Thursday, 23 November 2017

must must listen to full speech by radha rajan

https://www.facebook.com/noconversion/videos/2053287614951421/

यह है सोशल मीडिया की शक्ति

विद्या नाम की एक महिला ने थंपनूर रेलवे स्टेशन के पास एक बूढ़ी महिला को देखा जो अपनी भूख को शांत करने के लिए झाड़ियों से कुछ खा रही थी।
उस महिला ने पास के चाय-स्टाल से खाना लिया और उसे बूढ़ी औरत को दे दिया, और जब वह खा रही थी, तब सवाल पूछा, वह कौन थी और वह यहाँ क्या कर रही थी?
जवाब ने उसे चौंका दिया...! पुरानी महिला वत्सा थी और वह मलप्पुरम में एक पब्लिक स्कूल में गणित की शिक्षक थी।
विद्या ने फेसबुक पर बूढ़ी महिला की फोटो पोस्ट की।
पब्लिक स्कूल के कई छात्र ने पोस्ट देखा और जवाब दिया कि वे तुरंत अपनी शिक्षक को मलप्पुरम में लाने के लिए त्रिवेंद्रम आएंगे और उनकी अच्छी देखभाल करेंगे। स्कूल के पुराने छात्र एक रेलगाड़ी से अगले दिन त्रिवेन्द्रम रेलवे स्टेशन पर उतरे और उन्होंने अपनी पुरानी शिक्षक को अपने साथ वापस ले लिया।
यह है सोशल मीडिया की शक्ति ।

इसलिए सब हिन्दू है। संघ सबको हिन्दू मानता है।

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Wednesday, 22 November 2017




मुसलमानों का सबसे ताकतवर हथियार ‘अल-तकिया’

गजवा-ए-हिन्द (हिन्दुस्तान को मुग्लिस्तान बनाना मकसद)

● लव जिहाद -लव जिहाद या रोमियो जिहाद एक षड्यंत्र है जिसके तहत युवा मुस्लिम लड़के और पुरुष गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ प्यार का ढोंग करके उनसे शादी करके उनका धर्म-परिवर्तन करते हैं

● भक्ती जिहाद- यानी मंदिरॊं का इस्लामी करण करना जिसमें इस्लामिक व्यक्तियॊं को या फिर सूफी लोगों को भगवान का दर्जा देकर उसको संत बनाना और हिन्दुओं को भ्रमित किया जाता है।

● ब्लोगिंग जिहाद- सॊशियल मीडिया, टी .वी .सीरियल और फिल्मों के माध्यम से इस्लाम का प्राचार और प्रसार किया जाता है। इसके अलावा हिन्दू धर्म में कमियां निकाल कर लोगों को इस्लाम के प्रति आकर्षण पैदा करने का प्रयत्न किया जाता है।

● भाषा जिहाद- इसमें हिन्दी और संस्कृत भाषा को कम महत्व दिया जाता है और उर्दू या अरेबिक भाषा को अधिक महत्व दिया जाता है। आजकल के हिन्दी गानों में इसका निदर्शन मिल सकता है। आज कल सारे गानें और नगमें उर्दू में हि लिखी जाती है। और उनके बॊल अल्लाह, मौला, खुदा इसी प्रकार के होते हैं।इसमे न जाने कौन कौन और किस किस तरह के सैकड़ों जिहाद भी शामिल है।

–> अल- तकिया के अनुसार यदि इस्लाम के प्रचार , प्रसार अथवा बचाव के लिए किसी भी प्रकार का झूठ, धोखा , द्वेष अपने वादे से मुकर जाना काफिरों (हिन्दू) का विस्वास जितना और उनको घात लगाकर पीछे से हमला करना यहाँ तक की कुरआन की झूठी कसमे खाना – सब धर्म स्वीकृत है । और ये इनके अल्लाह का फरमान है

–> इस प्रकार अल – तकिया ने मुसलामानों को सदियों से बचाए रखा है ।

मुसलमानों के विश्वासघात के अन्य उदाहरण

1 -मुहम्मद गौरी ने 17 बार कुरआन की कसम खाई थी कि भारत पर हमला नहीं करेगा, लेकिन हमला किया ।

2 -अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तोड़ के राणा रतन सिंह को दोस्ती के बहाने बुलाया फिर क़त्ल कर दिया ।

3 -औरंगजेब ने शिवाजी को दोस्ती के बहाने आगरा बुलाया फिर धोखे से कैद कर लिया ।

4 -औरंगजेब ने कुरआन की कसम खाकर श्री गोविन्द सिंघ को आनद पुर से सुरक्षित जाने देने का वादा किया था. फिर हमला किया था।

5 -अफजल खान ने दोस्ती के बहाने शिवाजी की हत्या का प्रयत्न किया था ।

6-मित्रता की बातें कहकर पाकिस्तान ने कारगिल पर हमला किया था ।

सावधान रहें और अपने आस पास नजर बनाएं रखें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बनाई गई एक लघु फ़िल्म : स्वयमेव मृगेन्द्रता

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कैंसर

अगर किसी को कैंसर हो जाये तो ज्यादा खर्चा मत करिए ..देसी गाय  इसमें भी विशेष हैं काली गाय और ये ध्यान रखे के गाय गर्भवती ना हो, बेहतर होगा आप वो गाय का मूत्र लीजिये जो अभी छोटी बछड़ी हैं। अब इस एक गिलास गौ मूत्र में 1 चम्मच हल्दी डाल कर इसको धीमी आंच तक 10 मिनट तक उबाले, उबलने के बाद आप इसको रूम टेम्परेचर पर ठंडा कर ले, बस दवा तैयार। इसको छान कर आप किसी कांच की बोतल में डाल कर रख ले। अब हर रोज़ सुबह खली पेट और रात को सोते समय बिलकुल आखिर में और दिन में कम से कम 3 बार 10-10 मिली ले। 
 निरंतर अपना चेक अप करवा ले आप देखेंगे के आपकी कैंसर की बीमारी चमत्कारिक रूप से सही हो रही हैं।
झांसी की रानी ने कहा था अंतिम क्षणों में 
अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए,
जला दो🔥
अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.
उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.
उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में.
जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में शरण ली थी.
रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था.
गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग के कार्यकाल में ही 1857 का गदर हुआ था
'रानी महल' में लक्ष्मी बाई
लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, 'मुफ़ुस्सलाइट' निकाला करते थे.
लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन उन्हें पसंद नहीं करता था, क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश किया करते थे.
जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.
उनको झाँसी लाने के लिए रानी ने अपने दीवान और एक अनुचर को आगरा रवाना किया.
अनुचर के हाथ में बर्फ़ से भरी बाल्टी थी जिसमें पानी, बियर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी हुई थीं. पूरे रास्ते एक नौकर लैंग को पंखा करते आया था.
झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर 'रानी महल' लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.
मलमल की साड़ी
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया.
लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, 'द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.'
किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, 'रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थी और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी.उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था.. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.'
रानी के घुड़सवार
बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो खुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन जब जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर हमला कर देते थे. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भंग कर दें.
कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे.
उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की अत्यंत निपुण ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली. इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था.
इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे. इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गई.
उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई.
ब्रिटिश सैनिक
उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी किताब 'रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया' में लिखा, "अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, 'मेरे पीछे आओ.' पंद्रह घुड़सवारों को एक जत्था उनके पीछे हो लिया. वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग गए. अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, 'दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर.'"
रानी और उनके साथियों ने भी एक मील ही का सफ़र तय किया था कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ पहुंचे. जगह थी कोटा की सराय.
लड़ाई नए सिरे से शुरू हुई. रानी के एक सैनिक के मुकाबले में औसतन दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे. अचानक रानी को अपने बायें सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी सांप ने उन्हें काट लिया हो.
एक अंग्रेज़ सैनिक ने, जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी. वो तेज़ी से मुड़ी और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार से टूट पड़ी.
राइफ़ल की गोली
रानी को लगी चोट बहुत गहरी नहीं थी, लेकिन उसमें बहुत तेज़ी से ख़ून निकल रहा था. अचानक घोड़े पर दौड़ते-दौड़ते उनके सामने एक छोटा सा पानी का झरना आ गया.
उन्होंने सोचा वो घोड़े की एक छलांग लगाएंगी और घोड़ा झरने के पार हो जाएगा. तब उनको कोई भी नहीं पकड़ सकेगा.
उन्होंने घोड़े में एड़ लगाई, लेकिन वो घोड़ा छलाँग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि वो करीब करीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं.
उन्होंने फिर एड़ लगाई, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. तभी उन्हें लगा कि उनकी कमर में बाई तरफ़ किसी ने बहुत तेज़ी से वार हुआ है.
उनको राइफ़ल की एक गोली लगी थी. रानी के बांए हाथ की तलवार छूट कर ज़मीन पर गिर गई.
उन्होंने उस हाथ से अपनी कमर से निकलने वाले खून को दबा कर रोकने की कोशिश की.
रानी पर जानलेवा हमला
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, 'द वारियर क्वीन' में लिखती हैं, "तब तक एक अंग्रेज़ रानी के घोड़े की बगल में पहुंच चुका था. उसने रानी पर वार करने के लिए अपनी तलवार ऊपर उठाई. रानी ने भी उसका वार रोकने के लिए दाहिने हाथ में पकड़ी अपनी तलवार ऊपर की. उस अंग्रेज़ की तलवार उनके सिर पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा फट गया और वो उसमें निकलने वाले खून से लगभग अंधी हो गईं."
तब भी रानी ने अपनी पूरी ताकत लगा कर उस अंग्रेज़ सैनिक पर जवाबी वार किया. लेकिन वो सिर्फ़ उसके कंधे को ही घायल कर पाई. रानी घोड़े से नीचे गिर गई.
तभी उनके एक सैनिक ने अपने घोड़े से कूद कर उन्हें अपने हाथों में उठा लिया और पास के एक मंदिर में ले लाया. रानी तब तक जीवित थीं.
मंदिर के पुजारी ने उनके सूखे हुए होठों को एक बोतल में रखा गंगा जल लगा कर तर किया. रानी बहुत बुरी हालत में थी. धीरे धीरे वो अपने होश खो रही थी.
उधर, मंदिर के अहाते के बाहर लगातार फ़ायरिंग चल रही थी. अंतिम सैनिक को मारने के बाद अंग्रेज़ सैनिक समझे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है.
दामोदर के लिए...
तभी रॉड्रिक ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, "वो लोग मंदिर के अंदर गए है. उन पर हमला करो. रानी अभी भी ज़िंदा है."
उधर, पुजारियों ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी थी. रानी की एक आँख अंग्रेज़ सैनिक की कटार से लगी चोट के कारण बंद थी.
उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उन्हें सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था और उनके मुंह से रुक रुक कर शब्द निकल रहे थे, "....दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे छावनी ले जाओ... दौड़ो उसे ले जाओ."
बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गई.
मंदिर के पुजारी ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रख दिया, "इसे रखो... दामोदर के लिए."
रानी का पार्थिव शरीर
रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी थीं. उनकी चोट से खून निकल कर उनके फेफड़ों में घुस रहा था. धीरे धीरे वो डूबने लगी थीं. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई.
वो बोली, "अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए." ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए थे. वहाँ मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन फानन में कुछ लकड़ियाँ जमा की और उन पर रानी के पार्थिव शरीर को रख आग लगा दी थी.
उनके चारों तरफ़ रायफलों की गोलियों की आवाज़ बढ़ती चली जा रही थी. मंदिर की दीवार के बाहर अब तक सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक पहुंच गए थे.
मंदिर के अंदर से सिर्फ़ तीन रायफलें अंग्रेज़ों पर गोलियाँ बरसा रही थीं. पहले एक रायफ़ल शांत हुई... फिर दूसरी और फिर तीसरी रायफ़ल भी शांत हो गई.
चिता की लपटें
जब अंग्रेज़ मंदिर के अंदर घुसे तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. सब कुछ शांत था. सबसे पहले रॉड्रिक ब्रिग्स अंदर घुसा।
वहाँ रानी के सैनिकों और पुजारियों के कई दर्जन रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. एक भी आदमी जीवित नहीं बचा था. उन्हें सिर्फ़ एक शव की तलाश थी.
तभी उसकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकीं लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उसने अपने बूट से उसे बुझाने की कोशिश की.
तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ करीब करीब राख बन चुकी थीं.
इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टेन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, "हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी."
तात्या टोपे
रानी के बेटे दामोदर को लड़ाई के मैदान से सुरक्षित ले जाया गया. इरा मुखोटी अपनी किताब 'हिरोइंस' में लिखती हैं, "दामोदर ने दो साल बाद 1860 में अंग्रेज़ों के सामने आत्म समर्पण किया. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने पेंशन भी दी. 58 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. जब वो मरे तो वो पूरी तरह से कंगाल थे. उनके वंशज अभी भी इंदौर में रहते हैं और अपने आप को 'झाँसीवाले' कहते हैं."
दो दिन बाद महादजी सिधिंया ने इस जीत की खुशी में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में ग्वालियर में भोज दिया।
रानी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और ग्वालियर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया।
नाना साहब वहाँ से भी बच निकले लेकिन तात्या टोपे के साथ उनके अभिन्न मित्र नवाड़ के राजा ने ग़द्दारी की 
तात्या टोपे पकड़े गए और उन्हें ग्वालियर के पास शिवपुरी ले जा कर एक पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया ।
-दीपक सैगल

Tuesday, 21 November 2017

मेरे हिमालय के पासबानो। गुलिस्तां के बागबानों।
उठो सदियों की नींद तजके तुम्हे वतन फिर पुकारता है। 


जीवन भर हिन्दुओ के खिलाफ किया जिहाद, हर फिल्म के जरिये हिन्दुओ के खिलाफ उगला जहर और इतनी चालाकी से हिन्दुओ के खिलाफ जिहाद किया की हिन्दुओ को पता भी नहीं चला की किस चालाकी से उनके खिलाफ जिहाद किया जा रहा है, उनके मन में हीन भावना डाली जा रही है और हिन्दु धर्म की कब्र खोदी जा रही है
हम बात कर रहे है, जावेद अख्तर की जो अपनी बीवी शबाना आज़मी के साथ मिलकर इन दिनों टीवी मीडिया में खूब सेकुलरिज्म और ज्ञान की बात कर रहा है, और यहाँ तक की ये भी कह रहा है की, हम महान अकबर के देश में पैदा हुए, दरअसल इन जिहादियों ने मिलकर अपने लेखन के जरिये भारतीय समाज के सामने पहले अपने अजेंडे के मुताबिक चीजें परोसी, फिर पूरी एक पीढ़ी वही पढ़कर देखकर बड़ी हुई, और अब ये अकबर को महान बताएँगे, तो वो पीढ़ी इनकी हां में हां मिलाएगी ही, बहुत ही चालाकी से हिन्दू समाज के खिलाफ जावेद अख्तर जैसे बड़े जिहादियों ने जिहाद किया है
एक तो ओसामा बिन लादेन है, जो सीधा जिहाद करता है, पर वो इतना खतरनाक नहीं है जितना खतरनाक सांस्कृतिक जिहाद है, जिसे जावेद अख्तर जैसे लोग करते है, हम आपको कुछ उदाहरण देकर समझाते है, आप आसानी से समझ सकेंगे
फिल्म शोले का लेखक भी यही जावेद अख्तर है, जो अपने कहानी में बताता है की वीरू कितना बड़ा लड़कीबाज होता है की, मंदिर में जाकर लड़की छेड़ता है, शिव जी के भी इस जावेद अख्तर ने डायलॉग लिखे, हिन्दू तो बस मंदिर यही करने जाते है, वहीँ इस फिल्म में अब्दुल चाचा जो की इतने बड़े ईमान के पक्के होते है, इतने बड़े नमाज़ी होते है की बेटे की लाश छोड़ मस्जिद के तरफ जाने लगते है क्यूंकि भैया उनके नमाज़ का टाइम हो गया था, एक हिन्दू है जो मंदिर में लड़की छेड़ता है, वहीँ एक मुसलमान जो इमान का पक्का लाश छोड़ भी नमाज़ पढता है
"शान" नाम की फिल्म का लेखक भी जावेद अख्तर ही होता है, उसमे अमिताभ बच्चन और शशि कपूर साधु बनकर लोगों को बेकूफ़ बनाते है, वहीँ मज़हर खान अल्लाह के नाम पर लोगों का साथ देता है, नेकी करता है
दीवार फिल्म का लेखक भी जावेद अख्तर ही था, इस फिल्म में 786 का प्रचार, हिन्दू विजय की जान 786 का छल्ला बचा लेता है, अमिताभ बच्चन वाली हेरा फेरी में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना साधु बनकर लोगों लुटते है, हर फिल्म का यही कहानी, हिन्दू लुटेरा लड़कीबाज, वहीँ मुस्लिम ईमान का पक्का, हिन्दुओ को बताया जाता है की 786 का छल्ला रखो, बहुत पवित्र है और तुम्हारी जान भी बचा लेगा, हिन्दुओ के खिलाफ ताउम्र जिहाद किया है जावेद अख्तर ने, और इतनी चालाकी से जिहाद किया है की हिन्दुओ को पता भी नहीं चला की उनके खिलाफ जिहाद किया जा रहा है
हिन्दुओ में हीन भावना डालकर उनके इस्लाम के प्रति सॉफ्ट बनाना, और पूरी एक पीढ़ी ही ये सब देखकर पढ़कर बड़ी हुई है, और इसी कारण तो इस देश में आज हिन्दू गाय का मांस भी खाने का समर्थन करते है, हिंदूवादियों को हिन्दू ही आतंकी बताते है, भैया हिन्दू समाज के खिलाफ सांस्कृतिक और मानसिक जिहाद किया गया है, और जावेद अख्तर एक बड़ा जिहादी रहा है जिसने हिन्दू धर्म को खूब खोखला किया है,और आज ये और इसकी बेगम कहते है की हम अकबर महान के देश में पैदा हुए है
 दो महत्त्वपूर्ण सवाल हैं...
१) भंसाली ने  खिलजी के रोल में आज की "कूल डूडनियों" की पसंद रणवीर सिंह को लिया,.. जबकि "हीरो" के रोल में अपेक्षाकृत कमज़ोर और असफल अभिनेता शाहिद कपूर को ... ऐसा क्यों..? 
यदि  "विलेन" पेश करना था, तो  खिलजी के रोल में गुलशन ग्रोवर या नवाज़ुद्दीन  को ले सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया ...
२)  पश्चिमी देश "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा" सर्वाधिक पीटते हैं, क्या हॉलीवुड में ऐसी फिल्म बनाई जा सकती है, जिसमें  कोई प्रख्यात अभिनेता जिसकी इमेज हीरो की होऔर यूरोपीय औरतें उस पर जान छिड़कती हो,"हिटलर" का रोल करे..?
 यह वामपंथी महबूब खान की मदर इण्डिया से चला आ रहा "सेकुलर" ट्रेण्ड है, जिसमें धूर्त-ठरकी बनिए कन्हैयालाल की भूमिका है, जो हर बात में "राम-राम" कहता है... कुछ समझ में आया..?
 क्या भंसाली ने फिल्म में "आततायी इस्लामी आक्रांता" की जेहादी सच्चाई, और मलिक काफूर नामक हिजड़े के साथ उसके समलैंगिक सम्बन्धों को दिखाने की हिम्मत भी दिखाई है..? ...दरअसल ये वामपंथी गिरोह  ये कहना चाह रहे हैं कि रानी पद्मिनी का मसला सिर्फ राजपूतों का मसला है। जबकि सच्चाई ये है कि ये सभी भारतीय लोगों के लिए अस्मिता का प्रश्न है...

Monday, 20 November 2017

थाईराइड का घरेलू और आयुर्वेदिक इलाज, सुबह खाली पेट लेना है..
आज के आर्टिकल का विषय है “हाइपरथायराइडिज्म”.
 ब्लड प्रेशर यानी हाइपरथायराइडिज्म के लिए भी आपको वही सब करना है, जो उपाए आपने अपने हार्ट के लिए इस्तेमाल किये हैं. हाइपर थायराइडिज्म के केस में बाकी तो आप वही कर सकते हैं जो आप हार्ट के लिए कर रहे हैं लेकिन एक चीज एक्स्ट्रा है जो आपको हाइपरथायराइडिज्म में इस्तेमाल करनी होगी. और वह धनिया का पत्ता है. आपको इसकी चटनी बनाकर गरम पानी में मिलाकर पीनी है. 
अब थायराइड बढ़ने के बहुत सारे कॉन्प्लिकेशन है. जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि हार्मोनस का डिस्प्ले न होना एक बहुत बड़ी कॉन्प्लिकेशन है, और मोटापा बढ़ना इसका दूसरा कॉन्प्लिकेशन है. इसके अलावा तीसरा कॉन्प्लिकेशन है, गर्दन का मोटी हो जाना .ब्लड में कोलेस्ट्रॉल बढ़ ही नहीं पाए और ट्राइग्लिसराइड बढ़े ही नहीं. आपके खून में सबसे ज्यादा ये सब तब बढ़ता है, जब आप डालडा खाते हैं, रिफाइंड ऑयल खाते हैं या फिर डबल रिफाइनरी खाते हैं, यह चार नाम आप याद रखिए जो सबसे खतरनाक है आपकी जिंदगी के लिए.जितना ज्यादा आप ये सब खाएंगे, बैड कोलेस्ट्रॉल उतना ज्यादा बनेगा. रिफाइनड और डबल रिफाइनड जितना ज्यादा खाएंगे बैड कोलेस्ट्रॉल उससे भी ज्यादा बनेगा. तो पहली बात अपने जीवन में याद रखिए कि हार्ट से जुड़ी हुई किसी भी प्रॉब्लम में तेल तुरंत बदल दीजिए .

इन सब की जगह गाय का घी हो तो बहुत अच्छा है. गाय का घी जिस पर 12 साल राजीव जी ने रिसर्च किया है, ये आपका 1 ग्राम भी कोलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ने देगा. जो बढ़ने देता है, वह है भैंस का घी. तो जिन को भी हार्ट की प्रॉब्लम है उनको तो भैंस का घी छोड़ ही देना चाहिए. और उसकी जगह गाय का घी कहीं से अरेंज कर लेना चाहिए. दूसरी जानकारी आप के घर में तेल एकदम शुद्ध लाइए. यह जो रिफाइंड तेल है, उसको आप छोड़ ही दीजिए.

शुद्ध तेल का इस्तेमाल कीजिये. जिनके पास तेल निकालने वाली मशीन है, उनके पास सरसों लेकर जाइए और बोलिए की इसका तेल निकाल कर दे दो, जिस कंडीशन में वह तेल निकाल कर देता है वही शुद्ध है. ज्यादा से ज्यादा उसको आप फ़िल्टर करा लीजिए. इसके इलावा एक फ़िल्टर आयल आता है और एक रिफाइंड ऑयल आता है, रिफाइंड आयल गलती से भी मत लाइए पर फिल्टर आयल लाइए. फिल्टर मतलब उसमें कोई केमिकल मिक्सिंग नहीं है.

इसके इलावा और दो तीन चीजें कर सके तो बहुत अच्छा है. खाने के बाद कम से कम हजार कदम पैदल चलना खास करके शाम को बहुत जरूरी है. दोपहर को खाने के बाद आराम करना बहुत जरूरी है. वज्रासन में बैठना बहुत जरूरी है. अगर आपने ये सब तरीके अपना लिए तो हम आपको स्टांप पेपर पर लिख कर देते है कि ऐसा करने से जिंदगी में कभी भी आपको हार्ट अटैक नहीं आएगा. चाहे कितना भी कॉलेस्ट्रोल क्यों ना बढ़ जाये.

हाइपरथायराइडिज्म के सारे कॉन्प्लिकेशन को एक ही मेडिसिन कवर कर लेती है और वह है धनिया का पत्ता. हरे धनिये के पत्ते लें. अब उसको पीस लें और गुनगुने पानी में मिला लें. रात को पानी में डाल दीजिए इससे वह सवेरे नरम हो जाएगा. फिर उसकी चटनी बना लीजिए और पानी में डालकर पी लीजिए. हमेशा याद रखिये कि एक चम्मच एक ही बार मिक्सी में पीस सकते हैं. या आप इसको पत्थर पर भी पीस सकते हैं. यह जो धनिया है इससे आपका थायराइड बहुत कम हो सकता है.

sanskar-jan

" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "
एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।
 पिछले दिनों “सेक्सी दुर्गा और सेक्सी राधा” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा था, देश के फिल्मबाज़ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर अपनी फिल्मो के नाम रख रहे थे, और इसे अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी भी बता रहे थे तभी पत्रकार रोहित सरदाना ने ऐसे तमाम लोगों पर ungali उठाते हुए कहा था की, ये लोग सिर्फ सेक्सी राधा और दुर्गा जैसे शब्द ही इस्तेमाल कर सकते है, पर  सेक्सी फातिमा, सेक्सी आयशा, सेक्सी मैरी जैसे नाम का इस्तेमाल नहीं करते, क्यूंकि इन लोगों के निशाने पर सिर्फ हिन्दू होते है, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ये लोग सिर्फ हिन्दुओ को निशाना बनाते है
 अब कट्टरपंथी तत्वों ने रोहित सरदाना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया ,और रोहित सरदाना को हर तरह से चुप करवाने की कोशिशें भी तेज कर दी है .लखनऊ में मशाल खान ने रोहित सरदाना के खिलाफ केस दर्ज करवाया है,  साथ ही कई मुस्लिम धर्मगुरु रोहित सरदाना के खिलाफ बयानबाजी भी कर रहे है, , माफ़ी ना मांगने पर अंजाम भुगतने की धमकियाँ भी दे रहे है..., 
साफ़ है की रोहित सरदाना ने अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किया तो इनके खिलाफ सब एकजुट हो गए,और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा पर, उनके बोलने की आज़ादी के हक़ पर सेकुलरिज्म के चैंपियन  चुप भी हो गए है...
देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती हैं ये 10 एजेंसियां...!
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1. रिसर्च ऐंड अनैलिसिस विंग (RAW)-
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1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत का इंटेलिजेंस ब्यूरो सही से काम नहीं कर पाया था। ऐसे में एक ऐसी एजेंसी की जरूरत महसूस हुई जो सूचनाएं एकत्रित करने और दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो। इसके नतीजे में 1968 में रॉ का गठन हुआ जिसका उस समय नाम फॉरन इंटेलिजेंस था। रॉ को दुनिया की बेहतरीन खुफिया एजेंसियों में एक माना जाता है। इसने बांग्लादेश के निर्माण, ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्ध और 71, 99 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी।
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2. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)-
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इंटेलिजेंस ब्यूरो का गठन साल 1887 में सरकार के एग्जिक्युटिव ऑर्डर से हुआ और 1947 में इसका पुनर्गठन हुआ। आईबी देश की सबसे पुरानी खुफिया एजेंसी है। आईबी देश में खुफिया ऑपरेशनों को संचालित करती है और विदेश नीति बनाने में सरकार की मदद की करती है। आईबी के सदस्यों को रूस की केजीबी ट्रेनिंग देती है।
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3. नैशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA)-
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नैशनल इन्वेसिटगेशन एजेंसी (एनआईए) का गठन 2008 के मुंबई हमलों के बाद हुआ। यह एजेंसी आतंकवाद से संबंधित मामलों को हैंडल करती है। तंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने एवं अन्य आतंक संबंधित अपराधों का अन्वेषण के लिए एनआईए का गठन किया गया जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़ भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों एवं गंभीर तथा संगठित अपराधों का अन्वेषण करती है।
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4. नैशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (NTRO)-
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साल 2004 में टेक्निकल इंटेलिजेंस एजेंसी का गठन हुआ था। यह अन्य एजेंसियों को खुफिया जानकारी मुहैया कराती है और देश-विदेश में खुफिया सूचनाएं एकत्रित करने में समन्वय करती है। 2014 में इसने आईसीजी को खुफिया जानकारी दी थी जिसकी मदद से 2014 में नए साल की पूर्व संध्या पर पाकिस्तानी जहाज को उड़ाने में मदद मिली थी। यह इसका एक अहम ऑपरेशन था।
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5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB)-
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एनसीबी का गठन 1986 में हुआ था। एनसीबी भारत में मादक पदार्थों की तस्करी और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए काम करती है। इसने ऑपरेशनों में बीएसएफ पंजाब बॉर्डर के साथ समन्वय, बीएसएफ/आर्मी भारत-म्यांमार सीमा पर ऑपरेशनों में अहम भूमिका निभाई।
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6. डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA)-
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इसका गठन 2002 में किया गया था। यह देश-विदेश में डिफेंस से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने का काम करती है। यह सिविल इंटेलिजेंस एजेंसियों पर सशस्त्र बलों की निर्भरता को कम करती है। डायरेक्टोरेट ऑफ सिगनल्स इंटेलिजेंस, डिफेंस इमेज प्रोसेसिंग ऐंड अनैलिसिस सेंटर और डिफेंस इन्फर्मेशन वारफेयर इसके नियंत्रण में हैं।
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7. डायरेक्टोरेट ऑफ एयर इंटेलिजेंस (DAI)-
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यह वायु सेना से संबंधित इंटेलिजेंस एजेंसी है। इसने 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। यह देश के आंतरिक और सीमा से सटे इलाकों की निगरानी करती है। एयरस्पेस एरिया पर नजर रखने के लिए यह इंटेलिजेंस एजेंसी अवाक्स और ड्रोन्स का इस्तेमाल करती है।
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8. डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल इंटेलिजेंस (DNI)-
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यह भारतीय नौसेना का खुफिया अंग है जो सामुद्रिक क्षेत्र में सूचनाएं एकत्रित करने का काम करती है। कराची बंदरगाह पर बमवारी में इसने अहम भूमिका निभाई थी।
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9. डायरेक्टोरेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस (DMI)-
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यह भारतीय थल सेना की इंटेलिजेंस विंग है। इसका गठन 1941 में किया गया था। आजादी के बाद इसे सेना में भ्रष्टाचार की जांच का अधिकार दिया गया। एजेंसी ने कारगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाई।
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10. जॉइंट साइफर ब्यूरो (JCB)-
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इसका गठन 2002 में किया गया था। यह सिगनल अनैलिसिस और क्रिप्टअनैलिसिस को हैंडल करती है। यह संवेदनशील डेटा का इन्क्रिप्शन करती है। इसकी जिम्मेदारी साइबर क्राइम से संबंधित मामलों को हैंडल करने की है।

Sunday, 19 November 2017

पुरे देवभूमि को इस्लामी भूमि बनाने की तैयारी


बद्रीनाथ को अचानक से बदरुद्दीन नहीं बता दिया, पुरे देवभूमि को इस्लामी भूमि बनाने की तैयारी
मेरे एक मित्र ने 1997 में श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति की जोशीमठ बैठक में यह निवेदन किया था कि मुस्लिम बद्रीनाथ को बदरुद्दीन की मजार और केदारनाथ को केदारूदीन की मजार में निरूपित कर फिदाईन तैयार कर रहे हैं। उस वक्त CS टोलिया जी के कहने पर इतिहास लेखन की वैठक थी और उसमें वेदपाठी, धर्माधिकारी के अलावा तत्कालीन मुख्यकार्यकारी अधिकारी बी के मिश्रा थे। तब जनपद चमोली में देवबन्द से प्रशिक्षित जेहादियों को छोटे बच्चों को कुरान और उर्दू पढ़ाने के लिए भेजा गया था। ये घरों में जाकर पढ़ाते थे। तब तक गोपेश्वर में केवल पोस्ट आफिस के पास ही इनका अड्डा जाना जाता था।
देवबन्द के लोगों के आने के बाद परिस्थितियों में परिवर्तन आया। जो रणनीति कश्मीर में अपनायी थी उसे ही उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाने लगा। दिन में अंडे मुर्गी, फल, शब्जी, बिसात खाने, मैकेनिक, की दुकान और रात को जिहाद की शिक्षा। परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं की लड़कियों का मुसलमानों के साथ निकाह की खबरें आने लगी।
गोपेश्वर में मस्जिद बनाने के प्रयास तेज हुए। अलकापुरी में कब्रिस्तान को SDM अबरार अहमद ने डन्डे के बल पर मंजूरी दी। गोपेश्वर नगर क्षेत्र में ही नहीं पूरे जिले में इस्लाम के अनुयायियों की बाढ़ आगयी। उन्होंने ठेकेदार बन कर मकान खरीद लिए । सवर्ण तो मुसलमानों को किरायेदार रखते नहीं। बस्ती वालों के यहां रहे। और वहीं दामाद भी बन गये। पहले माँ से रिश्ते बनाये और बाद में शादी बेटी से की और फिर घर जमाई बन कर जमीन भी हड़प दी। पुलिस लाइन से लेकर पठालीधार पोखरी बैंड तक यही हाल है। और तो और गोपेश्वर जहां एबर्टशन बन्दोबस्त में तक भी 200 नाली जमीन मन्दिर के नाम दर्ज कागजाद थी।
1965 के उत्तराखण्ड ज़मीदारी विनाश कानून ने मन्दिर को ज़मीदारी मान लिया और मन्दिरों के नाम जिस जमीन से मन्दिरों की दिया बत्ती और भोग पूजा होती थी। और मन्दिर के भंडारी, बाजीगिरी, कमदी, आदि खैकर थे, जमीन उन खैकरों के नाम दर्ज हो गयी। मन्दिर कंगाल और अवैध कब्ज़े धारी मालामाल हो गये। आज उस जमीन पर इस्लामिक जेहादियों की हवेलियां उग आयी है।
मन्दिर की जमीन पर उगी इन हवेलियों में पुजारियों को कत्ल करने के लिए हथियारों का जखीरा होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यही स्थिति नन्दप्रयाग और जोशीमठ में है। लेकिन इन जेहादियों को प्रतिष्ठित करने में दोगले पत्रकारों की भी बड़ी भूमिका रही है। दारू के पैक में बिकने वाले पत्रकार हमेशा सेक्युलर आवरण में इनके काले कारनामों को छुपाने के लिए अग्रणी रहे हैं।
हर बार साम्प्रदायिक सौहार्द की दुहाई मंचों से माइक पर देने वालों की ही चलती है। अब जब पिछले 20 सालों में इस्लामिक जेहादियों ने अपनी जमीनी पकड़ यहां मजबूत कर ली तो बद्रीनाथ पर अपने कब्जे के पत्ते खोल दिए हैं। यही कश्मीर में होता रहा है। यह जेहाद की रणनीति का हिस्सा है। अब देवभूमि के अस्तित्व बचाने का एक ही रास्ता है कि म्यामांर सरकार से सीख लेते हुए उनकी नीतियों का अनुपालन किया जाय ।
Vithal Vyas
इसलिए मुझे., रावण याद आता है.......

मुझे ताड़का याद आती है। उसे यज्ञों का विध्वंस करना है, इसके लिए वो सभी मन्त्र जानने वालों की हत्या नहीं करती, वो सारी सामग्री चुरा नहीं भागती। वो बस हवन-कुण्ड में एक हड्डी फेंक जाती है। विदेशी आक्रमणों में हुए जौहर का इतिहास बिगाड़ना था तो बहुत मेहनत नहीं करनी, “पद्मिनी” नाम था या “पद्मावती” इसमें संशय पैदा कर देना भी बहुत है। एक हड्डी ही तो फेंकनी थी, इसलिये ताड़का और राक्षसी तरीका याद आता है।
मुझे सिंहिका राक्षसी याद आती है। ये जीव को नहीं उसकी परछाई को दबोच लेती थी, परछाई को त्यागने में असमर्थ जीव खुद उसके चंगुल में चला आता था। कोई बंधन ना हो, स्वतंत्रता युवाओं को प्रिय होती है, इसलिए वो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर युवाओं को ही बहकाती हैं। संतान तो अपनी ही परछाई सी है, उसे छोड़कर लोग कहाँ जायेंगे ? बच्चों के पीछे वो खुद ही फंसा, चला आता है।
मुझे कालनेमि याद आता है। उसे हनुमान को ठगकर, उन्हें समय से संजीवनी ले आने से रोकना है इसलिए वो साधू का वेष बनाता है। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े से तिलक, भगवा वस्त्रों और मोटी-मोटी मालाओं में खुले बालों वाली स्त्रियाँ टीवी बहसों में “पद्मावती” फिल्म के समर्थन में उतरी हैं। उन्हें भी बस फिल्म के विरोधियों का विरोध थोड़ा कम करना है। वो जीतेंगी नहीं, कालनेमि जैसा ही उन्हें भी पता है, इसलिए मुझे कालनेमि याद आता है।
मुझे मारीच याद आता है। उसे पता है वो गलत कर रहा है, लेकिन जिनके राजाश्रय में पल रहा है उनकी आज्ञा से बाध्य भी तो है ! वो भेष बदलता है, सोने का मृग बनकर सीता को लुभाने पहुँच जाता है। अंतिम समय तक भी छल नहीं छोड़ता, “हे राम” कहते ही मुक्ति मिलेगी ये जानकार भी “हा लक्ष्मण, हा सीते” चिल्लाता है। फिर वो कलाकार दिखते हैं जो कल निर्माताओं के पैसे पर पले और कल फिर उनके ही पास काम मांगने जाना है। उधार के तीस किलो का लहंगा और कई किलो के जेवर पहनकर वो लुभाने आ जाते हैं, अंत तक “मेरी बरसों की मेहनत डूबी” का रोना रोते हैं। भेष बदलकर वो स्त्रियों को लुभाने आये, इसलिए मारीच भी याद आता है।
मुझे रावण याद आता है। वो ज्ञानी है, लक्ष्मण रेखा क्यों लांघनी चाहिए इसके लिए नीति-धर्म की ही दुहाई देता है। अपने तरीकों, शालीनता, सभ्यता-संस्कृति की सीमाओं के अन्दर मौजूद सीता का वो अपहरण नहीं कर सकता। विमान, सेनाएं, बल-ज्ञान सब उसपर बेकार होगा ये जानता है। इसलिए वो बहकाकर सीता को लक्ष्मण-रेखा के बाहर लाना चाहता है। उसे पता है कि आग से जल सकते हो दूर रहो बच्चे को समझाया जा सकता है, गालियाँ क्यों नहीं सीखनी, इसमें गलत क्या है ? ये समझाना मुश्किल है। बस “माय चॉइस”, “फासीवाद के विरोध”, “आखिर ऐसा होगा क्या देख भर लेने से”, “चल देखें कुछ गलत दिखाया भी या नहीं”, जैसे किसी बहाने से दिखा देना है।
इसलिए मुझे रावण याद आता है।
Anand Kumar
संन्यासी से बने रईस अमेरिकी हिंदुस्तानी...
शांति के लिए भारत के वीरान पहाड़ों में संन्यासी के रूप में 12 साल बिताने के बाद एक शख्स अमेरिका के सबसे रईस भारतीय में शामिल हुआ है. 59 साल के मनोज भार्गव की सफलता ने फोर्ब्स के साथ ही पूरी दुनिया को हैरान किया है.
लखनऊ में जन्मे मनोज भार्गव की कारोबारी सफलता आज पूरी दुनिया में चर्चा बटोर रही है. वह फोर्ब्स की बनाई 400 सबसे अमीर अमेरिकी लोगों की सूची में 1.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 311वें नंबर पर मौजूद हैं. 14 साल की उम्र में अमेरिका पहुंचे भार्गव ने पेन्सिल्वेनिया के हिल स्कूल से हाई स्कूल तक की पढ़ाई की. मशहूर प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में एक साल पढ़ने के बाद उसे अलविदा कह कर मनोज भारत चले आए और यहां पहाड़ों में संन्यासी बन भटकते रहे. इन पहाड़ों में 12 साल बिताने के बाद वह अमेरिका वापस लौटे और कारोबार की दुनिया में कदम रखने से पहले कई तरह के छोटे मोटे काम किए. इनमें टैक्सी चलाने से लेकर प्रिंटिंग प्रेस चलाना, क्लर्क बन कर खाता बही संभालना, और सफाई के ठेके लेना तक शामिल है.
1990 में मनोज भार्गव ने एक प्लास्टिक का कच्चा माल बनाने वाली कंपनी प्राइम पीवीसी इंक शुरू की जो देखते ही देखते दो करोड़ डॉलर की बिक्री वाली कंपनी बन गई. बाद में मनोज ने इसे एक इक्विटी फर्म को बेच दिया. इसके बाद उन्होंने सीधे उपभोक्ताओं के इस्तेमाल वाली चीजें बनाना शुरू किया और नई कंपनी का नाम रखा लिविंग एसेन्शियल्स. इसी कंपनी ने फाइव आवर एनर्जी नाम का एनर्जी ड्रिंक बनाना शुरू किया जो इन दिनों खूब हिट हो रहा है. लिविंग एसेन्शियल्स के अलावा छह और कंपनियां भी हैं जिनकी शुरूआत मनोज भार्गव के हाथों हुई. इनके अलावा मनोज कई तरह से समाज की भलाई के कामों में भी जुटे हुए हैं और इसके लिए ट्रस्ट भी चलाते हैं. उनकी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा समाज की भलाई में ही खर्च होता है.
मनोज भार्गव के बारे में फोर्ब्स ने लिखा, "प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले 59 साल के भार्गव इस सूची में नए नए दाखिल हुए हैं. उन्होंने अमेरिकी सपने को पूरा करने के लिए एक नई राह पर चलना मंजूर किया."
अमेरिका के सबसे ज्यादा अमीर 400 लोगों में पांच भारतीय भी हैं. फोर्ब्स की बनाई अमेरिकी धनकुबेरों की सूची में बिल गेट्स लगातार 19वें साल शीर्ष पर हैं. अमीरों की फेहरिस्त में 56 साल के बिल गेट्स के बाद बर्कशायर हैथवे के वॉरेन बफेट हैं जिनकी कुल संपत्ति 46 अरब अमेरिकी डॉलर पर जा पहुंची है. तीसरे नंबर पर ऑरेकल के लैरी एलिसन है जो पिछले एक साल में सबसे ज्यादा आठ अरब डॉलर कमाने वाले अमेरिकी हैं. उनकी कुल संपत्ति 41 अरब डॉलर है.
अमेरिकी अमीरों की सूची में पहला भारतीय नाम आईटी कंपनी सिंटेल को शुरू करने वाले भरत देसाई का है जो 239वें नंबर पर हैं. कुल दो अरब डॉलर की संपत्ति वाले देसाई ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर 1980 में आईटी कंपनी सिंटेल की नींव रखी थी. सिंफनी टेक्नोलॉजी ग्रुप शुरू करने वाले रोमेश वाधवानी इस सूची में दूसरे भारतीय हैं. 250वें नंबर पर
मौजूद वाधवानी की कुल संपत्ति 1.9 अरब डॉलर बताई गई है. आईईटी मुंबई और कार्नेजी मेलन यूनिवर्सिटी में पढ़ चुके वाधवानी ने पहले बिजनेस सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी एस्पेक्ट डेवलपमेंट को आगे बढ़ाया. बाद में उन्होंने साल 2000 के आईटी बूम के दौरान कंपनी को 9.3 अरब डॉलर में बेच दिया.
अमेरिका के अमीर भारतीयों में गूगल के बोर्ड सदस्य और शेयरधारक के राम श्रीराम भी हैं. श्रीराम फोर्ब्स की सूची में 298वें नंबर पर हैं और उनकी कुल संपत्ति 1.6 अरब डॉलर है. मशहूर एनर्जी ड्रिंक 5 आवर एनर्जी बनाने वाली कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज भार्गव 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर के साथ 311वें नंबर पर हैं.
अमेरिका के सबसे रईस लोगों की संपत्ति पिछले एक साल में 13 फीसदी बढ़ कर 1.7 लाख करोड़ तक जा पहुंची है. फेसबुक को शुरू करने वाले मार्क जकरबर्ग इस साल सूची में थोड़ा नीचे खिसक गए हैं. मई में कंपनी के शेयर बाजार में उतरने के बाद कंपनी की संपत्ति घट कर 9.4 अरब डॉलर पर पहुंच गई है. फिलहाल मार्क जकरबर्ग 36वें नंबर पर हैं.
#एनआर/एजेए (पीटीआई)/डी डब्लू
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क्या मौजूदा ट्रकों को चुनौती दे पाएगा ई ट्रक ?

डीजल ट्रक को रोड का राजा कहा जाता है. क्या 30 मिनट की चार्जिंग से 600 किलोमीटर चलने वाला टेस्ला का इलेक्ट्रिक ट्रक नया रोड किंग साबित होगा?
अमेरिकी कंपनी टेस्ला के सीईओ ईलॉन मस्क ने कैलिफोर्निया में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़ा खुलासा किया. मस्क ने दावा किया कि टेस्ला ने एक बार में 804 किलोमीटर की दूरी तय करने वाला इलेक्ट्रिक ट्रक बना लिया है. ट्रक की ढुलाई क्षमता 36.28 टन है. अमेरिका में सेमी ट्रकों के लिए इतना ही लोड तय किया गया है.
बिजली से चलने वाला ट्रक, डीजल ट्रक से कीमत में काफी ज्यादा महंगा है. लेकिन गुरुवार को टेस्ला ने दावा किया कि प्रति किलोमीटर ढुलाई और रखरखाव के लिहाज से उसका ट्रक ज्यादा किफायती साबित होगा.
औटोपाइलट सिस्टम भी है
ट्रक में टेस्ला ऑटोपायलट सिस्टम होगा. सिस्टम की मदद से ट्रक तय की गई स्पीड पर चलता रहेगा. ज्यादा ट्रैफिक होने पर वाहन खुद ही रफ्तार कम करेगा. ऑटोपायलट ट्रक को निर्धारित लेन पर भी चलाता रहेगा.
मेगाचार्जर्स बनाने पड़ेंगे
मस्क ने कहा कि टेस्ला दुनिया भर में सौर ऊर्जा वाले सुपरफास्ट चार्जिंग स्टेशन "मेगाचार्जर्स" का नेटवर्क बनाएगी. ऐसे चार्जिंग स्टेशनों पर 30 मिनट की चार्जिंग के बाद ट्रक 600 किलोमीटर की यात्रा कर सकेगा. कंपनी ने वादा किया है कि ट्रक 2019 से बाजार में आ जाएगा. अमेरिका में इच्छुक ग्राहकों को 5,000 डॉलर जमा कराकर ऑर्डर देना होगा.
टेस्ला का ई ट्रक
दुनिया भर के ट्रक बाजार पर अभी डीजल इंजन का नियंत्रण है. डीजल इंजन जांचा परखा है. साथ ही डीजल हर जगह आसानी से उपलब्ध भी हो जाता है. मस्क इस वर्चस्व को तोड़ना चाहते हैं. अमेरिका में 2016 में 4,100 ई ट्रक बिके. नैविगेंट रिसर्च के मुताबिक 2026 तक यह संख्या 70,000 होगी. अमेरिका में फिलहाल बिजली से चलने वाले पिक अप ट्रकों की मांग बढ़ रही है. इन्हें रात भर चार्ज किया जाता है और 160 किलोमीटर की रेंज कवर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
चुनौतियां भी है
परिवहन पर शोध करने वाली संस्थाओं के मुताबिक डीजल पर सख्ती और बेहतर चार्जिंग से बिजली वाले वाहनों को फायदा मिलेगा. अमेरिका, यूरोप और चीन में आने वाले समय में गाड़ियों के उत्सर्जन के मानक कड़े होने तय हैं.
लंबी दूरी के लिए ई ट्रक बनाने का दांव टेस्ला ने चला है. इस राह में कई चुनौतियां भी हैं. कंपनी को दुनिया भर के हाईवेज पर सुपरफास्ट चार्जिंग का नेटवर्क बनाना होगा. अगर चार्जिंग में दो घंटे का समय लगा तो माल डिलिवर करने में देरी होगी. साथ ही कोई खराबी आने पर रिपेयर सुविधा भी जल्द मुहैया करानी होगी. केली ब्लू बुक की ट्रांसपोर्ट विशेषज्ञ रेबेका लिंडलैंड बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं. वह कहती हैं, ट्रांसपोर्टर "कारोबारी लोग होते हैं, उनके सामने यह साबित करना होगा कि यह ट्रक मौजूदा तकनीक से कहीं ज्यादा बेहतर है."
रोडस्टर के साथ ईलॉन मस्क स्पोर्ट कार
मस्क ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक और बड़ी खबर दी. उन्होंने टेस्ला की पहली स्पोर्ट्स कार रोडस्टर लॉन्च करने की घोषणा की. 402 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार भर सकने वाली रोडस्टर 2020 में बाजार में आएगी. 2,00,000 डॉलर की रोडस्टर एक चार्जिंग में 1,000 किलोमीटर की दूरी तय करेगी.
#डी डब्लू
इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण

हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है। ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवो।
क्या हम अधिकांश भारतीयों को यह पता है इन देशों का निर्माण किस आधार पर हुआ है?
जिन्हें नहीं पता है उनके लिए जानकारी है कि इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण हुआ है।
ईस्ट तिमोर जो इंडोनेशिया का एक भाग था में पहले ईसाइयों की आबादी बहुत कम थी, मुसलमानों एवं अन्य मत के मानने वाले लोगों की आबादी 80% से अधिक थी केवल 50 वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न से ईस्ट तिमोर में ईसाइयों की जनसंख्या 80% से अधिक हो गई, परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र के दखल से जनमत संग्रह करा कर ईस्ट तिमोर नाम के देश का निर्माण कर दिया गया। कोई युद्ध नहीं हुआ।
सूडान के दक्षिणी क्षेत्र में गरीबी थी, मिशनरियों के प्रभाव में कुछ आदिवासी लोगों को पहले ही ईसाई बनाया गया। धीरे धीरे इस मुस्लिम बहुल देश को दक्षिणी क्षेत्र में ईसाइयों से भर दिया गया। फिर गृह युद्ध करा दिया गया। शांति प्रयास संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुए और परिणिति दक्षिणी सूडान को काटकर ईसाई देश के रूप में नए देश की मान्यता दे दी गई।
कोसोवो सर्बिया के भीतर एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें खदानें बहुत अधिक थीं। इन खदानों में काम करने के लिए अल्बानियाई मूल के मुसलमानों को मजदूर के रूप में लाया गया था।कालांतर में इनकी संख्या बढ़ गई। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया स्वतंत्र देश बना। लेकिन मुसलमानों ने सर्बों के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और कोसोवो को अलग देश बनाने की मांग किया। गृहयुद्ध जैसी स्थिति कई वर्षों तक रही। फिर नया देश बन गया।
भारत के कई क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यकीय परिवर्तन किए जा रहे हैं।
बहुसंख्यक आबादी इससे अनजान है।
विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों मे ऐसा होने से गैरकानूनी एवं आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं।
यदि हम भारत की अखंडता बनाए रखना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन से मिलकर हमें समस्या का समाधान खोजना चाहिए। आखिर हम भी तो भारत माता के बिना वर्दी वाले सैनिक हैं।
ऑर्डर पर मिलेगा अच्छा मौसम!
'क्लाउड सीडिंग' की तकनीक से जब चाहे धूप दिखना या जब चाहे बारिश कराना संभव हो गया है. जानिए कैसे.
रूसी हवाई सेना पहले कई बार भी क्लाउड सीडिंग प्रयोग कर चुकी है. वे किसी महत्वपूर्ण समारोह के आयोजन स्थल पर पहुंचने से पहले ही किसी स्थान पर बारिश को गिरा देते हैं, जिससे कुछ समय के लिए बादल खाली हो जाते हैं और समारोह की जगह सूखी रह जाती है.
अचानक कहां से सूरज!
रूस में 9 मई को मनाये गये सेना दिवस के समारोह से पहले रिहर्सल होने थे. बारिश हो रही थी कि अचानक आसमान खुल गया और सूरज चमकने लगा. उस समय रूस ने अपनी क्लाउड सीडिंग तकनीक का परीक्षण किया था.
सिल्वर आयोडाइड से होता है सब
आर्टिफीशियल कंडेंसेशन तकनीक इसके केंद्र में है. सिल्वर आयोडाइड के नाभिक तूफानी बादलों में रोपे जाते हैं. फिर इन नाभिकों पर वाष्प संघनित होती है और छोटे छोटे बर्फ के क्रिस्टल बन जाते हैं
केवल रूसी सेना ही नहीं जर्मनी के वाइन बनाने वाले भी सिल्वर आयोडाइड के साथ प्रयोग कर चुके हैं. ओला वृष्टि से अपने अंगूरों की खेती को बचाने के लिए उन्होंने इसे एक और रसायन एसीटोन में मिलाकर इस्तेमाल किया. इसका सबसे प्रभावी तरीका हवाई जहाज से रसायन का छिड़काव कराना है. विमान को तूफानी बादलों के ऊपर या नीचे उड़ाया जा सकता है. छिड़काव वाली बूंदें इतनी छोटी होती हैं कि गिर कर धरती तक पहुंचती भी नहीं और बादलों के पास तैरती रहती हैं.
... जब नेहरू ने तिरंगा फहराने पर प्रतिबन्ध लगाया..!
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#तिरंगा_घोटाले का भण्डाफोड़...!
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... क्या ऐसा संभव है कि किसी देश में उस देश के नागरिकों को ही उनके देश का ध्वज फहराने की अनुमति न हो....???? 
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.. जी हाँ, ऐसा संभव है....ग़द्दार नेहरू ने वर्ष 1950 में आम लोगों द्वारा तिरंगा फहराने पर प्रतिबंध लगा दिया था जो वर्ष 2002 तक सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दखल न दिए जाने तक लागू रहा...!
#आकथू...!
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क्या आप जानते हैं कि RSS ने 52 वर्षों तक भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा क्यों नही फहराया ???
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... जी हां ये सच है कि 1950 से 2002 तक RSS ने तिरंगा नहीं फहराया... तो इस राष्ट्रीय ध्वज के न फहराने का सच क्या है ? आइये जानते हैं-
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ऐसा क्या हुआ कि 1950 के बाद RSS ने तिरंगा फहराना बंद कर दिया ? आज़ादी के बाद संघ की शक्ति लगातार बढ़ती जा रही थी और संघ ने राष्ट्रीय पर्व जैसे 15 अगस्त और 26 जनवरी जोर शोर से मनाने शुरू कर दिए थे, जनता ने भी इसमे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया... इससे नेहरू को अपना सिंहासन डोलता नज़र आया और बड़ी ही चालाकी से उन्होंने भारत के संविधान में एक अध्याय जुड़वा दिया- "National Flag Code" को संविधान की अन्य धाराओं के साथ 1950 में लागू कर दिया गया और इसी के साथ तिरंगा फहराना अपराध की श्रेणी में आ गया... इस कानून के लागू होने के बाद राष्ट्रीय ध्वज केवल सरकारी भवनों पर कुछ विशेष लोगों द्वारा ही फहराया जा सकता था और यदि कोई व्यक्ति इसका उल्लंघन करता तो उसे सश्रम कारावास की सज़ा का प्रावधान था।
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अर्थात कानून के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज अब संघ की शाखाओं में नही फहराया जा सकता था क्योंकि वे सरकारी भवन न होकर, निजी स्थान थे...संघ ने कानून का पालन किया और तिरंगा फहराना बंद कर दिया... यह कानून नेहरू के डर के कारण बनाया गया था वरना इसका कोई औचित्य नही था क्योंकि आज़ादी की लड़ाई में तो प्रत्येक आम आदमी तिरंगा हाथ में लेकर सड़कों पर होता था... परन्तु अचानक उसी आम आदमी और समस्त भारत की जनता से उनके देश के झंडे को फहराने का अधिकार छीन लिया गया और जिस तिरंगे के लिए लाखों लोग बलिदान हो गए वह तिरंगा फहराने का अधिकार अब केवल नेहरू गांधी परिवार की संपत्ति बन चुका था।
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कांग्रेस के Member of Parliament नवीन जिंदल ने अपनी फैक्ट्री 'जिंदल विजयनगर स्टील्स' में तिरंगा फहराया और उनके विरुद्ध FIR दर्ज करने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया... इसके बाद उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और 2002 में उच्च न्यायालय ने यह आदेश जारी किया कि भारत का ध्वज प्रत्येक नागरिक फहरा सकता है... अपने निजी भवन पर भी फहरा सकता है... बशर्ते वे राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान का ध्यान रखे और तिरंगे को Flag Code के अनुसार फहराए... इसके बाद से आज तक निरंतर संघ की हर शाखा में तिरंगा फहराया जा रहा है।
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है कोई कांग्रेसी, वामपंथी या आपिया जो मेरे इन तथ्यों को झुठला सके ? आज वही कांग्रेसी प्रश्न उठा रहे हैं जो राष्ट्रगान के समय कुर्सी से उठते भी नही, बैठे रहते हैं... आपको गूगल पर कई कांग्रेसी मुल्लों और वामपंथियों के ब्लॉग मिल जाएंगे... जिसमें तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया होगा... परन्तु हर जगह एक बात जरूर मिलेगी कि 1950 से पहले और 2002 के बाद संघ तिरंगा फहराता आ रहा है।
तो आज आपको पता चला कि तिरंगे का असली दोषी कौन था ? अब प्रश्न यह है कि नेहरू ने आखिर भारतीयों से उनके अपने ही देश का ध्वज क्यो छीन लिया था...?