Monday, 20 February 2017

हिंदूओ का वो इतिहास एक रणनीति के तहत छुपाया गया … देखिये आखिर क्या छिपाया गया हमसे ..और क्यों ???

आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है, वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है. हमारे ‘देसी अंग्रेजों’ को यदि सर जान मार्शल प्रमाणित नहीं करते तो हमारे ’बुद्धिजीवियों’को विशवास ही नहीं होना था कि हडप्पा और मोइन जोदडो स्थल ईसा से लगभग 5000 वर्ष पूर्व के समय के हैं और वहाँ पर ही विश्व की प्रथम सभ्यता ने जन्म लिया था……
विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख विश्व की प्राचीनतम् सिन्धु घाटी सभ्यता मोइन जोदडो के बारे में पाये गये उल्लेखों को सुलझाने के प्रयत्न अभी भी चल रहे हैं. जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोइन जोदडो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्हों ने देखा कि वहाँ की गलियों में नर-कंकाल पडे थे। कई अस्थि पिंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थि पिंजरों ने एक दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे. मानों किसी विपत्ति नें उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था। उन नर कंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो – ऐक्टीविटी के चिन्ह थे जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गये थे……

मोहन  जोदडो स्थल के अवशेषों पर नाईट्रिफिकेशन के जो चिन्ह पाये गये थे, उस का कोई स्पष्ट कारण नहीं था. क्यों कि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है….मोइनजोदडो की भूगोलिक स्थिति मोइन जोदडो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है। उस के चारों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में तीन प्रकार की तबाही देखी जा सकती है, जो मध्य केन्द्र से आरम्भ हो कर बाहर की तरफ गोलाकार फैल गयी थी। पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने पाया कि मिट्टी चूने के बर्तनों के अवशेष किसी ऊष्णता के कारण पिघल कर ऐक दूसरे के साथ जुड गये थे।हजारों की संख्या में वहां पर पाये गये ढेरों को पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने काले पत्थरों ‘बलैक -स्टोन्स’ की संज्ञा दी. वैसी दशा किसी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की राख के सूख जाने के कारण होती है। किन्तु मोइन जोदडो स्थल के आस पास कहीं भी कोई ज्वालामुखी की राख जमी हुयी नहीं पाई गयी…..निशकर्ष यही हो सकता है कि किसी कारण अचानक ऊष्णता 2000 डिग्री तक पहुँची, जिस में चीनी मिट्टी के पके हुये बर्तन भी पिघल गये. अगर ज्वालामुखी नहीं था तो इस प्रकार की घटना अणु बम के विस्फोट पश्चात ही घटती है.

महाभारत के आलेख इतिहास मौन है. परन्तु महाभारत युद्ध में महा संहारक क्षमता वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के साथ ऐक एटामिक प्रकार के युद्ध का उल्लेख भी मिलता है…..महाभारत में उल्लेख है कि मय दानव के विमान रथ का परिवृत 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिये लगे थे। देव दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है, जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं। इस युद्ध के वृतान्त से बहुत महत्वशाली जानकारी प्राप्त होती है। केवल संहारक शस्त्रों का ही प्रयोग नहीं, अपितु इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। उस अस्त्र को जब दाग़ा गया तो ऐकविशालकाय अग्नि पुंज की तरह उस ने अपने लक्ष्य को निगल लिया था। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः…..“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ऐक शक्ति – युक्त अस्त्र
प्रक्षेपित किया गया. धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा. वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था, जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया. उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे. बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे. कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए. उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रोंसहित जलधाराओं में डुबा लिया”……


उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप में हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य जैसा दृष्टिगत होता है…..ऐक अन्य वृतान्त में श्री कृष्ण अपने प्रतिदून्दी शल्व का आकाश में पीछा करते हैं। उसी समय आकाश में शल्व का विमान ‘शुभः’ अदृष्य हो जाता है। उस को नष्ट करने के विचार से श्री कृष्ण नें ऐक ऐसा अस्त्र छोडा, जो आवाज के माध्यम से शत्रु को खोज कर उसे लक्ष्य कर सकता था। आजकल ऐसे मिस्साईल्स को हीट- सीकिंग और साऊड-सीकरस कहते हैं और आधुनिक सैनाओं दूारा प्रयोग किये जाते हैं……राजस्थान से भी…प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी सतह पाई जाती है. वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है, जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे…
…‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रकार की अदृष्य ‘इलेक्ट्रानिक फैंस’ तो कोठियों में आज कल पालतु जानवरों को सीमित रखने के लिये प्रयोग की जातीं हैं, अपने आप खुलने और बन्द होजाने वाले दरवाजे किसी भी माल में जा कर देखे जा सकते हैं। यह सभी चीजे पहले आशचर्य जनक थीं, परन्तु आज ऐक आम बात बन चुकी हैं…‘मन की गति से चलने वाले’ रावण के पुष्पक-विमान का ‘प्रोटोटाईप’ भी उडान भरने के लिये चीन ने बना लिया है…..निस्संदेह रामायण तथा महाभारत के ग्रंथकार दो प्रथक-प्रथक ऋषि थे और आजकल की सैनाओं के साथ उन का कोई सम्बन्ध नहीं था। वह दोनो महाऋषि थे और किसी साईंटिफिक – फिक्शन के थ्रिल्लर – राईटर नहीं थे। उन के उल्लेखों में समानता इस बात की साक्षी है कि तथ्य क्या है और साहित्यक कल्पना क्या होती है?
 कल्पना को भी विकसित होने के लिये किसी ठोस धरातल की आवश्यक्ता होती है…हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे. किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना….हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है. पता नहीं, हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं??….
.खुद को भारतीय कहने वालो गर्व करो…..

आज भी जिंदा हैं बजरंग बली, श्रीलंका में  देखे जा चुके हैं कई बार ...

हमारी पौराणिक कहानियों के कई किरदार ऐसे हैं, जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। इन्हीं अमर प्रतापियों में रामभक्त हनुमान का नाम सबसे ऊपर है, जो इंसान न होकर भी इंसानियत के प्रतीक हैं। भरोसे का नाम हैं। प्रतापी योद्धा हैं। भक्ति के अनमोल दूत हैं। प्रेम का दूसरा नाम है। हमारी पौराणिक कथाओं में महावीर हनुमान जी को सीता मैय्या ने अमरता का आशिर्वाद दिया था, जो लगता है सच भी है।
ऐसा इसलिए, क्योंकि सहस्त्र वर्षों से जिस श्रीलंका से हमारे संबंध रहे हैं, उसी श्रीलंका को उलट-पुलट कर बर्बाद कर देने का प्रताप भी महावीर हनुमान के पास है और उसी श्रीलंका के निवासियों ने अब दावा किया है कि उन्होंने महावीर हनुमान को देखा है। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक खबर के मुताबिक श्रीलंका के आदिवासियों ने रामभक्त हनुमान के दर्शन किए। ये भले ही असंभव बात लगती हो, पर इन श्रीलंकाई आदिवासियों के दावों को झुठलाना भी आसान नहीं है।
दरअसल, ट्रिनिटी विश्वविद्यालय के 2 सदस्यीय शोधकर्ताओं के दल ने श्रीलंका का दौरा किया। यहां सेतु हनुमान नाम की एक संस्था है, जो महावीर हनुमान पर शोधकार्य कर रही है। उसी शोधकर्ताओं के दल ने दावा किया है कि महावीर हनुमान श्रीलंका के इन आदिवासियों को प्रत्येक 41 वर्षों में दर्शन देते हैं। वो भी जंगलों में। इन आदिवासियों का दावा है कि अमरता का वरदान पाए महावीर हनुमान प्रत्येक 41 वर्षों में जंगल में आकर सशरीर उन्हें दर्शन देते हैं।
सेतु हनुमान नाम के संगठन का कहना है कि ये आदिवासी आध्यात्मिक रूप से प्रत्येक 41 वर्षों में भक्तिभाव के चरम पर पहुंच जाते हैं, औऱ वो आत्म मंडल नाम का त्योहार हर्षोल्लास से मनाते हैं। इसी त्योहार के मौके पर रामभक्त हनुमान उन्हें दर्शन देते हैं। खास बात तो ये है कि वो लोगों ने बातचीत भी करते हैं और उनकी इच्छाओं को भी जानते हैं। ये सबकुछ एक रजिस्टर में दर्ज होता है। इस रजिस्टर में महावीर हनुमान से पूछे सवाल और उनके जवाब लिखे जाते हैं। 
यहां ‘सेतु हनुमान बोधि’ नाम का मठ है, जो पिदुरुथालगला की पहाड़ियों पर स्थित है। ट्रिनिटी विश्वविद्यालय की टीम यहीं ‘सेतु हनुमान बोधि’ मठ पर रुकी और 4 माह के शोध के पश्चात् वापस अमेरिका चली गई, इस बात से संतुष्ट होकर कि रामभक्त हनुमान प्रत्येक 41 वर्षों में इन आदिवासियों को दर्शन देते हैं और वो अमरता को प्राप्त हैं।

mediya

Retweeted Rohit Sardana (@sardanarohit):
तारेक फतह पर हमले के बाद कथित बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी ये साबित करती है कि अवार्ड वापसी,असहिष्णुता, सेकुलरिज्म,सब मौसमी जुमले ही थे!
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अपने स्तर पर राष्ट्रहित के पक्ष में निर्णय करें और भारत के भाग्य विधाता बनें ...

"सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन में अंतर है 
 राजनीति शाशन तंत्र की प्राप्ति का एक साधन है, उसकी भूमिका मात्र एक संसाधन की है ; सत्ता तंत्र में वह सामर्थ है की वह व्यवस्था बदल सके और इसीलिए जनतंत्र में सर्वाधिक महत्व जनता और जनता की जागृति का है; फिर चाहे सरकार में पदस्थापित व्यक्ति हो या राजनैतिक दल का कार्यकर्त्ता, है तो जनता ही न;
एक उत्प्रेरक कभी प्रक्रिया का परिणाम नहीं होता, हाँ, परिणाम में निर्णायक अवश्य होता है; भविष्य के उत्थान के लिए वर्त्तमान जिस क्रांति की प्रक्रिया को जी रहा है उसमे राजनीतिक दल के रूप में किसी नए व् प्रभावी दल की भूमिका राजनैतिक सुचिता की स्थापना में एक उत्प्रेरक की हो सकती है , वो परिणाम नहीं !
व्यवस्था परिवर्तन में समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है अतः इसके लिए समाज के अंदर तक पहुँच चुके किसी सामजिक संगठन की भी आवश्यकता होगी; संघ के 90 बरस की तपस्या का यही तो प्रारब्ध होगा जब वह समाज और शाशन तंत्र के बीच सेतु का काम करे; जब तक समुद्र पर सेतु नहीं बनेगा , रावण दहन कैसे होगा ?
अब इन बिन्दुओं को उलटे क्रमांक में देखें तो पठकथा और स्पष्ट होगी ;
एक सामाजिक संगठन को शाशन तंत्र वापस जनता तक पहुँचाने के लिए राजनैतिक दल की आवश्यकता थी, इसलिए संघ ने संभवतः इस राष्ट्र की वास्तविक विचारधारा पर आधारित एक राजनीतिक दल को जन्म दिया जिनके अस्तित्व का प्रयोजन इसी व्यवस्था परिवर्तन की प्रक्रिया में एक संसाधन की भूमिका निभाना था ;
आज जब वह दल अपने आप को शाशन तंत्र में पूर्ण बहुमत से स्थापित कर चुकी है तो जैसे अपनी विचारधारा ही नहीं बल्कि अपनी प्राथमिकताएं ही भूल गयी, ऐसे में भला उसकी उपयोगिता कैसे सिद्ध होगी ; यह परिस्थिति बिल्कुल वैसी ही प्रतीत होती है मानो सुग्रीव जैसे किष्किन्धा का राजा बनते ही राम के प्रति अपने वचन को भूल गया हो ;
वर्त्तमान की परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है की स्वयंसेवकों का समर्पण विचारधारा के प्रति हो और सत्ता की आकांक्षा से प्रेरित ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयास का वो विरोध करें जो राष्ट्र और समाज की एकता, अखंडता और सौहार्द को खंडित करता है; फिर प्रयास करने वाला चाहे जो हो।
समय की आवश्यकता ही परिवर्तन के माध्यम से नए को जन्म देती है और जिसकी संवेदनाएं इतनी क्षीण हो जाए जो समय की आवश्यकताओं को महसूस ना करे उसका नाश अवश्यम्भावी है ; यही प्रकृति का नियम है और मृत्यु का कारण भी; आवश्यकताओं की तीव्रता अपना विकल्प तैयार कर लेती है; ऐसे में देखना यह है की क्या सत्ता के मद और आत्मुघ्धता की पराकष्ठा में लीन राजनीतिक दल अपनी गलतियों को स्वीकार कर सुधरने का प्रयास करेगी या फिर अपने निर्णय व कर्म की दिशा से नए विकल्प को राष्ट्रीय राजनीति में और महत्वपूर्ण बना देगी ;
किसी भी परिस्थिति के सन्दर्भ में व्यक्ति का प्रतिउत्तर व्यक्तिगत विवेक का परिचायक होता है, इसलिए वर्त्तमान की परिस्थितियों के सन्दर्भ में भी निर्णय व्यक्तिगत ही होना चाहिए;
मैंने अपना प्रयास पूरी निष्ठां से किया, परिणाम का निर्णय समय पर छोड़ता हूँ! व्यक्तिगत निर्णय ही व्यक्ति की नियति निर्धारित करेगा, यही सिद्धांत सामाजिक व् राष्ट्रीय परिदृश्य में भी मान्य है; अतः अपने स्तर पर राष्ट्रहित के पक्ष में निर्णय करें और भारत के भाग्य विधाता बनें !"

Sunday, 19 February 2017

जम्मू-कश्मीर में बनी एशिया की सबसे लंबी सुरंग, प्रधानमंत्री मोदी मार्च में कर सकते है उद्धाटन ...

जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एशिया का सबसे बड़े टनल के निर्माण का काम देखा जाए तो तकरीबन-तकरीबन पूरा कर लिया गया है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधिकारियो के अनुसार चिनैनी-नाशरी टनल के सिविल वर्क का काम लगभग पूरा हो ही चूका है, और अब सिर्फ टनल के अंदर टेक्निकल और इलेक्ट्रिकल उपकरणों का ट्रायल चल रहा है।
चिनैनी-नाशरी टनल के खुलने से जम्मू-कश्मीर के बीच की दूरी न सिर्फ 30 किलोमीटर कम हो जाएगी पर वो रास्ता भी अब कट जाएगा जो बर्फबारी की के कारण बंद हो जाता था। 300 किलोमीटर लंबे जम्मू-श्रीनगर हाईवे की दूरी 300 की जगह महज 270 किलोमीटर रह जाएगी।
अब यह कार्य पूरा होने के अंतिम पड़ाव पर है। इस सुरंग के शुरू हो जाने के बाद से जम्मू-ऊधमपुर के बाद श्रीनगर जाने का रास्ता और भी ज्यादा रोमांचक और दर्शनीय हो जाएगा।
जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पे तैयार की गई एशिया की सबसे बड़ी हाईवे टनल चिनैनी नाशरी सुरंग को मार्च में यातायात के लिए लगभग खोला जा सकता है। यह बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस सुरंग का उद्घाटन करेंगे।
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हिंदुस्तान के हिन्दुओं ने हिंदुस्तान विभाजन का जितना मूल्य चुकाया है उतना संसार की किसी कौम ने ना चुकाया है और न कभी चुकायेगी पर इसके बदले मॆ हिन्दुओं के हिस्से मॆ आये हिंदुस्तान मॆ भी हिन्दूओं के नसीब मॆ आज भी शांति और सुरक्षा के साथ रहना नहीँ बदा है ,हमें अरबी गुलामों के आतंक के साये हिंदुस्तान मॆ जीना भी है तो बेहतर होगा की या तो 69 साल पहले किया गया बनावटी विभाजन रद्द कर एक बार अंतिम और निर्णायक युद्द लड़ा जाये या आबादी की 100% अदला -बदली हो जाये अन्यथा खोँग्रेसिओ द्वारा छले गये और अल्पसंख्यकवाद की चक्की मॆ पिछले 69 वर्षों से पिसते उतपीडित हिन्दुओं के प्रतिकार का दावानल जब फूटेगा तो उसकी लपटों मॆ अरबी गुलामों की वोट के सौदागरों के साथ पाकिस्तान ,बंगलादेश जैसे हिंदू उत्पीड़क देशों का वजूद भी बचने वाला नहीँ ,इस बात को छदम धर्मनिरपेक्षता के मसीहा और अरबी गुलामों का तुष्टिकरण करने वाले अलमबरदार जितनी जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है
अमेरिका में शाहरुख़ खान की तलाशी हर बार क्यों ली जाती है.
 शाहरूख खान ने हमेशा ही बताया है कि उनको अमेरिका में बार बार इसलिए रोका जाता है कि क्योंकि वे मुसलमान है और उनके नाम के पीछे खान टाइटल लगा है. वे एक मुसलमान है इसलिए अमेरिका उनको जानबूझकर ह्यूमीलेट करता है.लेकिन ये सरासर झूठ है ये महज एक आरोप है. अगर मुस्लिम होने के नाते तलाशी ली जाती है तो बाकि मुस्लिम अभिनेताओं की तलाशी क्यों नही ली जाती? इरफ़ान खान तो बाकयदा हॉलीवुड फिल्मों में काम करके भी आ जाते है. उन्हें तो कभी कोई दिक्कत नही हुई. तो आप सोच रहे होंगे फिर आखिर क्या बात है. चलिए हम आप को बताते हैं कि अमेरिका में शाहरुख़ खान की तलाशी बार बार क्यों ली जाती है.

दरअसल, शाहरूख खान इस खबर पर कभी अपना मुंह नहीं खोलेगे. 90 के दशक में बालीवुड में अंडरवल्र्ड की तूती बोलती थी. बालीवुड के अधिकांश कलाकार उसके संपर्क में थे. और दुबई जाकर अंडरवल्ड डान दाउद इब्राहिम की पार्टियों में न केवल शामिल होते थे बल्कि उसके लिए स्टेज शो भी करते थे. बताया जाता है कि ऐसे ही एक स्टेज शो में शाहरूख खान भी बंबई से दुबई गए थे. जिस शो में शाहरूख खान गए उसको पर्दें के पीछे से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आर्गेनाइज कराया था. ये तो सभी जानते हैं कि दाउद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का आदमी है.
                  इस शो के जरिए जो पैसा आया उसका प्रयोग आतंकवादियों की फंडिग के लिए किया गया. ये बात अमेरिका और इजराइल की खुफिया एजेंसी को मालूम है, क्योंकि बाद में ओसामा बिन लादेन को लेकर अमेरिका को पता चला था कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से ही उसके यहां छिपा हुआ था. यही कारण है कि शाहरूख उस वक्त से ही अमेरिका के रडार पर हैं. भारत भले ही इस प्रकार के मामले को अपने यहां गंभीरता से नहीं ले लेकिन अमेरिका एक बार अपने रडार पर आने के बाद लोगों पर हमेशा ही शक की नजर रखता है. गौरतलब है कि अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड टावर पर हमले के बाद मुसलमानों को शक की नजर से देखा जाता है. इस हमले को जिन लोगों ने अंजाम दिया था उनका संबंध मुस्लिम आतंकवादियों से था. इसलिए जिन लोगों का कभी भी किसी न किसी रूप में आतंकियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध आतंकियों से रहा है अमेरिका ने उनको भी शक के दायरे में ला दिया.यहां तक की शाहरूख खान में मामले में भी ऐसा हुआ जान पड़ता है. इसलिए अमेरिका में शाहरुख़ खान की तलाशी बार बार ली जाती है.