकणी, श्याम धरम रण नीत ।वीर दुर्गादास का निधन 22 नवम्बर, सन् 1718 में हुवा था इनका अन्तिम संस्कार शिप्रा नदी के तट पर किया गया था ।"उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुग़ल शक्ति उनके दृढ हृदये को पीछे हटा सकी। वह एक वीर था जिसमे राजपूती साहस व मुग़ल मंत्री सी कूटनीति थी "जिसने इस देश का पूर्ण इस्लामीकरण करने की औरंगजेब की साजिश को विफल कर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी.....उस महान यौद्धा का नाम है वीर दुर्गादास राठौर...इसी वीर दुर्गादास राठौर के बारे में रामा जाट ने कहा था कि "धम्मक धम्मक ढोल बाजे दे दे ठोर नगारां की,, जो आसे के घर दुर्गा नहीं होतो,सुन्नत हो जाती सारां की.......आज भी मारवाड़ के गाँवों में लोग वीर दुर्गादास को याद करते है कि“माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास, बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश”हिंदुत्व की रक्षा के लिए उनका स्वयं का कथन"रुक बल एण हिन्दू धर्म राखियों"अर्थात हिन्दू धर्म की रक्षा मैंने भाले की नोक से की............इनके बारे में कहा जाता है कि इन्होने सारी उम्र घोड़े की पीठ पर बैठकर बिता दी।अपनी कूटनीति से इन्होने ओरंगजेब के पुत्र अकबर को अपनी और मिलाकर,राजपूताने और महाराष्ट्र की सभी हिन्दू शक्तियों को जोडकर ओरंगजेब की रातो की नींद छीन ली थी।और हिंदुत्व की रक्षा की थी।उनके बारे में इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था कि ....."उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी,बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमे राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी".ये निर्विवाद सत्य है कि अगर उस दौर में वीर दुर्गादास राठौर,छत्रपति शिवाजी,वीर गोकुल,गुरु गोविन्द सिंह,बंदा सिंह बहादुर जैसे शूरवीर पैदा नहीं होते तो पुरे मध्य एशिया,ईरान की तरह भारत का पूर्ण इस्लामीकरण हो जाता और हिन्दू धर्म का नामोनिशान ही मिट जाता............28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गयाये वही वीर दुर्गा दास राठौड़ जो जोधपुर के महाराजा को औरंगज़ेब के चुंगल ले निकल कर लाये थे जब जोधपुर महाराजा अजित सिंह गर्भ में थे उनके पिता की मुर्त्यु हो चुकी थी तब औरंगज़ेब उन्हें अपने संरक्षण में दिल्ली दरबार ले गया था उस वक़्त वीर दुर्गा दास राठौड़ चार सो चुने हुए राजपूत वीरो को लेकर दिल्ली गए और युद्ध में मुगलो को चकमा देकर महाराजा को मारवाड़ ले आये.....उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह मेड़तिया की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |
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राणा सांगा : वीर योद्धा जो जीवन भर हिंदुत्व की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे और विदेशी लुटेरों से भारत की रक्षा की
भारतीय इतिहास में एक से बढ़कर एक वीर योद्धा हुवे हे जिन्होंने अपनी वीरता और युद्ध कौशल से इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया , मित्रों अगर हम भारत के इतिहास की जानकारी ले और राजस्थान का नाम ना आये ऐसा नहीं हो सकता हे , क्योकि राजस्थान को वीरो की भूमि कहाँ जाता हे , यहाँ पर "सर कटना और धड़ लड़ना" ऐसे सैकड़ो उदाहरण भरे पड़े हे , आज हम आपको राजस्थान के प्रान्त "मेवाड़" के एक शूरवीर योद्धा की कथा सुनाने जा रहे हे जिन्होंने अपनी वीरता और शौर्य के बल पर दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे , उस महान वीर योद्धा का नाम हे संग्रामसिंह - "महाराणा सांगा"
महाराणा सांगा जीवन परिचय : राणा सांगा का पूरा नाम महाराणा संग्रामसिंह था | उनका जन्म 12 अप्रैल, 1484 को मालवा, राजस्थान मे हुआ था. राणा सांगा सिसोदिया (सूर्यवंशी राजपूत) राजवंशी थे | राणा सांगा के पिता का नाम "राणा रायमल (शासनकाल 1473 से 1509 ई.) " था , राणा साँगा (शासनकाल 1509 से 1528 ई.) को 'संग्राम सिंह' के नाम से भी जाना जाता है। उसने अपने शासन काल में दिल्ली, मालवा और गुजरात के विरुद्ध अभियान किया।। राणा साँगा महान् योद्धा था और तत्कालीन भारत के समस्त राज्यों में से ऐसा कोई भी उल्लेखनीय शासक नहीं था, जो उससे लोहा ले सके। राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एकजुट किया। राणा सांगा अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध हुये। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। इनके शासनकाल मे मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की। (शासनकाल 1509 से 1528 ई.) राणा सांगा अदम्य साहसी थे। एक भुजा, एक आँख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया, वे अपने समय के महानतम विजेता तथा “हिन्दूपति” के नाम से विख्यात थे। वे भारत में हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे।
जीवन संघर्ष और वीरता : राणा रायमल के बाद सन 1509 में राणा सांगा मेवाड़ के उत्तराधिकारी बने। इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। इनके शासनकाल मे मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की। राणा सांगा ने दिल्ली और मालवा के नरेशों के साथ अठारह युद्ध किये। इनमे से दो युद्ध दिल्ली के शक्तिशाली सुल्तान इब्राहीम लोदी के साथ लड़े गए। कहा जाता था कि मालवा के सुल्तान मुजफ्फर खान को युद्ध में कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता था क्योंकि उसकी राजधानी ऐसी मजबूत थी कि वह दुर्भेद्य थी। परन्तु पराक्रमी राणा सांगा ने केवल उसके दुर्ग पर ही अधिकार न किया किन्तु सुल्तान मुजफ्फर खान को बंदी बनाकर मेवाड़ ले आया। फिर उसने सेनापति अली से रणथम्भोर के सुदृढ़ दुर्ग को छीन लिया।
देख खानवा यहाँ चढ़ी थी राजपूत की त्यौरियाँ ।
मतवालों की शमसीरों से निकली थी चिनगारियाँ ।
'खानवा की लड़ाई' (1527) में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। इतिहासकारों के अनुसार साँगा की सेना में 200,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,000 अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। लेकिन बाबर की सेना भी बहुत विशाल थी और बाबर की सेना में तौपे भी थी । कई दिनों तक चले इस भीषण युद्ध में सांगा की विजय हुई और बाबर को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा, इस युद्ध में राणा सांगा हाथी पर बैठकर युद्ध कर रहे थे तभी एक तीर महाराणा सांगा को आकर लगा , तीर लगने से सांगा मुर्छित हो गए , मुर्छित राणा सांगा के छत्र-चवर झाला अज्जा जी ने धारण कर लिए और स्वं हाथी पर बैठकर युद्ध करने लगे इससे राणा सांगा को युद्ध भूमि से सुरंक्षित निकाला जा सका |
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गोरा-बादल :जिन्होंने अपनी वीरता से खिलजी को उसकी ओकात दिखाई थी
जब जब भारत के इतिहास की बात होती हे तब तब राजपुताना के वीरो के लड़े युद्ध और उनकी वीरता के चर्चे आम होते हे . आज हम आपको भारत के ऐसे ही दो वीर "गौरा-बादल" की वीरता और पराक्रम की सच्ची कथा बताने जा रहे हे जो हम सबके लिए प्रेरणा प्रदान करने वाली हे . इतिहास को छू कर आने वाली हवा में एक बार साँस ले कर देखिए, उस हवा में घुली वीरता की महक से आपका सीना गौरवान्वित हो उठेगा. भले ही हममें से कई लोग अपने देश की माटी में सने अपने पूर्वजों के लहू की गंध ना ले पाए हों, किन्तु इतिहास ने आज भी भारत माँ के उन सपूतों की वीर गाथाओं को अपने सीने में सहेज कर रखा है. इन्हीं शूरवीरों की वजह से ही हमारी आन-बान और शान आज तक बरकरार है. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह गौरव किसी धर्म विशेष या जाति विशेष का नहीं, अपितु यह गौरव है हम सम्पूर्ण भारतवासियों का
गौरा और बादल ऐसे ही दो शूरवीरों के नाम है, जिनके पराक्रम से राजस्थान की मिट्टी बलिदानी है . जीवन परिचय : गौरा ओर बदल दोनों चाचा भतीजे जालोर के चौहान वंश से सम्बन्ध रखते थे | मेवाड़ की धरती की गौरवगाथा गोरा और बादल जैसे वीरों के नाम के बिना अधूरी है. हममें से बहुत से लोग होंगे, जिन्होंने इन शूरवीरों का नाम तक न सुना होगा! मगर मेवाड़ की माटी में आज भी इनके रक्त की लालिमा झलकती है. मुहणोत नैणसी के प्रसिद्ध काव्य ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में इन दो वीरों के बारे पुख्ता जानकारी मिलती है. इस काव्य की मानें तो रिश्ते में चाचा और भतीजा लगने वाले ये दो वीर जालौर के चौहान वंश से संबंध रखते थे, जो रानी पद्मिनी की विवाह के बाद चितौड़ के राजा रतन सिंह के राज्य का हिस्सा बन गए थे. ये दोनों इतने पराक्रमी थे कि दुश्मन उनके नाम से ही कांपते थे. कहा जाता है कि एक तरफ जहां चाचा गोरा दुश्मनों के लिए काल के सामान थे, वहीं दूसरी तरफ उनका भतीजा बादल दुश्मनों के संहार के आगे मृत्यु तक को शून्य समझता था. यहीं कारण था कि मेवाड़ के राजा रतन सिंह ने उन्हें अपनी सेना की बागडोर दे रखी थी
राणा रतनसिंह को खिलजी की कैद से छुड़ाना : खिलजी की नजर मेवाड़ की राज्य पर थी लेकिन वह युद्ध में राजपूतों को नहीं हरा सका तो उसने कुटनीतिक चाल चली , मित्रता का बहाना बनाकर रावल रतनसिंह को मिलने के लिए बुलाया और धोके से उनको बंदी बना लिया और वहीं से सन्देश भिजवाया कि रावल को तभी आजाद किया जायेगा, जब रानी पद्मिनी उसके पास भजी जाएगी। इस तरह के धोखे और सन्देश के बाद राजपूत क्रोधित हो उठे, लेकिन रानी पद्मिनी ने धीरज व चतुराई से काम लेने का आग्रह किया। रानी ने गोरा-बादल से मिलकर अलाउद्दीन को उसी तरह जबाब देने की रणनीति अपनाई जैसा अलाउद्दीन ने किया था। रणनीति के तहत खिलजी को सन्देश भिजवाया गया कि रानी आने को तैयार है, पर उसकी दासियाँ भी साथ आएगी। खिलजी सुनकर आन्दित हो गया। रानी पद्मिनी की पालकियां आई, पर उनमें रानी की जगह वेश बदलकर गोरा बैठा था। दासियों की जगह पालकियों में चुने हुए वीर राजपूत थे। खिलजी के पास सूचना भिजवाई गई कि रानी पहले रावल रत्नसिंह से मिलेंगी। खिलजी ने बेफिक्र होकर अनुमति दे दी। रानी की पालकी जिसमें गोरा बैठा था, रावल रत्नसिंह के तम्बू में भेजी गई। गोरा ने रत्नसिंह को घोड़े पर बैठा तुरंत रवाना कर और पालकियों में बैठे राजपूत खिलजी के सैनिकों पर टूट पड़े।
राजपूतों के इस अचानक हमले से खिलजी की सेना हक्की-बक्की रहा गई वो कुछ समझ आती उससे पहले ही राजपूतों ने रतनसिंह को सुरक्षित अपने दुर्ग पंहुचा दिया , हर तरफ कोहराम मच गया था गोरा और बादल काल की तरह दुश्मनों पर टूट पड़े थे , और अंत में दोनों वीरो की भांति लड़ते हुवे वीरगति को प्राप्त हुवे | गोरा और बादल जैसे वीरों के कारण ही आज हमारा इतिहास गर्व से अभिभूत है. ऐसे वीर जिनके बलिदान पर हमारा सीना चौड़ा हो जाये, उन्हें कोटि-कोटि नमन | मेवाड़ के इतिहास में दोनों वीरों की वीरता स्वर्ण अक्षरों में अंकित है |

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किले की 100 फिट ऊंची दीवार से कूद गई थीं रानी लक्ष्मीबाई…अंग्रेजों को बता दी थी उनकी औकात
रानी लक्ष्मीबाई, भारत की वो वीरांगना जिसने अंग्रेजों का उनकी औकात बता दी थी। झांसी के गणेश मं‍दिर में राजा गंगाधर राव से शादी के बाद उनका नाम मण‍िकर्ण‍िका से बदलकर लक्ष्मी बाई रख दिया गया और वह झांसी की रानी बन गईं।
1613 में ओरछा के राजा वीर सिंह द्वारा बनवाए गए इस किले को 400 साल हो गए हैं। कई मराठा शासकों का झांसी में शासन रहा, लेकिन किले को रानी के नाम से जाना जाता है। रानी की वीरता की कहानी किला सहेजे है। अंग्रेजों से खुद को घिरता देख लक्ष्मी बाई ने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ से बांध अपने ढाई हजार की कीमत के सफेद घोड़े पर बैठ किले की 100 फीट ऊंची दीवार से छलांग लगाई थी। झांसी के पुरानी बजरिया स्थित गणेश मंदिर की रानी लक्ष्मीबाई की जिंदगी में सबसे अहम जगह थी। 15 साल की उम्र (जानकारों के मुताबिक रानी का जन्म 1827 है) में मनु कर्णिका की शादी इसी मंदिर में झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई थी। शादी के बाद इसी मंदिर में उनका नाम मनु कर्ण‍िका से लक्ष्मीबाई पड़ा।राजा गंगाधर राव के निधन के बाद रानी गम में डूब गई थीं। 
गंगाधर राव का क्रिया कर्म जहां किया गया था, उसी लक्ष्मीताल के किनारे रानी ने राजा की याद में उनकी समाधि बनवाई थी। झांसी में रानी ने सिर्फ यही एक निर्माण करवाया था। इसे गंगाधर राव की छतरी के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि रानी लक्ष्मी बाई महा लक्ष्मी मंदिर में पूजा करने के जाती थीं, तब इसी तालाब से होकर गुजरती थीं। यह झांसी का बड़ा जल श्रोत था। निधन के बाद गंगाधर राव का अंतिम संस्कार भी यहीं किया गया, उन्हें श्रद्धांजलि देने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। आज इस तालाब की हालतखराब हो चुकी है।
इसे संवारने के लगातार कोश‍िश की जा रही है। झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।
1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़बज़ा कर लिया।
परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली। तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर क़बज़ा कर लिया।
18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक खतरनाक भी थी।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.
उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.
उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में.
जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में शरण ली थी.
रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था.
'रानी महल' में लक्ष्मी बाई
लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, 'मुफ़ुस्सलाइट' निकाला करते थे.
लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन उन्हें पसंद नहीं करता था क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश किया करते थे.
जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.
उनको झाँसी लाने के लिए रानी ने अपने दीवान और एक अनुचर को आगरा रवाना किया.
अनुचर के हाथ में बर्फ़ से भरी बाल्टी थी जिसमें पानी, बीयर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी हुई थीं. पूरे रास्ते एक नौकर लैंग को पंखा करते आया था.
झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर 'रानी महल' लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.
मलमल की साड़ी
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया.
लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, 'द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.'
किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, 'रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थीं और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी. उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.'
रानी के घुड़सवार
बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो ख़ुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन जब-जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर हमला कर देते थे. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भंग कर दें.
कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे.
उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की अत्यंत निपुण ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली. इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था.
इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे. इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गईं.
उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई.
ब्रिटिश सैनिक
उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी किताब 'रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया' में लिखा, "अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, 'मेरे पीछे आओ.' पंद्रह घुड़सवारों का एक जत्था उनके पीछे हो लिया. वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग गए. अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, 'दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर.'"
रानी और उनके साथियों ने भी एक मील ही का सफ़र तय किया था कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ पहुंचे. जगह थी कोटा की सराय.
लड़ाई नए सिरे से शुरू हुई. रानी के एक सैनिक के मुकाबले में औसतन दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे. अचानक रानी को अपने बायें सीने में हल्का-सा दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी सांप ने उन्हें काट लिया हो.
एक अंग्रेज़ सैनिक ने जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी. वो तेज़ी से मुड़ीं और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार लेकर टूट पड़ीं.
राइफ़ल की गोली
रानी को लगी चोट बहुत गहरी नहीं थी, लेकिन उसमें बहुत तेज़ी से ख़ून निकल रहा था. अचानक घोड़े पर दौड़ते-दौड़ते उनके सामने एक छोटा-सा पानी का झरना आ गया.
उन्होंने सोचा वो घोड़े की एक छलांग लगाएंगी और घोड़ा झरने के पार हो जाएगा. तब उनको कोई भी नहीं पकड़ सकेगा.
उन्होंने घोड़े में एड़ लगाई, लेकिन वो घोड़ा छलाँग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि वो क़रीब क़रीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं.
उन्होंने फिर एड़ लगाई, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. तभी उन्हें लगा कि उनकी कमर में बाई तरफ़ किसी ने बहुत तेज़ी से वार हुआ है.
उनको राइफ़ल की एक गोली लगी थी. रानी के बांए हाथ की तलवार छूट कर ज़मीन पर गिर गई.
उन्होंने उस हाथ से अपनी कमर से निकलने वाले ख़ून को दबा कर रोकने की कोशिश की.
रानी पर जानलेवा हमला
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, 'द वॉरियर क्वीन' में लिखती हैं, "तब तक एक अंग्रेज़ रानी के घोड़े की बगल में पहुंच चुका था. उसने रानी पर वार करने के लिए अपनी तलवार ऊपर उठाई. रानी ने भी उसका वार रोकने के लिए दाहिने हाथ में पकड़ी अपनी तलवार ऊपर की. उस अंग्रेज़ की तलवार उनके सिर पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा फट गया और वो उसमें निकलने वाले ख़ून से लगभग अंधी हो गईं."
तब भी रानी ने अपनी पूरी ताकत लगा कर उस अंग्रेज़ सैनिक पर जवाबी वार किया. लेकिन वो सिर्फ़ उसके कंधे को ही घायल कर पाई. रानी घोड़े से नीचे गिर गईं.
तभी उनके एक सैनिक ने अपने घोड़े से कूद कर उन्हें अपने हाथों में उठा लिया और पास के एक मंदिर में ले लाया. रानी तब तक जीवित थीं.
मंदिर के पुजारी ने उनके सूखे हुए होठों को एक बोतल में रखा गंगा जल लगा कर तर किया. रानी बहुत बुरी हालत में थीं. धीरे-धीरे वो अपने होश खो रही थीं.
उधर, मंदिर के अहाते के बाहर लगातार फ़ायरिंग चल रही थी. अंतिम सैनिक को मारने के बाद अंग्रेज़ सैनिक समझे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है.
दामोदर के लिए...
तभी रॉड्रिक ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, "वो लोग मंदिर के अंदर गए हैं. उन पर हमला करो. रानी अभी भी ज़िंदा है."
उधर, पुजारियों ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी थी. रानी की एक आँख अंग्रेज़ सैनिक की कटार से लगी चोट के कारण बंद थी.
उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उन्हें सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था और उनके मुंह से रुक-रुक कर शब्द निकल रहे थे, "....दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे छावनी ले जाओ... दौड़ो उसे ले जाओ."
बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गईं.
मंदिर के पुजारी ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रख दिया, "इसे रखो... दामोदर के लिए."
रानी का पार्थिव शरीर
रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी थीं. उनकी चोट से ख़ून निकल कर उनके फेफड़ों में घुस रहा था. धीरे-धीरे वो डूबने लगी थीं. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई.
वो बोलीं, "अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए." ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए थे. वहाँ मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन-फ़ानन में कुछ लकड़ियाँ जमा की और उन पर रानी के पार्थिव शरीर को रख आग लगा दी थी.
उनके चारों तरफ़ रायफ़लों की गोलियों की आवाज़ बढ़ती चली जा रही थी. मंदिर की दीवार के बाहर अब तक सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक पहुंच गए थे.
मंदिर के अंदर से सिर्फ़ तीन रायफ़लें अंग्रेज़ों पर गोलियाँ बरसा रही थीं. पहले एक रायफ़ल शांत हुई... फिर दूसरी और फिर तीसरी रायफ़ल भी शांत हो गई.
चिता की लपटें
जब अंग्रेज़ मंदिर के अंदर घुसे तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. सब कुछ शांत था. सबसे पहले रॉड्रिक ब्रिग्स अंदर घुसे.
वहाँ रानी के सैनिकों और पुजारियों के कई दर्जन रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. एक भी आदमी जीवित नहीं बचा था. उन्हें सिर्फ़ एक शव की तलाश थी.
तभी उनकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकीं लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उन्होंने अपने बूट से उसे बुझाने की कोशिश की.
तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ क़रीब-क़रीब राख बन चुकी थीं.
इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, "हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी."
तात्या टोपे
रानी के बेटे दामोदर को लड़ाई के मैदान से सुरक्षित ले जाया गया. इरा मुखोटी अपनी किताब 'हीरोइंस' में लिखती हैं, "दामोदर ने दो साल बाद 1860 में अंग्रेज़ों के सामने आत्म समर्पण किया. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने पेंशन भी दी. 58 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. जब वो मरे तो वो पूरी तरह से कंगाल थे. उनके वंशज अभी भी इंदौर में रहते हैं और अपने आप को 'झाँसीवाले' कहते हैं."
दो दिन बाद जयाजीराव सिंधिया ने इस जीत की खुशी में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में ग्वालियर में भोज दिया.
रानी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और ग्वालियर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया.
नाना साहब वहाँ से भी बच निकले, लेकिन तात्या टोपे के साथ उनके अभिन्न मित्र नवाड़ के राजा ने ग़द्दारी की.
तात्या टोपे पकड़े गए और उन्हें ग्वालियर के पास शिवपुरी ले जा कर एक पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया.

Wednesday, 14 November 2018


भारतीय मूल की पहली हिंदू सांसद तुलसी जिन्होंने गीता हाथ में लेकर ली थी शपथ,
लड़ सकती हैं अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव
तुलसी 2013 से अमेरिका के हवाई राज्य से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट सांसद हैं। वे अमेरिकी संसद में जगह बनाने वाली पहली हिंदू भी हैं। मोदी से प्रभावित भारतवंशी अमेरिकी सांसद तुलसी गबार्ड 2020 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की योजना बना रही हैं। उनके करीबी सूत्रों के हवाले से यह दावा किया गया है।माना जा रहा है कि उनकी दावेदारी पर क्रिसमस के बाद फैसला लिया जा सकता है।
लॉस एंजिलिस में  एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय मूल के अमेरिकी डॉक्टर संपत शिवांगी ने तुलसी का परिचय बताते हुए उन्हें 2020 में राष्ट्रपति पद का दावेदार बताया। इस पर दर्शकों ने काफी देर तक तालियां बजाईं। , खुद तुलसी ने उम्मीदवारी पर कोई बयान नहीं दिया।
- तुलसी गबार्ड पहले ही भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के बीच लोकप्रिय हैं। भारतीय-अमेरिकियों का समूह यहूदी अमेरिकियों के बाद देश का सबसे प्रभावशाली और अमीर ग्रुप माना जाता है। इसी वजह से वे अमेरिका के 50वें राज्य हवाई से लगातार जीत दर्ज करती आ रही हैं।
- चार बार की सांसद तुलसी भारत अमेरिका के संबंधों की बड़ी समर्थक हैं। मोदी पीएम बनने के बाद जब यूएस गए थे तब तुलसी ने उनसे मुलाकात की थी। वो पीएम मोदी के विचारों से काफी प्रभावित भी हैं। सांसद बनने के बाद तुलसी पहली सांसद थीं, जिन्होंने भगवत गीता के नाम पर शपथ ली थी।
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भारत के शक्तिशाली प्रधानमंत्री का
पूरी दुनिया सम्मान कर रही है और
भारत की अदालत उससे राफेल का हिसाब मांग रही हैं..?
यह शर्मनाक है
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने अब देश की जनता में जजों की नीयतों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इतने वर्षों की सुनवाई के बाद भी कोर्ट ने राममंदिर का फैसला 2019 पर टाल दिया. तो वहीँ  वहां महिलाओं को समानता की बात करते हुए सबरीमाला मंदिर पर फैसला तुरंत सुना दिया. लेकिन जब मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की बात आयी तो याचिका को ठुकरा दिया.
 कश्मीरी पंडितों के इंसाफ पर कोर्ट ने कहा ‘अब तो दसियों साल बीत गए अब सबूत नहीं मिलेंगे, और याचिका ठुकरा दी’ लेकिन पीएम मोदी के खिलाफ जिन्हे 2002 में क्लीन चिट मिल चुकी थी उसकी दुबारा जाँच की याचिका को तुरंत मंज़ूर कर लिया
 .इससे पहले कोर्ट ने कहा था उनके पास अभी बिलकुल भी वक़्त नहीं है.अब गुजरात दंगों पर नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट आखिर मिल कैसे गयी, इस पर मी लार्ड सुनवाई करेंगे ?
 5 अक्टूबर 2017 को हाई कोर्ट ने कहा था की गुजरात दंगों की दोबारा कोई जांच नहीं होगी. याचिका में साल 2002 में हुए गोधरा काण्ड के दंगों के सम्बन्ध में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी व अन्यों के खिलाफ विशेष जांच दल द्वारा दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी.
गोधरा काण्ड के आरोपियों मोदी व अन्यों के खिलाफ यह याचिका दिवंगत पूर्व सांसद अहसान जाफरी की पत्नी जाकिया और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने मोदी व अन्यों को दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखने के मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ आपराधिक पुनर्विचार याचिका दायर की थी.जिसे ठुकरा दिया गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब मंज़ूर कर दिया है.
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विवेक अग्निहोत्री 250 करोड़ की लागत से
दिखाएंगे हिन्दुओं का सच्चा इतिहास!
 ‘अर्बन नक्सल्स’ किताब लिखकर वामियों की नाक में दम करने वाले ख्यात लेखक विवेक अग्निहोत्री ने देश को नए इतिहास से रूबरू करवाने का बीड़ा उठाया है। वे 250 करोड़ की लागत से तीन फिल्मों की सीरीज बनाने जा रहे हैं।
  विवेक तीन भागों में बनने जा रही फिल्म बनाने से पहले एक रिसर्च पैनल बनाने जा रहे हैं। इस पैनल में बड़ी संख्या में स्कालर्स, इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, खगोल शास्त्री और मानव विज्ञानी शामिल किये जाएंगे। विवेक का कहना है कि ये प्रोजेक्ट उनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। वे बहुत जल्द ये प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहे हैं।
 यदि ये प्रोजेक्ट सटीक ढंग से आगे बढ़ा तो उनकी कहानियों में भोजशाला सरस्वती मंदिर अवश्य शामिल किया जाएगा।फिल्म की कहानी का आधार में वेदों, रामायण, महाभारत, सिंधु घाटी की सभ्यता से मिली जानकारियां होंगी।  ये एक ऐसा प्रोजेक्ट होगा जिस पर अब तक ऐसी शैली में काम नहीं किया गया है। यदि इसे आज शुरू किया जाए तो सन 2023 तक ये पूरा हो सकता है।
 पहले भाग में ब्रम्हा से बुद्ध के अध्याय , इसके बाद वाले भाग में कहानी बुद्ध से ब्रिटिश राज तक जाएगी। इसके बाद आखिर हिस्से में कहानी ब्रिटिश राज से आज के बुलेट ट्रेन के युग तक आएगी। स्पष्ट है कि पौराणिक काल और मध्य युगीन इतिहास अलग भागों में दिखाए जाएंगे।

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 देशभर की अदालतों में भ्रष्टाचार ने जड़ें जमाई
हैदराबाद हाई कोर्ट के एक अतिरिक्त जिला जज के घर पर ACB की टीम ने बड़ी छापेमारी की है. हैदराबाद में चार स्थानों पर, तेलंगाना के सिरीसिल्ला जिले में तीन स्थानों पर और महाराष्ट्र में दो स्थानों पर छापेमारी की। जज साहब के घर पर अकूत दौलत देख जांच अधिकारियों की भी आँखें फटी रह गयी.जिसमें जज की करीब तीन करोड़ रुपये की संपत्ति सामने आई है।
एसीबी ने रंगा रेड्डी जिले के 14वें अतिरिक्त जिला जज वैद्य वारा प्रसाद के खिलाफ हैदराबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था ,एसीबी के बयान के अनुसार, जज और उनके पारिवारिक सदस्यों के कई बार विदेशी दौरे करते हुए वहां पर भारी भरकम खर्च करने के भी सबूत मिले हैं।
 ये कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि कुछ महीनों पहले दिल्ली हाई कोर्ट के जज को भी घूस लेते हुए गिरफ्तार किया गया था. यही नहीं देशभर की अदालतों में इसी तरह से भ्रष्टाचार ने जड़ें जमाई हुई है और न्यायपालिका में बैठे ऐसे जजों के खिलाफ एक्शन लेने की सख्त जरूरत है
. जिस तरह से न्यायपालिका तानाशाही पर उतर आयी है, उससे ये भी लगने लगा है कि बिना राष्ट्रपति के दखल के शायद अदालतों से भ्रष्टाचार की सफाई नहीं हो पाएगी.
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गांधी परिवार और दूसरी पार्टियों के अन्य नेताओं में एक अंतर देखा गया है, वह यह कि सारी स्वायत्तशासी संस्थाओं से हारने के बाद भी गांधी-नेहरू परिवार को कोर्ट से राहत मिल जाती है। जबकि दूसरे नेता सारी संस्थाओं से बरी होने के बाद भी कोर्ट में आकर दोषी ठहरा दिए जाते हैं। हेराल्ड हाउस मामले में भी एक बार यही देखने को मिला है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हेराल्ड हाउस को सील करने से मना कर, सोनिया और राहुल गांधी को बहुत बड़ी राहत दे दी है।
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रेलवे के AC कोचों से 21 लाख तौलिये, बेडशीट और कंबल चुरा ले गए यात्री
पिछले वित्त वर्ष में देशभर में ट्रेनों के एसी कोचों से करीब 21,72,246 बेडरॉल आइटम गायब हो गए हैं, जिनमें 12,83,415 तौलिए, 4,71,077 चादर और 3,14,952 तकिए का गिलाफ चुरा लिए गए। "गायब हुए इन सामान की कुल कीमत 14 करोड़ रुपये है।" यही नहीं, शौचालयों से मग, फ्लश पाइप और दर्पणों की चोरी की रिपोर्ट भी नियमित तौर पर आती है। चोरी की इन घटनाओं ने उच्च श्रेणी के यात्रियों के लिए बेहतर सुविधा प्रदान करने की कोशिश में जुटी रेलवे के लिए नई समस्या पैदा कर दी है।
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केंद्र सरकार  75 रुपये का विशेष स‍िक्का जारी करेगी. सरकार ने पोर्ट ब्लेयर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ओर से पहली बार तिरंगा फहराने की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर यह सिक्का जारी करने का ऐलान किया.  वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में नोटिफ‍िकेशन जारी किया है.
 75 रुपये के इस सिक्के का वजन 35 ग्राम होगा. यह सिक्का 50 फीसदी चांदी से बना होगा. 40 फीसदी इस पर तांबा लगा होगा और 5-5 फीसदी जिंक और निकल धातु होगी. सिक्के पर सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर भी अंक‍ित होगी. , बोस ने पोर्ट ब्लेयर में 30 दिसंबर, 1943 को पहली बार तिरंगा फहराया था
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प्रयागराज-हल्दिया वॉटर हाईवे के मल्टी मॉडल टर्मिनल का शुभारंभ
जलमार्ग की कुल दूरी 1620 किमी है. यह देश का सबसे लंबा जलमार्ग होगा.  आजादी के पहले इस रूट पर कारोबार होता था. 1986 में इसे सरकार ने दोबारा शुरू करने की योजना बनाई थी, जो पूरी नहीं हो सकी.
 इसके बाद मोदी सरकार इसे साकार कर रही है. यह देश के चार राज्यों को जोड़ेगा. इनमें पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश हैं. इन चार राज्यों में 20 टर्मिनल हैं, जिनमें से 18 फ्लोटिंग हैं. इस जलमार्ग की क्षमता 12 लाख टन है.
 सरकार ने वॉटर-वे एक्ट 2016 के तहत देश में 111 जलमार्गों को नेशनल वॉटर वे घोषित किया गया है. इनकी कुल दूरी 14500 किमी है.इस पूरे जलमार्ग के साकार होने पर एक लाख 60 हजार लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है. यही नहीं, अब गंगा के रास्ते व्यापारिक गतिविधियां जुड़ने से उत्तर भारत और पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार, थाईलैंड और अन्य दक्षिण एशियाई देशों से जुड़ जाएगा.
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 बहुप्रतीक्षित सिग्नेचर ब्रिज का उद्घाटन 
. नॉर्थ इस्ट दिल्ली में यह यमुना नदी पर बना है इस ब्रिज पर 154 मीटर ऊंचा ग्लास बॉक्स तैयार करने की भी योजना है जो पर्यटक स्थल के रूप में लोगों को शहर का ‘बर्ड्स-आई व्यू’ देगा. 
ग्लास बॉक्स से लोग इस ब्रिज के ऊपर से शहर के विस्तृत मनोरम दृश्य का आनंद भी ले सकेंगे. इसके लिए चार लिफ्ट लगाई गई हैं. चार लिफ्ट की कुल क्षमता करीब 50 लोगों को ले जाने की है.  लिफ्ट का दो महीने में परिचालन शुरू हो जायेगा
.सिग्नेचर ब्रिज का प्रस्ताव 2004 में प्रस्तुत किया गया था जिसे 2007 में दिल्ली मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिली थी. कई डेडलाइन मिस होने के बाद मोदी सरकार ने इस पुल का निर्माण कार्य पूरा किया
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क्रिस्टोफर वुड ने आरबीआई के साथ जारी खींचतान में सरकार का समर्थन किया 
हॉन्गकॉन्ग की वित्तीय सेवा कंपनी सीएलएसए के एमडी एवं इक्विटी स्ट्रैटिजिस्ट क्रिस्टोफर वुड ने आरबीआई के साथ जारी खींचतान में सरकार का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक की कठोर मौद्रिक नीति को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की शिकायतें बिल्कुल वाजिब हैं।
मार्केट गुरु क्रिस वुड ने कहा कि वह सरकार के साथ 'सहानुभूति' इसलिए रख रहे हैं क्योंकि उनको लगता है कि महंगाई के प्रमुख मानक संतोषजनक स्तर पर हैं, जिससे नीतियों में ढील की गुंजाइश बनती है। वह मोदी सरकार को 10 में से 8 नंबर देते हैं  वुड ने ये सारी बातें CLSA की तरफ से आयोजित इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस में कहीं। 
उन्होंने आगे कहा, 'नोटबंदी बेहद साहसिक कदम था, बेहद बहादुरी भरा। बैंकरप्ट्सी कोड भी बड़ी बात है, यह बहुत बड़ा सुधार है।' उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी भी कर दी, हालांकि उन्होंने माना कि पार्टी को थोड़ा कम बहुमत हासिल होगा। 
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जातिवाद में बटा ईसाईसमाज
ईसाई Religion में .एक मसीह.एक बाइबल और एक मात्र Religion है... ! पर अजीब बात है कि ...
लैटिन कैथोलिक, सीरियाई कैथोलिक चर्च में प्रवेश करना शाक्त प्रतिबन्ध है यैसा कहें कि प्रवेश नहीं कर सकते।
- दोनों मर्थोमा चर्च में प्रवेश नहीं कर सकते।
- ये तीनों के लिए , Pentecost के चर्च में प्रवेश निशेध है अर्थात प्रवेश नहीं कर सकते और ये चरों को साल्वेशन आर्मी चर्च में भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं है|
इतना हीं नहीं, ये पांचों ,सातों दिन Adventist चर्च में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।
- ये ६ का ६ओं को, रूढ़िवादी चर्च में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।
- अब ये सातों को जैकोबाइट चर्च में प्रवेश करने की अधिकार नहीं है और इसी तरह. ईसाई Religion के 146 जाति मात्र भारत के केरल में हीं है|
मृत्यु पश्चात ..मृत शरीर के साथ भी भेदभाव .//
मृत्यु पश्चात भी मृत शरीर के साथ भी भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता है। बड़े जात के लोगों की मृत शरीर को अच्छी तरह से दफनाते है तो वहीँ छोटे जात की लोगों की मृत शरीर को कहीं भी दफना देते है। और चिल्लाते रहते है की.. एक मसीह, एक बाइबिल, एक Religion (धर्म??)

इसाईयों की कुछ जातीय .....जिन्हें ये वर्ग या फोलोअर कहा कर अपनी जातिवाद को छुपाते है ...
...जैसे ...
1. क्याथोलिक : (जनसंख्या ६ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी और पोप में विश्वास करते है
2. रोमन क्याथोलिक :(जनसंख्या १८ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी और पोप में विश्वास करते है
3. म्याथोडिस्ट : (जनसंख्या २ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी गोड विश्वास करते है
4. इस्टर्न ओर्थोदक्स : (जनसंख्या ५ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, विश्वास करते है
5. ओरियन्टल अर्थोडक्स : (जनसंख्या ५ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
6. एग्लिकन : (१ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
7. प्रोस्टेस्ट्यान्ट : (१० करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
8. प्रेसबेटीजम : (१ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
9. कोग्रेगाशनालिज्म : (२ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
10. अनाबेपिस्ट : (१ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
11. ब्रेथरन : (५० लाख ) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
12. होलीनेस चर्च : (५ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
13. ब्यप्तिस्ट : (१ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
14. स्प्रिच्युअल : बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
15. एपोस्टोलिक : बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
16. पेन्टाकोस्टा : बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
17. चेरीमेस्तिक : बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
18. ज्युयिस क्रिस्चियन : बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
19. एडवानटिस्ट : (२करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
20. जहोवाका साक्षीहरू : (५ करोड) बाइबल, क्राइस्ट, मेरी में विश्वास करते है
ये ईसाईयों की कुछ जातीय हे ............
समय के हिसाब से आगे ये भी बताएँगे की इनका क्या महत्त्व हे इस्लाम मजहब के बारेमे तो कहने की आवश्यकता हीं नहीं|





Wednesday, 31 October 2018

idhar--udhar

असम के कोंग्रेसी नेता अमजात अली सेब की पेटी में हथियार और गोलियां के साथ मस्जिद से हिरासत में। हिंदुओं को मारने का कर रहा था प्लान। पुलिस ने दबोचाचित्र में ये शामिल हो सकता है: भोजनचित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, लोग खड़े हैं

Tuesday, 30 October 2018

vichar

अब तो ऐसा लग रहा है कि कल को सुप्रीम कोर्ट मोदी सरकार से यह सूचना भी मांग देगा कि:
1.. भारत के पास कितने एटम और कितने हाड्रोजन बम है?
2. इनको कँहा-कँहा रखा गया है?
3. अलग-अलग कुल कितनी मिसाइले है, उन्हें कँहा छिपाकर रखा गया है?
4.. किस किस मिसाइल पर कौन कौन से एटम बम फिट किये जायेंगे और उनका निशाना कँहा-, कँहा होगा?
5. वार प्लान की जानकारी दी जाय.
छि छि अपने को तो शर्म महसूस हो रही है कि देश का सुप्रीम कोर्ट इतना अतार्किक तरीका अपनाएगा जिसके कारण देश की प्रतिष्ठा गिरेगी. आखिर वह समझे कि वह सुप्रीम कोर्ट है कठपुतली नही.

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''सीख हम बीते युगो से नए युग का करे स्वागत''
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"ठग्स ऑफ हिंदुस्तान"
इतना लंबा नामरखने की क्या जरूरत थी
सीधे "कांग्रेस" ही रख देते..?
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कांग्रेस की पुरी कोशिश यह है कि अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर बनने से कैसे रोका जाए। सूत्रों के अनुसार से खबर आ रही है कि मंदिर निर्माण को रोकने के लिए दो प्रकार की रणनीति तैयार की हैं।पहला षड्यंत्र की यदि मंदिर निर्माण पर संसद के शीतकालीन अधिवेशन में प्राइवेट बिल लाया जाएगा तो कांग्रेस ने तैयारी कर रखी है कि इस अधिवेशन को भी पिछले बार की तरह राफेल के मुद्दे पर हंगामेदार बना संसद को ठप किया जाए ताकि राम मंदिर प्राइवेट बिल पास न हो सके।
 कांग्रेस का दुसरा षड्यंत्र यह है कि सुप्रीम कोर्ट टाईटील सुट के मामले में यदि श्री रामलला मंदिर के पक्ष में फैंसला देता है तो ठिक दो दिन बाद फिर से एक याचिका डाली जाएगी -कि सुप्रीम कोर्ट यह साबित करें कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था या नही ? किसी को यह लगता है कि मनगढंत बातें है तो फिर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के एक वकील जो कांग्रेस का वरिष्ठ नेता भी रह चुका है उसके दो दिन पहले आजतक चैनल पर किए गये खुलासे से रूबरू हो लें।-- Sanjeet Singh

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हिन्दू मूर्खो की जमात है ?
एक सवाल आया .कि अगर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी लोकसभा चुनाव से पहले राजनीति से संन्यास ले ले .तो भाजपा कितनी लोकसभा सीट जीत पाएगी .और भाजपा के सहयोगी संगठन अपनी पार्टी को कितने राज्यों में चुनावी सफलता दिला पायेगे .. बीजेपी शासन में इनको राम मन्दिर अभी चाहिए --

 अरे - ५०० साल हो गए वहाँ मंदिर के ऊपर मस्जिद बने -- ये लड़ाई तबसे चल रही है -- ७० साल कांग्रेसियों की चप्पल चाटी इन हिन्दुओ ने -इंद्रा हमारी अम्मा बोलकर छाती पीटी -- मगर बीजेपी शासन में इनको राम मन्दिर अभी चाहिए ? यही समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी हर वो काम क्र रहा है जिससे आपन वाले वक्त में इसका मार्ग प्रशस्त होगा -- 
जिस काम को करना सबसे बड़ी जरूरत होती है --उस काम को समझदार अपनी जबान पर कभी नहीं लाते --जबकि हमारे मुर्ख हिन्दू ही मोदी से सवाल पूछते हैं मोदी अयोध्या क्यों नहीं गए? हिन्दू ऐसे रो कलप रहा है जैसे मंदिर बनते ही सब मसले हल हो जायेंगे ?-  वो फिर तोड़ दिया जाएगा -आज अभी जो स्थिति है -- किसी देश के युग परिवर्तन की घटनाये इतनी आसानी से और इतनी जल्दी नहीं होती।
अभी मोदी सरकार ने मूर्खो की बातों से चेष्टा की तो जो स्थिति भारतवर्ष में होगी उसका दोष मोदी सरकार पर मढ़ कर -- बीजेपी को सत्ता चुय्त कर दिया जाएगा --फिर राम मंदिर तो भूल ही जाना --तुम्हारे घरों में व्यक्तिगत मंदिर भी तोड़ दिए जाएंगे -- और मुर्ख हिन्दू ऐसी स्थिति जब तक उसके सामने नहीं आ जायेगी तब तक समझेगा नहीं।  ३७० और कॉमन सिविल कोड पर ध्यान दो वो ज्यादा जरुरी है हमारे लिए।
मन्दिर में मत उलझो--  sidhantsehgal

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प्रधानमंत्री मोदी भारत की औपनिवेशिक संरचना को बदल रहे हैं. ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने दोहन करने वाली संस्थाओं का निर्माण किया, चाहे वह अफ़्रीकी देश हो या भारत. स्वतंत्रता मिलने के बाद अफ्रीकी राजनेता ब्रिटेन की शोषण या दोहन करने वाली नीतियों को जारी रखा, क्योकि इनसे सत्ता पे उनका वर्चस्व बना रहेगा. यह पैटर्न स्वतंत्रता के बाद के अफ़्रीकी देशो जैसे कि घाना, केन्या, जाम्बिया, ज़िम्बाब्वे, सिएरा लेओने इत्यादि में दिखाई देता है.
परिणाम क्या हुआ? ज़िम्बाब्वे को 1980 में स्वतंत्रता मिली. वर्ष 2008 में इस देश के नागरिको की आय 1980 की तुलना में आधी रह गयी है, इससे भी बदतर हालात सिएरा लेओने में हुआ.
कई थिंक टैंक (प्रबुद्ध मंडल) और शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि अफ्रीका के अनेक देशों में अभिजात वर्ग ने स्वतंत्रता के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया और तानाशाही स्थापित कर दी. लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में उन्होंने लोकतंत्र स्थापित करना स्वीकार कर लिया. लेकिन चुनाव करवाने के लिए कुछ वर्षो - 5 से 10 साल - का समय मांग लिया. क्योकि वे चुनाव आयोग, अदालत, ब्यूरोक्रेसी और मीडिया में अपने प्यादो को बैठा कर सत्ता "लोकतान्त्रिक" तरीके से बनाये रखना चाहते थे.
कहने के लिए चुनाव आयोग ने चुनाव करवा दिया, लोगों ने वोट डाल दिए, और जब विपक्ष वोटर लिस्ट और चुनाव में धांधली की शिकायत करता था, तो चुनाव आयोग शिकायतों को खारिज कर देता था. हालत यहां तक हो जाती थी कि निर्वाचन-क्षेत्र से परिणाम कुछ होते थे, चुनाव आयोग घोषणा कुछ और करता था. जब विपक्ष अदालत में चुनौती देता था तो जज किसी तकनीकी कारणों का सहारा लेकर उनकी याचिका को खारिज कर देते थे. अगर विपक्ष न्यायालय और चुनाव आयोग के विरुद्ध प्रदर्शन करते थे, तो सेना और पुलिस नृशंस तरीके से मारपीट और हत्या करके उनके प्रदर्शन को दबा देती थी. सुरक्षाबलों के द्वारा विपक्ष के दमन के समाचार को मीडिया छुपा देता था, विपक्ष के आरोपों को प्रकाशित नहीं करता था तथा केवल अभिजात वर्ग के समर्थन में खबरें छापता था.
थिंक टैंक (प्रबुद्ध मंडल) और शोधकर्ताओं ने इसे "बनावटी लोकतंत्र" का नाम दिया.
अगर हम भारत के सन्दर्भ में देखे, तो पाएंगे कि स्वतंत्रता के बाद सत्ता पे एक अभिजात वर्ग ने कब्ज़ा जमा लिया, एक ही परिवार के लोग या उनके प्रोक्सी शासन करने लगे. यह स्पष्ट होने लगा है कि सोनिया सरकार ने अपने गुर्गों को धीरे-धीरे ब्यूरोक्रेसी, न्यायालय तथा मीडिया में बैठा रखा है.
उदाहरण के लिए कुछ मित्रों ने बताया कि एक वरिष्ठ मी लार्ड जिनके पिता कांग्रेस के नेता थे, कैसे उन्हें वर्ष 2010 में जज नियुक्त किया गया; कैसे वे कुछ ही महीनों में राज्य अदालत के मुख्य पंच हो गए, और फिर वह उससे बड़े न्यायालय में आ गए और प्रगति करते ही गए. सब कुछ सोनिया सरकार के समय में हुआ. मैं सोचकर हैरान हो जाता हूं कि कैसे सोनिया सरकार ने शातिर सोच से 2010 में ही इन महोदय की गोटी फिट कर दी थी जिससे वह एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाएं जहां वे सोनिया, उनके परिवार और सपोर्टरों का समर्थन कर सके. यही हाल मीडिया और ब्यूरोक्रेसी में भी मिलता है जहां कोंग्रेसी गुर्गे फिट हैं.
इस अभिजात वर्ग के शोषण का परिणाम यह हुआ कि अधिकांश भारतीय भीषण गरीबी से जूझते रहे; घर में बिजली नहीं, शौचालय नहीं, पानी नहीं, और डिजिटल युग में इंटरनेट नहीं. ना ही शिक्षा के साधन, ना ही स्वास्थ्य उपलब्ध, ना ही रोजगार, ना ही उनके क्षेत्र में कोई उद्यम, ना ही सड़क, ना ही रेल, ना ही बैंक. जरा सा पेट भरने के लिए उन्हें "माई-बाप" सरकार की तरफ दीन भाव से देखना पड़ता था जो चुनाव के समय एक सूती धोती, ₹500 का नोट और एक पव्वा चढ़ा के उन्हें कृतार्थ कर देता था.
अगर किसी के मन में गलती से भी यह विचार आ जाए कि यह कांग्रेसी और कम्युनिस्ट विलासिता में कैसे रहते हैं जबकि उनकी स्वयं की स्थिति दरिद्रता वाली है, तो उसके लिए इस अभिजात वर्ग ने संप्रदायवाद तथा समाजवाद का नारा ढूंढ रखा था. सेकुलरिज्म का एक जयकारा लगाया, बहुसंख्यको को गरियाया और जनता भाव-विव्हल होकर अपने सारे कष्ट भूल जाती थी.
प्रधानमंत्री मोदी भारत की औपनिवेशिक संरचना को बदल रहे हैं. उस औपनिवेशिक संरचना को जिसे अंग्रेजो ने उस समय के अभिजात वर्ग को सौंप दिया; जिसे अभिजात वर्ग ने अपना लिया और उसी से अपने परिवार और खानदान को राजनैतिक और आर्थिक सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखा.
भारत की मिटटी पर पले-बढ़े, शिक्षित, और उसी धरती पर संघर्ष करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा इस अभिजात वर्ग के रचनात्मक विनाश को समझिये और उन्हें समर्थन दीजिए.
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ये जो मीलौड साहब होते है ना ..इनकी पत्तले चाटने की लत पड चुकी होती है ......
रिटायरमेंट के बाद भी , सिस्टम मे घुसे रहना , अगडम -बगडम कमीशनो , आयोगो, और ट्रिब्यूनल का हिस्सा बने ही रहते है, और आकंठ भ्रष्टाचार मे डूबी रहने वाली नौकरी के बाद भी विलासिता पूर्ण जिदंगी का लालच छोडना इन्हे गवारा नही होता .....
सन् 2010 मे National Green Tribunal बनाया गया था , जिसके वर्तमान चेयरपर्सन है , सुप्रीम कोर्ट मे न्यायमूर्ति रह चुके स्वतंत्र_कुमार .बाकी सदस्यो मे दो किस्म के सदस्य होते है ,
1- Judicial members
2- Expert members .
ये सारे ज्यूडिशियल_मेंबर्स भी मी-लौड साहिब ही होते है . और इनके फैसले सुभान_अल्लाह ..
अब अचानक से इन मी-लौड साहिब की अलौकिक दिव्य दृष्टि कुंडलिनी की मानिंद जाग्रत हो उठी है , बगैर हकीकत को जाने , बगैर मौका मुआएना किये ही , इनको झट से पता चल गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चीनी मिले प्रदूषण फैला रही है . और हुजुर_ए_आला ने चीनी मिलो को बंद करने का तुगलकी फरमान सुना डाला
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चीनी_बैल्ट मे कुल 23 मिले Delhi_NCR मे आती है , जिनको बंद करने की तलवार जून-2017 से ही लटक रही है.सिभांवली चीनी मिल पर तो माननीय मीलौड सहाब पहले ही पाँच करोड का जुर्माना ठोक चुके है .
मगर मी-लौड जी , शायद आप भूल रहे है कि , Sugar bowl कहे जाने वाला ये ऐरिया और इसकी समृद्धि के लिए यहाँ की चीनी मिले मुख्य रूप से जिम्मेदार है .क्योकि गन्ना ही यहाँ की मुख्य Cash crop माना जाता है . ये गन्ने की फसल ,और चीनी उद्योग यहाँ कि Life_Line है .
करोडो हेक्टेयर की तैयार खडी फसल को किसान जलायेगा ? या फिर ट्राॅलिया सीधी आपके बंगले पर भिजवाई जायें ?  फसल तैयार करने मे किसान का खून पसीना , धन , और वक्त लगता है , खेती लाखो लोगो के लिए रोजगार का सृजन करती है . सीधे  और परोक्ष रूप से लगभग सभी लोग कृषि कार्य से जुडे है . अब इस तैयार फसल का क्या करें ? किसी को बच्चो के उज्जवल भविष्य हेतु स्कूलो की फीस  भरनी है , किसी की बेटी की शादी होनी है , किसी को बीमार माँ-बाप का ईलाज कराना है.
मिलो को बंद कर दो , मगर तैयार खडी फसल की कीमत कौन  देगा ? आज मिल बंद करोगे, कल रिफाइनरियाँ , परसो स्टील फैक्ट्रिया , और फिर एक एक करके सारे उद्योग धंधे. खुद को खुदा समझना बंद करो
By Rajeev Kumar