Friday, 21 July 2017


हिन्दूत्व राष्ट्रवाद से चिढ़ गांधी और नेहरू को थी, जिंन्ना को थी, पाकिस्तान को शुरू से है और अब चीन की सरकारी मीडिया को भी हो गई है।
अब राहुल, राबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की आव भगत चीनी दूतावास में हो रही है।
मणिशंकर अय्यर का पाकिस्तानियो और कश्मीर के अलगाव वादी आतंकवादियो से प्यार तो जग जाहिर है।
इन सबकी खिचड़ी सिक्किम-भूटान के डोकलाम मामले में एक साथ पक रही है।
लेकिन हमें देश के कुल 22.50 लाख सुरक्षा बल की ताकत पर गर्व है। चीन, पाकिस्तान और अन्य देश दुश्मनों को करारा जबाब मिलेगा..
उमा शंकर सिंह
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कांग्रेस अपनी खोयी सत्ता को पाने के लिए भारत के किसी भी दुश्मन या दुश्मन देश अथवा आतंकवादी संगठन की मदद ले सकती है .भविष्य में भी ये वर्तमान मोदी सरकार के खिलाफ किसी भी स्तर तक जा सकते है .इस पार्टी ने इसी तरह के काम तब किये थे .जब देश में अटल विहारी बाजपेयी की सरकार थी !!
पवन अवस्थी 
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 चीनी आर्थिक बुलबुला फुटेगा और वह भी सोवियत यूनियन की तरह धराशाई हो जाएगा।
हागकांग बेस इकोनॉमिस्ट के आर्थिक संवाददाता की जीती-जागती रिपोर्ट बता रही है कि चीन की कृषि योग्य भूमि पर 125 मिलियन (12.5 करोड़) परिवारों के लिए 12.5 करोड़ जो हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के फ्लैट्स बने थे उसमे से 85 मिलियन हाउसिंग काम्प्लेक्स फ्लैट 7-8 साल से खाली पड़े है।
इन हाउसिंग कॉम्लेक्सो में जो 1.3 मिलियन मार्केट माल/दुकाने बनी थी उनमे धुल बैठ रही है। क्योंकि उनको खरीदने वाला कोई नही मिल रहा है। बैंको का कर्ज व्याज सहित बढ़ता जा रहा है और पूरी संभावना है कि बैंक अपने को दिवालिया घोषित कर दें।
रिपोर्ट में पेकिंग, शंघाई और अन्य दूसरे बड़े मेट्रो शहरो में रहने वाले 8 करोड़ परिवारों के बारे में जो एक कमरे के मकान या 2 बेड रूम वाले फ्लेट में 3-3 परिवार साथ रहते है का विवरण दिया गया है कि प्रति परिवार की औसत मासिक आय $ 90 डालर प्रति माह है जिसमे से ये 40 डालर तो एक कमरे का किराया देने में खर्च कर देते है इस तरह इनका बमुश्किल खर्चा चलता है। इनके बच्चे गाँव में अपने दादा-दादी या नाना-नानी के पास रहते है क्योंकि ये जिन गलियों में रहते है वंहा बच्चो के खेलने की जगह नही है। बच्चो से मिलने ये साल में एक बार जाते है।
सबसे बुरी हालत तो शंघाई के उस माल की है जो विध्व का सबसे बड़ा माल कहा जाता है लेकिन बन्द पड़ा है क्योंकि उसकी एक भी दूकान अब तक नही बिकी है।
चीन सरकार हर साल 10 नए शहर बसा रही है है लेकिन उनमें बनने वाले फ्लेट 80 से 90% तक खाली पड़े है क्योंकि फ्लेट खरीदने वाले लोग मिल नही रहे है जबकि 650 मिलियन ( 65 करोड़) लोगो के पास रहने को मकान नही है लेकिन उनकी हैसियत मकान खरीद योग्य नही है।

Thursday, 20 July 2017

आयुर्वेद क्या है और कैसे काम करता है !
आयुर्वेद की खोज हमारी ऋषि-मुनियों ने सदियों पहले की थी। उसी के नवीन रूप को आयुर्विज्ञान कहते हैं। दोनों ही चिकित्सा की पद्धति है।
इतिहास पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार संचार की प्राचीनतम् प्रस्तक ऋग्वेद है । विभिन्न विद्वानों ने इसका निर्माण काल ईसा के ३,००० से ५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है । इस संहिता में भी आयुर्वेद के अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है । चरक, सुश्रुत,
काश्यप आदि मान्य ग्रन्थ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है । अतः हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व 3,000 से 50,000 वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का ही है
आयुर्वेद के ऐतिहासिक ज्ञान के संदर्भ में सर्वप्रथम ज्ञान का उल्लेख, चरक मत के अनुसार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ- अग्निवेश का नामोल्लेख है । सर्वप्रथम ब्रह्मा से प्रजापति ने,
प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने,
उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया । च्व्ह्न्न ऋषि का कार्यकाल भी अश्विनी कुमारों का सम्कालैन माना गया है ।आयुर्वेद के विकास मे ऋषि च्व्ह्न्न का अतिमहत्त्वपुर्न् योगदान है फिर भारद्वाज ने आयुर्वेद के प्रभाव से दीर्घ सुखी और आरोग्य जीवन प्राप्त कर अन्य ऋषियों में उसका प्रचार किया । तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश,
भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया । इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण किया- अग्निवेश तंत्र का, जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरक संहिता पड़ा,
जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है
आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार शरीर, इंद्रिय, मन तथा आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। यह चार प्रकार की होती है- सुखायु – किसी प्रकार के शारीरिक या मानसिक विकास से रहित होते हुए, ज्ञान, विज्ञान, बल, पौरुष, यश, परिजन आदि साधनों से समृद्ध व्यक्ति को सुखायु कहते हैं। दुखायु – इसके विपरीत समस्त साधनों से युक्त होते हुए भी, शारीरिक या मानसिक रोग से पीडि़त अथवा निरोग होते हुए भी साधनहीन या स्वास्थ्य और साधन दोनों से हीन व्यक्ति को दु:खायु कहते हैं। हितायु – स्वास्थ्य और साधनों से संपन्न होते हुए या उनमें कुछ कमी होने पर भी जो व्यक्ति विवेक, सदाचार, सुशीलता, उदारता, सत्य, अहिंसा, शांति, परोपकार आदि आदि गुणों से युक्त होते हैं और समाज तथा लोक के कल्याण में व्यस्त रहते हैं उन्हें हितायु कहते हैं।अहितायु – इसके विपरीत जो व्यक्ति अविवेक, दुराचार, क्रूरता, स्वार्थ, दंभ, अत्याचार आदि दुर्गुणों से युक्त और समाज तथा लोक के लिए अभिशाप होते हैं उन्हें अहितायु कहते हैं। इस प्रकार हित, अहित, सुख और दु:ख, आयु के ये चार भेद हैं। वेद शब्द के सत्ता, लाभ, गति, विचार, प्राप्ति और ज्ञान के साधन, ये अर्थ होते हैं, और आयु के वेद को आयुर्वेद कहते हैं। अर्थात जिस शास्त्र में आयु के स्वरूप, आयु के विविध भेद, आयु के लिए हितकारक और अप्रमाण तथा उनके ज्ञान के साधनों का एवं आयु के विभिन्न अवयव शरीर, इंद्रिय, मन, और आत्मा, इनमें सभी या किसी एक के विकास के साथ हित, सुख और दीर्घ आयु की प्राप्ति के साधनों का तथा इनके बाधक विषयों के निराकरण के उपायों का विवचेन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।
कैसे काम करता है आयुर्वेद?
आयुर्वेद आधार है कि ब्रह्मांड (मानव शरीर) सहित ‘के पांच महान तत्वों: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है पर आधारित है. इन तत्वों या शक्तियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, में मनुष्यों द्वारा तीन “दोषों”:
वात: वात संबंधित है और हवा आकाश तत्व. इस ऊर्जा है कि शारीरिक गति के साथ जुड़े श्वास, रक्त परिसंचरण, निमिष सहित काम करता है, को विनियमित है, और दिल की धड़कन है.
पित्त: पित्त से संबंधित है और पानी में आग तत्वों. इस ऊर्जा है कि शरीर के शरीर का तापमान, पाचन, अवशोषण सहित चयापचय प्रणाली,, और पोषण नियंत्रित करता है.
जिसे कफ: कफ संबंधित है और पानी पृथ्वी तत्वों. यह विकास और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार ऊर्जा है. यह शरीर के सभी भागों में पानी की आपूर्ति, त्वचा moisturizes, और प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाए रखता है।

Wednesday, 19 July 2017

अशोक से भी महान वो राजा, जिसे हिंदुस्तान ने भुला दिया

कनिष्क प्रथम. कुषाण वंश का राजा. जिसे कनिष्क महान भी कहते हैं. जिसका साम्राज्य बैक्ट्रिया से लेकर पटना तक फैला था. राजधानी गांधार थी. साम्राज्य में मथुरा और कपीसा जैसे बड़े शहर थे. बौद्ध धर्म को मानता था. उसकी इसी लगन से उस ज़माने का सिल्क रूट निकला था, जिसे चीन आज फिर से बनवा रहा है. 78 ईस्वी में कनिष्क राजा बना था, जिसे शक संवत का पहला साल माना गया. पर इतिहास तो इतिहास है. समय-समय पर बदलता रहता है. कई जगह ये भी कहा जाता है कि कनिष्क 127 ईस्वी में राजा बना था. जो भी हो, ये राजा बड़ा ही प्रतापी था. पर इसके बारे में बात बड़ी कम होती है. अशोक, हर्षवर्धन, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और अकबर में ही लोग उलझ कर रह जाते हैं. पर कनिष्क का साम्राज्य भी इन लोगों के साम्राज्य से कम नहीं था. बल्कि ज्यादा विविधता वाला था.
कनिष्क का साम्राज्य उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर से होते हुए पटना तक था. कश्मीर में उसके नाम पर शहर भी था: कनिष्कपुर. आज भी इस जगह पर एक स्तूप का कुछ हिस्सा है. माना जाता है कि ये स्तूप कनिष्क का था.
कनिष्क ने पूरी कोशिश की थी कि दक्षिण एशिया और रोम के बीच जमीन और समुद्र दोनों से व्यापार हो.
कनिष्क ने अपने नाम से सोने के सिक्के चलवाए थे. सिक्कों पर इंडिया, ग्रीक, ईरान और दूसरी जगहों के देवी-देवताओं की तस्वीर होती थी. मतलब धर्म को लेकर कोई विशेष झंझट नहीं थी
सिक्कों पर ही कनिष्क की तस्वीर मिलती है. लम्बे कोट और ट्राउजर पहने हुए. और लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान ने अंग्रेजों को देख ये सब पहनना सीखा था. हालांकि सिक्कों पर तो तस्वीर में कनिष्क के कंधे से आग-वाग भी निकलती है. वो सच में तो नहीं होता होगा.
फोटो में कनिष्क के पास एक बड़ी सी तलवार रहती है. कई में ये देखा जाता है कि कनिष्क पूरी तैयारी कर रहा है बलि देने के लिए.
कनिष्क की पूरी ड्रेस पहने हुए मूर्ति काबुल के म्यूजियम में थी. पर तालिबान ने म्यूजियम के साथ सब उड़ा दिया.
बहुत सारे सिक्कों पर ग्रीक में लिखा हुआ है: ΒΑΣΙΛΕΥΣ ΒΑΣΙΛΕΩΝ ΚΑΝΗϷΚΟΥ. पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि इसमें ग्रामर की बड़ी गलतियां हैं.
एक जगह ΟΗϷΟ भी लिखा हुआ है. इसका मतलब शिव होता है.
कनिष्क विदेशी था. यहां आकर उसने बौद्ध धर्म अपना लिया था. कश्मीर में मीटिंग भी कराई. उस मीटिंग का हेड वही था. अश्वघोष और वसुमित्र उसके अध्यक्ष बने थे. इसी मीटिंग में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में टूट गया था.
महात्मा बुद्ध की बड़ी स्पेशल मूर्तियां बनीं कनिष्क के वक़्त. 32 प्रतीकों वाली.
कनिष्क ने गंधार कला का विकास किया. ग्रीक, रोमन और इंडियन आर्ट मिलाकर एक बढ़िया फ्यूजन तैयार किया गया.
पेशावर में कनिष्क ने एक बड़ा सा स्तूप बनवाया था. 286 फीट व्यास का. चीन के घुमंतू यात्री लिखते हैं कि ये 600 फीट ऊंचा था. और इस पर तरह-तरह के जेवरात लगे हुए थे. ये एक कई मंजिला इमारत की तरह था.
बुद्धिस्ट किताबों में एकदम अशोक की कहानी की माफिक लिखा गया है कनिष्क के बारे में भी. कि पहले कनिष्क गरम दिमाग का, अड़ियल राजा था. पर बौद्ध धर्म अपनाने के बाद ये शांत दिमाग का उदार राजा बन गया. एक बौद्ध भिक्षु ने अपनी ताकत से कनिष्क को नरक के दर्शन करा दिए थे. कनिष्क डर के रोने लगा. और बदल गया
ये भी लिखा गया है कि बुद्ध ने कनिष्क के बारे में बहुत पहले भविष्यवाणी कर दी थी. कनिष्क ने इस भविष्यवाणी की लाज रखी. इतना काम किया कि उसे राजाओं का राजा कहा गया.


Tuesday, 18 July 2017


1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना वन्देमातरम और उसके बाद जब लोगो ने इसको पढ़ा तो इसका अर्थ पता चला की वन्देमातरम क्या है ! 
आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था अँग्रेजी सरकार के विरोध मे और उन राजा महाराजाओ के विरोध मे जो किसी भी संप्रदाय के हो लेकिन अँग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे ! फिर उसमे उन्होने बगावत की भूमिका लिखी कि अब बगावत होनी चाहिए !विरोध होना चाहिए ताकि इस अँग्रेजी सत्ता को हम पलट सके ! और इस तरह वन्देमातरम को सार्वजनिक गान बनना चाहिए ये उन्होने घोषित किया !

तब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा ,मेरी बात याद रखना एक दिन ये गीत हर नोजवान के होंटो पर होगा और हर क्रांतिवीर कि प्रेरणा बनेगा ! और हम सब जानते है इस घोषणा के 12 साल बाद बंकिम चंद्र चटर जी का स्वर्गवास हो गया ! 
वो पुस्तक पहले बंगला मे बनी बाद मे उसका कन्नड ,मराठी तेलगु ,हिन्दी आदि बहुत भाषा मे छपी ! उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों मे बहुत जोश भरने का काम किया ! उस पुस्तक मे क्या था कि इस पूरी अँग्रेजी व्यवस्था का विरोध करे क्यू कि यह विदेशी है ! उसमे ऐसे बहुत सी जानकारिया थी जिसको पढ़ कर लोग बहुत उबलते थे !और वो लोगो मे जोश भरने का काम करती थी ! अँग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर पाबंदी लगाई कई बार इसको जलाया गया ! लेकिन इस कोई न कोई एक मूल प्रति बच ही
जाती ! और आगे बढ़ती रहती !
1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया एक अंग्रेज़ अधिकारी था उसका नाम था कर्ज़न ! उसने बंगाल को दो हिस्सो मे बाँट दिया !एक पूर्वी बंगाल एक पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए पश्चमी बगाल था हिन्दुओ के लिए !! हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था !
तो भारत के कई लोग जो जानते थे कि आगे क्या हो सकता है उन्होने इस बँटवारे का विरोध किया ! और भंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) (अँग्रेजी सरकार का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो) (अँग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करो) ! और दूसरा हिस्सा था पोजटिव ! कि भारत मे स्वदेशी का निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो !
लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन कहा ! अँग्रेजी सरकार इसको भंग भंग विरोधे आंदोलन कहती रही !लोकमान्य तिलक कहते थे यह हमारा स्वदेशी आंदोलन है ! और उस आंदोलन के ताकत इतनी बड़ी थी !कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने आरके इलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो !करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया ! उयर उसी समय भले हिंदुतसनी कपड़ा मिले मोटा मिले पतला मिले वही पहनना है ! फिर उन्होने कहाँ अँग्रेजी बलेड का ईस्टमाल करना ब्नद करो ! तो भारत के हजारो नाईयो ने अँग्रेजी बलेड से दाड़ी बनाना बंद करदिया ! और इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर लोक मान्य तिलक ने कहा अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो ! क्यू कि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी
भारत मे गुड बनाता था ! तो हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड दाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से अपने घरो को मुकत करो ! तो हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े धोना मुकत कर दिया !फिर उन्होने ने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर तो उन लोगो कि मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो ! तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर दिया !
इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरागी क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया ! तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला ! कि हमारा तो धंधा ही चोपट हो गया भारत मे ! हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग को मंजूर करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए
! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911 मे divison of bangal
act वापिस लिया गया ! इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत !
तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया ! अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है ! तो बहिष्कार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है ! यह 6 साल जो आंदोलन चला इस आंदोलन का मूल मंत्र था वन्देमातरम ! जीतने क्रांतिकारी थे लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपत राय ,विपिन चंद्र पाल के साथ उनकी संख्या !1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा थी ! वो हर कार्यक्रम मे वन्देमातरम गाते थे ! कार्यक्रम कि शुरवात मे वन्देमातरम ! कार्यक्रम कि समाप्ति पर वन्देमातरम !!
उसके बाद क्या हुआ अंग्रेज़ अपने आप को बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे !क्यूंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था ! सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे
हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया।
रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए।
रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” में ये गीत गाया गया।
जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल
पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक
तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया।
सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा
मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। एक दल चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकिदूसरे दल वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार
बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण एक नरम दल और एक गरम दल। बन गया गया !गर्म दल वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।
नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और
वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया।
जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता
और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है।
उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिय और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे,
मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
अभी कुछ दिन पहले भारत सरकार ने एक सर्वे किया था अभी उसकी रिपोर्ट आई है अर्जुन सिंह की मणिस्ट्री मे है ! पूरे भारत के लोगो से पूछा गया कि आपको कौन सा गीत पसंद है ! जन गन मन या वन्देमातरम !! 98.8 %लोगो ने कहा है वन्देमातरम !!
अभी कुछ साल पहले बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है !!
 महात्मा गांधी हिन्दू धर्म को छोड़ना चाहते थे ...
लगभग 150 साल पहले 30 जून 1867 को गुजरात में एक संत का जन्म हुआ, जिन्हें गुजरात के लोग महात्मा गांधी का आध्यत्मिक गुरु मानते थे। जिनका नाम था- संत श्रीमद राजचंद्र। इन्हें कई लोग जैन धर्म का 25 वां तीर्थंकर भी मानते थे।श्रीमद राजचंद्र का जन्म गुजरात में मोरबी के निकट एक गांव में हुआ था। उनका जन्म एक जौहरी परिवार में हुआ था। उनके जन्म का नाम लक्ष्मी नंदन रखा गया था लेकिन चार साल बाद उनके पिता ने उनका नाम बदलकर रायचंद कर दिया। बाद में वे खुद को राजचन्द्र कहने लगे, जो रायचंद का संस्कृत रूपांतरण था। वह उम्र में गांधी से दो वर्ष बड़े थे और गांधी की ही तरह गुजराती बोलते थे।
राजचन्द्र के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अपने पूर्व जन्म की कई बातें याद थी। उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज थी। इसलिए कुछ लोग उन्हें जैन धर्म का 25वां तीर्थंकर मानने लगे थे, लेकिन वो जैन धर्म के मुनि के तौर पर कम, और आध्यत्म का ज्ञान देने वाले संत के रूप में ज्यादा प्रसिद्ध हुए।
श्रीमद राजचंद्र और महात्मा गांधी की मुलाकात
महात्मा गांधी से श्रीमद राजचंद्र की मुलाक़ात साल 1981 में हुई थी। गांधी उनके शास्त्र ज्ञान और अध्यात्म चिंतन की गहरी समझ से अत्यंत प्रभावित हुए। श्रीमद राजचंद्र के धार्मिक ज्ञान और अध्यात्म चिंतन का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में भी किया था। महात्मा गांधी जी ने लिखा है कि ”रायचंद भाई के विचारों ने मेरे आध्यत्मिक जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला।” गांधी जी प्यार से राजचंद्र को रायचंद भाई कहते थे। अपनी अफ्रीका प्रवास के समय गांधी जी ने गुजराती भाइयों को रायचंद की आत्म सिद्धि किताब पढ़ने की सलाह दी थी।
जब महात्मा गांधी अपनाने वाले थे इस्लाम या ईसाई धर्म
महात्मा गांधी के जीवन में एक बार ऐसा दौर आया, जब उनका रुझान ईसाई और इस्लाम धर्म की ओर ज्यादा होने लगा। एक बार तो उनके मन में धर्म परिवर्तन का भी ख्याल आया, लेकिन उन्होंने यह फैसला लेने से पहले श्रीमद राजचंद्र से सलाह लेना उचित समझा। इस पर राजचंद्र ने कहा कि वह धीरज रखे और हिन्दू धर्म का अध्ययन करे।
गांधी ने अपनी किताब में लिखा है- ”उन्होंने मुझे समझाया और कहा कि तुम जिस तरह के धार्मिक विचारों को अपनाना चाहते हो वह सभी हिन्दू धर्म में निहित है। उनके इन विचारों से मेरे हृदय को बहुत शांति मिली, तब आप समझ सकते हो, रायचन्द भाई मेरे लिए क्या महत्व रखते थे।”
*बाबाधाम कोसमनारा की सच्ची कहानी*
हिन्दू शास्त्रों में ऋषि मुनियों की 15-20 साल जंगलो,पहाड़ों और कंदराओं में कठोर तपस्या का वर्णन मिलता है। साधारण तौर पर इसे लोग इसे काल्पनिक कथा कहानियां ही समझते है पर छतीसगढ़ के लोग नही। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला मुख्यालय में 16 फरवरी 1998 से तपस्या में लीन बाबा सत्यनारायण को यह हठ योग करते 19 वर्ष बीत गए। रायगढ़ में गर्मी के मौषम में तापमान 49 डिग्री तक पहुँचता है। ऐसे गर्म मौषम सहित भीषण ठंड और भरी बरसात में बिना छत के हठ योग में विराजे बाबाजी का दर्शन कर लेना ही अपने आप मे सम्पूर्ण तीर्थ है। बाबा कब क्या खाते हैं कब समाधि से उठते हैं किसी को पता नहीं। भोजन करते किसी ने नहीं देखा। जीवन किसी काल्पनिक कथा सा लगता है। कोसमनारा से 19 किलोमीटर दूर देवरी, डूमरपाली में एक साधारण किसान दयानिधि साहू एवं हँसमती साहू के परिवार में 12 जुलाई 1984 को अवतरित हुए बाबाजी बचपन से ही आध्यात्मिक बालक थे। एक बार गांव के ही तालाब के बगल में स्थित शिव मंदिर में वो लगातार 7 दिनों तक तपस्या करते रहे। मॉ बाप और गांव वालों की समझाइश पर वो घर लौटे तो जरूर मगर एक तरह से स्वयम शिव उनके भीतर विराज चुके थे।
14 साल की उम्र में एक दिन वे स्कूल के लिए बस्ता ले कर निकले मगर स्कूल नही गए। बाबाजी सफेद शर्ट और खाकी हाफ पैंट के स्कूल ड्रेस में ही रायगढ़ की ओर रवाना हो गए। अपने गांव से 19 किलोमीटर दूर और रायगढ़ से सट कर स्थित कोसमनारा वो पैदल ही पहुचे। कोसमनारा गांव से कुछ दूर पर एक बंजर जमीन में उन्होंने कुछ पत्थरो को इकट्ठा कर शिवलिंग का रूप दिया और अपनी जीभ काट कर समर्पित कर दी। कुछ दिन तक तो किसी को पता नही चला मगर फिर जंगल मे आग की तरह खबर फैलती चली गई और लोगो का हुजूम वहां पहुचने लगा। कुछ लोगो ने बालक बाबा की निगरानी भी की मगर बाबा जी तपस्या में जो लीन हुए तो आज तक उसी जगह पर हठ योग में लीन है। मां बाप ने बचपन मे नाम दिया था हलधर... पिता प्यार से सत्यम कह कर बुलाते थे। उनके हठयोग को देख लोगो ने नाम दिया बाबा सत्य नारायण..।बाबा बात नही करते .. मगर जब ध्यान तोड़ते हैं तो भक्तों से इशारे में ही संवाद कर लेते है। रायगढ़ की धरा को तीर्थ स्थल बनाने वाले बाबा सत्यनारायण के दर्शन करने वाले भक्तों के लिए अब कोसमनारा में लगभग हर व्यवस्था है किंतु बाबा ने खुद के सर पर छांव करने से भी मना किया हुआ है। आज भी बाबा जी का कठोर तप जारी है....


मुस्लिम अलग कानून मांग रहे हैं.....
कांग्रेसी अलग झंडा मांग रहे हैं.....
वामपंथी पता नही किस की आजादी मांग रहे हैं....
गुनाहगार तो हम हैं साहब जो समान अधिकार मांग रहे हैं
कुमार अवधेश सिंह
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इस लडकी 2 लोगों की हत्या की हैँ
उन दोनों ने इसके साथ रेप किया था
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पिछले तीन वर्षो में देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने विभिन्न देशो के साथ 58 समझौते किये है जिनकी कीमत है 19 अरब डालर ..ये विषय मीडिया के संज्ञान में तब आया जब आज देश की सांसद में मोदी सरकार ने सम्बंधित विषय के मामले में एक सवाल का उत्तर दिया !
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भारत के 350 सैनिक मारे गए - काँग्रेड
कांग्रेस को किसने खबर दी ..मीडिया ने
मीडिया को किसने दी..पाकिस्तान मीडिया ने
पाकिस्तान मीडिया को किसने दी - चीन के किसी मीडिया ने
चीन के मीडिया को किसने खबर दी- चीन के किसी ब्लॉगर ने
.अब समझे ये कनेक्शन...खबरे पकती कहा है और परोसी कहा गई
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बिना एक गोली चलाये जीत जाएगा चीन......
टाइटल पर यकीन नही होगा , लेकिन पूरा लेख पढ़ने के बाद आंखे चौड़ी नही होंगी बल्कि फट जाएंगी।
*चीन की थ्योरी क्या है*
युद्ध की स्तिथि में किसी भी देश का पूरा ध्यान सीमा की सुरक्षा पर रहता है, और अगर उस देश के अंदर भीषण पैमाने पर अराजकता, नागरिकों को असुरक्षित या जान का नुकसान पहुचाया जाए तो किसी भी देश की सरकार प्राथमिकता पहले आंतरिक सुरक्षा और जान माल के नुकसान को रोकने की होती है। इसी थ्योरी पर कई साल पहले से ही चीन काम कर चुका है।
*हुआ कब*
वास्तव में चीन ने इसकी तैयारी 4-5 साल पहले शुरू कर दी थी, जब उसने मिसाइल से उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट करने की क्षमता हासिल कर ली थी। उस मिशन की सफलता पार्टी चल रही थी और पार्टी के दौरान चीनी एक गुप्त मीटिंग में राष्ट्रपति, अत्यंत वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ , वित्त मंत्री एक मिशन की रूपरेखा बना रहे थे कि बिना लड़े ही युद्ध कैसे जीत जा सकता है। इस मिशन का प्रारम्भिक बजट 9 खरब
(900 अरब ) रुपये रखा गया।
*मिशन क्या है*
इस मिशन का उद्देश्य उपग्रह द्वारा संचार तरंगों द्वारा भेजकर किसी विस्फोटक को नियंत्रित और उसमें विस्फोट कराने की क्षमता और तकनीक विकसित करना था, इस तकनीक को चीन ने करीब 2 साल में डेवलप कर लिया था।
*तकनीक का इस्तेमाल कैसे होगा*
इस तकनीक का इस्तेमाल में 2 महत्वपूर्ण चीजें हैँ, पहला विस्फोटक और दूसरा उसका उपग्रह से सतत संपर्क।
काफी बड़े पैमाने पर उपग्रह या संचार तरंगों के संपर्क में रहने वाली एक ही चीज है वो है मोबाइल।
चीन ने मोबाइल की बैटरी में कुछ खुफिया रसायनों का इस्तेमाल किया है और मोबाइल सीक्रेट प्रोग्राम फीड किया है जो कि एक विशेष निर्देश मिलने पर बैटरी को ब्लास्ट कर देगा।
*चीनी रणनीति*
तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित करने के बाद चीन दबाव और लालच देकर मोबाइल निर्माता कंपनियों के मालिकों को मिलाकर इस तकनीक को मोबाइल में डाल के बेच रहा है। जितना ज्यादा mAh की बैटरी उतना ही घातक विस्फोटक प्रभाव।
*आक्रामक बिक्री*
इस रणनीति के तहत चीन की योजना दूसरे देशों में ज्यादा से ज्यादा मोबाइल बेचने की है , ताकि कभी भी बहुत ही ज्यादा पैमाने पर नागरिकों को नुकसान पहुचाया जा सके।
जो high end मोबाइल Samsung, Apple और LG जैसी कंपनियां 25- 30 हजार में दे रही है वो मोबाइल चीनी कंपनियां मात्र 8-10 हजार में इसलिए नही दे रही हैं कि वो बहुत कम मुनाफा कमा रही हैं बल्कि इसलिए दे रही हैं कि उनको चीनी सरकार बहुत तगड़ा पैसा दे रही है।
*रणनीतिक और युद्ध की स्तिथि में प्रभाव*
अब इसके व्यापक प्रभाव पर नजर डालिए। पिछले 3 साल से चीनी कम्पनियो ने सस्ते दाम पर करीब 2 करोड़ मोबाइल भारतीयों की जेब मे डाल दिये हैं। जो उपग्रह संचार से चीनी खुफिया उच्च कार्यालय की निगरानी में हैं।
एक निर्देश देकर चीन 2 करोड़ विस्फोट भारत मे करने की क्षमता पा चुका है। आप खुद सोचिये की चीनी कम्पनियों के सबसे ज्यादा फोकस मोबाइल ही बेचने पर क्यो है ? वो TV , फ्रिज या वासिंग मशीन बेचने पर ज्यादा ध्यान क्यो नही दे रही हैं ? क्योकि उनपर निरंतर संचार उपग्रह से नियंत्रण असम्भव ही है।
अब अगर भारत और चीन का युद्ध होगा और चीन ने मोबाइल्स को विस्फ़ोट कर दिया तो करीब 2 करोड़ लोग घायल हो जाएंगे, और कई मृत्यु भी होंगी।
इतनी बड़ी संख्या में एक साथ कोई भी देश युद्ध के आपातकाल तो क्या नार्मल समय मे भी चिकित्सा सुविधा नही दे पायेगा। इस स्तिथि में देश के नागरिक अराजकता पर आ जाएंगे और सरकार को आंतरिक सुरक्षा और देश की सीमा सुरक्षा की भारी जिम्मेदारी एक साथ आएगी । बाहरी दुश्मन को मारना आसान है पर अपने ही घायल, पीड़ित और उपद्रवी नागरिकों पर सरकार कैसे नियंत्रण कर पायेगी ? इस दोहरे युद्ध मे पहले देश हारेगा फिर नागरिक चीनी गुलाम बन जाएंगे।
अब भी आपको शायद यकीन नही आएगा, शायद अब यकीन आ जाये
3 साल पहले से ही हमेशा चीन में ही निर्मित या असेंबल्ड मोबाइल्स में विस्फोट क्यो हो रहे हैं और कोई भी मोबाइल चीन में क्यो नही फटता है ?
वास्तव में समय समय पर चीन अपने नियंत्रण सिस्टम को चेक करने के लिए कुछ अत्यंत सीमित निर्देश संचारित करता है, जो मोबाइल में विस्फोट के करते हैं।
*क्या चीन ऐसा कर सकता है*
बेशक ।
वो देश जो अपने ही नागरिकों टैंक से भी उड़वा सकता है, वो दुश्मन देश के नागरिकों को अपना हथियार बनाने से भला क्यों पीछे हटने लगा।
ये राज हमेशा राज ही रहता अगर एक उच्च चीनी रक्षा अधिकारी ने नशे की हालत में एक अपनी एक महिला मित्र को उगला न होता, वास्तव में वो महिला चीन विरोधी देश के एक सीक्रेट जासूसी मिशन पर थी।
*अब करना क्या है*
सवाल सरकार से...
: सरकार क्या कर रही है क्यों नही चीनी मोबाइल सहित चीनी सामानों को लाने पर बैन लगा रही है..जैसे चीन ने लगा रखी है ..चीन में दुसरे देशों के सामानों को बैन कर रखा है..यहां तक whatsapp और facebook उसका अपना है टवीटर से लेकर गुगल तक सभी तकनीकी वह अपने देश का चलाता है...सभी उपरोक्त बैन है
सरकार नोट बंदी और जी.एस टी. से बाहर निकले..।।
डी.के.शुक्ला
प्रो.सचिव /जीकेपी
राष्ट्रीय मानवाधिकार एसोसिएशन
Sudhakar Roy
Ki wall post copy

Monday, 17 July 2017


*अंग्रेजी के बारे में आधारहीन कुतर्क*
*पहले आप एक खास बात जाने ! कुल 70 देश है पूरी दुनिया मे जो भारत से पहले और भारत से बाद आजाद हुए हैं भारत को छोड़ कर उन सब मे एक बार सामान्य हैं कि आजाद होते ही उन्होने अपनी मातृ भाषा को अपनी राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया ! लेकिन शर्म की बात है भारत आजादी के 70 साल बाद भी नहीं कर पाया आज भी भारत मे सरकारी स्तर की भाषा अँग्रेजी है !. अब हम आपको बताते है कि अंग्रेजी भाषा में समर्थन में कुछ मुर्ख लोगो द्वारा दिए जाने वाले कुतर्कों की सच्चाई क्या है. उनकी तरफ से निम्न 4 झूठे तर्क दिए जाते है:-*
*01. अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है:-*
*दुनिया में इस समय 204 देश हैं और मात्र 12 देशों में अँग्रेजी बोली, पढ़ी और समझी जाती है। संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। पूरी दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से सिर्फ 3% लोग अँग्रेजी बोलते हैं। इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा चाइनिज हो सकती है क्यूंकी ये दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है और दूसरे नंबर पर हिन्दी हो सकती है।*
*02. अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है:-*
*किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है कि उसमें कितने शब्द हैं और अँग्रेजी में सिर्फ 12,000 मूल शब्द हैं बाकी अँग्रेजी के सारे शब्द चोरी के हैं या तो लैटिन के या तो फ्रेंचके या तो ग्रीक के या तो दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की भाषाओं के हैं। आपने भी काफी बार किसी अँग्रेजी शब्द के बारे मे पढ़ा होगा! ये शब्द यूनानी भाषा से लिया गया है! ऐसी ही बाकी शब्द है!*
*उदाहरण: अँग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सब UNCLE ! चाची, ताई, मामी, बुआ सब AUNTY क्यूंकी अँग्रेजी भाषा में शब्द ही नहीं है। जबकि गुजराती में अकेले 40,000 मूल शब्द हैं। मराठी में 48000+ मूल शब्द हैं जबकि हिन्दी में 70000+ मूल शब्द हैं। कैसे माना जाए अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है? अँग्रेजी सबसे लाचार/पंगु/ रद्दी/ बेईमानी की भाषा है क्योंकि इस भाषा के नियम कभी एक से नहीं होते। दुनिया में सबसे अच्छी भाषा वो मानी जाती है जिसके नियम हमेशा एक जैसे हों, जैसे: संस्कृत। अँग्रेजी में आज से 200 साल पहले This की स्पेलिंग Tis होती थी।*
*अँग्रेजी में 250 साल पहले Nice मतलब बेवकूफ होता था और आज Nice मतलब अच्छा होता है। अँग्रेजी भाषा में Pronunciation कभी एक सा नहीं होता। Today को ऑस्ट्रेलिया में Todie बोला जाता है जबकि ब्रिटेन में Today. अमेरिका और ब्रिटेन में इसी बात का झगड़ा है क्योंकि अमेरीकन अँग्रेजी में Z का ज्यादा प्रयोग करते हैं और ब्रिटिश अँग्रेजी में S का, क्यूंकि कोई नियम ही नहीं है और इसीलिए दोनों ने अपनी- अपनी अलग- अलग अँग्रेजी मान ली।*
*03. अँग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकती:-*
*दुनिया में 2 देश इसका उदाहरण हैं कि बिना अँग्रेजी के भी विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई होटी है- जापान और फ़्रांस। पूरे जापान में इंजीन्यरिंग, मेडिकल के जीतने भी कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं सबमें पढ़ाई” JAPANESE” में होती है, इसी तरह फ़्रांस में बचपन से लेकर उच्चशिक्षा तक सब फ्रेंच में पढ़ाया जाता है। हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकि हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है।*
*ये अँग्रेजी का ही परिणाम है कि हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकि नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है। नोबल पुरस्कार के लिए P.hd, B.Tech, M.Tech की जरूरत नहीं होती है। उदाहरण: न्यूटन कक्षा 9 में फ़ेल हो गया था, आइंस्टीन कक्षा 10 के आगे पढे ही नही और E=hv बताने वाला मैक्स प्लांक कभी स्कूल गया ही नहीं। ऐसी ही शेक्सपियर, तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास आदि के पास कोई डिग्री नहीं थी, इन्होने सिर्फ अपनी मात्र भाषा में काम किया। जब हम हमारे बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से हटकर अपनी मात्र भाषा में पढ़ाना शुरू करेंगे तो इस अंग्रेज़ियत से हमारा रिश्ता टूटेगा।*
*4. English जाने बिना देश का विकास नहीं हो सकता:-*
*क्या आप जानते हैं जापान ने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली? क्यूंकि जापान के लोगों में अपनी मात्र भाषा से जितना प्यार है उतना ही अपने देश से प्यार है। जापान के बच्चों में बचपन से कूट- कूट कर राष्ट्रीयता की भावना भरी जाती है।*
*जो लोग अपनी मातृ भाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं।*
*दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा ‘संस्कृत’ है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका में चल रहा है। नासा ने ‘मिशन संस्कृत’ शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मातृ भाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मातृ भाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मातृ भाषा में ही देता हैं।*
*॥मातृ भाषा पर गर्व करो….. अँग्रेजी की गुलामी छोड़ो॥*
मानष सतपथी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
90 दसको से ज्यादा किये गए त्याग और तपस्या का फल।
प्रधानमंत्री - श्री नरेन्द्र मोदी
राष्ट्रपति - श्री रामनाथ कोविंद
उपराष्ट्रपति - श्री वैंकेया नायडू।
पहली बार देश के तीनों उच्च पदों पर स्वयंसेवक।
Abhishek Singh

Sunday, 16 July 2017

ये देते हैं सबसे ज्यादा नौकरियां
दुनिया भर में सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाली कंपनियां या संस्थान कौन हैं? फोर्ब्स पत्रिका ने 2015 के आंकड़ों के आधार पर एक सूची तैयार की है, जिसमें भारतीय सेना और भारतीय रेल भी शामिल है। लेकिन सबसे ज्यादा नौकरी
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय देता है । 
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय दुनिया का सबसे बड़ा एम्पलॉयर है जिसके कर्मचारियों की संख्या 32 लाख है। इसके बाद चीनी सेना का नम्बर है जो 23 लाख लोगों को नौकरी देती है। 3 सरे नम्बर पर वाल मार्ट है जो 21लाख लोगों को रोजगार में खपाये है। 10 की लिस्ट में मेकडोनल का भी नाम है जो 19 लाख लोगों को रोजगार देता है।
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कश्मीर में शनिवार की सुबह कुछ युवकों ने मस्जिद में लाउड स्पीकर पर कश्मीर की आज़ादी के गीत और नारे चलाने शुरू किये। जिसकी वजह से गुस्साए फौजियों ने मस्जिद को घेर लिया और अन्दर घुसकर लाउडस्पीकरों, खिड़की के शीशों को तोड़ डाला और सबको वहां से बाहर घसीटा।
कम से कम 40 लोग अपनी इस घटिया हरकत के लिए, सेना के गुस्से का शिकार हुए। भारतीय सेना जवानों इतने घुस्से में थे कि अपना आप खो बैठे और उन युवकों की जम के पिटाई की। बताया जा रहा है की उनमें से एक युवक, जो मौके पर लीडर बनने की कोशश कर रहा था, को फौजियों ने पीट पीट कर पिल-पिला कर दिया! वो तो गांव के कुछ बड़े बुज़ुर्ग बचाव के लिए बीच में आ गए, और उन्हें सेना के कहर से बचा लिया।
घायलों को मनिगम के सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र में उपचार के लिए ले जाया गया। लेकिन, सेना के कमांडिंग अधिकारी स्वास्थ्य केंद्र पहुंच गए और डॉक्टर और पैरा टीम को घायलों का उपचार करने के लिए भी धमकाया।
इस कांड में शामिल पुरुष महिलायें भारतीय सेना की इस ताड़ना के ही लायक थे। जो भारत की धरती पर रहते हैं, इस देश का नमक खाते हैं और फिर मस्जिद को साधन के रूप में प्रयोग कर, देश विरोधी नारे बजवा कर अपने आप को नायक सिद्ध करने की कोशिश करते हैं!
राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी कश्मीर की आज़ादी के लिए हिंसक विरोध प्रदर्शन किए गये, जिसमें की CRPF के जवान और कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
कश्मीर की आज़ादी मांगने वाले ये देश-विरोधी शायद भूल गए हैं कि, भारत के इन जवानों ने इनकी रक्षा के लिए अपनी जानें गवाई हैं और आज भी इनकी रक्षा करने के लिए रात-दिन लगे रहते हैं ....
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भारत चीन सीमा विवाद के बीच भारतीय सेना ने डोकलाम में चीनी सड़क को तोड़ दिया है। सेना ने चीन के सैनिकों को वहां से भगा दिया है।
डोकलाम पर कब्जा करने की फिराक में  था लेकिन भारतीय सेना ने उसके इरादों पर पानी फेर दिया। सैनिकों ने चीनी सेना को वहां से खदेड़ते हुए उनकी सड़क तोड़ दी। इससे पहले चीन ने बीते 20 जून को भारतीय सेना के साथ फ्लैग मीटिंग में डोकलाम को अपना इलाका बताते हुए वहां तक सड़क बनाने की जानकारी दी थी। भारत ने तुरंत ही इसका विरोध किया।इसके बाद रोड बनाने वाली कंपनी चीनी सेना के साथ डोकलाम पहुंचने लगी। इस दौरान वहां मौजूद भारतीय सेना ने कड़ा विरोध करते हुए चीनी वाहन रोक दिए थे।
चीन अपने फायदे के लिए एक ही साथ कई तरह की रणनीति इस्तेमाल करता है। डोकलाम में जारी मौजूदा सीमा विवाद में भूटान के सामने चीन द्वारा उसकी सीमा में की जा रही सेंधमारी एकमात्र चुनौती नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय से थिंपू को एक और गंभीर समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है। चीन अपने सोशल नेटवर्किंग ऐप 'वीचैट' की मदद से भूटान में दुष्प्रचार करने और वहां लोगों को गुमराह करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। 

 4 जहर हर रसोई में ,

 संभल जाए .. बहुत पछताने वाले है...

विज्ञापन आधारित खान पान में हुए बदलाव से हमारी स्थिति यहाँ तक पहुच गई है कि सरकार के आंकड़े के अनुसार हर 100 में से 85 लोग किसी ना किसी बीमारी का शिकार है, ये बीमारी हमें कोई देकर नहीं गया है, ये हमने खुद पैदा की है. आपने अपने खानपान में इतने बदलाव कर दिए जिसके अनुकूल हमारा शरीर नहीं है, हमने अपना खाने का सब तरीका बदल दिया, जो चीज विज्ञापन में दिखाई जाती है वो अपनी रसोई में ले आए. जिससे आपकी सेहर का सत्यनाश हो गया.
जानिए उन 4 जहरों के बारे में जो आपकी रसोई में है
1- आयोडीन नमक (समुद्री नमक)- आयोडीन के नाम पर हम जो नमक खाते हैं उसमें कोर्इ तत्व नहीं होता। आयोडीन और फ्रीफ्लो नमक बनाते समय नमक से सारे तत्व निकाल लिए जाते हैं और उनकी बिक्री अलग से करके बाजार में सिर्फ सोडियम वाला नमक ही उपलब्ध होता है जो आयोडीन की कमी के नाम पर पूरे देश में बेचा जाता है, जबकि आयोडीन की कमी सिर्फ पर्वतीय क्षेत्रों में ही पार्इ जाती है इसलिए आयोडीन युक्त नमक केवल उन्ही क्षेत्रों के लिए जरुरी है। सेंधा और काला नमक ही खाये। आयोडीन नमक उच्च रक्तचाप, थाइराइड, लकवा और नपुं-सकता का प्रमुख कारण है।
दुनिया के 56 देशों ने अतिरिक्त आओडीन युक्त नमक 40 साल पहले ban कर दिया अमेरिका मे नहीं है जर्मनी मे नहीं है फ्रांस मे नहीं ,डेन्मार्क मे नहीं , यही बेचा जा रहा है डेन्मार्क की सरकार ने 1956 मे आओडीन युक्त नमक बैन कर दिया क्यों ?? उनकी सरकार ने कहा हमने मे आओडीन युक्त नमक खिलाया !(1940 से 1956 तक ) अधिकांश लोग नपुंसक हो गए ! जनसंख्या इतनी कम हो गई कि देश के खत्म होने का खतरा हो गया ! उनके वैज्ञानिको ने कहा कि आओडीन युक्त नमक बंद करवाओ तो उन्होने बैन लगाया ! और शुरू के दिनो मे जब हमारे देश मे ये आओडीन का खेल शुरू हुआ इस देश के बेशर्म नेताओ ने कानून बना दिया कि बिना आओडीन युक्त नमक बिक नहीं सकता भारत मे !! वो कुछ समय पूर्व किसी ने कोर्ट मे मुकदमा दाखिल किया और ये बैन हटाया गया !
अंत आपके मन मे एक और सवाल आ सकता है कि ये सेंधा नमक बनता कैसे है ??
तो उत्तर ये है कि सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है !! पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’ ,लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है ! जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है !! वहाँ से ये नमक आता है ! मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मददरूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़्ते हैं। तों अंत आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले ! काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे !! क्यूंकि ये प्रकर्ति का बनाया है ईश्वर का बनाया हुआ है !! और सदैव याद रखे इंसान जरूर शैतान हो सकता है लेकिन भगवान कभी शैतान नहीं होता !!
2- रिफाइंड तेल(सोयाबीन तेल,पाम तेल, डालडा और राइस ब्रान)-  क्या आपने कभी विचार नहीं किया ?? कि आखिर जिस Refine तेल से आप अपनी और अपने छोटे बच्चों की मालिश नहीं कर सकते, जिस Refine को आप बालों मे नहीं लगा सकते, आखिर उस हानिकारक Refine तेल को कैसे खा लेते हैं ?? आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइन तेल के बारे में जानता नहीं था, ये पिछले 20 -25 वर्षों से हमारे देश में आया है | कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं | इन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जम कर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात को, तब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू किया | डोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइन तेल लिखना शुरू किया. यदि आपकी की जलवायु ना ज्यादा गर्म है और ना ज्यादा ठण्ड है तो सरषों और मूंगफली के सुद्ध तेल ही खाये जो आपके सामने निकले डब्बा बंद तेल ना खाएं। और आप जहाँ रहते हैं वहां गर्मी ज्यादा है तो नारियल तेल और जहाँ आप रहते हैं वहां ठण्ड ज्यादा है तो तिल और जैतून का तेल ही खाएं। रिफाइंड तेल नपुं-सकता और हृदयघात का प्रमुख कारण है।
3- चीनी(शुगर) – चीनी जहर है क्योकि उसके बनाए में बहुत ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल होता है, जो आपके शरीर में चले तो जातेहै लेकिन बाहर नहीं आ पाते.  देशी गुड़ ही खाएं, क्योकि गुड अमृत है, इसे प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है, इसको बनाने में दूध का प्रयोग होता है, ना कि किसी जहरीले केमिकल का.
4- एल्युमीनियम के बर्तन( नॉन स्टिक और प्रेशर कुकर) – हमारे देश में एल्युमिनियम के बर्तन 100-200 साल पहले ही ही आये है । उससे पहले धातुओं में पीतल, काँसा, चाँदी के बर्तन ही चला करते थे और बाकी मिट्टी के बर्तन चलते थे । अंग्रेजो ने जेलों में कैदिओं के लिए एल्युमिनिय के बर्तन शुरू किए क्योंकि उसमें से धीरे धीरे जहर हमारे शारीर में जाता है । एल्युमिनिय के बर्तन के उपयोग से कई तरह के गंभीर रोग होते है । जैसे अस्थमा, बात रोग, टी बी, शुगर, दमा आदि, सबसे अच्छे बर्तन मिटटी,कांशा,पीतल,स्टील और लोहे के बर्तन में ही खाना पकाएं और खाएं। कुकर तो सोने का भी ख़राब है। एल्युमीनियम और प्रेशर कुकर डाइबिटीज कैंसर जेसे 48 रोगों का कारण है। चीनी नामक जहर 103 गम्भीर रोगों का कारण है।