Monday, 2 October 2017

सेक्युलरवाद के कारण... कई देश और उनकी संस्कृति मिट गयी
, कई देश और मिटेंगे ...//
अयान हिरसी अली ने यह कहकर दुनिया भर में नई बहस को छेड़ दिया है। दुनिया में अधिकतर लोगों को सच्चाई पसंद नहीं आयी और इसी कारण सच कहने वालो के दुश्मन अधिक होते है, और ऐसे ही लोगों में सोमालिया मूल की अयान हिरसी अली भी हैं।सोमालिया में सच बोलने की हिम्मत की तो कट्टरपंथी इनकी जान के पीछे पड़ गए। ये तो किस्मत अच्छी रही की ये बच गयी और यूरोप तथा अमरीका में शरण मिली...
अयान हिरसी अली हमेशा से ही सच बोलती आयी है जो देश और वहां का समाज सेकुलरिज्म में अँधा हो जाता है, उस देश और उस समाज का नाश हो जाता है और इतिहास में ऐसे कई उदाहरण है...
सीरिया कभी ईसाई बहुल देश हुआ करता था,... ईरान का असली नाम तो पर्शिया था जहाँ पारसी लोग रहा करते थे, ...पाकिस्तान में 100% हिन्दू थे,... अफगानिस्तान में भी हिन्दू फिर बौद्ध थे पर ये तमाम देश अब इस्लामिक बन चुके है, इनके नाम तक बदल दिए गए है इराक का असली नाम तो मेसोपोटामिया था..., ये तमाम इलाके और यहाँ के लोग इतने सेक्युलर थे, की सेक्युलरवाद के कारण उनका समाज और देश हमेशा के लिए मिट गए... हिरसी अली ये भी कहती है की, जो देश आज सेक्युलरवाद निभा रहे है, भविष्य में वो भी सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान ही बनेंगे... हजारो प्राचीन संस्कृतियां और पूजा पद्दतियों को संगठित मजहबो द्वारा नष्ट किया जा रहा है...हजारो कबीलों की विविधता इस्लाम या ईसाइयत के संगठित आक्रमणों ने लील लिया।जिस गति और प्लानिंग से यह फैल रहा है जल्द ही या तो इस्लाम या क्रिश्चियन में दुनिया बची रहेगी।
 फ्रांस
जब फ्रांस के राष्ट्रपति के पद पर एक दक्षिणपंथ का विरोध करने वाला नियुक्त हुआ था तो कईयों ने तो इसको फ़्रांस के धर्मनिरपेक्षता की जीत बताया था।सेकुलरिज्म के नाम पर उसने वोट भी माँगा था। पर उसकी आड़ मे इस्लामिक आतंकियों ने फ़्रांस को बार बार लहू लुहान कर दिया मैकरोन को विचार बदलना पडा।
फ्रांस जो कभी दुनिया में पर्यटन के लिए सबसे अच्छा देश माना जाता था वह अचानक ही क्रूर इस्लामिक आतंकियों के निशाने पर आ गया था।खूबसूरत देश की तस्वीर ऐसी बिगड़ी की टूरिस्टों ने वहां जाने से ही लोग परहेज करना शुरू कर दिए।धर्मनिरपेक्षता के ढांचे ने फ्रांस को ही ध्वस्त करना शुरू कर दिया।सालो पहले वाम-पंथी माहौल में वहां लिबरंडूओं का प्रकोप बढ़ गया था,जिससे मुस्लिमो शरणार्थियो की कई खेप धीरे-धीरे वहां आने दी गई थी।जल्दी ही 'हम पांच हमारे तीस,की रणनीति ने वहां अमल किया और केवल चालीस साल में ही जनसख्या भी ४० गुना बढ़ गई।अब वे वहां 11.5 प्रतिशत हो गये।जैसे ही ७ प्रतिशत लांघे. फिर लव जेहाद,शरई शासन की मांग,सड़क पर नमाज का प्रदर्शन ...और जगह-जगह विस्स्फोट।जैसा की हर जगह होता हैं।कमोबेश नीदरलैंड भी इसी तरह की समस्या से ग्रस्त है।उसने यूएनओ को लिखित दे दिया है मुस्लिम शरणार्थियो की बस्तियां आतंकी स्थलों में तब्दील हो चुकी हैं जिन्हें सम्भालना उसके बूते का नही।सयुक्त राष्ट्र संघ उसे सैनिक मदद दे जिससे वह समस्याओं से निजात पा सके।
                              16वी सदी में स्पेन वार के बाद मुसलमानों को यूरोप से निकाल दिया गया और लगभग पूरी तरह से यूरोप में प्रतिबंधित कर दिया गया था।यह काफी सालो तक चला।उन्नीसवीं सदी में जब वामपंथ, सेकुलरिज्म का नाटक शुरू हुआ तो इस्लाम का प्रवेश फिर शुरू हुआ।मुसलमान फिर से यूरोप में जाने लगे।यह 1950 का आंकड़ा है 1950 से 2014 के आंकड़े के बीच का अंतर देखिए।1950 में मुसलमान 2.3 परसेंट थे इंग्लैंड में।आज वह 22.56 प्रतिशत हो चुके हैं।इंग्लैंड के एम्स्टर्डम में एक परसेंट थे आज वह 14 परसेंट हैं।एंटवर्क में वह दो पर्सेंट थे आज वह 16.9 परसेंट है। बेल्जियम में एक परसेंट से बढ़कर के 16.9 परसेंट हो चुके हैं। बार्सिलोना में जहां कभी मुस्लिमो पर रोक थी वह 0.103 से बढ़कर के साथ 6.5 परसेंट हो चुके हैं।बर्लिन में जहां 0.708 परसेंट थे वह 9.1 परसेंट हो चुके हैं।बरमिंघम में जहां 1.3 परसेंट थे आज वह 14.3 परसेंट हो चुके हैं।ब्रेडफोर्ड में जहां वह 1.7 परसेंट थे आज वह 15% पार कर चुके हैं।ब्रसेल्स में जहां वह 2.1 परसेंट थे आज वह 70% पार कर चुके हैं। ब्रसेल्स में 1 प्रतिशत से अब वह 30% की संख्या में रह रहे हैं।कोलोन(जर्मनी) में 1 प्रतिशत से बढ़कर 12% हो चुके हैं।कोपेनहेगन में वह 0 1% से बढ़कर के 10% हो चुके हैं।डबलिन में 0.57 से बढ़कर 11 प्रतिशत हो चुके हैं। फ्रेंकपूर्त में 0.03 परसेंट से बढ़कर के 11.87 हो चुके हैं। लिसेस्टर में वह 1.3 से बढ़कर के 18.6 प्रतिशत। लंदन में 0.84 सबसे बढ़कर वह 12.45 हो चुके हैं।माल्मो में 1.6 परसेंट से बढ़कर के 20% हो चुके हैं। मेनचेस्टर में 1.25 से बढ़कर 15.87 हो चुके हैं.मरसेआईल में से 1% से बढ़कर 25% हो चुके हैं। मिलान में 1.3 से बढ़कर 6% हो चुके हैं। पेरिस में वह 1.3 से बढ़कर 10 से 15% हैं एरिया में हो गए हैं।रोटरडम में वह 0.1 से बढ़कर 13.3 प्रस्तुत हो गए हैं।रॉबिएक्स में से 20% पार हो गए हैं।हेग में वह 0.976 थे 14.2 प्रतिशत हो चुके हैं,वियना में जहां 0.125 थे आज 8 पसे 12.57 हो चुके हैं।जहां भी उन्होंने १० प्रतिशत पार किया हैं वहां उत्पात शुरू चुका है।सभी युरोपियन राष्ट्रों का मानना है सेकुलरिज्म की खोल के कारण हुआ है।स्थानीय समाज को वामपंथी लिबर्लिज्म ने 'लांग-टाइम स्ट्रेटिजिक अटैक,को इग्नोर करने की आदत दाल दी है।फिलहाल वे अब सजग है।
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुल मैक्रोन ने अपने २०० देशो में फैले राजदूतों की एक सभा में उन्हें सीधे-सीधे निर्देशित किया की वे इस्लामिक आतंक से सतर्क रहें।यह अब दुनिया भर को चपेट में लेती जा रही है।हमें अब फ्रांस को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।अब हमें इन क्रूर आतंकियों से भिड़ना होगा।प्रसिद्ध संचार एजेंसी time. com के अनुसार फ्रांस के राष्ट्रपति का ये संदेश ना सिर्फ फ़्रांस की सेना , पुलिस और उनके अधिकारयों के लिए था अपितु उन्होंने सीधे सीधे अपनी जनता को भी यह संदेश खुलेआम दिया। समाज में बढ़ रहे इस आतंक रुपी कैंसर के बारे में .फ़्रांस के राष्ट्रपति ने अपनी विदेश नीति में भी बदलाव का एलान किया। जिसमे पहले उन्होंने अपनी धर्मनिरपेक्षता के चलते काफी शिथिल नियम रखे थे। इतना ही नहीं उन्होंने इस आतंक के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ से फ़ौरन ही एक नया दल बनाने की मांग की है। फ्रांस पिछले कुछ समय से आतंक के वार झेलने में सबसे अग्रणी रहा है।उसने अभी-अभी नीस जैसा आतंकी हमला भी झेला है जिसमे ट्रक को मौत का सामान बना दिया गया था।मासूमो , बच्चों बुजुर्गों सबको कुचल दिया गया था। फ़्रांस के राष्ट्रपति के इस बदले स्वरूप का यूरोपियन समाज स्वागत कर रहा है।
भारत में तो समस्याए बहुत ही ज्यादा है उस्ससे अलग हटकर अब ज़रा एक फैक्ट और देखिये।
भारत पर कर्ज- केन्द्र सरकार- 47 लाख करोड़ रुपए,राज्य सरकारों पर- 65 लाख करोड़ रुपए।
भारत में चर्च की परिसंपत्तियों की क़ीमत लगभग 52 लाख करोड़ रुपए है, क्या राष्ट्रीय हित में इसका राष्ट्रीयकरण नहीं किया जाना चाहिए...?
जॉर्ज बुश जब भारत आते हैं तो चर्च को 20 करोड़ डॉलर का दान देते हैं। अब सवाल यह है कि यह पैसा भारत सरकार को क्यों नहीं दिया गया...?
क्या चर्च भारत की सरकार चलाता है...? आखिर आदिवासियों और दलितों के कल्याण के लिए चर्च पर ही भरोसा क्यों..?
ज़ाहिर है, ये सारी जमीनें और पैसे भारत में लोगों को ज्यादा से ज्यादा धर्मांतरित करने में इस्तेमाल किए जाते हैं। अब समय आ गया है कि इनका राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए।इसी तरह मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के पास पूरे भारत में 4 लाख 90 हजार रजिस्टर्ड वक्फ़ संपत्तियां हैं।इन संपतियां का भी राष्ट्रीयकरण क्यों नही की जानी चाहिए? ये सभी संपत्तियां लगभग छह लाख एकड़ में फैली हुई हैं। इतनी संपत्तियों के बाद भी इन्हें माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक) का दर्जा क्यों दिया गया है...? क्या 20 करोड़ की आबादी के बावजूद किसी धर्म विशेष के अनुयायियों को अल्पसंख्यक माना जा सकता है...? जिस तरह भारत सरकार सनातन धर्म के मंदिरों का अधिग्रहण करती है उसी तरह चर्च और मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड की परिसंपत्तियों का अधिग्रहण क्यों नहीं किया जाता...?
अगर तिरूपति बालाजी, काशी विश्वनाथ, द्वारिका, सोमनाथ, वैष्णो देवी, उज्जैन के महाकालेश्वर और राज राजेश्वर जैसे मंदिरों को सरकार अपने अधीन कर सकती है तो हाजी अली दरगाह, ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, शेख बख़्तियार काकी और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाहों को क्यों छोड़ा गया है...?
हर त्याग की अपेक्षा सिर्फ़ सनातन धर्म के अनुयायियों से ही क्यों की जाती है..? जब दरगाहों से आया पैसा, सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिम उम्मा पर ही ख़र्च किया जाता है तो सनातन धर्म के मंदिरों से आया पैसा सरकार दूसरे मज़हबों के लोगों पर क्यों ख़र्च करती है...? इस पैसे को सिर्फ़ इंडो-वैदिक धर्मों (सनातन, बौद्ध, जैन और सिक्ख) के अनुयायियों पर ही क्यों न ख़र्च किया जाए..?

मुहम्मद बिन कासिब ने भारत पर पहला सफल आक्रमण किया, 7वीं सदी में, उस वक्त पूरी दुनिया में लगभग 70करोड़ हिन्दू थे ....उसके पूरे एक हजार साल बाद अर्थात् जब हमारे देश से समुदाय विशेष का राज लगभग खत्म होने को आया, 17 वीं सदी में, उस वक्त पूरी दुनिया में केवल और केवल, 20 करोड़ हिन्दू बचे थे ...
 इन एक हजार सालों में दुनिया की आबादी 5 गुणा बढ़ गई । इस हिसाब से हिन्दुओं की आबादी 70 करोड़ से 5 गुणा बढ़कर 350 करोड़ होनी चाहिए थी लेकिन हूई केवल 20 करोड़ । यानी  330 करोड़ हिन्दू पिछले एक हजार सालों में समुदाय विशेष के लोगों ने कम कर दिए । ये आकडे इतने भयानक है कि अगर कोई इंसान इन आकडो के पीछे की कहानी ध्यान से पढ़ ले तो फिर उसे पूरी रात नींद नहीं आ सकती ।

7 वीं सदी में पूरी दुनिया में हिन्दू 70 करोड़ थे जो आज 21वीं सदी में 100 करोड़ हुएं हैं, यानी 1400 सालों में केवल 30 करोड़ बढ़े....और जो समुदाय विशेष के लोग 7 वीं सदी में पूरी दुनिया में केवल 15 लाख थे आज 21वीं सदी में वो 150 करोड़ हो गए हैं ...ये आकडे बताते हैं कि पिछले एक हजार सालों में कितने जुल्म और अत्याचार हिन्दुओं के ऊपर समुदाय विशेष ने किए होंगे ।
 तुम फिर भी कहते हो कि समुदाय विशेष के लोग हमारे भाई हैं और उनकी बढ़ती जनसंख्या भारतवर्ष और हिन्दू धर्म के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है....?


सैयद मुहम्मद मुराहिद हुसैन जाफरी द्वारा बड़े बदलाव की शुरुआत ...

देश में मुस्लिम नेता मुस्लिमों को भड़का रहे है उन्हें दंगे करने और लड़ाई लड़ने के लिए उकसा रहे हैं. भारत को बर्बाद करने की कसम खा रहे हैं तो वही  कुछ मुस्लिम ऐसे भी हैं जो इन सबको छोड़ देश के लोगो की सेवा भी कर रहे हैं.
 अभी-अभी  मुहर्रम गया है.... मुहर्रम त्यौहार में कई जगहों पर मुस्लिम अपने शरीर को जख्मी कर ख़ून बहाकर मुहर्रम पर मातम मनाते हैं लेकिन  गुजरात के एक गाँव से जो तस्वीर सामने आई है उसे देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह गया
 मुहर्रम के दिन मुस्लिम लोग अपने शरीर को जख्मी कर खून को बहाते हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए गुजरात में साबरकंथा जिले के एक गाँव में यह फैसला लिया गया कि मुहर्रम के दिन इस गाँव के लोग अपने शरीर को जख्मी कर खून नही बहायेंगे बल्कि वो अपना खून जरुरतमंदों को दान में देंगे
शिया जाफरी मशायखी मोमिन जमात ने मुहर्रम के अवसर पर यह कदम उठाते हुए कहा कि पैगंबर मोहम्मद के पोते इमाम हुसैन की कुर्बानी पर अब हमने फैसला लिया है कि अब हम खून नही बहायेंगे. इस्लाम धर्म के नाम पर कुछ करनेके लिए इस गाँव के लोगों ने अपना खून दान में दे दिया. यहाँके लोग खुद को ब्लेड से घायल कर खून नही बहाते.
कई जगहों पर हो चुकी है शुरुवात गुजरात के ईदर, सूरपुर, केशारपुरा,जैथीपुरा, मंगध जैसेशहरों और गावों में शिया जाफरी मशायखी मोमिन जमात की तरह बल्ड डोनेशन कैम्प का आयोजन किया जाता है. मुस्लिम समुदाय के नेता सैयद मुहम्मद मुराहिद हुसैन जाफरी के द्वारा इस बड़े बदलाव की शुरुआत की गयी थी... पिछले साल 35000 यूनिट ब्लड यूनिट इकट्ठा की गयी थी जबकि इस साल मुहर्रम के पहले दिन ही 2800 यूनिट ब्लड जमा हो चुका है.
कुमार अवधेश सिंह
मजारें अगर सूफ़ी संतों की होती हैं तो इनके नाम में 'शहीद' क्यों लगा...?

दरअसल ये मजारें दो तरह की हैं. दोनों ही इस्लाम के प्रचारकों की.... एक का काम तलवार के बल पर इस्लाम को फैलाना था और दूसरे का काम भ्रांतियों और छल (अल-तकिया) से इस्लाम का विस्तार करना था. इस बार 'तलवार वाले संतों' पर चर्चा करते हैं.
'शहीद' शब्द इस्लाम में उन सैनिकों के लिए प्रयोग किया जाता है जो दीन के लिए लड़ते हुए मारे गए हैं. जैसे ईमान शब्द का अर्थ इस्लाम में 'दीन के लिए समर्पण' के तौर पर लिया जाता है न कि स्वच्छ छवि के परिप्रेक्ष्य में, बिल्कुल वैसे ही शहीद का भी अर्थ बदल जाता है. अब ये शहीद थे कौन...? ये शहीद उन इस्लामिक आक्रमणकारियों की फौजों के पैदल सैनिक थे जो धन, धर्म और ध्वज का विस्तार करने के लिए भारत आए थे. ये भारत को दारूल-अमन और दारूल-हर्ब से दारूल-इस्लाम बनाने का ख्वाब लिए थे. इन विधर्मियों को भारत के प्रतापी राजाओं ने काट डाला था. अब ये शहीद कह कर पूजे जा रहे हैं.
कुछ इसी संदर्भ में 'गाज़ी' शब्द का भी प्रयोग होता रहा है. गाज़ी शब्द बना है 'गज़वा' शब्द से. गाज़ी का अर्थ है- "काफिरों का संहारक (जो इस्लाम नहीं मानते उनकी हत्या करने वाला)". इसी तरह लगभग हर मुस्लिम शासक ने, चाहे वह सुल्तान रहा हो या बादशाह, अपने नाम के साथ गाज़ी शब्द ज़रूर जोड़ा. सुल्तान वे होते थे जो उलेमाओं को शासन में हस्तक्षेप का मौका देते थे या इस्लामिक क़ानूनों को शासन में ज्यादा प्राथमिकता देते थे. जबकि बादशाह खुद को इनसे अलग कर लेते थे. पर इस मामले में दोनों ही एकमत थे. जैसे जिस तरह दिल्ली के सुल्तानों में गयासुद्दीन तुगलक का नाम गाज़ी खान था उसी तरह मुगल बादशाहों ने भी इसे अपने नाम के साथ लगाया. सबसे उदार माने जाने वाले अकबर का भी पूरा नाम 'जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह गाज़ी' था. लश्कर-ए-तैयबा की पत्रिका का नाम है- गज़वा टाइम्स. हदीसों में बताए गए भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के ख़्वाब का नाम भी है- गज़वा-ए-हिंद.
इन गाज़ियों में सबसे प्रमुख था- सैयद सालार मसूद गाज़ी. बहराइच में सैयद सालार मसूद गाज़ी की कब्र पर सिर झुकाने वालों में हिंदू ज्यादा हैं. महमूद गजनवी का रिश्तेदार मसूद गाज़ी 1031 ईस्वी में जब भारत पर आक्रमण करने के लिए चला, तो उसने तय किया कि वह हिंद को दारूल-इस्लाम बना कर रहेगा. एक तरह से यह भारत के खिलाफ पहला जिहाद था (बाबर ने भी राणा सांगा के खिलाफ युद्ध में जिहाद का नारा दिया था). पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक के इलाके को लूटते-हत्यायें और बलात्कार करते वह अयोध्या के नजदीक बहराइच पंहुचा. इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे 'गाज़ी बाबा' की उपाधि दी गई. इस दौरान गाजी की विशाल सेना के विरुद्ध 17 हिंदू राजाओं ने गठबंधन कर लिया. शेख अब्दुल रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर उल मसूरी के अनुसार वह 1033 में बहराइच पंहुचा. यहां पर मई-जून 1033 में भयानक रक्तपात वाला युद्ध हुआ. युद्ध इतना भयंकर था कि गाज़ी के हर मुल्ला सैनिक को काट डाला गया. युद्धबंदियों तक को मार दिया गया. 14 जून 1033 को युद्ध समाप्त हुआ. गाज़ी की कब्र बनी. बाद में फिरोजशाह तुगलक ने इस पर मकबरा बनवाया. उसे संत के रूप में प्रचारित किया. आज तक उसकी कब्र पर उर्स लगता है.
तुलसीदास उसकी कब्र पर जाने वालों की खिल्ली उड़ाते हुए कहते हैं-
लही आँख कब आंधरे, बाँझ पूछ कब ल्याइ।
कब कोढ़ी काया रही, जग बहराइच जाइ।।
मतलब कि "पता नहीं कब किस अंधे को आंख मिली, कब किस बाँझ को पुत्र मिल गया, कब किसी कोढ़ी को काया मिली... फिर भी लोग बहराइच जाते हैं..!"
#क्रमशः
 सूफ़ी इस्लाम के प्रचारक  निश्चित रूप से सेक्युलर नहीं थे
. उन्होंने तबलीग़ के लिए हर हथकंडा अपनाया. हर सूफ़ी ने लाखों हिंदुओं को मुसलमान बनाया. इन इस्लाम के सिपाहियों को धर्मद्रोहियों ने महिमा मंडित किया. 
पंजाब में बाबा फरीदगंज शक्कर का नाम काफी श्रद्धा से लिया जाता है. गुरूग्रंथ साहिब तक में उनकी वाणी शामिल है. मगर नवीं शताब्दी की एक फारसी पुस्तक जिसका नाम है ‘मिरात-ए-फरीदी’ लेखक अहमद बुखारी में इस महान सूफ़ी की पोल खोलकर रख दी गई है.
 लेखक के अनुसार इस सूफी ने पंजाब में 25 लाख हिन्दू जाटों का धर्मांतरण करवाया था. उनके दस हजार बुतखानों को ध्वस्त करवाया. इस पुस्तक में उनके इन कारनामों का बड़े विस्तृत रूप से जिक्र किया गया है.
दरअसल सिंध पर पहले हमले के समय ही तगड़ा झटका खाकर इस्लाम समझ गया था कि भारत को केवल तलवार से नहीं जीत सकेंगे. (712 ईस्वी से लेकर 1000 ईस्वी यानी 300 सालों तक भारतीय राजाओं ने अरबी आक्रमणकारियों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया.) योजनाबद्ध रूप से पहले सूफी के वेशधारी भेजे गये, जिन्होंने यहां जनता के मन की घृणा को कम करके इस्लाम को सहज रूप से सहन करने की जमीन तैयार की. पीछे पीछे उनकी सेनाएं आ गयीं.
इस्लाम में शायरी हराम है, क्योंकि जब मुहम्मद साहब ने खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया था तो अरब के लोग कुरान को मुहम्मद की शायरी कहते थे. अरब के शायर कुरान का मजाक उड़ाते थे. इसी तरह इस्लाम में संगीत, गाना बजाना और वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना भी हराम है क्योंकि यह हिदू धर्म के भजन-कीर्तन में इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए चालाक मुस्लिमों ने सोचा कि यदि संगीत के माध्यम से हिन्दुओं में इस्लाम के प्रति रूचि पैदा की जाये तो उनका धर्म परिवर्तन करना सरल होगा. इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ हिन्दुओं ने तो मुसलमानों के आचार विचार और खानपान तो अपना लिए लेकिन मुसलमानों से हमेशा दूरी बनाये रखी. फिर एक कृत्रिम वर्णसंकर छद्म-धर्मनिरपेक्ष गंगा-जमुनी तहजीब बना डाली. इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बता दिया. बाद में दोगले हिन्दुओं ने इसे "धर्मनिरपेक्षता" का नाम दे दिया. मुस्लिम शासकों ने तो इसकी आड़ में हिन्दुओं की खतना करा कर मुसलमान बनाया था. लेकिन इस "धर्मनिरपेक्षता" ने हिन्दुओं की मानसिकता परिवर्तित कर दी. जिस से उनमें अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी. (आज भी यह बुजदिली निरंतर कायम है).
कई मतों के अनुसार तो आज के सूफ़ी संगीत के कई बड़े मरकज तो पहले भारतीय संगीत के घराने थे. चूंकि दीन में संगीत हराम था इसलिए इनसे कहा गया कि वे अल्लाह और उसके नबी मुहम्मद साहब की शान में गीत बनाएं पर इन्हें मक्का और मदीना यानी हज़ पर जाने की इजाज़त नहीं होगी. 
संभवत: इस तथ्य को गोस्वामी तुलसीदासजी ने सबसे अच्छी तरह समझा. उनकी मानस पद्मावत का इतना करारा जवाब है कि आज तक तथाकथित प्रगतिवादी पद्मावत को उसके बराबर खडा करने का दुस्साहस नहीं कर पाए. पद्मावत भी लगभग उसी कुटिल सोच से लिखी गयी थी.
अजमेर के हजरत गरीब नवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में कुछ वर्ष पूर्व लाहौर के एक समाचारपत्र 'कोहिस्तान' में कुछ फ़ारसी पत्र प्रकाशित हुए थे. जो कि उन्होंने शाहबुद्दीन गौरी को लिखे थे. जिसमें उन्होंने अजमेर के किले तारागढ़ को कैसे जीता जाए इसके बारे में कई सुझाव दिए थे. इनकी चार पत्नियां थीं जिनमें से एक पत्नी राजपूत थीं. जिसे किसी युद्ध में बंदी बनाया गया था. इसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया. उससे एक पुत्री का जन्म हुआ था जिसका नाम बीबी जमाल है जिसकी कब्र आज भी अजमेर स्थित दरगाह के परिसर में है. इनके बारे में तत्कालीन फारसी इतिहासकारों ने यह दावा किया है कि उन्होंने दस लाख काफिरों (हिन्दू) को कुफ्र की जिहालत से निकालकर इस्लामी के नूर से रोशन किया अर्थात् उनका धर्मांतरण करवाया. इस सूफी की प्रेरणा से अजमेर और नागौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया. अजेमर स्थित ढाई दिन का झोपड़ा इसका ज्वलंत उदाहरण है.
बंगाली खूंखार और लड़ाके सूफियों में एक मुख्य नाम सिलहट के शेख जलाल का भी है.
 गुलजार-ए-अबरार नामक ग्रंथ के अनुसार उन्होंने राजा गौढ़ गोविन्द को हराया. शेख जलाल का अपने अनुयायियों को स्पष्ट आदेश था कि वह हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने की दावत दें और जो उससे इंकार करे उसे फौरन कत्ल कर दें।

mediya

2 बच्चे वाले टैक्स देते है
14 बच्चे वाले सब्सिडी लेते है
इसलिए विकास पागल हुआ हे कोई मूर्ख पप्पू को समझाए--Sandeep Pandit
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बापू कहते थे "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं"
इसीलिए कांग्रेस 'आतंकवाद' से घृणा करती है और आतंकवादियो से "प्रेम" करती है...
कुमार अवधेश सिंह
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गाज़ियाबाद, यूपी मे मासूम बच्चों को अपाहिज बना भीख मँगवाने वाले एक गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। नाम है शहजाद, गुलशाद और ड़ॉ इमरान। इमरान समाजवादी पार्टी का लीडर था....बच्चों पर ऐसे घिनौने जुल्म करने वालों के भी मानवधिकार होंगे... क्युंकि बिचारे विशेष समुदाय से है...
नेहा गरचा 
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आजकल दो विरोधाभासी ट्रेंड चल रहे हैं,
१) भारत गरीब है इसलिए बुलेट ट्रैन नहीं चाहिए,
२) भारत इतना अमीर है कि लाखों #रोहिंग्या_मुस्लिम को पाल सकता है ...!
मानष सतपथी
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आतंकवाद का धर्म भले ही आपको न पता हो......
पर आतंकवाद को आपका धर्म पता है।

आप काफ़िर जो ठहरे ...।
Mukesh Tandi
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लालबहादुर शास्त्री जी की संदेहास्पद मृत्यु पर बुजुर्ग पत्रकार श्री मनमोहन शर्मा , जो शास्त्री जी के साथ ताशकंद गए थे , लिखते हैं -----
----- मैं ताशकंद में था। शास्त्री जी की मौत को स्वाभाविक नहीं कहा जाता सकता। ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने से पूर्व उन्होंने ताशकंद गए भारतीय पत्रकारों को बता दिया था कि रूस के दबाव के कारण भारत को वो क्षेत्र पाकिस्तान को वापस करने ही होंगे जिन पर युद्ध के दौरान कब्जा किया गया था। उन्होंने पत्रकारों से उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाहिए थी। उन दिनों में मैं युवा था इसलिए मैं फौरन फट पड़ा ‘साहब! दिल्ली जाने पर जूते खूब पड़ेंगे’। जब हम लोग उनके कमरे से बाहर निकलने लगे तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे रोक लिया। बात में बताया कि उन्होंने अपने घर पर बात की थी। उनकी बेटी भी ताशकंद के भावी समझौते के बारे में काफी रूष्ठ है। ये मेरी उनसे आखिरी मुलाकात थी।
यह कड़वी सच्चाई है कि जिस जगह शास्त्री जी को ठहराया गया था वहां डाॅक्टर की कोई व्यवस्था नहीं थी। प्रधानमंत्री का निजी डाॅक्टर माथुर साहब भी वहां से काफी दूर ठहराए गए थे। जब शास्त्री जी के शव को दिल्ली लाया गया तो वो नीला पड़ चुका था। श्रीमती ललिता शास्त्री ने तब भी उनकी मृत्यु की जांच करवाने की काफी मांग की थी मगर रूस के दबाव के कारण किसी ने ध्यान नहीं दिया। मैं नहीं समझता कि अब जांच करवाने से कुछ लाभ होगा। क्योंकि रूस के विघटन के बाद लगभग सारा रिकाॅर्ड नष्ट हो चुका है।
Dr-Abhishek Pratap Singh Rathore

Sunday, 1 October 2017

VYANG...

हंसी नहीं रुक रही मेरी,
आतंकी हाफिज सईद ने पाक विदेश मंत्री के खिलाफ ठोका 10 करोड़ रु. मानहानि का दावा.
कुमार अवधेश सिंह
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इतिहास के पन्नों में दर्ज है काली कहानी ...

क्या आप जानते हैं कि मशहूर गीतकार और शायर मजरूह सुल्तानपुरी को जवाहरलाल नेहरू ने मात्र एक कविता उनके सामने गाने पर उंहें 4 साल के लिए मुंबई की आर्थर रोड जेल में कैद करवा दिया था आज जो कांग्रेसी कु... अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं वह कभी इतिहास के पन्नों में दर्ज है इस काली कहानी की बात नहीं करेंगे
एक मुशायरे में मजनू सुल्तानपुरी ने नेहरू के सामने ही यह कविता पढ़ी थी
मन में ज़हर डॉलर के बसा के,
फिरती है भारत की अहिंसा.
खादी की केंचुल को पहनकर,
ये केंचुल लहराने न पाए.
ये भी है हिटलर का चेला,
मार लो साथी जाने न पाए.
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू,
मार लो साथी जाने न पाए.
नेहरू गुस्से से आग बबूला होकर वहां से चला गया और मात्र 4 घंटे के बाद मुंबई पुलिस ने देशद्रोह के आरोप में मजरूह सुल्तानपुरी को गिरफ्तार कर लिया उनके ऊपर राजद्रोह और देशद्रोह सहित आठ गैरजमानती धाराएं लगाई गई और उंहें आर्थर रोड जेल में कैद कर दिया गया मगर उस वक्त किसी ने भी इसके लिए आवाज नहीं उठाई नेहरू ने उनकी आजादी के लिए शर्त रखी कि यदि आप मुझसे माफी मांग लो तो मैं आप को आजाद कर दूंगा लेकिन खुद्दार मजनू सुल्तानपुरी ने नेहरू से माफी नहीं मांगी अंत में उनकी जमानत हुई और जमानत पर बाहर है और मरते दम तक यह केस उनके ऊपर चलता रहा...